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झांसी पहुंचकर आर्मी कमांडर ने देखी ‘शौर्य स्क्वाड्रन’, व्हाइट टाइगर डिवीजन में शोकेस किए गए न्यू जनरेशन वेपंस

Shaurya Squadron Indian Army
Source: Indian Army

Shaurya Squadron Indian Army: भारतीय सेना तेजी से खुद को भविष्य के युद्धों के लिए तैयार कर रही है। सेना अब नए हथियार खरीदने के साथ अपने पूरे मिलिट्री स्ट्रक्चर में भी बदलाव कर रही है। इसी बदलाव के तहत इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप (आईबीजी), इन्फैंट्री के लिए अश्नि प्लाटून, आर्टिलरी के लिए शक्तिबाण रेजिमेंट और दिव्यास्त्र बैटरी जैसी नई फॉर्मेशंस बनाई जा रही हैं। इसके साथ ही आर्मर्ड कोर यानी टैंक रेजिमेंट के लिए ‘शौर्य स्क्वाड्रन’ भी तैयार की जा रही है। जिसके खबर सबसे पहले रक्षा समाचार ने प्रकाशित की थी।

हालांकि भारतीय सेना ने अभी तक शौर्य स्क्वाड्रन की आधिकारिक घोषणा नहीं की है, लेकिन हाल के सैन्य कार्यक्रमों और वरिष्ठ अधिकारियों के दौरों से साफ संकेत मिले हैं कि सेना इस नई फॉर्मेशन पर तेजी से काम कर रही है। इसका उद्देश्य टैंक यूनिट्स को ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और काउंटर-ड्रोन तकनीक से लैस करना है।

Shaurya Squadron Indian Army: सेना बदल रही है युद्ध की पूरी सोच

पिछले कुछ साल में दुनिया के कई युद्धों ने यह साबित किया है कि आधुनिक युद्ध अब केवल टैंक, तोप और सैनिकों के दम पर नहीं लड़े जाते। रूस-यूक्रेन युद्ध में छोटे ड्रोन ने कई बार भारी-भरकम टैंकों को भी नष्ट कर दिया। इसी तरह पश्चिम एशिया के युद्धों में भी ड्रोन और यूएवी ने युद्ध की दिशा बदलने में बड़ी भूमिका निभाई।

भारतीय सेना ने इन अनुभवों का अध्ययन किया है। अब सेना का फोकस ऐसी लड़ाकू क्षमता तैयार करना है, जिसमें टैंक, ड्रोन, आर्टिलरी, हेलीकॉप्टर, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक साथ काम करें।

इसी वजह से सेना पारंपरिक ह्यूमन बेस्ड मिलिट्री स्ट्रक्चर से निकलकर नेटवर्क बेस्ड वेपन सिस्टम की ओर बढ़ रही है, जहां हर यूनिट एक-दूसरे से डिजिटल तरीके से जुड़ी होगी।

भारतीय सेना ने साल 2023 से 2032 की अवधि को ‘डेकेड ऑफ ट्रांसफॉर्मेशन’ नाम दिया है। इस दौरान सेना का लक्ष्य अपने संगठन, प्रशिक्षण, तकनीक और युद्ध क्षमता में व्यापक बदलाव करना है। (Shaurya Squadron Indian Army)

अमोघ ज्वाला अभ्यास में पहली बार दिखी शौर्य स्क्वाड्रन

शौर्य स्क्वाड्रन का कॉन्सैप्ट पहली बार मार्च 2026 में आयोजित एक्सरसाइज अमोघ ज्वाला के दौरान सामने आया था। यह अभ्यास झांसी स्थित बबीना फील्ड फायरिंग रेंज में आयोजित किया गया था।

उस समय वर्तमान सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ सदर्न कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ थे। उन्होंने इस अभ्यास के दौरान आधुनिक मैकेनाइज्ड युद्ध का प्रदर्शन देखा था। इसी अभ्यास में पहली बार शौर्य स्क्वाड्रन की मौजूदगी सामने आई थी।

अभ्यास में टैंक, आर्टिलरी, अटैक हेलीकॉप्टर, लड़ाकू विमान, ड्रोन और एयर डिफेंस सिस्टम को एक साथ इस्तेमाल किया गया। इसका उद्देश्य यह दिखाना था कि भविष्य के युद्धों में सभी हथियार प्रणालियां एक नेटवर्क के रूप में काम करेंगी।

फिर क्यों चर्चा में आई शौर्य स्क्वाड्रन

हाल ही में सदर्न कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल राजेश पुष्कर ने झांसी स्थित 31 आर्मर्ड डिवीजन का दौरा किया। जिसे व्हाइट टाइगर डिवीजन के नाम से भी जाना जाता है।

इस दौरान उन्हें नई सैन्य तकनीकों, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बेस्ड सिस्टम, मानवरहित प्लेटफॉर्म और इनसे निपटने वाली काउंटर-ड्रोन तकनीकों का प्रदर्शन दिखाया गया। साथ ही उन्होंने सेना की युद्ध की तैयारियों और लड़ाकू क्षमता बढ़ाने के लिए चल रहे प्रयासों की समीक्षा की।

लेफ्टिनेंट जनरल राजेश पुष्कर ने शौर्य स्क्वाड्रन के सैनिकों से भी बातचीत की। उन्होंने आधुनिक सैन्य उपकरणों की प्रदर्शनी देखी, जिसमें डिवीजन की नई युद्ध क्षमता और तकनीकी तैयारियों का प्रदर्शन किया गया।

उन्होंने जवानों से कहा कि वे बदलती चुनौतियों के अनुसार खुद को लगातार तैयार रखें, नई तकनीक सीखते रहें और हर समय मिशन के लिए तैयार रहें। उन्होंने कहा कि यह भारतीय सेना के ‘डेकेड ऑफ ट्रांसफॉर्मेशन’ अभियान के अनुरूप सेना को और अधिक आधुनिक तथा सक्षम बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

सेना इस नई यूनिट को प्रैक्टिकली डेवलप कर रही है, हालांकि इसका पूरा स्ट्रक्चर और आर्गेनाइजेशनल डिटेल्स अभी पब्लिक नहीं किए गए हैं।

क्या होगी शौर्य स्क्वाड्रन की भूमिका

शौर्य स्क्वाड्रन को आर्मर्ड रेजिमेंट की ड्रोन और काउंटर-ड्रोन यूनिट माना जा रहा है। आसान शब्दों में समझें तो यह यूनिट टैंकों के लिए “आंख” और “सुरक्षा कवच” दोनों का काम करेगी।

युद्ध के दौरान सबसे पहले ड्रोन आगे जाकर दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखेंगे। वे दुश्मन के टैंक, सैनिक, हथियार और छिपे हुए ठिकानों की जानकारी रियल टाइम में टैंक कमांडरों तक पहुंचाएंगे।

यदि दुश्मन की ओर से ड्रोन हमला होता है तो यही यूनिट उन्हें पहचानने और रोकने का भी काम करेगी। (Shaurya Squadron Indian Army)

टैंकों के साथ मिलकर काम करेंगे ड्रोन

अब तक टैंक यूनिट्स मुख्य रूप से अपने सेंसर और जमीन पर मौजूद सैनिकों की जानकारी के आधार पर आगे बढ़ती थीं।

नई व्यवस्था में ड्रोन पहले आसमान से पूरे इलाके की निगरानी करेंगे। वे कई किलोमीटर आगे तक दुश्मन की गतिविधियों का पता लगाएंगे।

इससे टैंक कमांडर को पहले से पता होगा कि आगे कौन सा खतरा मौजूद है। यदि कहीं घात लगाकर हमला करने की तैयारी हो रही होगी तो ड्रोन उसकी जानकारी पहले ही दे देंगे।

इस तरह टैंक और ड्रोन मिलकर एक जॉइंट कॉम्बैट सिस्टम के तौर पर काम करेंगे। (Shaurya Squadron Indian Army)

ड्रोन के साथ काउंटर-ड्रोन क्षमता भी

सेना केवल अपने ड्रोन बढ़ाने पर ही काम नहीं कर रही, बल्कि दुश्मन के ड्रोन से बचाव की तैयारी भी कर रही है।

रूस-यूक्रेन युद्ध में देखा गया कि छोटे एफपीवी ड्रोन ने बड़ी संख्या में टैंकों को नुकसान पहुंचाया। इसके बाद दुनिया की कई सेनाओं ने अपने टैंकों पर अतिरिक्त सुरक्षा लगानी शुरू की।

भारतीय सेना भी टैंकों पर कोप केज जैसी सुरक्षा व्यवस्था और काउंटर-ड्रोन सिस्टम का परीक्षण कर रही है, ताकि दुश्मन के ड्रोन हमलों का प्रभाव कम किया जा सके।

सेना का पूरा स्ट्रक्चर बदल रहा है

शौर्य स्क्वाड्रन अकेला बदलाव नहीं है। भारतीय सेना पिछले कुछ साल से अपनी पूरी कॉम्बैट फॉर्मेशंस को बदल रही है। इसी बदलाव के तहत इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप (आईबीजी) बनाए जा रहे हैं। इनका उद्देश्य ऐसी छोटी लेकिन बेहद तेज कॉम्बैट फॉर्मेशन तैयार करना है, जो कम समय में किसी भी मोर्चे पर कार्रवाई कर सके।

पूर्वी क्षेत्र में चीन सीमा के पास सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में सेना ने हाल ही में पांच आईबीजी तैयार किए हैं। ये माउंटेन स्ट्राइक कॉर्प्स के अंतर्गत बनाए गए हैं और 3 कॉर्प्स, 4 कॉर्प्स तथा 33 कॉर्प्स से जुड़े हुए हैं। (Shaurya Squadron Indian Army)

पूर्वोत्तर में सेना प्रमुख ने की समीक्षा

वहीं इससे पहले आईबीजी बनने के लगभग दो सप्ताह बाद सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ ने पूर्वोत्तर क्षेत्र का दौरा किया था। उन्होंने विभिन्न सैन्य ठिकानों पर जाकर सुरक्षा स्थिति, युद्ध तैयारी, नई तकनीकों के उपयोग और ऑपरेशनल क्षमता की समीक्षा की।

सेना प्रमुख ने कमांडरों और जवानों के साथ बातचीत की और अपने ‘विजय’ विजन के अनुरूप भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार रहने पर जोर दिया। उन्होंने तकनीक को तेजी से अपनाने और ऑपरेशनल फुर्ती बनाए रखने के निर्देश दिए।

इन्फैंट्री और आर्टिलरी में पहले ही हो चुके हैं बदलाव

भारतीय सेना पहले ही कई नई फॉर्मेशंस तैयार कर चुकी है। इन्फैंट्री बटालियनों में अश्नि प्लाटून बनाई जा रही हैं। इनमें विशेष रूप से प्रशिक्षित सैनिक ड्रोन, सर्विलंस सिस्टम, एफपीवी स्ट्राइक ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन को ऑपरेट करेंगे।

आर्टिलरी में शक्तिबाण रेजिमेंट तैयार की जा रही हैं, जिनमें लंबी दूरी के ड्रोन, ड्रोन स्वार्म और काउंटर-ड्रोन सिस्टम शामिल होंगे। इसके अलावा दिव्यास्त्र बैटरी आर्टिलरी को रियल टाइम लक्ष्य पहचान और सटीक हमला करने की क्षमता देगी।

इन सभी संरचनाओं का उद्देश्य अलग-अलग हथियार प्रणालियों को एक ही नेटवर्क में जोड़ना है। (Shaurya Squadron Indian Army)

ड्रोन और एआई बन रहे हैं नई ताकत

भारतीय सेना अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सैन्य प्रणालियों पर भी तेजी से काम कर रही है। इन तकनीकों की मदद से ड्रोन से मिलने वाली जानकारी का तुरंत विश्लेषण किया जा सकेगा। इससे कमांडरों को निर्णय लेने में कम समय लगेगा और कार्रवाई तेजी से हो सकेगी।

मानवरहित प्लेटफॉर्म, सेंसर, डिजिटल कमांड नेटवर्क और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को एक साथ जोड़कर सेना ऐसी युद्ध प्रणाली तैयार कर रही है, जिसमें अलग-अलग यूनिट्स एक साथ काम कर सकें। (Shaurya Squadron Indian Army)

ऑपरेशन सिंदूर पर राजनाथ सिंह का बड़ा संदेश, ‘जहां आतंकवाद पनपेगा, वहीं मिलेगा जवाब’

Operation Sindoor Rajnath Singh
Photo: Republic TV

Operation Sindoor Rajnath Singh: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि ऑपरेशन सिंदूर ने दुनिया के सामने भारत की आधुनिक सैन्य तैयारी और रक्षा क्षमता का मजबूत प्रदर्शन किया है। उन्होंने कहा कि पिछले 12 साल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में रक्षा क्षेत्र में हुए बदलावों ने भारतीय सेनाओं को नई ताकत दी है। यही वजह है कि ऑपरेशन सिंदूर जैसे मुश्किल सैन्य अभियान को सफलतापूर्वक अंजाम दिया जा सका।

नई दिल्ली में शनिवार को रिपब्लिक टीवी के आयोजित कार्यक्रम फोर्सेज फर्स्ट कॉन्क्लेव में रक्षा मंत्री ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर केवल एक सैन्य अभियान नहीं था, बल्कि यह भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना के साहस, आधुनिक तकनीक और स्वदेशी रक्षा उपकरणों की क्षमता का प्रमाण भी है।

Operation Sindoor Rajnath Singh: आतंकवाद पर सरकार की नीति साफ

राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत की आतंकवाद के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति केवल बयान नहीं है, बल्कि यह सरकार की कार्यशैली का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि भारतीय सुरक्षा बलों ने आतंकवादियों और उनके मददगारों को प्रभावी जवाब दिया है।

उन्होंने कहा कि भारत केवल अपनी सीमा की रक्षा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि जरूरत पड़ने पर वहां भी कार्रवाई करने की क्षमता रखता है, जहां से आतंकवाद संचालित होता है।

ऑपरेशन सिंदूर में दिखी स्वदेशी हथियारों की ताकत

रक्षा मंत्री ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान कई आधुनिक स्वदेशी वेपन सिस्टम्स का प्रभावी इस्तेमाल किया गया। उन्होंने विशेष रूप से आकाश तीर, आकाश मिसाइल सिस्टम और ब्रह्मोस मिसाइल का उल्लेख किया।

