Home Blog

ऑपरेशन सिंदूर में एयरबेस पर हुए हमलों से घबराया पाकिस्तान, खरीद रहा है चीन का टर्मिनल एयर डिफेंस सिस्टम

China LD-2000 Air Defence System
Is Pakistan Acquiring China’s LD-2000 Air Defence System After Operation Sindoor Airbase Strikes? (AI Image)

China LD-2000 Air Defence System: क्या पाकिस्तान वायुसेना चीन का एलडी-2000 नियर रेंज डिफेंस सिस्टम खरीदने की तैयारी कर रही है? हाल ही में पाकिस्तानी वायुसेना के इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस सिस्टम के एक आधिकारिक इन्फोग्राफिक में एलडी-2000 जैसा सिस्टम दिखाई दिया। हालांकि पाकिस्तान ने अभी तक इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की है, लेकिन ओपन सोर्स इंटेलिजेंस और कई मिलिट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि पाकिस्तान अपनी एयर वॉरफेयर रणनीति में बदलाव कर कर रहा है।

दरअसल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जिस तरह से भारतीय ब्रह्मोस मिसाइलों ने पकिस्तान के एयरबेस, रडार स्टेशन और कमांड सेंटर को निशाना बनाया था, उसके बाद से पाकिस्तान अपने एसेट्स की सुरक्षा को लेकर गंभीर हो गया है।

China LD-2000 Air Defence System: पाकिस्तान के इन्फोग्राफिक से खुला राज

हाल ही में पाकिस्तान वायुसेना द्वारा जारी एक इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस सिस्टम इन्फोग्राफिक में एक मोबाइल गन आधारित एयर डिफेंस सिस्टम दिखाई दिया। जो चीन के एलडी-2000 क्लोज-इन वेपन सिस्टम (सीआईडब्ल्यूएस) से काफी मिलता-जुलता था।

जिसके बाद बाद दावे किए जाने लगे कि यह सिस्टम चीनी नौसेना के टाइप-730 गैटलिंग गन पर आधारित एलडी-2000 हो सकता है। हालांकि पाकिस्तान एयर फोर्स या पाकिस्तान सरकार की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।

इसके बावजूद इस तस्वीर को गंभीरता से लिया जा रहा है क्योंकि मिलिट्री इन्फोग्राफिक्स में आमतौर पर उन्हीं प्लेटफॉर्मों को दिखाया जाता है जो किसी न किसी रूप में डिफेंस प्रोजेक्ट, मूल्यांकन या भविष्य के फॉरमेशंस का हिस्सा हों। (China LD-2000 Air Defence System)

China LD-2000 Air Defence System
China LD-2000 Air Defence System

क्या है एलडी-2000 सिस्टम?

एलडी-2000 चीन का बनाया एक नियर रेंज एयर डिफेंस सिस्टम है। इसे क्लोज-इन वेपन सिस्टम यानी सीआईडब्ल्यूएस क्लास में रखा जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य दुश्मन के उन हवाई खतरों को नष्ट करना है जो अंतिम चरण में टारगेट के बेहद करीब पहुंच चुके हों।

यह सिस्टम चीनी नौसेना के प्रसिद्ध टाइप-730 सात बैरल गैटलिंग गन सिस्टम के लैंड वर्जन के तौर पर देखा जाता है। इसमें 30 मिमी की सात बैरल वाली गैटलिंग गन लगाई जाती है, जो अत्यधिक तेज रफ्तार से फायरिंग कर सकती है।

इसका फायरिंग रेट लगभग 5,600 राउंड प्रति मिनट तक पहुंच सकता है। (China LD-2000 Air Defence System)

ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशंस को रोकेगा

एलडी-2000 को खास तौर पर कम ऊंचाई पर उड़ने वाले खतरों के खिलाफ बनाया गया है। इसमें क्रूज मिसाइल, ड्रोन, कामिकाजे ड्रोन, लॉइटरिंग म्यूनिशन, स्मार्ट वेपन और तेज गति वाले मानवरहित प्लेटफॉर्म (यूएवी) शामिल हैं।

आधुनिक युद्ध में कई हथियार रडार से बचते हुए बहुत कम ऊंचाई पर उड़ान भरते हैं। ऐसे टारगेट्स को इंटरसेप्ट करना अक्सर मुश्किल होता है। एलडी-2000 जैसे सिस्टम इन्हीं खतरों के खिलाफ अंतिम सुरक्षा घेरा बनाते हैं।

इसी कारण इसे “टर्मिनल डिफेंस सिस्टम” भी कहा जाता है। जब लंबी और मध्यम दूरी की एयर डिफेंस लेयर किसी खतरे को रोकने में विफल रहती है, तब एलडी-2000 जैसे सिस्टम एक्टिव हो जाते हैं। (China LD-2000 Air Defence System)

China LD-2000 Air Defence System
China LD-2000 Air Defence System

कैसे काम करता है यह सिस्टम?

एलडी-2000 केवल एक गन नहीं बल्कि खुद में एक पूरा एयर डिफेंस प्लेटफॉर्म है। इसमें आधुनिक रडार, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर और फायर कंट्रोल सिस्टम लगे होते हैं।

जब कोई टारगेट इसकी जद आता है तो रडार उसकी स्थिति, गति और दिशा का पता लगाता है। इसके बाद फायर कंट्रोल कंप्यूटर टारगेट की संभावित फ्लाइट डायरेक्शन की गणना करता है।

जैसे ही टारगेट प्रभावी मारक दूरी में आता है, गैटलिंग गन कुछ सेकंड के भीतर सैकड़ों गोलियां दाग सकती है। इसका उद्देश्य टारगेट को पूरी तरह नष्ट करना या उसे उसके मिशन को पूरा करने से पहले उसे निशाना बनाना होता है। (China LD-2000 Air Defence System)

China LD-2000 Air Defence System
China LD-2000 Air Defence System

एयरबेस की सुरक्षा बनी टेंशन

ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस मिसाइलों ने पााकिस्तान के कई एयरबेसों पर कहर बरपाया था और रनवे को निशाना बनाया था। इनमें पाकिस्तान के कई स्ट्रेटेजिक एयरबेस जिनमें इस्लामाबाद से करीब 10 किमी दूर नूर खान (रावलपिंडी/चकलाला), भोलारी, ड्रोन बेस मुरीद एयरबेस (चकवाल), जैकोबाबाद (शाहबाज), मुशफ (सरगोधा), रहीम यार खान और सुक्कुर शामिल थे। वहीं, जैकोबाबाद के एफ-16 हैंगर का एक हिस्से को नुकसान पहुंचा था, और कम से कम दो कमांड-कंट्रोल सेंटर भी क्षतिग्रस्त हुए थे।

आधुनिक युद्ध में एयरबेस किसी भी वायुसेना की रीढ़ होते हैं। अगर रनवे, हैंगर, ईंधन भंडार, हथियार डिपो या कमांड सेंटर क्षतिग्रस्त हो जाएं तो अत्याधुनिक फाइटर जेट भी प्रभावी ढंग से ऑपरेशन नहीं कर पाते।

किसी भी बड़े संघर्ष में एयरबेस और मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर शुरुआती टारगेट्स होते हैं। इसी वजह से कई देश अब मल्टी-लेयर एयर डिफेंस नेटवर्क डेवलप कर रहे हैं। इसमें लंबी दूरी की मिसाइलें, मध्यम दूरी के डिफेंस सिस्टम्स और टर्मिनल फेज गन बेस्ड सिस्टम्स शामिल होते हैं। एलडी-2000 को भी इसी अंतिम सुरक्षा परत का हिस्सा माना जा रहा है।

बता दें कि पाकिस्तान पहले से ही चीन के जेएफ-17 थंडर, जे-10सी फाइटर जेट, एचक्यू-9बीई लंबी दूरी के एयर डिफेंस सिस्टम और एलवाई-80 मध्यम दूरी का मिसाइल सिस्टम का इस्तेमाल कर रहा है। इन सिस्टम्स को पाकिस्तान के इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस नेटवर्क की रीढ़ माना जाता है। (China LD-2000 Air Defence System)

China LD-2000 Air Defence System
China LD-2000 Air Defence System

ब्रह्मोस को रोकना नामुमकिन

सूत्रों के मुताबिक, एलडी-2000 की प्रभावी रेंज लगभग 2.5 से 3.5 किलोमीटर तक होती है और यह एयर डिफेंस की आखिरी सुरक्षा परत (लास्ट-डिच लेयर) के रूप में काम करता है। यह सिस्टम सबसोनिक ड्रोन, कम ऊंचाई पर उड़ने वाली क्रूज मिसाइलों और रॉकेट तथा मोर्टार जैसे खतरों के खिलाफ तो कारगर है। लेकिन ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों के मामले में यह फेल है। ऐसी मिसाइलें लंबी दूरी से लॉन्च होकर तेज रफ्तार से टारगेट की ओर बढ़ती हैं, जिसके चलते उन्हें रोकने के लिए पूरा समय नहीं मिल पाता।

सूत्रों का कहना है कि गन बेस्ड सीआईडब्ल्यूएस (क्लोज-इन वेपन सिस्टम) रनवे को नुकसान पहुंचाने वाले हमलों या दूर से किए गए स्टैंडऑफ अटैक को नहीं रोक सकती। इसका मुख्य उद्देश्य केवल उस मिसाइल, ड्रोन या गोला-बारूद को मार गिराने की कोशिश करना होता है जो पहले ही एयरबेस के ऊपर या उसके बेहद करीब पहुंच चुका हो। (China LD-2000 Air Defence System)

International Day of Older Persons 2026: Why Elderly Veterans Deserve More Than Just Healthcare

International Day of Older Persons 2026
101 Years of Care, Courage & Compassion: Honouring Elderly Veterans with Dignity on International Day of Older Persons. (AI Image)

Sometime in 2011, while serving at Suratgarh as a young Major in the Army Medical Corps, I heard a Brigade Commander say something about ex-servicemen that stayed with me. He was reminding those responsible for looking after them that whenever a veteran approached us, we needed to remember who was standing before us. There was something about the way he spoke of them that touched a chord. I understood his words then, but perhaps I had not yet lived long enough in uniform to understand their full meaning.

Learning Respect from Veterans

A few years later, while serving at Base Hospital, Delhi Cantonment, that understanding deepened. A group of ex-servicemen came with a grievance. They were not getting some of their medicines and were visibly agitated. In their frustration, one of them said, almost as a reminder rather than a complaint, “We have fought the Kargil War. Just get us our medicines.” They were jawans, and I was an officer, but that distinction meant very little to me at that moment. They had served before me. They were senior veterans. Addressing them respectfully as “Sir” came naturally. I assured them that we would try to resolve their problem. What I remember today, however, is not merely the issue of medicines. I remember how much it mattered that somebody had listened.

Seeing the Uniform from the Other Side

Years have passed since then. Today, working closely with veterans and their families, I understand my Brigade Commander’s words better than I did as that young Major in Suratgarh. I am also much closer now to the other side of the uniform. A few years from now, I too will become an ex-serviceman.

And that changes the way one looks at the elderly veteran who walks through the door.
Often, he does not come to us when everything is going well. He comes when he is anxious-a medicine may not be available, treatment may have been delayed, a hospital response may have left him confused, or he may simply not know what to do next. Before looking at the file in his hand, perhaps we should first look at the person carrying it.

Offer him a chair. Let him settle down. Give him a glass of water. And then listen.

These are small things. Yet I have repeatedly seen how much anxiety can disappear when someone feels that another person is genuinely prepared to hear him.

The Power of Listening During Uncertainty

Only recently, I was reminded of this again. The son of an elderly ex-serviceman came to us deeply worried about his father. The veteran, around seventy, had multiple illnesses and had remained in hospital for several weeks, requiring ventilatory support. The son was not a doctor, but weeks beside his father’s bed had taught him enough medical terminology to understand much of what was happening. He had followed every development and was frightened by what might happen next. The hospital had begun attempting to wean his father from the ventilator. To the son, however, the discussion about the coming days sounded almost like a deadline. His anxiety was visible. There was little that we sitting across the table could change about his father’s illness. Nor could we promise an outcome that medicine itself could not promise.

