IAF 1000 kg aerial bomb: डिफेंस सेक्टर में स्वदेशी पहल के तहत रक्षा मंत्रालय ने भारतीय वायुसेना के लिए 1000 किलोग्राम वजन वाले एरियल बम को देश में ही डिजाइन और डेवलप करने की तैयारियां शुरू दी हैं। यह बम क्षमता के लिहाज से अमेरिकी एमके-84 जैसे बम के बराबर माना जा रहा है।
इस पहल के तहत अब भारतीय कंपनियों से इस प्रोजेक्ट में भाग लेने के लिए “एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट” यानी ईओआई जारी किया गया है, जिसके जरिए कंपनियां इस प्रोजेक्ट में शामिल होने के लिए आवेदन कर सकेंगी।
IAF 1000 kg aerial bomb: दो चरणों में पूरा होगा पूरा प्रोजेक्ट
इस पूरी योजना को दो हिस्सों में बांटा गया है। पहले चरण में इस बम का डिजाइन और डेवलपमेंट किया जाएगा। इस दौरान कुल छह प्रोटोटाइप बनाए जाएंगे। इनमें कुछ असली यानी लाइव बम होंगे और कुछ डमी यानी इनर्ट बम होंगे, जिनका इस्तेमाल टेस्टिंग के लिए किया जाएगा।
इन प्रोटोटाइप के साथ टेल यूनिट और दूसरे जरूरी उपकरण भी डेवलप किए जाएंगे, ताकि बम को पूरी तरह ऑपरेशनल बनाया जा सके। दूसरे चरण में इन बमों की खरीद की प्रक्रिया शुरू होगी। इसके लिए योग्य कंपनियों को चुनने के बाद कमर्शियल रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल यानी आरएफपी जारी किया जाएगा। (IAF 1000 kg aerial bomb)
भारतीय वायुसेना की जरूरतों के मुताबिक डिजाइन
इस बम को इस तरह डिजाइन किया जाएगा कि इसे भारतीय वायुसेना के अलग-अलग तरह के लड़ाकू विमानों से इस्तेमाल किया जा सके। खास बात यह है कि यह बम सिर्फ भारतीय या स्वदेशी विमान ही नहीं, बल्कि रूसी और राफेल पर लगाया जा सकेगा। इससे वायुसेना के मौजूदा बेड़े में इसे आसानी से शामिल किया जा सकेगा।
इस प्रोजेक्ट में स्वदेशीकरण पर खास जोर दिया गया है। डेवलपमेंट के दौरान कम से कम 50 प्रतिशत सामग्री भारत में बनी होनी जरूरी होगी। यह परियोजना “मेक-II” श्रेणी के तहत शुरू की जा रही है, जिसका मतलब है कि इसमें शुरुआती निवेश उद्योग खुद करेगा। बाद में जब बम तैयार हो जाएगा, तो इसे “बाय (इंडियन-आईडीडीएम)” श्रेणी के तहत खरीदा जाएगा। आईडीडीएम का मतलब है कि सिस्टम का डिजाइन, विकास और निर्माण भारत में ही हुआ हो। (IAF 1000 kg aerial bomb)
600 एरियल बम खरीदने की योजना
इस परियोजना के तहत भारतीय वायुसेना करीब 600 एरियल बम खरीदने की योजना बना रही है। फिलहाल इस तरह के बम विदेशों से खरीदे जाते हैं और वायुसेना के पास पहले से मौजूद हैं। लेकिन अब सरकार चाहती है कि इस तरह के हथियार देश में ही बनाए जाएं, ताकि बाहरी निर्भरता कम हो सके।
यह 1000 किलोग्राम का एरियल बम एक हाई-कैलिबर हथियार होगा, जिसका इस्तेमाल बड़े और मजबूत लक्ष्यों को नष्ट करने के लिए किया जाता है। इसमें “नेचुरल फ्रैगमेंटेशन” यानी विस्फोट के बाद छोटे-छोटे टुकड़े फैलने की क्षमता होगी, जिससे आसपास के इलाके में ज्यादा नुकसान होता है। इसके साथ ही इसमें हाई ब्लास्ट इफेक्ट और पीक ओवर-प्रेशर यानी तेज दबाव पैदा करने की क्षमता होगी, जिससे दुश्मन के बंकर, इमारतें या रनवे जैसे मजबूत ठिकाने भी निशाना बन सकते हैं। (IAF 1000 kg aerial bomb)
भारत में ही होगी टेस्टिंग
इस बम के सभी परीक्षण भारत में ही किए जाएंगे। इसके लिए भारतीय वायुसेना की यूनिट्स या अन्य तय स्थानों का इस्तेमाल किया जाएगा। टेस्टिंग के दौरान इस बम को अलग-अलग विमान प्लेटफॉर्म से गिराकर उसकी क्षमता और सटीकता को परखा जाएगा। इन परीक्षणों के आधार पर पहले पीएसक्यूआर यानी प्रारंभिक तकनीकी जरूरतों को तय किया जाएगा और फिर उन्हें एएसक्यूआर यानी अंतिम मानकों में बदला जाएगा।
रक्षा मंत्रालय के मुताबिक इस पूरी प्रक्रिया को पूरा होने में करीब ढाई साल का समय लगेगा। इसमें डिजाइन, प्रोटोटाइप तैयार करना, टेस्टिंग, मूल्यांकन और कॉन्ट्रैक्ट साइन करने जैसे सभी चरण शामिल होंगे। हर चरण में तकनीकी और वित्तीय मानकों के आधार पर कंपनियों का चयन किया जाएगा। (IAF 1000 kg aerial bomb)
इस प्रोजेक्ट में सिर्फ सरकारी संस्थानों ही नहीं, बल्कि निजी कंपनियों को भी हिस्सा लेने का मौका दिया गया है। भारतीय कंपनियां इस परियोजना में सीधे भाग ले सकती हैं। इसके अलावा कुछ शर्तों के तहत विदेशी कंपनियों के साथ साझेदारी, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर या जॉइंट वेंचर के जरिए भी भागीदारी की अनुमति होगी। हालांकि, ऐसे मामलों में भी यह जरूरी होगा कि डिजाइन और निर्माण का मुख्य हिस्सा भारत में ही हो।
इससे पहले नवंबर 2023 में आर्डनेंस फैक्ट्री खमारिया के अगुवाई में मेटल स्टील फैक्ट्री इशापोर और आर्डनेंस फैक्ट्री दम दम के साथ मिलकर इस स्वदेशी बम को डेवलप करने को लेकर गठजोड़ किया था। इस नए बम में “प्रिसिजन गाइडेड” तकनीक भी जोड़ी जा रही है, जिससे यह अपने लक्ष्य पर ज्यादा सटीक तरीके से हमला कर सकेगा। इसके तहत आधुनिक 1000 किलोग्राम के एमके-84 जैसे बम बनाए जाने हैं। इस नए स्वदेशी बम में भी सटीक मार्गदर्शन तकनीक जोड़ने पर काम किया जा रहा है, इसमें गाइडेंस किट लगाकर इसे “स्मार्ट बम” में बदला जा सकता है, जो तय लक्ष्य पर सटीक तरीके से गिरता है और अनावश्यक नुकसान को कम करता है। (IAF 1000 kg aerial bomb)
Strait of Hormuz Maritime Threat: 20-29 मार्च के आसपास स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज और पर्शियन गल्फ में जहाजों पर हमलों की संख्या अचानक घट गई थी, जिसके बाद यह अनुमान लगाए जा रहे थे कि ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर को लेकर जल्दी ही कोई समझौता हो सकता है।
गुरुग्राम स्थित इंडियन नेवी के सहयोग से काम करने वाले इंफॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर-इंडियन ओशन रीजन (IFC-IOR) की रिपोर्ट के मुताबिक हाल के दिनों में जो 9 दिन की शांति दिखी थी, वह असल में किसी सीजफायर या कूटनीतिक समझौते का नतीजा नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि 28 फरवरी से शुरू हुई जंग के बाद अरब सागर क्षेत्र, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और गल्फ ऑफ ओमान में समुद्री सुरक्षा हालात बेहद खराब हो चुके हैं और खतरे का स्तर “क्रिटिकल” बना हुआ है। बता दें कि ने IFC-IOR कई देशों के साथ मिलकर समुद्री गतिविधियों की निगरानी करता है।
Strait of Hormuz Maritime Threat: 9 दिन की शांति: क्या थी असली वजह?
रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि 9 दिन का जो शांत समय दिखा था, वह किसी भी तरह से युद्ध रुकने का संकेत नहीं था। यह एक “टैक्टिकल पॉज” यानी रणनीतिक ठहराव था।
IFR-IOR की रिपोर्ट के मुताबिक इस दौरान हमला करने वाले पक्ष ने अपनी गतिविधियों को रोकने के बजाय दोबारा हमले की तैयारी की। बाद में एमवी एक्सप्रेस रोम, एमवी अल सल्मी और एमवी एक्वा 1 जैसे जहाजों पर हुए हमलों ने यह साबित कर दिया कि यह सिर्फ एक अंतराल था, अंत नहीं।
इस पैटर्न में पहले तेज हमले होते हैं, फिर कुछ दिन का अंतर आता है और उसके बाद फिर से हमले शुरू हो जाते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक ज्यादातर हमले दिन के समय या ऐसे समय पर हुए जब उनका सटीक समय तय नहीं किया जा सका। लेकिन जो पैटर्न सामने आया है उससे यह साफ होता है कि हमले मौके का फायदा उठाकर किए गए। खास तौर पर ऐसे जहाजों को निशाना बनाया गया जो समुद्र में अपने तय रास्ते पर आगे बढ़ रहे थे। अधिकतर हमले सुबह या दोपहर के समय देखने को मिले, जब जहाज सामान्य रूप से अपनी यात्रा जारी रखते हैं।
रिपोर्ट बताती है कि अब समुद्री हमले सिर्फ एक जगह तक सीमित नहीं रहे हैं। शुरुआत में हमले स्ट्रेट ऑफ होर्मुज तक सीमित थे, लेकिन अब यह खतरा बढ़कर उत्तरी अरब सागर, यूएई के पानी और प्रमुख बंदरगाहों तक फैल गया है।
हमलों का तरीका भी बदल गया है। अब सिर्फ मिसाइल या पारंपरिक हथियार ही नहीं, बल्कि ड्रोन, बिना चालक वाली नावें और इंटरसेप्शन के दौरान गिरने वाला मलबा भी खतरा बन रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, 28 फरवरी से 2 अप्रैल तक कुल 29 घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिनमें से 23 जहाज सीधे हमलों का शिकार हुए। पिछले सात दिनों में भी तीन हमले सामने आए हैं, जो लगातार बने खतरे को दिखाते हैं। अरब सागर, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और गल्फ ऑफ ओमान के पूरे क्षेत्र में खतरे का स्तर इस समय ‘क्रिटिकल’ बना हुआ है, यानी स्थिति बेहद गंभीर है। (Strait of Hormuz Maritime Threat)
जीपीएस जामिंग के खतरा बढ़ा
रिपोर्ट में जीपीएस और जीएनएसएस जामिंग पर चिंता जाहिर की गई है। जिसका मतलब है कि जहाजों के नेविगेशन सिस्टम सही काम नहीं कर रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास, गल्फ ऑफ ओमान और अरब सागर के इलाके में लगातार जीपीएस और जीएनएसएस सिस्टम में दिक्कत आ रही है। इसकी वजह से जहाजों को सही दिशा और लोकेशन का पता लगाने में परेशानी हो रही है। एआईएस सिस्टम, जिससे जहाजों की पहचान और ट्रैकिंग होती है, वह भी प्रभावित हो रहा है।
यह खतरा अचानक सामने आ सकता है और किसी भी जहाज को निशाना बना सकता है, चाहे वह किसी भी देश का हो, किस कंपनी का हो या उसमें क्या सामान हो। खास तौर पर वे जहाज ज्यादा जोखिम में हैं जो एक जगह खड़े होते हैं, आदेश का इंतजार कर रहे होते हैं या किसी अहम समुद्री रास्ते के पास काम कर रहे होते हैं, क्योंकि ऐसे समय में उनके पास तेजी से दिशा बदलने की क्षमता कम होती है।
इस वजह से जहाजों को सही दिशा का अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है और समुद्र में उनकी स्थिति को समझना भी कठिन हो जाता है। यह खतरा इसलिए ज्यादा गंभीर है क्योंकि यह बिना किसी चेतावनी के सामने आता है और किसी भी जहाज को प्रभावित कर सकता है, चाहे उसका झंडा, मालिक या माल कुछ भी हो। (Strait of Hormuz Maritime Threat)
कब और कैसे हो रहे हैं हमले
रिपोर्ट के अनुसार, हमले अब पूरी तरह अनिश्चित हो चुके हैं। ये हमले चलते हुए जहाजों पर भी हो रहे हैं और बंदरगाह के पास खड़े जहाजों पर भी। कई मामलों में जहाज जब एंकर पर खड़े होते हैं या एक जहाज से दूसरे जहाज में माल ट्रांसफर कर रहे होते हैं, तब भी उन्हें निशाना बनाया गया है।
हमलों में खासतौर पर जहाज के इंजन रूम या पानी की सतह के ऊपर के हिस्से को निशाना बनाया जाता है, जिससे आग लगने या विस्फोट होने की संभावना बढ़ जाती है। इससे कई बार जहाज छोड़कर भागना पड़ता है या जहाज डूब भी सकता है। ये हमले मिसाइलों, ड्रोन, यूएसवी से भी किए जा रहे हैं।
रिपोर्ट में यह भी साफ किया गया है कि इस समय कोई भी जहाज पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। हमलों में कच्चा तेल ले जाने वाले टैंकर, कंटेनर जहाज, बल्क कैरियर और सपोर्ट जहाज सभी निशाने पर रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम का असर सिर्फ क्षेत्र तक सीमित नहीं है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक है, जहां से हर दिन करीब 2.1 करोड़ बैरल तेल गुजरता है। इस रास्ते के प्रभावित होने का मतलब है कि वैश्विक ऊर्जा सप्लाई और व्यापार दोनों पर असर पड़ना।
रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा हालात आधुनिक समय में अभूतपूर्व हैं और इसका असर दुनिया भर में महसूस किया जा रहा है। (Strait of Hormuz Maritime Threat)
नए रास्तों का कर रहे इस्तेमाल
रिपोर्ट के मुताबिक समुद्री क्षेत्र में बढ़ते खतरे को देखते हुए शिपिंग इंडस्ट्री ने अपने तरीके बदलने शुरू कर दिए हैं।
कई जहाज अब केप ऑफ गुड होप के रास्ते जा रहे हैं, क्योंकि यह फिलहाल सबसे सुरक्षित माना जा रहा है। हालांकि लंबा रास्ता है और लागत बढ़ जाती है, साथ ही, वहां के बंदरगाहों पर ईंधन भरने की व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
इसके साथ ही इस पूरे इलाके के लिए वॉर रिस्क प्रीमियम यानी बीमा की लागत काफी बढ़ गई है और बीमा कंपनियां भी अब ज्यादा सख्त रुख अपना रही हैं।
कुछ तेल शिपमेंट को सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के जरिए यनबू पोर्ट तक भेजा जा रहा है, जहां से आगे उन्हें लोड किया जाता है। इससे फिलहाल थोड़ी राहत मिली है, लेकिन यह भी एक सीमित रास्ता है और यमन के गैर-सरकारी समूहों से खतरे में बना रहता है।
वहीं, ओमान के डुक्म पोर्ट को भी कुछ ऑपरेटर्स एक वैकल्पिक ट्रांसशिपमेंट हब के तौर पर देख रहे हैं, क्योंकि यह सीधे खतरे वाले इलाके से थोड़ा बाहर स्थित है, लेकिन यह भी पूरी तरह जोखिम से मुक्त नहीं माना जा रहा। (Strait of Hormuz Maritime Threat)
यमन के समूहों की एंट्री से बढ़ी चिंता
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि यमन के हूथी समूहों ने इस अभियान के साथ जुड़ने का ऐलान किया है। हालांकि इस चरण में उनके द्वारा कोई सीधा समुद्री हमला दर्ज नहीं हुआ है, लेकिन उनकी क्षमता और इरादे को देखते हुए खतरा बढ़ सकता है। इससे रेड सी, बाब-अल-मंदेब और गल्फ ऑफ एडन जैसे इलाकों में भी जोखिम बढ़ने की आशंका जताई गई है। (Strait of Hormuz Maritime Threat)
होर्मुज में लगभग ठप हुआ ट्रैफिक
रिपोर्ट के बताया गया है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों की संख्या में भारी गिरावट देखी गई है। जहां पहले हर दिन करीब 130 से 140 जहाज इस रास्ते से गुजरते थे, वहीं अब यह संख्या घटकर सिर्फ 4 से 5 जहाज प्रतिदिन रह गई है। कुछ दिनों में तो यह संख्या लगभग शून्य तक पहुंच गई।
यह बदलाव इसलिए हुआ क्योंकि जहाज संचालकों ने जोखिम से बचने के लिए इस रास्ते से गुजरना लगभग बंद कर दिया है। वहीं, खतरे से बचने के लिए कई जहाज अब ईरान के क्षेत्रीय जल के करीब से गुजरने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि इससे जोखिम कम होगा, लेकिन इससे नई समस्याएं पैदा हो रही हैं।
इसमें कानूनी, राजनीतिक और सुरक्षा से जुड़ी अड़चनें शामिल हैं। इसके बावजूद यह रास्ता पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा रहा। (Strait of Hormuz Maritime Threat)