उन्होंने कहा कि इन वेपन सिस्टम्स ने यह साबित किया कि भारत अब आधुनिक तकनीक वाले रक्षा उपकरण स्वयं विकसित और तैयार करने की दिशा में काफी आगे बढ़ चुका है। उन्होंने इसे भारतीय उद्योगों पर सरकार के बढ़ते भरोसे का भी उदाहरण बताया।

आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ा रक्षा क्षेत्र

राजनाथ सिंह ने कहा कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए सरकार लगातार काम कर रही है। उन्होंने बताया कि अब तक रक्षा सेवाओं के लिए 509 रक्षा उपकरणों और प्रणालियों की पांच पॉजिटिव इंडिजेनाइजेशन लिस्ट जारी की जा चुकी हैं।

इसके अलावा रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों के लिए 5,012 वस्तुओं वाली पांच अलग-अलग सूचियां भी जारी की गई हैं। उन्होंने कहा कि जल्द ही एक और नई पॉजिटिव इंडिजेनाइजेशन लिस्ट जारी की जाएगी, जिससे देश में रक्षा उत्पादन को और गति मिलेगी।

रक्षा उत्पादन पहुंचा रिकॉर्ड स्तर पर

रक्षा मंत्री ने बताया कि वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का सालाना रक्षा उत्पादन लगभग 1.78 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 के आसपास यह आंकड़ा करीब 40 हजार करोड़ रुपये था।

उन्होंने यह भी बताया कि रक्षा निर्यात में भी तेज बढ़ोतरी हुई है। वित्त वर्ष 2013-14 में जहां रक्षा निर्यात केवल 686 करोड़ रुपये था, वहीं अब यह बढ़कर 38 हजार करोड़ रुपये से अधिक हो गया है।

आयात पर निर्भरता कम करने पर जोर

राजनाथ सिंह ने कहा कि पहले रक्षा जरूरतों के लिए विदेशी हथियारों और उपकरणों पर अधिक भरोसा किया जाता था। लेकिन पिछले कुछ साल में इस सोच में बदलाव लाया गया है।

उन्होंने कहा कि सरकार ने देश के भीतर ऐसा रक्षा औद्योगिक तंत्र विकसित किया है, जो भारतीय सेनाओं की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार की मांग भी पूरी कर सकता है।

उनके अनुसार, किसी भी देश की रणनीतिक स्वतंत्रता तभी मजबूत होती है जब वह अपने हथियार, गोला-बारूद, मिसाइल, रडार, ड्रोन और अन्य सैन्य उपकरण स्वयं बना सके।

रक्षा निर्यात आसान बनाने के लिए किए गए सुधार

रक्षा मंत्री ने बताया कि सरकार ने रक्षा निर्यात को आसान बनाने के लिए कई बड़े सुधार किए हैं। उन्होंने कहा कि डिफेंस एक्सिम पोर्टल, ऑनलाइन मंजूरी, ओपन जनरल एक्सपोर्ट लाइसेंस, क्वॉलिटी सर्टिफिकेशन प्रोसेस को सरल बनाना, ग्रीन चैनल नीति और सेल्फ सर्टिफिकेशन जैसी व्यवस्थाएं लागू की गई हैं। इन कदमों से भारतीय कंपनियों के लिए रक्षा उपकरणों का निर्यात पहले की तुलना में आसान हुआ है।

उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु डिफेंस कॉरिडोर का जिक्र

राजनाथ सिंह ने कहा कि उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर रक्षा क्षेत्र के सबसे बड़े सुधारों में शामिल हैं।

उन्होंने बताया कि इन दोनों कॉरिडोर में करीब 70 हजार करोड़ रुपये के निवेश के प्रस्ताव मिले हैं। इनमें से लगभग 10 हजार करोड़ रुपये का निवेश हो चुका है। इससे नई मैन्युफैक्चरिंग इकाइयां स्थापित हुई हैं और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर भी बढ़े हैं।

उन्होंने विशेष रूप से उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर को आत्मनिर्भर भारत का मजबूत उदाहरण बताया।

रक्षा खरीद में भारतीय उद्योगों को प्राथमिकता

रक्षा मंत्री ने कहा कि रक्षा आधुनिकीकरण के लिए निर्धारित बजट का 75 प्रतिशत हिस्सा भारतीय उद्योगों से खरीद के लिए रखा गया है। उन्होंने बताया कि नई डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर (डीएपी) में ‘बाय इंडियन-इंडिजिनसली डिजाइन, डेवलप्ड एंड मैन्युफैक्चर्ड’ श्रेणी को प्राथमिकता दी जा रही है। इससे भारतीय कंपनियों को रक्षा उत्पादन में अधिक अवसर मिलेंगे।

स्टार्टअप और एमएसएमई की बढ़ी भागीदारी

राजनाथ सिंह ने कहा कि रक्षा क्षेत्र में इनोवेशन बढ़ाने के लिए आईडेक्स, आईडेक्स प्राइम और अदिति योजना जैसी पहल शुरू की गई हैं। उन्होंने बताया कि स्टार्टअप और एमएसएमई से 2,400 करोड़ रुपये से अधिक की खरीद को मंजूरी दी जा चुकी है। वहीं नई रक्षा तकनीकों के विकास के लिए 1,500 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाएं स्वीकृत की गई हैं।

मार्च 2026 तक 676 स्टार्टअप और इनोवेटर्स आईडेक्स से जुड़े थे और 551 अनुबंध किए जा चुके थे। उन्होंने बताया कि वर्ष 2018 में रक्षा क्षेत्र में जहां कुछ दर्जन स्टार्टअप ही काम कर रहे थे, वहीं अब उनकी संख्या 2,000 से अधिक हो चुकी है। ये स्टार्टअप ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम टेक्नोलॉजी, साइबर सुरक्षा, रोबोटिक्स और अन्य आधुनिक रक्षा तकनीकों पर काम कर रहे हैं।

ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड के बदलाव का भी किया उल्लेख

रक्षा मंत्री ने कहा कि ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड के कॉरपोरेटाइजेशन का उद्देश्य उत्पादन क्षमता बढ़ाना, नई तकनीक अपनाना और जवाबदेही सुनिश्चित करना था।

उन्होंने कहा कि इस फैसले के बाद पहले घाटे में चल रही कई इकाइयां अब लाभ कमाने वाली कंपनियों में बदल चुकी हैं।

राजनाथ सिंह ने कहा कि आज डीआरडीओ केवल अनुसंधान संस्था नहीं रह गई है, बल्कि यह उद्योग, शैक्षणिक संस्थानों, स्टार्टअप, वैज्ञानिकों और निजी कंपनियों को जोड़ने वाला नेशनल इनोवेशन प्लेटफॉर्म बन चुका है।

उन्होंने बताया कि आज देश में रक्षा क्षेत्र के लिए रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों, निजी उद्योगों, 17 हजार से अधिक एमएसएमई और हजारों सप्लाई यूनिट्स का मजबूत नेटवर्क तैयार हो चुका है।

रक्षा क्षेत्र में भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका

रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत अब केवल अपनी जरूरतों के लिए रक्षा उपकरण नहीं बना रहा है, बल्कि वह वैश्विक सुरक्षा साझेदार के रूप में भी अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है। उन्होंने कहा कि भारतीय उद्योग, वैज्ञानिक, सैनिक, इंजीनियर, स्टार्टअप और युवा मिलकर देश के रक्षा औद्योगिक तंत्र को नई दिशा दे रहे हैं।

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड यात्रा का भी उल्लेख किया और कहा कि इन दौरों से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत के रणनीतिक, आर्थिक और रक्षा संबंधों को मजबूती मिली है। इंडोनेशिया के साथ ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली पर सहयोग, ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम आपूर्ति और न्यूजीलैंड के साथ व्यापार बढ़ाने जैसे कदमों का भी उन्होंने जिक्र किया।

ब्रह्मोस मिसाइल के लिए बनेगा हाई-टेक सबसिस्टम, PTC इंडस्ट्रीज को मिला मिशन-क्रिटिकल ऑर्डर

PTC Industries BrahMos Order
(Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

PTC Industries BrahMos Order: पीटीसी इंडस्ट्रीज लिमिटेड को देश के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक रक्षा कार्यक्रमों में शामिल ब्रह्मोस एयरोस्पेस से दो साल का बड़ा ऑर्डर मिला है। कंपनी ने शुक्रवार को स्टॉक एक्सचेंज को दी जानकारी में बताया कि इस ऑर्डर के तहत कंपनी ब्रह्मोस मिसाइल के लिए एक मिशन-क्रिटिकल स्ट्रक्चरल असेंबली वाले रणनीतिक मिसाइल सबसिस्टम का डेवलपमेंट, इंटीग्रेशन और सप्लाई करेगी।

अब तक पीटीसी इंडस्ट्रीज रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्र के लिए हाई-परफॉर्मेंस मटेरियल, प्रेसिजन कास्टिंग, इंजीनियरिंग कंपोनेंट और क्रिटिकल असेंबली तैयार करती रही है। लेकिन नए ऑर्डर के साथ कंपनी की भूमिका और बड़ी हो गई है।

अब उसे केवल अलग-अलग पार्ट्स नहीं बनाने होंगे, बल्कि पूरे सबसिस्टम को विकसित करके उसे इंटीग्रेटेड रूप में तैयार करना होगा। रक्षा उद्योग में इसे काफी बड़ा बदलाव माना जाता है, क्योंकि सिस्टम इंटीग्रेशन में डिजाइन, निर्माण, गुणवत्ता जांच और अंतिम असेंबली सभी चरण शामिल होते हैं।

कंपनी के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर सचिन अग्रवाल ने इसे कंपनी के इतिहास का अहम पड़ाव बताया। उन्होंने कहा कि यह ऑर्डर दिखाता है कि ब्रह्मोस एयरोस्पेस ने भारत के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक कार्यक्रमों में पीटीसी इंडस्ट्रीज की तकनीकी क्षमता पर भरोसा जताया है।

PTC Industries BrahMos Order: सुपरसोनिक मिसाइल के लिए बनेंगे विशेष स्ट्रक्चर

पीटीसी इंडस्ट्रीज जिस असेंबली का निर्माण करेगी, उसे ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक मिसाइल में इस्तेमाल किया जाएगा। ब्रह्मोस की गति लगभग मैक 2.8 से 3 तक पहुंचती है। इतनी तेज रफ्तार पर मिसाइल के हर हिस्से पर बहुत अधिक दबाव, कंपन और गर्मी का असर पड़ता है।

इसी वजह से इस तरह की स्ट्रक्चरल असेंबली तैयार करना आसान नहीं होता। इसके लिए माइक्रोन लेवल की सटीक मशीनिंग, विशेष जॉइनिंग तकनीक, कंट्रोल असेंबली का इंटीग्रेशन और कई चरणों की गुणवत्ता जांच करनी पड़ती है। तैयार होने वाले प्रत्येक हिस्से की ट्रेसेबिलिटी भी सुनिश्चित करनी होती है ताकि उसके निर्माण से लेकर अंतिम परीक्षण तक हर चरण का रिकॉर्ड उपलब्ध रहे।

1963 में शुरू हुई थी कंपनी

पीटीसी इंडस्ट्रीज की शुरुआत साल 1963 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में प्रिसिजन टूल्स एंड कास्टिंग्स के रूप में हुई थी। शुरुआती दौर में कंपनी औद्योगिक उपयोग के लिए इन्वेस्टमेंट कास्टिंग तैयार करती थी।

समय के साथ कंपनी ने अपनी तकनीक को लगातार विकसित किया। साल 1998 में उसने ब्रिटेन की कास्टिंग्स टेक्नोलॉजी इंटरनेशनल से रिप्लीकास्ट प्रक्रिया का लाइसेंस लिया और बाद में अपनी रैपिडकास्ट तकनीक विकसित की। इससे बड़े और जटिल धातु के पुर्जे अधिक सटीकता के साथ तैयार किए जाने लगे।

बाद में कंपनी ने फोर्जकास्ट और एडवांस सिरेमिक मोल्डिंग जैसी तकनीकों को भी अपनाया। आज पीटीसी एयरोस्पेस, रक्षा, अंतरिक्ष, ऊर्जा, तेल एवं गैस और समुद्री क्षेत्र के लिए विशेष धातु और जटिल कंपोनेंट तैयार करती है।

लखनऊ में तैयार हो रहा है हाईटेक मैन्युफैक्चरिंग सेंटर

पीटीसी इंडस्ट्रीज इस समय उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के लखनऊ नोड में अपनी अत्याधुनिक उत्पादन सुविधाओं का विस्तार कर रही है।

करीब 50 एकड़ में बने स्ट्रैटेजिक मैटेरियल टेक्नोलॉजी कॉम्प्लेक्स में वैक्यूम आर्क रीमेल्टिंग, प्लाज्मा आर्क मेल्टिंग, इलेक्ट्रॉन बीम मेल्टिंग और वैक्यूम इंडक्शन मेल्टिंग जैसी आधुनिक तकनीकें लगाई गई हैं।

इन सुविधाओं के जरिए एयरोस्पेस ग्रेड टाइटेनियम, सुपरअलॉय, बिलेट, बार, प्लेट और अन्य विशेष धातु उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। यही सामग्री आधुनिक मिसाइलों, लड़ाकू विमानों, गैस टर्बाइन और अंतरिक्ष कार्यक्रमों में इस्तेमाल होती है।

ब्रह्मोस दुनिया की सबसे तेज ऑपरेशनल सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में गिनी जाती है। इसका विकास भारत और रूस के संयुक्त उपक्रम ब्रह्मोस एयरोस्पेस ने किया है।

यह मिसाइल जमीन, समुद्र, हवा और पनडुब्बी से लॉन्च की जा सकती है। इसकी तेज गति, सटीक निशाना लगाने की क्षमता और कम प्रतिक्रिया समय इसे भारतीय सशस्त्र बलों के सबसे महत्वपूर्ण हथियारों में शामिल करते हैं।

ब्रह्मोस मिसाइल में इस्तेमाल होने वाले एयरफ्रेम और स्ट्रक्चरल हिस्सों के लिए हल्की लेकिन बेहद मजबूत धातुओं की जरूरत होती है। इन्हें अत्यधिक तापमान और तेज कंपन के बीच भी बिना क्षति के काम करना पड़ता है।

टाइटेनियम और सुपरअलॉय की बढ़ रही है अहमियत

आधुनिक रक्षा प्रणालियों में टाइटेनियम और सुपरअलॉय का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। इन धातुओं का वजन कम होता है, लेकिन मजबूती बहुत अधिक होती है। ये जंग से भी सुरक्षित रहती हैं और ऊंचे तापमान पर भी अपनी क्षमता बनाए रखती हैं।

भारत के पास टाइटेनियम अयस्क के बड़े भंडार हैं, लेकिन लंबे समय तक इसकी प्रोसेसिंग के लिए विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता था। पीटीसी इंडस्ट्रीज जैसी कंपनियां अब देश के भीतर ही इस तकनीक को विकसित कर रही हैं।

कई बड़े रक्षा संगठनों के साथ कर चुकी है काम

पीटीसी इंडस्ट्रीज पहले से हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल), डीआरडीओ, इसरो, सफ्रान, दसॉ एविएशन, बीएई सिस्टम्स और इजराइल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज जैसी संस्थाओं और कंपनियों के लिए विशेष कंपोनेंट तैयार कर चुकी है।

भारतीय नौसेना को मिला नया सबमरीन हंटर MH-60R सीहॉक, ऑपरेशन सिंदूर से हिंद महासागर तक बढ़ी भारत की ताकत!