But we could explain.

We told him what the process meant and that further decisions would depend upon how his father responded. A senior colleague sitting with me shared his own experience of having seen seriously ill patients improve when circumstances had initially appeared discouraging. Gradually, the son’s anxiety began to settle. Before he left, we gave him our contact details and asked him to keep us informed.

His father’s medical condition had not changed during those few minutes.

But the son who walked out of the room was calmer than the son who had walked in.

Compassion as a Form of Care

Perhaps that is one of the simplest lessons my years in medicine and uniform have taught me. We cannot solve every problem, cure every illness or promise every family the outcome it desperately wants. But we can always listen, explain and treat anxiety with patience and uncertainty with compassion. When the person before us is an ageing veteran, there is something else worth remembering. The elderly man who walks slowly into our office today was not always old. There was a time when he could march farther than many of us, endure conditions that would test us today, stay away from his family for months and stand his watch while the country slept.

Age may have slowed his steps, but it cannot erase the journey that he bravely lived.

International Day of Older Persons: Looking Beyond Numbers

Every year on 1 October, the International Day of Older Persons gives us an opportunity to reflect on this. Ageing is often described through numbers- age, blood pressure, blood sugar, medical conditions or degree of dependence. Somewhere among these numbers, however, we can easily lose sight of the person.

Behind every ageing face is a lifetime.

There are families raised, responsibilities shouldered, difficult decisions taken, sacrifices made, losses endured and contributions that may never find a place in any official record. Growing old may change what a person can physically do, but it does not diminish what that person has been-or what he continues to mean.

Patience: The Unwritten Prescription

Healthcare for the elderly, therefore, cannot be measured only through medicines, investigations, procedures and hospital beds. There is another component of care that does not appear on a prescription.

It is patience.

An elderly person may take longer to describe his symptoms. He may ask the same question twice. He may struggle to understand why a document has to be uploaded or why something once done across a counter must now be completed on a screen. Slowness should never be mistaken for inability. Nor should assistance gradually become a substitute for autonomy. There is a difference between helping an elderly person and taking over his decisions simply because doing so is faster. True assistance should enable him to retain as much independence as possible.

Dignity Lies in the Small Details

Dignity also lies in details. A name, an age, a medical history or an investigation report may appear to be just another entry in a busy healthcare system. But to the person whose life that record represents, it is not a minor detail. Accuracy tells the patient that somebody has paid attention.

A patient should never feel that he has become merely a number in a system.

Dignity also depends upon whether the system created to provide care actually works. A healthcare facility may possess equipment and established procedures, but their value lies in whether they are available when a patient needs them. For the elderly person waiting for care, the consequence of a system not working is simple: treatment is delayed.

Age may slow a veteran’s steps. Our procedures should not slow them further.

Bridging the Digital Divide

Technology has added another dimension to ageing. Digital systems have made healthcare faster and more transparent, but the transition has not been equally easy for everyone. What appears to us as a simple OTP, portal, QR code or online form can become a genuine obstacle for someone who spent most of his working life in a world where services were delivered face to face.

Digital literacy must never become a new test of eligibility for dignity. A counter that takes two additional minutes to explain a procedure, a healthcare worker who repeats an instruction without irritation, or a younger person who helps with an online form without making the senior citizen feel helpless- these are small interventions. Yet they can make the difference between dependence and dignity.

Accountability and Compassion Must Coexist

Healthcare systems also require checks and accountability. Public resources must be protected and irregularities examined. Compassion cannot mean abandoning scrutiny. But scrutiny must be fair. A discrepancy deserves examination, but examination should begin with facts rather than conclusions. Sometimes an explanation will reveal a simple error. At other times, closer examination may uncover something requiring action. The objective should neither be to find wrongdoing everywhere nor to explain every irregularity away. It should be to establish the truth. And throughout that process, the beneficiary should never become collateral damage. Perhaps that is what a truly veteran-friendly healthcare system means. It is not a system without rules. It is one in which rules, accountability, efficiency and compassion work together without losing sight of the person for whom the system exists.

The Responsibility Begins at Home

This responsibility does not begin or end at a hospital or government office. It begins at home.
Our parents and grandparents may repeat stories we have already heard. Their pace may no longer match ours. They may require help with things that once came naturally to them. In the rush of our own lives, patience can sometimes become the first casualty. Perhaps that is precisely when it is needed most. One day, if we are fortunate, we too will grow old. The technologies around us will have changed. The world may move at a speed unfamiliar to us. We too may stand before a counter trying to understand a procedure that seems obvious to the person on the other side.

And perhaps what we will want at that moment will not be sympathy. We will want time. We will want to be heard. Above all, we will want to be treated as adults whose lifetime of experience has not disappeared merely because our bodies have begun to slow down.

Standing Watch Over Their Dignity

The International Day of Older Persons therefore need not be marked only through ceremonies, messages or tributes. Its meaning can be found in ordinary behaviour—in listening without impatience, explaining rather than dismissing, protecting without patronising and recognising the individual behind the age. For those of us privileged to work with veterans, there is an additional reason to remember this. The elderly veteran before us is not simply an ageing beneficiary of a healthcare system. He is someone who once stood his watch so that others could live their lives in relative security. Today, perhaps, it is our turn to stand watch over something equally precious-his dignity. A society should not be judged merely by how rapidly it progresses. It should also be judged by whether, in its rush towards the future, it remembers those who helped bring it this far.

When Age Slows the Steps, Dignity Must Never Fade

On 1 October, perhaps our tribute to older persons can begin without grand promises.
It can begin with a chair.

  • A glass of water.
  • A few minutes of patient listening.
  • An explanation offered without irritation.
  • A helping hand offered without taking away independence.

And the understanding that the elderly person standing before us was not always elderly.
Once, he stood where we stand today. And one day, if life is kind enough to give us those years, we may stand where he stands today. That thought alone should be enough to remind us:

When age slows the steps, dignity must never be allowed to fade.

ऑपरेशन कोराग: 18 महीने तक चकमा देता रहा हाशिम मूसा, आखिर कैसे ट्रैक हुआ लश्कर का ‘फौजी कमांडर’?

Operation Korag- Hashim Moosa Killed
Operation Korag: How Actionable Intelligence Led Security Forces To Lashkar Commander Hashim Moosa. (AI Image)

Hashim Moosa Killed: जम्मू-कश्मीर के बडगाम जिले के यूसमर्ग, कोराग और दूधपथरी के घने जंगलों में सुरक्षा बलों ने एक बड़े आतंकवाद विरोधी अभियान में लश्कर-ए-तैयबा के मोस्ट वॉन्टेड विदेशी आतंकी हाशिम मूसा उर्फ आसिफ फौजी उर्फ सुलेमान को मार गिराया। सूत्रों का कहना है कि मूसा के खिलाफ चलाया गया यह ऑपरेशन मई 2026 में शुरू किए गए लंबे समय से जारी “ऑपरेशन शेरूवाली” का हिस्सा था। सुरक्षा एजेंसियां लगातार उसकी गतिविधियों पर नजर रख रही थीं और सही मौके का इंतजार कर रही थीं।

सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार हाशिम मूसा पिछले डेढ़ साल से अधिक समय से सुरक्षा बलों की निगरानी सूची में था। वह पाकिस्तान का नागरिक था और माना जाता है कि 2023 में घुसपैठ कर जम्मू-कश्मीर पहुंचा था। मूसा को पाकिस्तान सेना की स्पेशल सर्विस ग्रुप (एसएसजी) की ट्रेनिंग भी हासिल थी। इसी वजह से आतंकी नेटवर्क में उसे “फौजी मूसा” कहा जाता था।

Hashim Moosa Killed: इंटेलिजेंस ने बदली ऑपरेशन की दिशा

इस ऑपरेशन की सबसे बड़ी खासियत वह “एक्शनएबल इंटेलिजेंस” थी, जिसने सीधे मूसा तक सुरक्षा बलों को पहुंचाया। सूत्रों के मुताबिक हाल के दिनों में मूसा की गतिविधियों को लेकर तकनीकी और ह्यूमन इंटेलिजेंस दोनों तरह के इनपुट मिले थे।

टेक्निकल इंटेलिजेंस में सर्विलांस इक्विप्मेंट्स, कम्युनिकेशन सिग्नल्स और अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से जानकारी जुटाई गई। वहीं ह्यूमन इंटेलिजेंस के तहत स्थानीय स्तर पर मिले इनपुट्स ने उसकी मौजूदगी की पुष्टि की। इन दोनों स्रोतों से मिली जानकारी को जोड़कर एजेंसियों ने उसकी संभावित लोकेशन का पता लगाया।

29 सितंबर को बडगाम के गुरवेत कलां और कोराग इलाका में उसकी मौजूदगी की सूचना मिली। यह जानकारी तुरंत भारतीय सेना की 15 कोर यानी चिनार कॉर्प्स तक पहुंचाई गई। इसके बाद बिना देरी किए संयुक्त अभियान शुरू किया गया।

कैसे चला ऑपरेशन कोराग?

इस अभियान को “ऑपरेशन कोराग” नाम दिया गया। इसमें भारतीय सेना की चिनार कोर, जम्मू-कश्मीर पुलिस और सीआरपीएफ ने मिलकर काम किया।

यूसमर्ग और दूधपथरी के बीच का इलाका घने जंगलों, ऊंची पहाड़ियों और संकरे रास्तों से भरा हुआ है। यह इलाका लंबे समय से आतंकियों के लिए छिपने की सुरक्षित जगह माना जाता रहा है। ऐसे इलाकों में ऑपरेशन चलाना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है।

29 सितंबर की रात संयुक्त टीमों ने इलाके की घेराबंदी कर तलाशी शुरू की। सेना के अनुसार जवानों ने संदिग्ध गतिविधि देखी और चुनौती दी। जवाब में आतंकियों ने गोलीबारी शुरू कर दी। इसके बाद मुठभेड़ शुरू हुई।

करीब रात 10:30 बजे के आसपास हुई इस मुठभेड़ में हाशिम मूसा मारा गया। ऑपरेशन के बाद भी सुरक्षा बलों ने इलाका को खाली नहीं किया और सुबह तक तलाशी जारी रखी।

सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार मुठभेड़ स्थल से एक एके-47 राइफल, दो एके मैगजीन, एक लोरा/अल्ट्रा कम्युनिकेशन डिवाइस हैंडसेट, एक लोरा/अल्ट्रा मोबाइल डिवाइस और एक मोबाइल फोन बरामद किया गया।

लोरा बेस्ड कम्युनिकेशन इक्विपमेंट्स का इस्तेमाल लंबी दूरी संदेश भेजने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि ऐसे उपकरण आतंकियों को दूरदराज के जंगलों में भी संपर्क बनाए रखने में मदद करते हैं। (Hashim Moosa Killed)

कौन था हाशिम मूसा?

हाशिम मूसा पाकिस्तान मूल का लश्कर-ए-तैयबा का आतंकी था। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार वह 2023 में नियंत्रण रेखा पार कर जम्मू-कश्मीर में घुसा था। उसे आसिफ फौजी और सुलेमान के नाम से भी जाना जाता है। वह मिलिट्री ट्रेनिंग में एक्सपर्ट था, इसी वजह से वह जंगल में गुरिल्ला रणनीति, घात लगाकर हमला करने और सुरक्षा बलों से बच निकलने में माहिर माना जाता था।

मूसा पिछले 18 महीनों से अधिक समय से सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर था। कई बार उसके बारे में इनपुट मिले, लेकिन वह घने जंगलों और पहाड़ी रास्तों का फायदा उठाकर बच निकलता था।

मूसा के मारे जाने के साथ ही इस पूरे चार सदस्यीय समूह का सफाया हो गया है। इससे पहले सुरक्षा बलों ने दिसंबर 2024 में दाचीगाम में हुए ऑपरेशन में जुनैद भट, जुलाई 2025 में ऑपरेशन महादेव के दौरान सुलेमान और सितंबर 2026 में ऑपरेशन असधर में यासिर को मार गिराया था। (Hashim Moosa Killed)

सितंबर की शुरुआत में भी बच निकला था

5 सितंबर 2026 को यूसमर्ग इलाका में एक अन्य ऑपरेशन के दौरान सुरक्षा बलों ने उसके नेटवर्क को निशाना बनाया था। उस मुठभेड़ में उसका करीबी सहयोगी यासिर मारा गया था।

हालांकि उस समय मूसा बचकर निकल गया था। इसके बाद सुरक्षा एजेंसियों ने उसके संभावित मूवमेंट पर लगातार नजर रखी। पूंछ-राजौरी के जंगलों से लेकर मध्य कश्मीर तक उसके नेटवर्क की गतिविधियों की निगरानी की गई।

इसी लगातार दबाव और निगरानी ने अंततः ऑपरेशन कोराग की सफलता का रास्ता तैयार किया। (Hashim Moosa Killed)

किन हमलों से जुड़ा था मूसा?