International Mine Awareness Day 2026: दुनिया भर में आज इंटरनेशनल डे फॉर माइन अवेयरनेस एंड असिस्टेंस इन माइन एक्शन मनाया जा रहा है। यह दिन उन खतरों की याद दिलाता है, जो लड़ाई खत्म होने के बाद भी लंबे समय तक जमीन और समुद्र में बने रहते हैं। जमीन के नीचे छिपी बारूदी सुरंगें और अनफटे गोला-बारूद ऐसे ही खतरे हैं, जो सालों तक लोगों की जिंदगी को प्रभावित करते हैं।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और अमेरिका-ईरान में चल रहे टकराव के बीच यह मुद्दा और गंभीर हो गया है। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमैनिटेरियन माइन एक्शन स्टडीज (IIFOMAS) के डायरेक्टर जनरल और होराइजन ग्रुप के चेयरमैन रिटायर्ड कर्नल नवनीत एम.पी. मित्तल ने रक्षा समाचार को खास बातचीत में बताया कि युद्ध का असर सिर्फ लड़ाई तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह दशकों तक समाज, अर्थव्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों को प्रभावित करता है।
International Mine Awareness Day 2026: “युद्ध समाधान नहीं, बातचीत है जरूरी”
डिफेंस और पोस्ट-कॉन्फ्लिक्ट एनवायरमेंट मैनेजमेंट के एक्सपर्ट कर्नल नवनीत मित्तल का साफ कहना है कि किसी भी जंग का अंत बातचीत से ही होता है। किसी भी युद्ध में जिम्मेदारी और समझदारी बेहद जरूरी होती है। उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर बताया कि युद्ध दोनों पक्षों के आम लोगों को बराबर नुकसान पहुंचाता है।
वह कहते हैं, “युद्ध कोई समाधान नहीं है। यह कुछ समय के लिए दबाव जरूर बना सकता है, लेकिन आखिर में बातचीत से ही रास्ता निकलता है। मैंने खुद गाजा जैसे इलाकों में हालात देखे हैं, जहां लोग बेहद मुश्किल परिस्थितियों में जी रहे हैं। बमबारी का असर हर चीज पर पड़ता है, यात्रा, व्यापार और आम लोगों की जिंदगी सब प्रभावित होती है।”
उनका कहना है कि पश्चिम एशियाके कई देश सीधे तौर पर किसी एक पक्ष के साथ नहीं हैं, लेकिन वे अस्थिरता भी नहीं चाहते। “इन देशों के बीच भले दोस्ती न हो, लेकिन खुली दुश्मनी भी नहीं है। वे बस अपनी सुरक्षा की गारंटी चाहते हैं और यह नहीं चाहते कि मिसाइल या हमले उनके इलाके तक पहुंचें।” (International Mine Awareness Day 2026)
बढ़ते संघर्ष का वैश्विक असर
अमेरिका-ईरान वॉर को जिक्र करते हुए मित्तल कहते हैं, यह संघर्ष सीमित नहीं है। “अगर युद्ध लंबा चलता है तो दूसरे देशों की सहनशीलता की भी एक सीमा होती है। वे पूछना शुरू कर देंगे कि यह कब खत्म होगा।” उनके अनुसार, इसका असर पहले ही तेल की कीमतों और वैश्विक व्यापार पर दिखने लगा है। हवाई यात्रा, शिपिंग और सप्लाई चेन तक प्रभावित हो रहे हैं। (International Mine Awareness Day 2026)
बारूदी सुरंगें: युद्ध का सबसे खतरनाक हथियार
हॉर्मुज और खार्ग में ईरान की बारूदी सुरंग बिछाने की खबरों पर कर्नल मित्तल कहते हैं कि आधुनिक युद्ध में इस्तेमाल की जाने वाली बारूदी सुरंगें और समुद्री माइंस सबसे खतरनाक हथियारों में मानी जाती हैं।
वह कहते हैं, “हर साल औसतन 5 से 6 हजार लोग माइंस की वजह से मारे जाते हैं या घायल होते हैं।” लेकिन असली खतरा आंकड़ों से बड़ा है। “अगर सड़क पर एक्सीडेंट हो जाए तो लोग गाड़ी चलााना नहीं छोड़ते, उस रास्ते पर फिर भी चलते हैं। लेकिन अगर किसी इलाके में माइंस होने की खबर हो, तो कोई वहां कदम भी नहीं रखता। यही इसका सबसे बड़ा डर है।”
ईरान-अमेरिका तनाव में समुद्री माइंस का खतरा भी तेजी से बढ़ा है। खासतौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे इलाकों में, जहां से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल गुजरता है।
उन्होंने कहा, “समुद्री माइंस दो तरह की होती हैं, कुछ एक जगह बंधी रहती हैं और कुछ पानी में तैरती रहती हैं। तैरने वाली माइंस ज्यादा खतरनाक होती हैं, क्योंकि वे बहकर कहीं भी पहुंच सकती हैं और बड़ा हादसा कर सकती हैं।” International Mine Awareness Day 2026)
डबल एज्ड वेपन: लगाने वाला भी फंसता है
बारूदी सुरंगों को कर्नल मित्तल “दो धार वाली तलवार” बताते हैं। उनके मुताबिक, “जो देश माइंस बिछाता है, उसे यह भी पता होता है कि एक दिन उसे ही इन्हें हटाना पड़ेगा। लेकिन जब तक ये जमीन में रहती हैं, तब तक पूरा इलाका ठप हो जाता है।” उन्होंने बताया कि माइंस का सबसे बड़ा असर डर होता है, जो पूरे इलाके को बेकार बना देता है। यहां तक कि न तो वहां खेती की जा सकती है और न ही वहां कोई इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप हो सकता है। पूरा इलाका नो मेंस लैंड में बदल जाता है।
दशकों तक जिंदा रहती हैं माइंस
लैंड माइंस की सबसे खतरनाक बात यह है कि वे दशकों तक सक्रिय रह सकती हैं। कर्नल मित्तल बताते हैं, “कई बार 10-15 साल बाद भी अनफटे गोला-बारूद मिलते हैं। किसी भी युद्ध में 2-5 फीसदी हथियार अनफटे रह जाते हैं।”
कर्नल मित्तल ने कुवैत का उदाहरण देते हुए बताया कि 1991 के गल्फ वॉर खत्म होने के 12-13 साल बाद भी हमें अनएक्सप्लोडेड ऑर्डिनेंस (UXO) मिलते रहे। आमतौर पर सफाई (माइन क्लीयरेंस) बाद भी 2-3 प्रतिशत विस्फोटक जमीन में रह जाते हैं।
उन्होंने बताया कि उनकी टीम अब तक दुनिया भर में 1 लाख 77 हजार से ज्यादा अनफटे गोला-बारूद को हटाकर नष्ट कर चुकी है और 400 मिलियन वर्ग मीटर से ज्यादा जमीन को सुरक्षित बनाया जा चुका है। वहीं अकेले कुवैत में होराइजन ग्रुप ने 50,000 से अधिक अनएक्सप्लोडेड ऑर्डिनेंस को हटाया है।
(Left) Maj Gen Ajay Seth, VSM (Retd), Chairman IIFOMAS Board, (Middle) CDS General Anil Chauhan, (Right) Col Navneet MP Mittal (Retd), Director General, IIFOMAS
विकास पर पड़ता है सीधा असर
माइंस की वजह से कई देशों में बड़े इलाके पूरी तरह बेकार हो जाते हैं। वहां न खेती हो सकती है, न घर बन सकते हैं और न ही कोई विकास कार्य हो सकता है।
मित्तल के अनुसार, “यूक्रेन में माइंस हटाने के लिए करीब 35 अरब डॉलर की जरूरत होगी और इसमें दशकों लग सकते हैं। गाजा में यह खर्च लगभग 100 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। जब तक जमीन से बारूदी सुरंगें नहीं हटाई जाती, तब तक वह किसी काम की नहीं होती।”
माइंस हटाने का काम धीमा और कठिन
बारूदी सुरंगों को हटाना बेहद कठिन और खतरनाक प्रक्रिया है। इसमें कई चरण होते हैं, पहले सर्वे किया जाता है, फिर माइंस को ढूंढा जाता है, उसके बाद उन्हें सुरक्षित तरीके से हटाया जाता है।
मित्तल बताते हैं, “एक व्यक्ति एक दिन में मुश्किल से 20 वर्ग मीटर क्षेत्र ही साफ कर पाता है। यह बहुत धीमा और जोखिम भरा काम है। कई बार मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन हर कदम बहुत सावधानी से उठाना पड़ता है।”
उन्होंने बताया कि कई जगहों पर कुत्तों और चूहों जैसे जानवरों का भी इस्तेमाल किया जाता है, जो माइंस की पहचान करने में मदद करते हैं। लेकिन अंत में इंसान को ही जाकर उन्हें हटाना पड़ता है। इसके अलावा ड्रोन तकनीक का भी इस्तेमाल बढ़ रहा है। (International Mine Awareness Day 2026)
युद्ध के बाद भी जारी रहती है लड़ाई
मित्तल का कहना है कि युद्ध कागजों पर खत्म हो सकता है, लेकिन जमीन पर रहने वाले लोगों के लिए यह लंबे समय तक खत्म नहीं होता। हर कदम पर जान का जोखिम होता है, क्योंकि यह पता नहीं होता कि जमीन के नीचे क्या छिपा है। यही वजह है कि माइंस को “साइलेंट किलर” भी कहा जाता है।
उन्होंने कहा, “माइंस वाले इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए हर कदम जिंदगी और मौत के बीच का फैसला होता है। यही युद्ध की असली सच्चाई है।”
आज जब दुनिया नए संघर्षों का सामना कर रही है, तब यह समझना जरूरी हो गया है कि युद्ध का असर सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं रहता। जमीन के नीचे छिपी बारूदी सुरंगें उस खतरे की याद दिलाती हैं, जो दशकों तक तक बना रहता है।
वह कहते हैं, दुनिया आज जब नए संघर्षों का सामना कर रही है, तब यह समझना जरूरी है कि युद्ध की असली कीमत सिर्फ लड़ाई में नहीं, बल्कि उसके बाद की लंबी और कठिन प्रक्रिया में चुकानी पड़ती है। (International Mine Awareness Day 2026)
लैंडमाइन की लागत 3 डॉलर, हटाने का खर्च 2000 डॉलर तक
लागत के लिहाज से देखें तो लैंडमाइन्स एक बेहद खतरनाक असमानता पैदा करती हैं। कर्नल नवनीत मित्तल बताते हैं कि एक लैंडमाइन बिछाने में मुश्किल से 3 डॉलर, यानी करीब 250 रुपये खर्च होते हैं, लेकिन जब उसे हटाने की बारी आती है, तो यही लागत बढ़कर 1000 से 2000 डॉलर, यानी लगभग 80 हजार से डेढ़ लाख रुपये तक पहुंच जाती है।