MH-60R Seahawk Indian Navy
(Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

MH-60R Seahawk Indian Navy: भारतीय नौसेना की समुद्री ताकत को और मजबूत करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। अमेरिका ने भारतीय नौसेना को एक और अत्याधुनिक एमएच-60आर ‘सीहॉक’ मल्टी-रोल नौसैनिक हेलीकॉप्टर सौंप दिया है। यह हेलीकॉप्टर पिछले सप्ताह केरल के कोच्चि में भारतीय नौसेना को डिलीवर किया गया। अमेरिकी दूतावास ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि इसी सप्ताह दो और हेलीकॉप्टर भारत पहुंचने वाले हैं। इनकी डिलीवरी के साथ भारतीय नौसेना के पास मौजूद सीहॉक हेलीकॉप्टरों की संख्या 21 तक पहुंच जाएगी।

अमेरिकी दूतावास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि लॉकहीड मार्टिन द्वारा विकसित यह अत्याधुनिक हेलीकॉप्टर भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी की मजबूती का प्रतीक है। अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने भी इस डिलीवरी का स्वागत करते हुए कहा कि इससे समुद्री सुरक्षा और मुक्त एवं खुले हिंद-प्रशांत क्षेत्र के प्रति दोनों देशों की साझा प्रतिबद्धता और मजबूत होगी।

MH-60R Seahawk Indian Navy: 2020 में हुआ था 24 हेलीकॉप्टरों का बड़ा समझौता

भारत ने फरवरी 2020 में अमेरिका के साथ फॉरेन मिलिट्री सेल्स (एफएमएस) कार्यक्रम के तहत 24 एमएच-60आर (MH-60R) ‘रोमियो’ हेलीकॉप्टर खरीदने का समझौता किया था। इस सौदे की कीमत लगभग 2.6 अरब अमेरिकी डॉलर थी। इन हेलीकॉप्टरों का निर्माण अमेरिकी कंपनी सिकोरस्की एयरक्राफ्ट करती है, जो अब लॉकहीड मार्टिन का हिस्सा है।

इन हेलीकॉप्टरों की डिलीवरी साल 2021 से शुरू हुई। जुलाई 2026 तक 21 हेलीकॉप्टर भारत को मिल चुके हैं, जबकि अंतिम तीन हेलीकॉप्टरों की डिलीवरी अभी बाकी है।

अभी कितने हेलीकॉप्टर हैं ऑपरेशन के लिए तैयार

भारतीय नौसेना के सूत्रों के अनुसार, अभी तक मिले हेलीकॉप्टरों में से 15 हेलीकॉप्टर पूरी तरह ऑपरेशनल हैं और विभिन्न युद्धपोतों पर तैनात किए जा चुके हैं।

तीन हेलीकॉप्टर अमेरिका में भारतीय पायलटों और तकनीकी कर्मचारियों की ट्रेनिंग के लिए रखे गए हैं। वहीं, हाल में पहुंचे तीन हेलीकॉप्टरों की जांच, दस्तावेजी प्रक्रिया और वैलिडेशन के बाद उन्हें भी जल्द नौसेना के बेड़े में शामिल किया जाएगा। (MH-60R Seahawk Indian Navy)

दो स्क्वाड्रन में हो चुकी है तैनाती

सीहॉक हेलीकॉप्टरों के लिए भारतीय नौसेना ने दो अलग-अलग स्क्वाड्रन तैयार किए हैं। पहला स्क्वाड्रन आईएनएएस 334 ‘सीहॉक्स’ है, जिसे 6 मार्च 2024 को आईएनएस गरुड़, कोच्चि में कमीशन किया गया था। यह स्क्वाड्रन ट्रेनिंग और ऑपरेशनल मदद दोनों की जिम्मेदारी संभालता है।

दूसरा स्क्वाड्रन आईएनएएस 335 ‘ऑस्प्रेय्स’ है, जिसे 17 दिसंबर 2025 को आईएनएस हंसा, गोवा में कमीशन किया गया। यह पश्चिमी समुद्री क्षेत्र में पूरी तरह ऑपरेशनल स्क्वाड्रन है।

इन दोनों स्क्वाड्रनों के हेलीकॉप्टर आईएनएस विक्रांत, आईएनएस विक्रमादित्य, आधुनिक विध्वंसक युद्धपोतों और फ्रिगेट्स पर तैनात किए जा सकते हैं। (MH-60R Seahawk Indian Navy)

क्यों खास है MH-60R सीहॉक

एमएच-60 ‘रोमियो’ दुनिया के सबसे आधुनिक नौसैनिक हेलीकॉप्टरों में शामिल है। यह अमेरिकी सेना के प्रसिद्ध ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर का समुद्री संस्करण है। इसमें जहाज पर कम जगह घेरने के लिए फोल्ड होने वाले मुख्य रोटर ब्लेड और मुड़ने वाली टेल लगाई गई है।

यह दो टर्बोशाफ्ट इंजन से चलता है। हेलीकॉप्टर में तीन से चार सदस्यीय क्रू रहता है और इसमें पांच अतिरिक्त सैनिक या कर्मी बैठ सकते हैं। इसकी अधिकतम गति लगभग 330 किलोमीटर प्रति घंटा है, जबकि इसकी ऑपरेशनल रेंज लगभग 830 किलोमीटर है। यह लगभग 3,000 किलोग्राम तक का भार ले जाने में सक्षम है।

पनडुब्बियों का लग सकता है पता

सीहॉक हेलीकॉप्टर की सबसे बड़ी ताकत इसकी एंटी-सबमरीन वारफेयर (एएसडब्ल्यू) क्षमता है। इसमें डिपिंग सोनार लगा होता है, जिसे समुद्र में नीचे उतारकर पानी के भीतर मौजूद पनडुब्बियों का पता लगाया जाता है। इसके अलावा यह बड़ी संख्या में सोनोबॉय भी समुद्र में गिरा सकता है। ये छोटे सेंसर समुद्र के भीतर होने वाली ध्वनि को रिकॉर्ड करके पनडुब्बियों की गतिविधि का पता लगाते हैं।

हेलीकॉप्टर में लगा मल्टी-मोड रडार समुद्र की सतह और उसके आसपास मौजूद टारगेट्स की पहचान करता है। दुश्मन की पनडुब्बी मिलने पर यह एमके-54 लाइटवेट टॉरपीडो से हमला कर सकता है।

भारत ने साल 2024 में अमेरिका से 500 से अधिक आधुनिक सोनोबॉय खरीदने का फैसला किया था। इसी साल अमेरिका ने 53 एमके-54 टॉरपीडो की बिक्री को भी मंजूरी दी थी, ताकि सीहॉक हेलीकॉप्टरों की मारक क्षमता और बढ़ाई जा सके। (MH-60R Seahawk Indian Navy)

समुद्र की सतह पर भी कर सकता है हमला

एमएच-60आर केवल पनडुब्बियों के खिलाफ ही नहीं, बल्कि समुद्र की सतह पर मौजूद दुश्मन के जहाजों के खिलाफ भी प्रभावी हथियार है।

यह एजीएम-114 हेलफायर मिसाइल, मशीन गन और अन्य आधुनिक हथियारों से लैस किया जा सकता है। इसमें लगे इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर, लेजर रेंज फाइंडर, इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर्स, इन्फ्रारेड जैमर, मिसाइल अप्रोच वार्निंग सिस्टम और ग्लास कॉकपिट इसे हर मौसम और दिन-रात में ऑपरेशन करने की क्षमता देते हैं।

इसका रडार समुद्र में मौजूद छोटे टारगेट्स और यहां तक कि पनडुब्बियों के पेरिस्कोप तक की पहचान करने में सक्षम माना जाता है। (MH-60R Seahawk Indian Navy)

भारतीय जरूरतों के अनुसार किए जा रहे अपग्रेड

भारतीय नौसेना के लिए आने वाले एमएच-60आर हेलीकॉप्टरों में इंडिया यूनिक इक्विपमेंट (आईयूई) भी जोड़े जा रहे हैं। इनमें स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट, सुरक्षित संचार प्रणाली और भारतीय जरूरतों के अनुरूप अन्य उपकरण शामिल हैं। पहले से सेवा में मौजूद हेलीकॉप्टरों को भी चरणबद्ध तरीके से अमेरिका भेजकर इन्हीं मानकों के अनुसार अपग्रेड किया जाएगा।

इन हेलीकॉप्टरों का भारतीय विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत पर भी सफल परीक्षण किया जा चुका है। भारतीय नौसेना के अनुसार, इन्हें भारतीय मौसम और समुद्री परिस्थितियों के अनुरूप पूरी तरह परखा गया है।

पुराने सी किंग हेलीकॉप्टरों की ले रहे हैं जगह

एमएच-60आर हेलीकॉप्टर ब्रिटेन मूल के सी किंग एमके-42बी हेलीकॉप्टरों की जगह ले रहे हैं। सी किंग हेलीकॉप्टर करीब 40 सालों तक भारतीय नौसेना की सेवा में रहे और जून 2026 में उन्हें चरणबद्ध तरीके से सेवा से हटाया गया।

नई पीढ़ी के सीहॉक हेलीकॉप्टर आने के बाद नौसेना की पनडुब्बी रोधी क्षमता, समुद्री निगरानी और जहाज आधारित हवाई अभियानों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। (MH-60R Seahawk Indian Navy)

ऑपरेशन सिंदूर और नौसैनिक अभ्यासों में हुआ इस्तेमाल

भारतीय नौसेना प्रमुख रहे एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी ने दिसंबर 2025 में दूसरे स्क्वाड्रन के कमीशनिंग के दौरान बताया था कि एमएच-60आर हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान किया गया था और उन्होंने अपनी निर्धारित भूमिका प्रभावी तरीके से निभाई।

इन हेलीकॉप्टरों को ट्रोपेक्स-25 सहित कई बड़े नौसैनिक अभ्यासों में भी तैनात किया जा चुका है। इनके आधुनिक सेंसर और नेटवर्क आधारित सिस्टम युद्धपोतों को समुद्री क्षेत्र की बेहतर जानकारी उपलब्ध कराते हैं।

7,995 करोड़ का सस्टेनमेंट पैकेज भी हुआ लागू

हेलीकॉप्टरों की लंबे समय तक बेहतर उपलब्धता बनाए रखने के लिए भारत ने दिसंबर 2025 में लगभग 7,995 करोड़ का सस्टेनमेंट पैकेज भी साइन किया था। इस पांच सालीय पैकेज में स्पेयर पार्ट्स, तकनीकी सहायता, ट्रेनिंग, मरम्मत, उपकरण, नियमित निरीक्षण और भारत में इंटरमीडिएट स्तर की रिपेयर सुविधाएं तैयार करना शामिल है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इससे धीरे-धीरे रखरखाव के लिए अमेरिका पर निर्भरता कम होगी और भारत के भीतर ही मरम्मत एवं तकनीकी क्षमता विकसित होगी। (MH-60R Seahawk Indian Navy)

हिंद महासागर में बढ़ी समुद्री निगरानी क्षमता

भारतीय नौसेना लंबे समय से 100 से अधिक मल्टी-रोल नौसैनिक हेलीकॉप्टरों की आवश्यकता बता रही है। फिलहाल एमएच-60आर हेलीकॉप्टर हिंद महासागर क्षेत्र में पनडुब्बियों की निगरानी, समुद्री मार्गों की सुरक्षा, विमानवाहक पोतों की सुरक्षा, खोज एवं बचाव अभियान, मेडिकल इवैक्यूएशन और लंबी दूरी की समुद्री निगरानी जैसे कई महत्वपूर्ण कार्यों में इस्तेमाल किए जा रहे हैं।

इन हेलीकॉप्टरों के आने से भारतीय नौसेना की जहाज आधारित हवाई क्षमता पहले की तुलना में काफी मजबूत हुई है और आधुनिक युद्धपोतों को एक ऐसी हवाई ताकत मिली है, जो समुद्र के ऊपर और समुद्र के नीचे दोनों तरह के खतरों पर लगातार नजर रखने में सक्षम है। (MH-60R Seahawk Indian Navy)

27 साल बाद कारगिल युद्ध का पूरा सच! तोलोलिंग से टाइगर हिल तक- कब, कहां और कैसे बदला युद्ध का रुख, पढ़ें पूरी टाइमलाइन

Kargil War Timeline 1999
(Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

Kargil War Timeline 1999: कारगिल युद्ध को हुए 27 साल बीत चुके हैं। इसे भारत के सैन्य इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण लड़ाइयों में गिना जाता है। साल 1999 में पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर के कारगिल, द्रास, बटालिक और मुश्कोह सेक्टर की ऊंची चोटियों पर गुपचुप तरीके से कब्जा करने की योजना बनाई। शुरुआत में इसे आतंकियों की घुसपैठ माना गया, लेकिन कुछ ही दिनों में यह साफ हो गया कि इसके पीछे पाकिस्तान सेना की सुनियोजित कार्रवाई थी।