गृह मंत्रालय के मुताबिक यह समूह हालन हमला (अगस्त 2023), कांडी हमला (मई 2023), डीकेजी हमला (दिसंबर 2023), शाहसितार हमला (मई 2024), शिव खोरी हमला (जून 2024), गगनगीर हमला (अक्टूबर 2024), बूटापाथरी हमला (अक्टूबर 2024) और बैसरन हमला (अप्रैल 2025) जैसे कई बड़े आतंकी हमलों से जुड़ा रहा है।

4 अगस्त 2023 को कुलगाम के हलान इलाके में हुए हमले में तीन भारतीय सैनिक शहीद हुए थे। एजेंसियों का दावा है कि इस हमले में उसका हाथ था।

21 दिसंबर 2023 को पूंछ सेक्टर के डेरा की गली इलाका में सेना के काफिले पर घात लगाकर हमला किया गया था। इस हमले में चार सैनिक शहीद हुए थे। जांच एजेंसियों ने इस हमले को भी उसके नेटवर्क से जोड़ा।

4 मई 2024 को पूंछ के शाहसितार इलाका में भारतीय वायुसेना के काफिले पर हमला हुआ था। इसमें एक वायुसेना कर्मी की मौत हुई थी और कई अन्य घायल हुए थे। इसे पीछे भी मूसा का हाथ था।

जून 2024 में शिव खोरी जा रहे तीर्थयात्रियों की बस पर हुई फायरिंग में भी मूसा शामिल था।

24 अक्टूबर 2024 को गुलमर्ग के बोटापथरी इलाके में सेना के काफिले पर हमला हुआ था। इस घटना में दो सैनिक और दो पोर्टर मारे गए थे। जांच में उसका नाम सामने आया था।

इसके बाद 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम के बैसरन घाटी में पर्यटकों पर बड़ा आतंकी हमला हुआ। इस हमले में 26 लोगों की जान गई, जिनमें अधिकांश पर्यटक थे और एक स्थानीय नागरिक भी शामिल था। सुरक्षा एजेंसियों की जांच में मूसा का नाम इस हमले के संदिग्धों में शामिल बताया गया था। (Hashim Moosa Killed)

सज्जाद जट्ट से लगातार संपर्क में था

खुफिया एजेंसियों के अनुसार मूसा लगातार लश्कर कमांडर सज्जाद जट्ट के संपर्क में था। जट्ट को घाटी में सक्रिय लश्कर नेटवर्क का ऑपरेटर माना जाता है।

एजेंसियों का कहना है कि मूसा की जट्ट से लगातार बातचीत होती थी। इसी वजह से वह केवल एक फील्ड कमांडर नहीं बल्कि बड़े नेटवर्क की महत्वपूर्ण कड़ी माना जा रहा था।

सुरक्षा एजेंसियां उसके कम्युनिकेशन नेटवर्क को ट्रैक कर रही थीं। माना जाता है कि इसी दौरान उसकी लोकेशन का पता लगा। (Hashim Moosa Killed)

नेवल कमांडर्स कॉन्फ्रेंस में CDS ने नेवी को बताया ‘स्ट्रैटेजिक फोर्स मल्टीप्लायर’, नेवी चीफ बोले- हाई कॉम्बैट रेडीनेस हमारी प्राथमिकता

Naval Commanders Conference 2026
Naval Commanders' Conference 2026: CDS Calls Indian Navy a Strategic Force Multiplier, Focus on Combat Readiness and Joint Operations. (Image: PIB)

Naval Commanders Conference 2026: चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल एन.एस. राजा सुब्रमणि ने भारतीय नौसेना को देश की सुरक्षा व्यवस्था का “स्ट्रैटेजिक फोर्स मल्टीप्लायर” बताया है। भारतीय नौसेना की दूसरी नेवल कमांडर्स कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए उन्होंने युद्ध के बदलते तरीकों, इनोवेशन, आत्मनिर्भरता और तीनों सेनाओं के बीच बेहतर इंटीग्रेशन की जरूरत पर जोर दिया।

29 सितंबर को नई दिल्ली स्थित नौसेना भवन में शुरू हुई दूसरी नेवल कमांडर्स कॉन्फ्रेंस में समुद्री सुरक्षा, ऑपरेशनल तैयारियों और भविष्य की युद्धक क्षमताओं पर मंथन किया जा रहा है। सम्मेलन के पहले दिन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी हिस्सा लिया था तथा क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों, संयुक्त सैन्य अभियानों और हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका पर अपने विचार साझा किए।

Naval Commanders Conference 2026: सीडीएस ने नेवी को बताया स्ट्रैटेजिक फोर्स मल्टीप्लायर

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल एन.एस. राजा सुब्रमणि ने नौसेना कमांडरों को संबोधित करते हुए भारतीय नौसेना को देश की सुरक्षा व्यवस्था में एक “स्ट्रैटेजिक फोर्स मल्टीप्लायर” बताया।

सीडीएस ने कहा कि आधुनिक युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। ऐसे समय में तकनीकी बदलाव, डेटा शेयरिंग, नेटवर्क आधारित ऑपरेशन्स और सैन्य संसाधनों की मजबूती पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है।

उन्होंने नौसेना द्वारा तकनीक अपनाने, आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने और देश की ऊर्जा सुरक्षा की रक्षा में निभाई जा रही भूमिका की सराहना की। जनरल राजा सुब्रमणि ने तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल और इंटीग्रेशन को भी जरूरी बताया। (Naval Commanders Conference 2026)

कॉम्बैट रेडीनेस पर फोकस

सम्मेलन में बोलते हुए नौसेना प्रमुख एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन ने मौजूदा समुद्री सुरक्षा माहौल की समीक्षा करते हुए नौसेना की ऑपरेशनल स्थिति का आकलन किया। उन्होंने कहा कि बदलते सुरक्षा माहौल में भारतीय नौसेना को उच्च स्तर की कॉम्बैट रेडीनेस, तेज प्रतिक्रिया क्षमता और तकनीकी आधुनिकीकरण पर लगातार ध्यान देना होगा।

आर्मी चीफ ने साझा किए सुरक्षा माहौल पर विचार

थल सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ ने भी सम्मेलन में हिस्सा लिया और नौसेना कमांडरों के साथ बातचीत की। उन्होंने मौजूदा सुरक्षा चुनौतियों और क्षेत्रीय हालात पर अपने विचार साझा किए। बैठक के दौरान तीनों सेनाओं के बीच बेहतर समन्वय, इंटरऑपरेबिलिटी और उभरती सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए संयुक्त प्रतिक्रिया क्षमता पर चर्चा हुई।

आर्मी चीफ और नौसेना नेतृत्व के बीच हुई बातचीत में ऑपरेशनल अनुभव साझा करने, संयुक्त सैन्य तैयारियों को मजबूत करने और इंटीग्रेटेड ऑपरेशन्स के महत्व पर भी जोर दिया गया। (Naval Commanders Conference 2026)

बदलते युद्ध स्वरूप पर हुई चर्चा

सम्मेलन के दौरान नौसेना नेतृत्व को बदलते युद्ध स्वरूप, नई सैन्य तकनीकों और संयुक्त अभियानों की बढ़ती भूमिका पर चर्चा करने का अवसर मिला।

वरिष्ठ अधिकारियों ने इस बात पर विचार-विमर्श किया कि आधुनिक युद्ध में केवल पारंपरिक सैन्य ताकत पर्याप्त नहीं है। साइबर क्षमता, डेटा नेटवर्क, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सिस्टम, ऑटोनॉमस प्लेटफॉर्म और रियल टाइम सूचना साझा करना भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। (Naval Commanders Conference 2026)

ऑपरेशंस से लेकर नई टेक्नोलॉजी तक होगा मंथन

तीन दिवसीय सम्मेलन के बाकी सत्रों में नौसेना नेतृत्व कई अहम विषयों पर विस्तृत चर्चा करेगा। इनमें ऑपरेशन्स, मैटेरियल मैनेजमेंट, लॉजिस्टिक्स, ह्यूमन रिसोर्सेज, ट्रेनिंग, फोर्स डेवलपमेंट और नई उभरती तकनीकों को शामिल करने से जुड़े मुद्दे प्रमुख रहेंगे।

इसके अलावा नौसेना की युद्धक तैयारियों को और मजबूत करने, फोर्स लेवल को बेहतर बनाने तथा क्षमता विकास की गति बढ़ाने से जुड़े मामलों की भी समीक्षा की जाएगी।

नेवल कमांडर्स कॉन्फ्रेंस भारतीय नौसेना के लिए एक महत्वपूर्ण मंच है, जहां समुद्री सुरक्षा, जॉइंट मिलिट्री ऑपरेशंस, तकनीकी आधुनिकीकरण और भविष्य की क्षमताओं से जुड़े मुद्दों पर शीर्ष स्तर पर चर्चा की जा रही है। (Naval Commanders Conference 2026)

आर्मेनिया ने किया 155 मिमी भारतीय ट्राजन होवित्जर का लाइव फायर टेस्ट, एक मिनट में तैनात, 55 किमी तक मार

Trajan 155mm Howitzer
Armenia Conducts Live Fire Test of India-French Trajan 155mm Howitzer, Boosting India's Defence Export Profile. (AI Image)

Trajan 155mm Howitzer: भारत और फ्रांस की साझेदारी में बनी ट्राजन 155 मिमी/52 कैलिबर होवित्जर तोपों का हाल ही में आर्मेनिया ने अपने सैन्य अभ्यास के दौरान लाइव-फायर परीक्षण किया। ट्राजन एक एडवांस टोड आर्टिलरी सिस्टम है, जिसे फ्रांस की केएनडीएस (पूर्व नेक्स्टर सिस्टम्स) और भारत की लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी) ने मिलकर बनाया है। यह लंबी दूरी तक सटीक फायर करने वाली आधुनिक तोप मानी जाती है और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी प्रभावी ढंग से काम करने के लिए डिजाइन की गई है।

बता दें कि यह परीक्षण ऐसे समय हुआ है जब आर्मेनिया तेजी से अपने पुराने सोवियत दौर के हथियारों की जगह आधुनिक पश्चिमी और भारतीय हथियारों को शामिल कर रहा है।

Trajan 155mm Howitzer: आर्मेनिया ने क्यों चुनी भारतीय ट्राजन तोप?

