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2011 में शुरू हुआ धनुष तोप प्रोजेक्ट, 15 साल बाद भी पूरी नहीं हुई डिलीवरी; PAC ने बताई देरी की वजह

Dhanush gun production delay
Dhanush Gun Production Delay: PAC Report Reveals Why 155mm Indigenous Howitzer Took So Long. (Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

Dhanush gun production delay: संसद की लोक लेखा समिति यानी पब्लिक अकाउंट्स कमेटी (पीएसी) ने भारतीय सेना की स्वदेशी धनुष 155 एमएम/45 कैलिबर तोप के उत्पादन में हुई देरी पर चिंता जताई है। से जुड़ी कई अहम बातें सामने आई हैं। यह रिपोर्ट सिर्फ धनुष तोप की डिलीवरी में देरी की बात नहीं करती, बल्कि यह भी बताती है कि इस सिस्टम को भारत में विकसित करते समय किन तकनीकी मुश्किलों, इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और स्किल गैप का सामना करना पड़ा।

पीएसी की रिपोर्ट के मुताबिक धनुष प्रोजेक्ट की शुरुआत 2011 में हुई थी। इसका मकसद भारतीय सेना के लिए 155 एमएम/45 कैलिबर की इलेक्ट्रॉनिक और मैकेनिकल रूप से अपग्रेडेड तोप तैयार करना था। इस काम में पहले ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड यानी ओएफबी की प्रमुख भूमिका थी। बाद में ओएफबी के कॉरपोरेटाइजेशन के बाद एआरमामेंट्स से जुड़ी कंपनी एआईडब्ल्यूईआईएल यानी एडवांस्ड वेपन्स एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड (AWEIL) उत्पादन से जुड़ी।

Dhanush gun production delay: क्यों पड़ी धनुष प्रोजेक्ट की जरूरत?

भारतीय सेना के पास लंबे समय से 155 एमएम/39 कैलिबर की बोफोर्स तोपें मौजूद थीं। इन तोपों की खरीद का कॉन्ट्रैक्ट 1986 में स्वीडन की कंपनी एबी बोफोर्स के साथ हुआ था। इस समझौते में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर भी शामिल था, जिससे भारत में कुछ असेंबली और सब-असेंबली तैयार की जाती थीं।

लेकिन लंबे समय तक नई आर्टिलरी गन शामिल नहीं की जा सकी। साल 2009 तक 39 कैलिबर तोपों की कमी काफी बढ़ गई थी। इसके बाद भारत ने अपनी मौजूदा क्षमता के आधार पर नई तोप विकसित करने का रास्ता चुना। डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल यानी डीएसी ने अक्टूबर 2011 में 155 एमएम/39 और 45 कैलिबर गन की खरीद के लिए ‘बाय इंडियन’ श्रेणी में मंजूरी दी। इसके बाद धनुष प्रोजेक्ट शुरू हुआ।

शुरुआत में ही सामने आई तकनीकी चुनौती

रिपोर्ट में रक्षा मंत्रालय ने बताया कि भारत में इससे पहले ऐसी आर्टिलरी गन का डिजाइन और निर्माण नहीं किया गया था। पहले दो प्रोटोटाइप डीएसी की मंजूरी के करीब 12 महीने के भीतर तैयार किए गए। इसके बाद इनकी विस्तृत जांच और ट्रायल शुरू हुए। ट्रायल के नतीजों के आधार पर आगे के प्रोटोटाइप तैयार किए गए।

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक समस्या यह थी कि गन के साथ-साथ इसके कई महत्वपूर्ण हिस्सों को भी भारत में पहली बार डिजाइन और विकसित करना पड़ रहा था। इसलिए प्रोडक्शन के साथ-साथ टेस्टिंग और मूल्यांकन का तरीका भी धीरे-धीरे विकसित हुआ। (Dhanush gun production delay)

2012 में टेस्ट के दौरान बैरल और मजल ब्रेक को नुकसान

धनुष के विकास के शुरुआती चरण में मई 2012 में वैलिडेशन फायरिंग की गई। इस दौरान गन के बैरल और मजल ब्रेक को नुकसान पहुंचा।

इसके बाद 45 कैलिबर बैरल और इलेक्ट्रॉनिक सब-सिस्टम की जांच के आधार पर सितंबर 2012 में आगे की प्रक्रिया के लिए नई मंजूरी दी गई। मार्च 2013 में ओएफबी को गन बनाने का इंडेंट दिया गया।

बाद के परीक्षणों में भी कुछ तकनीकी समस्याएं सामने आईं। जुलाई 2017 में यूजर एक्सप्लॉइटेशन फायरिंग के दौरान मजल ब्रेक और उससे जुड़े सब-सिस्टम में खराबी हुई। इसके बाद इसकी जांच की गई।

रक्षा मंत्रालय के अनुसार बाद में हुई जांच में किसी एक कारण को इस घटना के लिए जिम्मेदार नहीं पाया गया। बालासोर स्थित प्रूफ एंड एक्सपेरिमेंटल एस्टेब्लिशमेंट यानी पीएक्सई में जांच के दौरान प्रोपेलेंट के जलने के चलते प्रेशर ऑसिलेशन की दिक्कत देखी गई। जुलाई 2018 में बोर्ड ऑफ ऑफिसर्स की जांच रिपोर्ट में मजल ब्रेक के फेल होने को वेपन सिस्टम से नहीं जोड़ा गया। (Dhanush gun production delay)

सामान्य गन से ज्यादा लंबे थे यूजर ट्रायल

धनुष की टेस्टिंग भी सामान्य प्रक्रिया से ज्यादा लंबी रही। मंत्रालय ने पीएसी को बताया कि धनुष को तीन गन की ट्रूप फॉर्मेशन और छह गन की बैटरी फॉर्मेशन में भी टेस्ट किया गया।

सामान्य तौर पर किसी नई गन को यूजर ट्रायल के दौरान सिंगल गन के रूप में भी जांचा जा सकता है। लेकिन धनुष को सेना की जरूरत के अनुसार अलग-अलग फॉर्मेशन में परखा गया।

रिपोर्ट के मुताबिक धनुष के लिए बुल्क प्रोडक्शन क्लीयरेंस (बीपीसी) फरवरी 2019 में मिली। इससे पहले इसका लंबा डेवलपमेंट, ट्रायल और इवैल्यूएशन चरण चला। (Dhanush gun production delay)

2019 में बीपीसी मिली, फिर भी उत्पादन अटका

बीपीसी मिलने के बाद मार्च 2019 में कुछ धनुष गन सेना को जारी की गईं। इसके बाद फैक्ट्री ने बड़े पैमाने पर उत्पादन की तैयारी शुरू की।

फैक्ट्री ने अपने स्तर पर कई सब-असेंबली तैयार कर ली थीं। लेकिन गन का अंतिम इंटीग्रेशन इलेक्ट्रॉनिक सूट और इलेक्ट्रिकल सिस्टम से जुड़ा हुआ था। रिपोर्ट के मुताबिक बीईएल से मिलने वाले ये सिस्टम जनवरी 2020 में मिले।

इसके बाद कुछ गन को अंतिम प्रूफ टेस्ट के लिए 20 मार्च 2020 तक पीएक्सई बालासोर भेजा गया। इसी दौरान देश में कोविड-19 महामारी के चलते राष्ट्रीय लॉकडाउन शुरू हो गया।

2021 में फिर हुई तकनीकी समीक्षा

धनुष प्रोजेक्ट से जुड़े सभी पक्षों की समीक्षा के लिए रक्षा उत्पादन विभाग के अतिरिक्त सचिव ने 29 जुलाई 2021 को बैठक की। मंत्रालय के अनुसार इस बैठक में उठाए गए तकनीकी मुद्दों को संबंधित पक्षों के संयुक्त प्रयास से बाद में हल किया गया।

इसके बाद गन को प्रूफ पास किया गया और 8 मार्च 2022 को पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज में सफल कॉन्फिडेंस फायरिंग हुई। इसके बाद गन को सेना में शामिल करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया। (Dhanush gun production delay)

स्वदेशी पावर पैक भी जोड़ा गया

धनुष प्रोजेक्ट में एक महत्वपूर्ण बदलाव पावर पैक को लेकर हुआ। शुरुआत में यह पावर पैक फॉरेन ऑरिजनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर से आयात किया जाता था।

बाद में इसे स्वदेशी पावर पैक से बदल दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार नए पावर पैक वाली धनुष गन सेना की यूनिट्स को दी जा चुकी हैं। इससे आयात पर निर्भरता कम हुई और स्वदेशी सामग्री का हिस्सा बढ़ा। (Dhanush gun production delay)

उत्पादन में देरी की बड़ी वजह क्या थी?

पीएसी की रिपोर्ट में कई कारण सामने आए हैं। सबसे बड़ी समस्या यह थी कि भारत में इस स्तर की आर्टिलरी गन बनाने का पहले का अनुभव नहीं था।

प्रोजेक्ट के दौरान स्वदेशी 155 एमएम बैरल डिजाइन, नया मजल ब्रेक, बैलिस्टिक्स विशेषज्ञता, गन इलेक्ट्रॉनिक्स, नेविगेशन सिस्टम और एडवांस साइटिंग सिस्टम को बैलिस्टिक कंप्यूटर के साथ इंटीग्रेशन जैसी चुनौतियां सामने आईं।

इसके अलावा ऑटो-लेइंग तकनीक, माइक्रो-अलॉय स्टील, कास्टिंग, फोर्जिंग और इलेक्ट्रॉनिक रिले जैसे महत्वपूर्ण हिस्सों को भी स्वदेशी बनाने की चुनौती थी। (Dhanush gun production delay)

इंफ्रास्ट्रक्चर और सप्लाई चेन भी बनी चुनौती

मंत्रालय ने समिति को बताया कि धनुष जैसा बड़ा प्रोजेक्ट शुरू करने के समय उपलब्ध प्रोडक्शन इंफ्रास्ट्रक्चर उसकी जरूरत के मुताबिक काफी नहीं था। इंफ्रास्ट्रक्चर को धीरे-धीरे मजबूत किया गया।

इसके अलावा शुरुआत में ऐसी सप्लाई चेन भी मौजूद नहीं थी, जो इस स्तर के जटिल आर्टिलरी कंपोनेंट तैयार कर सके। धनुष प्रोजेक्ट के दौरान कई नए सप्लायर और तकनीकी क्षमताएं विकसित हुईं। (Dhanush gun production delay)

प्रोजेक्ट की निगरानी के लिए बना था टेक्निकल ओवरसाइट ग्रुप

धनुष प्रोजेक्ट की निगरानी के लिए पुराने ओएफबी के स्तर पर नियमित मॉनिटरिंग की जाती थी। इसके अलावा भारतीय सेना के आर्टिलरी डायरेक्टोरेट ने टेक्निकल ओवरसाइट ग्रुप यानी टीओजी बनाया था।

इस ग्रुप में प्रोजेक्ट से जुड़े अलग-अलग पक्ष शामिल थे। इसका उद्देश्य तकनीकी मुद्दों की समीक्षा करना और प्रोजेक्ट की प्रगति को आगे बढ़ाना था।

इसके बावजूद पीएसी ने पाया कि प्रोजेक्ट कई समय-सीमाओं से पीछे रहा। समिति ने उत्पादन, सप्लाई चेन और तकनीकी समस्याओं पर ज्यादा सक्रिय निगरानी की जरूरत बताई है। (Dhanush gun production delay)

देरी से सेना की आर्टिलरी तैयारी पर पड़ा असर

रक्षा मंत्रालय ने खुद पीएसी को बताया कि धनुष के उत्पादन में देरी का असर भारतीय सेना की ऑपरेशनल प्रिपेयर्डनेस, खासकर आर्टिलरी पर पड़ा।

इस क्षमता के अंतर को कम करने के लिए सेना ने कई दूसरे उपाय किए। इनमें 130 एमएम गनों को 155 एमएम/45 कैलिबर सारंग और सोल्टम गन में अपग्रेड करना, अमेरिकी एम-777ए2 155 एमएम/39 कैलिबर गन शामिल करना, 155 एमएम/52 कैलिबर एटीएजीएस का स्वदेशी विकास और के-9 वज्र-टी गनों को शामिल करना शामिल था। पुरानी गनों की लाइफ एक्सटेंशन भी की गई। (Dhanush gun production delay)

प्रोडक्शन की नई समय-सीमा मार्च 2027

मूल योजना के अनुसार मार्च 2013 में दिए गए इंडेंट के बाद बुल्क प्रोडक्शन क्लीयरेंस मिलने के 36 महीने के भीतर उत्पादन और डिलीवरी का टारगेट रखा गया था।

ओएफबी के कॉरपोरेटाइजेशन के बाद 28 सितंबर 2021 को डीडीम्ड कॉन्ट्रैक्ट किया गया, जिसे 10 अक्टूबर 2023 को संशोधित किया गया। मौजूदा योजना के अनुसार एआईडब्ल्यूईआईएल ने सभी ऑर्डर वाली धनुष गनों की डिलीवरी मार्च 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा है। (Dhanush gun production delay)

पीएसी ने देरी पर क्या कहा?

पीएसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि धनुष के मामले में देरी सिर्फ एक प्रोडक्शन समस्या नहीं थी। समिति ने घरेलू तकनीकी क्षमता, इंफ्रास्ट्रक्चर, स्किल और सप्लाई चेन की तैयारी को प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले पर्याप्त रूप से जांचने की जरूरत बताई।

समिति ने यह भी कहा कि डिफेंस सेक्टर के मुश्किल स्वदेशी प्रोजेक्ट्स के लिए तकनीकी विशेषज्ञता और प्रशिक्षित मानव संसाधन की जरूरत को पहले ही पहचानना जरूरी है। रिपोर्ट में आईआईटी जैसे तकनीकी संस्थानों के जरिए विशेष स्किल डेवलपमेंट कोर्स शुरू करने और डिफेंस पीएसयू सेक्टर की कंपनियों के कर्मचारियों को नियमित रूप से अपस्किल करने की सिफारिश की गई है।

धनुष प्रोजेक्ट की प्रक्रिया में 155 एमएम का 23-लीटर चैंबर बैरल, स्वदेशी बैलिस्टिक्स, गन इलेक्ट्रॉनिक्स, नेविगेशन, एडवांस साइटिंग, ऑटो-लेइंग, माइक्रो-अलॉय स्टील और कई महत्वपूर्ण सब-सिस्टम डेवलप किए गए। पीएसी रिपोर्ट में इन क्षमताओं को इस प्रोजेक्ट से मिली प्रमुख तकनीकी सीख के रूप में बताया गया है। (Dhanush gun production delay)

वायुसेना खरीदेगी 150 एडवांस्ड जेट ट्रेनर, हॉक-132 की जगह आएगा नेक्स्ट-जनरेशन एयरक्राफ्ट

IAF 150 trainer aircraft
IAF Begins Process to Acquire 150 Next-Generation Trainer Aircraft to Replace Hawk Mk-132. (Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

IAF 150 trainer aircraft: भारतीय वायुसेना ने अपने फाइटर पायलट ट्रेनिंग सिस्टम को अपग्रेड करने की तैयारी कर रही है। वायुसेना ने 150 नए एडवांस्ड जेट ट्रेनर विमानों की खरीद प्रक्रिया शुरू करने के लिए रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन यानी आरएफआई जारी की है। इसके तहत मौजूदा हॉक एमके-132 एडवांस्ड जेट ट्रेनर की जगह अगली पीढ़ी के ट्रेनर एयरक्राफ्ट खरीदे जाएंगे।

इन्हें ऐसे समय में इस्तेमाल किया जाएगा जब पायलट को ट्रेनर विमान से निकलकर आधुनिक लड़ाकू विमान की कॉकपिट में जाने के लिए तैयार किया जाता है। जहां पर पायलट को रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, डेटा लिंक और आधुनिक वेपन सिस्टम से जुड़ी ट्रेनिंग की जरूरत होती है।

यह स्टेज-3 ट्रेनर कैटेगरी का विमान होगा। यह विमान ट्रेनिंग की फाइनल फ्लाइट स्टेज में इस्तेमाल होगा, जिसके बाद पायलट ऑपरेशनल फाइटर स्क्वाड्रन में जाता है।

IAF 150 trainer aircraft: 150 विमानों के लिए शुरू हुई खरीद प्रक्रिया

भारतीय वायुसेना को करीब 150 नेक्स्ट-जेनरेशन ट्रेनर एयरक्राफ्ट की जरूरत है। फिलहाल कंपनियों और विमान निर्माताओं से तकनीकी जानकारी मांगी गई है। आरएफआई के जवाब जमा करने की अंतिम तारीख 5 अक्टूबर 2026 है।

इसके बाद अगले चरण में रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल यानी आरएफपी जारी किया जाएगा। आरएफपी जारी करने का लक्ष्य दिसंबर 2027 रखा गया है। कॉन्ट्रैक्ट प्रभावी होने के बाद विमानों की डिलीवरी और सिस्टम की इंडक्शन 60 महीने के भीतर पूरी करने की शर्त रखी गई है। (IAF 150 trainer aircraft)

हॉक एमके-132 की जगह आएगा नया ट्रेनर

भारतीय वायुसेना में हॉक एमके-132 ने फरवरी 2008 में सेवा शुरू की थी। लंबे समय से यही विमान स्टेज-3 ट्रेनिंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

हॉक का इस्तेमाल उस समय किया जाता है जब पायलट बेसिक और इंटरमीडिएट ट्रेनिंग पूरी करने के बाद तेज गति वाले जेट और लड़ाकू विमान के ऑपरेशन के लिए तैयार होता है। इस ट्रेनिंग में पायलट को फाइटर जेट जैसी उड़ान परिस्थितियों से परिचित कराया जाता है।

अब वायुसेना ऐसा विमान चाहती है जिसमें आधुनिक फाइटर जेट के ज्यादा सिस्टम को ट्रेनिंग के दौरान ही इस्तेमाल किया जा सके। (IAF 150 trainer aircraft)

क्या होती है स्टेज-3 ट्रेनिंग?

फाइटर पायलट बनने की ट्रेनिंग कई चरणों में होती है। शुरुआती चरण में पायलट को बेसिक उड़ान कौशल सिखाया जाता है। इसके बाद इंटरमीडिएट ट्रेनर के जरिए जेट उड़ान और अधिक मुश्किल तकनीकों की ट्रेनिंग होती है।

स्टेज-3 में पायलट को फाइटर जेट उड़ाने वाली ट्रेनिंग दी जाती है। इसी स्टेज में तेज गति, आधुनिक कॉकपिट, वेपन सिस्टम, रडार और मिशन से जुड़ीं कई तरह की ट्रेनिंग दी जाती हैं।

नए विमान को इसी जरूरत को ध्यान में रखकर तैयार किया जाना है। इसका उद्देश्य पायलट को सुखोई-30एमकेआई, राफेल, तेजस और आगे चलकर एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एएमसीए जैसे विमानों की ट्रेनिंग के लिए तैयार करना है।

नए ट्रेनर में फ्लाई-बाय-वायर सिस्टम

आरएफआई में नए ट्रेनर के लिए सबसे महत्वपूर्ण फ्लाई-बाय-वायर फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम है। फ्लाई-बाय-वायर में पायलट के कंट्रोल इनपुट को इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम के जरिए प्रोसेस करके विमान के कंट्रोल सरफेस तक पहुंचाया जाता है। इससे विमान को कंट्रोल करने में कंप्यूटर बेस्ड मदद मिलती है और आधुनिक लड़ाकू विमान जैसे फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम का अनुभव ट्रेनिंग के दौरान ही मिल सकता है।

विमान में ग्लास कॉकपिट की भी मांग की गई है। ग्लास कॉकपिट में पारंपरिक एनालॉग मीटर की जगह डिजिटल डिस्प्ले का इस्तेमाल होता है। इसमें उड़ान, नेविगेशन और विमान से जुड़ी दूसरी महत्वपूर्ण जानकारी स्क्रीन पर दिखाई जाती है। (IAF 150 trainer aircraft)

एचओटीएएस कंट्रोल से फाइटर जैसी ट्रेनिंग

नए ट्रेनर में हैंड्स ऑन थ्रॉटल एंड स्टिक यानी एचओटीएएस सिस्टम की भी जरूरत बताई गई है।

एचओटीएएस का मतलब है कि पायलट कई महत्वपूर्ण कंट्रोल बिना हाथों को मुख्य स्टिक और थ्रॉटल से हटाए ऑपरेट कर सकता है। आधुनिक फाइटर जेट में इससे पायलट के काम में आसानी होती है क्योंकि उसे बार-बार अलग-अलग स्विच या कंट्रोल तक हाथ ले जाने की जरूरत नहीं पड़ती।

ट्रेनर में इसका इस्तेमाल पायलट को आधुनिक फाइटर कॉकपिट के ऑपरेशन से परिचित कराने के लिए किया जाएगा।

नाविक, जीपीएस और ग्लोनास से नेविगेशन

नया विमान भारत के नाविक सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम के साथ जीपीएस और ग्लोनास नेविगेशन सिस्टम लैस होगा। इस तरह के मल्टी-सिस्टम नेविगेशन से विमान को अपनी स्थिति और दिशा की जानकारी अलग-अलग सैटेलाइट नेविगेशन सोर्सेज से मिल सकती है। (IAF 150 trainer aircraft)

कंट्रोल छूटने पर खुद संभल सकेगा विमान

नए ट्रेनर की सुरक्षा से जुड़ी एक महत्वपूर्ण जरूरत यह है कि विमान अचानक अनियंत्रित उड़ान स्थिति में जाने से बच सके।

आरएफआई में ऐसे विमान की मांग की गई है जो डिपार्चर जैसी स्थिति के प्रति प्रतिरोधी हो। अगर किसी स्थिति में पायलट विमान पर नियंत्रण छोड़ देता है तो सिस्टम विमान को वापस नियंत्रित उड़ान में लाने में सक्षम होना चाहिए।

इस तरह की सुविधा ट्रेनिंग विमान में खास महत्व रखती है, क्योंकि नए पायलट जटिल उड़ान परिस्थितियों का अभ्यास करते हैं।

जीरो-जीरो इजेक्शन सीट भी जरूरी

विमान में जीरो-जीरो इजेक्शन सीट की आवश्यकता भी रखी गई है। इसका मतलब ऐसी इजेक्शन सीट से है जिसे विमान के जमीन पर खड़े होने या बहुत कम ऊंचाई और गति की स्थिति में भी पायलट की सुरक्षा के लिए इस्तेमाल किया जा सके।

ट्रेनिंग के दौरान सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इजेक्शन सिस्टम विमान के महत्वपूर्ण सुरक्षा उपकरणों में शामिल होता है। (IAF 150 trainer aircraft)

तेजस और एएमसीए के दौर में क्यों जरूरी है नया ट्रेनर?

भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमान बेड़े में तेजस और राफेल जैसे आधुनिक प्लेटफॉर्म शामिल हैं। इसके अलावा तेजस एमके-2 और एएमसीए जैसे कार्यक्रम भी लड़ाकू विमान क्षमता से जुड़े हैं।

ऐसे विमानों को उड़ाने वाले पायलटों को केवल सामान्य जेट उड़ान का अनुभव देना काफी नहीं होता। उन्हें आधुनिक कॉकपिट, डिजिटल एवियोनिक्स, रडार, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और नेटवर्क आधारित युद्ध प्रणाली के अनुरूप तैयार करना पड़ता है।

इसी वजह से नया ट्रेनर केवल एक उड़ान प्रशिक्षण विमान नहीं, बल्कि लीड-इन फाइटर ट्रेनर यानी लिफ्ट की भूमिका निभाने वाला प्लेटफॉर्म होगा। (IAF 150 trainer aircraft)

एचएएल भी दौड़ में

इस कार्यक्रम में भारतीय और विदेशी विमान निर्माता दोनों अपनी टेक्नोलॉजी पेश कर सकते हैं। भारतीय पक्ष में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल प्रमुख दावेदार है।

एचएएल ने एचएलएफटी-42 नाम का सुपरसोनिक लीड-इन फाइटर ट्रेनर डेवलप करने की योजना पेश की है। यह विमान आधुनिक लड़ाकू विमानों की ट्रेनिंग जरूरतों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है।

एचएलएफटी-42 को एयरो इंडिया 2023 में मॉडल के रूप में प्रदर्शित किया गया था। इससे जुड़े कार्यक्रम में 95 से 100 केएन श्रेणी के इंजन की जरूरत बताई गई है। हालांकि इस कार्यक्रम के मौजूदा विकास चरण को लेकर पूरी जानकारी नहीं दी गई है। (IAF 150 trainer aircraft)

विदेशी कंपनियां भी कर सकती हैं दावेदारी

आरएफआई में भारतीय कंपनियों के साथ विदेशी विमान निर्माताओं के लिए भी अवसर है। संभावित अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म में इटली का लियोनार्डो एम-346, दक्षिण कोरिया का केएआई टी-50, रूस का याक-130 और अमेरिका का बोइंग टी-7ए जैसे विमान चर्चा में हैं।

इनमें एम-346 और टी-50 जैसे विमान पहले से कई देशों की मिलिट्री ट्रेनिंग में इस्तेमाल किए जा रहे हैं। वहीं टी-7ए एक डिजिटल डिजाइन वाले नए सुपरसोनिक ट्रेनर के रूप में विकसित किया गया है।

अंतिम चयन केवल विमान के नाम या प्रदर्शन के आधार पर नहीं होगा। तकनीकी मूल्यांकन के बाद योग्य विमानों का भारत में फील्ड ट्रायल किया जाएगा। इसके बाद तकनीकी रूप से योग्य प्रस्तावों में से खरीद प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। (IAF 150 trainer aircraft)

यशस और एचएलएफटी-42

भारतीय ट्रेनर विमान कार्यक्रम में एचजेटी-36 भी महत्वपूर्ण रहा है। इस विमान का नाम एयरो इंडिया 2025 में बदलकर यशस किया गया था। इसके विकास के दौरान विमान की हैंडलिंग से जुड़ी कई तकनीकी समस्याओं पर लंबे समय तक काम किया गया।

दूसरी तरफ एचएलएफटी-42 अभी विकास कार्यक्रम के स्तर पर है। इसलिए 150 विमानों वाला नया कार्यक्रम भारतीय और विदेशी दोनों प्लेटफॉर्म के लिए बड़े स्तर की तकनीकी जांच से जुड़ा है। (IAF 150 trainer aircraft)

अब समंदर में दुश्मन की पनडुब्बियों की खैर नहीं, दो नए भारतीय युद्धपोतों पर लगे हैं ये खास स्वदेशी एडवांस्ड सोनार, 16 पर लगाने की तैयारी

NPOL Indigenous Sonar System
Indigenous Sonar Systems Boost Indian Navy’s INS Dunagiri and INS Agray with Advanced Underwater Surveillance Capability. (Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

NPOL Indigenous Sonar System: भारतीय नौसेना की ताकत बढ़ाने में केवल मिसाइलों, युद्धपोतों और पनडुब्बियों को ही रोल नहीं है, बल्कि उन तकनीकों से भी बढ़ी है जो समुद्र के भीतर छिपे खतरों को समय रहते पहचान सकें। हाल ही में कमीशन किए गए भारतीय नौसेना के दो स्वदेशी युद्धपोतों आईएनएस दुनागिरी और आईएनएस अग्रय में पूरी तरह स्वदेशी सोनार सिस्टम तैनात किए गए हैं। 21 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोलकाता में इन दोनों स्वदेशी युद्धपोतों को नौसेना में शामिल किया था। इन जहाजों में 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है।

सूत्रों ने बताया कि ये सोनार सिस्टम कोच्चि स्थित डीआरडीओ की प्रयोगशाला नेवल फिजिकल एंड ओशनोग्राफिक लेबोरेटरी (एनपीओएल) ने डेवलप किए हैं।

बता दें कि स्टेल्थ फ्रिगेट आईएनएस दुनागिरी और एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट आईएनएस अग्रय को गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) ने बनाया है।

NPOL Indigenous Sonar System: समुद्र के भीतर कैसे काम करता है सोनार?

समुद्र के भीतर किसी भी युद्धपोत के लिए सोनार उतना ही महत्वपूर्ण होता है, जितना आसमान में उड़ने वाले विमान के लिए रडार। यही सिस्टम पानी के भीतर छिपी पनडुब्बियों, टॉरपीडो और अन्य खतरों का पता लगाने का काम करता है।

सोनार को किसी भी युद्धपोत की पानी के भीतर देखने और सुनने वाली आंख और कान माना जाता है। समुद्र के अंदर पनडुब्बियां, टॉरपीडो और अन्य अंडरवॉटर प्लेटफॉर्म सामान्य रडार से दिखाई नहीं देते। ऐसे में सोनार ध्वनि तरंगों के जरिए उनकी पहचान करता है।

सोनार दो तरीकों से काम करता है। एक्टिव मोड में यह ध्वनि तरंग भेजता है और लौटने वाली गूंज से टारगेट की लोकेशन का पता लगाता है। पैसिव मोड में यह केवल आसपास मौजूद ध्वनियों को सुनता है और उनके आधार पर टारगेट की पहचान करता है। आधुनिक नौसैनिक युद्ध में सोनार की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि पनडुब्बियों से होने वाले खतरे लगातार बढ़ रहे हैं।

NPOL क्यों है खास?