कारगिल युद्ध अचानक शुरू नहीं हुआ था। फरवरी 1999 से ही पाकिस्तान की गतिविधियां तेज होने लगी थीं। भारतीय सेना के दस्तावेजों के अनुसार, कई घटनाएं एक के बाद एक हुईं, जिन्होंने अंततः बड़े सैन्य अभियान का रूप लिया। फरवरी से जून 1999 के बीच हुई घटनाओं ने युद्ध की दिशा तय की। आइए जानते हैं इस पूरे घटनाक्रम की पूरी टाइमलाइन।

Kargil War Timeline 1999: फरवरी 1999: मुश्कोह सेक्टर से शुरू हुई घुसपैठ

भारतीय सेना के रिकॉर्ड के अनुसार सर्दियों में फरवरी 1999 में पाकिस्तान सेना ने मुश्कोह सेक्टर में घुसपैठ शुरू कर दी थी। उस समय यह आम गतिविधियां लग रही थीं, लेकिन बाद में पता चला कि पाकिस्तानी सेना सुनियोजित तरीके से ऊंची पहाड़ियों पर कब्जा जमाने की तैयारी कर रही थी।

इन इलाकों में सर्दियों के दौरान भारी बर्फबारी होती है। कई ऊंची चौकियां मौसम के कारण खाली करनी पड़ती थीं। पाकिस्तान ने इसी स्थिति का फायदा उठाकर भारतीय क्षेत्र में कई स्थानों पर अपनी मौजूदगी बना ली। (Kargil War Timeline 1999)

अप्रैल 1999: युद्धाभ्यास में उठा था घुसपैठ का मुद्दा

अप्रैल 1999 में बादामी बाग (श्रीनगर) स्थित 15 कोर मुख्यालय में एक कोर वार गेम आयोजित किया गया। इस अभ्यास के दौरान 70 इन्फैंट्री ब्रिगेड के कमांडर ब्रिगेडियर देविंदर सिंह ने टाइगर हिल और अन्य बिना कब्जे वाली चोटियों में संभावित घुसपैठ का मुद्दा उठाया।

उस समय यह केवल एक सैन्य आकलन माना गया, लेकिन कुछ हफ्तों बाद यही आशंका असलियत में बदल गई।

3-5 मई: स्थानीय चरवाहे ने सबसे पहले देखी घुसपैठ

3 मई 1999 को बटालिक सेक्टर के स्थानीय निवासी ताशी नामग्याल ने कुछ काले पठानी सूट पहने कुछ संदिग्ध लोगों को ऊंची पहाड़ियों पर देखा। उन्होंने तुरंत इसकी जानकारी भारतीय सेना को दी। इसी के बाद पता चला कि पाकिस्तान कुछ बड़ी तैयारी कर रहा है। सेना ने सूचना मिलने के बाद 5 मई को इलाके में पेट्रोलिंग बढ़ाई और हालात की जानकारी लेना शुरू कर दिया। (Kargil War Timeline 1999)

9 मई: कारगिल के गोला-बारूद डिपो पर हमला

रविवार 9 मई 1999 को पाकिस्तान ने कारगिल स्थित भारतीय सेना के अम्युनिशन डंप पर भारी गोलाबारी की। पाकिस्तानी सेना ने दोपहर से गोलाबारी शुरू की, जो 10 मई तक चली। इस हमले में गोला-बारूद के भंडार को काफी नुकसान पहुंचा। कारगिल शहर के बारू इलाके में भारतीय सेना का बड़ा गोला-बारूद डंप (अम्युनिशन डंप) था, जो पहाड़ियों में फैला हुआ था और कारगिल शहर के बेहद करीब था।

यह पहली बार था जब पाकिस्तानी सेना ने खुले तौर पर भारी तोपखाने का इस्तेमाल किया। विस्फोट 2-3 दिनों तक चले, और गोले-बारूद उड़कर आसपास बिखर गए। (Kargil War Timeline 1999)

10 मई: सेना प्रमुख विदेश दौरे पर

10 मई को तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल वीपी मलिक पोलैंड और चेकोस्लोवाकिया के आधिकारिक दौरे पर रवाना हुए। इसी दौरान सीमा पर हालात तेजी से बदल रहे थे। बाद में जनरल मलिक को स्थिति की गंभीरता देखते हुए अपना दौरा बीच में छोड़कर भारत लौटना पड़ा। (Kargil War Timeline 1999)

11 मई: वायुसेना से हेलीकॉप्टर मदद मांगी

11 मई 1999 को उधमपुर स्थित उत्तरी कमान मुख्यालय ने भारतीय वायुसेना से एमआई-25, एमआई-35 अटैक हेलीकॉप्टर और हथियारबंद एमआई-17 हेलीकॉप्टरों की मांग की। हालांकि उस समय यह अनुरोध स्वीकार नहीं किया गया। कारण यह बताया गया कि कारगिल क्षेत्र की ऊंचाई इन हेलीकॉप्टरों की प्रभावी ऑपरेटिंग सीमा से अधिक थी।

12 और 13 मई: द्रास सेक्टर में भी हुई घुसपैठ की पुष्टि

12 मई को पहली बार द्रास सेक्टर में भी दुश्मन की मौजूदगी का पता चला। इसके अगले ही दिन यानी 13 मई को कारगिल के अम्युनिशन डंप पर हुए हमले के केवल चार दिन बाद द्रास स्थित भारतीय सेना का ट्रांजिट कैंप भी पाकिस्तान की भारी गोलाबारी का शिकार हुआ। इससे भारतीय सेना को स्पष्ट संकेत मिल गया कि यह सामान्य सीमा उल्लंघन नहीं, बल्कि बड़े सैन्य अभियान का हिस्सा है।

14 मई: वायुसेना की मदद पर हुई अहम बैठक

14 मई 1999 को तत्कालीन उप सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल चंद्र शेखर ने चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी की बैठक में भारतीय वायुसेना को अभियान में शामिल करने की जरूरत पर जोर दिया। उस समय तत्कालीन वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल अनिल यशवंत टिपनिस ने कहा कि इसके लिए भारत सरकार की औपचारिक मंजूरी आवश्यक होगी।

इसी दिन एक और महत्वपूर्ण घटना हुई। 4 जाट रेजिमेंट के कैप्टन सौरभ कालिया के नेतृत्व में पांच सैनिकों (सिपाही अर्जुन राम बसावनबिहा, सिपाही भंवर लाल बागरिया, सिपाही भिखा राम, सिपाही मूला राम और सिपाही नरेश सिंह) की गश्ती टीम बजरंग पोस्ट (काकसर सेक्टर, ऊंचाई लगभग 13,000–14,000 फीट) की ओर गई, लेकिन यह दल वापस नहीं लौटा। यह कारगिल युदध की शुरुआत की पहली बड़ी क्षति थी।

पाकिस्तानी सेना (नॉर्दर्न लाइट इन्फेंट्री और रेंजर्स) ने उन पर हमला बोल दिया। घंटों तक भीषण गोलीबारी हुई। गोला-बारूद खत्म होने के बाद कालिया ने बेस कैंप से संपर्क किया और रीइन्फोर्समेंट मांगी। लेकिन इससे पहले ही पाकिस्तानी प्लाटून ने उन्हें घेर लिया और जिंदा पकड़ लिया। कैप्टन सौरभ कालिया और उनके पांच साथियों को 15 मई से 7 जून 1999 तक (लगभग 22-23 दिन) पाकिस्तानी हिरासत में रखा गया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार उन्हें बेहद क्रूर यातनाएं दी गईं। 9 जून 1999 को पाकिस्तानी सेना ने उनके क्षत-विक्षत शव भारतीय पक्ष को सौंपे। जिसके बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ जिनेवा कन्वेंशन के उल्लंघन का नोटिस भेजा।

16 मई: कैप्टन अमित भारद्वाज की टुकड़ी पर हमला

लापता गश्ती दल की तलाश के लिए 16 मई को कैप्टन अमित भारद्वाज के नेतृत्व में एक प्लाटून भेजी गई। जांच के दौरान इस दल पर घात लगाकर हमला किया गया। इस मुठभेड़ में कैप्टन अमित भारद्वाज और एक जूनियर कमीशंड अधिकारी शहीद हो गए।

इसी दिन 8 माउंटेन डिवीजन की 56 माउंटेन ब्रिगेड को कश्मीर घाटी से द्रास भेजने का आदेश दिया गया। यह फैसला युद्ध की दिशा बदलने वाला साबित हुआ क्योंकि इसके बाद बड़े स्तर पर सैनिकों की तैनाती शुरू हुई। (Kargil War Timeline 1999)

17 मई: पहली बार हुई कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी की बैठक

17 मई 1999 को नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) की पहली बैठक हुई।
इस बैठक में रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री को कारगिल की स्थिति की जानकारी दी गई। सेना ने वायुसेना को अभियान में शामिल करने का प्रस्ताव रखा, लेकिन उस समय इसे मंजूरी नहीं मिली। (Kargil War Timeline 1999)

20 मई: सेना प्रमुख लौटे भारत

हालात की गंभीरता को देखते हुए 20 मई को सेना प्रमुख जनरल वी. पी. मलिक अपना विदेश दौरा बीच में छोड़कर भारत लौट आए। उनके लौटने के बाद सैन्य अभियान की गति और योजना दोनों में तेजी आई।

22 मई: टाइगर हिल और तोलोलिंग पर पहला बड़ा हमला

22 मई 1999 को 56 माउंटेन ब्रिगेड ने द्रास सेक्टर की जिम्मेदारी संभाली।

उसी दिन टाइगर हिल, तोलोलिंग और पॉइंट 5140 पर कब्जा वापस लेने के लिए पहला बड़ा सैन्य हमला शुरू किया गया। हालांकि यह हमला सफल नहीं हो सका और भारतीय सेना को भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। ऊंची पहाड़ियों पर बैठे पाकिस्तानी सैनिकों को सामरिक बढ़त हासिल थी। (Kargil War Timeline 1999)

23 से 27 मई: अतिरिक्त सैन्य बल की तैनाती

23 मई को 79 माउंटेन ब्रिगेड को मुश्कोह सेक्टर भेजा गया ताकि वहां की जिम्मेदारी संभाली जा सके। 24 मई को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई सीसीएस बैठक में भारतीय वायुसेना के इस्तेमाल की मंजूरी दी गई। साथ ही स्पष्ट निर्देश दिया गया कि अभियान के दौरान वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलओसी) या अंतरराष्ट्रीय सीमा पार नहीं की जाएगी।

26 मई 1999 को भारतीय वायुसेना ने ऑपरेशन सफेद सागर शुरू किया। पहले ही दिन तीन विमान और हेलीकॉप्टर खोने के बाद वायुसेना ने अपनी रणनीति में बदलाव किया और ऊंचाई पर स्थित लक्ष्यों के अनुसार अभियान को फिर से तैयार किया।

इसी दौरान 26-27 मई को पाकिस्तान सेना प्रमुख और रावलपिंडी स्थित चीफ ऑफ जनरल स्टाफ के बीच हुई बातचीत भारतीय एजेंसियों ने इंटरसेप्ट की। इन बातचीतों से पहली बार स्पष्ट प्रमाण मिला कि कारगिल घुसपैठ में पाकिस्तान सेना सीधे तौर पर शामिल थी, न कि केवल आतंकवादी या घुसपैठिए।

27 मई: 6 माउंटेन डिवीजन को भी किया गया एक्टिव

27 मई 1999 को सेना मुख्यालय ने 6 माउंटेन डिवीजन को सोनमर्ग के पास जोजिला दर्रे तक पहुंचने का आदेश दिया। इसका उद्देश्य जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त सैन्य बल उपलब्ध कराना था।

इसी समय भारतीय एजेंसियों द्वारा इंटरसेप्ट की गई बातचीत से यह भी साफ हो गया कि कारगिल की पूरी योजना पाकिस्तान सेना की टॉप लीडरशिप उस समय जनरल परवेज मुशर्रफ की जानकारी में बनाई गई थी।

31 मई: प्रधानमंत्री ने माना युद्ध जैसे हालात

31 मई 1999 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सार्वजनिक रूप से कहा कि कारगिल में युद्ध जैसी स्थिति बन चुकी है। इसके बाद सैन्य और प्रशासनिक स्तर पर फैसलों में तेजी आने लगी। (Kargil War Timeline 1999)

1 जून: 8 माउंटेन डिवीजन ने संभाली कमान

1 जून को 8 माउंटेन डिवीजन के टैक्टिकल मुख्यालय ने मुश्कोह और द्रास सेक्टर की जिम्मेदारी संभाल ली। यहीं से भारतीय सेना ने अलग-अलग क्षेत्रों में योजनाबद्ध तरीके से जवाबी अभियान शुरू किया।

4 जून: स्पेशल फोर्स की एंट्री

4 जून 1999 को 9 पैरा स्पेशल फोर्स की बटालियन, जिसकी कमान कर्नल जॉन एबॉट के पास थी, कारगिल पहुंची।
इसके बाद 50 पैरा ब्रिगेड, जिसकी कमान ब्रिगेडियर प्रभोध भारद्वाज संभाल रहे थे, को भी अभियान में शामिल किया गया। इन विशेष बलों को कठिन पर्वतीय इलाकों में विशेष ऑपरेशन के लिए लगाया गया।

6 जून: बोफोर्स तोप का इस्तेमाल

6 जून को भारतीय सेना ने पहली बार बोफोर्स एफएच-77बी हॉवित्जर का लंबी दूरी से सीधे टारगेट पर फायर करने का प्रयोग तोलोलिंग में किया। सामान्य तौर पर बोफोर्स का उपयोग अप्रत्यक्ष गोलाबारी के लिए किया जाता है, लेकिन कारगिल की ऊंची पहाड़ियों में इसे सीधे टारगेट पर दागा गया। इससे दुश्मन के बंकरों को भारी नुकसान पहुंचा और आगे के हमलों के लिए रास्ता तैयार हुआ।

