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जयपुर में सप्त शक्ति कमांड ने मनाया 22वां स्थापना दिवस, पश्चिमी सीमा की सुरक्षा का है जिम्मा

Sapta Shakti Command Raising Day

Sapta Shakti Command Raising Day: भारतीय सेना की सप्त शक्ति कमांड ने बुधवार को जयपुर मिलिट्री स्टेशन में अपना 22वां स्थापना दिवस मनाया। इस कमांड की स्थापना 15 अप्रैल 2005 को हुई थी और यह भारतीय सेना की सातवीं और सबसे युवा कमांड मानी जाती है।

इस खास अवसर पर सप्त शक्ति कमांड के आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल मनजिंदर सिंह ने सभी रैंक्स, वेटरन्स, डिफेंस सिविलियंस और उनके परिवारों को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि पिछले कई सालों में इस कमांड ने अपनी मेहनत, साहस और समर्पण से एक मजबूत पहचान बनाई है। उन्होंने वर्तमान और पूर्व सैनिकों के योगदान को याद करते हुए उनके बलिदान को कमांड की सबसे बड़ी ताकत बताया।

स्थापना दिवस के दौरान आयोजित सैनिक सम्मेलन में चीफ ऑफ स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल पीएस शेखावत ने सभी सैनिकों को संबोधित किया। उन्होंने बताया कि सप्त शक्ति कमांड ने सेना की सोच के अनुसार अपनी तैयारियों को मजबूत किया है। मल्टी डोमेन ऑपरेशन और नई रणनीतियों को अपनाकर ऑपरेशनल क्षमता को बेहतर बनाया गया है।

उन्होंने सैनिकों के परिवारों, वेटरन्स और वीर नारियों के योगदान को भी याद किया और उनके सहयोग के लिए आभार जताया। कार्यक्रम के दौरान सभी रैंक्स को अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित रहने और देश की सुरक्षा के लिए तैयार रहने का संदेश दिया गया।

पश्चिमी सीमा पर मजबूत मौजूदगी

पिछले 22 सालों में सप्त शक्ति कमांड ने पश्चिमी सीमाओं पर अपनी मजबूत मौजूदगी कायम की है। ‘सर्वदा विजयी भव’ के मंत्र के साथ काम करते हुए इस कमांड ने सीमा सुरक्षा के साथ-साथ ऑपरेशनल तैयारी को भी उच्च स्तर पर बनाए रखा है। नियमित ट्रेनिंग, नई रणनीतियों को अपनाना और आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल इसकी कार्यशैली का हिस्सा रहा है।

कमांड ने समय के साथ खुद को एक टेक्नोलॉजी आधारित, तेज और प्रभावी फोर्स के रूप में तैयार किया है, जो बदलते युद्ध के माहौल के अनुसार खुद को ढाल रही है।

स्थापना दिवस के मौके पर प्रेरणा स्थल पर एक विशेष पुष्पांजलि कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस दौरान चीफ ऑफ स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल पीएस शेखावत और वेटरन्स ने देश के लिए बलिदान देने वाले सैनिकों को श्रद्धांजलि दी।

इस आयोजन के तहत जयपुर मिलिट्री स्टेशन में सिम्फनी बैंड कॉन्सर्ट का भी आयोजन किया गया। इसके अलावा जवाहर कला केंद्र में आम नागरिकों के लिए भारतीय सेना का सिम्फनी बैंड प्रदर्शन रखा गया। देशभक्ति और सैन्य धुनों ने लोगों को सेना की परंपरा और शौर्य से जोड़ने का काम किया। (Sapta Shakti Command Raising Day)

टैंकों के बाद पनडुब्बियों पर भी ड्रोन हमलों का खौफ, ‘जुगाड़’ से लैस दिखीं रूसी सबमरींस

Russian Submarine Anti Drone System
Pic Source: Covert Shores/X

Russian Submarine Anti Drone System: मॉडर्न वॉरफेयर में ड्रोन का खौफ कितना बढ़ गया है कि इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि पारंपरिक हथियारों को सस्ते छोटे टॉप अटैक वाले FPV ड्रोन और लॉइटरिंग मुनिशन्स से निपटने के लिए जुगाड़ लगाने पड़ रहे हैं। टैंकों और आर्मर्ड व्हीकल्स पर एंटी-ड्रोन कोप कैज के वीडियो आपने सोशल मीडिया पर जरूर देखे होंगे। लेकिन अब खतरा समंदर तक पहुंच चुका है।

हाल ही में रूस की नौसेना की कुछ तस्वीरें सामने आई हैं, जिनमें उनकी पनडुब्बियों पर अलग तरह के सुरक्षा इंतजाम दिखाई दे रहे हैं। सेंट पीटर्सबर्ग के पास क्रोनस्टाट नौसैनिक अड्डे पर खींची गई इन तस्वीरों में साफ दिखता है कि अब पनडुब्बियों को भी ड्रोन हमलों से बचाने की तैयारी की जा रही है।

इन तस्वीरें से पता चल रहा है कि समुद्र में होने वाले युद्ध का तरीका बदल रहा है और ड्रोन अब पनडुब्बियों जैसी ताकतवर हथियार प्रणालियों के लिए भी खतरा बन चुके हैं।

Russian Submarine Anti Drone System: नाटो भी खौफ खाता है इन पनडुब्बियों से

रूसी नौसेना की दो किलो क्लास पनडुब्बियों की तस्वीरें सेंट पीटर्सबर्ग के पास क्रोनस्टाट नौसैनिक अड्डे पर ली गई है, जहां इन पनडुब्बियों पर नए तरह के एंटी-ड्रोन डिफेंस सिस्टम दिखाई दे रहे हैं।

इस तस्वीर में दो अलग-अलग पनडुब्बियां पहचान में आई हैं। पहली है प्रोजेक्ट 06363 इम्प्रूव्ड किलो क्लास की “मोझाईस्क”, जो नई और आधुनिक पनडुब्बी है। दूसरी है पुरानी प्रोजेक्ट 877EKM किलो क्लास की “दिमित्रोव”, जो 1980 के दशक से सेवा में है।

दोनों ही डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां हैं और अपनी कम आवाज के चलते काफी खतरनाक मानी जाती हैं। इन्हें इतना शांत माना जाता है कि नाटो इन्हें “ब्लैक होल” कहता है, क्योंकि ये आसानी से सोनार पर पकड़ में नहीं आती हैं।

क्या दिखा एंटी-ड्रोन सिस्टम में

तस्वीर में जो सबसे खास चीज दिखी, वह है पनडुब्बियों पर लगाए गए एंटी-ड्रोन सिस्टम्स। इनमें एक पेडेस्टल पर लगी हेवी मशीन गन दिखाई देती है, जो संभवतः 12.7 एमएम की एनएसवी मशीन गन है। यह हवा और सतह दोनों तरह के लक्ष्यों पर फायर कर सकती है।

इसके साथ ही नेविगेशन ब्रिज पर सर्चलाइट भी लगाई गई है, ताकि रात में आने वाले ड्रोन को आसानी से देखा जा सके। एक पनडुब्बी पर अतिरिक्त गन माउंट भी तैयार दिखता है, जिससे जरूरत पड़ने पर और हथियार लगाए जा सकते हैं।

दूसरी पनडुब्बी पर एक खास “एंटी-ड्रोन केज” भी दिखाई देता है। यह एक तरह की लोहे की जाली होती है, जो ड्रोन को सीधे संवेदनशील हिस्सों (जैसे पेरिस्कोप, सेंसर या टॉरपीडो ट्यूब्स) तक पहुंचने से रोकने के लिए लगाई जाती है।

पनडुब्बी पर क्या है ड्रोन का खतरा

रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान ड्रोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। यूक्रेन ने समुद्र में चलने वाले ड्रोन और हवा में उड़ने वाले ड्रोन दोनों का इस्तेमाल किया है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, दिसंबर 2025 में एक अंडरवॉटर ड्रोन “सब सी बेबी” ने रूसी पनडुब्बी को नुकसान पहुंचाया था। इसके बाद से रूस को अपनी नौसेना की सुरक्षा को लेकर ज्यादा सतर्क होना पड़ा है।

इससे पहले सी बेबी सरफेस ड्रोन्स ने सेवस्तोपोल में रूसी बेड़े को परेशान किया था। इन हमलों के बाद रूस को ब्लैक सी फ्लीट की कई पनडुब्बियों को पीछे हटाना पड़ा। यूक्रेन के पास लंबी दूरी के यूएवी, यूएसवी और यूयूवी हैं, जो सस्ते लेकिन घातक हैं।

अब यह खतरा सिर्फ ब्लैक सी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बाल्टिक सागर जैसे क्षेत्रों में भी महसूस किया जा रहा है। यही वजह है कि पनडुब्बियों पर ऐसे फील्ड-लेवल बदलाव किए जा रहे हैं।

कितना असरदार है ये जुगाड़

हालांकि ये एंटी-ड्रोन सिस्टम दिखने में उपयोगी लगते हैं, लेकिन इनकी क्षमता पर सवाल भी उठ रहे हैं। पनडुब्बियां जब पानी के अंदर होती हैं, तब वे सुरक्षित रहती हैं, लेकिन सतह पर या बंदरगाह में वे ज्यादा कमजोर होती हैं।

