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भारत को मिला चौथा S-400 ‘सुदर्शन’ सिस्टम, पाकिस्तान सीमा पर तैनाती की तैयारी; जानें कैसे करता है काम

DAC S-400 India Approval
Pic Source- IAF Disha

S-400 Sudarshan Air Defence System: रूस से भेजा गया चौथा एस-400 ‘सुदर्शन’ एयर डिफेंस सिस्टम भारत पहुंच चुका है। सूत्रों के अनुसार यह सिस्टम कुछ दिन पहले समुद्री मार्ग से भारत आया और जल्द ही इसे ऑपरेशनल क्षेत्र में तैनात किया जाएगा। माना जा रहा है कि इसकी तैनाती पाकिस्तान सीमा से जुड़े पश्चिमी सेक्टर में की जा सकती है, जहां भारतीय वायुसेना अपनी लंबी दूरी की एयर डिफेंस क्षमता को और मजबूत करना चाहती है।

एस-400 को दुनिया के सबसे एडवांस लॉन्ग रेंज एयर डिफेंस सिस्टम में गिना जाता है। यह लड़ाकू विमान, ड्रोन, क्रूज मिसाइल, बैलिस्टिक मिसाइल और कुछ प्रकार के स्टील्थ टारगेट्स को भी निशाना बना सकता है। भारतीय वायुसेना पहले से ही तीन एस-400 स्क्वाड्रन ऑपरेट कर रही है और अब चौथे सिस्टम के आने से इसकी क्षमता में और बढ़ोतरी होगी।

S-400 Sudarshan Air Defence System: रूस से भारत तक पहुंचा चौथा सिस्टम

सूत्रों के मुताबिक भारतीय वायुसेना की टीम ने रूस में इस सिस्टम का प्री-डिस्पैच इंस्पेक्शन किया था। सभी तकनीकी जांच पूरी होने के बाद इसे भारत रवाना किया गया। यह डिलीवरी पहले हो जानी थी, लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते प्रोडक्शन और सप्लाई शेड्यूल पर असर पड़ा, जिससे डिलीवरी में देरी हुई।

भारत और रूस के बीच साल 2018 में एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम की खरीद का समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत भारत को कुल पांच स्क्वाड्रन मिलने हैं। इनमें से तीन स्क्वाड्रन पहले ही भारत को मिल चुके हैं और अब चौथा सिस्टम भी पहुंच गया है। पांचवें और अंतिम सिस्टम के इस साल के आखिर तक आने की उम्मीद जताई जा रही है।

पाकिस्तान सीमा पर क्यों बढ़ी जरूरत

शुरुआती योजना के अनुसार चौथे एस-400 सिस्टम को चीन से जुड़े उत्तरी सेक्टर में तैनात किया जाना था। हालांकि सुरक्षा हालात और हाल के सैन्य अनुभवों को देखते हुए इसकी संभावित तैनाती पश्चिमी सीमा पर किए जाने की चर्चा है।

रक्षा अधिकारियों का मानना है कि पश्चिमी क्षेत्र में पहले से तैनात दो एस-400 सिस्टम ने मजबूत सुरक्षा कवच तैयार किया है, लेकिन कुछ इलाकों में अतिरिक्त कवरेज की जरूरत महसूस की गई। ऐसे में चौथे सिस्टम को पाकिस्तान सीमा के पास तैनात कर एयर डिफेंस नेटवर्क को और मजबूत किया जा सकता है।

मौजूदा योजना के अनुसार पांच एस-400 सिस्टम में से तीन पाकिस्तान मोर्चे और दो उत्तरी क्षेत्र के लिए हैं। इसके अलावा भारत अतिरिक्त पांच एस-400 सिस्टम खरीदने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ा रहा है, ताकि पूरे देश के लिए व्यापक एयर डिफेंस कवरेज तैयार किया जा सके। (S-400 Sudarshan Air Defence System)

ऑपरेशन सिंदूर में दिखी एस-400 की ताकत

एस-400 की चर्चा विशेष रूप से ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी। इस ऑपरेशन के दौरान सिस्टम ने अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान एस-400 ने 300 किमी से ज्यादा लंबी दूरी पर पाकिस्तान के एक अवॉक्स को सफलतापूर्वक निशाना बनाया था। यह सतह से हवा में मार करने वाले मिसाइल सिस्टम द्वारा दर्ज की गई सबसे लंबी दूरी की सफल कार्रवाई में से एक मानी जा रही है।

रक्षा अधिकारियों का कहना है कि इस ऑपरेशन के दौरान एस-400 की एक और खूबी सामने आई। यह सिस्टम तेजी से अपनी स्थिति बदल सकता है। सैन्य भाषा में इसे “शूट एंड स्कूट” क्षमता कहा जाता है। यानी मिसाइल दागने के बाद सिस्टम बहुत कम समय में दूसरी जगह पहुंच सकता है, जिससे दुश्मन के जवाबी हमले से बचना आसान हो जाता है।

पाकिस्तान वायुसेना के खिलाफ प्रभाव

सुरक्षा सूत्रों के अनुसार मई 2025 में हुए संघर्ष के दौरान भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान वायुसेना की गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण बनाए रखा। इसी दौरान एस-400 नेटवर्क ने दुश्मन के विमानों की निगरानी और ट्रैकिंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस दौरान भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तानी वायुसेना के एक जेएफ-17 लड़ाकू विमान को पाकिस्तानी हवाई क्षेत्र के भीतर ही निशाना बनाया था। इसके बाद पाकिस्तान के कई लड़ाकू विमानों को पीछे हटना पड़ा। हालांकि कुछ विमानों ने सीमित समय के लिए एक ऐसे क्षेत्र का उपयोग किया जहां कवरेज अपेक्षाकृत कम थी।

इसी अनुभव के बाद भारतीय रणनीतिकारों ने अतिरिक्त एस-400 सिस्टम की जरूरत पर जोर दिया, ताकि किसी भी संभावित गैप को खत्म किया जा सके। (S-400 Sudarshan Air Defence System)

आखिर क्या है एस-400 सुदर्शन सिस्टम

एस-400 रूस का बनाया एक अत्याधुनिक लंबी दूरी का एयर डिफेंस सिस्टम है। भारत में इसे सुदर्शन नाम दिया गया है। इसका मुख्य काम दुश्मन के हवाई खतरों को बहुत दूर से पहचानना और उन्हें नष्ट करना है।

यह सिस्टम एक साथ कई टारगेट्स को ट्रैक कर सकता है और अलग-अलग प्रकार की मिसाइलों का इस्तेमाल करके उन्हें निशाना बना सकता है। इसका रडार सिस्टम सैकड़ों किलोमीटर दूर मौजूद टारगेट्स का पता लगाने में सक्षम माना जाता है।

एस-400 लगभग 400 किलोमीटर तक की दूरी पर मौजूद एरियल टारगेट्स को निशाना बना सकता है। इसके अलावा यह बैलिस्टिक मिसाइलों और तेज रफ्तार से उड़ने वाले कुछ हाइपरसोनिक टारगेट्स के खिलाफ भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

एस-400 अपने पूर्ववर्ती एस-300 सिस्टम की तुलना में कहीं अधिक तेज, आधुनिक और प्रभावी है। इसका फायरिंग रेट भी पहले के सिस्टम्स से काफी ज्यादा माना जाता है। (S-400 Sudarshan Air Defence System)

एस-400 में कौन-कौन सी मिसाइलें होती हैं?

एस-400 ट्रायम्फ में अलग-अलग दूरी और अलग-अलग तरह के खतरों के लिए कई प्रकार की मिसाइलें इस्तेमाल की जाती हैं। यही वजह है कि इसे “लेयर्ड एयर डिफेंस सिस्टम” कहा जाता है।

अगर दुश्मन का विमान बहुत दूर है, तो एस-400 लंबी दूरी वाली मिसाइल इस्तेमाल करेगा। अगर टारगेट करीब है या कोई ड्रोन हमला कर रहा है, तो छोटी दूरी वाली मिसाइल दागी जाएगी। इस तरह यह सिस्टम हर तरह के हवाई खतरे से निपट सकता है।

40N6E: सबसे लंबी दूरी वाली मिसाइल

यह एस-400 की सबसे ताकतवर मिसाइल मानी जाती है। इसकी मारक क्षमता लगभग 400 किलोमीटर तक है। यह दुश्मन के अवाक्स विमान, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर एयरक्राफ्ट, जासूसी विमान और लंबी दूरी के महत्वपूर्ण हवाई लक्ष्यों को निशाना बनाने के लिए बनाई गई है।

यह मिसाइल करीब 30 किलोमीटर की ऊंचाई तक उड़ रहे टारगेट्स को मार सकती है। इसकी खासियत यह है कि यह बहुत दूर मौजूद लक्ष्य को भी ट्रैक और नष्ट करने में सक्षम है।

48N6DM: मुख्य युद्धक मिसाइल

एस-400 में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली मिसाइल 48N6 सीरीज की मानी जाती है। इसकी रेंज लगभग 200 से 250 किलोमीटर तक होती है।

यह दुश्मन के लड़ाकू विमान, क्रूज मिसाइल और बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने के लिए इस्तेमाल की जाती है। इसमें शक्तिशाली हाई-एक्सप्लोसिव वारहेड लगा होता है, जो लक्ष्य को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।

भारतीय एस-400 सिस्टम में भी इस श्रेणी की मिसाइलें शामिल हैं।

9M96E2: मध्यम दूरी की सटीक मिसाइल

यह मिसाइल लगभग 120 किलोमीटर तक के लक्ष्य को निशाना बना सकती है। इसे खास तौर पर तेजी से दिशा बदलने वाले लड़ाकू विमानों और क्रूज मिसाइलों को मार गिराने के लिए डिजाइन किया गया है।

इसमें एक्टिव रडार होमिंग तकनीक लगी होती है, जिससे यह अंतिम चरण में खुद लक्ष्य को खोजकर हमला कर सकती है। इसकी सटीकता बहुत अधिक मानी जाती है। (S-400 Sudarshan Air Defence System)

9M96E: नजदीकी सुरक्षा के लिए

यह एस-400 की छोटी दूरी वाली मिसाइल है, जिसकी मारक क्षमता लगभग 40 किलोमीटर तक है।

इसे ड्रोन, प्रिसीजन गाइडेड हथियारों, हेलीकॉप्टरों और नजदीकी हवाई खतरों को रोकने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। जब कोई खतरा एयर डिफेंस सिस्टम के काफी करीब पहुंच जाता है, तब यह मिसाइल सक्रिय भूमिका निभाती है।

कैसे दागी जाती हैं मिसाइलें?

एस-400 में “कोल्ड लॉन्च” तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। इसका मतलब है कि मिसाइल लॉन्च ट्यूब के अंदर ही इंजन नहीं जलाती।

सबसे पहले गैस जनरेटर मिसाइल को कंटेनर से ऊपर की ओर बाहर निकालता है। मिसाइल लगभग 30 मीटर ऊपर पहुंचने के बाद अपना रॉकेट इंजन चालू करती है और टारगेट की ओर बढ़ जाती है।

इस तकनीक के कई फायदे हैं। लॉन्चर को किसी खास दिशा में घुमाने की जरूरत नहीं पड़ती, लॉन्च ट्यूब सुरक्षित रहती है और सिस्टम बहुत तेजी से दोबारा फायर कर सकता है।

एस-400 के एक लॉन्चर में आमतौर पर चार लॉन्च ट्यूब होती हैं। यदि बड़ी मिसाइलें जैसे 40N6E या 48N6DM लगी हों तो एक ट्यूब में एक मिसाइल रखी जाती है। यानी एक लॉन्चर में कुल चार बड़ी मिसाइलें होंगी।

लेकिन यदि छोटी 9M96E या 9M96E2 मिसाइलें इस्तेमाल की जाएं तो एक ट्यूब में चार-चार मिसाइलें रखी जा सकती हैं। ऐसे में एक लॉन्चर कुल 16 मिसाइलें ले जा सकता है।

वहीं, एक एस-400 बैटरी में आमतौर पर आठ लॉन्चर होते हैं। हर स्क्वाड्रन में 12 लॉन्चर होते हैं। मिसाइलों के प्रकार के अनुसार इसमें 32 से लेकर 128 तक मिसाइलें मौजूद हो सकती हैं। पूरा सिस्टम एक साथ दर्जनों टारगेट्स को ट्रैक कर सकता है और लगभग 36 लक्ष्यों पर एक साथ हमला करने की क्षमता रखता है।

भारत ने रूस से पांच एस-400 स्क्वाड्रन खरीदने का समझौता किया था। इनमें लंबी दूरी वाली 40N6E, 48N6 सीरीज और 9M96 सीरीज की मिसाइलें शामिल हैं।

इन प्रणालियों के साथ शक्तिशाली रडार भी लगे होते हैं, जो लगभग 600 किलोमीटर दूर तक हवाई गतिविधियों का पता लगा सकते हैं। यही कारण है कि एस-400 को भारत की वायु रक्षा प्रणाली का सबसे मजबूत सुरक्षा कवच माना जाता है।