पिछले कुछ सालों में आर्मेनिया ने अपने डिफेंस प्रोक्योरमेंट सोर्सेज में बड़ा बदलाव किया है। लंबे समय तक रूस पर निर्भर रहने वाला यह देश अब भारत, फ्रांस और अन्य देशों से भी सैन्य उपकरण खरीद रहा है।

अजरबैजान, तुर्किये और पाकिस्तान के बढ़ते रक्षा सहयोग के बीच आर्मेनिया अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने में जुटा है। इसी रणनीति के तहत उसने भारतीय डिफेंस सिस्टम्स में रुचि दिखाई है। ट्राजन होवित्जर की खरीद भी इसी व्यापक सैन्य आधुनिकीकरण कार्यक्रम का हिस्सा मानी जा रही है।

ट्राजन 155 मिमी/52 कैलिबर होवित्जर

ट्राजन 155 मिमी, 52 कैलिबर की टोड आर्टिलरी गन है। इसका डिजाइन फ्रांस की प्रसिद्ध सीजर (सीएईएसएआर) सेल्फ प्रोपेल्ड होवित्जर सिस्टम से प्रेरित है। इसकी बैरल तकनीक सीजर से ली गई है, जबकि इसका कैरिज फ्रांसीसी टीआरएफ-1 गन जैसा है।

इस तोप का वजन लगभग 13 टन यानी करीब 13,000 किलोग्राम है। यही वजह है कि इसे भारी तोपों की तुलना में तेजी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सकता है।

इसका ऑपरेशन आमतौर पर पांच से सात सैनिकों की टीम करती है। गन में ऑटोमैटिक शेल-लोडिंग सिस्टम लगाया गया है, जिससे फायरिंग की रफ्तार बढ़ जाती है।

कितनी दूर तक मार कर सकती है ट्राजन?

ट्राजन की सबसे बड़ी ताकत इसकी लंबी मारक क्षमता है। सामान्य हाई एक्सप्लोसिव गोले के साथ यह लगभग 30 किलोमीटर तक निशाना साथ सकती है। एक्सटेंडेड रेंज फुल बोर बेस ब्लीड (ईआरएफबी-बीबी) गोला-बारूद के साथ इसकी रेंज करीब 42 किलोमीटर तक पहुंच जाती है।

वहीं, वेलोसिटी एन्हांस्ड लॉन्ग रेंज आर्टिलरी प्रोजेक्टाइल (वीएलएपी) या रॉकेट-असिस्टेड गोले के इस्तेमाल से यह लगभग 55 किलोमीटर दूर तक फायर कर सकती है।

ट्राजन डायरेक्ट फायर मोड में करीब 2 किलोमीटर दूरी पर भी टारगेट को निशाना बना सकती है। (Trajan 155mm Howitzer)

आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम से लैस

ट्राजन में कई आधुनिक डिजिटल सिस्टम भी लगाए गए हैं। गन में इंटीग्रेटेड इनर्शियल नेविगेशन यूनिट (आईएनयू), ऑटोमैटिक लेइंग सिस्टम, मजल वेलोसिटी रडार और बैलिस्टिक कंप्यूटर मौजूद हैं। ये सभी सिस्टम फायरिंग की सटीकता बढ़ाने में मदद करते हैं।

ट्राजन आधुनिक सैन्य नेटवर्क के साथ भी जुड़ सकती है, जिससे कमांड सेंटर से मिले डेटा के आधार पर तेजी से फायर मिशन पूरा किया जा सकता है।

यह गन बोनस एंटी-आर्मर स्मार्ट गोला-बारूद और स्पेसिडो कोर्स करेक्टिंग फ्यूज जैसे उन्नत गोला-बारूद का इस्तेमाल भी कर सकती है। (Trajan 155mm Howitzer)

एक मिनट से भी कम समय में तैनाती

ट्राजन की एक और खासियत इसकी तुरंत तैनाती क्षमता है। इसमें ऑक्जिलियरी पावर यूनिट (एपीयू) लगी है, जो इसे सीमित दूरी तक खुद चलने की क्षमता देती है। यह लगभग 10 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से खुद चल सकती है। जब इसे ट्रक से टो किया जाता है तो इसकी गति 80 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच सकती है। यह गन एक मिनट 30 सेकंड से भी कम समय में फायरिंग पोजीशन में तैनात हो सकती है। (Trajan 155mm Howitzer)

भारतीय सेना ने नहीं खरीदी ट्राजन

आर्मेनिया इस समय भारत की दो अलग-अलग 155 मिमी/52 कैलिबर टोइड होवित्जर तोपों का इस्तेमाल कर रहा है, इनमें एटीएजीएस (ATAGS) और ट्राजन (Trajan) हैं। लेकिन भारतीय सेना के पास अभी इस कैटेगरी की दोनों तोपें सर्विस में नहीं हैं, जबकि आर्मेनिया इन्हें पहले ही अपने सैन्य बेड़े में शामिल कर चुका है।

दिलचस्प बात यह है कि ट्राजन को भारतीय सेना की टोड आर्टिलरी जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया था। इसने रेगिस्तान, दलदली क्षेत्रों और ऊंचाई वाले ठंडे इलाकों में परीक्षण भी सफलतापूर्वक पूरे किए थे। इसके बावजूद भारतीय सेना ने इसे सेवा में शामिल नहीं किया। बाद में संबंधित खरीद कार्यक्रम को आगे नहीं बढ़ाया गया।

इस कारण आर्मेनिया ट्राजन का पहला प्रमुख ऑपरेशनल यूजर बन गया है।

जून 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के हजीरा स्थित एलएंडटी संयंत्र का दौरा किया था। उस दौरान दिखाई गई ट्राजन गन भी आर्मेनिया के लिए तैयार की जा रही युनिट्स में से एक बताई गई थी।

ट्राजन का उत्पादन गुजरात के हजीरा स्थित एलएंडटी संयंत्र में किया जा रहा है। गन के कई महत्वपूर्ण सबसिस्टम भारत में तैयार किए गए हैं। इनमें ऑक्जिलियरी पावर यूनिट, कंट्रोल पैनल और रोलिंग गियर असेंबली शामिल हैं।

इसी वजह से ट्राजन उन देशों के लिए आकर्षक विकल्प बन रही है जो एडवांस 155 मिमी आर्टिलरी चाहते हैं लेकिन अत्यधिक महंगे प्लेटफॉर्म नहीं खरीदना चाहते। (Trajan 155mm Howitzer)

आर्मेनिया के पास अब कई भारतीय तोप सिस्टम्स

ट्राजन अकेली भारतीय प्रणाली नहीं है जिसे आर्मेनिया ने खरीदा है। आर्मेनिया पहले ही भारत से एमएआरजी 155-बीआर सेल्फ प्रोपेल्ड होवित्जर और एटीएजीएस 155 मिमी गन सिस्टम खरीद कर चुका है।

नवंबर 2022 में आर्मेनिया ने 72 एमएआरजी 155-बीआर सिस्टम का ऑर्डर दिया था। जनवरी 2026 तक इनकी डिलीवरी पूरी होने की जानकारी सामने आई थी। यह ट्रक पर लगी माउंटेड गन है, जो तेजी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर फायरिंग करने में सक्षम है।

इसके अलावा कल्याणी ग्रुप और डीआरडीओ की बनाई एटीएजीएस की भी सीमित संख्या सेवा में शामिल की जा चुकी है। वहीं, फ्रांस से खरीदी गई सीजर स्वचालित होवित्जर भी आर्मेनियाई सेना के पास मौजूद हैं।

इस तरह आर्मेनिया के पास अब 155 मिमी कैलिबर की कई आधुनिक प्रणालियां हैं, जो नाटो मानक गोला-बारूद का इस्तेमाल कर सकती हैं। (Trajan 155mm Howitzer)

भारत-आर्मेनिया रक्षा सहयोग तेजी से बढ़ा

भारत और आर्मेनिया के बीच रक्षा सहयोग पिछले चार वर्षों में काफी तेजी से बढ़ा है। 2022 में आर्मेनिया ने लगभग 720 मिलियन डॉलर के सौदे में आकाश-1एस एयरर डिफेंस सिस्टम खरीदा थाा। वह इस मिसाइल सिस्टम का पहला विदेशी ग्राहक बना।

इसके बाद 250 मिलियन डॉलर के अनुबंध के तहत पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम का निर्यात भी किया गया। 2026 में भारत ने गाइडेड पिनाका रॉकेट की सप्लाई शुरू की।

आर्मेनिया ने स्वाति वेपन लोकेटिंग रडार भी खरीदे हैं, जो दुश्मन की तोपों और रॉकेटों की स्थिति का पता लगाने में सक्षम हैं। साथ ही आर्मेनिया टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स के बनाए एएलएस-50 लोइटरिंग म्यूनिशन का भी ग्राहक है।

इस साल 17 अगस्त को येरेवन में भारत के रक्षा सचिव और आर्मेनिया के हाई-टेक इंडस्ट्री मंत्री के बीच एक एमओयू पर भी दस्तखत हुए थे। इस समझौते का उद्देश्य रक्षा अनुसंधान, तकनीकी सहयोग और संयुक्त उत्पादन को बढ़ावा देना है। वहीं, दोनों देशों के बीच कुल कॉन्ट्रैक्ट्स का मूल्य अब 1.7 अरब यूरो से अधिक बताया जाता है, जिससे आर्मेनिया भारत के सबसे बड़े रक्षा निर्यात बाजारों में शामिल हो गया है। (Trajan 155mm Howitzer)

पलक झपकते ही दुश्मन ड्रोनों का होगा काम तमाम, डीआरडीओ बना रहा 30 किलोवाट डायरेक्टेड एनर्जी वेपन

DRDO 30kW Laser Weapon System
DRDO Moves Ahead With Indigenous 30kW Laser Weapon System To Counter Drones And UAV Swarms. (AI Image)

DRDO 30kW Laser Weapon System: भारत अब अपने सबसे शक्तिशाली स्वदेशी लेजर हथियार को प्रोडक्शन फेज में ले जाने की तैयारी कर रहा है। डीआरडीओ की हैदराबाद स्थित प्रयोगशाला सेंटर फॉर हाई एनर्जी सिस्टम्स एंड साइंसेज (सीएचईएस) ने 30 किलोवॉट क्षमता वाले काउंटर-ड्रोन डायरेक्टेड एनर्जी वेपन (डीईडब्ल्यू) के लिए स्पेक्ट्रल बीम कंबाइंड (एसबीसी) लेजर सिस्टम के डेवलपमेंट और इंटीग्रेशन के लिए इंडस्ट्री से प्रस्ताव मांगे हैं। यह सिस्टम मुख्य रूप से ड्रोन, ड्रोन स्वार्म, फिक्स्ड-विंग यूएवी और दुश्मन के सर्विलांस सेंसर को नष्ट करने के लिए विकसित किया गया है।

यह ट्रक पर लगाया जाने वाला हाई-पावर लेजर सिस्टम है, जो लगभग 5 किलोमीटर तक की दूरी पर हवाई खतरों को निशाना बना सकता है। अगस्त 2025 में इसके अंतिम ट्रायल्स पूरे हो चुके हैं।

DRDO 30kW Laser Weapon System: क्या है नया लेजर प्रोजेक्ट?

डीआरडीओ चाहता है कि भारतीय इंडस्ट्री पूरा सिस्टम खुद डिजाइन करे, बनाए, टेस्ट करे और सभी हिस्सों को एक साथ इंटीग्रेट करे। इस सिस्टम में हाई-पावर लेजर सोर्स, बीम डिलीवरी सिस्टम, कमांड एंड कंट्रोल मॉड्यूल, मैकेनिकल स्ट्रक्चर और टेस्टिंग फैसिलिटी शामिल होंगी।

मुख्य लक्ष्य ऐसा स्वदेशी लेजर सिस्टम तैयार करना है जो बहुत ज्यादा एनर्जी वाली एक सिंगल लेजर बीम पैदा कर सके और उसे बेहद सटीक तरीके से लक्ष्य पर फोकस कर सके।

कैसे काम करेगी यह तकनीक?

इस प्रोजेक्ट की सबसे खास तकनीक है स्पेक्ट्रल बीम कंबाइनिंग (एसबीसी)। आम तौर पर एक अकेले फाइबर लेजर की पावर सीमित होती है। लेकिन एसबीसी तकनीक में कई छोटे और बेहद सटीक फाइबर लेजर चैनलों को एक साथ जोड़कर एक शक्तिशाली लेजर बीम बनाई जाती है।

डीआरडीओ की योजना के अनुसार सिस्टम में लगभग 30 नैरो-लाइनविड्थ फाइबर लेजर चैनल होंगे। इन सभी चैनलों को विशेष डिफ्रैक्शन ग्रेटिंग की मदद से जोड़ा जाएगा। जब सभी चैनलों की एनर्जी एक साथ मिलती है तो एक हाई-पावर लेजर बीम तैयार होती है।

इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि पावर बढ़ने के बावजूद बीम की क्वालिटी खराब नहीं होती। इसका मतलब है कि लंबी दूरी पर भी टारगेट तक पर्याप्त एनर्जी पहुंचाई जा सकती है।

स्पेक्ट्रल बीम कंबाइनिंग आधुनिक लेजर तकनीक की सबसे एडवांस सिस्टम्स में से एक मानी जाती है। इसमें कई छोटे लेकिन बेहद सटीक फाइबर लेजर चैनलों को एक साथ जोड़कर एक ताकतवर बीम बनाई जाती है। (DRDO 30kW Laser Weapon System)

क्या है बीम डायरेक्टर?