मैनुअल मशीन गन से छोटे और तेज ड्रोन को निशाना बनाना आसान नहीं होता। ड्रोन कम ऊंचाई पर उड़ सकते हैं या पानी के नीचे से भी आ सकते हैं। ऐसे में सिर्फ मशीन गन और सर्चलाइट से पूरी सुरक्षा मिलना मुश्किल माना जा रहा है।

एंटी-ड्रोन केज कुछ हद तक सुरक्षा दे सकता है, लेकिन अगर एक साथ कई ड्रोन हमला करें, तो यह नाकाफी है।

दरअसल समुद्री युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब सिर्फ बड़े युद्धपोत या पनडुब्बियां ही निर्णायक नहीं हैं, बल्कि छोटे और सस्ते ड्रोन भी बड़ी चुनौती बन चुके हैं। जिसके चलते रूस जैसी बड़ी नौसेना को भी अपनी पनडुब्बियों पर अतिरिक्त सुरक्षा उपाय लगाने पड़ रहे हैं।

“कॉम्पिटिशन से कॉन्फ्लिक्ट तक”, नौसेना कॉन्फ्रेंस 2026 में नेवी चीफ ने बताई बदलती दुनिया की तस्वीर

Indian Navy Commanders Conference 2026

Indian Navy Commanders Conference 2026: भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी का कहना है कि दुनिया तेजी से बदल रही है और युद्ध का स्वरूप पहले जैसा नहीं रहा। उन्होंने कहा कि पिछले पांच सालों में दुनिया में हालात तेजी से बदले हैं और अब देश प्रतिस्पर्धा के दौर से आगे बढ़कर सीधे टकराव के दौर में पहुंच चुके हैं।

14 अप्रैल से नौसेना भवन में भारतीय नौसेना की तीन दिवसीय कमांडर्स कॉन्फ्रेंस 2026 में बोलते हुए नेवी चीफ ने पश्चिम एशिया के हालात का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि किसी एक क्षेत्र का तनाव अब दूर-दराज के समुद्री रास्तों और व्यापार को भी प्रभावित करता है, इसलिए समुद्री सुरक्षा को लगातार मजबूत रखना जरूरी है।

कॉन्फ्रेंस के पहले दिन अलग-अलग ऑपरेशनल मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। इसमें जॉइंटनेस, क्षमता बढ़ाने, मेंटेनेंस, ट्रेनिंग, विदेशी सहयोग और नई तकनीकों को अपनाने जैसे विषय शामिल रहे।

Indian Navy Commanders Conference 2026: पश्चिम एशिया के हालात का असर

कॉन्फ्रेंस के उद्घाटन संबोधन में नौसेना प्रमुख ने दौरान पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव का जिक्र करते हुए कहा कि वहां के अस्थिर हालात का असर समुद्री रास्तों और व्यापार पर साफ दिखाई दे रहा है। उन्होंने बताया कि समुद्र के रास्ते चलने वाले जहाजों की सुरक्षा आज ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है, क्योंकि किसी एक क्षेत्र में तनाव होने का असर दूर-दूर तक पड़ता है।

नौसेना प्रमुख ने कहा कि आज समुद्री सुरक्षा का माहौल पहले से ज्यादा मुश्किल हो गया है। कई जगह एक साथ युद्ध जैसी स्थितियां बन रही हैं, विरोधी देशों की क्षमताएं बढ़ रही हैं और नॉन स्टेट एक्टर्स भी अब सस्ती तकनीक के जरिए खतरा पैदा कर रहे हैं। इन सभी वजहों से समुद्र का क्षेत्र अब ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गया है, जहां हर दिन नई स्थिति का सामना करना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि आज युद्ध केवल मैदान में नहीं लड़ा जा रहा, बल्कि नैरेटिव वॉरफेयर के जरिए लोगों की सोच और धारणा को भी प्रभावित किया जा रहा है। यानी कौन क्या दिखा रहा है और लोगों को क्या समझाया जा रहा है, यह भी उतना ही अहम हो गया है जितना असली ऑपरेशन। (Indian Navy Commanders Conference 2026)

Indian Navy Commanders Conference 2026

ऑपरेशनल तैयारियों पर जोर

कॉन्फ्रेंस के पहले दिन नौसेना की ऑपरेशनल तैयारियों पर खास ध्यान दिया गया। नौसेना प्रमुख ने बताया कि पिछले पांच से दस सालों में नौसेना की तैनाती में काफी बढ़ोतरी हुई है। समुद्र की सतह, पानी के नीचे और हवा में काम करने वाली क्षमताओं को लगातार मजबूत किया गया है। इसके लिए नए जहाज, पनडुब्बियां और एयर सिस्टम शामिल किए गए हैं। इसके साथ ही इंफ्रास्ट्रक्चर, मेंटेनेंस और तकनीकी विकास पर भी लगातार काम किया गया है, ताकि ऑपरेशन के दौरान कोई रुकावट न आए। (Indian Navy Commanders Conference 2026)

बजट का पूरा इस्तेमाल

नौसेना प्रमुख ने यह भी बताया कि उपलब्ध बजट का पूरी तरह उपयोग किया गया है और 90 से ज्यादा कैपिटल कॉन्ट्रैक्ट पूरे किए गए हैं। इसके साथ ही स्वदेशी डिजाइन और निर्माण वाले कई प्लेटफॉर्म को शामिल किया गया है और इस साल 15 से ज्यादा नए प्लेटफॉर्म डिलीवर होने वाले हैं।

समुद्र मार्गों की सुरक्षा में भारत की भूमिका

नौसेना ने हाल के समय में समुद्री मार्गों की सुरक्षा में भी अहम भूमिका निभाई है। खासकर फारस की खाड़ी से निकलने वाले व्यापारिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने में नौसेना सक्रिय रही है। नौसेना की मौजूदगी से भारतीय नाविकों और जहाजों को भरोसा मिला है कि जरूरत पड़ने पर उन्हें सुरक्षा मिलेगी।

कॉन्फ्रेंस में उन्होंने नौसेना की कई अहम गतिविधियों का भी जिक्र किया, जिनमें आईएनएसवी कौंडिन्य की पहली यात्रा, मैरिटाइम महाकुंभ, इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू, मिलन अभ्यास और आईओएनएस कॉन्क्लेव जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम शामिल हैं। उन्होंने बताया कि आईओएस सागर-2 मिशन में 16 मित्र देशों की भागीदारी ने भारत की वैश्विक स्तर पर विश्वसनीयता को और मजबूत किया है। (Indian Navy Commanders Conference 2026)

Indian Navy Commanders Conference 2026

नई तकनीक और भविष्य की तैयारियों पर चर्चा

तकनीकी क्षेत्र में हो रहे बदलावों पर बात करते हुए नौसेना प्रमुख ने बताया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग जैसी तकनीकों को ऑपरेशनल सिस्टम में शामिल किया जा रहा है, ताकि भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार रहा जा सके। इन तकनीकों के जरिए जानकारी जुटाने, फैसले लेने और ऑपरेशन को बेहतर बनाने में मदद मिल रही है। (Indian Navy Commanders Conference 2026)

कॉन्फ्रेंस में उन्होंने उन प्राथमिकताओं का भी जिक्र किया, जिन पर नौसेना आगे काम करेगी। इनमें युद्ध क्षमता को सर्वोच्च स्तर पर बनाए रखना, फोर्स लेवल और क्षमता का विकास, मेंटेनेंस और लॉजिस्टिक्स, नई तकनीकों का उपयोग, मानव संसाधन प्रबंधन, संगठनात्मक लचीलापन और तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल शामिल हैं।

इस दौरान सीडीएस अनिल चौहान ने भी नौसेना कमांडर्स को संबोधित किया। उन्होंने बदलते वैश्विक माहौल और युद्ध के नए तरीकों पर बात की। उन्होंने नौसेना से कहा कि वह तेजी से बदलते हालात के हिसाब से अपनी योजना तैयार करे, जिसमें आर्थिक और तकनीकी पहलुओं को भी ध्यान में रखा जाए। (Indian Navy Commanders Conference 2026)

भारतीय सेना को मिले 500 से ज्यादा ये खास ड्रोन, बिना जीपीएस भी करेंगे काम

Ajeet Drone
Indian Army Gets 500+ Cyber-Secure Ajeet Drones, Boost to Indigenous ISR Capabilities

Ajeet Drone: भारतीय सेना की निगरानी और ऑपरेशन क्षमता को मजबूत करने के लिए चेन्नई की कंपनी जुप्पा जियो नेविगेशन टेक्नोलॉजीज ने पिछले तीन महीनों में सेना को 500 से ज्यादा साइबर-सिक्योर “अजीत” सीरीज के ड्रोन सौंपे हैं। यह डिलीवरी जनवरी से अप्रैल के बीच पूरी की गई है और इन ड्रोन को खास तौर पर फ्रंटलाइन यूनिट्स के लिए तैयार किया गया है।

क्या है Ajeet Drone सीरीज

अजीत सीरीज छोटे और हल्के ड्रोन का एक परिवार है, जिसे निगरानी और जानकारी जुटाने के काम के लिए बनाया गया है। सेना इन्हें दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने, इलाके की तस्वीरें लेने और रियल टाइम जानकारी जुटाने के लिए इस्तेमाल करती है।