भारतीय एयर डिफेंस नेटवर्क की रीढ़

भारतीय वायुसेना पिछले कुछ वर्षों में मल्टीलेवल एयर डिफेंस नेटवर्क डेवलप कर रही है। इसमें स्वदेशी आकाश मिसाइल सिस्टम, एमआरएसएएम, क्यूआरएसएएम और अन्य कई डिफेंस सिस्टम्स शामिल हैं।

इन सभी के बीच एस-400 को सबसे ऊपरी स्तर का सुरक्षा कवच माना जाता है। इसकी लंबी दूरी की क्षमता इसे दुश्मन के विमानों और मिसाइलों को काफी पहले पहचानने और नष्ट करने की ताकत देती है।

रक्षा अधिकारियों का मानना है कि एस-400 देश के महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों, एयरबेस, औद्योगिक केंद्रों और रणनीतिक परिसंपत्तियों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। (S-400 Sudarshan Air Defence System)

अतिरिक्त पांच एस-400 खरीदने की तैयारी

रक्षा मंत्रालय पहले ही अतिरिक्त पांच एस-400 स्क्वाड्रन खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी दे चुका है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सिस्टम के प्रदर्शन के बाद इस आवश्यकता को और मजबूती मिली।

यदि यह योजना आगे बढ़ती है तो भारत के पास कुल 10 एस-400 स्क्वाड्रन हो सकते हैं। इससे देश के विभिन्न संवेदनशील क्षेत्रों को एयर डिफेंस सुरक्षा कवच के दायरे में लाना आसान होगा। (S-400 Sudarshan Air Defence System)

स्वदेशी विकल्प पर भी काम जारी

रूस से एस-400 की खरीद के साथ-साथ भारत अपना स्वदेशी लंबी दूरी का एयर डिफेंस सिस्टम भी डेवलप कर रहा है। इस परियोजना को “प्रोजेक्ट कुशा” नाम दिया गया है।

इस कार्यक्रम का उद्देश्य ऐसा स्वदेशी सिस्टम तैयार करना है जो लंबी दूरी पर दुश्मन के विमान, ड्रोन और मिसाइलों को मार गिराने में सक्षम हो। इस परियोजना में कई भारतीय रक्षा कंपनियां और अनुसंधान संस्थान शामिल हैं।

रक्षा क्षेत्र की प्रमुख कंपनी सोलर इंडस्ट्रीज भी इस कार्यक्रम में विकास एवं उत्पादन भागीदार के रूप में जुड़ी हुई है। प्रोजेक्ट कुशा को भारत की आत्मनिर्भर रक्षा क्षमता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है। (S-400 Sudarshan Air Defence System)

Explained: ड्रोन से टैंक नहीं, पेंट करेगा रक्षा! रूस ने मिलिटरी ट्रकों को क्यों बना दिया चलता-फिरता जेब्रा?

Russian Zebra Camouflage Trucks

Russian Zebra Camouflage Trucks: रूस-यूक्रेन युद्ध में अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन और स्मार्ट सर्विलांस सिस्टम ने टैंकों, मिसाइलों और लड़ाकू विमानों की जगह ले ली है। लो कॉस्ट ड्रोन के आगे सब फेल हैं। ड्रोन जब चाहे, जिसे चाहे निशाना बना लेते हैं। यहां तक कि ग्राउंड बेस्ड वेपन सिस्टम और लॉजिस्टिक्स व्हीकल्स को ड्रोन की नजरों से बचाने में भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। इसी बीच रूस ने अपने मिलिटरी लॉजिस्टिक्स व्हीकल्स को बचाने के लिए एक नई और अनोखी रणनीति अपनाई है।

हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर रूस के कई सैन्य ट्रकों की तस्वीरें सामने आई हैं। इन ट्रकों पर काले और सफेद रंग की धारियां बनाई गई हैं, जो देखने में बिल्कुल जेब्रा की खाल जैसी लगती हैं। पहली नजर में यह रंग-रोगन किसी प्रयोग या कलात्मक डिजाइन जैसा दिखेगा, लेकिन इसके पीछे एक गंभीर वजह छिपी हुई है।

रूस का मानना है कि यह विशेष पेंट पैटर्न यूक्रेन के ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-बेस्ड टारगेट रिकॉग्निशन सिस्टम को कन्फ्यूज कर सकता है। इसी वजह से इसे आधुनिक युद्ध में इस्तेमाल होने वाले नए तरह के कैमोफ्लाज के रूप में देखा जा रहा है।

Russian Zebra Camouflage Trucks

Russian Zebra Camouflage Trucks: सप्लाई लाइनों पर बढ़े हमलों ने बढ़ाई चिंता

रूस और यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष में अब एक-दूसरे की सप्लाई लाइनों को भी निशाना बनाया जा रहा रहा है।
यूक्रेनी सेना और उसकी खुफिया एजेंसी लगातार रूस के उन ट्रकों, ईंधन टैंकरों और गोला-बारूद वाहनों पर हमले कर रही हैं जो मोर्चे पर सैनिकों तक जरूरी सामान पहुंचाते हैं। पश्चिमी रूस, क्रीमिया और रूस के कब्जे वाले यूक्रेनी इलाकों में ऐसे हमले बढ़े हैं।

किसी भी सेना के लिए लॉजिस्टिक्स उसकी लाइफलाइन मानी जाती है। यदि सैनिकों तक समय पर गोला-बारूद, ईंधन, भोजन और उपकरण नहीं पहुंचते, तो ऑपरेशन पर असर पड़ सकता है। यही कारण है कि रूस अब इन वाहनों की सुरक्षा के लिए नए-नए उपाय अपना रहा है।

Russian Zebra Camouflage Trucks

आखिर क्या है ‘जेब्रा पैटर्न’?

रूस द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा यह पैटर्न सामान्य सैन्य रंगों से बिल्कुल अलग है। इसमें ट्रकों के पूरे ढांचे पर सफेद और काले रंग की मोटी धारियां बनाई जाती हैं।

कुछ ट्रकों पर सीधी धारियां दिखाई देती हैं, जबकि कुछ पर पत्तियों या घुमावदार आकृतियों जैसी डिजाइन बनाई गई है। खास बात यह है कि यह पैटर्न केवल वाहन के बॉडी हिस्से तक सीमित नहीं है। पहियों, टायरों और कई बाहरी हिस्सों पर भी यही रंग किया गया है। इनका उद्देश्य वाहन को छिपाना नहीं, बल्कि उसकी ऑरिजनल शेप को तोड़ना है। (Russian Zebra Camouflage Trucks)

Russian Zebra Camouflage Trucks

प्रथम विश्व युद्ध से मिली प्रेरणा

हालांकि यह रणनीति पूरी तरह नई नहीं है। लगभग एक सदी पहले प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश नौसेना ने अपने युद्धपोतों पर इसी तरह का कैमोफ्लाज इस्तेमाल किया था।

उस समय जर्मन पनडुब्बियां समुद्र में ब्रिटिश जहाजों को निशाना बना रही थीं। जहाजों को पूरी तरह छिपाना संभव नहीं था, इसलिए एक अलग तरीका अपनाया गया। जहाजों पर काले और सफेद रंग के बड़े-बड़े जियोमेट्रिक पैटर्न बनाए गए।

इस तकनीक को डैजल कैमोफ्लाज कहा गया। इसका मकसद जहाज को अदृश्य बनाना नहीं था, बल्कि दुश्मन को उसकी दिशा, गति और दूरी का सही अनुमान लगाने से रोकना था। आज रूस उसी रणनीति का युद्ध में फिर से इस्तेमाल कर रहा है।

Russian Zebra Camouflage Trucks

AI बेस्ड ड्रोन को कैसे कन्फ्यूज करता है यह पेंट?

आधुनिक युद्ध में इस्तेमाल होने वाले कई ड्रोन अब केवल कैमरे पर निर्भर नहीं रहते। उनमें मशीन विजन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक भी लगी होती है।

यह तकनीक ड्रोन को वाहन, टैंक, रडार, तोप और अन्य मिलिटरी टारगेट्स की पहचान करने में मदद करती है। ड्रोन का सॉफ्टवेयर हजारों तस्वीरों के आधार पर सीखता है कि किसी टारगेट को कैसे पहचाना जाए।

जब किसी ट्रक पर असामान्य पैटर्न बना दिया जाता है, तो उसकी सामान्य आकृति टूट जाती है। वाहन के किनारे, छत और पहियों की पहचान करना कठिन हो जाता है।

ऐसी स्थिति में एआई बेस्ड सिस्टम कभी-कभी लक्ष्य को सही ढंग से क्लासिफाइड नहीं कर पाता। इससे टारगेट पहचानने में अधिक समय लग सकता है या ड्रोन को दोबारा पुष्टि करनी पड़ सकती है। (Russian Zebra Camouflage Trucks)

मशीन विजन के लिए क्यों चुनौती है यह डिजाइन?

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-बेस्ड टारगेट रिकॉग्निशन सिस्टम वस्तुओं की रूपरेखा, आकार और किनारों के आधार पर काम करती है।

जेब्रा जैसी धारियां वाहन के वास्तविक आकार को छिपा देती हैं। कैमरे को कई अतिरिक्त रेखाएं और नकली किनारे दिखाई देते हैं। इससे सॉफ्टवेयर के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि सामने वास्तव में ट्रक है या कुछ और।

जानकारों के मुताबिक तरीका टारगेट रिकॉग्निशन सिस्टम को धीमा कर सकता है। कई बार ड्रोन को टारगेट की पुष्टि करने में अतिरिक्त समय लग सकता है।

ऑपरेटरों के लिए भी पैदा हो सकती है परेशानी

सिर्फ एआई ही नहीं, ड्रोन उड़ाने वाले ह्यूमन ऑपरेटरों को भी इस तरह के पैटर्न से दिक्कत हो सकती है।

जब कोई ट्रक तेज रफ्तार से चल रहा हो और उसके आसपास पेड़, झाड़ियां या अन्य वाहन मौजूद हों, तब उसकी दिशा और रफ्तार का अनुमान लगाना कठिन हो सकता है। (Russian Zebra Camouflage Trucks)

रूस पहले भी आजमा चुका है कई अनोखे उपाय

यह पहली बार नहीं है जब रूस ने ड्रोन हमलों से बचने के लिए असामान्य उपाय अपनाए हों।

युद्ध के शुरुआती चरण में कई रूसी ट्रकों पर लकड़ियों का अस्थायी कवच लगाया गया था। इसका उद्देश्य छोटे ड्रोन और गोलियों से कुछ अतिरिक्त सुरक्षा प्राप्त करना था।

इसके बाद रूसी टैंकों पर लोहे की जालीदार संरचनाएं लगाई गईं, जिन्हें बाद में कोप केज और टर्टल टैंक जैसे नाम मिले। जिसे पूरी दुनिया की सेनाओं ने फॉलो किया।

कई वाहनों पर जाल, अतिरिक्त प्लेटें और स्पाइक जैसे स्ट्रक्चर भी लगाए गए ताकि ड्रोन सीधे वाहन से टकराने से पहले ही रूक जाएं। (Russian Zebra Camouflage Trucks)

विमानों पर भी अपनाई गई थी ऐसी रणनीति

साल 2023 में सैटेलाइट तस्वीरों में रूस के कुछ बॉम्बर्स पर पुराने टायर रखे हुए दिखाई दिए थे। उस समय कई विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया था कि यह यूक्रेनी ड्रोन और क्रूज मिसाइलों की इमेज-मैचिंग टेक्नोलॉजी को कन्फ्यूज्ड करने की कोशिश भी हो सकती है।

बाद में अमेरिकी सैन्य तकनीकी विशेषज्ञों ने भी संकेत दिया कि किसी विमान के आइडेंटिफिकेशन सिस्टम कन्फ्यूज करने के लिए ऐसा किया जा सकता है।

क्योंकि टायरों के कारण विमान का सामान्य आकार बदल जाता है और कंप्यूटर विजन मॉडल को लक्ष्य पहचानने में परेशानी हो सकती है। (Russian Zebra Camouflage Trucks)

क्या सफल है यह रणनीति?