लेजर सिस्टम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा केवल लेजर सोर्स नहीं बल्कि बीम डायरेक्टर भी होता है। लेजर सोर्स एनर्जी पैदा करता है, लेकिन उस एनर्जी को सही टारगेट तक पहुंचाने का काम बीम डायरेक्टर करता है। यह ऑप्टिकल और मैकेनिकल सिस्टम का एक कॉम्बिनेशन होता है जो लेजर किरण को अत्यधिक सटीकता के साथ लक्ष्य की ओर गाइड करता है।

हाई-पावर लेजर सिस्टम में बहुत छोटी गलती भी टारगेट को मिस कर सकती है। इसी कारण डीआरडीओ ने इस प्रोजेक्ट में सिक्स-एक्सिस हेक्सापॉड, इलेक्ट्रॉनिक ऑटोकॉलिमेटर और इंटरफेरोमीटर जैसे हाई-प्रिसिजन उपकरणों की मांग की है।

इन उपकरणों की मदद से लेजर बीम को लगातार सही दिशा में रखा जा सकेगा और उसकी सटीकता बनी रहेगी।

गर्मी को कंट्रोल करना सबसे बड़ी चुनौती

30 किलोवाट कैटेगरी का लेजर सिस्टम बहुत अधिक एनर्जी पैदा करता है। इसके साथ बड़ी मात्रा में गर्मी भी उत्पन्न होती है। अगर इस गर्मी को कंट्रोल नहीं किया जाए तो ऑप्टिकल सिस्टम को नुकसान पहुंच सकता है और लेजर की कार्यक्षमता कम हो सकती है। इसी वजह से डीआरडीओ ने इस प्रोजेक्ट में एडवांस्ड कूलिंग सिस्टम को जरूरी बनाया है। (DRDO 30kW Laser Weapon System)

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी जरूरत

मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान दोनों देशों ने बड़ी संख्या में ड्रोन का इस्तेमाल किया था। वहीं, पाकिस्तान ने कम लागत वाले ड्रोन का उपयोग भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम की लोकेशन पता लगाने और महंगे इंटरसेप्टर मिसाइलों को खर्च करवाने के लिए किया।

छोटे और कम लागत वाले ड्रोन एयरबेस, रडार स्टेशन, कमांड सेंटर और महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों के लिए गंभीर खतरा बन सकते हैं। ऐसे ड्रोनों को पारंपरिक मिसाइलों से मार गिराना अक्सर महंगा साबित होता है। कई बार जिस ड्रोन की कीमत लाखों रुपये होती है, उसे गिराने के लिए करोड़ों रुपये की मिसाइल खर्च करनी पड़ती है।

डायरेक्टेड एनर्जी वेपन ऐसे हथियार होते हैं जो बारूद या मिसाइल की जगह अत्यधिक शक्तिशाली लेजर बीम या माइक्रोवेव एनर्जी का इस्तेमाल करते हैं। जब तक एनर्जी उपलब्ध है, सिस्टम बार-बार फायर कर सकता है।

जब लेजर बीम किसी ड्रोन या एरियल टारगेट पर फोकस की जाती है तो वह उसके मोटर, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर या अन्य महत्वपूर्ण हिस्सों को नुकसान पहुंचा सकती है। इससे लक्ष्य काम करना बंद कर देता है या पूरी तरह नष्ट हो जाता है।

लेजर बीम लगभग प्रकाश की गति से टारगेट तक पहुंचती है, जिससे प्रतिक्रिया समय बेहद कम हो जाता है और ड्रोन जैसे तेज लक्ष्यों को निशाना बनाना आसान हो जाता है। (DRDO 30kW Laser Weapon System)

एयर डिफेंस में कैसे काम करेगा?

आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम “ओओडीए लूप” पर आधारित होते हैं। इसका मतलब है ऑब्जर्व, ओरिएंट, डिसाइड और एक्ट। सबसे पहले रडार, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर, इन्फ्रारेड सिस्टम और अन्य निगरानी उपकरण हवाई क्षेत्र पर नजर रखते हैं। इसके बाद कंप्यूटर और ऑपरेटर यह पहचानते हैं कि कौन-सा टारगेट फ्रेंडली है और कौन-सा एनिमी।

जब खतरे की पहचान हो जाती है तो सिस्टम तय करता है कि किस हथियार का इस्तेमाल करना है। इसी चरण में हाई-एनर्जी लेजर एक विकल्प के रूप में सामने आता है। पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य टारगेट की पहचान और प्रतिक्रिया के बीच का समय न्यूनतम रखना होता है। (DRDO 30kW Laser Weapon System)

2 से 10 किलोवाट कैटेगरी के लेजर सिस्टम तैयार

भारत पिछले कई सालों से डायरेक्टेड एनर्जी वेपन तकनीक पर काम कर रहा है। डीआरडीओ पहले ही 2 किलोवाट और 10 किलोवाट कैटेगरी के लेजर सिस्टम तैयार कर चुका है।

इसके बाद अप्रैल 2025 में आंध्र प्रदेश के कुरनूल स्थित नेशनल ओपन एयर रेंज में वाहन पर लगे मल्टी-किलोवाट लेजर सिस्टम का सफल प्रदर्शन किया गया था।

इस परीक्षण के दौरान फिक्स्ड-विंग ड्रोन, स्वॉर्म ड्रोन और निगरानी उपकरणों को सफलतापूर्वक निष्क्रिय किया गया था।

अभी तक हाई-पावर लेजर तकनीक वर्तमान में दुनिया के चुनिंदा देशों के पास है। अमेरिका, चीन और कुछ अन्य देशों ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति की है। नया 30 किलोवाट एसबीसी लेजर प्रोग्राम इसी क्षमता को अगले स्तर तक ले जाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। (DRDO 30kW Laser Weapon System)

राजनाथ सिंह बोले- भारत बना दुनिया का भरोसेमंद सुरक्षा साझेदार, दक्षिण चीन सागर तक दिख रही भारतीय नौसेना की ताकत

Naval Commanders Conference 2026
India Emerges as Trusted Security Partner in Indian Ocean, Rajnath Singh Highlights Navy's Presence from South China Sea to Atlantic. (Pic: PIB)

Naval Commanders Conference 2026: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि भारत आज हिंद महासागर क्षेत्र में फर्स्ट रिस्पॉन्डर, पसंदीदा सुरक्षा साझेदार और भरोसे के प्रतीक के तौर पर उभर चुका है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारतीय नौसेना की मौजूदगी अब केवल हिंद महासागर तक सीमित नहीं है, बल्कि दक्षिण चीन सागर, भूमध्यसागर और अटलांटिक महासागर तक दिखाई दे रही है। यह भारत की बढ़ती ब्लू-वॉटर नेवी की क्षमता का प्रमाण है।

Naval Commanders Conference 2026: चुनौतियां पहले के मुकाबले बढ़ीं

मंगलवार को नई दिल्ली में नौसेना भवन में आयोजित भारतीय नौसेना की दूसरी कमांडर्स कॉन्फ्रेंस 2026 को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री ने कह कि आज समुद्री क्षेत्र में भीड़भाड़, धोखाधड़ी और तथाकथित ग्रे-जोन गतिविधियों के चलते चुनौतियां पहले के मुकाबले बढ़ गई हैं। उन्होंने कहा कि बदलते सुरक्षा माहौल को देखते हुए निगरानी और प्रतिक्रिया तंत्र को नए स्तर पर ले जाने की जरूरत है।

यह तीन दिवसीय सम्मेलन 29 सितंबर से 1 अक्टूबर तक आयोजित किया जा रहा है, जिसमें नौसेना के शीर्ष अधिकारी ऑपरेशनल तैयारी, समुद्री सुरक्षा और भविष्य की क्षमताओं की समीक्षा कर रहे हैं।

राजनाथ सिंह ने कहा, “भारत हिंद महासागर क्षेत्र में फर्स्ट रिस्पॉन्डर और पसंदीदा सुरक्षा साझेदार के रूप में मजबूती से खड़ा है। पूरी दुनिया हमारी रणनीतिक स्थिति और क्षेत्रीय जिम्मेदारी में हो रही बढ़ोतरी को देख रही है।”

दक्षिण चीन सागर से अटलांटिक तक नौसेना की मौजूदगी

रक्षा मंत्री ने कहा कि भारतीय युद्धपोत अब दक्षिण चीन सागर, भूमध्यसागर और अटलांटिक महासागर तक नियमित रूप से तैनात हो रहे हैं। उनके अनुसार यह केवल समुद्र में मौजूदगी नहीं है, बल्कि भारत की दूर-दराज क्षेत्रों में ऑपरेशन करने की क्षमता को भी दर्शाती है।

उन्होंने कहा कि भारतीय नौसेना देश को रणनीतिक गहराई प्रदान करने के साथ-साथ क्षेत्रीय प्रभाव स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इसी वजह से नौसेना भारत की व्यापक सुरक्षा नीति का अहम हिस्सा बन चुकी है।

विकसित भारत 2047 के विजन में नौसेना की बड़ी भूमिका

राजनाथ सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में नौसेना के आधुनिकीकरण पर लगातार काम किया जा रहा है। उन्होंने नौसेना को “विकसित भारत 2047” के विजन का रणनीतिक आधार बताया।

उनके अनुसार नौसेना केवल समुद्री सीमाओं की रक्षा नहीं करती, बल्कि आर्थिक सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और शक्ति प्रदर्शन में भी महत्वपूर्ण योगदान देती है। उन्होंने नौसेना को भविष्य के लिए तैयार, युद्ध के लिए सक्षम और वैश्विक स्तर पर सम्मानित बल बनाने पर जोर दिया। (Naval Commanders Conference 2026)

ऑपरेशन ऊर्जा सुरक्षा का किया उल्लेख

रक्षा मंत्री ने पश्चिम एशिया में पैदा हुए संकट के दौरान भारतीय नौसेना की भूमिका की सराहना की। उन्होंने विशेष रूप से ऑपरेशन ऊर्जा सुरक्षा का उल्लेख किया।

उन्होंने कहा कि इस अभियान के तहत स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले भारतीय झंडे वाले व्यापारिक जहाजों, खासकर एलपीजी टैंकरों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना एक बड़ी उपलब्धि रही।

राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 से 90 प्रतिशत कच्चा तेल और करीब 50 प्रतिशत प्राकृतिक गैस समुद्री मार्गों के जरिए आयात करता है। इसलिए समुद्री मार्गों की सुरक्षा सीधे देश की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति और रक्षा तैयारियों से जुड़ी हुई है। (Naval Commanders Conference 2026)

स्वदेशी युद्धपोत निर्माण में बड़ी प्रगति

रक्षा मंत्री ने आत्मनिर्भरता की दिशा में नौसेना के प्रयासों की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि भारतीय नौसेना का युद्धपोत निर्माण तंत्र अब वैश्विक मानकों तक पहुंच चुका है।

उन्होंने बताया कि हाल के सालों में नौसेना में शामिल किए गए कई युद्धपोतों में 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है। इससे भारत का रक्षा औद्योगिक आधार मजबूत हुआ है।

राजनाथ सिंह ने कहा, “आने वाले समय में हमें केवल अपनी जरूरतें पूरी नहीं करनी हैं, बल्कि मित्र देशों को भारतीय युद्धपोतों का निर्यात भी करना है।”