इन ड्रोन को इस तरह डिजाइन किया गया है कि सैनिक इन्हें आसानी से अपने साथ ले जा सकें। कुछ मॉडल इतने छोटे हैं कि बैकपैक में रखकर भी ले जाए जा सकते हैं।

साइबर सिक्योरिटी पर फोकस

इन ड्रोन की सबसे बड़ी खासियत उनकी साइबर सुरक्षा मानी जा रही है। आज के समय में ड्रोन सिर्फ उड़ने वाली मशीन नहीं रहे, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम का हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में हैकिंग, जैमिंग और स्पूफिंग जैसे खतरे बढ़ गए हैं।

अजीत ड्रोन को इन खतरों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इनमें इस्तेमाल होने वाले इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स और सॉफ्टवेयर ज्यादातर देश में ही तैयार किए गए हैं। इससे बाहरी सिस्टम पर निर्भरता कम होती है और सुरक्षा बेहतर रहती है।

इनमें कंपनी का अपना ऑटो पायलट सिस्टम “नवगति” लगाया गया है, जो ऐसे इलाकों में भी काम कर सकता है जहां जीपीएस सिग्नल उपलब्ध नहीं होते।

ये ड्रोन खास तौर पर ऐसे इलाकों के लिए बनाए गए हैं जहां इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर का खतरा ज्यादा होता है। यानी दुश्मन रेडियो सिग्नल को जैम करने या सिस्टम को भ्रमित करने की कोशिश कर सकता है।

अजीत ड्रोन इन हालात में भी अपनी दिशा और काम को बनाए रखने में सक्षम हैं। कुछ बड़े मॉडल लगभग एक घंटे तक उड़ान भर सकते हैं और कई किलोमीटर तक की दूरी कवर कर सकते हैं।

इनमें डे और नाइट कैमरा लगे होते हैं, जिससे दिन और रात दोनों समय निगरानी की जा सकती है।

कंपनी ने सेना के जवानों को इन ड्रोन के इस्तेमाल की ट्रेनिंग भी दी है। इस ट्रेनिंग में ड्रोन उड़ाना, उनकी देखभाल करना और एक साथ कई ड्रोन चलाने की तकनीक शामिल है। इसका मकसद यह है कि सेना की यूनिट्स खुद ही अलग-अलग ऑपरेशन में इनका इस्तेमाल कर सकें।

स्वॉर्म ऑपरेशन की क्षमता

इन ड्रोन की एक खास क्षमता यह भी है कि इन्हें एक साथ समूह में उड़ाया जा सकता है। इसे स्वॉर्म ऑपरेशन कहा जाता है। इस तकनीक में कई ड्रोन मिलकर एक साथ काम करते हैं, जिससे निगरानी का दायरा बढ़ जाता है और ज्यादा जानकारी एक साथ मिल सकती है।

बता दें कि भारत लंबे समय तक विदेशी ड्रोन, खासकर चीनी कंपनियों के सिस्टम पर निर्भर रहा है। लेकिन अब सरकार और सेना दोनों ही इस निर्भरता को कम करने की दिशा में काम कर रहे हैं। अजीत सीरीज को इसी लक्ष्य के तहत विकसित किया गया है। इसमें हार्डवेयर से लेकर सॉफ्टवेयर तक अधिकतर चीजें देश में ही बनाई गई हैं।

यह पहली बार नहीं है जब इस कंपनी ने सेना को ड्रोन दिए हों। इससे पहले भी अलग-अलग ऑपरेशन के दौरान इनके ड्रोन इस्तेमाल में लाए जा चुके हैं। कंपनी ने पहले भी कई ड्रोन सिस्टम और स्वॉर्म टेक्नोलॉजी सेना को उपलब्ध कराई है।

कंपनी का फोकस सिर्फ ड्रोन बनाने पर नहीं, बल्कि पूरी अनमैन्ड सिस्टम टेक्नोलॉजी को विकसित करने पर है। इसमें नेविगेशन, ऑटो पायलट और डेटा प्रोसेसिंग जैसे हिस्से शामिल हैं।

इन ड्रोन के शामिल होने से सेना की निगरानी क्षमता को सीधा फायदा मिलेगा। खास तौर पर सीमावर्ती इलाकों और संवेदनशील क्षेत्रों में इनका इस्तेमाल बढ़ेगा, जहां लगातार नजर बनाए रखना जरूरी होता है।

भारत के NOTAM ट्रैप में फिर फंसा चीनी जासूसी जहाज, आया था मिसाइल डेटा लेने, लौटा खाली हाथ

NOTAM India Missile Test
Image Source: @notam_in, @detresfa/X

NOTAM India Missile Test: भारत ने एक बार फिर बंगाल की खाड़ी में चीन के साथ कैट एंड माउस गेम खेला है। जिसमें चीनी शिप की एख बार फिर फजीहत हुई है। भारत ने सात अप्रैल को NOTAM यानी “नोटिस टू एयरमेन” जारी किया था। इसी दौरान चीन का मिसाइल ट्रैकिंग शिप हिंद महासागर क्षेत्र में पहुंच गया। वहीं भारत ने चीन के खेल को समझते हुए नोटम कैंसिल कर दिया।

NOTAM India Missile Test: क्या होता है NOTAM और क्यों जारी किया जाता है

जब भी भारत कोई मिसाइल टेस्ट करने की तैयारी करता है, तो पहले से एक बड़ा इलाका खाली कराया जाता है। इसके लिए NOTAM जारी किया जाता है। इसका मतलब होता है कि उस क्षेत्र में कुछ समय के लिए हवाई और समुद्री गतिविधियां सीमित रहेंगी। आमतौर पर यह इलाका सैकड़ों से लेकर हजारों किलोमीटर तक फैला होता है।

इसका सीधा उद्देश्य सुरक्षा होता है, ताकि टेस्ट के दौरान कोई सिविल एयरक्राफ्ट या जहाज उस इलाके में न पहुंचे। लेकिन यही NOTAM अब एक तरह का संकेत भी बन गया है, जिसे दूसरे देश, खासकर चीन, बहुत ध्यान से देखता है।

कैसे काम करते हैं चीनी ट्रैकिंग शिप

चीन के पास “युआन वांग” सीरीज के खास जहाज हैं, जिन्हें मिसाइल और सैटेलाइट ट्रैक करने के लिए बनाया गया है। ये जहाज बेहद एडवांस रडार और एंटीना सिस्टम से लैस होते हैं। इनका काम किसी भी मिसाइल टेस्ट के दौरान उसकी स्पीड, रास्ता और बाकी तकनीकी जानकारी जुटाना होता है।

जैसे ही भारत NOTAM जारी करता है, ये जहाज उस इलाके के पास पहुंचने की कोशिश करते हैं। इसका मकसद टेस्ट के दौरान ज्यादा से ज्यादा डेटा इकट्ठा करना होता है।

सात अप्रैल को भी भारत ने 12 से 14 अप्रैल के लिए 1780 किमी की रेंज का NOTAM यानी “नोटिस टू एयरमेन” जारी किया था। मना जा रहा था कि यह कोई लंबी दूरी की मिसाइल का परीक्षण हो सकता है। इसी दौरान चीन का युआन वांग-07 जहाज सुंडा स्ट्रेट के रास्ते हिंद महासागर में दाखिल होने लगा।

लेकिन 13 अप्रैल को अचानक NOTAM कैंसल कर दिया गया। नतीजा यह रहा कि चीनी जहाज, जो खास तौर पर डेटा इकट्ठा करने आया था, उसे कुछ हासिल नहीं हुआ।

हालांकि भारत ने 14 अप्रैल को बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में फिर एक नया NOTAM यानी “नोटिस टू एयरमेन” जारी किया है। यह नोटिस 20 अप्रैल सुबह 10 बजे से 24 अप्रैल शाम 6:30 बजे तक प्रभावी रहेगा। इस दौरान 170 किमी के इलाके में हवाई गतिविधियों पर विशेष निगरानी रखी जाएगी।

पहले भी कई बार हो चुका है ऐसा

यह पहली बार नहीं है जब ऐसा हुआ हो। पिछले कुछ सालों में कई बार इसी तरह की स्थिति बनी है। कई बार NOTAM जारी हुआ और फिर अचानक रद्द कर दिया गया।

भारत ने पिछले साल दिसंबर के दौरान कई बार अलग-अलग तारीखों पर NOTAM जारी किए थे, जैसे 1 से 4 दिसंबर, 17 से 20 दिसंबर और 22 से 24 दिसंबर। इन NOTAM की रेंज 3500 किलोमीटर तक रखी गई थी। जैसे ही ये NOTAM जारी होते, चीन के 4 से 5 रिसर्च वैसल तुरंत उस इलाके के आसपास पहुंच जाते। इनमें शी यान-6, शेन हाय यी हाओ, लान हाई 101 और द यांग यी हाओ जैसे जहाज शामिल थे।

इसी दौरान चीन के कुछ युद्धपोत भी वहां मौजूद थे। ये सभी जहाज चीन के 48वें एंटी-पायरेसी एस्कॉर्ट फोर्स का हिस्सा थे, जो उस समय गल्फ ऑफ एडन के आसपास तैनात थे। ये जहाज मिसाइल की दिशा, उसकी गति, टेलीमेट्री डेटा, ध्वनि संकेत और गिरने वाले हिस्सों तक की जानकारी जुटाने में सक्षम होते हैं।