सैन्य विशेषज्ञों की राय इस मुद्दे पर बंटी हुई है। कुछ का मानना है कि यदि ड्रोन पूरी तरह ऑटोनॉमस मोड में टारगेट खोज रहा हो, तो इस तरह का कैमोफ्लाज उसके आइडेंटिफिकेशन सिस्टम को प्रभावित कर सकता है।

वहीं कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक ड्रोन केवल कैमरों पर निर्भर नहीं रहते। कई सिस्टम्स में थर्मल सेंसर, इन्फ्रारेड कैमरे और दूसरे एडवांस उपकरण भी होते हैं।

ऐसी स्थिति में केवल रंग बदल देने से हर प्रकार के सेंसर को धोखा देना संभव नहीं होगा। (Russian Zebra Camouflage Trucks)

ड्रोन युद्ध ने बदल दी सैन्य सोच

रूस-यूक्रेन युद्ध को दुनिया का पहला बड़े पैमाने का ड्रोन युद्ध भी कहा जा रहा है।

दोनों देश हजारों ड्रोन का इस्तेमाल कर रहे हैं। छोटे एफपीवी ड्रोन से लेकर लंबी दूरी तक मार करने वाले कामिकाजे ड्रोन तक, सब हमलों में इस्तेमाल हो रहे हैं। इन ड्रोन की वजह से टैंक, ट्रक, रडार और गोला-बारूद डिपो पहले की तुलना में अधिक असुरक्षित हो गए हैं।

वहीं, युद्ध के दौरान अग्रिम मोर्चे पर लड़ रहे सैनिकों तक जरूरी सामग्री पहुंचाना किसी भी सेना की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। रूस के लिए भी यह चुनौती कम नहीं है। लंबी दूरी तक फैले मोर्चों पर लगातार ईंधन, गोला-बारूद और अन्य सामग्री भेजनी पड़ती है।

यूक्रेनी ड्रोन इन्हीं सप्लाई मार्गों को निशाना बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में जेब्रा पैटर्न वाले ट्रकों को रूस की एक कम लागत वाली लेकिन सुरक्षा रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। (Russian Zebra Camouflage Trucks)

अब नहीं होंगे ड्रोन क्रैश! रक्षा मंत्रालय ने शुरू की नई स्वदेशी पहल, पैराशूट खोलकर सुरक्षित उतरेंगे UAV

Drone Recovery Parachute System
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Drone Recovery Parachute System: भारत में ड्रोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में किसी तकनीकी खराबी, बैटरी फेल होने या ऑपरेशन के दौरान दुर्घटना की स्थिति में महंगे ड्रोन और उनके पेलोड को सुरक्षित बचाना एक बड़ी चुनौती बन गया है।

इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए रक्षा मंत्रालय के अधीन ग्लाइडर्स इंडिया लिमिटेड की कानपुर स्थित यूनिट ऑर्डनेंस पैराशूट फैक्टरी (ओपीएफ) ने ड्रोन रिकवरी पैराशूट सिस्टम के डेवलपमेंट के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया है। इस पहल का उद्देश्य भारतीय ड्रोन उद्योग, डिफेंस आर्गेनाइजेशंस, रिसर्च आर्गेनाइजेशंस और टेक्निकल कंपनियों के साथ मिलकर ऐसे स्वदेशी रिकवरी सिस्टम तैयार करना है, जो किसी आपात स्थिति में ड्रोन को सुरक्षित तरीके से जमीन पर उतार सकें और महंगे उपकरणों को नुकसान से बचा सकें।

Drone Recovery Parachute System: ड्रोन के बढ़ते इस्तेमाल के साथ बढ़ी सुरक्षा की जरूरत

पिछले कुछ वर्षों में भारत में ड्रोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। रक्षा क्षेत्र, सीमा निगरानी, पुलिसिंग, कृषि, आपदा प्रबंधन, मेडिकल सप्लाई, लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक सर्वेक्षण जैसे क्षेत्रों में ड्रोन महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

हालांकि ड्रोन तकनीक जितनी उपयोगी है, उससे जुड़े जोखिम भी उतने ही गंभीर हैं। उड़ान के दौरान बैटरी खराब होना, मोटर फेल होना, जीपीएस सिग्नल खोना या किसी तकनीकी खराबी के कारण ड्रोन अचानक जमीन पर गिर सकता है। ऐसे मामलों में न केवल लाखों रुपये का ड्रोन नष्ट हो सकता है, बल्कि उसमें लगे कैमरे, सेंसर या अन्य महंगे उपकरण भी खराब हो सकते हैं।

इसी चुनौती से निपटने के लिए ड्रोन रिकवरी पैराशूट सिस्टम जरूरी माना जा रहा है। यह सिस्टम किसी आपात स्थिति में तुरंत एक्टिव होकर ड्रोन की स्पीड को कंट्रोल करता है और उसे सुरक्षित तरीके से जमीन पर उतारने में मदद करता है।

आयातित रिकवरी सिस्टम पर निर्भर

कानपुर स्थित ऑर्डनेंस पैराशूट फैक्टरी लंबे समय से डिफेंस प्रोडक्शन से जुड़ी रही है। साल 1941 में स्थापित यह फैक्टरी सेना के लिए विभिन्न प्रकार के पैराशूट, एयरोस्पेस टेक्सटाइल और विशेष सुरक्षा उपकरण बनाती रही है।

ओपीएफ पहले से सैनिकों के पैराशूट, कार्गो पैराशूट, ब्रेक पैराशूट और अन्य विशेष उपयोग वाले सिस्टम तैयार करती है। अब फैक्टरी अपने इसी अनुभव का उपयोग ड्रोन रिकवरी पैराशूट विकसित करने में करना चाहती है।

सूत्रों का कहना है कि वर्तमान में कई भारतीय ड्रोन निर्माता विदेशी तकनीक या आयातित रिकवरी सिस्टम पर निर्भर हैं। यदि यह तकनीक देश में विकसित होती है तो लागत कम होगी और घरेलू उद्योग को भी मजबूती मिलेगी। (Drone Recovery Parachute System)

किन-किन ड्रोन के लिए बनेगा सिस्टम

ओपीएफ ने कहा है कि वह हर कैटेगरी के ड्रोन के लिए रिकवरी सॉल्युशन डेवलप करने की संभावनाएं तलाश रही है।

इसमें छोटे नैनो ड्रोन से लेकर बड़े मिलिटरी यूएवी तक शामिल हैं। फैक्टरी ने ड्रोन को उनके अधिकतम टेक-ऑफ वजन के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा है। इनमें 250 ग्राम तक के नैनो ड्रोन, 2 किलोग्राम तक के माइक्रो ड्रोन, 25 किलोग्राम तक के स्मॉल ड्रोन, 150 किलोग्राम तक के मीडियम यूएवी, 600 किलोग्राम तक के बड़े यूएवी और उससे ऊपर की कैटेगरी के ड्रोन शामिल हैं।

ओपीएफ ने ईओआई के तहत हिस्सा लेने वाली कंपनियों और संस्थानों से उनके ड्रोन प्लेटफॉर्म से जुड़ी विस्तृत जानकारी मांगी है।

कंपनियों को अपने ड्रोन का मॉडल, प्रकार, वजन, पेलोड क्षमता, उड़ान ऊंचाई, गति और वर्तमान रिकवरी सिस्टम की जानकारी देनी होगी। इसके अलावा यह भी बताना होगा कि उन्हें किस प्रकार के पैराशूट सिस्टम की जरूरत है।

ओपीएफ यह जानना चाहती है कि ड्रोन के लिए इमरजेंसी रिकवरी सिस्टम चाहिए या मिशन पूरा होने के बाद सुरक्षित लैंडिंग के लिए अलग पैराशूट चाहिए। इसके अलावा पेलोड रिकवरी, नाइट रिकवरी, समुद्र में रिकवरी और फ्लोटेशन जैसी विशेष जरूरतों पर भी सुझाव मांगे गए हैं। (Drone Recovery Parachute System)

तकनीकी मानकों पर रहेगा विशेष फोकस

ईओआई में रिकवरी सिस्टम से जुड़े कई महत्वपूर्ण तकनीकी पहलुओं का भी जिक्र किया गया है। इसमें ड्रोन का वजन, पैराशूट खुलने की न्यूनतम ऊंचाई, अधिकतम गति, सुरक्षित अवतरण दर, सिस्टम की विश्वसनीयता और पैकिंग आकार जैसी जानकारियां शामिल हैं।

ओपीएफ यह भी जानना चाहती है कि अलग-अलग ऑपरेशनल परिस्थितियों में सिस्टम को कैसे काम करना चाहिए। इसमें अत्यधिक गर्मी, ठंड, बारिश, नमी और समुद्री वातावरण जैसी परिस्थितियां शामिल हैं।

मिलिटरी और सिविल दोनों क्षेत्रों के लिए समाधान

ओपीएफ ने स्पष्ट किया है कि वह केवल रक्षा उपयोग तक सीमित नहीं रहना चाहती। ड्रोन रिकवरी पैराशूट सिस्टम का उपयोग मेडिकल सप्लाई ड्रोन, कृषि ड्रोन, सर्विलांस प्लेटफॉर्म, मैपिंग ड्रोन, लॉजिस्टिक्स ड्रोन और समुद्री निगरानी ड्रोन में भी किया जा सकता है।

डिफेंस सेक्टर में इनका इस्तेमाल टोही मिशन, सीमा निगरानी और अन्य संवेदनशील अभियानों में किया जा सकता है। वहीं नागरिक क्षेत्र में यह तकनीक महंगे उपकरणों और संवेदनशील पेलोड की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है।

उद्योग के साथ मिलकर होगा विकास

ओपीएफ ने इस परियोजना के लिए कई प्रकार के सहयोग का प्रस्ताव रखा है। इसमें संयुक्त अनुसंधान, प्रोटोटाइप विकास, तकनीकी हस्तांतरण, दीर्घकालिक उत्पादन समझौते और निर्यात केंद्रित विनिर्माण शामिल हैं।

फैक्टरी का मानना है कि निजी कंपनियों, स्टार्टअप्स, अनुसंधान संस्थानों और रक्षा उद्योग के साथ साझेदारी करके बेहतर और व्यावहारिक समाधान विकसित किए जा सकते हैं। (Drone Recovery Parachute System)

ओपीएफ के पास मौजूद हैं आधुनिक सुविधाएं

ड्रोन रिकवरी सिस्टम डेवलप करने के लिए ओपीएफ के पास पहले से मजबूत तकनीकी आधार मौजूद है। फैक्टरी में पैराशूट डिजाइन, एयरोस्पेस टेक्सटाइल इंजीनियरिंग, कंप्यूटर आधारित डिजाइन, प्रोटोटाइप निर्माण, ग्राउंड टेस्टिंग और फ्लाइट टेस्टिंग जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं।

इसके अलावा क्वॉलिटी कंट्रोल, एन्वायरनमेंटल टेस्टिंग और बड़े पैमाने पर उत्पादन की क्षमता भी मौजूद है। यही कारण है कि ओपीएफ खुद को इस क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाने के लिए तैयार मान रही है।

ड्रोन उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षित रिकवरी सिस्टम किसी भी ड्रोन इकोसिस्टम का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। ऐसे सिस्टम न केवल महंगे प्लेटफॉर्म को बचाते हैं बल्कि मिशन की सफलता और ऑपरेशनल सेफ्टी को भी बढ़ाते हैं। भारत में इस तकनीक का विकास रक्षा और नागरिक दोनों क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। (Drone Recovery Parachute System)

Explained: SU-30 MKI से दागी गई रुद्रम-II मिसाइल, सिर्फ एक वार और दुश्मन का रडार बेकार, जानिए कितनी है खतरनाक

DRDO RudraM-II Missile SU-30MKI
DRDO Successfully Tests RudraM-II Missile From Su-30MKI

RudraM-II Missile: भारत ने एक ऐसी स्वदेशी मिसाइल का सफल परीक्षण किया है, जिसे आधुनिक युद्ध के सबसे महत्वपूर्ण हथियारों में गिना जा रहा है। डीआरडीओ और भारतीय वायुसेना ने मिलकर रुद्रम-II एयर-टू-सर्फेस मिसाइल का सफल उड़ान परीक्षण किया। यह मिसाइल सु-30 एमकेआई लड़ाकू विमान से दागी गई और उसने अपने टारगेट को बेहद सटीकता के साथ हिट किया।

क्या है RudraM-II Missile?

रुद्रम-II एक स्वदेशी एयर-टू-सर्फेस मिसाइल है। इसे फाइटर जेट से लॉन्च किया जाता है और यह जमीन पर मौजूद दुश्मन के टारगेट्स पर हमला करती है। इस मिसाइल को खास तौर पर दुश्मन के रडार, एयर डिफेंस सिस्टम, कमांड सेंटर, कम्युनिकेशन स्टेशन, बंकर और अन्य महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को नष्ट करने के लिए डेवलप किया गया है।

रुद्रम-II, डीआरडीओ की रुद्रम मिसाइल सीरीज का दूसरा और अधिक एडवांस वर्जन है। इससे पहले रुद्रम-1 डेवलप की जा चुकी है, जिसने भारतीय वायुसेना को दुश्मन के रडार सिस्टम पर हमला करने की क्षमता दी थी। रुद्रम-II को उससे कहीं अधिक शक्तिशाली और बहुउद्देश्यीय बनाया गया है।

कठिन परिस्थितियों में किया गया परीक्षण

रक्षा मंत्रालय की तरफ से मिली जानकारी के मुताबिक यह परीक्षण ओडिशा के चांदीपुर तट के पास किया गया। मिसाइल को ऐसी परिस्थितियों में छोड़ा गया जिन्हें सैन्य भाषा में “एक्सट्रीम रिलीज कंडीशंस” कहा जाता है। इसका मतलब है कि मिसाइल को अलग-अलग ऊंचाई, गति और जटिल उड़ान प्रोफाइल के दौरान लॉन्च किया गया।

मिसाइल विमान से अलग होने के बाद खुद अपने टारगेट की ओर बढ़ी और तय जगह पर बिल्कुल सटीक वार किया। परीक्षण के दौरान रेंज पर मौजूद ट्रैकिंग सिस्टम, रडार और अन्य निगरानी उपकरणों ने पूरे मिशन पर नजर रखी।

रुद्रम-II की जरूरत क्यों पड़ी?