समुद्री निगरानी तंत्र को और मजबूत करने की जरूरत

रक्षा मंत्री ने कहा कि समुद्री यातायात की मात्रा और मुश्किलें लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में केवल निगरानी पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि डेटा विश्लेषण और खतरे की पहचान की क्षमता भी बढ़ानी होगी।

उन्होंने भारत की मैरीटाइम सर्विलांस आर्किटेक्चर को और मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका कहना था कि आधुनिक समुद्री सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने के लिए एडवांस तकनीक और बेहतर विश्लेषण तंत्र जरूरी है। (Naval Commanders Conference 2026)

2026 नौसेना के लिए ऐतिहासिक वर्ष

राजनाथ सिंह ने वर्ष 2026 को भारतीय नौसेना के लिए ऐतिहासिक बताया। उन्होंने कहा कि इस वर्ष नौसेना में 18 युद्धपोतों के शामिल होने या कमीशन होने की योजना है।

यह भारतीय नौसेना के इतिहास में एक साल के भीतर होने वाली सबसे बड़ी क्षमता वृद्धि मानी जा रही है। रक्षा मंत्री ने कहा कि यह उपलब्धि देश के नौसैनिक जहाज निर्माण उद्योग की बढ़ती परिपक्वता को दर्शाती है।

महिलाओं की बढ़ती भागीदारी की सराहना

रक्षा मंत्री ने नौसेना में महिलाओं की बढ़ती भूमिका की भी प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि “ऑल रैंक्स, ऑल रोल्स” नीति के तहत महिलाओं को विभिन्न जिम्मेदारियां दी जा रही हैं।

उन्होंने अग्रिम मोर्चे के युद्धपोतों और विमानों पर महिला अधिकारियों की तैनाती का विशेष उल्लेख किया। साथ ही नाविका सागर परिक्रमा जैसी समुद्री यात्राओं में महिलाओं की भागीदारी को भी महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। (Naval Commanders Conference 2026)

अंतरराष्ट्रीय समुद्री सहयोग में बढ़ी भूमिका

राजनाथ सिंह ने भारतीय नौसेना द्वारा कम्बाइंड टास्क फोर्स-154 की कमान संभालने को क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग में महत्वपूर्ण योगदान बताया।

उन्होंने कोच्चि में आयोजित ऑपरेशन सदर्न रेडीनेस का भी जिक्र किया। इस अभ्यास में 27 देशों के 276 कर्मियों, 76 विशेषज्ञों और चार अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने हिस्सा लिया था।

इसके अलावा उन्होंने आईएनएस सुदर्शिनी की लोकायन-26 तैनाती की सराहना की। इस अभियान के जरिए अमेरिका, अटलांटिक और भूमध्यसागर क्षेत्र में भारत की समुद्री विरासत और कूटनीतिक पहुंच को प्रदर्शित किया गया। (Naval Commanders Conference 2026)

समुद्री सुरक्षा और विकसित भारत का संबंध

रक्षा मंत्री ने कहा कि भारतीय नौसेना लगातार उच्च स्तर की युद्ध तैयारी बनाए हुए है और बदलती चुनौतियों के बीच अपनी जिम्मेदारियों को सफलतापूर्वक निभा रही है।

उन्होंने कहा, “अगर समुद्र सुरक्षित रहेंगे तो भारत सुरक्षित रहेगा और यदि भारत सुरक्षित रहेगा तो विकसित भारत का संकल्प और मजबूत होगा।”

रक्षा मंत्री ने यह भी कहा कि भारत की समुद्री शक्ति केवल समुद्र में तिरंगा दिखाने के लिए नहीं है, बल्कि जहां भी भारतीय ध्वज दिखाई दे, वहां सुरक्षा, भरोसा और विश्वास का संदेश पहुंचना चाहिए। (Naval Commanders Conference 2026)

Watch Video! चीन की मदद से पाकिस्तान ने किया रॉकेट माइन सिस्टम का लाइव टेस्ट, भारतीय सेना की कोल्ड स्टार्ट रणनीति और IBG से घबराया

Pakistan Rocket Mine Dispensing System
Pakistan Tests Rocket Mine Dispensing System To Counter India’s Cold Start Strategy And IBGs. (AI Image)

Pakistan Rocket Mine Dispensing System: सितंबर के आखिरी सप्ताह में पाकिस्तान आर्मी ने एक ऐसे हथियार सिस्टम का लाइव फायर टेस्ट किया, जो वाकई चौंकाने वाला है। इस सिस्टम का नाम है रॉकेट माइन डिस्पेंसिंग सिस्टम (आरएमडीएस)। इस सिस्टम के जरिए पाकिस्तान की सेना रॉकेटों के जरिए दूर बैठे-बैठे बड़े इलाके में माइंस बिखेरने की तैयारी कर रही है। पाकिस्तान ने अरब सागर के किनारे बलूचिस्तान तट पर फायरिंग एक्सरसाइज के दौरान 25-26 सितंबर को इस सिस्टम का टेस्ट किया।

Pakistan Rocket Mine Dispensing System: मई 2026 में पहली बार दिखाया गया था सिस्टम

यह कोई पारंपरिक माइन बिछाने वाला सिस्टम नहीं है। इसकी खूबी यह है कि सैनिकों को सीमा के पास जाकर जमीन में माइंस लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। इसके बजाय रॉकेट कई किलोमीटर दूर से दागे जाते हैं और टारगेट एरिया के ऊपर पहुंचकर दर्जनों माइंस फैला देते हैं। पाकिस्तान ने इसे अपनी नई “डायनामिक एरिया डिनायल” क्षमता के तौर डेवलप कर रहा है।

पाकिस्तान आर्मी ने मई 2026 में इस सिस्टम को पहली बार सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया था। उस समय इसे अन्य स्वदेशी हथियार प्रणालियों के साथ दिखाया गया था। हालांकि सितंबर 2026 में पहली बार इसका लाइव फायर टेस्ट सामने आया।

यह सिस्टम पाकिस्तान की आर्मी रॉकेट फोर्स कमांड के तहत रॉकेट आर्टिलरी प्लेटफॉर्म के साथ काम करता है। इसमें 122 मिमी और 300 मिमी मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है।

122 मिमी रॉकेट घजब और आजर प्रकार के लॉन्चरों से दागे जाते हैं, जबकि 300 मिमी रॉकेट ए-100ई और फतह-1 फैमिली के लॉन्चरों से छोड़े जाते हैं। यह सिस्टम एक साथ छह राकेट फायर कर सकता है, जिनके वॉरहेड्स में प्लास्टिक माइंस भरी होती हैं, ताकि मैग्नेट से भी इन्हें खोजा नहीं जा सके।

पाकिस्तान का कहना है कि इस सिस्टम को पूरी तरह से पाकिस्तान के अंदर ‘डायरेक्टरेट जनरल ऑफ़ डिफेंस डिज़ाइन एंड डेवलपमेंट’ (DGRDE) की देखरेख में डिजाइन और डेवलप किया गया था। यह सिस्टम मिलिट्री व्हीकल (शाहीन 6×6) पर लगाया गया है, जिसे रेगिस्तान और पहाड़ी इलाकों जैसे मुश्किल माहौल में तेजी से चलने-फिरने के लिए खास तौर पर डिजाइन किया गया है।

रॉकेट से माइन डिस्पेंसिंग

आम तौर पर माइनफील्ड बनाने के लिए इंजीनियर यूनिट्स को जमीन पर जाकर माइंस बिछानी पड़ती हैं। यह प्रक्रिया समय लेने वाली होती है और दुश्मन की फायरिंग के बीच काफी जोखिम भरी भी हो सकती है।

रॉकेट माइन डिस्पेंसिंग सिस्टम में कार्गो रॉकेट टारगेट एरिया तक पहुंचने के बाद हवा में खुल जाते हैं और अपने अंदर मौजूद माइंस को बड़े इलाके में बिखेर देते हैं।

ये माइंस जमीन पर गिरने के बाद एक्टिव हो जाती हैं। इनमें लगे मैग्नेटिक सेंसर किसी टैंक, बख्तरबंद वाहन या भारी सैन्य प्लेटफॉर्म की धातु को पहचान सकते हैं। जैसे ही कोई व्हीकल इनके पास में आता है, माइन एक्टिव हो सकती है।

122 मिमी रॉकेट अपेक्षाकृत कम दूरी पर बड़े क्षेत्र को कवर करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। वहीं 300 मिमी रॉकेट ज्यादा दूरी तक अधिक संख्या में माइंस पहुंचाने में सक्षम होते हैं। इन माइंस की रेंज 15 से 20 किलोमीटर तक हो सकती है। (Pakistan Rocket Mine Dispensing System)

Pakistan Rocket Mine Dispensing System

चीन से आई है यह तकनीक

हालांकि पाकिस्तान इसे अपनी उपलब्धि के रूप में पेश कर रहा है, लेकिन असल में यह तकनीक चीन से मिली है।

122 मिमी घजब और आजर सिस्टम मूल रूप से सोवियत बीएम-21 ग्रैड रॉकेट सिस्टम के लोकल वर्जन हैं। पाकिस्तान ऑर्डनेंस फैक्ट्रीज इनके लिए यरमुक रॉकेट तैयार करती है।

दूसरी ओर 300 मिमी ए-100ई सिस्टम को चीन की डिफेंस कंपनियों ने बनाया था। चीन ने लगभग 2015 के आसपास पाकिस्तान को ये लॉन्चर दिए थे। 2019 में पाकिस्तान ने इसे “स्वदेशी” बताकर शामिल किया, लेकिन यह लाइसेंस के तहत स्थानीय उत्पादन या रॉकेट का स्थानीय संस्करण है।

वहीं, स्कैटरेबल माइन तकनीक भी चीनी टाइप-84 एंटी-टैंक माइन सिस्टम से जुड़ी हुई है। चीन लंबे समय से ऐसे रॉकेटों का इस्तेमाल कर रहा है जो हवा में जाकर माइंस बिखेर सकते हैं। चीन का टाइप-84 स्कैटरेबल एंटी-टैंक माइन ठीक इसी तरह 122 मिमी रॉकेट से दागा जाता है। हर रॉकेट में 6 से 8 माइंस होती हैं और मैग्नेटिक फ्यूज वाला वर्जन भी मौजूद है। यही सिस्टम पाकिस्तान ने अपने 122 मिमी और 300 मिमी लॉन्चरों पर लगाया है।

पाकिस्तान ने भी इस तकनीक को अपने मौजूदा रॉकेट लॉन्चरों के साथ जोड़कर इसका इस्तेमाल करना शुरू किया है। (Pakistan Rocket Mine Dispensing System)

क्या होता है “डायनामिक एरिया डिनायल”?