12 जून: तोलोलिंग पर पहला बड़ा हमला

12 जून 1999 को 8 माउंटेन डिवीजन के नेतृत्व में 56 माउंटेन ब्रिगेड ने तोलोलिंग हाइट्स और पॉइंट 5140 पर बड़ा हमला शुरू किया।

यह हमला बेहद कठिन था क्योंकि पाकिस्तानी सैनिक ऊंची चोटियों पर बैठे थे, जबकि भारतीय सैनिकों को नीचे से चढ़ाई करते हुए हमला करना पड़ रहा था। (Kargil War Timeline 1999)

13 जून: तोलोलिंग पर फहराया तिरंगा

13 जून 1999 कारगिल युद्ध का महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। 2 राजपूताना राइफल्स ने भीषण लड़ाई के बाद तोलोलिंग हाइट्स पर कब्जा कर लिया। यह कारगिल युद्ध में भारतीय सेना की पहली बड़ी टैक्टिकल जीत थी।
तोलोलिंग की जीत से द्रास क्षेत्र में भारतीय सेना की स्थिति मजबूत हुई और आगे के अभियानों के लिए आधार तैयार हुआ।

17 जून: पॉइंट 5140 की ओर बढ़ा अभियान

17 जून को 13 जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स ने रॉकी नॉब क्षेत्र में दिन के उजाले में हमला किया। यह अभियान सफल रहा और भारतीय सेना ने आगे बढ़ने के लिए महत्वपूर्ण सामरिक स्थिति हासिल कर ली।

19 जून: पॉइंट 5140 पर कब्जा

19 जून 1999 को 13 जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स ने पॉइंट 5140 पर सफल हमला किया। यह द्रास क्षेत्र की सबसे ऊंची टैक्टिकल चोटियों में से एक थी। इसी अभियान के दौरान कैप्टन विक्रम बत्रा ने “ये दिल मांगे मोर” का मैसेज दिया था, जो बाद में पूरे देश में चर्चा का विषय बना।

पॉइंट 5140 पर कब्जा मिलने के बाद भारतीय सेना को टाइगर हिल की दिशा में आगे बढ़ने में महत्वपूर्ण बढ़त मिली।

28 जून: मारपोला रिज पर सफलता

28 जून को भारतीय सेना ने मारपोला रिज क्षेत्र में अभियान शुरू किया। 56 माउंटेन ब्रिगेड के नेतृत्व में 2 राजपूताना राइफल्स ने ब्लैक रॉक क्षेत्र में सफलता हासिल की, जबकि 18 गढ़वाल राइफल्स ने पॉइंट 4700 पर कब्जा कर लिया।

इन सफलताओं से द्रास क्षेत्र में पाकिस्तान की कई अग्रिम पोस्ट दबाव में आ गईं।

1 जुलाई: सैंडो टॉप पर स्पेशल ऑपरेशन

1 जुलाई को 9 पैरा स्पेशल फोर्स ने टारगिल हिल के नीचे सैंडो टॉप पर विशेष अभियान शुरू किया। दिन निकलने के बाद दुश्मन की नजर पड़ने पर स्पेशल फोर्सेज को आर्टिलरी की आड़ लेकर पीछे हटना पड़ा। इसके बाद अभियान की रणनीति में बदलाव किया गया।

3 और 4 जुलाई: टाइगर हिल की निर्णायक लड़ाई

3 जुलाई 1999 को 92 माउंटेन ब्रिगेड, जिसकी कमान ब्रिगेडियर एमपीएस बाजवा के पास थी, उन्होंने 18 ग्रेनेडियर्स के साथ मिलकर टाइगर हिल पर हमला शुरू किया। 4 जुलाई की सुबह भारतीय सैनिक टाइगर हिल की चोटी तक पहुंच गए। हालांकि शुरुआती घोषणा समय से पहले कर दी गई थी, लेकिन लगातार लड़ाई के बाद भारतीय सेना ने पूरी चोटी पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। उसी दिन 79 माउंटेन ब्रिगेड के नेतृत्व में ब्रिगेडियर रमेश कक्कड़ ने पॉइंट 4875 पर भी सफल हमला किया।

7 जुलाई: ट्विन बंप पर कब्जा

7 जुलाई को 2 नागा रेजिमेंट ने ट्विन बंप पर कब्जा कर लिया। इस सफलता से पॉइंट 4875 के आसपास भारतीय सेना की स्थिति और मजबूत हो गई। पॉइंट 4875 (टाइगर हिल कॉम्प्लेक्स का हिस्सा) मुश्कोह वैली में स्थित एक प्रमुख ऊंची चोटी थी। पाकिस्तानी सेना ने इसकी चोटियों पर कब्जा करके भारतीय सैनिकों और सप्लाई काफिले पर तोपों और मोर्टार से हमला कर रही थी।

2 नागा रेजिमेंट (कमांडिंग ऑफिसर कर्नल डी.के. बादोला) को 27 जून 1999 को द्रास-मश्कोह सेक्टर में शामिल किया गया। सिर्फ 7 दिनों के एक्रोमेटाइजेशन (ऊंचाई के अभ्यस्त होने) के बाद ही उन्हें ट्विन बंप्स पर हमला करने का काम सौंपा गया। यह हमला टाइगर हिल पर हमला कर रही इकाइयों (जैसे 8 सिख) पर दबाव कम करने के लिए था। आर्टिलरी से ट्विन बंप्स पर भारी गोलाबारी की गई। इससे पाकिस्तानी ठिकानों को काफी नुकसान पहुंचा।
ट्विन बंप्स पर कब्जे के बाद पाकिस्तानी सेना को पॉइंट 4875 और टाइगर हिल क्षेत्र से पीछे हटना पड़ा।

2 नागा रेजिमेंट को इस ऑपरेशन में भारी कीमत चुकानी पड़ी। उनके लगभग 18 सैनिक शहीद हुए। यूनिट को बैटल ऑनर: मुश्कोह, थिएटर ऑनर: कारगिल और सीओएएस यूनिट सिटेशन का सम्मान मिला।

10 जुलाई: पाकिस्तान ने हार मानी

लगातार सैन्य दबाव के बाद 10 जुलाई 1999 को पाकिस्तान ने संघर्षविराम स्वीकार किया। पाकिस्तान के डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशंस (डीजीएमओ) ने 10 जुलाई से सैनिकों की वापसी शुरू करने और 16 जुलाई तक इसे पूरा करने पर सहमति दी। मश्कोह से 12–15 जुलाई, द्रास से 14–15 जुलाई और बटालिक से 15–16 जुलाई तक वापसी की बात हुई।

16 जुलाई: पीछे हटने के वादे से मुकरा पाकिस्तान

16 जुलाई को भारतीय सेना ने पाया कि पाकिस्तान ने तय समय के अनुसार सभी क्षेत्रों से सैनिक नहीं हटाए हैं।
इसके बाद कई स्थानों पर भारतीय सेना ने अभियान जारी रखा। कुछ क्षेत्रों में पाकिस्तानी सैनिक अभी भी भारतीय क्षेत्र पर मौजूद थे। वहीं, वापसी के दौरान पाकिस्तान ने कई जगहों पर माइंस और बूबी ट्रैप बिछा दिए थे।
जबकि तीन प्रमुख फीचर्स पर पाकिस्तान की उपस्थिति अभी भी बनी हुई थी।

21 जुलाई: अंतिम सैन्य कार्रवाई की मंजूरी

21 जुलाई 1999 को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से शेष घुसपैठियों को पूरी तरह बाहर निकालने के लिए अंतिम सैन्य कार्रवाई की अनुमति मांगी गई। उसी दिन अनुमति मिलने के बाद भारतीय सेना ने शेष क्षेत्रों में अभियान शुरू किया।

26 जुलाई: कारगिल विजय दिवस

26 जुलाई 1999 को भारतीय सेना ने घोषणा की कि सभी घुसपैठियों और पाकिस्तानी सैनिकों को कब्जे वाले क्षेत्रों से पूरी तरह बाहर निकाल दिया गया है। इसी दिन को हर वर्ष कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है।

अगस्त में भी जारी रही सैन्य कार्रवाई

इसके बाद भी पाकिस्तान की ओर से तोपखाने की गोलाबारी जारी रही। 20 अगस्त 1999 को भारतीय तोपखाने ने पोस्ट 44 पर भारी जवाबी कार्रवाई की। यह पोस्ट पॉइंट 13620 के पास स्थित थी। युद्ध समाप्त होने के बाद भी सेना ने सीमावर्ती इलाकों की सुरक्षा मजबूत करने का काम जारी रखा। मध्य अगस्त 1999 में 8 माउंटेन डिवीजन को कारगिल क्षेत्र की सुरक्षा मजबूत करने और खाली स्थानों पर परमानेंस डिफेंस सिस्टम तैयार करने का आदेश दिया गया। (Kargil War Timeline 1999)

CGHS में 51 नए अस्पताल शामिल, दिल्ली-NCR के लाखों कर्मचारियों और पेंशनर्स को मिलेगा फायदा, देखें पूरी लिस्ट

(Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

CGHS New Empanelled Hospitals 2026: केंद्र सरकार स्वास्थ्य योजना (सीजीएचएस) के लाभार्थियों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं का दायरा बढ़ाते हुए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में 51 नए मल्टीस्पेशियलिटी अस्पतालों को ताजा तौर पर पैनल में शामिल कर लिया है। इस संबंध में आरके पुरम स्थित, सीजीएचएस मुख्यालय की ओर से हाल ही में एक आधिकारिक कार्यालय ज्ञापन (ऑफिस मेमोरेंडम) जारी किया गया।

इस फैसले के बाद केंद्र सरकार के कर्मचारियों, पेंशनर्स और अन्य पात्र सीजीएचएस लाभार्थियों को इलाज के लिए पहले की तुलना में अधिक अस्पतालों का विकल्प मिलेगा। नए अस्पताल दिल्ली, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम, फरीदाबाद, सोनीपत और आसपास के क्षेत्रों में स्थित हैं।

CGHS New Empanelled Hospitals 2026: तीन साल तक रहेगा पैनल में शामिल होने का दर्जा

सीजीएचएस मुख्यालय के मुताबिक, ये सभी अस्पताल आदेश जारी होने की तारीख यानी 15 जुलाई 2026 से अगले तीन वर्ष तक पैनल में बने रहेंगे। सभी अस्पतालों को 22 दिसंबर 2025 को जारी सीजीएचएस की नई अस्पताल सूची और नियमों का पूरी तरह पालन करना होगा।

मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि जिन जांचों या प्रक्रियाओं के लिए अस्पताल एनएबीएच या एनएबीएल मान्यता प्राप्त हैं, केवल उन्हीं सेवाओं पर संबंधित दरें लागू होंगी। यदि किसी जांच के लिए मान्यता नहीं है तो उस पर मान्यता प्राप्त संस्थान वाली दर का दावा नहीं किया जा सकेगा। (CGHS New Empanelled Hospitals 2026)

क्या है सीजीएचएस और किसे मिलता है लाभ

केंद्र सरकार स्वास्थ्य योजना यानी सीजीएचएस केंद्र सरकार के कर्मचारियों, सेवानिवृत्त कर्मचारियों, सांसदों, कुछ स्वायत्त संस्थानों के कर्मचारियों और अन्य पात्र श्रेणियों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराती है। इस योजना के तहत लाभार्थियों को सरकारी डिस्पेंसरी, वेलनेस सेंटर और सूचीबद्ध निजी अस्पतालों में इलाज की सुविधा मिलती है।

सीजीएचएस समय-समय पर अस्पतालों का मूल्यांकन कर उन्हें सूची में शामिल या बाहर करता रहता है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य लाभार्थियों को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराना और अस्पतालों की गुणवत्ता सुनिश्चित करना होता है।

दिल्ली और एनसीआर के कई बड़े अस्पताल हुए शामिल

नई सूची में कई प्रसिद्ध मल्टीस्पेशियलिटी अस्पतालों को शामिल किया गया है। इनमें नारायणा सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, गुरुग्राम, अपोलो हॉस्पिटल, नोएडा, शारदा हॉस्पिटल, ग्रेटर नोएडा, यथार्थ वेलनेस सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, आरजी स्टोन यूरोलॉजी एंड लैप्रोस्कोपी हॉस्पिटल, पारस हॉस्पिटल, शांति गोपाल हॉस्पिटल, फेलिक्स हॉस्पिटल, प्रकाश हॉस्पिटल, पुष्पांजलि हॉस्पिटल, तिरथ राम शाह चैरिटेबल हॉस्पिटल, एसजीटी मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल, आस्था हॉस्पिटल, एपेक्स सिटी हॉस्पिटल, गुप्ता मल्टीस्पेशियलिटी हॉस्पिटल और कई अन्य अस्पताल शामिल हैं।

इन अस्पतालों के शामिल होने से लाभार्थियों को अपने घर के नजदीक इलाज कराने में सुविधा मिलेगी। (CGHS New Empanelled Hospitals 2026)

पूरी लिस्ट यहां देखें…CGHS New Empanelled Hospitals 2026

अलग-अलग शहरों को मिलेगा फायदा

नई सूची में दिल्ली के अलावा गाजियाबाद, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गुरुग्राम, फरीदाबाद और सोनीपत के अस्पतालों को भी शामिल किया गया है। इससे एनसीआर में रहने वाले लाखों सीजीएचएस लाभार्थियों को लंबी दूरी तय किए बिना इलाज कराने का विकल्प मिलेगा।

सीजीएचएस ने केवल उन्हीं अस्पतालों को सूची में शामिल किया है, जिन्होंने तय गुणवत्ता मानकों को पूरा किया है। सूची में अधिकांश अस्पताल एनएबीएच, एनएबीएल, क्यूसीआई अथवा एंट्री लेवल एनएबीएच मान्यता प्राप्त हैं।

एनएबीएच अस्पतालों की चिकित्सा सेवाओं, मरीजों की सुरक्षा, डॉक्टरों की योग्यता, आपातकालीन व्यवस्था, संक्रमण नियंत्रण और उपचार की गुणवत्ता का मूल्यांकन करता है। वहीं एनएबीएल प्रयोगशालाओं की गुणवत्ता और जांच की विश्वसनीयता सुनिश्चित करता है। (CGHS New Empanelled Hospitals 2026)