कोच्चि स्थित नेवल फिजिकल एंड ओशनोग्राफिक लेबोरेटरी (NPOL) को भारत की अंडरवाटर सर्विलांस और एंटी-सबमरीन वॉरफेयर तकनीकों की रीढ़ माना जाता है। यह प्रयोगशाला वर्षों से भारतीय नौसेना के लिए सोनार और अंडरवाटर सेंसर डेवलप कर रही है।

भारतीय महासागर क्षेत्र में समुद्र का तापमान, पानी की गहराई, समुद्री धाराएं और जहाजों की आवाजाही लगातार बदलती रहती है। ऐसे माहौल में पनडुब्बियों का पता लगाना आसान नहीं होता। एनपीओएल के बनाए सिस्टम इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं। (NPOL Indigenous Sonar System)

आईएनएस दुनागिरी पर लगा है HUMSA-2020

प्रोजेक्ट-17ए के तहत तैयार आईएनएस दुनागिरी एक आधुनिक स्टेल्थ गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट है। इस युद्धपोत को लंबी दूरी पर दुश्मन की पनडुब्बियों और अन्य अंडरवॉटर खतरों की पहचान करने की जरूरत होती है।

सूत्रों के मुताबिक इस युद्धपोत को HUMSA-2020 यानी HUMSA-NG मार्क-II सोनार से लैस किया गया है।

यह चौथी पीढ़ी का हुल-माउंटेड एक्टिव-कम-पैसिव सोनार है। इसे एनपीओएल ने डिजाइन किया है, जबकि इसका निर्माण बेंगलुरु स्थित भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड ने किया है।

यह सिस्टम एक्टिव और पैसिव दोनों मोड में काम करता है। HUMSA-2020 की एक्टिव डिटेक्शन रेंज लगभग 40 किलोमीटर तक है। यह एक साथ आठ अलग-अलग टारगेट्स को ट्रैक कर सकता है। इसमें ऑटोमेटेड टॉरपीडो डिटेक्शन, डिजिटल डेटा रिकॉर्डिंग, टारगेट लाइब्रेरी और एडवांस्ड सिग्नल प्रोसेसिंग जैसी सुविधाएं मौजूद हैं।

युद्धपोत के ऑपरेटरों को जानकारी देने के लिए इसमें हाई-रिजॉल्यूशन मल्टी-फंक्शन कंसोल लगाए गए हैं। ये कंसोल सोनार और अन्य सेंसर से मिलने वाले डेटा को एक साथ दिखाते हैं, जिससे ऑपरेटर तेजी से फैसला ले सकते हैं। (NPOL Indigenous Sonar System)

दुश्मन की पनडुब्बी की गतिविधि पर रखता है नजर

HUMSA-2020 में कई एडवांस्ड फीचर्स शामिल किए गए हैं। इसमें एडैप्टिव प्रोसेसिंग, ब्रॉडबैंड और नैरोबैंड एनालिसिस, डिजिटल डेटा रिकॉर्डिंग और ऑटोमेटेड टॉरपीडो डिटेक्शन जैसी क्षमताएं मौजूद हैं।

सिस्टम टारगेट की ध्वनिक पहचान के लिए टारगेट लाइब्रेरी भी तैयार करता है। इससे किसी पनडुब्बी या अंडरवॉटर प्लेटफॉर्म की पहचान अधिक सटीकता से की जा सकती है।

यदि किसी दुश्मन पनडुब्बी का पता पहले ही चल जाए तो युद्धपोत टॉरपीडो, एंटी-सबमरीन रॉकेट या अन्य हथियारों का इस्तेमाल सुरक्षित दूरी से कर सकता है।

इसमें सोनार परफॉर्मेंस मॉडलिंग सिस्टम और नियर-फील्ड अकॉस्टिक कैरेक्टराइजेशन सिस्टम जैसी सुविधाएं भी जोड़ी गई हैं। ऑपरेटरों के लिए हाई-रिजोल्यूशन मल्टी-फंक्शन कंसोल उपलब्ध हैं, जहां रडार और सोनार से मिलने वाली जानकारी एक साथ देखी जा सकती है। (NPOL Indigenous Sonar System)

कई युद्धपोतों पर पहले से तैनात है यह सिस्टम

सूत्रों ने बताया कि डीआरडीओ ने 2019 से 2022 के बीच HUMSA-NG को नई इलेक्ट्रॉनिक आर्किटेक्चर के साथ अपग्रेड करके HUMSA-2020 डेवलप किया था। यह सिस्टम पहले ही भारतीय नौसेना के कई युद्धपोतों पर तैनात किया जा चुका है।

अब तक इसके लिए 16 से अधिक ऑर्डर दिए जा चुके हैं। इनमें प्रोजेक्ट-17ए के सात युद्धपोत, तलवार श्रेणी के युद्धपोत, अतिरिक्त तलवार क्लास जहाज, आईएनएस राणा और आईएनएस ब्रह्मपुत्र शामिल हैं। (NPOL Indigenous Sonar System)

आईएनएस अग्रय के लिए खास तौर पर बनाया गया Abhay PG

जहां आईएनएस दुनागिरी खुले समुद्र में काम करता है, वहीं आईएनएस अग्रय का मुख्य काम तटीय और उथले समुद्री क्षेत्रों में पनडुब्बियों का पता लगाना है। ऐसे इलाकों में सोनार ऑपरेशन ज्यादा चुनौतीपूर्ण होता है क्योंकि समुद्री लहरें, चट्टानें, समुद्र तल की बनावट और जहाजों का ट्रैफिक ध्वनि संकेतों को प्रभावित करते हैं।

इसी कारण एनपीओएल ने आईएनएस अग्रय के लिए Abhay PG नाम का विशेष शैलो वॉटर सोनार डेवलप किया है। यह भी एक्टिव और पैसिव दोनों मोड में काम करता है।

यह एक कॉम्पैक्ट हुल-माउंटेड एक्टिव-कम-पैसिव सोनार है जिसे खास तौर पर छोटे युद्धपोतों और एंटी-सबमरीन वॉरफेयर प्लेटफॉर्म के लिए डिजाइन किया गया है। (NPOL Indigenous Sonar System)

उथले समुद्र में पनडुब्बियों की पहचान में सक्षम

अभय पीजी शैलो वॉटर सोनार सूट का हिस्सा है। यह सतह और पानी के भीतर मौजूद दोनों तरह के टारगेट्स को डिटेक्ट, लोकेलाइज, क्लासिफाई और ट्रैक कर सकता है।

इस सिस्टम में ट्रांसड्यूसर एरे, डेटा एक्विजिशन सिस्टम, पावर एम्प्लीफायर और ड्यूल मल्टी-फंक्शन कंसोल शामिल हैं। इसमें एडवांस्ड सिग्नल प्रोसेसिंग तकनीक का उपयोग किया गया है, जिससे समुद्र में मौजूद अनचाहे शोर को अलग करके वास्तविक लक्ष्य की पहचान की जा सकती है।

यह सिस्टम पहले इस्तेमाल किए जा रहे विदेशी और रूसी मूल के सिस्टम का स्वदेशी विकल्प मानी जा रही है। (NPOL Indigenous Sonar System)

16 एंटी-सबमरीन युद्धपोतों में लगेगा यह सोनार

सूत्रों ने बताया कि अभय पीजी को भारतीय नौसेना के 16 शैलो वॉटर क्राफ्ट्स में लगाने की योजना है। इनमें जीआरएसई और कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड द्वारा बनाए जा रहे अर्नाला क्लास एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शिप शामिल हैं।

इन युद्धपोतों का मुख्य कार्य भारत के तटीय क्षेत्रों और महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा करना है। ऐसे में इनके लिए उथले समुद्र में प्रभावी रूप से काम करने वाला सोनार जरूरी माना जाता है। (NPOL Indigenous Sonar System)

भारतीय महासागर की परिस्थितियों के लिए खास डिजाइन

सूत्रों ने बताया कि दोनों सोनार सिस्टम भारतीय महासागर क्षेत्र की विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखकर विकसित किए गए हैं। उष्णकटिबंधीय समुद्री क्षेत्रों में ध्वनि का व्यवहार ठंडे समुद्रों से अलग होता है। इसी वजह से विदेशी सिस्टम हमेशा सर्वोत्तम परिणाम नहीं दे पाते।

एनपीओएल ने इन सिस्टम्स को भारतीय समुद्री परिस्थितियों के अनुरूप तैयार किया है। इससे भारतीय नौसेना को स्थानीय वातावरण में बेहतर अंडरवाटर निगरानी क्षमता मिलती है। (NPOL Indigenous Sonar System)

UP Defence Corridor: कानपुर में बन रहे टैंक और आर्टिलरी के लिए आधुनिक एम्युनिशन, 30 करोड़ गोलियां और लाखों ग्रेनेड बनाने की तैयारी

Kanpur Defence Manufacturing Hub
Kanpur Emerges as India’s New Defence Manufacturing Hub, Ammunition Production Capacity Set for Major Expansion. (Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

Kanpur Defence Manufacturing Hub: उत्तर प्रदेश अब केवल औद्योगिक और कृषि राज्य के तौर पर ही नहीं, बल्कि देश के तेजी से उभरते डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग सेंटर के रूप में भी अपनी पहचान मजबूत कर रहा है। उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के तहत कानपुर में रक्षा उत्पादन से जुड़ी गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं। छोटे हथियारों के लिए गोलियों के निर्माण से लेकर टैंक और आर्टिलरी सिस्टम में इस्तेमाल होने वाले बड़े कैलिबर के एम्युनिशन तक, कानपुर अब स्वदेशी रक्षा उत्पादन का महत्वपूर्ण केंद्र बनता जा रहा है।

अदाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस की कानपुर स्थित एम्युनिशन मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी में चल रहे विस्तार और बढ़ती उत्पादन क्षमता ने इस क्षेत्र को नई पहचान दी है। कंपनी का कहना है कि यहां निवेश, आधुनिक तकनीक और बड़े पैमाने पर उत्पादन के जरिए भारत की रक्षा जरूरतों को पूरा करने की दिशा में काम किया जा रहा है।

Kanpur Defence Manufacturing Hub: कानपुर में बढ़ रहा डिफेंस इंडस्ट्री का दायरा

कानपुर के हाथीपुर इलाके में स्थापित अदाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस की यूनिट आज देश की प्रमुख निजी रक्षा निर्माण सुविधाओं में गिनी जा रही है। हाल ही में आयोजित एक विशेष दौरे के दौरान कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) आशीष राजवंशी ने यूनिट की मौजूदा क्षमता और विस्तार योजनाओं की जानकारी दी।

उन्होंने बताया कि कंपनी पहले ही कानपुर में लगभग 4,000 करोड़ रुपये का निवेश कर चुकी है। अब यूनिट के विस्तार के लिए करीब 250 एकड़ अतिरिक्त क्षेत्र विकसित करने की तैयारी चल रही है। इस विस्तार परियोजना में लगभग 2,000 करोड़ रुपये का निवेश प्रस्तावित है। इसके अलावा आने वाले वर्षों में लगभग 4,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त निवेश करने की योजना भी बताई गई।

Kanpur Defence Manufacturing Hub
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रोजगार के अवसरों में हो रही बढ़ोतरी

डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग के विस्तार का असर रोजगार पर भी दिखाई दे रहा है। वर्तमान में इस यूनिट में करीब 2,000 कुशल और अकुशल कर्मचारी कार्यरत हैं। उत्पादन क्षमता बढ़ने के साथ-साथ मैन्युफैक्चरिंग, सप्लाई चेन, लॉजिस्टिक्स, मशीन ऑपरेशन और तकनीकी सेवाओं से जुड़े क्षेत्रों में भी रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं।

डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के तहत विकसित हो रही अन्य औद्योगिक गतिविधियों का लाभ भी स्थानीय स्तर पर देखने को मिल रहा है। इससे कानपुर की औद्योगिक पहचान को नया आयाम मिला है। (Kanpur Defence Manufacturing Hub)

सालाना 30 करोड़ राउंड गोलियां बनाने की तैयारी

कानपुर स्थित इस यूनिट में फिलहाल हर साल लगभग 15 करोड़ राउंड विभिन्न प्रकार की गोलियों का उत्पादन किया जा रहा है। कंपनी का लक्ष्य इस उत्पादन क्षमता को बढ़ाकर 30 करोड़ राउंड सालाना तक पहुंचाना है।

यह गोलियां सेना, अर्धसैनिक बलों और अन्य सुरक्षा एजेंसियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले विभिन्न हथियारों के लिए तैयार की जाती हैं। अधिकारियों के अनुसार उत्पादन क्षमता बढ़ाने का उद्देश्य घरेलू मांग को पूरा करना और आयात पर निर्भरता कम करना है। (Kanpur Defence Manufacturing Hub)

Kanpur Defence Manufacturing Hub
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छोटे हथियारों से लेकर आर्टिलरी तक का बन रहा एम्युनिशन

इस मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी में कई प्रकार के एम्युनिशन का निर्माण और असेंबली की जा रही है। इसमें स्मॉल कैलिबर एम्युनिशन शामिल है, जिसका इस्तेमाल राइफल और अन्य छोटे हथियारों में होता है।

इसके साथ ही लार्ज कैलिबर एम्युनिशन का निर्माण भी किया जा रहा है, जिसका उपयोग टैंक और आर्टिलरी सिस्टम में किया जाता है। अधिकारियों ने बताया कि मीडियम कैलिबर एम्युनिशन के उत्पादन की तैयारी भी चल रही है। ऐसे एम्युनिशन का इस्तेमाल ऑटो कैनन और अन्य आधुनिक हथियार प्रणालियों में किया जाता है।

ग्रेनेड उत्पादन क्षमता में भी बढ़ोतरी

कंपनी ने ग्रेनेड निर्माण क्षमता बढ़ाने की योजना की भी जानकारी दी। इसके तहत 2027 तक सालाना 40 लाख ग्रेनेड उत्पादन क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है।

ग्रेनेड सैन्य अभियानों में इस्तेमाल होने वाले महत्वपूर्ण उपकरणों में शामिल हैं। इसलिए इनके स्वदेशी उत्पादन को रक्षा क्षेत्र में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कंपनी के अनुसार उत्पादन सुविधाओं को इस तरह विकसित किया जा रहा है कि गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित किया जा सके। (Kanpur Defence Manufacturing Hub)

Kanpur Defence Manufacturing Hub
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ऑपरेशन सिंदूर से मिला आत्मनिर्भरता का संदेश

सीईओ आशीष राजवंशी ने कहा कि हाल के वर्षों में हुए सैन्य अभियानों और वैश्विक परिस्थितियों ने यह स्पष्ट किया है कि किसी भी देश के लिए रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर होना कितना महत्वपूर्ण है।

उन्होंने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान यह महसूस किया गया कि संकट की स्थिति में मित्र देश सहयोग के लिए तैयार हो सकते हैं, लेकिन उनकी अपनी रणनीतिक प्राथमिकताएं भी होती हैं। ऐसे में महत्वपूर्ण सैन्य सामग्री की आपूर्ति में देरी की संभावना बनी रहती है। इसी कारण भारत में ही गोला-बारूद और रक्षा उपकरणों का उत्पादन बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। (Kanpur Defence Manufacturing Hub)

अभय राइफल और प्रहार एलएमजी ने खींचा ध्यान

यूनिट में कई स्वदेशी हथियार प्रणालियों का भी प्रदर्शन किया गया। इनमें अभय राइफल विशेष आकर्षण का केंद्र रही। अधिकारियों के अनुसार यह राइफल 5.56 एमएम और 9 एमएम दोनों प्रकार के एम्युनिशन का उपयोग करने में सक्षम है।

इसके अलावा प्रहार लाइट मशीन गन भी प्रदर्शित की गई। कंपनी का दावा है कि इस हथियार को भारतीय सेना से अच्छी प्रतिक्रिया मिली है। यहां पिस्टल, राइफल और मशीन गन की कई अन्य श्रेणियों को भी दिखाया गया।

Kanpur Defence Manufacturing Hub
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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से हो रही गुणवत्ता जांच

डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में अब आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ रहा है। कानपुर की इस यूनिट में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई आधारित निरीक्षण प्रणाली का उपयोग किया जा रहा है।

अधिकारियों के मुताबिक केस-लाइन इंस्पेक्शन टेक्नोलॉजी की मदद से प्रत्येक एम्युनिशन केस की जांच की जाती है। यह सिस्टम निर्धारित मानकों के अनुसार उत्पाद की गुणवत्ता का मूल्यांकन करता है। इससे निरीक्षण प्रक्रिया अधिक तेज और सटीक बनती है तथा उत्पादन में एकरूपता बनाए रखने में मदद मिलती है। (Kanpur Defence Manufacturing Hub)

नाटो मानकों के अनुरूप हो रहा निर्माण

कंपनी के अधिकारियों ने बताया कि यहां तैयार किए जा रहे कई प्रकार के एम्युनिशन और आर्टिलरी सिस्टम नाटो मानकों के अनुरूप बनाए जा रहे हैं।

नाटो मानकों का पालन करने का मतलब है कि उत्पादों की गुणवत्ता, विश्वसनीयता और प्रदर्शन को अंतरराष्ट्रीय स्तर के मानकों के अनुरूप रखा जाता है। इससे हथियार प्रणालियों के बीच बेहतर इंटरऑपरेबिलिटी सुनिश्चित होती है और प्रदर्शन में एकरूपता बनी रहती है।

अधिकारियों के अनुसार कानपुर में तैयार किए जा रहे कुछ रक्षा उत्पादों के लिए मित्र देशों की ओर से भी रुचि दिखाई गई है। उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के तहत विकसित हो रही यह क्षमता राज्य को देश के प्रमुख रक्षा विनिर्माण केंद्रों में शामिल कर रही है, जहां गोला-बारूद, छोटे हथियार और एडवांस मिलिट्री सिस्टम्सके उत्पादन पर तेजी से काम हो रहा है। (Kanpur Defence Manufacturing Hub)

LAC और LoC की हाई-एल्टीट्यूड चौकियों तक ड्रोन पहुंचाएंगे राशन, दवा और गोला-बारूद, DRDO का नया प्लान हेलीकॉप्टरों की जरूरत करेगा खत्म!