यानी जो हथियार सस्ते में तैयार होकर जमीन में दबा दिए जाते हैं, उन्हें हटाने में कई गुना ज्यादा पैसा और संसाधन लगते हैं। इसी वजह से युद्ध खत्म होने के बाद असली आर्थिक बोझ शुरू होता है, क्योंकि तब देशों को अपने ही इलाकों को सुरक्षित बनाने के लिए भारी खर्च उठाना पड़ता है।
कर्नल मित्तल इस खतरे की गंभीरता को और स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि दुनिया भर के आंकड़े बताते हैं कि हर 5000 लैंडमाइन्स को साफ करते समय एक व्यक्ति की जान चली जाती है। यानी यह सिर्फ महंगा काम ही नहीं, बल्कि बेहद जानलेवा भी है।
आज स्थिति यह है कि दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में लाखों वर्ग किलोमीटर जमीन लैंडमाइन्स और अनफटे विस्फोटकों से प्रभावित है। इन इलाकों को सुरक्षित बनाने के लिए अरबों डॉलर की जरूरत है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिलने वाली फंडिंग काफी कम है। पिछले दस वर्षों में यह फंडिंग औसतन 700 से 800 मिलियन डॉलर सालाना ही रही है, जबकि जरूरत इससे कई गुना ज्यादा है।
यही कारण है कि कई देशों में युद्ध खत्म होने के बाद भी जमीन सालों तक उपयोग के लायक नहीं बन पाती और विकास की रफ्तार थम जाती है। (International Mine Awareness Day 2026)
खतरनाक काम में महिलाओं की बढ़ रही भागीदारी
माइन क्लीयरेंस जैसे खतरनाक काम में अब महिलाएं भी बड़ी भूमिका निभा रही हैं। मित्तल बताते हैं कि 2008-09 के आसपास श्रीलंका में माइंस हटाने की मुहिम के दौरान महिलाओं को भी इस काम में शामिल करना शुरू किया गया था। हमने महिलाओं को ट्रेनिंग देना शुरू किया और उन्होंने शानदार काम किया। आज यह एक ऐसा क्षेत्र बन गया है, जहां जेंडर इक्वालिटी साफ दिखाई देती है।”
माइन एक्शन के पांच स्तंभ
कर्नल मित्तल ने बताया कि माइंस से निपटने के लिए जो प्रक्रिया अपनाई जाती है, उसे माइन एक्शन कहा जाता है। इसके पांच मुख्य हिस्से होते हैं- माइंस को हटाना, लोगों को जागरूक करना, पीड़ितों की मदद करना, हथियारों के भंडार को नष्ट करना और माइंस पर रोक लगाने के प्रयास करना।
हालांकि, मित्तल का कहना है कि इन सभी में बराबर ध्यान नहीं दिया जाता। “ज्यादातर बजट माइंस हटाने में खर्च हो जाता है, जबकि पीड़ितों की मदद के लिए बहुत कम पैसा मिलता है।” (International Mine Awareness Day 2026)
पीड़ितों के लिए जरूरी है पुनर्वास
माइंस से प्रभावित लोगों को लंबे समय तक इलाज और सहारे की जरूरत होती है। कई लोगों के हाथ-पैर चले जाते हैं और उन्हें कृत्रिम अंग की जरूरत होती है।
मित्तल कहते हैं, “विक्टिम असिस्टेंस बहुत जरूरी है। इसमें मेडिकल केयर, प्रोस्थेटिक्स और पुनर्वास शामिल है। भारत ने जयपुर फुट जैसे प्रोग्राम के जरिए कई देशों में मदद की है।”
PPP मॉडल से निकल सकता है रास्ता
कर्नल नवनीत मित्तल माइन क्लियरेंस के लिए पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप यानी पीपीपी मॉडल को एक प्रभावी समाधान मानते हैं। वह कहते हैं कि पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल में कंपनियां माइंस क्लियर कर विकास कार्य कर सकती हैं। उनके अनुसार, कंपनियां युद्ध प्रभावित जमीन को “एडॉप्ट” करें, वहां खुद माइन हटाने का काम करें और उसके बाद उसी जमीन पर खेती, खनन या इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करें। इससे एक साथ कई फायदे होते हैं। देश को सुरक्षित और उपयोगी जमीन मिलती है, कंपनियों को संसाधन और निवेश का अवसर मिलता है, जबकि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए रास्ते खुलते हैं। इस तरह यह मॉडल विकास और पुनर्निर्माण दोनों को साथ लेकर चलता है। (International Mine Awareness Day 2026)
भारत की भूमिका: ग्लोबल साउथ में नेतृत्व का है मौका
कर्नल नवनीत मित्तल के मुताबिक अगर हम ग्लोबल साउथ की बात करते हैं, तो हमें इन देशों की मदद करनी चाहिए। यह हमारी जिम्मेदारी भी है और अवसर भी। वह कहते हैं कि ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों पर लैंडमाइंस और अनफटे विस्फोटकों का सबसे ज्यादा असर देखने को मिलता है। अफ्रीका के अंगोला, मोजाम्बिक और सूडान, दक्षिण एशिया के श्रीलंका और अफगानिस्तान, दक्षिण-पूर्व एशिया के कंबोडिया और लाओस, और मध्य पूर्व के इराक, सीरिया और गाजा जैसे इलाके आज भी इस खतरे से जूझ रहे हैं। इन देशों में समस्या इसलिए और गंभीर है क्योंकि यहां संसाधन कम हैं, अर्थव्यवस्था कमजोर है और कई जगह लंबे समय तक युद्ध चलता रहा है।
कर्नल नवनीत मित्तल का मानना है कि भारत को इस क्षेत्र में आगे आकर नेतृत्व करना चाहिए। भारत माइन एक्शन प्रोग्राम शुरू कर सकता है, पूर्व सैनिकों को इसमें शामिल कर सकता है और श्रीलंका की तरह दूसरे देशों को सीधी मदद दे सकता है।
वह कहते हैं, “आज दुनिया एक ग्लोबल विलेज बन चुकी है। एक जगह का संघर्ष पूरी दुनिया को प्रभावित करता है। अगर दूसरे देश अस्थिर हैं, तो उसका असर हम पर भी पड़ेगा। भारत के पास तकनीकी क्षमता और अनुभव है, इसलिए उसे आगे आना चाहिए।” (International Mine Awareness Day 2026)
High Altitude Monorail System Indian Army: पिछले साल भारतीय सेना ने एलएसी से सटे बॉर्डर इलाके में एक ऐसा सिस्टम तैयार किया था, जिसने पहाड़ों में लॉजिस्टिक्स यानी जरूरी सामान पहुंचाने के तरीके को बदल दिया। भारतीय सेना की गजराज कोर ने समुद्र तल से 16,000 फीट से ज्यादा ऊंचाई पर एक खास मोनोरेल ट्रांसपोर्ट सिस्टम तैनात किया था। वहीं खास बात यह है कि सेना के इस इनोवेशन को एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स और इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी जगह मिली है।
यह सिस्टम उन इलाकों में काम कर रहा है, जहां सामान्य गाड़ियां चल ही नहीं पातीं। बर्फ, खड़ी चट्टानें और बेहद खराब मौसम के बीच यह लगातार काम कर रहा है और सैनिकों तक जरूरी सामान पहुंचा रहा है।
High Altitude Monorail System Indian Army: चार महीने से लगातार चल रहा है सिस्टम
इस मोनोरेल सिस्टम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पिछले चार महीनों से बिना रुके काम कर रहा है। दिन हो या रात, तेज बर्फबारी हो या शून्य से नीचे तापमान यह सिस्टम हर हाल में चलता रहा है।
ऊंचाई वाले इलाकों में अक्सर मौसम अचानक खराब हो जाता है, जिससे हेलीकॉप्टर उड़ नहीं पाते और सड़क रास्ते बंद हो जाते हैं। ऐसे में यह मोनोरेल सिस्टम लगातार सप्लाई बनाए रखने में मदद कर रहा है। इससे सैनिकों को समय पर राशन, दवाइयां और अन्य जरूरी सामान मिल रहा है। (High Altitude Monorail System Indian Army)
रिकॉर्ड बुक में दर्ज हुआ नाम
इस मोनो रेल सिस्टम को उसकी खास उपलब्धि के लिए आधिकारिक तौर पर एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स और इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया है। इतनी ऊंचाई पर इस तरह का सिस्टम बनाना और उसे लगातार चलाना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
आसान नहीं था तैयार करना
इस सिस्टम को तैयार करना आसान नहीं था। इसे भारतीय सेना की इंजीनियर टीम ने बेहद कठिन परिस्थितियों में बनाया। जहां ऑक्सीजन कम होती है और ठंड बहुत ज्यादा होती है, वहां काम करना खुद एक बड़ी चुनौती होती है।
इसके बावजूद इंजीनियरों ने कम समय में इसे तैयार कर दिया। यह पूरी तरह स्वदेशी डिजाइन पर आधारित है, यानी इसमें किसी विदेशी तकनीक का इस्तेमाल नहीं किया गया। यही वजह है कि इसे आत्मनिर्भर भारत का मजबूत उदाहरण माना जा रहा है। (High Altitude Monorail System Indian Army)
कैसे काम करता है यह मोनोरेल सिस्टम
यह मोनोरेल एक ट्रैक पर चलने वाला सिस्टम है, जो पहाड़ों के बीच एक तय ट्रैक पर चलता है। इसके जरिए एक बार में काफी मात्रा में सामान भेजा जा सकता है। इसमें राशन, गोला-बारूद, ईंधन और मेडिकल सप्लाई जैसी चीजें आसानी से पहुंचाई जा रही हैं।