अस्पतालों को नियमों का करना होगा पालन

कार्यालय ज्ञापन में कहा गया है कि सभी सूचीबद्ध अस्पतालों को सीजीएचएस द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन करना होगा। इलाज, बिलिंग, मरीजों के रिकॉर्ड, कैशलेस सुविधा और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाएं निर्धारित नियमों के अनुसार संचालित होंगी।

यदि कोई अस्पताल तय मानकों का पालन नहीं करता है, तो उसके खिलाफ सीजीएचएस के नियमों के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए होगी बिलिंग

स्वास्थ्य मंत्रालय ने अस्पतालों को निर्देश दिया है कि सीजीएचएस लाभार्थियों के इलाज से जुड़े सभी क्रेडिट बिल नेशनल हेल्थ अथॉरिटी के एचईएम 2.0 पोर्टल के माध्यम से जमा किए जाएंगे।

इसके लिए अस्पतालों को लॉगिन आईडी और पासवर्ड उपलब्ध कराया जाएगा। इससे बिलों की जांच, भुगतान और रिकॉर्ड रखने की प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक पारदर्शी और डिजिटल होगी। (CGHS New Empanelled Hospitals 2026)

एम्पैनलमेंट से पहले कई स्तर पर होती है जांच

किसी भी अस्पताल को सीजीएचएस पैनल में शामिल करने से पहले उसकी सुविधाओं, विशेषज्ञ डॉक्टरों, चिकित्सा उपकरणों, आपातकालीन सेवाओं, ऑपरेशन थिएटर, गहन चिकित्सा इकाई, लैब और अन्य व्यवस्थाओं का मूल्यांकन किया जाता है।

इसके अलावा अस्पताल की मान्यता, प्रशासनिक क्षमता और निर्धारित नियमों के पालन की भी समीक्षा की जाती है। सभी आवश्यक शर्तें पूरी होने के बाद ही अस्पताल को पैनल में शामिल किया जाता है।

मरीजों को इलाज के अधिक विकल्प

नई सूची जारी होने के बाद लाभार्थियों के पास इलाज के लिए अधिक विकल्प उपलब्ध होंगे। कई ऐसे क्षेत्रों में भी अस्पताल सूची में शामिल किए गए हैं, जहां पहले सीमित विकल्प थे।

दिल्ली, पश्चिमी दिल्ली, पूर्वी दिल्ली, रोहिणी, बुराड़ी, द्वारका के साथ-साथ गाजियाबाद, इंदिरापुरम, वैशाली, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गुरुग्राम और सोनीपत के मरीजों को अपने नजदीक उपचार कराने की सुविधा मिलेगी। (CGHS New Empanelled Hospitals 2026)

चिकन नेक से LAC तक, पूर्वोत्तर में जनरल धीरज सेठ ने तीन अहम कोर की तैयारियों का लिया जायजा

General Dhiraj Seth Gajraj Corps
Army Chief General Dhiraj Seth Reviews Operational Preparedness of Tezpur-Based Gajraj Corps Under Eastern Command (Pic: Indian Army)

General Dhiraj Seth Gajraj Corps: भारतीय सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ ने गुरुवार को पूर्वी कमान के तहत आने वाली तेजपुर स्थित 4 कोर (IV Corps) का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने कोर की ऑपरेशनल तैयारियों, युद्धक क्षमता और पूर्वोत्तर क्षेत्र की मौजूदा सुरक्षा स्थिति की विस्तृत समीक्षा की। सेना प्रमुख ने वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक कर सीमा सुरक्षा, आधुनिक सैन्य तकनीकों के उपयोग और विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच तालमेल से जुड़े पहलुओं की जानकारी ली।

इससे पहले जनरल धीरज सेठ ने पश्चिम बंगाल के सुकना स्थित त्रिशक्ति कोर (XXXIII Corps) और नागालैंड के दीमापुर स्थित स्पीयर कोर (III Corps) का दौरा किया था।

General Dhiraj Seth Gajraj Corps: गजराज कोर पूर्वोत्तर की सुरक्षा का अहम स्तंभ

4 कोर को गजराज कोर के नाम से जाना जाता है। यह भारतीय सेना की सबसे महत्वपूर्ण फॉर्मेशन में से एक मानी जाती है। इसका मुख्यालय असम के तेजपुर में स्थित है। इस कोर की जिम्मेदारी असम के बड़े हिस्से और अरुणाचल प्रदेश के उन इलाकों की सुरक्षा है, जो वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के नजदीक हैं।

इस कोर के तहत मिसामारी स्थित 71 माउंटेन डिवीजन, रंगिया स्थित 21 माउंटेन डिवीजन (रेड हॉर्न डिवीजन) और अरुणाचल प्रदेश के बोमडिला के पास रूपा स्थित 5 माउंटेन डिवीजन (बॉल ऑफ फायर डिवीजन) आती हैं। इनमें से खास तौर पर 5 माउंटेन डिवीजन एलएसी के नजदीक तैनात है और संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों की सुरक्षा संभालती है।

ऑपरेशनल तैयारियों की दी जानकारी

दौरे के दौरान सेना प्रमुख को पूर्वी कमान के अधिकारियों ने मौजूदा सुरक्षा स्थिति, सीमा पर तैनाती, ऑपरेशनल तैयारियों और सैन्य क्षमता बढ़ाने के लिए चल रही विभिन्न परियोजनाओं की जानकारी दी।

अधिकारियों ने बताया कि गजराज कोर अपने जिम्मेदारी वाले क्षेत्र में शांति, स्थिरता और सुरक्षित माहौल बनाए रखने के लिए लगातार काम कर रही है। सेना प्रमुख ने इन प्रयासों की समीक्षा की और क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी ली।

नागरिक प्रशासन और केंद्रीय बलों के साथ बेहतर तालमेल

सेना अधिकारियों ने जनरल धीरज सेठ को बताया कि गजराज कोर राज्य सरकार, जिला प्रशासन और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के साथ लगातार कॉर्डिनेशन बनाकर काम कर रही है।

इस कॉर्डिनेशन के तहत विकास कार्यों में सहयोग, सामुदायिक संपर्क कार्यक्रम, स्थानीय प्रशासन को सहायता और जरूरत पड़ने पर राहत कार्यों में भागीदारी शामिल है। सेना का कहना है कि सीमावर्ती इलाकों में स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल से सुरक्षा व्यवस्था और मजबूत होती है।

असम और मेघालय में आंतरिक सुरक्षा में निभाई अहम भूमिका

सेना प्रमुख ने गजराज कोर की सराहना करते हुए कहा कि इस फॉर्मेशन ने असम और मेघालय में आंतरिक सुरक्षा बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने प्राकृतिक आपदाओं और मानवीय सहायता अभियानों के दौरान कोर की त्वरित प्रतिक्रिया की भी प्रशंसा की। बाढ़, भूस्खलन और अन्य आपात स्थितियों में सेना द्वारा स्थानीय प्रशासन को दी गई सहायता की जानकारी भी उन्हें दी गई।

जवानों से मुलाकात कर बढ़ाया उत्साह

दौरे के दौरान जनरल धीरज सेठ ने अधिकारियों और जवानों से भी बातचीत की। उन्होंने सैनिकों के उच्च मनोबल, पेशेवर कार्यशैली और कर्तव्य के प्रति समर्पण की सराहना की।

उन्होंने कहा कि कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और चुनौतीपूर्ण वातावरण में तैनात सैनिकों की भूमिका राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने सभी रैंकों से हर परिस्थिति के लिए तैयार रहने का आह्वान किया।

ड्रोन के इस्तेमाल पर जोर

सेना प्रमुख ने गजराज कोर द्वारा आधुनिक तकनीकों को अपनाने की भी सराहना की। अधिकारियों ने उन्हें बताया कि ऑपरेशनल क्षमता बढ़ाने के लिए ड्रोन, आधुनिक निगरानी प्रणालियों और अन्य उभरती तकनीकों का उपयोग लगातार बढ़ाया जा रहा है।

उन्हें भारतीय वायुसेना के साथ आयोजित जॉइंट एयरबोर्न एक्सरसाइज की जानकारी भी दी गई, जिनका उद्देश्य विभिन्न सेनाओं के बीच तालमेल और संयुक्त अभियान क्षमता को मजबूत करना है।

जनरल धीरज सेठ ने अधिकारियों और जवानों से कहा कि बदलते सुरक्षा माहौल में केवल पारंपरिक सैन्य क्षमता पर्याप्त नहीं है। नई तकनीकों, तेज सूचना साझा करने की व्यवस्था और विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर कॉर्डिनेशन की भी उतनी ही आवश्यकता है।

उन्होंने सभी सैनिकों से मिशन पर पूरा ध्यान केंद्रित रखने, संयुक्त कार्य संस्कृति को मजबूत करने और हर समय उच्च स्तर की ऑपरेशनल तैयारियां बनाए रखने को कहा।

पूर्वी कमान के अन्य महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों का भी किया दौरा

गजराज कोर के दौरे से पहले सेना प्रमुख ने सुकना स्थित त्रिशक्ति कोर का दौरा किया था, जहां उन्हें चिकन नेक यनी सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा व्यवस्था की जानकारी दी गई।

सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है। पश्चिम बंगाल में स्थित यह संकरा भूभाग मुख्य भारत को पूर्वोत्तर के आठ राज्यों से जोड़ता है। सबसे संकरे हिस्से में इसकी चौड़ाई लगभग 20 किलोमीटर से भी कम है। इसी मार्ग से सड़क, रेल और सैन्य रसद पूर्वोत्तर राज्यों तक पहुंचती है।

हाल के वर्षों में इस क्षेत्र में राष्ट्रीय राजमार्गों का विस्तार, भूमिगत रेलवे लाइन की योजना, सीमा सुरक्षा बल के लिए अतिरिक्त भूमि उपलब्ध कराना और मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने जैसे कई कदम उठाए गए हैं। बागडोगरा हवाई अड्डा और हासीमारा वायुसेना स्टेशन भी इस पूरे क्षेत्र की सैन्य तैयारियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

स्पीयर कोर में दिया ‘विजय’ का मंत्र

पूर्वी कमान के दौरे के दौरान सेना प्रमुख ने दीमापुर स्थित स्पीयर कोर का भी निरीक्षण किया। वहां उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक में सेना के लिए अपना विजन “विजय” साझा किया।

“विजय” का अर्थ है विजिलेंस (सतर्कता), इनोवेशन (नवाचार), जॉइंटनेस (संयुक्तता), आत्मनिर्भरता और योद्धा फर्स्ट। उन्होंने कहा कि इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर भारतीय सेना भविष्य की चुनौतियों के लिए खुद को तैयार कर रही है।

उन्होंने अधिकारियों से कहा कि आधुनिक युद्ध अब मल्टी डाइमेंशन हो चुका है। इसलिए तकनीक, संयुक्त अभियान क्षमता, आत्मनिर्भर सैन्य प्रणालियों और बेहतर कॉर्डिनेशन पर लगातार काम करना जरूरी है।

यह दौरा जनरल धीरज सेठ के सेना प्रमुख बनने के बाद पूर्वी क्षेत्र का दूसरा बड़ा फील्ड निरीक्षण था। इससे पहले वह जम्मू-कश्मीर के पुंछ, राजौरी और सुंदरबनी सेक्टर में स्थित व्हाइट नाइट कोर (16 कोर) के फॉरवर्ड इलाकों का दौरा कर वहां की ऑपरेशनल तैयारियों की समीक्षा कर चुके हैं। (General Dhiraj Seth Gajraj Corps)

भविष्य के युद्ध में सड़कें होंगी सबसे बड़ा हथियार! रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बताया क्यों जरूरी है बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर

BRO Strategic Infrastructure Conclave
Border Infrastructure Will Remain Critical in Future Warfare, Says Defence Minister Rajnath Singh at BRO Strategic Infrastructure Conclave (Photo: PIB)

BRO Strategic Infrastructure Conclave: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गुरुवार को कहा कि आधुनिक युद्ध तेजी से बदल रहा है। सेनाओं में अत्याधुनिक मिसाइलें, ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सिस्टम और लंबी दूरी तक मार करने वाले हथियार शामिल हो रहे हैं। इसके बावजूद सीमा तक पहुंचाने वाली सड़कें, सुरंगें, हवाई पट्टियां और बंदरगाह आने वाले समय में भी उतने ही महत्वपूर्ण रहेंगे।

उन्होंने कहा कि किसी भी युद्ध का नतीजा केवल आधुनिक हथियार तय नहीं करते। सैनिकों, हथियारों और रसद को समय पर सीमा तक पहुंचाने वाला मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर भी उतना ही जरूरी होता है। इसलिए सीमा क्षेत्रों में सड़क, सुरंग, पुल, हवाई पट्टी और अन्य रणनीतिक ढांचे का विकास राष्ट्रीय सुरक्षा का अहम हिस्सा है।

BRO Strategic Infrastructure Conclave: सीमा तक पहुंचने वाली सड़क भी युद्ध का पहला मोर्चा

नई दिल्ली में आयोजित दो दिवसीय बॉर्डर रोड्स ऑर्गेनाइजेशन (बीआरओ) स्ट्रैटेजिक इंफ्रास्ट्रक्चर कॉन्क्लेव में बोलते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि कई बार युद्ध का पहला मोर्चा सीमा पर नहीं, बल्कि उस सड़क पर होता है जो सैनिकों को सीमा तक पहुंचाती है। यदि सड़क मजबूत और हर मौसम में चालू रहने वाली हो तो सेना कम समय में अपनी तैनाती कर सकती है।

उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति ऐसी सड़क बनाता है, वह भी राष्ट्रीय सुरक्षा में उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है जितनी सीमा पर तैनात सैनिक निभाते हैं। (BRO Strategic Infrastructure Conclave)

BRO Strategic Infrastructure Conclave
Border Infrastructure Will Remain Critical in Future Warfare, Says Defence Minister Rajnath Singh at BRO Strategic Infrastructure Conclave (Photo: PIB)

बीआरओ ने बदली अपनी पहचान

राजनाथ सिंह ने कहा कि पिछले साढ़े छह दशकों में बीआरओ ने केवल सड़क निर्माण एजेंसी की भूमिका तक खुद को सीमित नहीं रखा। आज यह दुनिया की प्रमुख रणनीतिक इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने वाली संस्थाओं में शामिल है।