DRDO VTOL Logistics Drone
DRDO Launches Indigenous High-Altitude VTOL Logistics Drone Project for Indian Army Forward Posts. (Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

DRDO VTOL Logistics Drone: भारतीय सेना की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है ऊंचे पहाड़ी इलाकों में तैनात सैनिकों तक समय पर रसद पहुंचाना। नियंत्रण रेखा (एलओसी) और वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के कई इलाकों में सैनिक 12,000 फीट से लेकर 18,000 फीट से अधिक ऊंचाई पर तैनात रहते हैं। इन इलाकों में राशन, दवाइयां, गोला-बारूद, कम्युनिकेशन इक्विपमेंट्स और जरूरी स्पेयर पार्ट्स पहुंचाना हमेशा से कठिन और महंगा काम रहा है।

इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए डीआरडीओ ने एक नया स्वदेशी प्रोजेक्ट शुरू किया है। डीआरडीओ की तरफ से जारी आरएफआई के मुताबिक ऐसा हाई-एल्टीट्यूड वीटीओएल लॉजिस्टिक्स ड्रोन डेवलप किया जाएगा, जो बिना रनवे के उड़ान भर सके, मुश्किल पहाड़ी इसकों में उतर सके और हेवी पेलोड लेकर फॉरवर्ड पोस्ट तक पहुंच सके। इस प्रोजेक्ट का मकसद दुर्गम इलाकों में रसद सप्लाई को अधिक तेज, सुरक्षित और भरोसेमंद बनाना है।

DRDO VTOL Logistics Drone: ऊंचे इलाकों में सप्लाई क्यों है बड़ी चुनौती?

भारत की उत्तरी सीमाओं पर स्थित कई सैन्य चौकियां ऐसे इलाकों में हैं जहां सड़क संपर्क सीमित है। भारी बर्फबारी, भूस्खलन, हिमस्खलन, तेज हवाएं और अत्यधिक ठंड के कारण कई बार सप्लाई मार्ग बाधित हो जाते हैं। ऐसी परिस्थितियों में सेना को खच्चरों, मानव पोर्टरों और हेलीकॉप्टरों पर निर्भर रहना पड़ता है।

हेलीकॉप्टर प्रभावी साधन हैं, लेकिन उनकी उड़ान लागत अधिक होती है। खराब मौसम में उड़ानें प्रभावित होती हैं और सीमित संख्या में उपलब्ध हेलीकॉप्टरों को कई तरह के सैन्य कार्यों में लगाया जाता है। इसके अलावा ऊंचाई वाले क्षेत्रों में फ्लाइंग ऑपरेशन तकनीकी रूप से भी कठिन होता है।

यही वजह है कि अब ऐसा सिस्टम डेवलप करने पर जोर दिया जा रहा है जो बिना पायलट के स्वचालित रूप से आवश्यक सामग्री सैनिकों तक पहुंचा सके। (DRDO VTOL Logistics Drone)

क्या है हाई-एल्टीट्यूड वीटीओएल लॉजिस्टिक्स ड्रोन?

यह एक विशेष प्रकार का अनमैन्ड एरियल व्हीकल होगा, जिसे वीटीओएल यानी वर्टिकल टेक-ऑफ एंड लैंडिंग क्षमता के साथ विकसित किया जाएगा। इसका अर्थ है कि इसे उड़ान भरने या उतरने के लिए किसी रनवे की जरूरत नहीं होगी।

ड्रोन केवल 5×5 मीटर के छोटे और बिना रनवे वाले इलाके से भी उड़ान भर सकेगा और वहीं उतर सकेगा। पहाड़ी इलाकों में यह क्षमता बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि वहां समतल भूमि की उपलब्धता बहुत कम होती है।

इस सिस्टम का पूरा डिजाइन स्वदेशी होगा और इसमें भारत में विकसित तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा।

200 किलोग्राम तक सामान ले जाने की क्षमता

प्रोजेक्ट के अनुसार ड्रोन की पेलोड क्षमता 200 किलोग्राम तक होगी। ड्रोन एक बार में बड़ी मात्रा में राशन, चिकित्सा सामग्री, गोला-बारूद या अन्य जरूरी सैन्य उपकरण पहुंचाए जा सकेंगे।

ड्रोन का कुल वजन 700 किलोग्राम से अधिक होगा। यह लगभग 100 किलोमीटर तक उड़ान भरने में सक्षम होगा, जिसमें 50 किलोमीटर वन-वे मिशन शामिल है।

अधिकतम रफ्तार करीब 120 किलोमीटर प्रति घंटा रखी गई है। इससे दुगर्म इलाकों में स्थित चौकियों तक सामग्री पहुंचाने में लगने वाला समय काफी कम हो सकता है। (DRDO VTOL Logistics Drone)

25,000 फीट तक ऑपरेशनल क्षमता

इस प्रोजेक्ट की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक इसकी हाई-एल्टीट्यूड क्षमता है। ड्रोन को 25,000 फीट तक की सर्विस सीलिंग के लिए डिजाइन किया जा रहा है।

यह 15,000 फीट तक की ऊंचाई वाले क्षेत्रों से टेक-ऑफ कर सकेगा। इतनी ऊंचाई पर वायु घनत्व कम हो जाता है, जिससे सामान्य इंजन और रोटर सिस्टम की परफॉरमेंस पर असर पड़ता है।

इसी वजह से प्रोजेक्ट में विशेष रूप से हाई-एल्टीट्यूड ऑपरेशन के लिए जरूरी प्रोपल्शन सिस्टम डेवलप करने पर जोर दिया गया है। (DRDO VTOL Logistics Drone)

स्वदेशी हैवी-फ्यूल इंजन होगा सबसे अहम हिस्सा

ड्रोन का ऑपरेशन इंडिजिनस हैवी-फ्यूल इंटरनल कंबशन इंजन (आईसी इंजन) से होगा। यह इंजन जेपी-8 और डीजल जैसे मिलिट्री फ्यूल्स पर चलने में सक्षम होगा।

मिलिट्री इस्तेमाल के लिए हैवी-फ्यूल इंजन को अधिक सुरक्षित और व्यावहारिक माना जाता है क्योंकि सेना पहले से ही ऐसे ईंधनों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करती रही है।

ऊंचाई वाले इलाकों में कम ऑक्सीजन की स्थिति में इंजन की परफॉरमेंस बनाए रखना एक बड़ी तकनीकी चुनौती होती है। इसलिए इंजन को विशेष रूप से हाई-एल्टीट्यूड संचालन के लिए डिजाइन किया जाएगा।

एफएडीईसी तकनीक से होगा इंजन कंट्रोल

इस प्रोजेक्ट में फुल अथॉरिटी डिजिटल इंजन कंट्रोल यानी एफएडीईसी तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा।

एफएडीईसी एक डिजिटल सिस्टम है जो इंजन के फ्यूल फ्लो, पावर आउटपुट और प्रदर्शन को स्वतः नियंत्रित करती है। इससे इंजन की दक्षता बढ़ती है और बदलती परिस्थितियों में बेहतर प्रदर्शन मिलता है।

ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में तापमान, हवा और वायुदाब लगातार बदलते रहते हैं। ऐसे वातावरण में एफएडीईसी तकनीक इंजन को स्थिर प्रदर्शन बनाए रखने में मदद करती है। (DRDO VTOL Logistics Drone)

बिना पायलट पूरा होगा मिशन

ड्रोन में मिलिट्री-ग्रेड ऑटोनॉमस फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम लगाया जाएगा। यह सिस्टम पूर्व निर्धारित मार्ग के अनुसार ड्रोन को स्वतः उड़ाने में सक्षम होगी।

ड्रोन वेपॉइंट नेविगेशन, बाधाओं की पहचान और इमरजेंसी रिकवरी जैसी क्षमताओं से लैस होगा। यदि किसी वजह से कम्युनिकेश ब्लॉक हो जाए तो भी यह सुरक्षित तरीके से मिशन पूरा कर सकेगा या निर्धारित स्थान पर लौट सकेगा। (DRDO VTOL Logistics Drone)

नेविगेशन में होगी मल्टी-लेयर सिक्योरिटी

सीमावर्ती क्षेत्रों में नेविगेशन सिस्टम का सुरक्षित होना बेहद जरूरी है। इसलिए इस ड्रोन में जीपीएस, ग्लोनास और नाविक आधारित मल्टी-कॉन्स्टेलेशन जीएनएसएस सिस्टम लगाया जाएगा।

इसके साथ इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम का भी इस्तेमाल किया जाएगा। यदि सैटेलाइट सिग्नल ब्लॉक हो जाएं तब भी ड्रोन अपनी स्थिति का अनुमान लगाकर उड़ान जारी रख सकेगा।

ड्रोन में एंटी-जैमिंग और एंटी-स्पूफिंग तकनीक भी होगी ताकि इलेक्ट्रॉनिक युद्ध की स्थिति में इसकी कार्यक्षमता प्रभावित न हो। (DRDO VTOL Logistics Drone)

दो मीटर के भीतर सटीक डिलीवरी

प्रोजेक्ट के अनुसार पेलोड डिलीवरी की सटीकता दो मीटर सीईपी के भीतर रखी गई है।

सीईपी (सर्कुलर एरर प्रोबेबिलिटी) का अर्थ है कि ड्रोन द्वारा पहुंचाई गई सामग्री निर्धारित स्थान से औसतन केवल दो मीटर के दायरे में गिरेगी या उतरेगी। पहाड़ी इलाकों और छोटी चौकियों के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण क्षमता मानी जाती है।

इससे गोला-बारूद, चिकित्सा सामग्री और अन्य आवश्यक उपकरण सही स्थान पर पहुंचाने में आसानी होगी।

बेहद कठिन मौसम में भी करेगा ऑपरेशन

ड्रोन को माइनस 40 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 60 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में काम करने योग्य बनाया जाएगा। यह उड़ान के दौरान 50 से 60 किलोमीटर प्रति घंटे तक की हवाओं का सामना कर सकेगा। टेक-ऑफ और लैंडिंग के समय 25 से 30 किलोमीटर प्रति घंटे की हवा में भी ऑपरेशन संभव होगा। सीमावर्ती पर्वतीय क्षेत्रों में मौसम तेजी से बदलता है। इसलिए ऑल-वेदर क्षमता इस प्रोजेक्ट का महत्वपूर्ण हिस्सा है। (DRDO VTOL Logistics Drone)

सिक्योर कम्युनिकेशंस और साइबर सिक्योरिटी पर विशेष ध्यान

ड्रोन और ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन के बीच सुरक्षित डेटा कम्युनिकेशन के लिए एन्क्रिप्टेड मिलिट्री डेटालिंक का इस्तेमाल किया जाएगा।

सिस्टम में एईएस-256 स्तर की एन्क्रिप्शन तकनीक शामिल होगी। इसके अलावा साइबर हमलों, सिग्नल स्पूफिंग और इलेक्ट्रॉनिक व्यवधानों से सुरक्षा के लिए विशेष उपाय किए जाएंगे।

यह सुनिश्चित किया जाएगा कि मिशन से जुड़ी जानकारी किसी भी अनधिकृत व्यक्ति तक न पहुंचे।

ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन से होगी निगरानी

ड्रोन के ऑपपरेशन के लिए पोर्टेबल और रग्ड ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन विकसित किया जाएगा। यह स्टेशन वास्तविक समय में ड्रोन की स्थिति, गति, ऊंचाई और पेलोड की जानकारी प्रदर्शित करेगा। एक ही स्टेशन से कई ड्रोन की निगरानी और नियंत्रण भी संभव होगा। इसके साथ मिशन प्लानिंग और फ्लाइट मैनेजमेंट सॉफ्टवेयर भी विकसित किया जाएगा। (DRDO VTOL Logistics Drone)

आत्मनिर्भर रक्षा तकनीक पर जोर

प्रोजेक्ट के तहत केवल ड्रोन ही नहीं बल्कि इंजन, फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम, नेविगेशन कंप्यूटर, डेटालिंक, मिशन सॉफ्टवेयर, पावर मैनेजमेंट सिस्टम और अन्य महत्वपूर्ण उप-प्रणालियों को भी स्वदेशी रूप से डेवलप करने पर जोर दिया गया है।

इसके लिए उद्योग, अनुसंधान संस्थानों और अकादमिक संगठनों से तकनीकी प्रस्ताव मांगे गए हैं। उनसे विकास समय, लागत, मानव संसाधन, अवसंरचना और स्वदेशी सामग्री के इस्तेमाल का विस्तृत विवरण भी मांगा गया है।

इस प्रोजेक्ट के लिए इंडस्ट्री, रिसर्च इंस्टीट्यूट्स और अकैडमिक ऑर्गेनाइजेशन्स से टेक्निकल प्रपोजल मांगे गए हैं। उनसे यह भी पूछा गया है कि इस ड्रोन सिस्टम को विकसित करने में कितना समय लगेगा, अनुमानित लागत क्या होगी, कितनी मैनपावर की जरूरत पड़ेगी, किस तरह का इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए होगा और सिस्टम में कितनी स्वदेशी सामग्री (इंडिजिनस कंटेंट) का इस्तेमाल किया जाएगा। (DRDO VTOL Logistics Drone)

भारतीय नौसेना की नई P-75i पनडुब्बियों में लगेगी स्वदेशी लिथियम-आयन बैटरी, अब और देर तक रहेंगी समंदर के अंदर

P75 India submarine
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P75 India submarine: समुद्र के भीतर लंबे समय तक छिपकर ऑपरेशन करने की क्षमता किसी भी आधुनिक पनडुब्बी की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है। पनडुब्बी जितनी देर तक बिना सतह पर आए पानी के भीतर रह सकती है, उसकी युद्धक क्षमता उतनी ही अधिक मानी जाती है। यही वजह है कि दुनिया की प्रमुख नौसेनाएं अब पारंपरिक लेड-एसिड बैटरियों की जगह एडवांस लिथियम-आयन बैटरी तकनीक पर तेजी से काम कर रही हैं।

भारतीय नौसेना भी अपनी अगली पीढ़ी की पनडुब्बियों के लिए इसी दिशा में बड़ा कदम उठा रही है। नई पीढ़ी की पनडुब्बियों को अधिक ऊर्जा, लंबी अंडरवाटर एंड्योरेंस, तेज चार्जिंग और बेहतर सुरक्षा देने के लिए स्वदेशी लिथियम-आयन बैटरी सिस्टम विकसित करने की प्रक्रिया शुरू की गई है। इस पहल का उद्देश्य केवल पनडुब्बियों की क्षमता बढ़ाना ही नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ऊर्जा भंडारण तकनीक में आत्मनिर्भरता हासिल करना भी है।

मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (एमडीएल) ने पी-75 इंडिया प्रोजेक्ट के लिए लिथियम-आयन बैटरी सिस्टम और बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम के डिजाइन, डेवलपमेंट और सप्लाई के लिए कंपनियों से एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट मांगा है। इस बैटरी सिस्टम का उपयोग उन छह नई डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक पनडुब्बियों में किया जाएगा, जिन्हें पी-75 इंडिया कार्यक्रम के तहत बनाया जाना है।

P75 India submarine: क्या है पी-75 इंडिया प्रोजेक्ट?