आधुनिक युद्ध में किसी भी देश की सुरक्षा का सबसे बड़ा आधार उसका एयर डिफेंस नेटवर्क होता है। इसमें रडार, सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें और सर्विलांस सिस्टम शामिल होता है।

अगर किसी देश की वायुसेना को दुश्मन के इलाके में हमला करना है, तो सबसे पहले उसके एयर डिफेंस सिस्टम को निष्क्रिय करना जरूरी होता है। यदि ऐसा नहीं किया जाए तो लड़ाकू विमान दुश्मन की मिसाइलों का आसान निशाना बन सकते हैं।

रुद्रम-II इसी काम के लिए बनाई गई है। यह दुश्मन के रडार की पहचान कर उसे नष्ट कर सकती है, जिससे आगे आने वाले विमानों के लिए रास्ता आसान हो जाता है। (RudraM-II Missile)

कैसे काम करती है यह मिसाइल?

रुद्रम-II में अत्याधुनिक गाइडेंस और टारगेटिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इसमें पैसिव होमिंग हेड लगाया गया है, जो दुश्मन के रडार से निकलने वाले रेडियो सिग्नल को पकड़ता है। जैसे ही रडार सक्रिय होता है, मिसाइल उसके सोर्स के डायरेक्शन में बढ़ने लगती है।

इसके अलावा इसमें इमेजिंग इन्फ्रारेड सीकर भी लगाया गया है। यह लक्ष्य की गर्मी और उसकी तस्वीर के आधार पर पहचान करता है।

यही कारण है कि अगर दुश्मन अपना रडार बंद भी कर दे, तब भी मिसाइल टारगेट को खोजकर हमला कर सकती है।

रुद्रम-II की प्रमुख खूबियां

रुद्रम-II को लंबी दूरी और तेज गति वाली मिसाइल माना जाता है। इसकी अनुमानित मारक क्षमता 300 किलोमीटर से अधिक है।

यह मैक 3 से मैक 4.3 की रफ्तार से उड़ सकती है, जो लगभग 3,600 से 4,300 किलोमीटर प्रति घंटा के बराबर है। इतनी तेज गति के कारण दुश्मन के पास प्रतिक्रिया देने या बचाव करने के लिए बहुत कम समय बचता है।

करीब 600 किलोग्राम वजन वाली यह मिसाइल लगभग 4.7 मीटर लंबी होती है, जबकि कुछ आधुनिक वेरिएंट की लंबाई 5.3 मीटर तक है। इसमें 87 से 90 किलोग्राम का हाई एक्सप्लोसिव वारहेड लगाया जाता है, जो रडार स्टेशन, कमांड सेंटर और एयर डिफेंस सिस्टम को गंभीर नुकसान पहुंचाने में सक्षम है।

इसमें एक खास तरह का रैमजेट इंजन लगाया गया है। लॉन्च के बाद पहले सॉलिड फ्यूल बूस्टर मिसाइल को तेज गति देता है, फिर रैमजेट इंजन सक्रिय होकर इसे अत्यधिक गति से लक्ष्य तक पहुंचाता है।

मिसाइल को अलग-अलग ऊंचाइयों और गति पर लॉन्च किया जा सकता है। मिसाइल को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह लॉन्च के बाद स्वतः अपने लक्ष्य तक पहुंच सके। इसके लिए इसमें आधुनिक नेविगेशन सिस्टम और सटीक मार्गदर्शन तकनीक का उपयोग किया गया है।

रुद्रम-II का परीक्षण भारतीय वायुसेना के सु-30 एमकेआई लड़ाकू विमान से किया गया। सु-30 एमकेआई भारतीय वायुसेना का सबसे शक्तिशाली बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमान माना जाता है। यह लंबी दूरी तक उड़ान भर सकता है और भारी मात्रा में हथियार ले जाने में सक्षम है।

रुद्रम-II के साथ इसका कॉम्बिनेशन भारतीय वायुसेना की स्ट्राइक क्षमता को और मजबूत बनाता है। (RudraM-II Missile)

रुद्रम प्रोजेक्ट की कैसे हुई शुरुआत

भारत लंबे समय तक इस प्रकार की मिसाइलों के लिए विदेशी तकनीक पर निर्भर रहा। भारतीय वायुसेना रूसी मूल की Kh-31P जैसी मिसाइलों का इस्तेमाल करती थी।

डीआरडीओ ने लगभग एक दशक पहले स्वदेशी एंटी-रेडिएशन मिसाइल विकसित करने की परियोजना शुरू की। इस कार्यक्रम का नेतृत्व हैदराबाद स्थित रिसर्च सेंटर इमरात ने किया।

इसके साथ डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरेटरी, हाई एनर्जी मैटेरियल्स रिसर्च लेबोरेटरी, आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट और इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज जैसी संस्थाओं ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

रुद्रम-1 के सफल परीक्षणों के बाद वैज्ञानिकों ने अधिक दूरी और बेहतर मारक क्षमता वाली रुद्रम-II पर काम शुरू किया। पिछले कुछ वर्षों में इसके कई चरणों में परीक्षण किए गए और अब यह प्रणाली अपने चरम पर पहुंचती दिखाई दे रही है।

कई संस्थाओं ने मिलकर किया विकास

रुद्रम-II में डीआरडीओ के अलावा कई सरकारी और औद्योगिक संगठनों का योगदान शामिल है।

हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड, रीजनल सेंटर फॉर मिलिट्री एयरवर्थिनेस, मिसाइल सिस्टम क्वालिटी एश्योरेंस एजेंसी और विभिन्न विकास-सह-उत्पादन साझेदारों ने इसके निर्माण और परीक्षण में सहयोग किया।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सफल परीक्षण पर डीआरडीओ, भारतीय वायुसेना, रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों, उद्योग भागीदारों और सभी संबंधित टीमों को बधाई दी।

उन्होंने कहा कि इस परीक्षण ने यह दिखाया है कि भारत की स्वदेशी रक्षा तकनीक लगातार परिपक्व हो रही है। उनके अनुसार उन्नत हथियार प्रणालियों के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

डीआरडीओ के अध्यक्ष और रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव ने भी वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और परीक्षण टीमों की सराहना की। (RudraM-II Missile)

आधुनिक युद्ध में क्यों महत्वपूर्ण है ऐसी मिसाइल

हाल के सालों में दुनिया के कई संघर्षों ने दिखाया है कि वायु रक्षा प्रणाली और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध आधुनिक लड़ाई का अहम हिस्सा बन चुके हैं। किसी भी बड़े सैन्य अभियान से पहले दुश्मन के रडार और मिसाइल नेटवर्क को निष्क्रिय करना आवश्यक माना जाता है।

ऐसी स्थिति में रुद्रम-II जैसी मिसाइलें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यह दुश्मन की निगरानी क्षमता को कमजोर करने और आगे आने वाले लड़ाकू विमानों के लिए रास्ता साफ करने का काम करती हैं। (RudraM-II Missile)

DRDO and the Indian Air Force have successfully tested the indigenous RudraM-II air-to-surface missile from a Su-30MKI fighter jet under extreme operational conditions. The missile accurately struck its designated target, validating all critical systems. Designed to destroy enemy radars and air defence networks, RudraM-II significantly boosts India’s anti-radar strike capability and strengthens the country’s self-reliance in advanced defence technologies. Its successful trial marks another major milestone in India’s indigenous missile development programme.

भारतीय सेना कर रही अंतरिक्ष में युद्ध की तैयारी! स्पेस वॉरफेयर पर करेगी बड़ी स्टडी, चीन-पाकिस्तान पर नजर

Indian Army Space Warfare Study
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Indian Army Space Warfare Study: आधुनिक युद्ध अब सिर्फ जमीन, समुद्र और आसमान तक सीमित नहीं रह गया है। बल्कि दुनिया की बड़ी सैन्य ताकतें अब अंतरिक्ष यानी स्पेस को भी भविष्य के युद्ध का सबसे अहम हिस्सा मान रही हैं। भारत सरकार ने भी स्पेस वॉरफेयर को अब मल्टी डॉमेन ऑपरेशंस (MDO) में शामिल किया है, जिसमें लैंड, सी, एयर, स्पेस, साइबर और कॉग्निटिव शामिल हैं। जिसे देखते हुए भारतीय सेना ने स्पेस वॉरफेयर को लेकर बड़ी तैयारी शुरू कर दी है।

रक्षा समाचार को मिले आरएफपी डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक भारतीय सेना “स्पेस वॉरफेयर: न्यू हाई ग्राउंड ऑफ कॉन्फ्लिक्ट” को लेकर बड़ी स्टडी की तैयारी कर रही है। डॉक्यूमेंट के मुताबिक यह स्टडी आर्मी मैनेजमेंट स्टडीज बोर्ड (AMSB) के तहत कराई जाएगी।

भारतीय सेना का मानना है कि भविष्य के संघर्षों में स्पेस आधारित तकनीक की भूमिका बेहद अहम होने वाली है। इसी वजह से सेना अब स्पेस टेक्नोलॉजी, सैटेलाइट नेटवर्क, मिसाइल ट्रैकिंग, सर्विलांस सिस्टम और अंतरिक्ष आधारित सैन्य क्षमताओं पर गहराई से स्टडी करना चाहती है।

Indian Army Space Warfare Study: क्यों महत्वपूर्ण हो गया है स्पेस वॉरफेयर

पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के कई देशों ने अंतरिक्ष को रणनीतिक सैन्य क्षेत्र के रूप में विकसित करना शुरू कर दिया है। अमेरिका, चीन और रूस जैसे देश पहले से ही एंटी-सैटेलाइट हथियार, स्पेस सर्विलांस सिस्टम और मिलिट्री सैटेलाइट नेटवर्क पर काम कर रहे हैं।

आधुनिक सेना अब संचार, नेविगेशन, ड्रोन ऑपरेशन, मिसाइल गाइडेंस और रियल टाइम इंटेलिजेंस के लिए सैटेलाइट सिस्टम पर निर्भर हो चुकी है। किसी युद्ध की स्थिति में अगर दुश्मन देश के सैटेलाइट सिस्टम को नुकसान पहुंचा दे, तो उसकी संचार और सैन्य क्षमता बुरी तरह प्रभावित हो सकती है।

इसी वजह से भारतीय सेना अब स्पेस डोमेन को केवल वैज्ञानिक क्षेत्र नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा रणनीतिक क्षेत्र मान रही है। (Indian Army Space Warfare Study)

एमसीटीई करेगा स्टडी और सेमिनार

इस प्रोजेक्ट का समन्वय मिलिट्री कॉलेज ऑफ टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियरिंग करेगा, जो भारतीय सेना की प्रमुख तकनीकी संस्थाओं में गिना जाता है। यह संस्थान संचार, नेटवर्किंग, साइबर और आधुनिक युद्ध तकनीकों पर काम करता है।

डॉक्यूमेंट में कहा गया है कि स्टडी का विषय “स्पेस वॉरफेयर: न्यू हाई ग्राउंड ऑफ कॉन्फ्लिक्ट” रखा गया है और इसके तहत अंतरिक्ष आधारित युद्ध की बदलती चुनौतियों का स्टडी किया जाएगा।

सेना इस स्टडी के जरिए यह समझना चाहती है कि आने वाले समय में स्पेस आधारित सैन्य क्षमताएं युद्ध की दिशा को किस तरह प्रभावित कर सकती हैं। (Indian Army Space Warfare Study)

क्या-क्या शामिल होगा स्टडी में

डॉक्यूमेंट के अनुसार यह स्टडी केवल टेक्निकल रिसर्च तक सीमित नहीं होगी। इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा रणनीति, जियोपॉलिटिक्स और आर्थिक प्रभाव जैसे कई पहलुओं को शामिल किया जाएगा।

स्टडी में यह देखा जाएगा कि स्पेस टेक्नोलॉजी आधुनिक युद्ध को किस तरह बदल रही है। इसमें निगरानी, इंटेलिजेंस, संचार, मिसाइल ट्रैकिंग और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर जैसे विषय शामिल रहेंगे।

इसके अलावा अंतरिक्ष आधारित सैन्य क्षमताओं का भारत की रक्षा तैयारी और रणनीतिक ताकत पर क्या असर पड़ सकता है, इसका भी विश्लेषण किया जाएगा। (Indian Army Space Warfare Study)

अंतरिक्ष से जुड़े खतरों पर रहेगा फोकस

सूत्रों के मुताबिक आज का युद्ध तेजी से नेटवर्क सेंट्रिक होता जा रहा है। किसी भी सेना की ताकत अब केवल सैनिकों और हथियारों से नहीं, बल्कि उसके डेटा नेटवर्क और सैटेलाइट सिस्टम से भी तय होती है।

अगर युद्ध के दौरान किसी देश का सैटेलाइट नेटवर्क जाम या नष्ट हो जाए, तो उसकी मिसाइल गाइडेंस, जीपीएस, संचार और निगरानी क्षमता प्रभावित हो सकती है।