यह सिस्टम खड़ी ढलानों और बर्फीले रास्तों पर भी बिना रुकावट काम करता है। जहां पहले सैनिकों को भारी सामान खुद उठाकर ले जाना पड़ता था या खच्चरों का सहारा लेना पड़ता था, वहां अब यह काम मशीन के जरिए हो रहा है।
सैनिकों के लिए बड़ी राहत
पहले ऊंचाई वाले इलाकों में तैनात सैनिकों को सप्लाई पहुंचाना बहुत मुश्किल काम होता था। कई बार खराब मौसम की वजह से दिनों तक सप्लाई रुक जाती थी। इससे सैनिकों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था।
अब इस मोनोरेल सिस्टम के आने से यह समस्या काफी हद तक कम हो गई है। सप्लाई लगातार बनी रहती है और सैनिकों को जरूरी चीजों के लिए इंतजार नहीं करना पड़ता। इससे उनका ध्यान अपने ऑपरेशन पर ज्यादा रहता है।
घायल सैनिकों को निकालने में भी मदद
यह सिस्टम सिर्फ सामान पहुंचाने तक सीमित नहीं है। जरूरत पड़ने पर इसका इस्तेमाल घायल सैनिकों को सुरक्षित स्थान तक लाने के लिए भी किया जा सकता है। ऐसे इलाकों में जहां हेलीकॉप्टर उतर नहीं पाते, वहां यह एक अहम विकल्प बन जाता है। इससे आपात स्थिति में जल्दी मदद पहुंचाना संभव हो पाता है और समय की बचत होती है। (High Altitude Monorail System Indian Army)
सीमा के पास बढ़ी ऑपरेशनल क्षमता
यह मोनोरेल सिस्टम ऐसे क्षेत्र में लगाया गया है, जो रणनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां मौसम और भू-भाग की वजह से अक्सर सप्लाई लाइन प्रभावित होती थी।
अब इस सिस्टम के जरिए अग्रिम चौकियों तक बिना रुकावट सामान पहुंचाया जा रहा है। इससे सैनिकों की ऑपरेशनल क्षमता मजबूत हुई है और वे बेहतर तरीके से अपने काम को अंजाम दे पा रहे हैं। (High Altitude Monorail System Indian Army)
INS Taragiri Commissioned: Rajnath Singh Calls Strong Navy a Strategic Necessity for India
INS Taragiri Commission: भारत की समुद्री क्षमता को शुक्रवार को बड़ा बूस्ट मिला, जब देश की तीसरी न्यूक्लियर सबरमरीन आईएनएस अरिदमन के साथ एडवांस स्टेल्थ फ्रिगेट आईएनएस तारागिरी को विशाखापत्तनम में नौसेना में शामिल किया गया। तारागिरी पूर्वी समुद्री तट पर ईस्टर्न फ्लीट का हिस्सा बनेगी।
इस मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह मुख्य अतिथि के तौर पर मौजूद रहे। समारोह विशाखापत्तनम के नौसैनिक डॉकयार्ड में आयोजित किया गया, जहां नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी और चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ अनिल चौहान समेत कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।
6,670 टन वजनी आईएनएस तारागिरी को प्रोजेक्ट 17ए के तहत तैयार किया गया है और यह आधुनिक स्टेल्थ फ्रिगेट्स की उसी सीरीज का हिस्सा है, जिसे भारतीय नौसेना के लिए खास तौर पर नई पीढ़ी के समुद्री युद्ध को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है।
INS Taragiri Commission: 11 हजार किमी से ज्यादा लंबी समुद्री सीमा
समारोह के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि आईएनएस तारागिरी का नौसेना में शामिल होना भारत की बढ़ती समुद्री ताकत का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि देश की 11 हजार किलोमीटर से ज्यादा लंबी समुद्री सीमा है और भारत तीन तरफ से समुद्र से घिरा हुआ है। ऐसे में देश के विकास को समुद्र से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
उन्होंने साफ कहा कि देश का लगभग 95 फीसदी व्यापार समुद्री रास्तों से होता है और ऊर्जा सुरक्षा भी समुद्र पर निर्भर करती है। इसलिए एक मजबूत और सक्षम नौसेना अब विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत बन चुकी है।
रक्षा मंत्री ने यह भी कहा कि भारतीय नौसेना लगातार हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बनाए रखती है, चाहे वह फारस की खाड़ी हो या मलक्का जलडमरूमध्य। किसी भी संकट की स्थिति में नौसेना हमेशा आगे रहती है, चाहे वह लोगों को सुरक्षित निकालना हो या मानवीय सहायता पहुंचाना। (INS Taragiri Commission)
रक्षा मंत्री ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि आज के समय में वैश्विक हालात तेजी से बदल रहे हैं और समुद्र इन बदलावों का सबसे बड़ा केंद्र बनता जा रहा है। उन्होंने कहा कि जब भी दुनिया में तनाव बढ़ता है, तो उसका असर सबसे पहले समुद्री व्यापार और एनर्जी सप्लाई पर दिखाई देता है।
उन्होंने यह भी बताया कि भारत की नौसेना ने कई बार यह साबित किया है कि वह सिर्फ देश के हितों की रक्षा ही नहीं करती, बल्कि जरूरत पड़ने पर वैश्विक स्तर पर भी अपने नागरिकों और व्यापारिक रास्तों को सुरक्षित रखने में सक्षम है।
11. इंटरनेट केबल्स की सुरक्षा पर जताई चिंता
रक्षा मंत्री ने कहा कि आज के डिजिटल दौर में दुनिया का ज्यादातर डेटा समुद्र के नीचे बिछी इंटरनेट केबल्स के जरिए चलता है। अगर इन केबल्स को कोई नुकसान पहुंचता है, तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। इसलिए अब समुद्री सुरक्षा को सिर्फ पारंपरिक नजरिए से नहीं, बल्कि एक व्यापक और भविष्य के हिसाब से तैयार दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि हमें केवल अपनी तटरेखा की सुरक्षा तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों, चोक पॉइंट्स और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की भी सुरक्षा करनी होगी, जो सीधे देश के हितों से जुड़े हैं। भारतीय नौसेना इन सभी क्षेत्रों में सक्रिय रूप से काम कर रही है और यही सोच हमें आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार करती है। उन्होंने कहा कि जब भी भारत आईएनएस तारागिरी जैसे आधुनिक युद्धपोत बनाता और तैनात करता है, तो यह पूरे क्षेत्र में शांति और समृद्धि की गारंटी जैसा होता है। (INS Taragiri Commission)
10. नेवी चीफ बोले- जीपीएस और सैटेलाइट सर्विसेज पर बढ़ा खतरा
वहीं, नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी ने कहा कि आज का सुरक्षा माहौल तेजी से बदल रहा है और इसका सबसे ज्यादा असर समुद्री क्षेत्र में देखने को मिल रहा है। पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव का असर भी समुद्री व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा पर साफ दिखाई दे रहा है।
नौसेना प्रमुख ने कहा कि अब समुद्री क्षेत्र में सिर्फ पारंपरिक खतरे ही नहीं हैं, बल्कि जीपीएस और सैटेलाइट सेवाओं में रुकावट जैसे नए खतरे भी सामने आ रहे हैं, जिससे समुद्री ऑपरेशन और भी जटिल हो गए हैं।
उन्होंने कहा कि आज का समुद्री सुरक्षा माहौल पहले से ज्यादा जटिल हो गया है, जहां बदलती जियोपॉलिटिक्स, नई तकनीक और नए तरह के खतरे सामने आ रहे हैं। ऐसे समय में भारतीय नौसेना का लक्ष्य है कि वह हमेशा कॉम्बैट-रेडी, भरोसेमंद और भविष्य के लिए तैयार फोर्स बनी रहे, जो कभी भी, कहीं भी देश के समुद्री हितों की रक्षा कर सके।
9. नौसेना की ताकत बढ़ाने पर जोर
नौसेना प्रमुख ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में भारतीय नौसेना ने लगातार अपनी ताकत बढ़ाई है। उन्होंने कहा कि हाल के समय में नौसेना ने कई नए जहाज, पनडुब्बियां और एयरक्राफ्ट स्क्वाड्रन को शामिल किया है।
उन्होंने यह भी कहा कि देश के दोनों समुद्री तटों यानी पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों पर नौसेना की क्षमता को मजबूत किया जा रहा है, ताकि हर तरह की चुनौती का सामना किया जा सके। (INS Taragiri Commission)
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8. पुराने तारागिरी की विरासत का किया जिक्र
नौसेना प्रमुख ने अपने संबोधन में पुराने आईएनएस तारागिरी की विरासत को भी याद किया। उन्होंने बताया कि इसका नाम पहले लियंडर क्लास फ्रिगेट पर रखा गया था, जो 1980 में नौसेना में शामिल हुआ था और जिसने एंटी-सबमरीन वॉरफेयर और ऑपरेशनल इनोवेशन में अहम भूमिका निभाई थी।
उन्होंने बताया कि पुराने तारागिरी ने 1999 के गुजरात चक्रवात के दौरान राहत और बचाव कार्यों में अहम भूमिका निभाई थी। इसके अलावा 2004 की सुनामी के समय श्रीलंका में मानवीय सहायता पहुंचाने में भी इस जहाज ने महत्वपूर्ण योगदान दिया था।