पी-75 इंडिया भारतीय नौसेना के सबसे महत्वपूर्ण पनडुब्बी प्रोजेक्ट्स में से एक है। इसके तहत छह अत्याधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों का निर्माण किया जाना है। इन पनडुब्बियों में एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन यानी एआईपी तकनीक, एडवांस सेंसर, मॉडर्न वेपन सिस्टम और नेक्स्ट जनरेशन एनर्जी सिस्टम शामिल होगा।

वर्तमान में भारतीय नौसेना की कलवरी श्रेणी की पनडुब्बियां प्रोजेक्ट-75 के तहत बनाई गई हैं। जनवरी 2025 में आईएनएस वाग्शीर के शामिल होने के साथ इस सीरीज की सभी छह पनडुब्बियां नौसेना को मिल चुकी हैं। अब नौसेना का ध्यान अगली पीढ़ी की और अधिक सक्षम पनडुब्बियों पर है।

इसी नए प्रोजेक्ट में लिथियम-आयन बैटरी सिस्टम एक प्रमुख भूमिका निभाने वाला है।

एमडीएल ने क्या मांगा है?

एमडीएल ऐसी भारतीय कंपनियों को शॉर्टलिस्ट करना चाहती है जो लिथियम-आयन बैटरी सिस्टम और बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम का डिजाइन, डेवलपमेंट, ट्रायल्स और सप्लाई कर सकें।

इन छह पनडुब्बियों के लिए लगभग 20.64 मेगावाट-घंटा क्षमता वाले बैटरी सिस्टम की जरूरत है। वहीं, बैटरी पैक का रेटेड वोल्टेज लगभग 740 से 800 वोल्ट डीसी होगा।

कंपनियों को केवल बैटरी सेल उपलब्ध नहीं कराने होंगे, बल्कि पूरा बैटरी सिस्टम डेवलप करना होगा। इसमें सेल सिलेक्शन, बैटरी मॉड्यूल डिजाइन, बैटरी पैक, बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम, कूलिंग सिस्टम, ट्रायल और प्रोडक्शन सीरीज तक की पूरी जिम्मेदारी शामिल होगी। (P75 India submarine)

पनडुब्बी के लिए बैटरी इतनी महत्वपूर्ण क्यों होती है?

पनडुब्बी को अक्सर समुद्र के भीतर एक चलता-फिरता इलेक्ट्रिसिटी सिस्टम कहा जाता है। जब पनडुब्बी सतह पर होती है या स्नॉर्कलिंग मोड में चलती है, तब डीजल जनरेटर बिजली बनाते हैं। लेकिन जब वह पूरी तरह पानी के भीतर होती है, तब उसे अपनी बैटरियों पर निर्भर रहना पड़ता है।

यही बैटरियां पनडुब्बी के सेंसर, नेविगेशन सिस्टम, वेपन कंट्रोल सिस्टम, जीवन रक्षक उपकरणों और प्रोपल्शन सिस्टम को ऊर्जा उपलब्ध कराती हैं।

यदि बैटरी की क्षमता अधिक होगी तो पनडुब्बी लंबे समय तक पानी के भीतर रह सकेगी। यही वजह है कि आधुनिक नौसैनिक युद्ध में बैटरी तकनीक को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

लिथियम-आयन बैटरी और लेड-एसिड बैटरी में क्या अंतर है?

दुनिया की अधिकांश पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां लंबे समय तक लेड-एसिड बैटरियों का उपयोग करती रही हैं। हालांकि नई पीढ़ी की पनडुब्बियां तेजी से लिथियम-आयन बैटरियों की ओर बढ़ रही हैं।

लिथियम-आयन बैटरियों की एनर्जी डेंसिटी अधिक होती है। इसका मतलब है कि समान जगह में अधिक ऊर्जा संग्रहित की जा सकती है। ये बैटरियां तेजी से चार्ज होती हैं, उनका जीवनकाल अधिक होता है और उनका रखरखाव भी अपेक्षाकृत कम होता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसी बैटरियां पनडुब्बी को अधिक समय तक पानी के भीतर रहने की क्षमता प्रदान करती हैं। इससे उसकी गोपनीयता और युद्धक क्षमता दोनों बढ़ती हैं। (P75 India submarine)

एलएफपी तकनीक को ही क्यों चुना गया?

वहीं, इस प्रोजेक्ट में केवल लिथियम-आयरन फॉस्फेट (एलएफपी) रसायन तकनीक का उपयोग किया जाएगा। एलएफपी बैटरियां अन्य लिथियम-आयन तकनीकों की तुलना में अधिक सुरक्षित मानी जाती हैं। इनमें थर्मल रनअवे यानी अत्यधिक गर्म होकर आग लगने का खतरा कम होता है।

पनडुब्बी जैसे बंद और संवेदनशील वातावरण में सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता होती है। इसलिए एलएफपी तकनीक को चुना गया है। इसके अलावा एलएफपी बैटरियां लंबी आयु और स्थिर प्रदर्शन के लिए भी जानी जाती हैं।

बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम क्या करेगा?

केवल बैटरी होना काफी नहीं होता। आधुनिक बैटरी सिस्टम में बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम यानी बीएमएस भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। बीएमएस बैटरी के हर सेल की निगरानी करता है। यह तापमान, वोल्टेज, चार्ज स्तर और प्रदर्शन पर लगातार नजर रखता है।

यदि किसी सेल में असामान्य गतिविधि दिखाई देती है तो बीएमएस तुरंत चेतावनी देता है और आवश्यक सुरक्षा कदम उठाता है। पनडुब्बी में जहां हजारों बैटरी सेल एक साथ जुड़े होते हैं, वहां बीएमएस पूरी प्रणाली की सुरक्षा और विश्वसनीयता सुनिश्चित करता है। (P75 India submarine)

कूलिंग सिस्टम भी होगा बेहद महत्वपूर्ण

ज्यादा क्षमता वाली बैटरियां ऑपरेशन के दौरान हीट पैदा करती हैं। यदि इस हीट को कंट्रोल नहीं किया जाए तो प्रदर्शन प्रभावित हो सकता है। इसी कारण एमडीएल ने कंपनियों से प्रभावी थर्मल मैनेजमेंट यानी कूलिंग सिस्टम विकसित करने की मांग की है। यह प्रणाली बैटरियों को सुरक्षित तापमान पर बनाए रखेगी और लंबे समय तक उनकी कार्यक्षमता सुनिश्चित करेगी।

भारत में ही बनेंगे बैटरी सेल

ईओआई की सबसे महत्वपूर्ण शर्तों में से एक यह है कि सभी बैटरी सेल भारत में निर्मित होने चाहिए। एमडीएल ने यह भी स्पष्ट किया है कि उत्पादन तकनीक किसी ऐसे देश से नहीं ली जा सकती जो भारत के साथ भूमि सीमा साझा करता हो। यह शर्त राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखकर रखी गई है।

डिफेंस सेक्टर में इस्तेमाल होने वाले महत्वपूर्ण उपकरणों में विदेशी निर्भरता कम करना सरकार की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है। (P75 India submarine)

केवल नई पनडुब्बियां ही नहीं, पुरानी पनडुब्बियों पर भी फोकस

जहां एक ओर पी-75 इंडिया प्रोजेक्ट के लिए नई बैटरी टेक्नोलॉजी डेवलप की जा रही है, वहीं दूसरी ओर भारतीय नौसेना अपनी मौजूदा कलवरी श्रेणी की पनडुब्बियों के मेंटेनेंस और लाइफसाइकिल सपोर्ट पर भी ध्यान दे रही है।

हाल ही में नौसेना ने पी-75 बेड़े के लिए स्टैटिक फ्रीक्वेंसी कन्वर्टर और स्टीयरिंग गियर कंसोल जैसे महत्वपूर्ण स्पेयर पार्ट्स की खरीद प्रक्रिया शुरू की है। (P75 India submarine)

ये ऐसे उपकरण हैं जो पनडुब्बी के इलेक्ट्रिकल सिस्टम और डायरेक्शन कंट्रोल के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं।

क्या करते हैं स्टैटिक फ्रीक्वेंसी कन्वर्टर?

पनडुब्बी के भीतर अलग-अलग सोर्सेज से आने वाली बिजली को कंट्रोल और स्टेबल बनाना जरूरी होता है।

स्टैटिक फ्रीक्वेंसी कन्वर्टर यही काम करते हैं। वे बिजली को ऐसे रूप में बदलते हैं जिसे पनडुब्बी के संवेदनशील उपकरण सुरक्षित रूप से उपयोग कर सकें।

यदि यह सिस्टम खराब हो जाए तो नेविगेशन, निगरानी और हथियार नियंत्रण जैसी महत्वपूर्ण प्रणालियां प्रभावित हो सकती हैं। (P75 India submarine)

क्यों जरूरी हैं स्टीयरिंग गियर कंसोल ?

स्टीयरिंग गियर कंसोल पनडुब्बी की दिशा और गहराई नियंत्रण प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

इन्हीं के माध्यम से चालक दल पनडुब्बी को मोड़ता है, उसकी गहराई नियंत्रित करता है और सुरक्षित ऑपरेशन सुनिश्चित करता है। ऐसे उपकरणों के लिए उच्च गुणवत्ता वाले स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता आवश्यक होती है क्योंकि इनकी विफलता गंभीर परिचालन जोखिम पैदा कर सकती है।

प्रोटोटाइप से शुरू होगी प्रक्रिया

एमडीएल सीधे प्रोडक्शन नहीं करेगा। सबसे पहले कंपनियों को प्रोटोटाइप विकसित करना होगा। इसके लिए भूमि आधारित परीक्षण सुविधा की व्यवस्था भी संबंधित कंपनी को स्वयं करनी होगी। प्रोटोटाइप के सफल परीक्षण के बाद ही प्रोडक्शन सीरीज शुरू होगी।

कंपनियों को तकनीक सत्यापन प्रक्रिया, रिस्क मैनेजमेंट प्लान और विस्तृत विकास समयसीमा भी प्रस्तुत करनी होगी। (P75 India submarine)

36 महीने में पूरा करना होगा काम

वहीं, ऑर्डर मिलने के बाद एक सेट के डिजाइन, विकास, परीक्षण और आपूर्ति का काम 36 महीने के भीतर पूरा करना होगा। इसमें प्रोटोटाइप परीक्षण भी शामिल होगा। इसके बाद प्रोडक्शन सीरीज के लिए आगे की प्रक्रिया शुरू होगी। (P75 India submarine)

क्या है सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान का नया गठबंधन? मक्का डिफेंस एग्रीमेंट के पीछे क्या है पूरी कहानी, भारत क्यों है सतर्क

Mecca Defence Pact Explained
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Mecca Defence Pact: पश्चिम एशिया में चल रहे उथल-पुथल से इन दिनों पूरी दुनिया चिंतित है। अमेरिका-ईरान संघर्ष, लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़े तनाव, क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं और बदलते सामरिक समीकरणों के बीच 7 अगस्त को सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान ने एक नए सुरक्षा समझौते पर दस्तखत किए। इस समझौते को मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट (एमजेडीए) नाम दिया गया है। इसे सामूहिक सुरक्षा (कलेक्टिव सिक्योरिटी) और सामूहिक प्रतिरोध (कलेक्टिव डिटरेंस) की व्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है।

हालांकि समझौते के पूरे प्रावधान सार्वजनिक नहीं किए गए हैं, लेकिन तीनों देशों की ओर से जारी संयुक्त बयान में कहा गया है कि अगर किसी एक सदस्य देश पर हमला होता है तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। इसी एक पंक्ति ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचा है।

वहीं, इसकी तुलना नाटो के अनुच्छेद-5 से की जा रही है, जिसके तहत किसी एक सदस्य पर हमला पूरे गठबंधन पर हमला माना जाता है। इसी वजह से कुछ हलकों में इसे संभावित “मुस्लिम नाटो” की दिशा में एक कदम भी बताया जा रहा है। हालांकि सऊदी अरब ने इस दावे को सार्वजनिक रूप से खारिज किया है।

Mecca Defence Pact: क्या है मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट?

मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट एक त्रिपक्षीय सुरक्षा समझौता है, जिसमें सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान शामिल हैं। यह समझौता ऐसे समय सामने आया है जब पश्चिम एशिया में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर नए विकल्पों की तलाश जारी है।

संयुक्त बयान के अनुसार तीनों देश सुरक्षा मामलों में सहयोग बढ़ाएंगे और किसी सदस्य देश के खिलाफ होने वाले सैन्य हमले को सामूहिक खतरे के तौर पर देखेंगे। हालांकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि किसी संकट की स्थिति में सैन्य सहायता किस तरह दी जाएगी, किस स्तर पर सैनिक तैनात होंगे या कमान और नियंत्रण व्यवस्था कैसी होगी।

यही कारण है कि समझौते को लेकर कई सवाल अभी भी बने हुए हैं।

“कलेक्टिव सिक्योरिटी” और “मिलिट्री अलायंस” में क्या है अंतर?

सैन्य गठबंधन का मतलब होता है कि सदस्य देश अपने दुश्मनों के खिलाफ एकजुट होकर लड़ाई लड़ें। जबकि सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था में देशों की कोशिश होती है कि विवाद बातचीत से सुलझाए जाएं और क्षेत्रीय स्थिरता बनी रहे। वहीं, मक्का समझौते को इसी नजरिये से देखा जाना चाहिए। (Mecca Defence Pact)

अमेरिका-ईरान संघर्ष के बाद क्यों बढ़ी इसकी चर्चा?