भारत ने भी इस पैटर्न को समझ लिया था। जैसे ही चीनी जहाज उस इलाके में पहुंचते, भारत NOTAM रद्द कर देता था। इससे चीन के जहाजों को कोई फायदा नहीं मिलता, उनका समय और ईंधन खर्च होता और उनकी लोकेशन भी सामने आ जाती। भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी ने भी कहा था कि ऐसी स्थिति में टेस्ट को “रीकैलिब्रेट” करना अब एक सामान्य प्रक्रिया बन चुकी है।

क्या यह सिर्फ संयोग है या रणनीति

सोशल मीडिया पर इसे मजाक के तौर पर भी देखा जाता है, लेकिन इसके पीछे एक गंभीर रणनीति मानी जा रही है। क्योंकि NOTAM एक पब्लिक डॉक्यूमेंट होता है, जिसे कोई भी देख सकता है। चीन भी इसी जानकारी के आधार पर अपने जहाज भेजता है।

लेकिन भारत अब इस प्रक्रिया का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कर रहा है। जब चीनी जहाज तय जगह पर पहुंच जाते हैं, तो टेस्ट को आगे खिसका दिया जाता है या उनका समय बदल दिया जाता है।

इस पूरे खेल में भारत को कई तरह के फायदे मिलते हैं। सबसे पहला फायदा यह है कि चीन को मिसाइल से जुड़ा कोई डेटा नहीं मिल पाता। दूसरा, चीन के जहाजों को बार-बार लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, जिससे उनका समय और संसाधन खर्च होता है।

तीसरा, भारत को यह समझने में मदद मिलती है कि चीन कितनी तेजी से प्रतिक्रिया देता है और उसकी निगरानी क्षमता कैसी है। चौथा, भारतीय नौसेना को भी इन जहाजों की गतिविधियों पर नजर रखने का मौका मिलता है।

भारत की तैयारी भी है मजबूत

भारत के पास भी अब अपना मिसाइल ट्रैकिंग जहाज है, जिसे आईएनएस ध्रुव कहा जाता है। यह जहाज इलेक्ट्रॉनिक निगरानी और मिसाइल ट्रैकिंग में सक्षम है। इसके जरिए भारत खुद भी समुद्र में होने वाली गतिविधियों पर नजर रख सकता है।

इसके अलावा अंडमान-निकोबार और बंगाल की खाड़ी जैसे इलाके भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम हैं। यहां से गुजरने वाले समुद्री रास्तों पर नजर रखना जरूरी माना जाता है।

Operation Tiranga: इस नई सीक्रेट वॉर स्ट्रैटेजी ने रखी सबसे बड़े डिफेंस रिफॉर्म्स की नींव, जानें क्या है यह ऐतिहासिक टेबल टॉप एक्सरसाइज

Operation Tiranga Explained: How India’s Theatre Command Plan Will Transform Armed Forces Structure

Operation Tiranga: अगले कुछ महीनों में भारतीय सेनाओं के इतिहास में एक ऐसा अध्याय लिखा जा रहा है जिसे स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा रक्षा सुधार माना जाएगा। इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड्स को सबसे बड़े डिफेंस रिफॉर्म्स के तौर पर देखा जा रहा है। लेकिन थिएटर कमांड्स को आकार देने में सबसे अहम भूमिका निभाई है ऑपरेशन तिरंगा ने।

नाम भले ही किसी सैन्य अभियान जैसा लगे, लेकिन यह असल में एक टेबल टॉप एक्सरसाइज (TTX) थी, जिसमें तीनों सेनाओं ने बैठकर भविष्य के युद्ध का पूरा खाका तैयार किया। इस पूरी प्रक्रिया में जनरल अनिल चौहान की अगुवाई में सेना, नौसेना और वायुसेना के प्रमुखों ने मिलकर थिएटर कमांड का फॉर्मेट तय किया।

यह एक्सरसाइज कई महीनों तक चली और अप्रैल 2026 में इसका मुख्य काम पूरा हो गया। इसमें सबसे ज्यादा फोकस इस बात पर रहा कि युद्ध के समय तीनों सेनाएं एक साथ कैसे काम करें और फैसले जल्दी कैसे लिए जाएं।

Operation Tiranga पर क्या कहा सीडीएस ने

अप्रैल 2026 में बेंगलुरु में हुए रण संवाद कार्यक्रम के दौरान सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने पहली बार खुलकर “ऑपरेशन तिरंगा” का नाम लिया। उन्होंने साफ शब्दों में बताया कि यह कोई युद्ध अभ्यास नहीं था, बल्कि तीनों सेनाओं के बीच थिएटर कमांड बनाने को लेकर गहन चर्चा और योजना बनाने की प्रक्रिया थी। उन्होंने कहा कि “ऑपरेशन तिरंगा” के तहत जो भी बातचीत और विचार-विमर्श चल रहा था, वह अब पूरा हो चुका है। यानी सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच जो बड़े मुद्दे थे, उन पर चर्चा खत्म हो गई है और एक तरह से सहमति बन चुकी है।

जनरल चौहान ने एक और महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने बताया कि थिएटर कमांड बनने के बाद सर्विस चीफ्स की कुछ शक्तियां कम हो सकती हैं, लेकिन इसके बावजूद तीनों सेनाएं इस बदलाव के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा कि यह फैसला राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर लिया जा रहा है। यानी तीनों सेनाएं अपनी-अपनी सीमाओं से ऊपर उठकर देश के बड़े हित के लिए एक साथ काम करने को तैयार हैं।

जनरल चौहान ने सबसे अहम बात यह कही कि थिएटर कमांड के कॉन्सेप्ट पर तीनों सेनाओं के बीच कोई मतभेद नहीं है। उनके मुताबिक, सभी सर्विस चीफ इस बात से सहमत हैं कि भविष्य के युद्ध के लिए यह सिस्टम जरूरी है। उन्होंने यह भी बताया कि कोई भी सेवा प्रमुख यह नहीं कह रहा कि थिएटर कमांड नहीं बनना चाहिए।

हालांकि उन्होंने यह भी माना कि कुछ मुद्दों पर अलग-अलग राय है, लेकिन ये मतभेद केवल इस बात को लेकर हैं कि इसे लागू कैसे किया जाए। इसे उन्होंने “मैनिफेस्टेशन” यानी कार्यान्वयन का हिस्सा बताया।

उनके अनुसार, मुख्य सवाल यह है कि यह बदलाव कितनी तेजी से हो, किस क्रम में हो और संसाधनों का बंटवारा कैसे किया जाए। खास तौर पर एयर एसेट्स यानी फाइटर जेट और दूसरे हवाई संसाधनों को लेकर चर्चा ज्यादा हुई है। लेकिन उन्होंने साफ कहा कि ये सभी मुद्दे सुलझाए जा सकते हैं।

सीडीएस ने यह भी बताया कि तीनों सेनाओं की तरफ से जो काम होना था, वह लगभग पूरा हो चुका है। उन्होंने कहा कि अब वह अपनी पूरी रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं और इसे जल्द ही रक्षा मंत्री को सौंप दिया जाएगा, जिसके बाद इस पर अंतिम फैसला लिया जाएगा।

क्या है Operation Tiranga

ऑपरेशन तिरंगा को समझने के लिए पहले यह समझना जरूरी है कि यह कोई जमीनी ऑपरेशन नहीं था। यह ऑपरेशन एक “टेबल टॉप एक्सरसाइज” यानी टीटीएक्स के रूप में किया गया, जहां असली युद्ध नहीं लड़ा गया, बल्कि अलग-अलग संभावित परिस्थितियों पर बैठकर चर्चा की गई। इसमें सेना, नौसेना और वायुसेना के प्रमुखों ने हिस्सा लिया और यह समझने की कोशिश की कि भविष्य में अगर एक साथ कई तरह के खतरे सामने आएं, तो उनसे कैसे निपटा जाए।

इस एक्सरसाइज में अलग-अलग हालात बनाए गए, जैसे अगर एक साथ दो सीमाओं पर तनाव बढ़ जाए या समुद्र में दुश्मन सक्रिय हो जाए, तो तीनों सेनाएं कैसे प्रतिक्रिया देंगी। इन सभी परिस्थितियों पर विस्तार से चर्चा हुई और हर स्थिति में फैसले लेने का तरीका तय किया गया।

कैसे हुई टेबल टॉप एक्सरसाइज

ऑपरेशन तिरंगा के दौरान कई तरह के काल्पनिक हालात तैयार किए गए। इनमें चीन के साथ सीमा तनाव, पाकिस्तान के साथ युद्ध, समुद्री खतरे, साइबर हमले और स्पेस से जुड़े खतरे शामिल थे। इन सभी स्थितियों पर बैठकर चर्चा की गई कि अगर ऐसा होता है तो कौन क्या करेगा और कैसे करेगा।