उन्होंने कहा कि उस समय इस जहाज पर सी किंग हेलीकॉप्टर का संचालन एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि मानी जाती थी, जिससे नौसेना की एंटी-सबमरीन क्षमता में भी सुधार हुआ था। (INS Taragiri Commission)
7. आधुनिक तकनीक से लैस नया युद्धपोत
नई आईएनएस तारागिरी पूरी तरह आधुनिक तकनीक से लैस है। यह करीब 6,670 टन वजनी युद्धपोत है, जिसे मुंबई स्थित मझगांव जॉक शिपबिल्डर्स में बनाया गया है। इस जहाज को बनाने में 75 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। इसके निर्माण में देश के 200 से ज्यादा एमएसएमई यानी छोटे और मध्यम उद्योगों ने योगदान दिया है।
6. स्टेल्थ डिजाइन से दुश्मन के लिए चुनौती
आईएनएस तारागिरी की सबसे बड़ी खासियत इसका स्टेल्थ डिजाइन है। इसका मतलब यह है कि इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह दुश्मन के रडार पर आसानी से नजर नहीं आता।
इसका रडार क्रॉस सेक्शन काफी कम रखा गया है और इसके बाहरी ढांचे को इस तरह बनाया गया है कि यह समुद्र में आसानी से छिपा रह सके। इसके अलावा इसमें कम इंफ्रारेड सिग्नेचर तकनीक भी दी गई है, जिससे दुश्मन के सेंसर इसे पकड़ने में मुश्किल महसूस करते हैं।
5. लगे हैं आधुनिक हथियार और कॉम्बैट सिस्टम
इस युद्धपोत में आधुनिक हथियारों का पूरा सेट लगाया गया है। इसमें सुपरसोनिक सर्फेस-टू-सर्फेस मिसाइल सिस्टम, मीडियम रेंज सर्फेस-टू-एयर मिसाइल और एंटी-सबमरीन वॉरफेयर सिस्टम शामिल हैं।
इन सभी सिस्टम को एक आधुनिक कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम से जोड़ा गया है, जिससे जहाज का क्रू तेजी से फैसले ले सकता है और तुरंत कार्रवाई कर सकता है।
4. तेज रफ्तार और लंबी तैनाती की क्षमता
आईएनएस तारागिरी में सीओडीओजी यानी कंबाइंड डीजल ऑर गैस प्रोपल्शन सिस्टम लगाया गया है। इससे जहाज जरूरत के हिसाब से डीजल इंजन या गैस टरबाइन का इस्तेमाल कर सकता है।
इस वजह से यह जहाज तेज रफ्तार से चल सकता है और लंबे समय तक समुद्र में तैनात रह सकता है। यह खासियत इसे अलग-अलग तरह के मिशन के लिए सक्षम बनाती है। (INS Taragiri Commission)
3. कई तरह के मिशन के लिए तैयार
आईएनएस तारागिरी को सिर्फ युद्ध के लिए ही नहीं बनाया गया है, बल्कि यह कई तरह के ऑपरेशन में काम आ सकता है। यह जहाज हाई इंटेंसिटी कॉम्बैट के साथ-साथ ह्यूमैनिटेरियन असिस्टेंस एंड डिजास्टर रिलीफ जैसे मिशन में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
2. प्रोजेक्ट-17 अल्फा के तहत सात फ्रिगेट
आईएनएस तारागिरी (एफ41) एक आधुनिक नीलगिरी क्लास स्टेल्थ गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट है, जिसे प्रोजेक्ट-17 अल्फा के तहत तैयार किया गया है। प्रोजेक्ट-17 अल्फा के तहत कुल सात ऐसे फ्रिगेट बनाए जा रहे हैं। इनमें चार जहाज मझगांव डॉक द्वारा और तीन जहाज गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स द्वारा बनाए जा रहे हैं। इनमें चार नीलगिरी क्लास स्टेल्थ फ्रिगेट भारतीय नौसेना में शामिल हो चुके हैं। इनमें आईएनएस नीलगिरी, आईएनएस उदयगिरि, आईएनएस हिमगिरि और अब आईएनएस तारागिरी शामिल हैं।
इसके अलावा कुछ अन्य जहाज जैसे दुनागिरी पहले ही नौसेना को डिलीवर हो चुके हैं, लेकिन उनका कमीशन होना अभी बाकी है। वहीं महेंद्रगिरि और विंध्यगिरि जैसे अन्य युद्धपोत अलग-अलग निर्माण और परीक्षण के चरण में हैं। इन जहाजों को सी ट्रायल यानी समुद्री परीक्षण के बाद ही नौसेना में शामिल किया जाता है।
इन फ्रिगेट्स का सबसे बड़ा फायदा यह है कि ये भारतीय नौसेना की ब्लू-वॉटर क्षमता को मजबूत करते हैं। इसका मतलब है कि अब भारतीय नौसेना सिर्फ अपने तटों की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि दूर समुद्र में भी लंबे समय तक ऑपरेशन कर सकती है। स्टेल्थ डिजाइन, तेज मिसाइलें और पनडुब्बी रोधी क्षमता के चलते ये युद्धपोत एक साथ कई तरह के खतरों का सामना करने में सक्षम हैं।
1. इस साल 15 शिप शामिल करने का लक्ष्य
नौसेना का लक्ष्य 2035 तक 200 से ज्यादा जहाजों की फ्लीट तैयार करना है। जिनमें अभी सभी 50 से ज्यादा शिप भारतीय यार्ड्स में ही बन रहे हैं।
अगर साल 2025 की बात करें, तो इस दौरान भारतीय नौसेना में कुल 12 नए युद्धपोत, एक पनडुब्बी और एक एयरक्राफ्ट स्क्वाड्रन को शामिल किया गया। वहीं, साल 2026 में यह रफ्तार और बढ़ने की उम्मीद है। नेवी चीफ के मुताबिक इस साल करीब 15 नए युद्धपोत नौसेना में शामिल किए जा सकते हैं। इस तेज रफ्तार के पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण है भारत का मजबूत होता स्वदेशी शिपबिल्डिंग सिस्टम। मझगांव डॉक, गार्डन रीच शिपबिल्डर्स, कोचीन शिपयार्ड और एलएंडटी जैसे शिपयार्ड अब एक साथ कई जहाजों का निर्माण कर रहे हैं। इसके साथ ही मॉड्यूलर कंस्ट्रक्शन तकनीक अपनाई जा रही है, जिससे अलग-अलग हिस्सों को पहले तैयार करके बाद में जोड़ा जाता है, और समय की बचत होती है।
वहीं, पहले किसी भी नए जहाज की पहली यूनिट बनने में ज्यादा समय लगता था, लेकिन अब उसी क्लास के अगले जहाज कम समय में तैयार हो रहे हैं। अनुभव और तकनीकी सुधार की वजह से अब बाद के जहाज 20 से 30 प्रतिशत कम समय में बन जाते हैं। इसके अलावा पहले नौसेना किसी जहाज को कमीशन करने से पहले कम से कम पांच सॉर्टी करती थी, जहां जहाज का परीक्षण करती थी, लेकिन अब 1-2 सॉर्टी में ही अप्रूवल मिल जाता है। इसकी वजह है कि जहाज बनाने वाली कंपनियों को इस बात का अनुभव हो गया कि नौसेना की असल जरूरत क्या है, जिसका फायदा जल्दी कमीशनिंग में देखने को मिल रहा है।
इसके अलावा आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया जैसी योजनाओं ने भी इस रफ्तार को बढ़ाया है। अब जहाजों में 75 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी सामग्री इस्तेमाल हो रही है और सैकड़ों छोटे और मध्यम उद्योग इसमें योगदान दे रहे हैं। सरकार की नीतियों और बेहतर प्रोजेक्ट मैनेजमेंट ने भी निर्माण प्रक्रिया को तेज किया है। (INS Taragiri Commission)
INS Aridaman: स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी आईएनएस अरिदमन को आज औपचारिक तौर पर भारतीय नौसेना में शामिल हो गई, वहीं इसकी जिम्मेदारी अब स्ट्रेटेजिक फोर्सेस कमांड (SFC) के पास होगी। इस मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह मौजूद रहे। यह पनडुब्बी भारत की तीसरी स्वदेशी न्यूक्लियर बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी (SSBN) है, जिसे लंबे समय से तैयार किया जा रहा था। इससे पहले आईएनएस अरिहंत और अरिघात को पहले ही स्ट्रेटेजिक फोर्सेस कमांड में शामिल किया जा चुका है। वहीं, चौथी एसएसबीएन आईएनएस अरिसुदन अभी कंस्ट्रक्शन स्टेज में है जिसे 2027 के आसपास शामिल किया जा सकता है।
INS Aridaman: कई महीनों तक चले सी-ट्रायल्स
आईएनएस अरिदमन को नौसेना में शामिल करने से पहले इसका लंबा सी ट्रायल चला। इसकी सी ट्रायल्स 2022 से दिसंबर 2025 तक चले। इस दौरान समुद्र में कई महीनों तक इसके अलग-अलग सिस्टम, इंजन और हथियारों की जांच की गई। सभी परीक्षण पूरे होने के बाद इसे अब ऑपरेशनल भूमिका के लिए तैयार माना गया है।
यह पनडुब्बी विशाखापत्तनमके सीक्रेट शिप बिल्डिंग सेंटर में तैयार की गई है। इसके निर्माण में निजी कंपनी एलएंडटी सहित कई भारतीय संस्थानों का योगदान रहा है। यह पनडुब्बी एडवांस्ड टेक्लोनॉजी वेसल (ATV) प्रोजेक्ट का हिस्सा है।
अरिहंत क्लास की तीसरी पनडुब्बी
आईएनएस अरिदमन, अरिहंत क्लास की तीसरी पनडुब्बी है। इससे पहले इसी श्रेणी की आईएनएस अरिहंत को साल 2016 में और आईएनएस अरिघात को 2024 में नौसेना में शामिल किया गया था।
इस नई पनडुब्बी का आकार पहले की पनडुब्बियों से बड़ा है और इसमें ज्यादा मिसाइलें ले जाने की क्षमता है। यही वजह है कि इसे तकनीकी रूप से पहले के मुकाबले ज्यादा सक्षम माना जा रहा है।
“Not words, but power — Aridhaman.” 🔥🇮🇳
In what is perhaps the clearest signal yet, Defence Minister Rajnath Singh has effectively confirmed the commissioning of INS Aridhaman (S4) at Visakhapatnam.