सैन्य भाषा में एरिया डिनायल का मतलब होता है किसी इलाके को दुश्मन के लिए असुरक्षित बना देना ताकि वह वहां आसानी से आगे न बढ़ सके।

पहले यह काम स्थायी माइनफील्ड, खाइयों और अन्य बाधाओं के जरिए किया जाता था। पाकिस्तान लंबे समय से सीमा क्षेत्रों में डिट्च-कम-बंड जैसी डिफेंसिव फॉरमेशंस पर निर्भर रहा है।

लेकिन डायनामिक एरिया डिनायल का मतलब है कि जरूरत पड़ने पर किसी भी समय और किसी भी स्थान पर नई बाधा खड़ी कर दी जाए।

रॉकेट माइन डिस्पेंसिंग सिस्टम इसी कॉन्सैप्ट पर आधारित है। अगर किसी इलाके में आर्मर्ड टुकड़ी आगे बढ़ रही हो तो उसके पीछे या आसपास अचानक माइनफील्ड बनाया जा सकता है।

इससे रफ्तार धीमी पड़ सकती है और उसकी सप्लाई लाइन प्रभावित हो सकती है। (Pakistan Rocket Mine Dispensing System)

कोल्ड स्टार्ट और आईबीजी के खिलाफ इस्तेमाल

पाकिस्तान सेना की सोच यह है कि इस सिस्टम के जरिए कैसे भारत की “कोल्ड स्टार्ट” स्ट्रेटेजी और इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप्स (आईबीजी) को काउंटर किया जाए।

कोल्ड स्टार्ट रणनीति में सीमित समय में तेजी से सैन्य कार्रवाई की जाती है। इसके तहत अग्रिम मोर्चे पर मौजूद सैन्य बल कम समय में जवाबी कार्रवाई कर सकते हैं।

वहीं, आईबीजी भी इसी सोच का हिस्सा माने जाते हैं। आईबीजी छोटी लेकिन अत्यधिक मोबाइल कॉम्बैट ग्रुप होते हैं, जिनमें टैंक, मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री, आर्टिलरी और इंजीनियरिंग रिसोर्सेज शामिल होते हैं।

पाकिस्तान का सोचना है कि अगर ऐसे कॉम्बैट ग्रुप तेजी से आगे बढ़ते हैं तो उनके पीछे के ब्रिजहेड, सप्लाई कॉरिडोर और रसद मार्गों पर माइंस बिखेरकर उनकी रफ्तार को धीमा किया जा सकता है। (Pakistan Rocket Mine Dispensing System)

बढ़ जाता है जोखिम

यदि किसी मिलिट्री ऑपरेशन के दौरान पीछे के इलाकों में अचानक माइनफील्ड बन जाएं तो केवल आगे चल रहे टैंक ही प्रभावित नहीं होते, बल्कि ईंधन, गोला-बारूद और अन्य रसद ले जाने वाले वाहन भी प्रभावित हो सकते हैं।

इस स्थिति में इंजीनियर यूनिट्स को कई स्थानों पर एक साथ माइन क्लियरेंस करनी पड़ सकती है। इससे रफ्तार में 24 से 48 घंटे की देरी हो सकती है। इतने समय में पाकिस्तान अपनी रिजर्व फोर्स लाकर जवाबी हमला कर सकता है।

बता दें कि भारतीय सेना पहले से ही माइन प्लॉ, माइन रोलर, लाइन चार्ज सिस्टम और विशेष इंजीनियरिंग व्हीकल्स का इस्तेमाल करती है। इसके अलावा ड्रोन बेस्ड माइन डिटेक्शन और आधुनिक सर्विलांस सिस्टम्स पर भी काम चल रहा है। (Pakistan Rocket Mine Dispensing System)

गलत दिशा में गिर सकती हैं माइंस

रॉकेट माइन डिस्पेंसिंग सिस्टम का सबसे बड़ा फायदा इसकी रफ्तार है। कुछ मिनटों में कई किलोमीटर लंबे इलाके में माइंस बिखेरी जा सकती हैं।

दूसरा फायदा यह है कि सैनिकों को दुश्मन के करीब जाने की जरूरत नहीं पड़ती। पूरा काम सुरक्षित दूरी से किया जा सकता है।

तीसरा फायदा यह है कि रियल टाइम खुफिया जानकारी के आधार पर किसी भी इलाके को तत्काल माइनफील्ड में बदला जा सकता है।

हालांकि इसकी कुछ सीमाएं भी हैं। स्कैटरेबल माइंस हमेशा एक समान तरीके से जमीन पर नहीं गिरतीं। कुछ माइंस गलत दिशा में गिर सकती हैं या पूरी तरह प्रभावी स्थिति में नहीं पहुंच पातीं। वहीं, अगर माइंस में भरोसेमंद सेल्फ-डिस्ट्रक्ट मैकेनिज्म नहीं है तो लंबे समय तक इलाके को प्रभावित कर सकती हैं।

मौसम, मिट्टी और घने पेड़-पौधे या नरम जमीन माइन की कार्यक्षमता कम कर सकते हैं। इसके अलावा रॉकेट दागने वाले लॉन्चर दुश्मन की काउंटर-बैटरी फायर का निशाना भी बन सकते हैं। (Pakistan Rocket Mine Dispensing System)

आर्मी रॉकेट फोर्स कमांड की ताकत बढ़ा रहा है पाकिस्तान

पाकिस्तान लगातार अपनी आर्मी रॉकेट फोर्स कमांड को मजबूत कर रहा है। इस कमांड का उद्देश्य लंबी दूरी की पारंपरिक फायरपावर को इंटीग्रेट करना है।

फतह सीरीज के गाइडेड रॉकेट, लंबी दूरी की मारक क्षमता और अब माइन डिस्पेंसिंग सिस्टम को एक साथ जोड़कर पाकिस्तान अपनी काउंटर-मोबिलिटी क्षमता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

पहले जहां माइंस मुख्य रूप से इंजीनियर यूनिट्स की जिम्मेदारी मानी जाती थीं, वहीं अब यह क्षमता सीधे आर्टिलरी और रॉकेट फोर्स के हाथ में भी आ गई है। (Pakistan Rocket Mine Dispensing System)

C-17 और C-130J से सीधे फ्रंटलाइन तक पहुंचेगा भारी सैन्य सामान, भारत बना रहा नया हेवी एयरड्रॉप सिस्टम

G-11 Heavy Drop Platform
Gliders India Launches Indigenous G-11 Heavy Drop Platform Project For Air Dropping Up To 19 Tons From C-130J And C-17 Aircraft. (AI Image)

G-11 Heavy Drop Platform: सीमावर्ती क्षेत्रों, ऊंचे पर्वतीय इलाकों और युद्धक्षेत्रों में भारी सैन्य सामग्री की रैपिड सप्लाई के लिए ग्लाइडर्स इंडिया लिमिटेड (जीआईएल) ने स्वदेशी जी-11 हेवी ड्रॉप प्लेटफॉर्म प्रोजेक्ट शुरू किया है। इस प्रोजेक्ट से भारतीय वायुसेना की स्ट्रेटेजिक एयरड्रॉप क्षमता को और मजबूती मिलेगी।

इस अत्याधुनिक प्लेटफॉर्म से सी-130जे सुपर हरक्यूलिस और सी-17 ग्लोबमास्टर-III जैसे ट्रांसपोर्ट विमानों से करीब 19 टन तक के भारी सैन्य उपकरण, वाहन, इंजीनियरिंग स्टोर, गोला-बारूद और लॉजिस्टिक सामग्री को पैराशूट के जरिए दुर्गम इलाकों में सुरक्षित उतारा जा सकेगा। कानपुर स्थित ऑर्डनेंस पैराशूट फैक्ट्री ने इस प्रोजेक्ट के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट जारी किया है।

G-11 Heavy Drop Platform: सैन्य एयरड्रॉप सिस्टम का प्रमुख हिस्सा

जी-11 प्लेटफॉर्म एक विशेष सैन्य एयरड्रॉप सिस्टम का मुख्य स्ट्रक्चरल हिस्सा है। इसे डीआरडीओ की आगरा स्थित एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट (ADRDE) की बनाई तकनीक के आधार पर तैयार किया जा रहा है।

जब किसी सैन्य अभियान, आपदा राहत मिशन या दुर्गम क्षेत्र में भारी सामान पहुंचाने की जरूरत होती है, तब इस प्लेटफॉर्म पर मिलिट्री इक्विपमेंट को सुरक्षित तरीके से बांधा जाता है। इसके बाद प्लेटफॉर्म को ट्रांसपोर्ट विमान में लोड किया जाता है और निर्धारित स्थान पर पैराशूट के जरिए नीचे उतारा जाता है।

इस प्रक्रिया में प्लेटफॉर्म को विमान से बाहर निकालने, हवा में स्थिर रखने और जमीन पर सुरक्षित लैंडिंग तक पूरे भार को संभालना पड़ता है। यही वजह है कि इसकी डिजाइन और स्ट्रक्चरल मजबूती बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।

19,050 किलोग्राम तक भार ले जाने की क्षमता

जीआईएल का कहना है कि जी-11 सिस्टम का ऑल-अप मास (एयूएम) अधिकतम 19,050 किलोग्राम तक होगा। इसका मतलब है कि लगभग 19 टन तक का सैन्य सामान एक बार में एयरड्रॉप किया जा सकेगा।

इस सिस्टम को भारतीय वायुसेना के दो प्रमुख सामरिक परिवहन विमानों सी-130जे सुपर हरक्यूलिस और सी-17 ग्लोबमास्टर-III के साथ जोड़ा जाएगा।

प्लेटफॉर्म छह अलग-अलग लंबाई में उपलब्ध रहेगा। इनमें 12 फुट, 16 फुट, 20 फुट, 24 फुट, 28 फुट और 32 फुट के विकल्प शामिल हैं। अलग-अलग आकार के सैन्य उपकरण और वाहनों के अनुसार उपयुक्त प्लेटफॉर्म चुना जा सकेगा। (G-11 Heavy Drop Platform)

पैराशूट सिस्टम की भी खास भूमिका

हेवी ड्रॉप मिशन में केवल प्लेटफॉर्म ही नहीं, बल्कि पैराशूट सिस्टम भी बेहद महत्वपूर्ण होता है। जी-11 सिस्टम में 100 फुट व्यास वाले मुख्य पैराशूट का इस्तेमाल किया जाएगा। जरूरत के अनुसार एक से लेकर आठ कैनोपी तक का क्लस्टर इस्तेमाल किया जा सकता है।

विमान से प्लेटफॉर्म को बाहर निकालने के लिए एक्सट्रैक्टर पैराशूट लगाए जाएंगे। इनके आकार 15 फुट, 22 फुट और 28 फुट व्यास के होंगे।

एयरड्रॉप के दौरान विमान की गति 140 से 145 नॉट इंडिकेटेड एयर स्पीड (आईएएस) रखी जाएगी। इस स्पीड पर प्लेटफॉर्म को नियंत्रित तरीके से बाहर निकालकर सुरक्षित लैंडिंग सुनिश्चित की जाती है। (G-11 Heavy Drop Platform)

कैसे काम करता है हेवी ड्रॉप सिस्टम?

लो-वेलोसिटी एयरड्रॉप तकनीक में सबसे पहले एक्सट्रैक्टर पैराशूट खुलता है। यह पैराशूट विमान के कार्गो कम्पार्टमेंट से पूरे प्लेटफॉर्म को बाहर खींचता है।

जैसे ही प्लेटफॉर्म विमान से अलग होता है, मुख्य पैराशूट खुल जाते हैं। इसके बाद हैवी लोड नियंत्रित गति से जमीन की ओर उतरता है।

इस पूरी प्रक्रिया में प्लेटफॉर्म को कई प्रकार के लोड और झटकों का सामना करना पड़ता है। इसलिए उसकी डिजाइन में स्ट्रक्चरल स्ट्रेंथ, बैलेंसिंग, शॉक एब्जॉर्प्शन और लोड डिस्ट्रिब्यूशन का विशेष ध्यान रखा जाता है। (G-11 Heavy Drop Platform)

भारतीय वायुसेना के लिए क्यों अहम है यह प्रोजेक्ट?