इस प्रक्रिया में “रोल प्ले” भी किया गया। यानी कुछ अधिकारियों को थिएटर कमांडर की भूमिका दी गई, कुछ को डिप्टी कमांडर की और कुछ को सर्विस चीफ की भूमिका में रखा गया। इसके जरिए यह समझा गया कि आदेश कैसे दिए जाएंगे, किसके पास कितना अधिकार होगा और किस तरह से संसाधनों का इस्तेमाल किया जाएगा।

मल्टी-डोमेन युद्ध पर फोकस

इस दौरान एक महत्वपूर्ण बात सामने आई कि केवल एक डोमेन यानी जमीन, हवा या समुद्र के आधार पर अब युद्ध नहीं जीता जा सकता। सभी डोमेन्स को एक साथ जोड़कर ही काम करना होगा। इसमें साइबर हमले, स्पेस टेक्नोलॉजी, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और जानकारी की लड़ाई भी शामिल होती है। यही वजह है कि इसे मल्टी-डोमेन अप्रोच कहा जाता है।

ऑपरेशन तिरंगा में इस बात पर खास ध्यान दिया गया कि कैसे एक कमांडर एक साथ सभी डोमेन्स को समझ सके और उनका इस्तेमाल कर सके। उदाहरण के तौर पर, अगर जमीन पर सेना आगे बढ़ रही है, तो उसी समय वायुसेना एयर सपोर्ट दे रही हो और नौसेना समुद्र में दुश्मन की सप्लाई रोक रही हो। (Operation Tiranga)

नए थिएटर कमांड्स की तैयारी

आज भारतीय सेनाएं अलग-अलग कमांड के तहत काम करती हैं। कुल मिलाकर करीब 17 कमांड हैं, जिनमें आर्मी, नेवी और वायुसेना की अपनी-अपनी व्यवस्था है। हर सर्विस का अपना अलग कमांड सिस्टम होता है। जैसे आर्मी का वेस्टर्न कमांड पाकिस्तान सीमा को देखता है, नॉर्दर्न कमांड चीन सीमा को संभालता है, जबकि वायुसेना का वेस्टर्न एयर कमांड जरूरत पड़ने पर एयर सपोर्ट देता है।

इस पूरे अभ्यास के बाद तीन बड़े थिएटर कमांड का प्रस्ताव तैयार किया गया। पहला वेस्टर्न थिएटर, जो पाकिस्तान पर फोकस करेगा। दूसरा नॉर्दर्न या ईस्टर्न थिएटर, जो चीन से जुड़े क्षेत्रों को संभालेगा। तीसरा मैरिटाइम थिएटर, जो समुद्री क्षेत्र की जिम्मेदारी संभालेगा।

इन तीनों थिएटर में अलग-अलग सेवाओं के अधिकारी कमांडर बनेंगे, लेकिन उनके साथ दूसरी सेवाओं के अधिकारी भी डिप्टी के रूप में काम करेंगे। इससे तीनों सेनाओं के बीच तालमेल बना रहेगा।

इसके अलावा एक और प्रस्ताव सामने आया, जिसमें वाइस चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की नई पोस्ट बनाने की बात कही गई है, जो ऑपरेशन के स्तर पर कॉर्डिनेशन में मदद करेगा।

इसके अलावा यह भी तय हुआ कि कुछ खास संसाधन, जैसे एयर रिफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट या बड़े सर्विलांस सिस्टम, सीधे वायुसेना के पास ही रहेंगे, ताकि जरूरत के हिसाब से उन्हें कहीं भी भेजा जा सके। (Operation Tiranga)

कौन लेगा ऑपरेशनल फैसले

इस नई व्यवस्था में सबसे बड़ा बदलाव फैसले लेने के तरीके में आएगा। अभी किसी ऑपरेशन के लिए अलग-अलग स्तर पर अनुमति लेनी पड़ती है। थिएटर कमांड में यह प्रक्रिया छोटी हो जाएगी।

इससे समय की बचत होगी और किसी भी आपात स्थिति में तेजी से प्रतिक्रिया दी जा सकेगी। साथ ही, अलग-अलग संसाधनों का बेहतर उपयोग भी हो पाएगा, क्योंकि सब कुछ एक ही कमांड के तहत होगा।

क्योंकि तीनों सेनाएं अभी अपने-अपने संसाधनों का इस्तेमाल अलग-अलग करती हैं। इससे कई बार एक ही तरह के संसाधन अलग-अलग जगहों पर उपयोग होते हैं, जिससे खर्च भी बढ़ता है और प्रभाव भी कम होता है।

थिएटर कमांड के जरिए सभी संसाधनों को एक साथ लाकर जरूरत के अनुसार इस्तेमाल किया जाएगा। इससे लॉजिस्टिक्स यानी सप्लाई सिस्टम भी मजबूत होगा और ऑपरेशन में कोई रुकावट नहीं आएगी। (Operation Tiranga)

ट्रेनिंग और तैयारी में बदलाव

थिएटर कमांड लागू होने के बाद सैनिकों की ट्रेनिंग में भी बदलाव आएगा। अब उन्हें सिर्फ अपने डोमेन की नहीं, बल्कि दूसरे डोमेन्स की भी जानकारी दी जाएगी।

इससे सैनिक और अधिकारी बेहतर तरीके से समझ पाएंगे कि युद्ध के समय किस तरह अलग-अलग सिस्टम एक साथ काम करते हैं। इससे उनकी तैयारी भी मजबूत होगी और ऑपरेशन के दौरान गलतियों की संभावना कम होगी।

अंडमान-निकोबार कमांड से मिली सीख

भारत में पहले से एक जॉइंट कमांड मौजूद है, जिसे अंडमान-निकोबार कमांड कहा जाता है। इसे मॉडल के तौर पर देखा गया।

यह कमांड तीनों सेनाओं को एक साथ लेकर काम करता है और लंबे समय से सक्रिय है। ऑपरेशन तिरंगा में इसके अनुभव का इस्तेमाल किया गया, ताकि नई व्यवस्था को बेहतर बनाया जा सके। (Operation Tiranga)

कमांड और कंट्रोल सिस्टम में बदलाव

थिएटर कमांड के साथ कमांड और कंट्रोल सिस्टम भी बदलेगा। इसमें कम्युनिकेशन, डेटा और इंटेलिजेंस को एक साथ जोड़ा जाएगा।

इसका मतलब है कि जमीन पर मौजूद सैनिक से लेकर ऊपर बैठे कमांडर तक, सभी को एक ही समय में एक जैसी जानकारी मिलेगी। इससे फैसले लेने में आसानी होगी।

थिएटर कमांड लागू होने के बाद क्या करेंगे सर्विस चीफ

सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने साफ बताया है कि थिएटर कमांड लागू होने के बाद आर्मी चीफ, नेवी चीफ और एयर चीफ की भूमिका बदल जाएगी। पहले ये चीफ्स ऑपरेशन भी संभालते थे और अपनी-अपनी सेना की तैयारी भी करते थे, लेकिन अब ये दोनों काम अलग हो जाएंगे।

अब युद्ध लड़ने की जिम्मेदारी थिएटर कमांडर के पास होगी। यानी किसी इलाके में अगर ऑपरेशन होता है, तो वहां एक ही कमांडर तीनों सेनाओं को मिलाकर काम करेगा।

थिएटर कमांड बनने के बाद सेवा चीफ्स का मुख्य काम अपनी-अपनी सेना को तैयार रखना होगा। इसे आसान भाषा में “रेज, ट्रेन और सस्टेन” कहा जाता है। (Operation Tiranga)

रेज का मतलब है नई यूनिट बनाना, भर्ती करना और नए हथियार व उपकरण शामिल करना। ट्रेन का मतलब है सैनिकों और अधिकारियों को अच्छी ट्रेनिंग देना, ताकि वे हर स्थिति में तैयार रहें। सस्टेन का मतलब है सेना को हमेशा तैयार रखना, जिसमें हथियारों की मरम्मत, गोला-बारूद, ईंधन और दूसरी जरूरी चीजों की सप्लाई शामिल है।

इसके अलावा सेवा चीफ्स अपने-अपने फोर्स की परंपरा और सिस्टम को बनाए रखेंगे। वे जरूरत पड़ने पर थिएटर कमांडर को तैयार और ट्रेन की हुई फोर्स उपलब्ध कराएंगे। साथ ही, वे रणनीतिक स्तर पर सीडीएस की मदद भी करेंगे।

पहले सेवा चीफ्स ही ऑपरेशन भी चलाते थे और सेना भी तैयार करते थे, जिससे कई बार तालमेल की कमी और देरी होती थी। अब ऑपरेशन और तैयारी दोनों काम अलग हो जाएंगे, जिससे काम ज्यादा तेजी और बेहतर तरीके से हो सकेगा। (Operation Tiranga)

क्या होगा स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड (SFC) का?