👉 Third submarine of the INS Arihant class submarine
👉 A nuclear-powered SSBN… pic.twitter.com/CB3ebcJdB1
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) April 3, 2026
कैसे काम करती है यह परमाणु पनडुब्बी
इस पनडुब्बी में प्रोपल्शन के लिए 83 मेगावॉट का स्वदेशी प्रेसराइज्ड लाइट वॉटर रिएक्टर लगाया गया है, जिसे भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर ने डिजाइन किया है। इस वजह से यह पनडुब्बी लंबे समय तक बिना सतह पर आए गहरे समुद्र में रह सकती है और इसे स्नॉर्कलिंग की जरूरत नहीं पड़ती। जिससे इसकी आवाज बहुत कम रहती है और दुश्मन के लिए इसे पकड़ना मुश्किल हो जाता है।
इसकी स्टेल्थ क्षमता बढ़ाने के लिए एडवांस अकॉस्टिक डैम्पिंग, एनेकोइक टाइल्स और सेवन-ब्लेड प्रोपेलर का इस्तेमाल किया गया है। पानी के अंदर इसकी स्पीड करीब 24 नॉट तक पहुंच सकती है, जबकि सतह पर यह 12 से 15 नॉट की रफ्तार से चलती है। इस पनडुब्बी में लगभग 95 लोगों का क्रू तैनात रहता है और इसकी ऑपरेशनल अवधि लगभग अनलिमिटेड मानी जाती है, जो सिर्फ खाने-पीने की सप्लाई पर निर्भर करती है। इसमें 533 एमएम के छह टॉरपीडो ट्यूब भी लगे हैं, जिनसे टॉरपीडो, क्रूज मिसाइल और माइन दागे जा सकते हैं।
मिसाइल क्षमता में बड़ा बदलाव
आईएनएस अरिहंत और आईएनएस अरिघात जहां करीब 6,000 टन की पनडुब्बियां हैं, वहीं नई आईएनएस अरिदमन उनसे बड़ी है और इसका वजन करीब 7,000 टन के आसपास है। इसकी लंबाई भी पहले से ज्यादा है, जो करीब 125 से 130 मीटर तक है।
आईएनएस अरिदमन की सबसे बड़ी खासियत इसकी मिसाइल क्षमता है। इसमें 8 वर्टिकल लॉन्च ट्यूब लगाए गए हैं, जबकि पहले की पनडुब्बियों में सिर्फ 4 ट्यूब होते थे। इसकी मदद से यह एक साथ ज्यादा मिसाइलें ले जा सकती है। एक मिशन में यह पनडुब्बी 24 K-15 सागरिका मिसाइलें ले जा सकती है, जिनकी मारक दूरी करीब 750 किलोमीटर है। इसके अलावा यह 8 K-4 मिसाइलें भी ले जा सकती है, जिनकी रेंज 3,500 किलोमीटर से ज्यादा है। आगे चलकर इसमें K-5 जैसी लंबी दूरी की मिसाइलें भी जोड़ी जा सकती हैं।
इस पनडुब्बी की एक खास बात यह है कि इसमें ऐसी तकनीक पर काम किया जा रहा है, जिसमें एक ही मिसाइल कई वारहेड ले जा सके। इससे दुश्मन के डिफेंस सिस्टम को चकमा देना आसान हो जाता है।
समुद्र से जवाबी हमला करने की क्षमता
यह पनडुब्बी भारत की न्यूक्लियर ट्रायड का अहम हिस्सा मानी जाती है। यानी जमीन, हवा और समुद्र तीनों जगह से जवाबी हमला करने की क्षमता। इन पनडुब्बी के शामिल होने के बाद इससे कंटीन्यूअस एट-सी डिटरेंस (एक पनडुब्बी हमेशा पेट्रोल पर) की दिशा में बड़ा कदम है।
यह पनडुब्बी हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की टाइप 094 और 096 एसएसबीएन पनडुब्बियों और पाकिस्तान की चीनी मूल की पनडुब्बियों से मुकाबला करेगी। इसकी शांत तरीके से काम करने की क्षमता और लंबी दूरी की मिसाइलें इसे और मजबूत बनाती हैं, जिससे दुश्मन की एंटी-सबमरीन वॉरफेयर सिस्टम के लिए इसे पकड़ना और रोकना काफी मुश्किल हो जाता है। समुद्र में तैनात रहने की वजह से यह दुश्मन के लिए ट्रैक करना बेहद मुश्किल होता है। अगर किसी संघर्ष की स्थिति बनती है, तो यह पनडुब्बी समुद्र के भीतर से जवाबी हमला कर सकती है।
स्ट्रेटेजिक फोर्सेज कमांड में तैनाती
नौसेना में शामिल होने के बाद आईएनएस अरिदमन को स्ट्रेटेजिक फोर्सेज कमांड के तहत रखा जाएगा। यह वही कमान है जो देश की परमाणु क्षमता से जुड़ी जिम्मेदारी संभालती है। इससे पहले आईएनएस अरिहंत और आईएनएस अरिघात भी इसी कमान के तहत काम कर रही हैं।
क्या है स्ट्रेटेजिक फोर्सेस कमांड (SFC)
स्ट्रेटेजिक फोर्सेस कमांड यानी एसएफसी भारत की परमाणु ताकत को संभालने वाला मुख्य ऑपरेशनल संगठन है। इसे आसान भाषा में समझें तो यही वह कमान है जो देश के परमाणु हथियारों की देखरेख और जरूरत पड़ने पर उनके इस्तेमाल की जिम्मेदारी निभाती है। यह भारत के न्यूक्लियर कमांड अथॉरिटी का हिस्सा है, जो पूरे परमाणु सिस्टम को कंट्रोल करता है।
एसएफसी की स्थापना 4 जनवरी 2003 को की गई थी। उस समय केंद्र सरकार ने इसे औपचारिक रूप से शुरू किया था। इसका मुख्य काम है परमाणु हथियारों को सुरक्षित रखना, उनका रखरखाव करना और जरूरत पड़ने पर उनका सही तरीके से उपयोग सुनिश्चित करना।
यह एक ट्राई-सर्विस कमांड है, यानी इसमें थलसेना, वायुसेना और नौसेना तीनों के अधिकारी और संसाधन शामिल होते हैं। इसका प्रमुख एक तीन-स्टार अधिकारी होता है, जो बारी-बारी से तीनों सेनाओं से आता है।
एसएफसी तीनों तरह के परमाणु सिस्टम को संभालता है। जमीन से दागी जाने वाली मिसाइलें जैसे अग्नि और पृथ्वी सीरीज, हवा से छोड़े जाने वाले हथियार जो फाइटर जेट्स से ले जाए जाते हैं, और समुद्र से दागी जाने वाली मिसाइलें जो पनडुब्बियों से छोड़ी जाती हैं।
समुद्र में मौजूद न्यूक्लियर अटैक सबमरींस भी इसी कमान के तहत काम करती हैं। इनसे K-15 और K-4 जैसी मिसाइलें दागी जा सकती हैं। भारत के पास तीन तरीके से जवाबी हमला करने की क्षमता है, जिसे न्यूक्लियर ट्रायड कहा जाता है। इसमें जमीन, हवा और समुद्र तीनों शामिल हैं। इस पूरे सिस्टम का ऑपरेशनल कंट्रोल एसएफसी के पास होता है।
एसएफसी सीधे देश की शीर्ष कमान से निर्देश लेता है। यानी प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री के स्तर से आदेश आते हैं। सामान्य समय में परमाणु हथियार और मिसाइलें अलग-अलग रखी जाती हैं। जरूरत पड़ने पर इन्हें जोड़कर तैयार किया जाता है। एसएफसी समय-समय पर मिसाइलों के परीक्षण करता रहता है। इससे यह सुनिश्चित किया जाता है कि सभी सिस्टम ठीक से काम कर रहे हैं और किसी भी स्थिति के लिए तैयार हैं।
यह कमान बहुत संवेदनशील और गोपनीय मानी जाती है। इसका काम देश की सुरक्षा से सीधे जुड़ा है। भारत की नीति के अनुसार पहले परमाणु हमला नहीं किया जाता, लेकिन अगर हमला होता है तो जवाब देने की पूरी तैयारी रखी जाती है। पनडुब्बियों की भूमिका इसमें खास होती है, क्योंकि वे समुद्र में छिपकर काम करती हैं और जरूरत पड़ने पर जवाबी कार्रवाई कर सकती हैं। इसी वजह से एसएफसी में समुद्री ताकत को बहुत अहम माना जाता है।
West Asia Crisis IGoM Meeting: पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के बीच केंद्र सरकार ने एक बार फिर हालात की समीक्षा की है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में मंत्रियों का अनौपचारिक समूह (IGoM) की दूसरी अहम बैठक नई दिल्ली के कर्तव्य भवन में हुई। इस बैठक में सरकार ने मौजूदा हालात, उनके भारत पर असर और उससे निपटने के कदमों पर विस्तार से चर्चा की।
बैठक के दौरान रक्षा मंत्री ने साफ कहा कि हालात अभी अनिश्चित बने हुए हैं, इसलिए चौबीसों घंटे निगरानी रखना और हर कदम सोच-समझकर उठाना जरूरी है।
West Asia Crisis IGoM Meeting: लगातार निगरानी और संतुलित प्रतिक्रिया पर जोर
बैठक में रक्षा मंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि हालात पर लगातार नजर रखी जाए। उन्होंने कहा कि किसी भी स्थिति से निपटने के लिए पहले से तैयारी रखना जरूरी है, ताकि देश के लोगों पर इसका असर कम से कम पड़े। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को हर कदम संतुलित तरीके से उठाना होगा, ताकि अचानक होने वाले किसी भी बदलाव का सही तरीके से जवाब दिया जा सके।
मंत्रालयों ने दी तैयारी की जानकारी
इस बैठक में सात अलग-अलग सचिव समूहों ने अपनी-अपनी तैयारियों की जानकारी दी। इनमें वित्त मंत्रालय, ऊर्जा क्षेत्र और अन्य विभाग शामिल थे।
वित्त मंत्रालय ने बताया कि वैश्विक व्यापार में आई रुकावटों को देखते हुए कई राहत उपाय किए गए हैं। खास तौर पर 40 जरूरी पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर कस्टम ड्यूटी पूरी तरह हटा दी गई है, जिससे उद्योगों पर लागत का दबाव कम होगा।
इसके अलावा स्पेशल इकॉनमिक जोन यानी एसईजेड में काम करने वाली यूनिट्स को भी राहत दी गई है। अब वे अपने प्रोडक्ट देश के भीतर कम ड्यूटी पर बेच सकेंगी। इससे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को फायदा मिलेगा।
Chaired the second meeting of the Informal Group of Ministers (IGoM) in New Delhi.