इस समझौते की पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है। पश्चिम एशिया लंबे समय से सुरक्षा अस्थिरता का सामना कर रहा है। ईरान और उसके सहयोगी समूहों की गतिविधियां, इजरायल से जुड़े तनाव, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और ऊर्जा ढांचे पर हमलों की आशंकाएं क्षेत्रीय देशों के लिए बड़ी चिंता रही हैं।

विशेष रूप से सऊदी अरब ने पिछले कुछ सालों में अपने तेल प्रतिष्ठानों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमले झेले हैं। इसके अलावा होर्मुज जलडमरूमध्य और बाब-अल-मंदेब जैसे समुद्री मार्गों की सुरक्षा भी उसके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि ग्लोबल एनर्जी सप्लाई का बड़ा हिस्सा इन्हीं रास्तों से गुजरता है।

इसी पृष्ठभूमि में सऊदी अरब ने सुरक्षा सहयोग के नए विकल्पों पर काम करना शुरू किया। इससे पहले सितंबर 2025 में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच स्ट्रेटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट (एसएमडीए) और बहुराष्ट्रीय समुद्री रक्षा गठबंधन जैसे प्रयास भी सामने आ चुके हैं। (Mecca Defence Pact)

क्या यह वास्तव में “मुस्लिम नाटो” है?

समझौते की घोषणा के बाद सबसे ज्यादा चर्चा इसी सवाल पर हुई। कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों और रणनीतिक विशेषज्ञों ने इसे संभावित मुस्लिम नाटो की शुरुआत बताया।

हालांकि सऊदी उप विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि यह किसी सैन्य धुरी या सांप्रदायिक गठबंधन बनाने की कोशिश नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि इसका उद्देश्य हथियारों की दौड़ या परमाणु महत्वाकांक्षाओं को बढ़ावा देना नहीं है।

इसके बावजूद बहस इसलिए जारी है क्योंकि समझौते में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि मुख्य खतरा किससे है। संयुक्त बयान में न तो ईरान का नाम लिया गया, न इजरायल का और न ही क्षेत्र में सक्रिय गैर-राज्य समूहों का।

यही अस्पष्टता इस समझौते को लेकर अलग-अलग व्याख्याओं को जन्म दे रही है।

सऊदी अरब को क्यों करना पड़ा यह समझौता?

विश्लेषकों का मानना है कि इस समझौते का केंद्र बिंदु सऊदी अरब की सुरक्षा जरूरतें हैं। सऊदी अरब का रक्षा बजट लगभग 83 अरब डॉलर माना जाता है, जो दुनिया के सबसे बड़े रक्षा बजटों में शामिल है। इसके बावजूद उसे कई प्रकार की सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

इनमें ड्रोन और मिसाइल हमलों का खतरा, तेल प्रतिष्ठानों की सुरक्षा, समुद्री व्यापार मार्गों की रक्षा और आंतरिक सुरक्षा संबंधी चिंताएं शामिल हैं।

सऊदी अरब लंबे समय तक अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था पर निर्भर रहा है। लेकिन बदलती परिस्थितियों और क्षेत्रीय तनावों ने उसे वैकल्पिक साझेदारों की तलाश के लिए प्रेरित किया है। तुर्किये और पाकिस्तान इसी रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं। (Mecca Defence Pact)

तुर्किये इस गठबंधन में क्या लेकर आया है?

तुर्किये आज पश्चिम एशिया और यूरोप के बीच स्थित एक महत्वपूर्ण सैन्य शक्ति है। पिछले एक दशक में उसने अपने रक्षा उद्योग का तेजी से विस्तार किया है।

तुर्किये के रक्षा निर्यात का आंकड़ा लगभग 10 अरब डॉलर सालाना तक पहुंच चुका है। ड्रोन, बख्तरबंद वाहन, मिसाइल सिस्टम, नौसैनिक प्लेटफॉर्म और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम्स के क्षेत्र में उसकी क्षमताएं लगातार बढ़ी हैं।

रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में तुर्किये की आत्मनिर्भरता भी बढ़ी है। यही वजह है कि सऊदी अरब और पाकिस्तान दोनों तुर्किये के रक्षा उद्योग में रुचि दिखा रहे हैं।

एमजेडीए के जरिए तीनों देशों के बीच सैन्य तकनीक, संयुक्त उत्पादन और रक्षा सहयोग बढ़ने की संभावना पर चर्चा हो रही है।

पाकिस्तान के लिए यह समझौता कितना महत्वपूर्ण है?

पाकिस्तान लंबे समय से सऊदी अरब के साथ घनिष्ठ रक्षा संबंध बनाए हुए है। पाकिस्तानी सेना में लगभग 6.6 लाख सक्रिय सैनिक हैं, जो उसे मुस्लिम वर्ल्ड की सबसे बड़ी सेनाओं में शामिल करता है।

सऊदी अरब में पहले भी पाकिस्तानी सैनिकों की तैनाती हो चुकी है। दोनों देशों के बीच सैन्य प्रशिक्षण और सुरक्षा सहयोग का लंबा इतिहास रहा है।

हालांकि पाकिस्तान के सामने अपनी कुछ मुश्किलें भी हैं। उसकी ईरान के साथ लगभग 900 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है। देश के भीतर बड़ी शिया आबादी मौजूद है और उसे अफगानिस्तान तथा आंतरिक सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है।

इसी कारण कई विशेषज्ञ मानते हैं कि पाकिस्तान किसी ऐसे क्षेत्रीय संघर्ष में सीधे शामिल होने से बचना चाहेगा जो ईरान के साथ उसके संबंधों को प्रभावित करे। (Mecca Defence Pact)

क्या तीनों देशों के बीच मतभेद भी हैं?

यह समझौता जितना महत्वपूर्ण दिखाई देता है, उतना ही जटिल भी है। तीनों देशों के बीच कई ऐतिहासिक और राजनीतिक मतभेद मौजूद रहे हैं।

सऊदी अरब और तुर्किये आज भले साथ दिखाई दे रहे हों, लेकिन उनके बीच लंबे समय से अविश्वास भी रहा है।
ओटोमन साम्राज्य के दौर में अरब क्षेत्रों पर तुर्क शासन था। सऊदी शासकों के इतिहास में उस दौर की कई कड़वी यादें मौजूद हैं।

इसके अलावा तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोआन अक्सर मुस्लिम दुनिया में नेतृत्व की भूमिका की बात करते रहे हैं। दूसरी तरफ सऊदी अरब खुद को इस्लाम के दो सबसे पवित्र स्थलों मक्का और मदीना का संरक्षक मानता है।

तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोआन की नव-उस्मानी सोच और मुस्लिम दुनिया में नेतृत्व की महत्वाकांक्षा कई बार सऊदी दृष्टिकोण से टकराती रही है।

2018 में सऊदी पत्रकार जमाल खशोगी की इस्तांबुल स्थित सऊदी वाणिज्य दूतावास में हत्या के बाद तुर्किये और सऊदी अरब के रिश्तों में काफी तनाव आया था। तुर्किये से लीक हुई जानकारियों ने उस समय सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान पहुंचाया था।

हालांकि बाद के सालों में दोनों देशों ने रिश्ते सुधारने की कोशिश की।

इसी तरह पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच भी कुछ मुद्दों पर मतभेद रहे हैं। अतीत में सैनिक तैनाती, कमान व्यवस्था और ईरान से जुड़े मामलों पर दोनों देशों के दृष्टिकोण पूरी तरह समान नहीं रहे। (Mecca Defence Pact)

क्या यह गठबंधन सैन्य रूप से प्रभावी हो सकता है?

सैन्य दृष्टि से देखें तो तीनों देशों की क्षमताएं एक-दूसरे की पूरक हैं। सऊदी अरब के पास विशाल रक्षा बजट है। तुर्किये के पास विकसित हो रहा रक्षा उद्योग है। पाकिस्तान के पास बड़ा मिलिट्री स्ट्रक्चर और ऑपरेशनल अनुभव है।

यदि तीनों देश संयुक्त अभ्यास, वेपन सिस्टम्स की इंटरऑपरेबिलिटी, तकनीकी सहयोग और रक्षा उत्पादन पर काम करते हैं तो इससे उनकी सामूहिक क्षमता बढ़ सकती है।

इसी वजह से इस समझौते को केवल राजनीतिक बयानबाजी के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे रक्षा सहयोग के एक संभावित ढांचे के रूप में भी समझा जा रहा है। (Mecca Defence Pact)

यह समझौता किसके खिलाफ है?

पहली नजर में ऐसा लग सकता है कि यह समझौता ईरान को ध्यान में रखकर किया गया है। क्योंकि हाल के वर्षों में ईरान और खाड़ी देशों के बीच तनाव रहा है। ईरान समर्थित समूहों ने कई बार क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियां पैदा की हैं।

लेकिन कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस समझौते का असली फोकस केवल ईरान नहीं है। उनके अनुसार तुर्किये के लिए इजराइल एक बड़ी रणनीतिक चुनौती बनकर उभरा है, खासकर सीरिया के घटनाक्रम के बाद।

तुर्किये और इजराइल के बीच बयानबाजी लगातार तेज हुई है। कई इजराइली नेताओं ने हाल के महीनों में तुर्किये को क्षेत्रीय चुनौती बताया है। वहीं तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोआन भी इजराइल की सैन्य कार्रवाइयों की लगातार आलोचना करते रहे हैं। (Mecca Defence Pact)

क्या अमेरिका है इस समझौते के पीछे?

मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट को केवल सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच सुरक्षा समझौते के रूप में नहीं देखा जा रहा है। बल्कि इसे पश्चिम एशिया में बदलती अमेरिकी भूमिका से भी जोड़कर देखा जा रहा है।

दरअसल, पिछले कुछ सालों में अमेरिका ने पश्चिम एशिया में अपनी प्रत्यक्ष सैन्य मौजूदगी को सीमित करने की नीति अपनाई है। अफगानिस्तान से अमेरिकी वापसी, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर बढ़ता फोकस और घरेलू प्राथमिकताओं ने क्षेत्रीय देशों को अपनी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर नए विकल्प तलाशने के लिए प्रेरित किया है।

सऊदी अरब लंबे समय तक अमेरिकी की सुरक्षा में रहा है। 1991 के खाड़ी युद्ध से लेकर हाल के सालों तक अमेरिकी सैन्य उपस्थिति ने सऊदी सुरक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन 2019 में सऊदी के अबकैक और खुरैस तेल प्रतिष्ठानों पर हुए ड्रोन और मिसाइल हमलों के बाद यह बहस तेज हुई कि क्षेत्रीय देशों को अपनी सुरक्षा के लिए केवल अमेरिका पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।

इसी पृष्ठभूमि में सऊदी अरब ने चीन, तुर्किये और पाकिस्तान समेत कई देशों के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाना शुरू किया। मक्का समझौते को भी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि सऊदी अरब अमेरिका से दूरी बना रहा है। अमेरिका आज भी सऊदी अरब का सबसे बड़ा रक्षा साझेदार है। सऊदी वायुसेना के एफ-15 लड़ाकू विमान, पैट्रियट और थाड मिसाइल डिफेंस सिस्टम समेत कई प्रमुख हथियार अमेरिकी मूल के हैं।

वहीं, मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट का एक उद्देश्य यह भी हो सकता है कि क्षेत्रीय देश अपनी सुरक्षा जरूरतों के लिए एक अतिरिक्त गठबंधन तैयार रखें, ताकि किसी संकट की स्थिति में केवल बाहरी शक्तियों पर निर्भर न रहना पड़े। (Mecca Defence Pact)

चीन की भी अप्रत्यक्ष भूमिका?

विश्लेषकों के अनुसार इस पूरे समीकरण में चीन भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। तुर्किये और पाकिस्तान दोनों के चीन के साथ रक्षा संबंध मजबूत हैं। पाकिस्तान पहले से चीनी हथियारों और सैन्य तकनीक का बड़ा उपयोगकर्ता है। वहीं तुर्किये भी रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

आज पाकिस्तान, तुर्किये और चीन कई रक्षा परियोजनाओं में सहयोग कर रहे हैं। इसी नेटवर्क के जरिए सऊदी अरब अपनी सैन्य औद्योगिक क्षमता बढ़ाना चाहता है। (Mecca Defence Pact)

भारत इस समझौते को कैसे देख रहा है?

भारत के लिए यह समझौता स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें पाकिस्तान शामिल है। नई दिल्ली की चिंता केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं है, बल्कि तुर्किये की दक्षिण एशिया में बढ़ती रणनीतिक सक्रियता पर भी नजर रखी जा रही है।

तुर्किये पिछले कुछ सालों में पाकिस्तान के साथ रक्षा सहयोग बढ़ा चुका है। नौसैनिक परियोजनाओं, ड्रोन तकनीक और रक्षा उद्योग में दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ा है।

ऐसे में भारत इस नए सुरक्षा समझौते का अध्ययन कर रहा है कि इसका क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।

हालांकि कई विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और सऊदी अरब के संबंधों की प्रकृति पाकिस्तान से अलग है। (Mecca Defence Pact)

भारत और सऊदी अरब के संबंध क्यों हैं महत्वपूर्ण?

भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा आयातकों में से एक है। सऊदी अरब भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश, ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग लगातार बढ़ा है।

भारत सऊदी अरब का एक महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार है। दोनों देशों के संबंध अपेक्षाकृत स्थिर और व्यावहारिक माने जाते हैं।

इसी कारण कई जानकारों का मानना है कि सऊदी अरब भारत को एक स्थिर और भरोसेमंद साझेदार के रूप में देखता है। इसलिए यह संभावना कम मानी जाती है कि रियाद भारत के खिलाफ किसी पाकिस्तानी सैन्य एजेंडे का समर्थन करेगा। (Mecca Defence Pact)

भारत को किस बात पर नजर रखनी चाहिए?

विशेषज्ञों के अनुसार भारत को तीन प्रमुख बातों पर नजर रखनी होगी। पहली, पाकिस्तान और तुर्किये के सैन्य सहयोग की गति। दूसरी, सऊदी अरब की रक्षा खरीद और रक्षा उत्पादन परियोजनाओं में पाकिस्तान तथा तुर्किये की भूमिका। तीसरी, चीन-पाकिस्तान-तुर्किये नेटवर्क के साथ सऊदी अरब के बढ़ते रणनीतिक संबंध।

हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि मक्का समझौता क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को कितना बदल पाएगा। लेकिन इतना तय है कि इस समझौते ने पश्चिम एशिया की सुरक्षा राजनीति में एक नया समीकरण जोड़ दिया है, जिस पर भारत समेत कई देश करीबी नजर बनाए हुए हैं। (Mecca Defence Pact)

इजरायल, यूएई और भारत का भी बढ़ा जिक्र

मक्का समझौते के बाद कुछ रणनीतिक विश्लेषकों ने एक अन्य संभावित समीकरण की भी चर्चा शुरू की है। उनके अनुसार तुर्किये, पाकिस्तान और सऊदी अरब की बढ़ती निकटता के बीच इजरायल, संयुक्त अरब अमीरात और भारत के संबंधों का महत्व भी बढ़ सकता है।

भारत और इजरायल के बीच रक्षा सहयोग पिछले कई सालों में मजबूत हुआ है। ड्रोन, मिसाइल, निगरानी प्रणाली और सैन्य तकनीक के क्षेत्र में दोनों देशों की साझेदारी महत्वपूर्ण मानी जाती है।

संयुक्त अरब अमीरात भी भारत का प्रमुख रणनीतिक और आर्थिक साझेदार है। इसलिए पश्चिम एशिया में बदलते समीकरणों के बीच इन संबंधों पर भी नजर रखी जा रही है। (Mecca Defence Pact)

समझौते को लेकर सबसे बड़ा सवाल क्या है?

मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि इसका वास्तविक स्वरूप क्या होगा। अभी तक केवल संयुक्त बयान सामने आया है। समझौते का पूरा विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया है।

यह स्पष्ट नहीं है कि सामूहिक सुरक्षा की स्थिति में सदस्य देशों की क्या जिम्मेदारियां होंगी, सैन्य सहायता का स्वरूप क्या होगा, कमान व्यवस्था कैसे चलेगी और यह सहयोग किस स्तर तक जाएगा। यही वजह है कि फिलहाल यह समझौता जितना चर्चा में है, उतने ही सवाल भी इसके साथ जुड़े हुए हैं। (Mecca Defence Pact)

अब हेलीकॉप्टर नहीं, ड्रोन से होगी फॉरवर्ड पोस्ट्स तक गोला-बारूद और राशन की सप्लाई, ये है वायुसेना का नया लॉजिस्टिक प्लान

IAF Logistics Drone System
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IAF Logistics Drone System: ऊंचे पहाड़ों, बर्फ से ढके इलाकों और दुर्गम सीमावर्ती क्षेत्रों में तैनात सैनिकों तक समय पर जरूरी सामान पहुंचाना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रही है। कई बार मौसम, खराब भौगोलिक इलाकों और सीमित परिवहन साधनों के कारण रसद सप्लाई प्रभावित होती है। सप्लाई प्रभावित न हो, इसके लिए भारतीय वायुसेना बड़ी तैयारी कर रही है।

रक्षा मंत्रालय ने जम्मू-कश्मीर के पुलवामा स्थित अवंतीपुरा एयर फोर्स स्टेशन के लिए एयर-बेस्ड लॉजिस्टिक पेलोड डिलीवरी सिस्टम की हायरिंग के लिए रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन (आरएफआई) जारी किया है। इसका उद्देश्य ऐसे हवाई सिस्टम को शामिल करना है, जो आगे की चौकियों और सीमावर्ती इलाकों में तैनात सैनिकों तक दवाइयां, स्पेयर पार्ट्स, संचार उपकरण, गोला-बारूद और अन्य जरूरी सामग्री तेजी से पहुंचा सके।

IAF Logistics Drone System: सैनिकों तक अंतिम छोर की सप्लाई पहुंचाने पर जोर

भारतीय सेना और वायुसेना की कई चौकियां ऐसे इलाकों में स्थित हैं, जहां सड़क मार्ग से पहुंचना कठिन होता है। कुछ स्थानों पर मौसम कई दिनों तक हेलीकॉप्टर उड़ानों को भी प्रभावित कर देता है।

ऐसे में एयर-बेस्ड लॉजिस्टिक पेलोड डिलीवरी सिस्टम सैनिकों तक अंतिम छोर यानी लास्ट माइल सपोर्ट पहुंचाने का जरिया बनेगा। यह सिस्टम पारंपरिक परिवहन साधनों के बजाय ड्रोन, मानवरहित हवाई प्लेटफॉर्म (यूएवी) या इसी तरह की तकनीकों का इस्तेमाल करेगी।

आरएफआई के अनुसार यह सिस्टम रेगुलर सप्लाई के अलावा आपातकालीन परिस्थितियों में भी इस्तेमाल किया जा सकेगा। इसका इस्तेमाल दिन और रात दोनों समय किया जा सकेगा।

दो अलग-अलग ऊंचाइयों पर करेंगे काम

वायुसेना को दो तरह के सिस्टम्स की जरूरत है। पहली श्रेणी उन क्षेत्रों के लिए है, जहां लॉन्चिंग प्लेटफॉर्म समुद्र तल से 11,000 फीट तक की ऊंचाई पर हो सकता है। इस श्रेणी में सिस्टम कम से कम 18,000 फीट तक ऑपरेशन कर सके।

दूसरी श्रेणी और अधिक चुनौतीपूर्ण इलाकों के लिए है। इसमें सिस्टम को 15,000 फीट तक की ऊंचाई वाले क्षेत्रों से उड़ान भरने और कम से कम 24,000 फीट तक ऑपरेट करने की क्षमता रखनी होगी। (IAF Logistics Drone System)

50 किलोग्राम से लेकर 200 किलोग्राम तक पेलोड

वायुसेना ने न्यूनतम जरूरत के तौर पर 50 किलोग्राम पेलोड को कम से कम 50 किलोमीटर की एक तरफा दूरी तक पहुंचाने की क्षमता मांगी है।

हालांकि जरूरत इससे कहीं अधिक है। आरएफआई डॉक्यूमेंट्स के अनुसार वायुसेना ऐसे सिस्टम को प्राथमिकता देगी जो 200 किलोग्राम या उससे अधिक वजन का सामान 150 किलोमीटर या उससे ज्यादा दूरी तक पहुंचा सके।

इसका मतलब है कि भविष्य में यह सिस्टम केवल छोटे पैकेज नहीं, बल्कि भारी सैन्य सामग्री और आवश्यक उपकरण भी पहुंचाने में सक्षम हो सकती है।

बिना तैयार रनवे के भी उड़ान भर सकेगा सिस्टम

सीमावर्ती क्षेत्रों में हर जगह रनवे या हेलीपैड उपलब्ध नहीं होते। इसी वजह से वायुसेना ने ऐसी सिस्टम की मांग की है जो बिना तैयार क्षेत्र से भी उड़ान भर सके।

आरएफआई के अनुसार सिस्टम को अधिकतम 20 मीटर गुणा 20 मीटर के एरिया में लॉन्च और रिकवरी करने की क्षमता रखनी होगी। इससे पहाड़ी चौकियों, अस्थायी सैन्य ठिकानों और दूरस्थ इलाकों में भी इसका इस्तेमाल संभव होगा। (IAF Logistics Drone System)

पूरी तरह ऑटोनॉमस ऑपरेशन

वायुसेना ने केवल रिमोट कंट्रोल बेस्ड प्लेटफॉर्म की मांग नहीं की है। बल्कि उसका फोकस फुल ऑटोनॉमस ऑपरेशनल क्षमता पर है। सिस्टम में फुली ऑटोनोमस मोड, मैनुअल मोड और रिटर्न-टू-होम मोड होना जरूरी होगा।

यदि किसी कारण से संचार बाधित हो जाए या ऑपरेटर का नियंत्रण टूट जाए तो सिस्टम अपने निर्धारित बेस या सुरक्षित स्थान पर वापस लौट सकेगा। यह सुविधा कठिन मौसम और युद्ध जैसी परिस्थितियों में काफी महत्वपूर्ण है। (IAF Logistics Drone System)

दिन और रात दोनों समय निगरानी की सुविधा

हर सिस्टम में आधुनिक सेंसर लगाए जाएंगे। प्लेटफॉर्म में कलर डे वीडियो कैमरा और मोनोक्रोमैटिक नाइट थर्मल सेंसर होना अनिवार्य होगा। इससे ऑपरेटर दिन और रात दोनों समय निगरानी कर सकेंगे। थर्मल सेंसर कम दृश्यता और अंधेरे में भी लक्ष्य क्षेत्र की स्थिति देखने में मदद करेगा। (IAF Logistics Drone System)

इसके अलावा ऑटो ट्रैकिंग और डिटेक्शन जैसी सुविधाओं की भी मांग की गई है।

नेविगेशन को लेकर भी वायुसेना का कहना है कि सिस्टम को जीपीएस, ग्लोनास, नाविक और आईआरएनएसएस जैसे कई सैटेलाइट बेस्ड नेविगेशन नेटवर्क के साथ काम करने में सक्षम होना होगा।

वायुसेना ने यह भी कहा है कि इस्तेमालकर्ता जरूरत के अनुसार लैटिट्यूड-लॉन्गिट्यू बेस्ड कॉर्डिनेट्स या भारतीय मिलिट्री ग्रिड रेफरेंस सिस्टम का चयन कर सके। एक से अधिक नेविगेशन सोर्सेज का इस्तेमाल सिस्टम की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। (IAF Logistics Drone System)

जैमिंग और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध से सुरक्षा जरूरी

आधुनिक युद्धक्षेत्र में इलेक्ट्रॉनिक युद्ध एक बड़ी चुनौती बन चुका है। इसी वजह से आरएफआई में एंटी-जैमिंग और एंटी-स्पूफिंग क्षमता को महत्वपूर्ण जरूरत के रूप में शामिल किया गया है। सिस्टम को इलेक्ट्रॉनिक इंटरफेरेंस के खिलाफ हार्डन्ड होना होगा। साथ ही इसे मित्र और शत्रु की पहचान के लिए आईएफएफ सुविधा से भी लैस होना चाहिए। इसका उद्देश्य अपने ही हवाई प्लेटफॉर्म के साथ भ्रम या दुर्घटना की संभावना को कम करना है।

अत्यधिक गर्मी और कड़ाके की ठंड में भी ऑपरेशन

भारतीय सीमाओं पर मौसम की परिस्थितियां काफी अलग-अलग होती हैं। कहीं तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे चला जाता है तो कहीं रेगिस्तानी क्षेत्रों में अत्यधिक गर्मी होती है। इसी कारण वायुसेना ने सिस्टम को माइनस 30 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 50 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक तापमान में ऑपरेशन योग्य बनाने की मांग की है। इसके लिए पर्यावरणीय परीक्षण भारतीय सैन्य मानकों के अनुरूप किए जाएंगे। (IAF Logistics Drone System)

सुरक्षित डेटा लिंक और एन्क्रिप्शन पर जोर

आरएफआई में कहा गया है कि ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन पोर्टेबल और मजबूत डिजाइन का होना चाहिए, ताकि उसे विभिन्न स्थानों पर आसानी से तैनात किया जा सके।

डेटा लिंक एस और सी बैंड फ्रीक्वेंसी रेंज में काम करेगा। इसके साथ 128 बिट या 256 बिट एईएस एन्क्रिप्शन का इस्तेमाल किया जाएगा।

इसका उद्देश्य डेटा को सुरक्षित रखना और कम्युनिकेशन को अवांछित हस्तक्षेप से बचाना है। (IAF Logistics Drone System)

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का फीचर!

आरएफआई में यह भी कहा गया है कि भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम से अपग्रेड किया जा सके। सिस्टम में ऑनबोर्ड रिकॉर्डिंग, रियल टाइम वीडियो ट्रांसमिशन और एडवांस सर्विलंस सिस्टम्स उपलब्ध होनी चाहिए।

इसके अलावा पेलोड को सुरक्षित रखने, निर्धारित स्थान पर छोड़ने और जरूरत पड़ने पर इमरजेंसी रिलीज की सुविधा भी जरूरी हो। (IAF Logistics Drone System)

भारतीय नौसेना के नए लॉइटरिंग म्यूनिशन होंगे बेहद खास, समुद्र से 1,000 किमी दूर तक करेंगे अटैक, 9 घंटे तक रहेंगे हवा में!

Indian Navy Loitering Munition
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Indian Navy Loitering Munition: भारतीय नौसेना अपने वॉरशिप्स से लंबी दूरी तक काम करने वाले लॉइटरिंग म्यूनिशन को शामिल करने की तैयारी कर रही है। रक्षा मंत्रालय ने लॉइटरिंग म्यूनिशन-मीडियम रेंज यानी एलएम (एमआर) के लिए रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन (आरएफआई) जारी किया है। इसमें ऐसे सिस्टम की जानकारी मांगी गई है, जिसे नौसेना के जहाजों से लॉन्च किया जा सके और जो समुद्र के साथ-साथ जमीन पर भी टारगेट्स के खिलाफ इस्तेमाल हो सके।

Indian Navy Loitering Munition: जहाज से लॉन्च होंगे लॉइटरिंग म्यूनिशन

नौसेना के लिए प्रस्तावित एलएम (एमआर) सामान्य ड्रोन से अलग होगा। इसे वॉरशिप पर कैनिस्टर में रखा जाएगा और जरूरत के समय जहाज से लॉन्च किया जा सकेगा।

आरएफआई में इसे समुद्र आधारित यानी शिप-माउंटेड सिस्टम के तौर पर डेवलप किया जाएगा। इसका इस्तेमाल समुद्र और जमीन पर मौजूद टारगेट्स के खिलाफ किया जा सकेगा। साथ ही, सिस्टम दिन और रात तथा अलग-अलग मौसम की परिस्थितियों में काम कर सके।

वहीं, इसके साथ मिशन कंट्रोल कंसोल, ग्राउंड कंट्रोल कंसोल, ग्राउंड डेटा टर्मिनल, लॉन्चर, रिकॉर्डिंग यूनिट और प्रशिक्षण के लिए एम्बेडेड सिम्युलेटर भी शामिल होंगे।

इसे भारतीय नौसेना के कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम से भी जोड़ा जाएगा। साथ ही, जहाज के सेंसरों से मिलने वाली जानकारी को लॉइटरिंग म्यूनिशन के मिशन सिस्टम के साथ इस्तेमाल किया जा सकेगा।

1,000 किलोमीटर की रेंज, 9 घंटे तक हवा में रहने की क्षमता

आरएफआई में एलएम (एमआर) की उड़ान क्षमता को लेकर स्पष्ट मापदंड दिए गए हैं। इसकी अधिकतम रेंज कम से कम 1,000 किलोमीटर होनी चाहिए। वहीं इसे कम से कम 9 घंटे तक हवा में रहने की क्षमता रखनी होगी।

लॉइटरिंग के दौरान इसकी न्यूनतम गति 75 नॉट और हमले के दौरान न्यूनतम गति 200 नॉट रखी गई है। इसकी अधिकतम उड़ान ऊंचाई 15,000 फीट होगी।

वहीं, इसका सीईपी यानी सर्कुलर एरर प्रोबेबल एक मीटर से कम हो। आरएफआई में आरएफ और सैटकॉम दोनों तरह के डेटा लिंक का प्रावधान भी रखा गया है।

इसका आकार भी सीमित रखा गया है। एलएम की लंबाई अधिकतम 2.5 मीटर और विंगस्पैन अधिकतम तीन मीटर होना चाहिए। इसका रडार क्रॉस सेक्शन यानी आरसीएस भी एक वर्ग मीटर से ज्यादा नहीं होना चाहिए। (Indian Navy Loitering Munition)

डेटा लिंक टूटने पर भी रहेगी नेविगेशन क्षमता

इस सिस्टम में ऑटोमैटिक नेविगेशन की क्षमता भी होनी चाहिए। ऑपरेटर आरएफ या सैटकॉम डेटा लिंक के जरिए से एलएम को कंट्रोल कर सकेगा। मिशन शुरू करने से पहले कई कॉर्डिनेट्स तय किए जा सकेंगे। इसके बाद एलएम इन कॉर्डिनेट्स के बीच अपने आप नेविगेट कर सकेगा।