थिएटर कमांड बनने की प्रक्रिया के बीच एक बड़ा सवाल यह है कि स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड यानी SFC का क्या होगा। इस बारे में कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिला है। लेकिन सूत्रों का कहना है, एसएफसी को अलग ही रखा जाएगा। इसे थिएटर कमांड में शामिल नहीं किया जाएगा। क्योंकि चीन और रूस में भी स्ट्रेटेजिक फोर्सेस अलग-अलग हैं।

स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड की स्थापना 2003 में की गई थी। इसका मुख्य काम भारत के परमाणु हथियारों से जुड़ी पूरी व्यवस्था को संभालना है। इसमें जमीन से छोड़ी जाने वाली मिसाइलें, पनडुब्बी से दागी जाने वाली मिसाइलें और हवाई माध्यम से इस्तेमाल होने वाले परमाणु हथियार शामिल होते हैं। इनमें अग्नि मिसाइलें, सबमरीन-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइलें (SLBM), और एयर-ड्रॉप्ड न्यूक्लियर वेपंस शामिल हैं।

फिलहाल स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड के वर्तमान कमांडर-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल दिनेश सिंह राणा हैं, जो सीडीएस को रिपोर्ट करते हैं।

यह कमांड पहले से ही तीनों सेनाओं का संयुक्त सिस्टम है, यानी आर्मी, नेवी और वायुसेना, तीनों की न्यूक्लियर ताकत इसमें शामिल रहती है। इसका कंट्रोल बहुत ही उच्च स्तर पर होता है और यह सीधे राष्ट्रीय नेतृत्व के दिशा-निर्देशों के तहत काम करता है।

सूत्रों ने बताया कि थिएटर कमांड का काम सामान्य युद्ध यानी जमीन, हवा और समुद्र में होने वाले ऑपरेशन को संभालना होगा। लेकिन स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड का काम इससे अलग और ज्यादा संवेदनशील है, क्योंकि यह परमाणु हथियारों से जुड़ा है। (Operation Tiranga)

इसी वजह से इसे किसी क्षेत्रीय थिएटर कमांडर के अधीन नहीं रखा जा सकता। अगर ऐसा किया गया तो कमांड और कंट्रोल सिस्टम में जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड को अलग ही रखा जाएगा, ताकि इसका कंट्रोल सीधे राष्ट्रीय स्तर पर बना रहे।

स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड पहले की तरह अपनी जिम्मेदारी निभाता रहेगा। यह परमाणु हथियारों की सुरक्षा, नियंत्रण और जरूरत पड़ने पर उनके इस्तेमाल की तैयारी से जुड़ा रहेगा। थिएटर कमांडर्स को इसके संसाधनों पर सीधा कंट्रोल नहीं मिलेगा।

सूत्रों का कहना है कि अगर किसी स्थिति में कॉर्डिनेशन की जरूरत पड़ेगी, तो यह काम सीडीएस के जरिए किया जाएगा। यानी स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड और थिएटर कमांड्स के बीच तालमेल रहेगा, लेकिन कंट्रोल अलग-अलग रहेगा। (Operation Tiranga)

थिएटर कमांड बनने के बाद कितने 4-स्टार अफसर

थिएटर कमांड लागू होने के बाद भारतीय सेना में 4-स्टार अधिकारियों की संख्या बढ़ जाएगी। अभी स्थिति यह है कि सिर्फ चार ही 4-स्टार अधिकारी होते हैं, जिनमें एक सीडीएस, एक आर्मी चीफ, एक नेवी चीफ और एक एयर चीफ शामिल हैं।

लेकिन नई व्यवस्था लागू होने के बाद कुल 8 चार-स्टार अधिकारी होंगे। इनमें सबसे ऊपर सीडीएस होंगे। उनके अलावा एक नया पद बनेगा, जिसे वाइस चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (VCDS) कहा जाएगा। यह भी 4-स्टार रैंक का होगा।

इसके बाद तीनों सेनाओं के प्रमुख यानी आर्मी चीफ, नेवी चीफ और एयर चीफ पहले की तरह 4-स्टार रहेंगे। साथ ही तीन नए थिएटर कमांडर भी बनाए जाएंगे, जो अलग-अलग इलाकों की कमान संभालेंगे और ये भी 4-स्टार रैंक के होंगे। इस तरह कुल मिलाकर 8 बड़े अधिकारी होंगे। (Operation Tiranga)

कानपुर बनेगा एविएशन हब, जीई एयरोस्पेस से मिलेगा यूपी डिफेंस कॉरिडोर को ग्रोथ का “इंजन”!

GE Aerospace Tejas Engine Depot
GE Aerospace Tejas Engine Depot India: Kanpur Set to Become Aviation Hub Boosting UP Defence Corridor

GE Aerospace Tejas Engine Depot: उत्तर प्रदेश अब डिफेंस और एविएशन सेक्टर में भी ऊंची छलांग लगाने की तैयारी कर रहा है। अमेरिकी कंपनी जीई एरोस्पोस और भारतीय वायुसेना के बीच तेजस के इंजन को लेकर हाल ही में अहम समझौता हुआ है। इस समझौते के तहत देश में ही एफ-404-आईएन20 इंजन के लिए एक इन-कंट्री डिपो फैसिलिटी बनाई जाएगी, जो तेजस एलसीए फाइटर जेट्स के इंजन की मरम्मत और मेंटेनेंस का काम करेगी। सूत्रों का कहना है कि यह फैसिलिटी उत्तर प्रदेश में लगाई जा सकती है।

इस फैसिलिटी को भारतीय वायुसेना तैयार करेगी, जबकि जीई एयरोस्पेस तकनीकी सहयोग देगा। इस कदम को यूपी डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के लिए एक बड़े बूस्ट के तौर पर देखा जा रहा है।

GE Aerospace Tejas Engine Depot: क्या है नया डिपो प्रोजेक्ट

इस समझौते का मुख्य उद्देश्य यह है कि भारत में ही तेजस एमके1/एमके1ए के इंजन रिपेयर और ओवरहॉल की सुविधा तैयार हो सके। अभी तक जब भी तेजस फाइटर जेट के इंजन में बड़ी खराबी आती थी, तो उसे विदेश भेजना पड़ता था। इस पूरी प्रक्रिया में काफी समय लगता था और कई विमान लंबे समय तक ग्राउंडेड रहते थे।

अब इस नई डिपो फैसिलिटी के बनने के बाद यह काम देश के अंदर ही हो सकेगा। इससे रिपेयर का समय कम होगा और विमान ज्यादा समय तक ऑपरेशनल रह पाएंगे। इस फैसिलिटी का पूरा ऑपरेशन भारतीय वायुसेना के हाथ में होगा। जबकि जीई एयरोस्पेस ट्रेनिंग, तकनीकी सपोर्ट, स्पेयर पार्ट्स और जरूरी उपकरण उपलब्ध कराएगा।

समय पर मिलेंगे इंजन

जीई एरोस्पेस की डिफेंस और सिस्टम्स की सेल्स और बिजनेस डेवलपमेंट की वाइस प्रेसिडेंट रीटा फ्लैहर्टी ने कहा,भारतीय सशस्त्र बलों की मदद करना उनकी कंपनी की प्राथमिकता है। उन्होंने बताया कि इसी सोच के तहत यह साझेदारी आगे बढ़ाई जा रही है, ताकि तेजस विमान के इंजनों की देखभाल और सपोर्ट की क्षमता भारत में ही मजबूत हो सके। उन्होंने यह भी कहा कि नई डिपो फैसिलिटी के जरिए भारतीय वायुसेना को एफ-404 आईएन20 इंजन समय पर उपलब्ध रहेंगे और उन्हें आधुनिक तकनीक का सीधा फायदा मिलेगा। (GE Aerospace Tejas Engine Depot)

तेजस फ्लीट को कैसे मिलेगा फायदा

एफ-404-आईएन20 वही इंजन है, जो हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एलएएल) तेजस फाइटर जेट में लगाया जाता है। यह भारत का स्वदेशी लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट है। इंजन की समय पर मरम्मत और मेंटेनेंस न होने की वजह से कई बार विमान उड़ान के लिए तैयार नहीं हो पाते थे। अब डिपो फैसिलिटी के जरिए यह समस्या काफी हद तक कम हो जाएगी। इसका सीधा असर यह होगा कि वायुसेना के पास ज्यादा विमान एक साथ उपलब्ध रहेंगे और ऑपरेशनल क्षमता बेहतर बनी रहेगी। (GE Aerospace Tejas Engine Depot)

यूपी डिफेंस कॉरिडोर को मिलेगी मजबूती

उत्तर प्रदेश में बना डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर देश के बड़े डिफेंस प्रोजेक्ट्स में से एक है। यह कॉरिडोर छह अलग-अलग शहरों में फैला हुआ है, जिसमें अलीगढ़, आगरा, चित्रकूट, झांसी, लखनऊ और कानपुर शामिल हैं।

इन सभी में कानपुर को सबसे अहम नोड माना जा रहा है। यहां सबसे ज्यादा निवेश आया है और पहले से ही डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग का मजबूत बेस मौजूद है। सूत्रों का कहना है कि जीई एरोस्पेस अपनी नई फैसिलिटी के लिए कानपुर नोड को चुन सकता है।

इसकी वजह है कि कानपुर में पुराने समय से ऑर्डनेंस फैक्ट्रियां काम कर रही हैं, जहां हथियार और सैन्य उपकरण बनाए जाते रहे हैं। यहां आयुध निर्माणी कानपुर, लघु शस्त्र निर्माणी, फील्ड गन निर्माणी जैसी कई ऑर्डनेंस फैक्ट्रियां पहले से ही मौजूद हैं। इसके साथ ही यहां के लोगों को मेटल वर्क, लेदर और टेक्सटाइल का अच्छा अनुभव है, जिससे डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग के लिए तैयार स्किल्ड वर्कफोर्स और इंडस्ट्रियल इन्फ्रास्ट्रक्चर मिलता है। (GE Aerospace Tejas Engine Depot)