उन्होंने कहा कि अटल टनल, सेला टनल और उमलिंग ला सड़क जैसी परियोजनाएं बीआरओ की इंजीनियरिंग क्षमता और कठिन परिस्थितियों में काम करने की योग्यता का प्रमाण हैं। ऊंचे पहाड़ों, बर्फबारी और बेहद कठिन मौसम के बीच भी बीआरओ के कर्मचारियों ने लगातार काम कर यह साबित किया है कि मजबूत इच्छाशक्ति के साथ बड़ी से बड़ी चुनौती का सामना किया जा सकता है। (BRO Strategic Infrastructure Conclave)

नई तकनीकों का तेजी से हो रहा इस्तेमाल

रक्षा मंत्री ने कहा कि बीआरओ अब आधुनिक तकनीकों को तेजी से अपना रहा है। विशेष रूप से टनल निर्माण तकनीक ने देश में बड़ा बदलाव लाया है। पहले जहां सुरंगें मुख्य रूप से शहरों में मेट्रो परियोजनाओं तक सीमित थीं, वहीं अब इन्हीं तकनीकों का इस्तेमाल पहाड़ी क्षेत्रों में राष्ट्रीय राजमार्ग और सामरिक सड़कों के निर्माण में भी किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि दुनिया के सबसे कठिन इलाकों में जिस रफ्तार से बीआरओ सड़कें और राजमार्ग बना रहा है, वह आधुनिक तकनीक और मानव क्षमता के बेहतर तालमेल का उदाहरण है।

सीमा के गांवों तक पहुंच रही बेहतर कनेक्टिविटी

राजनाथ सिंह ने कहा कि किसी भी सभ्यता के विकास में कनेक्टिविटी की अहम भूमिका होती है। सड़क, रेल, हवाई और डिजिटल संपर्क किसी भी क्षेत्र के विकास की नींव हैं।

उन्होंने कहा कि सरकार का प्रयास है कि देश के किसी भी दूरदराज इलाके में रहने वाला नागरिक खुद को मुख्यधारा से अलग महसूस न करे। इसी सोच के तहत सीमावर्ती गांवों को मजबूत किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि जिन गांवों को पहले देश का आखिरी गांव कहा जाता था, उन्हें अब वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम के तहत देश का पहला गांव बनाने की दिशा में काम किया जा रहा है। इन गांवों में सड़क, बिजली, संचार, स्वास्थ्य और अन्य सुविधाओं का तेजी से विस्तार किया जा रहा है। (BRO Strategic Infrastructure Conclave)

इंफ्रास्ट्रक्चर केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं

रक्षा मंत्री ने कहा कि मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना केवल सरकार का काम नहीं है। इसमें उद्योग, शिक्षण संस्थान, इंजीनियर और प्रशासन सभी की समान भूमिका है।

उन्होंने उद्योग जगत से नई तकनीक विकसित करने, शैक्षणिक संस्थानों से शोध बढ़ाने, इंजीनियरों से नए समाधान तैयार करने और प्रशासन से उन्हें समय पर लागू करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि सभी पक्ष मिलकर ही ऐसा माहौल बना सकते हैं जिसमें बेहतर गुणवत्ता वाले रणनीतिक इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण हो। (BRO Strategic Infrastructure Conclave)

BRO Strategic Infrastructure Conclave
Rajnath Singh released three flagship BRO publications ‘Path Pradarshak’, ‘Oonchi Sadken’ and ‘Path Vikas’. (Photo: PIB)

बीआरओ में बढ़ रहा डिजिटल बदलाव

कार्यक्रम में बीआरओ के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल हरपाल सिंह ने कहा कि आज केवल सड़क बनाना ही पर्याप्त नहीं है। अब यह भी जरूरी है कि योजना कितनी बेहतर बनाई गई, काम कितनी तेजी से पूरा हुआ, उसकी निगरानी कैसे हुई और रखरखाव कितना प्रभावी है।

उन्होंने बताया कि बीआरओ संगठन में तकनीक आधारित बदलाव किए जा रहे हैं। डिजिटल प्लानिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित समाधान, आधुनिक निर्माण तकनीक, मशीनों का अधिक इस्तेमाल और उद्योग तथा शिक्षण संस्थानों के साथ सहयोग बढ़ाया जा रहा है।

परियोजना प्रबंधन और भर्ती के लिए शुरू हुए नए डिजिटल प्लेटफॉर्म

कॉन्क्लेव के दौरान रक्षा मंत्री ने बीआरओ के दो नए डिजिटल प्लेटफॉर्म भी शुरू किए। इनमें एक परियोजना प्रबंधन से जुड़ा है, जबकि दूसरा भर्ती प्रक्रिया को डिजिटल बनाने के लिए तैयार किया गया है।

बीआरओ का कहना है कि इन प्लेटफॉर्म के जरिए परियोजनाओं की निगरानी, समयबद्ध कार्यान्वयन और संगठन के आधुनिकीकरण में मदद मिलेगी। (BRO Strategic Infrastructure Conclave)

BRO Strategic Infrastructure Conclave
Photo: PIB

परियोजनाओं को मिला सम्मान

कार्यक्रम में विभिन्न बीआरओ परियोजनाओं को बेहतर प्रदर्शन और उत्कृष्ट निर्माण कार्य के लिए सम्मानित भी किया गया। इसके अलावा बीआरओ की तीन नई प्रकाशन पुस्तिकाएं ‘पथ प्रदर्शक’, ‘ऊंची सड़कें’ और ‘पथ विकास’ जारी की गईं।

इन प्रकाशनों में बीआरओ की प्रमुख उपलब्धियां, नई इंजीनियरिंग तकनीक, कार्य प्रणाली और संगठन की विकास यात्रा को शामिल किया गया है। कार्यक्रम के दौरान बीआरओ का आधिकारिक एंथम भी जारी किया गया, जिसे संगठन के कर्मचारियों के योगदान को समर्पित किया गया। (BRO Strategic Infrastructure Conclave)

अब दुश्मन हैक नहीं कर पाएगा भारत के सीक्रेट मैसेज! DRDO ने पूरे किए क्वांटम कम्युनिकेशन के मिलिट्री ट्रायल्स

DRDO Quantum Communication
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DRDO Quantum Communication: भारत ने सिक्योर मिलिट्री कम्युनिकेशन के क्षेत्र में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने फाइबर बेस्ड क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन (क्यूकेडी) सिस्टम के मिलिट्री फील्ड ट्रायल सफलतापूर्वक पूरे कर लिए हैं। यह सिस्टम ऐसा सुरक्षित कम्युनिकेशन नेटवर्क तैयार करता है, जिसे रास्ते में कोई सुन नहीं सकता और न ही उसमें सेंध लगा सकता है। डीआरडीओ ने इस तकनीक को बेंगलुरु की भारतीय कंपनी टैकबिट लैब्स के साथ मिलकर तैयार किया है।

सूत्रों के मुताबिक, इसका परीक्षण मिलिट्री इकोसिस्टम में किया गया, वहीं यह सिस्टम भविष्य में भारत के स्ट्रेटेजिक कम्युनिकेशन नेटवर्क की सुरक्षा बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएगा। यह तकनीक बड़े पैमाने पर मल्टी-हॉप क्वांटम नेटवर्क बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

DRDO Quantum Communication: क्या है क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम

आमतौर पर जब कोई संदेश इंटरनेट या किसी सुरक्षित नेटवर्क के जरिए भेजा जाता है तो उसे एन्क्रिप्शन यानी विशेष कोड में बदल दिया जाता है। इस कोड को खोलने के लिए एक डिजिटल “की” यानी चाबी की जरूरत होती है।

यहीं से क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन (क्यूकेडी) की भूमिका शुरू होती है। यह तकनीक उस डिजिटल चाबी को एक स्थान से दूसरे स्थान तक इस तरह भेजती है कि अगर कोई तीसरा व्यक्ति बीच में उसे पकड़ने या पढ़ने की कोशिश करे, तो सिस्टम तुरंत इसकी जानकारी दोनों अधिकृत पक्षों को दे देता है।

यानी संदेश चोरी होने से पहले ही पता चल जाता है कि नेटवर्क में किसी ने हस्तक्षेप किया है।

यह तकनीक सामान्य एन्क्रिप्शन से कैसे है अलग

आज दुनिया में ज्यादातर सिक्योर मैथेमेटिकल कम्युनिकेशन एन्क्रिप्शन पर बेस्ड हैं। बैंकिंग, मिलिट्री नेटवर्क, सरकारी डेटा और इंटरनेट सेवाओं में इसी प्रकार की सुरक्षा का इस्तेमाल होता है।

लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में आने वाले क्वांटम कंप्यूटर इतनी अधिक क्षमता वाले होंगे कि वे आज इस्तेमाल हो रहे कई एन्क्रिप्शन सिस्टम को काफी तेजी से तोड़ सकेंगे।

इसी खतरे को देखते हुए दुनिया के कई देश क्वांटम कम्युनिकेशन पर काम कर रहे हैं।

क्यूकेडी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसकी सुरक्षा केवल गणित पर आधारित नहीं होती, बल्कि क्वांटम फिजिक्स के नियमों पर आधारित होती है। इसलिए यदि कोई बीच में जानकारी चुराने की कोशिश करता है तो स्वयं क्वांटम अवस्था बदल जाती है और सिस्टम तुरंत अलर्ट कर देता है।

कैसे काम करता है ये सिस्टम

क्वांटम कम्युनिकेशन में जानकारी भेजने के लिए फोटॉन यानी प्रकाश के अत्यंत छोटे कणों का इस्तेमाल किया जाता है। इन फोटॉनों में विशेष प्रकार की क्वांटम जानकारी मौजूद होती है। यदि कोई व्यक्ति इन्हें रास्ते में मापने या कॉपी करने की कोशिश करता है तो इनकी मूल अवस्था बदल जाती है।

यही बदलाव सिक्योरिटी सिस्टम को बता देता है कि किसी ने कम्युनिकेशन में दखल देने की कोशिश की है। इसके बाद पूरी की दोबारा तैयार की जाती है और संदिग्ध कम्युनिकेशन रिसीव नहीं होता। यही वजह है कि इसे दुनिया की सबसे सिक्योर कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी में से एक माना जाता है। (DRDO Quantum Communication)

डीआरडीओ ने किस तरह का सिस्टम तैयार किया

डीआरडीओ ने जिस सिस्टम का परीक्षण किया है, वह फाइबर बेस्ड क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम है। यह तकनीक पहले से मौजूद ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क के साथ काम कर सकती है। नई केबल बिछाने की जरूरत कम पड़ती है और मौजूदा कम्युनिकेशन स्ट्रक्चर का इस्तेमाल किया जा सकता है।

डीआरडीओ का कहना है कि यह सिस्टम केवल एक लिंक तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आगे चलकर कई सुरक्षित नेटवर्क को जोड़ने वाले मल्टी-हॉप नेटवर्क का आधार बनेगा।

टैकबिट लैब्स की रही अहम भूमिका

इस परियोजना में डीआरडीओ के साथ बेंगलुरु स्थित टैकबिट लैब्स ने भी काम किया है। यह भारतीय कंपनी क्वांटम साइबर सुरक्षा, क्वांटम रैंडम नंबर जेनरेटर और पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी जैसे क्षेत्रों में काम करती है।

डीआरडीओ के अनुसार, प्रयोगशाला स्तर पर विकसित तकनीक को वास्तविक उत्पाद में बदलने का काम इसी साझेदारी के माध्यम से किया गया। (DRDO Quantum Communication)

डीआरडीओ कई सालों से कर रहा है क्वांटम तकनीक पर काम

क्वांटम तकनीक पर शोध को आगे बढ़ाने के लिए डीआरडीओ ने मई 2025 में दिल्ली के मेटकॉफ हाउस परिसर में क्वांटम टेक्नोलॉजी रिसर्च सेंटर (क्यूटीआरसी) की स्थापना की थी। इस केंद्र में सुरक्षित क्वांटम संचार, क्वांटम सेंसिंग और पोस्ट-क्वांटम साइबर सुरक्षा से जुड़े कई आधुनिक प्रयोग किए जा रहे हैं।

इस रिसर्च सेंटर में सिंगल फोटॉन सोर्स की जांच, लेजर कैरेक्टराइजेशन, क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन तकनीक का परीक्षण, अल्ट्रा स्मॉल एटॉमिक क्लॉक, एटॉमिक मैग्नेटोमीटर और अन्य अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं बनाई गई हैं। यहां वैज्ञानिक भविष्य के सुरक्षित सैन्य नेटवर्क के लिए नई तकनीकों पर लगातार काम कर रहे हैं।

पिछले कई सालों से डीआरडीओ लगातार क्वांटम कम्युनिकेशन पर अनुसंधान कर रहा है। वर्ष 2022 में डीआरडीओ ने प्रयागराज और विंध्याचल के बीच लगभग 100 किलोमीटर से अधिक की दूरी पर देश का पहला इंटरसिटी क्वांटम कम्युनिकेशन लिंक सफलतापूर्वक प्रदर्शित किया था। उस समय पहली बार सामान्य टेलीकॉम फाइबर के जरिए सुरक्षित क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन का प्रदर्शन किया गया था।

इसके बाद आईआईटी दिल्ली के साथ मिलकर डीआरडीओ ने एक किलोमीटर से अधिक दूरी तक फ्री स्पेस ऑप्टिकल लिंक के जरिए एंटैंगलमेंट आधारित सुरक्षित संचार का सफल प्रदर्शन किया था।

उस परीक्षण के दौरान क्वांटम बिट एरर रेट सात प्रतिशत से कम रही, जिसे इस प्रकार के परीक्षणों में अच्छा माना जाता है। सुरक्षित की तैयार करने की गति भी सफल रही थी।

आईआईटी दिल्ली के साथ मिला बड़ा अनुभव

डीआरडीओ के डीआरडीओ-इंडस्ट्री-अकादमिया सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के तहत आईआईटी दिल्ली में क्वांटम कम्युनिकेशन पर लगातार अनुसंधान चल रहा है। पिछले साल वैज्ञानिकों ने क्वांटम साइबर सिक्योरिटी से जुड़ा सफल प्रदर्शन किया था। इसमें यह दिखाया गया कि भविष्य में क्वांटम नेटवर्क और क्वांटम इंटरनेट जैसे सिस्टम विकसित किए जा सकते हैं। (DRDO Quantum Communication)