अगर उड़ान के दौरान डेटा लिंक टूट जाता है तो एलएम के पास आखिरी ज्ञात ग्राउंड डेटा टर्मिनल की स्थिति की ओर वापस जाने का सिस्टम होगा। वहीं, अगर डेटा लिंक दोबारा स्थापित नहीं होता है तो पहले से तय टर्मिनेशन प्वाइंट की तरफ ऑटोमैटिक रूप से जाने की क्षमता भी हो।

एक ऑपरेटर संभाल सकेगा 10 एलएम

इस सिस्टम का मिशन कंट्रोल कंसोल इसका अहम हिस्सा होगा। आरएफआई में एमसीसी के लिए ओपन आर्किटेक्चर की मांग की गई है। इससे जरूरत के अनुसार नए सेंसर और अन्य उपकरण जोड़े जा सकेंगे।

एक ऑपरेटर एक समय में अधिकतम 10 लॉइटरिंग म्यूनिशन संभाल सकेगा। ऑपरेटर मिशन की योजना बनाने, एलएम की स्थिति देखने और मिशन के दौरान उपलब्ध डेटा का इस्तेमाल करने में सक्षम होगा।

एमसीसी को एलएम के अपने सेंसरों के साथ-साथ जहाज के सेंसरों से मिलने वाली जानकारी को भी एक साथ इस्तेमाल करने में सक्षम होना होगा। (Indian Navy Loitering Munition)

दूसरे जहाज से किया जा सकेगा कंट्रोल

आरएफआई में एलएम के कंट्रोल को एक प्लेटफॉर्म से दूसरे प्लेटफॉर्म पर ट्रांसफर करने की सुविधा भी होनी चाहिए। इसमें जिस जहाज से एलएम लॉन्च किया गया है, उसके अलावा दूसरे जहाज पर मौजूद मिशन कंट्रोल कंसोल और ग्राउंड डेटा टर्मिनल के जरिए भी उसका कंट्रोल लिया जा सकेगा।

इसके लिए दूसरे जहाज पर अलग लॉन्चर या ग्राउंड कंट्रोल कंसोल होना जरूरी नहीं होगा। इससे नौसेना के अलग-अलग प्लेटफॉर्म के बीच एलएम के कंट्रोल को शेयर करने का सिस्टम बनाया जा सकेगा। (Indian Navy Loitering Munition)

ईओ और आईआर सीकर से होगी निगरानी

एलएम में इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड यानी ईओ/आईआर सीकर भी लगाया जाएगा। यह सीकर नेविगेशन, निगरानी, टारगेट की पहचान और हमले से जुड़े कामों में इस्तेमाल होगा।

इसमें फॉरवर्ड लुकिंग इन्फ्रारेड यानी एफएलआईआर के साथ एमडब्ल्यूआईआर क्षमता मांगी गई है। इसके अलावा डे कैमरा के साथ एसडब्ल्यूआईआर क्षमता भी रखी गई है।

वहीं, जहाज पर एलएम को कैनिस्टर में रखा जाएगा। कैनिस्टर को समुद्री वातावरण में सुरक्षित भंडारण, परिवहन, हैंडलिंग और लॉन्च के लिए तैयार किया जाना होगा।

एलएम को कैनिस्टर में रखने से पहले ईंधन भरने की व्यवस्था भी हो। इससे जरूरत के अनुसार इसे डी-फ्यूल्ड स्थिति में स्टोर किया जा सकेगा। कैनिस्टर से लॉन्च के लिए बूस्टर की भी जरूरत होगी। इसके अलावा जहाज पर किसी आपात स्थिति में एलएम को अलग करने के लिए इमरजेंसी जेटिसन की व्यवस्था भी रखी गई है।

नौसेना के सेंसरों से जुड़ेगा सिस्टम

एलएम (एमआर) को जहाज के मौजूदा डेटा नेटवर्क से जोड़ा जाएगा। आरएफआई में शिप डेटा नेटवर्क के जरिए कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम, जीएनएसएस, नाविक, जायरो और एनेमोमीटर जैसे सिस्टम के साथ इंटरफेस की जरूरत बताई गई है।

इसके साथ इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर्स यानी ईएसएम, निगरानी रडार और अर्ली वार्निंग रडार से भी डेटा लेने की क्षमता रखनी होगी। शिप वेपन इंटरलॉक एंड सेफ्टी सिस्टम के साथ भी इसका इंटरफेस होना चाहिए।

सिस्टम जीएनएसएस-डिनाइड एनवॉयरमेंट में भी काम कर सके। यानी ऐसी स्थिति में भी नेविगेशन की क्षमता बनी रहनी चाहिए जब सामान्य सैटेलाइट नेविगेशन संकेत उपलब्ध नहीं हों। (Indian Navy Loitering Munition)

समुद्र के कठिन माहौल में काम करने की क्षमता

युद्धपोत पर इस्तेमाल होने वाले सिस्टम को समुद्र की कठिन परिस्थितियों में काम करना होगा। एलएम प्रणाली को 40 डिग्री सेल्सियस तापमान पर 95 प्रतिशत रिलेटिव ह्यूमिडिटी और 50 नॉट तक की हवा में काम करने योग्य होना चाहिए। इसकी ऑपरेशनल तापमान सीमा माइनस 20 डिग्री सेल्सियस से प्लस 60 डिग्री सेल्सियस तक रखी गई है।

जहाज के इलेक्ट्रिकल सिस्टम को देखते हुए सिस्टम को 380 से 415 वोल्ट की इलेक्ट्रिकल सप्लाई पर काम करने में सक्षम होना होगा। (Indian Navy Loitering Munition)

10 साल की सर्विस लाइफ, अपग्रेड की हो सुविधा

आरएफआई के मुताबिक एलएम (एमआर) के महत्वपूर्ण हिस्सों की सेवा अवधि कम से कम 10 साल होनी चाहिए। इसे आगे 10 साल तक बढ़ाने की क्षमता भी रखी गई है।

वहीं यह सिस्टम मॉड्यूलर और ओपन आर्किटेक्चर पर बेस्ड हो। इसमें प्लग-एंड-प्ले सुविधा होगी, जिससे जरूरत के अनुसार नए उपकरण और सेंसर जोड़े जा सकेंगे। मैन्युफैक्चरर को सिस्टम के लिए हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर अपग्रेड की सुविधा भी देनी होगी। अपग्रेड इस तरह किए जाए कि मौजूदा सिस्टम में बड़े बदलाव की जरूरत कम से कम हो। (Indian Navy Loitering Munition)

भारतीय कंपनियों से मांगी गई जानकारी

रक्षा मंत्रालय ने आरएफआई के जरिए कंपनियों से उनकी तकनीकी और उत्पादन क्षमता की जानकारी मांगी है। इसमें यह भी पूछा गया है कि वे एलएम (एमआर) को बाय इंडियन-आईडीडीएम या बाय इंडियन कैटेगरी के तहत उपलब्ध करा सकती हैं या नहीं।

बाय इंडियन-आईडीडीएम के लिए स्वदेशी डिजाइन और कम से कम 50 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री से जुड़ी जानकारी मांगी गई है। बाय इंडियन श्रेणी में कम से कम 60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री से संबंधित जानकारी मांगी गयी है।

इसके अलावा कंपनियों से उत्पादन क्षमता, जीएनएसएस-डिनाइड और एंटी-जैमिंग क्षमता, भारत में रखरखाव और ओवरहॉल की सुविधा तथा सप्लाई से जुड़े अनुभव की जानकारी भी मांगी गई है। (Indian Navy Loitering Munition)

DRDO का बड़ा कदम! क्रूज मिसाइलों और ड्रोन के लिए छोटे गैस टर्बाइन इंजन का बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन शुरू करने की तैयारी

DRDO GTRE Expendable Engine
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GTRE Expendable Engine: भारतीय सेनाओं में क्रूज मिसाइलों, हाई-स्पीड ड्रोन, लोटरिंग म्यूनिशन और अन्य एक बार इस्तेमाल होने वाले प्लेटफॉर्म की मांग लगातार बढ़ रही है। जिसके बाद डीआरडीओ के तहत आने वाली गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट (जीटीआरई) देश में छोटे गैस टर्बाइन इंजनों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए बड़ी तैयारी कर रही है।

जीटीआरई ने एक्स्पेंडेबल गैस टर्बाइन इंजन के निर्माण, असेंबली और सप्लाई के लिए दो अतिरिक्त भारतीय उद्योग भागीदारों के चयन की प्रक्रिया शुरू कर दी है, जो उच्च तकनीक वाले एयरोस्पेस और गैस टर्बाइन कंपोनेंट्स का निर्माण कर सकें।

GTRE Expendable Engine: गैस टर्बाइन तकनीक पर काम कर रहा है जीटीआरई

बेंगलुरु स्थित जीटीआरई लंबे समय से गैस टर्बाइन तकनीक पर काम कर रहा है। जीटीआरई ने एक छोटे आकार का ट्विन-स्पूल गैस टर्बाइन इंजन बनाया है, जिसे एक्स्पेंडेबल एप्लीकेशन्स के लिए डिजाइन किया गया है। एक्स्पेंडेबल का मतलब ऐसे प्लेटफॉर्म से है जो मिशन के दौरान एक बार इस्तेमाल किए जाते हैं और बाद में वापस नहीं लाए जाते।

अभी तक ऐसे इंजन के उत्पादन के लिए सीमित औद्योगिक क्षमता उपलब्ध है। इसी वजह से जीटीआरई ने इसके प्रोडक्शन और के लिए दो अतिरिक्त भारतीय उद्योग भागीदारों को शामिल करने का फैसला लिया है। जीटीआरई की तरफ से जरी आरएफपी के अनुसार वर्तमान निर्माता को इस प्रक्रिया से बाहर रखा गया है ताकि नए उद्योगों को मौका मिल सके और उत्पादन क्षमता को कई जगह बांटा जा सके। (GTRE Expendable Engine)

क्या है एक्स्पेंडेबल इंजन

जीटीआरई का बनाया यह इंजन एक ट्विन-स्पूल गैस टर्बाइन इंजन है। ट्विन-स्पूल डिजाइन का अर्थ है कि इंजन में हाई प्रेशर और लो प्रेशर सेक्शन अलग-अलग स्पूल पर काम करते हैं। इससे इंजन की कार्यक्षमता और प्रदर्शन बेहतर होता है।

यह इंजन विशेष रूप से एक्स्पेंडेबल एप्लिकेशन के लिए विकसित किया गया है। यानी ऐसे प्लेटफॉर्म जिनका उपयोग एक मिशन के दौरान किया जाता है और जिनकी रिकवरी जरूरी नहीं होती।

इस इंजन में 15 से अधिक प्रमुख सब-असेंबली और 400 से ज्यादा इंजीनियरिंग ड्रॉइंग शामिल हैं। इसके निर्माण में विशेष स्टील, एल्युमिनियम एलॉय, टाइटेनियम एलॉय तथा निकल और कोबाल्ट आधारित सुपर एलॉय का इस्तेमाल किया जाता है। कई महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स का डायामीटर लगभग 400 मिलीमीटर तक है।

किन सैन्य प्लेटफॉर्म में होगा इस्तेमाल

जीटीआरई ने इस इंजन को विशेष रूप से एक्स्पेंडेबल प्लेटफॉर्म के लिए डेवलप किया है। इनमें लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलें प्रमुख हैं।

पिछले कुछ सालों में दुनिया भर में ड्रोन और लोइटरिंग म्यूनिशन के इस्तेमाल में तेजी आई है। इसी कारण ऐसे छोटे लेकिन विश्वसनीय गैस टर्बाइन इंजनों की आवश्यकता बढ़ी है। भारतीय सेनाओं द्वारा विभिन्न प्रकार के स्वदेशी ड्रोन और मिसाइल कार्यक्रमों पर काम किए जाने के कारण इस कैटेगरी के इंजनों की मांग लगातार बढ़ रही है। (GTRE Expendable Engine)

बनाने होंगे तीन इंजन

इस प्रक्रिया में शामिल सभी साझेदार को तीन इंजन बनाने होंगे। इस तरह दोनों कंपनियों द्वारा कुल छह इंजन तैयार किए जाएंगे। इन इंजनों का निर्माण, असेंबली, परीक्षण और डिलीवरी पूरी तरह कंपनियों द्वारा की जाएगी, जबकि डिजाइन और टेक्निकल डॉक्यूमेंट्स जीटीआरई उपलब्ध कराएगा। वहीं, भविष्य में सशस्त्र बल या भारत सरकार द्वारा नामित कोई अन्य एजेंसी प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया के तहत इन कंपनियों से सीधे प्रोडक्शन सीरीज के के इंजन भी खरीद सकेगी। (GTRE Expendable Engine)

क्लीन रूम में होगी इंजन असेंबली

इंजन असेंबली के लिए सामान्य प्रोडक्शन एरिया का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। आरएफपी के अनुसार चयनित उद्योगों के पास आईएसओ-8 या उससे बेहतर क्लीन रूम होना चाहिए। इसी कंट्रोल एनवॉयरमेंट में इंजन की असेंबी की जाएगी। जीटीआरई ने यह भी स्पष्ट किया है कि इंजन असेंबली को किसी अन्य कंपनी को आउटसोर्स नहीं किया जा सकता।

साथ ही, कंपनी के पास एयरोस्पेस क्षेत्र में कम से कम तीन वर्ष का अनुभव होना चाहिए। उसे विशेष स्टील, टाइटेनियम और निकल या कोबाल्ट आधारित सुपर एलॉय के साथ काम करने का अनुभव होना चाहिए।

कंपनी ने पिछले तीन वित्तीय वर्षों में कम से कम 10 करोड़ रुपये का एक एयरोस्पेस ऑर्डर सफलतापूर्वक पूरा किया हो। वहीं कंपनी का औसत वार्षिक कारोबार 300 करोड़ रुपये या उससे अधिक होना भी जरूरी है। इसके अलावा पिछले तीन वर्षों में कंपनी ने कम से कम 10 करोड़ रुपये का एकल एयरोस्पेस ऑर्डर सफलतापूर्वक पूरा किया हो।

वहीं, डीएपी 2020 के अनुसार उद्योग का भारतीय होना अनिवार्य है। विदेशी सहयोग, विदेशी उत्पादन या महत्वपूर्ण कार्यों की आउटसोर्सिंग की अनुमति नहीं होगी।

जीटीआरई ने परियोजना के लिए स्पष्ट समयसीमा निर्धारित की है। प्रत्येक उद्योग को पहला इंजन फर्स्ट आर्टिकल इंस्पेक्शन के लिए ऑर्डर जारी होने के 24 महीने के भीतर देना होगा। इसके बाद बाकी दो इंजन 36 महीने के भीतर डिलीवर करने होंगे।

यदि आवश्यकता हुई तो चयनित उद्योग को इंजन री-बिल्ड का कार्य भी करना होगा। इसमें इंजन को खोलना, साफ करना, आवश्यक मरम्मत करना और दोबारा असेंबल करना शामिल होगा। (GTRE Expendable Engine)