चकेरी में है बेस रिपेयर डिपो 

सूत्रों ने बताया कि कानपुर के चकेरी इलाके में भारतीय वायुसेना और एचएएल की बड़ी मरम्मत और मेंटेनेंस सुविधाएं भी हैं। चकेरी एयर फोर्स स्टेशन पर वायुसेना के दो बड़े वर्कशॉप हैं, जिन्हें बेस रिपेयर डिपो कहा जाता है। पहला है 1 बीआरडी, जहां मुख्य रूप से ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट जैसे एएन-32 की मरम्मत और ओवरहॉल किया जाता है। यहां विमान के इंजन, बॉडी और सिस्टम्स की पूरी जांच और सुधार किया जाता है, ताकि वह लंबे समय तक सुरक्षित उड़ान भर सके। दूसरा है 4 बीआरडी, जहां एयरक्राफ्ट के इंजन की मरम्मत होती है। यहां मिग और मिराज जैसे फाइटर जेट्स में इस्तेमाल होने वाले इंजनों की ओवरहॉलिंग की जाती रही है।

इसके अलावा चकेरी में ही एचएएल का ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट डिविजन भी है। यहां डॉर्नियर-228 जैसे विमानों का निर्माण भी होता है और उनकी रिपेयरिंग भी की जाती है। इसके अलावा एएन-32 और दूसरे ट्रांसपोर्ट विमानों की मेंटेनेंस का काम भी यहीं होता है।

चकेरी की खासियत यह है कि यहां पहले से ही स्किल्ड वर्कफोर्स और पुरानी डिफेंस फैक्ट्री का अनुभव मौजूद है। आजादी के बाद से यह जगह एयरक्राफ्ट रिपेयर का बड़ा केंद्र रही है।

तेजी से बढ़ रहा निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर

कानपुर यूपी डिफेंस कॉरिडोर का सबसे अहम हिस्सा माना जा रहा है। यहां सबसे ज्यादा निवेश आया है और यही वजह है कि इसे इस कॉरिडोर का “इंजन” कहा जाता है। अब तक यहां करीब 12,683 करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है, जो बाकी सभी नोड्स से ज्यादा है।

यहां नए-नए डिफेंस प्रोजेक्ट्स पर काम शुरू हो चुका है। नरवल इलाके में बड़े पैमाने पर जमीन डेवलप की गई है, जहां कंपनियों को प्लॉट दिए जा रहे हैं। इसके अलावा यहां सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और स्किल डेवलपमेंट से जुड़े प्रोजेक्ट्स भी शुरू किए गए हैं। आईआईटी कानपुर जैसे संस्थान के जुड़ने से रिसर्च और टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट को भी बढ़ावा मिल रहा है। (GE Aerospace Tejas Engine Depot)

इसके अलावा कानपुर में प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों ने भी तेजी से निवेश किया है। यहां बड़े प्राइवेट प्रोजेक्ट्स भी तेजी से आ रहे हैं। अदाणी डिफेंस एंड एरोस्पेस का करीब 1,500 करोड़ रुपये का प्लांट कानपुर में शुरू हो चुका है, जहां मिसाइल और गोला-बारूद बनाए जा रहे हैं। इसे दक्षिण एशिया के बड़े डिफेंस प्लांट्स में गिना जाता है।

यह यूनिट सालाना करीब 30 करोड़ राउंड छोटे हथियारों के लिए बना सकती है। इस तरह हथियार और गोला-बारूद दोनों का निर्माण देश में ही हो रहा है, जिससे पूरी सप्लाई चेन मजबूत हो रही है। हाल ही में अदाणी डिफेंस की तरफ से सेना को डिलीवर की गईं प्रहार लाइट मशीन गन की गोलियां भी यहीं बनाई जा रही हैं।

कानपुर में टेक्नोलॉजी और रिसर्च पर भी काम हो रहा है। आईआईटी कानपुर के साथ मिलकर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाया जा रहा है। शिवली इलाके में डिफेंस पार्क की योजना है, जहां बैलिस्टिक मैटेरियल और डिफेंस टेक्सटाइल से जुड़े प्रोजेक्ट्स लगाए जाएंगे।

इसमें बड़े डिफेंस प्लांट लगाए जा रहे हैं, जहां मिसाइल, गोला-बारूद और अन्य सैन्य उपकरण बनाए जा रहे हैं। इन प्रोजेक्ट्स की वजह से न सिर्फ उत्पादन बढ़ रहा है, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के मौके भी बन रहे हैं। सरकार की तरफ से भी इन कंपनियों को पॉलिसी सपोर्ट, टैक्स में छूट और इंफ्रास्ट्रक्चर की सुविधा दी जा रही है, जिससे निवेश को बढ़ावा मिल रहा है।

सीधे शब्दों में कहें तो पुरानी फैक्ट्रियों और नई प्राइवेट कंपनियों के निवेश की वजह से कानपुर सबसे तेजी से आगे बढ़ रहा है और पूरे डिफेंस कॉरिडोर को रफ्तार दे रहा है। (GE Aerospace Tejas Engine Depot)

सेना के कई प्लेटफॉर्म्स में जीई के इंजन

कंपनी भारत में एविएशन सेक्टर को मजबूत बनाने पर भी काम कर रही है। डिजाइन, डेवलपमेंट, मैन्युफैक्चरिंग और मेंटेनेंस जैसे क्षेत्रों में लगातार सहयोग किया जा रहा है। कंपनी ने भारत में कई ट्रेनिंग प्रोग्राम भी चलाए हैं, जिनसे हजारों लोगों को तकनीकी कौशल सिखाया गया है।

तेजस के अलावा भी जीई एरोस्पेस के इंजन भारतीय नौसेना और वायुसेना के कई प्लेटफॉर्म्स में इस्तेमाल हो रहे हैं। इनमें पी-8आई मैरीटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट, एमएच-60आर हेलीकॉप्टर और एएच-64 अपाचे हेलीकॉप्टर शामिल हैं। इसके अलावा एलएम2500 गैस टरबाइन इंजन भारतीय नौसेना के युद्धपोतों और आईएनएस जैसे एयरक्राफ्ट कैरियर में भी लगाए गए हैं।

इसके साथ ही, जीई और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ‘तेजस एमके2’ के लिए भारत में एफ414 इंजनों का संयुक्त उत्पादन भी करेंगे, जिसमें 80% टेक्नोलॉजी ट्रांसफर शामिल होगा। (GE Aerospace Tejas Engine Depot)

मंगोलिया में भारतीय सेना के बॉक्सरों का जलवा! एशियन चैंपियनशिप में जीते 8 मेडल

Indian Army Boxers Asian Championship

Indian Army Boxers Asian Championship: भारतीय सेना के बॉक्सरों ने मंगोलिया में आयोजित एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में शानदार प्रदर्शन करते हुए कुल आठ मेडल अपने नाम किए हैं। इस टूर्नामेंट में सेना के खिलाड़ियों ने तीन गोल्ड, दो सिल्वर और तीन ब्रॉन्ज मेडल जीतकर देश का नाम रोशन किया।

इन सभी बॉक्सरों ने सेना के आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट में ट्रेनिंग ली है, जो मिशन ओलंपिक्स प्रोग्राम के तहत काम करता है। इस प्रोग्राम का मकसद ऐसे खिलाड़ियों को तैयार करना है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व कर सकें।

पुरुष वर्ग में विश्वनाथ ने 50 किलो कैटेगरी में गोल्ड मेडल जीता। वहीं 60 किलो वर्ग में सचिन ने सिल्वर हासिल किया। आकाश ने 75 किलो में ब्रॉन्ज जीता, जबकि लोकेश ने 85 किलो और नरेंद्र ने 90 किलो से ऊपर की कैटेगरी में ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया।

महिला वर्ग में भी भारतीय सेना की बॉक्सरों ने शानदार प्रदर्शन किया। प्रीति ने 54 किलो कैटेगरी में गोल्ड मेडल जीता। अरुंधति ने 70 किलो वर्ग में गोल्ड हासिल किया, जबकि जैस्मिन ने 57 किलो कैटेगरी में सिल्वर मेडल अपने नाम किया।

इन खिलाड़ियों की सफलता के पीछे आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट की कड़ी ट्रेनिंग और अनुशासन को अहम माना जा रहा है। यहां खिलाड़ियों को प्रोफेशनल माहौल में तैयार किया जाता है, ताकि वे बड़े मुकाबलों में बेहतर प्रदर्शन कर सकें।

मिशन ओलंपिक्स के तहत सेना लगातार ऐसे खिलाड़ियों को आगे बढ़ा रही है, जो अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में मेडल जीतने की क्षमता रखते हैं।

अब NCC कैडेट्स बनेंगे ‘साइबर डिफेंडर’, इंटरनेट सेफ्टी पर फोकस, NIELIT के साथ किया करार

NCC Cyber Security Training Programme
DG NCC, Lt Gen Virendra Vats, YSM, SM, VSM and DG NIELIT, Dr Madan Mohan Tripathi