इसी वजह से दुनिया की कई सेनाएं अब एंटी-सैटेलाइट सिस्टम, स्पेस सर्विलांस और इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग तकनीक पर काम कर रही हैं।

भारतीय सेना की इस स्टडी में भी ऐसे खतरों और उनसे निपटने की रणनीति पर फोकस रहने की संभावना है।

एआई और आधुनिक तकनीक पर भी चर्चा

डॉक्यूमेंट में कहा गया है कि स्टडी के दौरान आधुनिक तकनीक, आर्थिक विकास और जियोपॉलिटिकल प्रभावों को भी शामिल किया जाएगा।

अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बिग डेटा, सैटेलाइट इमेजिंग और ऑटोमेटेड सिस्टम मॉडर्न वॉरफेयर का अहम हिस्सा बन चुके हैं।

स्पेस बेस्ड डेटा की मदद से अब रियल टाइम में दुश्मन की गतिविधियों की निगरानी की जा सकती है। मिसाइल लॉन्च, सैनिकों की तैनाती और सैन्य गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा सकती है।

इसी वजह से भारतीय सेना भविष्य के युद्ध में एआई और स्पेस टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल को गंभीरता से समझना चाहती है।

भारत की सैन्य रणनीति में बढ़ रहा स्पेस का महत्व

भारत पहले ही डिफेंस सेक्टर में स्पेस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल बढ़ा चुका है। भारतीय सेना, नौसेना और वायु सेना अब संचार और निगरानी के लिए कई सैन्य सैटेलाइट का इस्तेमाल कर रही हैं।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) भी कई रक्षा आधारित स्पेस परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं।

2019 में भारत ने मिशन शक्ति के तहत एंटी-सैटेलाइट मिसाइल टेस्ट भी किया था। इसके बाद भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया था जिनके पास एंटी-सैटेलाइट क्षमता मौजूद है।

सूत्रों का कहना है कि इसी बदलती स्थिति को देखते हुए भारतीय सेना अब स्पेस वॉरफेयर पर गहराई से स्टडी करना चाहती है। (Indian Army Space Warfare Study)

विशेषज्ञ संस्थानों से मांगे गए प्रस्ताव

वहीं, सेना ऐसे संस्थानों, थिंक टैंक और रिसर्च एजेंसियों से प्रस्ताव मांग रही है, जिन्हें स्पेस रिसर्च और रक्षा स्टडी का अनुभव हो।

स्टडी करने वाले संस्थानों के पास अनुभवी विशेषज्ञों की टीम होना जरूरी है। डॉक्यूमेंट के अनुसार स्टडी टीम में कम से कम पांच सदस्य होने चाहिए। इसमें मेजर जनरल स्तर के विशेषज्ञ, ब्रिगेडियर स्तर के अधिकारी और रक्षा स्टडी से जुड़े विशेषज्ञ शामिल हो सकते हैं।

इसके अलावा भारतीय सशस्त्र बलों के साथ पहले किए गए स्टडी और अकादमिक संस्थानों से सहयोग को भी मूल्यांकन का हिस्सा बनाया गया है। (Indian Army Space Warfare Study)

सेमिनार में होगी बड़ी चर्चा

इस प्रोजेक्ट के तहत केवल रिसर्च रिपोर्ट ही तैयार नहीं की जाएगी, बल्कि एक बड़ा सेमिनार भी आयोजित किया जाएगा।

डॉक्यूमेंट के अनुसार स्टडी पूरा होने के बाद विशेषज्ञों, सैन्य अधिकारियों और रणनीतिक मामलों के जानकारों के बीच विस्तृत चर्चा होगी। इसमें स्पेस आधारित युद्ध की चुनौतियों और भारत की तैयारी पर विचार किया जाएगा।

सेमिनार में मिलिट्री कम्यूनिकेशन, स्पेस सिक्योरिटी, सैटेलाइट सुरक्षा, साइबर खतरों और आधुनिक युद्ध में अंतरिक्ष की भूमिका जैसे विषय शामिल रह सकते हैं। (Indian Army Space Warfare Study)

दस महीने में पूरी करनी होगी स्टडी

डॉक्यूमेंट के मुताबिक संस्था को स्टडी और सेमिनार का काम समझौते पर हस्ताक्षर होने के दस महीने के भीतर पूरा करना होगा।

स्टडी पूरा होने के बाद संस्था को विस्तृत रिपोर्ट, प्रेजेंटेशन और हाई क्वालिटी प्रिंटेड कॉपी सेना को सौंपनी होगी। डॉक्यूमेंट में डिजिटल और हार्ड कॉपी दोनों जमा करने की बात कही गई है। (Indian Army Space Warfare Study)

राष्ट्रीय सुरक्षा पर असर का होगा विश्लेषण

स्टडी के दौरान यह भी देखा जाएगा कि स्पेस वॉरफेयर भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को किस तरह प्रभावित कर सकता है।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक अब युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रह गया है। दुश्मन देश साइबर अटैक, सैटेलाइट जैमिंग और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर के जरिए भी हमला कर सकते हैं।

अगर किसी देश का कम्यूनिकेशन नेटवर्क जाम हो जाए, तो उसकी सेना के ऑपरेशन प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए सेना अब स्पेस और साइबर दोनों क्षेत्रों को साथ लेकर चल रही है। (Indian Army Space Warfare Study)

भारत के लिए क्यों अहम है यह स्टडी

भारत के सामने चीन और पाकिस्तान जैसी दोहरी सुरक्षा चुनौती मौजूद है। चीन पहले से ही स्पेस टेक्नोलॉजी और मिलिट्री सैटेलाइट नेटवर्क पर तेजी से काम कर रहा है।

चीनी सेना स्पेस आधारित निगरानी, एंटी-सैटेलाइट वेपन और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम विकसित कर चुकी है। वहीं पाकिस्तान भी चीन की मदद से अपनी सैन्य तकनीक मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

ऐसे में भारतीय सेना भविष्य के युद्ध की तैयारी के लिए स्पेस डोमेन को लेकर अपनी रणनीति मजबूत करना चाहती है।

स्पेस को माना जा रहा नया युद्धक्षेत्र

रक्षा मामलों से जुड़े सूत्रों का कहना है कि आने वाले समय में स्पेस को “न्यू हाई ग्राउंड ऑफ कॉन्फ्लिक्ट” यानी संघर्ष का नया बड़ा मोर्चा माना जा रहा है। जिस देश के पास मजबूत स्पेस नेटवर्क और सैटेलाइट सिक्योरिटी होगी, उसे युद्ध के दौरान रणनीतिक बढ़त मिल सकती है। इसी वजह से दुनिया की बड़ी सेनाएं अब जमीन और समुद्र के साथ-साथ अंतरिक्ष को भी युद्ध का नया क्षेत्र मान रही हैं। भारतीय सेना का यह स्टडी भी उसी बदलते वैश्विक सैन्य माहौल का हिस्सा माना जा रहा है। (Indian Army Space Warfare Study)

The Indian Army is undertaking a major study on space warfare, reflecting the growing importance of satellites, space-based surveillance, missile tracking, and secure communications in modern military operations. As future conflicts expand beyond traditional battlefields, the study will examine emerging threats, space security challenges, and the role of advanced technologies in national defence. The initiative highlights India’s increasing focus on multi-domain warfare and strategic preparedness in the space domain.

भारतीय सेना के पास क्यों हो अपनी ऑर्गेनिक एयर पावर? कारगिल और सियाचिन से मिले अनुभव हैं बड़ी वजह

Indian Army Organic Air Power
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Indian Army Organic Air Power: भारतीय सेना को अपने लिए अलग एयर पावर यानी हेलिकॉप्टर और अन्य हवाई संसाधन मिलने चाहिए या नहीं, इस मुद्दे पर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। हाल ही में एक थिंक टैंक के विश्लेषण में कहा गया कि देश की तीनों सेनाओं के हवाई संसाधनों को एक जगह लाकर बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है। वहीं दूसरी ओर कई सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि सेना को अपनी जरूरतों के मुताबिक खुद के एयर एसेट्स रखना जरूरी है, क्योंकि जमीनी युद्ध के दौरान तत्काल हवाई मदद कई बार निर्णायक साबित होती है।

हालांकि मामला केवल संसाधनों के बंटवारे का नहीं है, बल्कि युद्ध के मैदान में सैनिकों तक समय पर मदद पहुंचाने और ऑपरेशन की सफलता से भी जुड़ा है। कारगिल युद्ध, सियाचिन और 1971 के युद्ध जैसे उदाहरणों को देखते हुए सेना के लिए ऑर्गेनिक एयर पावर की आवश्यकता पर फिर चर्चा हो रही है।

Indian Army Organic Air Power: आखिर क्या है ऑर्गेनिक एयर पावर?

ऑर्गेनिक एयर पावर का मतलब है कि किसी सेना के पास अपने नियंत्रण में ऐसे हवाई संसाधन हों जिन्हें वह सीधे अपने ऑपरेशन के लिए इस्तेमाल कर सके। इसमें मुख्य रूप से हेलिकॉप्टर, टोही विमान और अन्य सपोर्ट प्लेटफॉर्म शामिल होते हैं।

सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि जमीनी लड़ाई के दौरान कई बार मिनटों में फैसला लेना पड़ता है। ऐसे समय में अगर हवाई सहायता के लिए किसी दूसरी सेवा पर निर्भर रहना पड़े तो प्रतिक्रिया में देरी हो सकती है। यही वजह है कि दुनिया के कई देशों की सेनाओं के पास अपनी अलग एविएशन यूनिट मौजूद हैं।

1971 के युद्ध से मिले सबक

भारतीय सैन्य इतिहास में 1971 का युद्ध एक बड़ा उदाहरण माना जाता है। उस दौरान पूर्वी मोर्चे पर तेजी से बढ़ती सेना को रसद, सैनिकों की आवाजाही और अन्य मदद की जरूरत थी।

विशेषज्ञों का कहना है कि कई इलाकों में सेना के एविएशन संसाधनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जमीनी कमांडरों को सीधे उपलब्ध हवाई सहायता ने ऑपरेशन को रफ्तार देने में मदद की। इसी अनुभव ने बाद के सालों में आर्मी एविएशन को और मजबूत करने की सोच को बढ़ावा दिया। (Indian Army Organic Air Power)

सियाचिन में हेलिकॉप्टर हैं लाइफलाइन 

1984 में सियाचिन में शुरू हुए ऑपरेशन मेघदूत ने दिखाया कि ऊंचे और कठिन इलाकों में हेलिकॉप्टर कितने जरूरी होते हैं।

सियाचिन दुनिया का सबसे ऊंचा युद्धक्षेत्र माना जाता है। यहां सैनिकों तक राशन, हथियार, दवाइयां और अन्य जरूरी सामान पहुंचाने का सबसे बड़ा साधन हेलिकॉप्टर ही हैं।

ऐसे हालात में केवल उड़ान भरना ही चुनौती नहीं होता, बल्कि बेहद कम तापमान और ऑक्सीजन की कमी में सुरक्षित संचालन भी बड़ी जिम्मेदारी होती है। सेना का तर्क है कि ऐसे मिशनों के लिए उन्हीं पायलटों की जरूरत होती है जो सेना की कार्यप्रणाली और जमीनी जरूरतों को अच्छी तरह समझते हों।

कारगिल युद्ध में दिखी सेना एविएशन की ताकत

1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना ने दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमले कर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वहीं आर्मी एविएशन कोर के चीता और चेतक हेलिकॉप्टरों ने भी बेहद अहम जिम्मेदारी निभाई।

कारगिल की ऊंची चोटियों तक रसद पहुंचाने, घायल सैनिकों को निकालने और अग्रिम चौकियों तक सहायता पहुंचाने का काम इन हेलिकॉप्टरों ने किया।

रक्षा मामलों से जुड़ी पुस्तक द इंडियन डिफेंस बजट के अनुसार कारगिल अभियान के दौरान सेना एविएशन कोर ने लगभग 2,500 मिशन पूरे किए और 2,700 घंटे से अधिक उड़ान भरी। इस दौरान करीब 900 घायलों को सुरक्षित बाहर निकाला गया।

यह सब इसलिए संभव हो सका क्योंकि हेलिकॉप्टर सीधे सेना कमांड के नियंत्रण में थे और जरूरत के अनुसार तुरंत तैनात किए जा सकते थे। (Indian Army Organic Air Power)

क्या कहता है दुनिया की बड़ी सेनाओं का मॉडल?

अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि सभी हवाई संसाधन एक ही एयर फोर्स के पास होने चाहिए। लेकिन कई देशों की व्यवस्था इससे अलग है।

अमेरिका की सेना के पास खुद का विशाल एविएशन बेड़ा है। अमेरिकी सेना एविएशन के पास हजारों रोटरी विंग एयरक्राफ्ट यानी हेलिकॉप्टर हैं। संख्या के लिहाज से यह दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य हवाई क्षमताओं में से एक है।

ब्रिटेन की सेना के पास भी अपने अपाचे अटैक हेलिकॉप्टर हैं, जिन्हें आर्मी एविएशन कोर ऑपरेट करता है। इनका इस्तेमाल सीधे जमीनी अभियानों के सपोर्ट में किया जाता है।

इन उदाहरणों को देखते हुए कई विशेषज्ञ मानते हैं कि जमीनी युद्ध की जरूरतें अलग होती हैं और उनके लिए समर्पित हवाई संसाधन जरूरी हैं।

ब्रह्मोस मिसाइल का उदाहरण भी चर्चा में

विश्लेषण में एक और दिलचस्प मुद्दा उठाया गया है। भारतीय सेना ने 2007 में ब्रह्मोस मिसाइल रेजिमेंट को शामिल किया था। बाद में भारतीय वायुसेना ने भी ब्रह्मोस मिसाइल को अपने प्लेटफॉर्म पर शामिल किया।

कुछ विशेषज्ञ सवाल उठाते हैं कि अगर अलग-अलग सेवाओं द्वारा समान क्षमता वाले सिस्टम अपनाने को संसाधनों की पुनरावृत्ति माना जाए, तो फिर यह तर्क केवल आर्मी एविएशन पर ही क्यों लागू किया जाए।

उनका कहना है कि कई बार अलग-अलग सर्विसेज की जरूरतें अलग होती हैं और उसी के आधार पर संसाधनों का चयन किया जाता है। (Indian Army Organic Air Power)

वायुसेना के सामने भी बड़े आधुनिकीकरण कार्यक्रम

इस बहस के बीच भारतीय वायुसेना भी कई बड़े आधुनिकीकरण कार्यक्रमों पर काम कर रही है।

36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए लगभग 59 हजार करोड़ रुपये खर्च किए गए। इसके बाद तेजस एमके-1ए के 83 विमानों का अनुबंध करीब 48 हजार करोड़ रुपये का रहा। फिर अतिरिक्त 97 तेजस एमके-1ए विमानों के लिए भी बड़ा समझौता किया गया।

इसके अलावा तेजस एमके-2 और एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) जैसे कार्यक्रम भी चल रहे हैं। हाल ही में एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) कार्यक्रम के लिए आरएफपी जारी की गई है, और फुल-स्केल इंजीनियरिंग डेवलपमेंट (FSDE) कार्यक्रम के लिए 15,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे।

इन सभी परियोजनाओं के लिए अलग प्रशिक्षण, रखरखाव और सपोर्ट सिस्टम की जरूरत होती है।

विश्लेषकों का कहना है कि संसाधनों के बेहतर उपयोग पर चर्चा करते समय सभी सेवाओं के कार्यक्रमों को समान नजरिए से देखना चाहिए। (Indian Army Organic Air Power)

सेना की जरूरत का सवाल

भारतीय सेना का कहना है कि उसकी मांग किसी संस्थागत प्रतिस्पर्धा या अधिकार क्षेत्र बढ़ाने से जुड़ी नहीं है। सेना का मुख्य तर्क यह है कि जमीनी अभियानों के दौरान उसे तत्काल और हवाई सहायता की जरूरत होती है।

पहाड़ी इलाकों, सीमावर्ती क्षेत्रों और आतंकवाद विरोधी अभियानों में कई बार ऐसी परिस्थितियां बनती हैं जहां मिनटों में लिए गए फैसले मिशन की सफलता तय करते हैं। ऐसे में सीधे सेना के नियंत्रण में मौजूद हेलिकॉप्टर और हवाई संसाधन अधिक प्रभावी साबित हो सकते हैं। (Indian Army Organic Air Power)

The debate over organic air power for the Indian Army has gained renewed attention, driven by lessons from the Kargil War, Siachen operations, and modern battlefield requirements. Army Aviation helicopters played a critical role in casualty evacuation, logistics, and frontline support during Kargil, completing thousands of missions in extreme conditions. Military experts argue that dedicated air assets under Army control ensure faster response and better coordination during combat. As warfare evolves, the demand for organic air power is increasingly being viewed as an operational necessity rather than a duplication of resources.

कैलाश खेर का नया देशभक्ति गीत ‘भारतीय सेना’ वायरल, पहली बार सुनाई दी अमित शाह और राजनाथ सिंह की आवाज

Kailash Kher Bharatiya Sena Song

Kailash Kher Bharatiya Sena Song: मशहूर गायक और पद्मश्री सम्मानित कलाकार कैलाश खेर ने देश की रक्षा और सुरक्षा में जुटे सैनिकों को समर्पित एक विशेष गीत ‘भारतीय सेना’ जारी किया है। इस गाने को कैलाश खेर ने ही लिखा और संगीतबद्ध किया और अपनी आवाज दी है। खास बात यह है कि इस गीत में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह की आवाज भी सुनाई देती है। बताया जा रहा है कि पहली बार दोनों वरिष्ठ नेताओं ने किसी गाने के लिए वॉयसओवर दिया है।

यह गीत भारतीय एयरोस्पेस और रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी सैमटेल एवियोनिक्स तथा कैलाशा एंटरटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड के सहयोग से तैयार किया गया है। हाल ही में अपनी स्थापना के 50 वर्ष पूरे करने वाली सैमटेल एवियोनिक्स ने इस परियोजना के जरिए देश के सैनिकों को सम्मान देने की कोशिश की है।

Kailash Kher Bharatiya Sena Song: सैनिकों के साहस को समर्पित है गीत

भारतीय सेना’ गीत में देश की थल सेना, वायु सेना और नौसेना के जवानों के साहस, समर्पण और देशभक्ति को दर्शाया गया है। गीत के बोल और संगीत इस तरह तैयार किए गए हैं कि वे सैनिकों के संघर्ष, त्याग और कर्तव्य भावना को सामने लाते हैं।

गीत में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि देश की सीमाओं पर तैनात सैनिक हर परिस्थिति में राष्ट्र की सुरक्षा के लिए तैयार रहते हैं। इसी भावना को संगीत और शब्दों के माध्यम से व्यक्त किया गया है।

इस गीत की सबसे बड़ी खासियत रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह की भागीदारी है। दोनों नेताओं ने गीत में अपने संदेश और वॉयसओवर के जरिए सैनिकों के प्रति देश के सम्मान और आभार को व्यक्त किया है।

किसी संगीत रचना में दोनों शीर्ष नेताओं की एक साथ आवाज सुनाई देना एक अनोखी पहल है। इससे गीत का महत्व और भी बढ़ गया है।

सैमटेल एवियोनिक्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और प्रबंध निदेशक पुनीत कौरा ने कहा कि कंपनी का उद्देश्य केवल तकनीक विकसित करना नहीं है, बल्कि उन वीर पुरुषों और महिलाओं का सम्मान करना भी है जो देश की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित करते हैं।

उन्होंने कहा कि ‘भारतीय सेना’ गीत सैनिकों के साहस, बलिदान और अटूट समर्पण को समर्पित एक भावनात्मक श्रद्धांजलि है। उनके अनुसार यह पहल देश की सुरक्षा में योगदान देने वाले हर सैनिक के प्रति सम्मान व्यक्त करने का माध्यम है।

कैलाश खेर ने बताया दिल से निकला गीत

गीत के बारे में बात करते हुए कैलाश खेर ने कहा कि ‘भारतीय सेना’ केवल एक गीत नहीं बल्कि उनके दिल से निकली भावनाओं का प्रकटीकरण है। उन्होंने बताया कि इस रचना को तैयार करते समय वे भारतीय सशस्त्र बलों के साहस, धैर्य और अदम्य जज्बे से गहराई से प्रभावित थे।

कैलाश खेर ने कहा कि यह गीत उन सभी सैनिकों को उनका विनम्र प्रणाम है जो देश की आजादी और सुरक्षा की रक्षा करते हैं। उन्होंने इसे हर भारतीय के लिए गर्व और सम्मान का प्रतीक बताया।

कैलाशा एंटरटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड के बैनर तले तैयार किया गया यह गीत कई अनुभवी संगीतकारों और कलाकारों की टीम के सहयोग से बनाया गया है। ‘भारतीय सेना’ को प्रमुख डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर जारी किया गया है। यह गीत कैलाश खेर के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर भी उपलब्ध है।

सैमटेल एवियोनिक्स का कहना है कि यह पहल कंपनी की उस सोच को दर्शाती है, जिसमें रक्षा तकनीक के साथ-साथ राष्ट्रीय सेवा की भावना को भी समान महत्व दिया जाता है। गीत के माध्यम से भारतीय सशस्त्र बलों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का प्रयास किया गया है।

मिशन राफेल 2.0 शुरू! फ्रांस पहुंचे वायुसेना प्रमुख, 114 जेट्स के सौदे को मिलेगी रफ्तार

IAF Chief France Visit

IAF Chief France Visit: भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह तीन दिन की फ्रांस यात्रा पर हैं। यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब भारत 114 नए राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहा है। इस प्रस्तावित सौदे को भारतीय वायुसेना के इतिहास की सबसे बड़ी लड़ाकू विमान खरीद योजनाओं में गिना जा रहा है।

रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार भारत ने 114 राफेल विमानों की खरीद के लिए फ्रांस को आधिकारिक तौर पर लेटर ऑफ रिक्वेस्ट (एलओआर) भेज दिया है। यह दस्तावेज पिछले सप्ताह रक्षा मंत्रालय के एक्विजिशन विंग द्वारा फ्रांसीसी सरकार को सौंपा गया। अब फ्रांस अगले दो से तीन महीनों में कीमत, उपलब्धता, उत्पादन व्यवस्था और लॉजिस्टिक सपोर्ट से जुड़ा अपना जवाब भेजेगा। इसके बाद दोनों देशों के बीच औपचारिक बातचीत शुरू होगी। अधिकारियों का मानना है कि अगले एक वर्ष के भीतर इस सौदे को अंतिम रूप दिया जा सकता है।

IAF Chief France Visit: फ्रांस यात्रा में क्या है खास

एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह की यात्रा केवल एक औपचारिक दौरा नहीं है। इस दौरान उनकी मुलाकात फ्रांस की प्रमुख एयरोस्पेस कंपनी दसॉ एविएशन और मिसाइल निर्माता कंपनी एमबीडीए के वरिष्ठ अधिकारियों से होने की संभावना है।

दसॉ एविएशन वही कंपनी है जो राफेल लड़ाकू विमान बनाती है। वहीं एमबीडीए मीटिओर और स्कैल्प जैसी एडवांस मिसाइलें बनाती है। माना जा रहा है कि बातचीत का फोकस राफेल सौदे के अलावा भारतीय हथियारों के इंटीग्रेशन, तकनीकी सहयोग और भारत में उत्पादन व्यवस्था पर भी रहेगा।

पीएम मोदी जा सकते हैं फ्रांस

सूत्रों के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जून के मध्य में फ्रांस की यात्रा कर सकते हैं। इस दौरान फ्रांसीसी राष्ट्रपति और शीर्ष नेतृत्व के साथ होने वाली बैठकों में राफेल सौदा भी प्रमुख मुद्दों में शामिल रह सकता है। चूंकि यह सौदा सरकार-से-सरकार (G2G) मॉडल के तहत आगे बढ़ाया जा रहा है, इसलिए दोनों देशों के राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

भारत क्यों खरीदना चाहता है 114 नए राफेल

भारतीय वायुसेना लंबे समय से लड़ाकू स्क्वाड्रन की कमी का सामना कर रही है। वायुसेना की स्वीकृत क्षमता 42 स्क्वाड्रन की है, लेकिन वर्तमान में यह संख्या 29 है। पुराने मिग-21 और अन्य विमानों की चरणबद्ध विदाई के बाद यह चुनौती और बढ़ गई है।

इसी कमी को दूर करने के लिए मल्टी रोल फाइटर एयरक्राफ्ट कार्यक्रम के तहत 114 नए लड़ाकू विमानों की योजना तैयार की गई है। राफेल इस दौड़ में सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है क्योंकि भारतीय वायुसेना पहले से ही 36 विमानों को ऑपरेट कर रही है।

राफेल के आने से वायुसेना को नए स्क्वाड्रन खड़े करने में मदद मिलेगी और कई मोर्चों पर उसकी ऑपरेशनल क्षमता मजबूत होगी।

पहले भी भारत खरीद चुका है राफेल

भारत और फ्रांस के बीच राफेल को लेकर रक्षा सहयोग नया नहीं है। वर्ष 2016 में दोनों देशों के बीच 36 राफेल विमानों की खरीद का समझौता हुआ था। इन विमानों की सप्लाई पूरी हो चुकी है और वे अंबाला तथा हाशिमारा एयरबेस पर तैनात हैं।

पिछले कुछ सालों में राफेल ने भारतीय वायुसेना की क्षमता में बड़ा योगदान दिया है। यही कारण है कि अब बड़ी संख्या में अतिरिक्त राफेल विमानों की खरीद पर विचार किया जा रहा है।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पहले से मौजूद बुनियादी ढांचे, प्रशिक्षित पायलटों और तकनीकी स्टाफ के कारण राफेल के नए बेड़े को शामिल करना अपेक्षाकृत आसान रहेगा।