एंटैंगलमेंट आधारित क्यूकेडी क्या होती है

डीआरडीओ जिस तकनीक पर काम कर रहा है, उसमें क्वांटम एंटैंगलमेंट का इस्तेमाल भी शामिल है। इसे सामान्य क्यूकेडी की तुलना में अधिक सुरक्षित माना जाता है।

एंटैंगलमेंट ऐसी अवस्था होती है जिसमें दो फोटॉन एक-दूसरे से विशेष रूप से जुड़े रहते हैं। चाहे दोनों के बीच कितनी भी दूरी हो, यदि कोई तीसरा व्यक्ति उनमें से किसी एक को छूने या मापने की कोशिश करता है तो दोनों की क्वांटम अवस्था प्रभावित हो जाती है।

यही बदलाव अधिकृत उपयोगकर्ताओं को तुरंत बता देता है कि कम्युनिकेशन के दौरान किसी ने दखल देने की कोशिश की है। इस कारण एंटैंगलमेंट बेस्ड सिस्टम को भविष्य की सुरक्षित संचार तकनीकों में सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

पोस्ट-क्वांटम साइबर सुरक्षा क्यों बन रही है जरूरी

दुनिया भर में साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ एक नए खतरे की चर्चा कर रहे हैं, जिसे “हार्वेस्ट नाउ, डिक्रिप्ट लेटर” कहा जाता है। इसका मतलब है कि कोई हमलावर आज सुरक्षित डेटा चुरा सकता है और भविष्य में जब उसके पास शक्तिशाली क्वांटम कंप्यूटर होंगे, तब उस डेटा को पढ़ सकता है।

इसी खतरे को देखते हुए दुनिया के कई देश पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी और क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन जैसी तकनीकों पर तेजी से काम कर रहे हैं। डीआरडीओ का यह नया सिस्टम भी इसी दिशा में भारत की तैयारी का हिस्सा माना जा रहा है। (DRDO Quantum Communication)

IAF का बड़ा फैसला! MiG-29 फाइटर जेट के लिए स्वदेशी एवियोनिक सिस्टम भारत में बनाने की तैयारी

MiG-29 Avionics Indigenous Development
(Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

MiG-29 Avionics Indigenous Development: भारतीय वायुसेना ने अपने पुराने हो चुके मिग-29 फाइटर जेट्स के मेंटेनेंस और ऑपरेशनल क्षमता को मजबूत करने के लिए इसमें इस्तेमाल होने वाले आठ महत्वपूर्ण एवियोनिक एग्रीगेट्स के स्वदेशी विकास के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया है। इसका उद्देश्य उन विदेशी इक्विपमेंटों का भारतीय विकल्प तैयार करना है, क्योंकि उनकी उपलब्धता समय के साथ मुश्किल होती जा रही है।

इस प्रोजेक्ट के तहत भारतीय कंपनियों से मौजूदा विदेशी सिस्टम का फंक्शनल रिप्लेसमेंट बनाने की मांग की गई है।

MiG-29 Avionics Indigenous Development: क्यों उठाना पड़ा यह कदम

मिग-29 भारतीय वायुसेना का एक महत्वपूर्ण मल्टीरोल फाइटर जेट है। यह विमान 1980 के दशक के अंत में वायुसेना में शामिल हुआ था और बाद में इसे मिग-29 यूपीजी मानक तक अपग्रेड किया गया। इन विमानों में आधुनिक रडार, डिजिटल कॉकपिट, बेहतर इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और हवा में ईंधन भरने जैसी सुविधाएं जोड़ी गईं।

इसके बावजूद विमान के कई इलेक्ट्रॉनिक इक्विपमेंट पुराने हो चुके हैं। इनमें इस्तेमाल होने वाले कई पुर्जों का उत्पादन बंद हो चुका है या उनकी सप्लाई सीमित हो गई है। ऐसे में स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता और रखरखाव बड़ी चुनौती बन गई है।

इसी समस्या को देखते हुए वायुसेना अब विदेशी इक्विपमेंटों की नकल करने के बजाय नई पीढ़ी के भारतीय इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम डेवलप करना चाहती है।

पूरी तकनीक बदलने की योजना

पुणे स्थित वायुसेना के बेस रिपेयर डिपो (9 बीआरडी) की तरफ से यह ईओआई जारी किया गया है। इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि भारतीय वायुसेना पारंपरिक तरीके से अलग रास्ता अपना रही है। इससे पहले किसी खराब इक्विपमेंट का वैसा ही दूसरा इक्विपमेंट तैयार करने का कोशिश की जाती थी। लेकिन अब वायुसेना ने टेक्नोलॉजी स्पेसिफिक इंडिजनाइजेशन मॉडल अपनाया है। इसमें समान तकनीक वाले कई इक्विपमेंट्स को एक ग्रुप में रखकर उनके लिए एक साझा हार्डवेयर प्लेटफॉर्म डेवलप किया जाएगा।

इसके बाद अलग-अलग काम केवल सॉफ्टवेयर के जरिए कराए जाएंगे। इसे सॉफ्टवेयर डिफाइंड एवियोनिक सिस्टम कहा जाता है। इससे भविष्य में किसी एक इक्विपमेंट के खराब होने पर पूरा सिस्टम बदलने की जरूरत नहीं पड़ेगी। केवल सॉफ्टवेयर या संबंधित मॉड्यूल अपडेट करके काम किया जा सकेगा। MiG-29 Avionics Indigenous Development

किन आठ सिस्टम को भारत में किया जाएगा तैयार

ईओआई में जिन आठ प्रमुख एवियोनिक एग्रीगेट्स को शामिल किया गया है, उनमें रडार के लिए पावर और सिंक्रोनाइजेशन सिस्टम, रिसीवर-एक्साइटर यूनिट, ट्रांसमीटर यूनिट, कैमरा इलेक्ट्रॉनिक यूनिट, वोल्टेज रेक्टिफायर, एयरबोर्न प्रोटेक्टेड रिकॉर्डर, कोड कन्वर्टर और रडार ट्रांसमीटर शामिल हैं।

इनमें से कुछ इक्विपमेंट सीधे रडार ऑपरेशन से जुड़े हैं, जबकि कुछ फ्लाइट रिकॉर्डिंग, पावर मैनेजमेंट और सेंसर डेटा प्रोसेसिंग का काम करते हैं। कई सिस्टम को वायुसेना ने मिशन क्रिटिकल कैटेगरी में रखा है, यानी इनके बिना विमान का सुरक्षित ऑपरेशन संभव नहीं होगा। MiG-29 Avionics Indigenous Development

रडार सिस्टम को मिलेगा नया भारतीय विकल्प

प्रोजेक्ट में शामिल सबसे महत्वपूर्ण सिस्टम रडार से जुड़े हैं। एक यूनिट रडार के विभिन्न हिस्सों को स्टेबल इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई और सिंक्रोनाइजेशन सिग्नल उपलब्ध कराती है। दूसरी यूनिट रेडियो फ्रीक्वेंसी सिग्नलों को रिसीव और प्रोसेस करती है। तीसरी यूनिट रडार ट्रांसमीटर के लिए हाई पावर सिग्नल तैयार करती है। इन सभी का स्वदेश में डेवलपमेंट होने से भविष्य में विदेशी सप्लाई पर निर्भरता कम होगी।

कॉकपिट रिकॉर्डर और फ्लाइट डेटा सिस्टम भी होंगे स्वदेशी

प्रोजेक्ट में एयरबोर्न प्रोटेक्टेड रिकॉर्डर भी शामिल है। यही सिस्टम उड़ान के दौरान विमान के विभिन्न पैरामीटर और कॉकपिट की आवाज रिकॉर्ड करता है। किसी दुर्घटना या तकनीकी जांच के समय यही रिकॉर्डर सबसे महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराता है।

इसके अलावा कैमरा इलेक्ट्रॉनिक यूनिट और वोल्टेज रेक्टिफायर जैसे इक्विपमेंट भी डेवलप किए जाएंगे, जो मल्टी फंक्शन डिस्प्ले और डिजिटल वीडियो रिकॉर्डिंग सिस्टम को बिजली उपलब्ध कराते हैं। MiG-29 Avionics Indigenous Development

मॉडर्न ओपन आर्किटेक्चर पर बनेगा पूरा सिस्टम

भारतीय वायुसेना ने इस प्रोजेक्ट में मॉड्यूलर ओपन सिस्टम अप्रोच (मोसा) अपनाने का फैसला किया है। इस मॉडल में पूरा हार्डवेयर ओपन वीपीएक्स प्लेटफॉर्म पर आधारित होगा। इससे भविष्य में किसी भी मॉड्यूल को आसानी से बदला या अपग्रेड किया जा सकेगा।

सॉफ्टवेयर का विकास अंतरराष्ट्रीय डीओ-178सी स्टैंडर्ड के अनुसार होगा, जबकि हार्डवेयर डीओ-254 सर्टिफिकेशन प्रक्रिया का पालन करेगा। यही स्टैंडर्ड दुनिया के आधुनिक सैन्य और नागरिक विमानों में इस्तेमाल किए जाते हैं।

नई तकनीक तैयार करने से पहले भारतीय कंपनियों को पुराने विदेशी इक्विपमेंटों का विस्तृत तकनीकी अध्ययन करना होगा। इसके तहत प्रत्येक इक्विपमेंट की कार्यप्रणाली, इनपुट और आउटपुट सिग्नल, इंटरफेस, प्रदर्शन सीमा, फर्मवेयर और इलेक्ट्रॉनिक व्यवहार का विश्लेषण किया जाएगा। इसके बाद भारतीय कंपनियां ऐसा नया सिस्टम विकसित करेंगी जो पुराने इक्विपमेंट की सभी क्षमताओं को पूरा कर सके।

परीक्षण के लिए बनेगा विशेष टेस्ट बेड

वायुसेना ने इस प्रोजेक्ट में आधुनिक पीएक्सआईई आधारित टेस्ट बेड डेवलप करने की भी योजना बनाई है। इसमें लैबव्यू आधारित सॉफ्टवेयर का उपयोग किया जाएगा। यही प्लेटफॉर्म दुनिया की कई बड़ी एयरोस्पेस कंपनियां
टेस्टिंग और मेजरमेंट के लिए इस्तेमाल करती हैं।

नए तैयार सिस्टम की तुलना ऑरिजनल इक्विपमेंट से की जाएगी। इसके लिए दोनों पर समान टेस्ट वेक्टर चलाकर परिणामों का मिलान किया जाएगा। MiG-29 Avionics Indigenous Development

हर सिस्टम के बनेंगे तीन प्रोटोटाइप

वायुसेना ने प्रत्येक एवियोनिक एग्रीगेट के कम से कम तीन प्रोटोटाइप तैयार करने की शर्त रखी है। इनका इस्तेमाल डिजाइन सत्यापन, तकनीकी परीक्षण और सर्टिफिकेशन प्रक्रिया में किया जाएगा। सभी सिस्टम को सीईएमआईएलएसी, आरसीएमए और डीजीएक्यूए जैसी डिफेंस सर्टिफिकेशन एजेंसियों की मंजूरी लेनी होगी।

किन कंपनियों को मिलेगा मौका

इस प्रोजेक्ट में केवल भारतीय कंपनियां भाग ले सकेंगी। ऐसी कंपनियों को प्राथमिकता दी जाएगी जिनके पास एवियोनिक सिस्टम के डिजाइन, डेवलपमेंट, रिपेयर या ओवरहॉल का अनुभव हो। साथ ही उन्हें मिलिट्री एयरवर्थनेस मानकों की जानकारी भी होनी चाहिए। यदि कोई कंपनी किसी विदेशी तकनीकी साझेदार के साथ काम करना चाहती है तो उसे उसकी भूमिका भी स्पष्ट करनी होगी। MiG-29 Avionics Indigenous Development

मिग-29 बेड़े के लिए क्यों अहम है यह प्रोजेक्ट

भारतीय वायुसेना के पास इस समय लगभग 55 से 65 मिग-29 यूपीजी लड़ाकू विमान हैं। इनमें सिंगल-सीटर और ट्विन-सीटर ट्रेनर दोनों शामिल हैं। ये विमान मुख्य रूप से पंजाब के अदमपुर और गुजरात के जामनगर एयरबेस से संचालित तीन स्क्वाड्रनों में तैनात हैं। यह बेड़ा वायुसेना की एयर डिफेंस क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वहीं वायुसेना की योजना इसकी सर्विस लाइफ 40 साल से बढ़ाकर 50 साल करने की है।

भारतीय वायुसेना के लिए लड़ाकू विमानों की संख्या बनाए रखना इस समय बड़ी चुनौती है। वायुसेना की स्वीकृत क्षमता 42 फाइटर स्क्वाड्रन की है, लेकिन फिलहाल उसके पास केवल 29 से 31 स्क्वाड्रन ही सक्रिय हैं। मिग-21 लड़ाकू विमानों के चरणबद्ध रिटायर होने के बाद यह कमी और बढ़ गई है। ऐसे में मिग-29 जैसे विमानों की भूमिका और महत्वपूर्ण हो गई है। स्वदेशी तेजस एमके-2 लड़ाकू विमान के पूरी तरह सेवा में आने में अभी समय है। इसलिए वायुसेना चाहती है कि मिग-29 बेड़ा लंबे समय तक पूरी क्षमता के साथ सेवा में बना रहे। इसी वजह से इसके पुराने और दुर्लभ हो चुके एवियोनिक सिस्टम का स्वदेशी विकल्प तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की गई है, ताकि इन विमानों की ऑपरेशनल क्षमता प्रभावित न हो।

भारतीय वायुसेना इन विमानों को सेवा में बनाए रखने के लिए लगातार अपग्रेड और लाइफ एक्सटेंशन कार्यक्रम चला रही है। हाल के सालों में मिग-29 में एएसआरएएएम हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल, एचएसएलडी एमके-2 प्रिसीजन गाइडेड बम, स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो जैसी नई क्षमताएं जोड़ी गई हैं। (MiG-29 Avionics Indigenous Development)