NCC Cyber Security Training Programme: एनसीसी ने देशभर के कैडेट्स को साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में ट्रेनिंग करने के लिए एक नया कार्यक्रम शुरू किया है। इस पहल के तहत नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के साथ मिलकर साइबर सिक्योरिटी कैपेसिटी बिल्डिंग प्रोग्राम लॉन्च किया गया है। इसके लिए दोनों संस्थाओं के बीच एमओयू साइन किया गया।

इस प्रोग्राम का मकसद कैडेट्स को साइबर अवेयरनेस, डिजिटल हाइजीन और बेसिक साइबर डिफेंस स्किल्स सिखाना है। आज के समय में इंटरनेट का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है, ऐसे में ऑनलाइन सुरक्षा को समझना जरूरी हो गया है। इसी को ध्यान में रखते हुए यह ट्रेनिंग शुरू की गई है।

एनसीसी के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल वीरेंद्र वत्स और एनआईईएलआईटी के महानिदेशक डॉ. मदन मोहन त्रिपाठी की उपस्थिति में एनसीसी और एनआईईएलआईटी के बीच एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए।

इस पूरे प्रोग्राम को दो हिस्सों में बांटा गया है। पहले चरण में साइबर सिक्योरिटी अवेयरनेस प्रोग्राम होगा, जो 15 घंटे का ऑनलाइन कोर्स है। इसमें कैडेट्स को डिजिटल लिटरेसी, सुरक्षित इंटरनेट इस्तेमाल और साइबर खतरों के बारे में आसान जानकारी दी जाएगी। यह ट्रेनिंग सभी एनसीसी कैडेट्स के लिए खुली रहेगी और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए कराई जाएगी।

दूसरे चरण में साइबर डिफेंडर प्रोग्राम होगा। यह 60 घंटे का ऑफलाइन ट्रेनिंग कोर्स है, जिसमें केवल चुने गए कैडेट्स को शामिल किया जाएगा। इसमें प्रैक्टिकल ट्रेनिंग, सिमुलेशन और अलग-अलग साइबर टूल्स का इस्तेमाल सिखाया जाएगा, ताकि कैडेट्स असली परिस्थितियों में भी साइबर खतरों को पहचान सकें।

इस पहल के जरिए ऐसे प्रशिक्षित कैडेट्स तैयार किए जाएंगे, जो अपने आसपास के लोगों को साइबर सुरक्षा के बारे में जागरूक कर सकें। साथ ही वे सुरक्षित डिजिटल आदतों को बढ़ावा देने में भी मदद करेंगे। यह प्रोग्राम देश में चल रहे डिजिटल इंडिया और स्किल डेवलपमेंट से जुड़े प्रयासों के अनुरूप तैयार किया गया है, ताकि युवाओं को नई तकनीक के साथ सुरक्षित तरीके से जोड़ा जा सके।

अब भारत में ही होगा तेजस इंजन रिपेयर! F404 इंजन के लिए भारत में खास फैसिलिटी बनाएगा GE

GE-IAF F404 Engine Depot

GE-IAF F404 Engine Depot: अमेरिकी कंपनी जीई एरोस्पेस ने भारतीय वायुसेना के साथ एक समझौता किया है, जिसके तहत देश में ही एफ-404 इंजन के लिए डिपो फैसिलिटी स्थापित की जाएगी। यह वही इंजन है जो तेजस एलसीए फाइटर जेट में इस्तेमाल किया जाता है। इस फैसिलिटी के बनने के बाद भारत को इंजन की मरम्मत और ओवरहॉल के लिए विदेश पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा, जिससे समय और संसाधनों दोनों की बचत होगी।

GE-IAF F404 Engine Depot: क्या है नया समझौता

इस समझौते के तहत देश में एफ-404-आईएन20 इंजन के लिए एक इन-कंट्री डिपो तैयार किया जाएगा। इस डिपो को ऑपरेट और मेंटेन भारतीय वायुसेना करेगी। इसमें जीई एरोस्पेस तकनीकी सहयोग देगा, जिसमें ट्रेनिंग, सपोर्ट स्टाफ, जरूरी स्पेयर पार्ट्स और विशेष उपकरण शामिल होंगे।

इसका मकसद यह है कि तेजस फ्लीट के इंजनों को समय पर रिपेयर और मेंटेनेंस मिल सके और विमान ज्यादा समय तक ऑपरेशनल रहें।

एफ-404-आईएन20 इंजन भारतीय वायुसेना के लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट तेजस एमके1 और एमके1ए वेरिएंट में इस्तेमाल होता है। अभी तक जब भी इंजन में बड़ी मरम्मत की जरूरत होती थी, तो उसे विदेश भेजना पड़ता था। इस पूरी प्रक्रिया में काफी समय लग जाता था, जिससे कई बार विमान लंबे समय तक ग्राउंडेड रहते थे। अब देश में ही डिपो बनने से यह प्रक्रिया तेज हो जाएगी और इंजनों की उपलब्धता बेहतर हो सकेगी। (GE-IAF F404 Engine Depot)

यह डिपो पूरी तरह भारत में बनाया जाएगा और इसका ऑपरेशन भारतीय वायुसेना करेगी। जीई एरोस्पेस इस फैसिलिटी को तकनीकी रूप से सपोर्ट करेगा। इस प्रोजेक्ट के तहत भारतीय इंजीनियरों और तकनीकी स्टाफ को विशेष ट्रेनिंग भी देगी, साथ ही जरूरी उपकरण उपलब्ध कराएगी और यह सुनिश्चित करेगी कि सभी मरम्मत अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार हो। इसके अलावा कंपनी स्पेयर पार्ट्स की सप्लाई में भी मदद करेगी, ताकि रिपेयर का काम बिना रुकावट चलता रहे।

जीई एरोस्पेस ने भारत में पहले भी कई स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम चलाए हैं, जिनमें हजारों लोगों को मैन्युफैक्चरिंग और इंजीनियरिंग से जुड़ी ट्रेनिंग दी गई है। इस नई फैसिलिटी के जरिए भी स्थानीय स्तर पर तकनीकी कौशल को बढ़ावा मिलेगा। (GE-IAF F404 Engine Depot)

इस फैसिलिटी का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि इंजन रिपेयर में लगने वाला समय काफी कम हो जाएगा। पहले इंजन को विदेश भेजने, वहां जांच और मरम्मत कराने और फिर वापस लाने में लंबा समय लगता था। अब यह पूरा काम भारत में ही हो सकेगा, जिससे टर्नअराउंड टाइम कम होगा। इसका सीधा असर यह होगा कि ज्यादा से ज्यादा तेजस विमान ऑपरेशन के लिए उपलब्ध रहेंगे।

इस डिपो फैसिलिटी को देश में स्थापित करने का मकसद सिर्फ सुविधा बढ़ाना नहीं है, बल्कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को मजबूत करना भी है। जब इंजन की मरम्मत और मेंटेनेंस देश में ही होगी, तो विदेशी निर्भरता कम होगी और तकनीकी क्षमता भी बढ़ेगी। इससे देश के अंदर ही एक मजबूत एविएशन सपोर्ट सिस्टम तैयार होगा, जो भविष्य में अन्य प्रोजेक्ट्स के लिए भी उपयोगी रहेगा। (GE-IAF F404 Engine Depot)

पी-8आई, एमएच-60आर और अपाचे में जीई के इंजन

जीई एरोस्पेस और भारत के बीच साझेदारी नई नहीं है। पिछले करीब 40 सालों से यह कंपनी भारत के एविएशन सेक्टर के साथ काम कर रही है। तेजस विमान के अलावा कंपनी के इंजन भारतीय नौसेना के पी-8आई मैरीटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट, एमएच-60आर हेलीकॉप्टर और भारतीय वायुसेना के हेलीकॉप्टर में भी इस्तेमाल हो रहे हैं।

इसके अलावा एलएम2500 गैस टरबाइन इंजन भारतीय नौसेना के युद्धपोतों और एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत में भी लगाए गए हैं।

इस बीच एचएएल और जीई एरोस्पेस के बीच एफ-414 इंजन को लेकर तकनीकी समझौते पर भी बातचीत हुई है।
यह इंजन तेजस एमके2 के लिए इस्तेमाल किया जाएगा, जो मौजूदा एफ-404 इंजन से ज्यादा ताकतवर है। एचएएल और जीई अब इस प्रोजेक्ट की अगली स्टेज में पहुंच गए हैं, जहां कमर्शियल बातचीत आगे बढ़ेगी।

इससे पहले पिछले हफ्ते बुधवार को बेंगलुरु में एचएएल के साथ जीई के अधिकारियों की अहम बैठक हुई थी। इस बैठक में जीई एरोस्पेस के उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने एचएएल के अधिकारियों से मुलाकात की। इस अहम बैठक का फोकस तेजस के इंजन की डिलीवरी में देरी और आगे की योजना को लेकर था। बैठक में जीई एरोस्पेस की टीम का नेतृत्व कंपनी की वाइस प्रेसिडेंट रीटा फ्लेहर्टी कर रही थीं। जबकि एचएएल की तरफ से चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. डीके सुनील और डायरेक्टर (ऑपरेशंस) रवि के. शामिल हुए थे। (GE-IAF F404 Engine Depot)