भारत में बनेंगे लगभग 90 विमान

इस प्रस्तावित सौदे की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पहली बार राफेल लड़ाकू विमान का उत्पादन फ्रांस के बाहर किया जाएगा। सूत्रों के अनुसार 114 विमानों में से 94 राफेल भारत में बनाए जाएंगे। इसके लिए फ्रांसीसी कंपनी दसॉ एविएशन किसी भारतीय साझेदार के साथ मिलकर उत्पादन लाइन स्थापित करेगी। शेष 20 विमान फ्रांस से सीधे भारतीय वायुसेना को मिलेंगे।

रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार इस कार्यक्रम में लगभग 50 प्रतिशत स्थानीयकरण (लोकलाइजेशन) का लक्ष्य रखा गया है। इसके तहत भारतीय हथियारों, भारतीय डेटा लिंक और कई स्वदेशी प्रणालियों को भी विमान में एकीकृत करने की अनुमति होगी। यही वजह है कि इस परियोजना को “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” अभियान के सबसे बड़े रक्षा कार्यक्रमों में से एक माना जा रहा है।

राफेल कार्यक्रम को मेक इन इंडिया अभियान से भी जोड़कर देखा जा रहा है। यदि बड़ी संख्या में विमान भारत में बनते हैं तो इससे रक्षा उत्पादन क्षेत्र को बड़ा प्रोत्साहन मिलेगा।

विमानों के निर्माण में शामिल होने वाली भारतीय कंपनियों को अत्याधुनिक तकनीक के साथ काम करने का अवसर मिलेगा। इससे देश में रक्षा उत्पादन से जुड़ी सप्लाई चेन भी मजबूत होगी।

पहली बार फ्रांस के बाहर बनेगा राफेल

रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी विशेषता यह होगी कि राफेल का निर्माण पहली बार फ्रांस के बाहर भारत में होगा। साथ ही भारतीय हथियारों और भारतीय प्रणालियों के एकीकरण पर भी भारत को पर्याप्त अधिकार मिलेंगे। भारतीय नौसेना के लिए राफेल-एम विमानों की डिलीवरी 2028 से शुरू होने की उम्मीद है, जबकि वायुसेना के लिए नए राफेल विमानों की आपूर्ति उसके बाद शुरू हो सकती है।

176 तक पहुंच जाएगी भारतीय राफेल बेड़े की संख्या

भारतीय वायुसेना पहले ही 36 राफेल लड़ाकू विमान शामिल कर चुकी है। इसके अलावा भारतीय नौसेना के लिए 26 राफेल-एम विमानों का सौदा भी हो चुका है। इस तरह 62 राफेल विमानों का ऑर्डर पहले से दिया जा चुका है।

यदि 114 नए राफेल विमानों का यह सौदा पूरा होता है तो भारत के पास कुल राफेल विमानों की संख्या 176 हो जाएगी। नौसेना ने भविष्य में अतिरिक्त राफेल-एम विमानों की जरूरत भी जताई है, जिससे यह संख्या और बढ़ सकती है।

राफेल क्यों माना जाता है खास

राफेल को दुनिया के सबसे आधुनिक बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमानों में गिना जाता है। यह एक ऐसा विमान है जो हवाई युद्ध, जमीनी हमले, समुद्री मिशन और लंबी दूरी की स्ट्राइक जैसे कई कार्य एक साथ कर सकता है।

इस विमान में आधुनिक रडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और उन्नत सेंसर लगे होते हैं। इसके साथ मीटिओर, माइका और स्कैल्प जैसी आधुनिक मिसाइलों का उपयोग किया जा सकता है।

भारतीय वायुसेना के पास मौजूद राफेल विमानों में भारत की जरूरतों के अनुसार कई विशेष सुधार भी किए गए हैं।

एलओआर से लेकर अनुबंध तक क्या होगी प्रक्रिया

रक्षा खरीद प्रक्रिया में लेटर ऑफ रिक्वेस्ट एक महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। इसके जरिए भारत आधिकारिक रूप से फ्रांस को अपनी आवश्यकता और शर्तों की जानकारी देगा।

फ्रांस की ओर से जवाब मिलने के बाद कीमत, उपलब्धता, उत्पादन व्यवस्था और तकनीकी सहयोग जैसे मुद्दों पर बातचीत शुरू होगी।

इसके बाद औपचारिक रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल जारी किया जाएगा। दोनों पक्षों के बीच कई दौर की वार्ता होगी। अंत में सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति की मंजूरी मिलने के बाद अंतिम अनुबंध पर हस्ताक्षर किए जाएंगे।

भारतीय सेना खरीदेगी पोर्टेबल काउंटर ड्रोन सिस्टम, 1.5 किमी दूर से GPS, Beidou और GLONASS सिग्नल करेगा जाम

Indian Army Counter UAS System
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Indian Army Counter UAS System: आधुनिक युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। कभी युद्ध के मैदान में टैंक, तोप और लड़ाकू विमान सबसे बड़े हथियार माने जाते थे, लेकिन अब छोटे आकार के ड्रोन भी बड़ी चुनौती बन चुके हैं। यूक्रेन-रूस युद्ध से लेकर पश्चिम एशिया के संघर्षों तक, ड्रोन ने युद्ध की तस्वीर बदल दी है। भारत की सीमाओं पर भी ड्रोन गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं। पाकिस्तान की ओर से हथियार और नशीले पदार्थ गिराने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल कई बार सामने आ चुका है, जबकि उत्तरी सीमाओं पर भी ड्रोन निगरानी एक बड़ी चिंता बनी हुई है।

इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए भारतीय सेना ने एक नए काउंटर-यूएएस सिस्टम की खरीद प्रक्रिया शुरू की है। सेना ऐसा पोर्टेबल सिस्टम चाहती है जो दुश्मन के ड्रोन को बिना गोली चलाए बेअसर कर सके। इसमें आधुनिक जेमिंग तकनीक वाले उपकरण की मांग की गई है।

Indian Army Counter UAS System: क्यों बढ़ी काउंटर ड्रोन सिस्टम की जरूरत

पिछले कुछ वर्षों में ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। पहले जहां ड्रोन केवल सेनाओं के पास होते थे, वहीं अब छोटे संगठन और आतंकवादी समूह भी उनका इस्तेमाल करने लगे हैं। कुछ किलो वजन वाले ड्रोन कैमरे के जरिए निगरानी कर सकते हैं, हथियार गिरा सकते हैं और यहां तक कि आत्मघाती हमलों के लिए भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने कई बार सीमा पार से आने वाले ड्रोन पकड़े हैं। कई मामलों में इन ड्रोन के जरिए हथियार, गोला-बारूद और नशीले पदार्थ भारतीय सीमा में गिराए गए। ऐसे में केवल ड्रोन खरीदना ही काफी नहीं है, बल्कि उन्हें रोकने वाली तकनीक भी उतनी ही जरूरी हो गई है।

इसी वजह से सेना अब ऐसे सिस्टम पर जोर दे रही है, जो दुश्मन के ड्रोन को उसके टारगेट तक पहुंचने से पहले ही बेकार कर दे। (Indian Army Counter UAS System)

क्या होता है काउंटर-यूएएस सिस्टम

काउंटर-यूएएस का मतलब है काउंटर अनमैन्ड एरियल सिस्टम। यह एंटी ड्रोन सिस्टम है। इसका काम दुश्मन के ड्रोन को पहचानना, उसके कंट्रोल को जाम करना और उसे मिशन पूरा करने से रोकना होता है।

भारतीय सेना जिस सिस्टम की खरीद कर रही है, वह मुख्य रूप से जेमिंग तकनीक पर आधारित है। यह ड्रोन और उसके ऑपरेटर के बीच मौजूद कम्यूनिकेशन को जाम कर देता है। इसके अलावा यह उन सैटेलाइट सिग्नलों को भी रोकता करता है जिनकी मदद से ड्रोन को डायरेक्शन मिलता है।

जब ड्रोन को सही सिग्नल नहीं मिलते तो वह या तो अपनी जगह पर रुक जाता है, वापस लौटने की कोशिश करता है या फिर टारगेट से भटक जाता है। यही कारण है कि ऐसे सिस्टम आधुनिक युद्ध में बेहद प्रभावी माने जाते हैं। (Indian Army Counter UAS System)

एक साथ कई सैटेलाइट सिस्टम को करेगा जाम

सेना ऐसा सिस्टम चाहती है, जो एक साथ कई ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम को जाम कर सके। इसमें जीपीएस, गैलीलियो, ग्लोनास और बीडू जैसे प्रमुख सैटेलाइट नेटवर्क शामिल हैं।

आज अधिकांश ड्रोन इन्हीं नेविगेशन सिस्टम पर निर्भर रहते हैं। यदि ये सिग्नल जाम हो जाएं तो ड्रोन की दिशा और कंट्रोल प्रभावित हो जाता है। यही वजह है कि जेमिंग तकनीक को एंटी-ड्रोन डिफेंस का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

360 डिग्री सुरक्षा देगा सिस्टम

सेना की मांग के अनुसार यह सिस्टम ओम्नी-डायरेक्शनल होना चाहिए। इसका मतलब है कि यह केवल एक दिशा में नहीं बल्कि चारों डायरेक्शन में काम करेगा।

तकनीकी शर्तों के अनुसार सिस्टम को 360 डिग्री तक जेमिंग कवरेज देना होगा। यानी सैनिक को यह अनुमान लगाने की जरूरत नहीं होगी कि ड्रोन किस दिशा से आ रहा है। यदि कोई ड्रोन उसके आसपास के क्षेत्र में प्रवेश करता है तो सिस्टम उसे प्रभावित कर सकेगा।

युद्ध क्षेत्र में यह क्षमता बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि ड्रोन किसी भी दिशा से अचानक दिखाई दे सकते हैं।

डेढ़ किलोमीटर तक असरदार

सेना ने इस सिस्टम के लिए न्यूनतम 1.5 किलोमीटर की जेमिंग रेंज तय की है। इसका मतलब है कि सैनिक अपने स्थान से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर तक उड़ रहे ड्रोन को भी प्रभावित कर सकेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि अग्रिम चौकियों, संवेदनशील ठिकानों और अस्थायी सैन्य शिविरों की सुरक्षा के लिए यह दूरी काफी उपयोगी साबित हो सकती है। इससे सैनिकों को ड्रोन खतरे का पहले से जवाब देने का अवसर मिलेगा।

वजन तीन किलो से कम

किसी भी सैन्य उपकरण के लिए उसका वजन बेहद महत्वपूर्ण होता है। विशेषकर पहाड़ी और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तैनात सैनिक अतिरिक्त भार नहीं उठा सकते।

इसी को ध्यान में रखते हुए सेना ने शर्त रखी है कि पूरा सिस्टम तीन किलो से कम वजन का होना चाहिए। इसका मतलब है कि सैनिक इसे अपने साथ आसानी से लेकर चल सकेगा और जरूरत पड़ने पर तुरंत इस्तेमाल कर सकेगा।

हल्का होने के बावजूद सिस्टम को मजबूत और भरोसेमंद भी होना होगा ताकि मुश्किल हालात में भी उसका परफॉरमेंस प्रभावित न हो। (Indian Army Counter UAS System)

हर मौसम में काम करने की क्षमता

भारतीय सेना रेगिस्तान, जंगल, पहाड़ और बर्फीले इलाकों सहित विभिन्न परिस्थितियों में तैनात रहती है। इसलिए किसी भी उपकरण को हर तरह के मौसम में काम करने योग्य होना जरूरी है।

दस्तावेज के अनुसार यह सिस्टम माइनस 15 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 50 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में काम करने में सक्षम होना चाहिए। इसका मतलब है कि यह हिमालयी क्षेत्रों की ठंड और पश्चिमी भारत की गर्मी दोनों में उपयोग किया जा सकेगा।

इसके अलावा इसे आईपी-67 सुरक्षा मानक के अनुरूप भी होना होगा। ताकि यह धूल और पानी से भी सुरक्षित रहे।

आठ घंटे लगातार ऑपरेशनल

सैन्य अभियानों में लगातार ऑपरेशन बेहद महत्वपूर्ण होता है। इसलिए सेना ने मांग की है कि यह सिस्टम बैटरी के सहारे कम से कम आठ घंटे तक लगातार काम कर सके।

इससे सैनिकों को बार-बार बैटरी बदलने या चार्जिंग की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। लंबी गश्त, सीमा सुरक्षा और महत्वपूर्ण सैन्य गतिविधियों के दौरान यह विशेष रूप से उपयोगी होगा।

दस्तावेज में यह भी कहा गया है कि सिस्टम के सभी मोड चौबीसों घंटे संचालन के लिए सक्षम होने चाहिए।

वहीं, सेना केवल काउंटर ड्रोन सिस्टम ही नहीं खरीद रही, बल्कि ड्रोन प्रशिक्षण से जुड़ी सुविधाओं पर भी ध्यान दे रही है।