भारतीय वायुसेना के सी-130जे और सी-17 विमान देश की स्ट्रेटेजिक एयरलिफ्ट क्षमता की रीढ़ माने जाते हैं।

सी-130जे का इस्तेमाल छोटे रनवे, पहाड़ी इलाकों और अग्रिम मोर्चों तक सैन्य सामग्री पहुंचाने के लिए किया जाता है। वहीं सी-17 लंबी दूरी तक भारी सैन्य उपकरण और वाहन ले जाने में सक्षम है।

ऐसे क्षेत्रों में जहां सड़क संपर्क नहीं होता या आपात स्थिति में रैपिड सप्लाई की जरूरत होती है, वहां एयरड्रॉप सिस्टम बेहद उपयोगी साबित होता है। इसी वजह से स्वदेशी हेवी ड्रॉप प्लेटफॉर्म का विकास रक्षा क्षेत्र में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। (G-11 Heavy Drop Platform)

डीआरडीओ पहले भी कर चुका है सफल परीक्षण

डीआरडीओ की एडीआरडीई प्रयोगशाला पहले ही हेवी ड्रॉप सिस्टम के कई परीक्षण कर चुकी है। दिसंबर 2023 में सी-17 ग्लोबमास्टर विमान से लगभग 16 टन वजन वाले 24 फुट लंबे प्लेटफॉर्म का सफल एयरड्रॉप परीक्षण किया गया था।

इन परीक्षणों में सिस्टम की स्ट्रक्चरल मजबूती, पैराशूट प्रदर्शन और सुरक्षित लैंडिंग क्षमता का मूल्यांकन किया गया था। क्वालिफिकेशन प्रक्रिया में सिमिलैक द्वारा निर्धारित मानकों की भी जांच की गई थी।

कानपुर स्थित ऑर्डनेंस पैराशूट फैक्ट्री के पास देश में पैराशूट निर्माण का लंबा अनुभव है। साल 1941 से यह फैक्ट्री विभिन्न प्रकार के सैन्य पैराशूट तैयार करती रही है।

2021 में ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड के कॉरपोरेट पुनर्गठन के बाद यह ग्लाइडर्स इंडिया लिमिटेड का हिस्सा बनी। कंपनी वर्तमान में पायलट पैराशूट, ब्रेक पैराशूट, सप्लाई ड्रॉप सिस्टम, कॉम्बैट पैराशूट और हेवी ड्रॉप पैराशूट का निर्माण करती है।

हाल के सालों में कंपनी ने डीआरडीओ के साथ मिलकर पी-7 हेवी ड्रॉप सिस्टम, एडीसी-150 एयरड्रॉपेबल कंटेनर और मिलिट्री कॉम्बैट पैराशूट सिस्टम जैसी प्रोजेक्ट्स पर भी काम किया है। (G-11 Heavy Drop Platform)

चीन का नया सस्ता एंटी-ड्रोन सिस्टम; 40 किमी दूर से ट्रैक करेगा रडार, 70 मिमी रॉकेट से करेगा हमला

China Anti-Drone System
China Unveils 70mm Rocket-Based Anti-Drone System With 40km Radar Detection Range. (AI Image)

China Anti-Drone System: आधुनिक युद्ध में ड्रोन सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व के संघर्ष और हाल के कई सैन्य अभियानों ने दिखाया है कि छोटे और सस्ते ड्रोन भी बड़े सैन्य ठिकानों, एयर डिफेंस सिस्टम और महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसी चुनौती से निपटने के लिए चीन की कंपनी कांगशुओ इलेक्ट्रिक ग्रुप ने एक नया 70 मिमी मिसाइल आधारित एंटी-ड्रोन सिस्टम पेश किया है।

यह सिस्टम सितंबर 2026 में बीजिंग में आयोजित चाइना इंटरनेशनल डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स एग्जीबिशन (सीआईडीईएक्स-2026) में प्रदर्शित किया गया। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह महंगी एयर डिफेंस मिसाइलों की जगह कम लागत वाले 70 मिमी (2.75 इंच) रॉकेट का इस्तेमाल करके ड्रोन और ड्रोन स्वार्म को निशाना बनाने के लिए डिजाइन किया गया है।

China Anti-Drone System: डोंगफेंग मेंगशी 6×6 चेसिस पर आधारित है पूरा सिस्टम

कांगशुओ इलेक्ट्रिक ग्रुप का यह सिस्टम पूरी तरह मोबाइल है। इसे चीन के डोंगफेंग मेंगशी 6×6 हाई-मोबिलिटी ऑफ-रोड चेसिस पर तैयार किया गया है।

सिस्टम में चार अलग-अलग व्हीकल शामिल हैं। इनमें कमांड व्हीकल, लॉन्च व्हीकल, एम्युनिशन सप्लाई व्हीकल और सपोर्ट व्हीकल शामिल हैं।

कमांड व्हीकल पूरे सिस्टम का कंट्रोल सेंटर है। लॉन्च व्हीकल रॉकेट दागने का काम करता है। सप्लाई व्हीकल अतिरिक्त मिसाइल और रॉकेट लेकर चलता है, जबकि सपोर्ट व्हीकल तकनीकी मदद और मेंटेनेंस के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

कंपनी के मुताबिक यह सिस्टम काफी हद तक ऑटोमेटेड है और जरूरत पड़ने पर सीमित मानवीय हस्तक्षेप के साथ काम कर सकता है। (China Anti-Drone System)

40 किलोमीटर दूर से खोज सकता है टारगेट

इस सिस्टम की सबसे महत्वपूर्ण खूबियों में इसका रडार नेटवर्क शामिल है। कमांड व्हीकल पर लगाया गया सर्च रडार लगभग 40 किलोमीटर तक टारगेट का पता लगाने का दावा करता है। इसका इस्तेमाल शुरुआती चेतावनी और टारगेट की पहचान के लिए किया जाता है।

इसके अलावा लॉन्च व्हीकल पर भी एक अलग फेज्ड एरे रडार लगाया गया है, जिसकी डिटेक्शन रेंज लगभग 20 किलोमीटर बताई गई है। यह रडार टारगेट को ट्रैक करता है और आखिरी चरण में रॉकेट को टारगेट की ओर गाइड करने में मदद करता है।

दो अलग-अलग रडार का इस्तेमाल सिस्टम को एक क्लोज्ड लूप एयर डिफेंस प्लेटफॉर्म बनाता है। जिससे टारगेट की पहचान से लेकर हमला करने तक की पूरी प्रक्रिया एक ही नेटवर्क के भीतर पूरी की जा सकती है।

लॉन्चर में 30 रॉकेट तक ले जाने की क्षमता

एंटी-ड्रोन सिस्टम का लॉन्च व्हीकल एक बार में लगभग 24 से 30 रॉकेट ले जा सकता है। कंपनी का दावा है कि सिस्टम एक साथ कई टारगेटों के खिलाफ काम कर सकता है।

वहीं, इसकी अधिकतम कॉम्बैट रेंज लगभग 6 किलोमीटर है। वहीं अधिकतम कॉम्बैट ऊंचाई 4.5 किलोमीटर है।

यह ऊंचाई और दूरी छोटे तथा मध्यम आकार के अधिकांश मिलिट्री ड्रोन, सर्विलांस यूएवी और लॉइटरिंग म्यूनिशन को निशाना बनाने के लिए काफी मानी जाती है। (China Anti-Drone System)

China Anti-Drone System
China Kangshuo Electric Group recently revealed a concept of an on-board anti-drone system, with 70mm missiles as the main means of interception.

दो तरह के 70 मिमी रॉकेट

इस सिस्टम में इस्तेमाल होने वाले 70 मिमी रॉकेट दो अलग-अलग कॉन्फिगरेशन में उपलब्ध हैं। पहला वर्जन लेजर गाइडेड रॉकेट है। इसका इस्तेमाल उन टारगेट्स के खिलाफ किया जा सकता है जो घातक हों या तेज रफ्तार से उड़ रहे हों। लेजर गाइडेंस टारगेट पर अधिक सटीक हमला करने में मदद करती है।

दूसरा वर्जन प्रोग्रामेबल टाइमिंग फ्यूज वाला रॉकेट है। इसे एक निश्चित दूरी या समय पर हवा में फटने के लिए सेट किया जा सकता है।

इस तकनीक का इस्तेमाल विशेष रूप से ड्रोन स्वार्म के खिलाफ किया जाता है। जब रॉकेट टारगेट के पास पहुंचता है तो वह हवा में विस्फोट करता है और बड़ी संख्या में मेटल के टुकड़े फैलाता है। (China Anti-Drone System)

1,920 धातु के टुकड़ों से है बना

हर 70 मिमी रॉकेट में लगभग 1,920 प्री-फॉर्म्ड फ्रैगमेंट यानी पहले से तैयार मेटल के टुकड़े लगाए गए हैं।

रॉकेट के विस्फोट के बाद ये टुकड़े तेज गति से चारों ओर फैलते हैं। कंपनी का दावा है कि इनकी प्रभावी किल रेडियस 15 मीटर तक है।

इसका मतलब है कि ड्रोन को सीधे हिट करना जरूरी नहीं है। यदि रॉकेट टारगेट के पास फटता है तो उसके टुकड़े ड्रोन के मोटर, सेंसर, पंख या कंट्रोल सिस्टम को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

एंटी-ड्रोन ऑपरेशंस में यह तरीका काफी प्रभावी माना जाता है क्योंकि छोटे ड्रोन का साइज बहुत कम होता है और उन्हें सीधे मारना हमेशा आसान नहीं होता। (China Anti-Drone System)

महंगी मिसाइलों का सस्ता विकल्प

हाल के सालों में दुनिया भर की सेनाओं को एक बड़ी समस्या का सामना करना पड़ा है। कई बार कुछ हजार डॉलर की कीमत वाला ड्रोन गिराने के लिए लाखों डॉलर की एयर डिफेंस मिसाइल दागनी पड़ती है।

यही वजह है कि अमेरिका, यूरोप, चीन और अन्य देश कम लागत वाले इंटरसेप्टर हथियारों पर काम कर रहे हैं।

वहीं, 70 मिमी (2.75 इंच) कैलिबर का रॉकेट कोई नई तकनीक नहीं है। यह पुराने हाइड्रा और एफएफएआर (फोल्डिंग-फिन एरियल रॉकेट) परिवार का हिस्सा है।

अमेरिका ने इसी रॉकेट में एपीकेडब्ल्यूएस हाइड्रा 70 मिमी (एडवांस्ड प्रिसिजन किल वेपन सिस्टम) किट जोड़कर इसे सटीक निशाना लगाने वाला लेजर गाइडेड रॉकेट बना दिया। इसकी एक रॉकेट की कीमत लगभग 15,000 से 20,000 डॉलर होती है, जो पैट्रियट जैसी महंगी एयर डिफेंस मिसाइलों की तुलना में काफी कम है। इस सिस्टम का इस्तेमाल लाल सागर क्षेत्र में हूती ड्रोन को मार गिराने में भी किया गया है।

साल 2026 में फ्रांस की कंपनी थेल्स ने एलजीआर-275 प्रॉक्सी नाम का नया वर्जन पेश किया है, जिसमें लेजर गाइडेंस के साथ प्रॉक्सिमिटी सेंसर भी लगाया गया है। इससे रॉकेट टारगेट के बिल्कुल पास पहुंचते ही फट सकता है। वहीं, ताइवान भी 70 मिमी रॉकेट पॉड और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल डायरेक्टर आधारित अपने सिस्टम पर काम कर रहा है।

चीन का नया सिस्टम भी इसी कॉन्सैप्ट पर है, लेकिन उसने इसे सिर्फ रॉकेट तक सीमित नहीं रखा। चीन ने पूरे सिस्टम को ग्राउंड-बेस्ड एयर डिफेंस बैटरी के तौर पर डेवलप किया है, जिसे मेंगशी सैन्य वाहन पर लगाया गया है। (China Anti-Drone System)

मोबाइल एयर डिफेंस पर चीन का जोर

चीन पहले से कई मोबाइल एयर डिफेंस सिस्टम ऑपरेट करता है। इनमें एफबी-10ए एयर डिफेंस मिसाइल, एसडब्ल्यूएस-3 गन और मिसाइल सिस्टम, ओडब्ल्यू-5/गुआंगजियान लेजर हथियार और यहां तक कि लीजियान पोर्टेबल लेजर सिस्टम भी शामिल हैं।

नया 70 मिमी एंटी-ड्रोन सिस्टम विशेष रूप से फील्ड फोर्सेज, सैन्य काफिलों और महत्वपूर्ण ठिकानों की सुरक्षा के लिए तैयार किया गया है। डोंगफेंग मेंगशी 6×6 चेसिस कठिन इलाकों में भी तेजी से तैनाती की जा सकती है।

वहीं, 70 मिमी रॉकेट सिस्टम को सबसे निचली और सबसे सस्ती डिफेंस लेयर माना जा रहा है। इसका उद्देश्य छोटे और कम कीमत वाले ड्रोन को महंगी मिसाइलों से नहीं, बल्कि कम लागत वाले रॉकेट से नष्ट करना है। चीन की यह रणनीति “चिड़िया को तोप से नहीं, रॉकेट से मारने” जैसी है, ताकि दुश्मन के सस्ते ड्रोन को गिराने में अत्यधिक महंगे हथियारों का इस्तेमाल न करना पड़े। (China Anti-Drone System)