तकनीकी दस्तावेज में ड्रोन सॉकर एरीना, डिफेंस ट्रेनिंग सिमुलेटर और अवरोधक प्रशिक्षण क्षेत्र जैसी व्यवस्थाओं का भी उल्लेख किया गया है। सेना ड्रोन ऑपरेशन और एंटी ड्रोन दोनों क्षमताओं को साथ-साथ विकसित करना चाहती है।

ड्रोन सॉकर एरीना में सैनिक सुरक्षित वातावरण में ड्रोन ऑपरेशन का अभ्यास कर सकेंगे। वहीं सिमुलेटर के जरिए वास्तविक परिस्थितियों जैसी ट्रेनिंग दी जा सकेगी। (Indian Army Counter UAS System)

एफपीवी ड्रोन भी होंगे ट्रेनिंग का हिस्सा

दस्तावेज में आठ इंच और दस इंच कैटेगरी के एफपीवी ड्रोन का भी उल्लेख किया गया है। एफपीवी यानी फर्स्ट पर्सन व्यू ड्रोन, जिन्हें ऑपरेटर कैमरे के जरिए वास्तविक समय में कंट्रोल करता है।

इन ड्रोन की उड़ान अवधि, गति और पेलोड क्षमता को देखते हुए स्पष्ट है कि सेना ड्रोन ऑपरेशन की नई तकनीकों पर भी काम कर रही है। कुछ ड्रोन 180 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक रफ्तार हासिल कर सकते हैं और विशेष परिस्थितियों में विभिन्न प्रकार के पेलोड ले जाने में सक्षम होते हैं।

मेक इन इंडिया को मिलेगा बढ़ावा

इस प्रोक्योरमेंट प्रोसेस में आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया पर विशेष जोर दिया गया है। केवल क्लास-1 और क्लास-2 स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं को भाग लेने की अनुमति दी गई है।

डिलीवरी की समयसीमा 20 दिन तय की गई है। साथ ही चयनित विक्रेता को प्रशिक्षण और आवश्यक सहायता भी उपलब्ध करानी होगी। सेना ने अनुभव, प्रदर्शन और तकनीकी क्षमता से जुड़े कई मानदंड भी निर्धारित किए हैं ताकि केवल सक्षम कंपनियां ही इस प्रक्रिया में भाग ले सकें। (Indian Army Counter UAS System)

The Indian Army has initiated the procurement of a portable Counter-Unmanned Aerial System (Counter-UAS) to strengthen its ability to detect and neutralize hostile drones. Designed for modern battlefield requirements, the system will be capable of disrupting enemy drone operations at ranges of up to 1.5 kilometers through advanced signal jamming technology. The lightweight and portable solution will help troops counter surveillance, reconnaissance, and weaponized drones in sensitive border areas and operational zones. This move reflects the Army’s growing focus on anti-drone warfare capabilities as unmanned aerial threats continue to evolve, posing significant security challenges across multiple theatres.

SSB भर्ती घोटाले में रिटायरमेंट के आखिरी दिन सेना के मेजर जनरल पर बड़ा एक्शन, 20 से ज्यादा अफसरों का होगा कोर्ट मार्शल

SSB Recruitment Scam
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SSB Recruitment Scam: भारतीय सेना में अधिकारी भर्ती प्रक्रिया से जुड़े एक पुराने और चर्चित भ्रष्टाचार मामले में बड़ा कदम उठाया गया है। सेना ने सर्विस सेलेक्शन सेंटर (एसएसबी) कपूरथला भर्ती घोटाले में एक मेजर जनरल समेत कई अधिकारियों के खिलाफ कोर्ट मार्शल की कार्रवाई शुरू कर दी है। यह मामला वर्ष 2021 में सामने आया था, जब आरोप लगे थे कि कुछ उम्मीदवारों को पैसे लेकर अधिकारी चयन प्रक्रिया में पास कराया गया।

इस पूरे मामले की जांच पहले सैन्य खुफिया एजेंसियों ने की थी। बाद में मामला सीबीआई तक पहुंचा। करीब पांच साल तक चली जांच और विभागीय कार्रवाई के बाद अब सेना ने आरोपित अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का फैसला किया है।

SSB Recruitment Scam: रिटायरमेंट के आखिरी दिन लागू की विशेष कानूनी धारा

सूत्रों के अनुसार जिस मेजर जनरल के खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई है, वह उस समय सर्विस सेलेक्शन सेंटर, कपूरथला के प्रमुख थे। सेना ने उनके रिटायर होने के अंतिम दिन आर्मी एक्ट की धारा 123 लागू की। यह धारा सेना को यह अधिकार देती है कि यदि किसी अधिकारी पर सेवा अवधि के दौरान अपराध करने का आरोप हो तो रिटायरमेंट के बाद भी उसे जांच और कोर्ट मार्शल के लिए वापस बुलाया जा सकता है।

सेना के अधिकारियों का कहना है कि इस प्रावधान का इस्तेमाल तभी किया जाता है जब मामला गंभीर प्रकृति का हो और आरोपों की जांच में पर्याप्त आधार सामने आए हों। (SSB Recruitment Scam)

मई 2026 में कई अधिकारियों को किया अटैच

जानकारी के मुताबिक मई 2026 में मेजर जनरल को दिल्ली एरिया मुख्यालय से अटैच किया गया। इसके अलावा करीब 20 अन्य अधिकारियों को भी अलग-अलग सैन्य प्रतिष्ठानों से जोड़कर जांच प्रक्रिया के लिए रखा गया है। इनमें कुछ ऐसे अधिकारी भी शामिल हैं जो अब रिटायर हो चुके हैं। वहीं, अधिकारियों के अलावा कुछ जूनियर रैंक के सैन्यकर्मी भी जांच और अनुशासनात्मक कार्रवाई का सामना कर रहे हैं। (SSB Recruitment Scam)

आखिर क्या था भर्ती घोटाला?

यह मामला सेना में अधिकारी चयन के लिए होने वाली एसएसबी प्रक्रिया से जुड़ा है। एसएसबी वह संस्था है जो राष्ट्रीय रक्षा अकादमी, संयुक्त रक्षा सेवा परीक्षा, तकनीकी प्रवेश और अन्य अधिकारी स्तर की भर्तियों के लिए उम्मीदवारों का मूल्यांकन करती है।

आरोप था कि कुछ अधिकारियों और बिचौलियों ने मिलकर उम्मीदवारों से पैसे लेकर उन्हें चयन प्रक्रिया में फायदा पहुंचाया। जांच में सामने आया कि कुछ उम्मीदवारों से 50 हजार रुपये से लेकर 10 लाख रुपये तक की रकम ली गई थी।

जांच एजेंसियों के अनुसार रिश्वत की रकम नकद, बैंक ट्रांसफर, यूपीआई और अन्य डिजिटल माध्यमों से ली गई। कई मामलों में अधिकारियों के परिजनों के खातों में भी रकम भेजी गई थी। (SSB Recruitment Scam)

सीबीआई की एफआईआर में 23 लोग नामजद

मार्च 2021 में सीबीआई ने इस मामले में एफआईआर दर्ज की थी। जांच एजेंसी ने कुल 23 लोगों को आरोपी बनाया था। इनमें 17 सैन्य अधिकारी और कर्मचारी तथा छह नागरिक शामिल थे।

जांच में कुछ अधिकारियों पर उम्मीदवारों को चयन प्रक्रिया में मदद करने, चिकित्सा जांच को प्रभावित करने और बिचौलियों के माध्यम से पैसों का लेन-देन कराने के आरोप लगे।

सीबीआई ने अपनी जांच में कई बैंक खातों की पड़ताल की और डिजिटल लेन-देन का रिकॉर्ड जुटाया। एजेंसी का दावा था कि कुछ मामलों में रिश्वत के पैसे सीधे परिवार के सदस्यों के खातों तक पहुंचे थे।

मेडिकल रिजेक्शन को पास कराने का आरोप

जांच के दौरान पता चला कि कुछ उम्मीदवारों को पहले मेडिकल आधार पर अस्थायी रूप से अयोग्य घोषित किया गया था, लेकिन बाद में समीक्षा मेडिकल बोर्ड के दौरान उन्हें पास करा दिया गया।

सीबीआई के दस्तावेजों के अनुसार एक सैन्यकर्मी कथित रूप से ऐसे उम्मीदवारों की सूची तैयार करता था जिन्हें मेडिकल आधार पर रोका गया था। बाद में इन उम्मीदवारों या उनके परिवारों से संपर्क किया जाता था और कथित तौर पर पैसे लेकर उन्हें राहत दिलाने की कोशिश की जाती थी।

यही हिस्सा जांच एजेंसियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण साबित हुआ क्योंकि इसमें चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हुए।

एनडीए और ओटीए तक पहुंची जांच

जांच के दौरान कुछ ऐसे मामलों की भी पहचान हुई, जिनका संबंध राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) और ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी से था।

सीबीआई की जांच में ऐसे उम्मीदवारों की जानकारी भी दी गई जिन्हें कथित तौर पर पैसे लेकर अधिकारी प्रशिक्षण संस्थानों में प्रवेश दिलाने की कोशिश की गई थी।

मामले की जांच के दौरान सीबीआई ने देश के कई हिस्सों में एक साथ छापेमारी की थी। कपूरथला, बठिंडा, दिल्ली, कैथल, पलवल, लखनऊ, बरेली, गोरखपुर, जयपुर, विशाखापट्टनम, गुवाहाटी और जोरहाट समेत 13 शहरों में लगभग 30 स्थानों पर तलाशी ली गई थी।

कुछ सैन्य प्रतिष्ठान और अस्पताल भी जांच के दायरे में आए। एजेंसी ने बड़ी मात्रा में दस्तावेज, बैंक रिकॉर्ड, डिजिटल डाटा और अन्य सामग्री जब्त की थी।

जांच अधिकारियों का कहना था कि इन दस्तावेजों ने पैसों के लेन-देन और उम्मीदवारों से जुड़े संपर्कों को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। (SSB Recruitment Scam)

मिलिटरी इंटेलिजेंस इनवेस्टिगेशन से खुला था मामला

इस घोटाले का खुलासा सबसे पहले मिलिटरी इंटेलिजेंस की जांच में हुआ था। कुछ अधिकारियों पर अवैध आर्थिक लाभ लेने के आरोप सामने आने के बाद मामला सेना मुख्यालय पहुंचा।

इसके बाद अतिरिक्त महानिदेशालय अनुशासन एवं सतर्कता ने विस्तृत जांच कराई और फिर मामला सीबीआई को सौंप दिया गया।

सेना ने शुरू से ही यह रुख रखा कि अधिकारी चयन जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में किसी भी तरह की अनियमितता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

अदालतों तक भी पहुंचा था मामला

जांच के दौरान कुछ आरोपित अधिकारियों ने अपने खिलाफ की गई कार्रवाई को विभिन्न कानूनी मंचों पर चुनौती दी थी। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट और सशस्त्र बल न्यायाधिकरण में याचिकाएं दायर की गईं।

हालांकि उपलब्ध जानकारी के अनुसार इन याचिकाओं को राहत नहीं मिली और जांच प्रक्रिया जारी रही। इसके बाद विभागीय कार्रवाई का रास्ता साफ हो गया। (SSB Recruitment Scam)

एसएसबी चयन प्रक्रिया क्यों है अहम?

भारतीय सशस्त्र बलों में अधिकारी बनने के लिए एसएसबी प्रक्रिया सबसे महत्वपूर्ण चरणों में से एक मानी जाती है। यहां उम्मीदवारों के नेतृत्व, निर्णय क्षमता, मानसिक मजबूती, व्यक्तित्व और समूह में काम करने की क्षमता का मूल्यांकन किया जाता है।

इसी वजह से चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता को बेहद गंभीरता से लिया जाता है। यदि किसी भी स्तर पर हस्तक्षेप या भ्रष्टाचार की आशंका पैदा होती है तो उसका असर पूरी भर्ती व्यवस्था की साख पर पड़ सकता है।

यही कारण है कि सेना ने मामले की जांच पूरी होने के बाद संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की है। (SSB Recruitment Scam)

सेना ने प्रक्रिया में बढ़ाई निगरानी

मामला सामने आने के बाद भर्ती प्रक्रिया की निगरानी और इवैल्यूशन सिस्टम को और सख्त बनाया गया। विभिन्न चरणों में अतिरिक्त जांच और रिकॉर्ड सत्यापन की व्यवस्था लागू की गई।

सेना के अधिकारियों का कहना है कि अधिकारी चयन प्रणाली की निष्पक्षता बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है और इसी उद्देश्य से समय-समय पर प्रक्रियाओं की समीक्षा की जाती है। (SSB Recruitment Scam)

The Indian Army has initiated court martial proceedings against a Major General and several other officers in connection with the 2021 SSB recruitment bribery scam. The case revolves around allegations that candidates were selected for officer training after illegal payments ranging from Rs 50,000 to Rs 10 lakh. Following an extensive investigation by Military Intelligence and the Central Bureau of Investigation (CBI), multiple officers were found linked to irregularities in the Service Selection Board (SSB) selection process at Kapurthala. The Army invoked Section 123 of the Army Act to proceed against retired personnel, highlighting its commitment to transparency, accountability, and integrity in military recruitment.