Underlined the importance of Round-the-Clock monitoring of the situation and the need to respond in a calibrated manner to deal with any eventuality.
सरकार ने निवेशकों का भरोसा बनाए रखने के लिए भी कदम उठाए हैं। पुराने निवेशों पर जीएएआर नियम लागू न करने का फैसला लिया गया है, जिससे निवेशकों को स्पष्टता मिलेगी।
इन सभी उपायों का असर टेक्सटाइल, पैकेजिंग और फार्मा जैसे क्षेत्रों पर पड़ेगा, जहां कच्चे माल की लागत कम हो सकेगी और सप्लाई भी स्थिर रहेगी।
इसके अलावा बैठक में एविएशन टरबाइन फ्यूल यानी एटीएफ की कीमतों पर भी चर्चा हुई। सरकार ने तय किया है कि घरेलू उड़ानों के लिए इसकी कीमतों में हर महीने 25 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ोतरी नहीं होगी।
रक्षा मंत्री ने इस फैसले की सराहना करते हुए कहा कि इससे आम लोगों पर हवाई किराए का बोझ अचानक नहीं बढ़ेगा।
एलपीजी सप्लाई को दी गई प्राथमिकता
बैठक में घरेलू गैस यानी एलपीजी की सप्लाई पर भी खास ध्यान दिया गया। सरकार ने बताया कि देश में एलपीजी की उपलब्धता पूरी तरह सामान्य है और कहीं भी कमी की कोई रिपोर्ट नहीं है।
हालांकि कुछ जगहों पर घबराहट के कारण ज्यादा खरीदारी देखने को मिली, जिससे अस्थायी दबाव बना। इसके पीछे जमाखोरी और ब्लैक मार्केटिंग को जिम्मेदार माना गया।
सरकार ने इस पर सख्त कार्रवाई शुरू कर दी है। कई राज्यों में छापेमारी की जा रही है और गलत तरीके से काम करने वाले गैस डिस्ट्रीब्यूटर के खिलाफ भी कदम उठाए गए हैं।
छोटे सिलेंडर की उपलब्धता बढ़ी
मजदूरों और कम खपत वाले परिवारों के लिए 5 किलो वाले छोटे एलपीजी सिलेंडर की उपलब्धता भी बढ़ाई गई है। 23 मार्च 2026 से अब तक 4.3 लाख से ज्यादा सिलेंडर बेचे जा चुके हैं।
सरकार उन राज्यों पर ज्यादा ध्यान दे रही है, जहां डिमांड ज्यादा है, ताकि किसी को भी गैस की कमी का सामना न करना पड़े।
उद्योगों के लिए भी जारी सप्लाई
बैठक में यह भी बताया गया कि उद्योगों को मिलने वाली एलपीजी सप्लाई भी लगभग सामान्य स्तर पर बनी हुई है। संकट से पहले की तुलना में करीब 80 प्रतिशत सप्लाई जारी है, जिससे उद्योगों का काम प्रभावित न हो।
सरकार अलग-अलग उद्योगों के साथ बैठक कर उनकी जरूरतों को समझ रही है और उसी के अनुसार सप्लाई सुनिश्चित की जा रही है।
इसके साथ ही, ऑटो एलपीजी की सप्लाई भी जारी है, हालांकि निजी कंपनियों को कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इसी वजह से कुछ जगहों पर कतारें देखने को मिल रही हैं। जहां संभव है, वहां ड्यूल फ्यूल वाले वाहनों को पेट्रोल इस्तेमाल करने की सलाह दी जा रही है।
इसके अलावा पाइप्ड नेचुरल गैस यानी पीएनजी को भी बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि उद्योगों को एक स्थिर विकल्प मिल सके।
अफवाहों पर सरकार की नजर
बैठक में सोशल मीडिया पर फैल रही अफवाहों का भी मुद्दा उठा। सरकार ने बताया कि कुछ लोग फर्जी तस्वीरें और गलत जानकारी फैलाकर डर का माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
ऐसी गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है और लोगों से अपील की गई है कि वे बिना पुष्टि की जानकारी पर भरोसा न करें और केवल आधिकारिक स्रोतों पर ही विश्वास करें।
इस बैठक में कई बड़े मंत्री शामिल हुए। इनमें वित्त और कॉरपोरेट मामलों की मंत्री निर्मला सीतारमण, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी, बिजली मंत्री मनोहर लाल खट्टर, रसायन और उर्वरक मंत्री जगत प्रकाश नड्डा, विदेश मंत्री एस जयशंकर, उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री प्रहलाद जोशी, विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) जितेन्द्र सिंह और रेल, सूचना एवं प्रसारण तथा इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव मौजूद रहे।
इससे पहले 28 मार्च को भी इसी समूह की पहली बैठक हुई थी, जिसमें अधिकारियों को हालात पर नजर रखने और तेजी से फैसले लेने के निर्देश दिए गए थे। इस दूसरी बैठक में उन निर्देशों की समीक्षा के साथ आगे की रणनीति पर चर्चा की गई।
Lieutenant General Manjinder Singh, Army Commander, Sapta Shakti Command
Mechanised Infantry Raising Day: भारतीय सेना की मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री रेजिमेंट ने 2 अप्रैल को अपना 47वां रेजिंग डे पूरे सम्मान और सादगी के साथ मनाया। इस मौके पर जहां एक ओर दिल्ली स्थित नेशनल वॉर मेमोरियल में शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई, वहीं जयपुर में आयोजित एक अहम सेमिनार में आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल मनजिंदर सिंह ने बदलते वैश्विक हालात पर बोलते हुए कहा कि आज के समय में “स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी” यानी रणनीतिक स्वतंत्रता अब सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि हर देश के लिए जरूरी जरूरत बन चुकी है।
Mechanised Infantry Raising Day: स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी है जरूरी
जयपुर मिलिट्री स्टेशन के सप्त शक्ति ऑडिटोरियम में आयोजित जनरल के सुंदरजी मेमोरियल लेक्चर में सेना की सप्त शक्ति कमांड यानी साउथ वेस्टर्न कमांड के आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल मनजिंदर सिंह ने साफ कहा कि दुनिया तेजी से बदल रही है और देशों के बीच प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है।
यह कार्यक्रम मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री सेंटर एंड स्कूल और सेंटर फॉर लैंड वारफेयर स्टडीज (CLAWS) के सहयोग से आयोजित किया गया था। जिसका विषय था- “बदलती और तनावपूर्ण दुनिया में स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी की चुनौतियां।” इसका मतलब यह है कि आज के समय में कोई भी देश अपनी सुरक्षा और फैसलों में कितना स्वतंत्र रह सकता है, यह एक बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है।
जनरल ऑफिसर इन कमांडिंग लेफ्टिनेंट जनरल सिंह ने कहा कि आज का वैश्विक माहौल काफी अस्थिर है। बड़े देशों के बीच टकराव, आर्थिक प्रतिस्पर्धा, टेक्नोलॉजी की होड़ और अलग-अलग क्षेत्रों में संघर्ष ने हालात को और मुश्किल बना दिया है। ऐसे में किसी भी देश के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह अपने फैसले खुद ले सके और अपनी सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और लंबे समय के हितों को सुरक्षित रख सके।
उन्होंने कहा कि पहले स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी को एक कूटनीतिक सोच के रूप में देखा जाता था, लेकिन अब यह सीधे तौर पर देश की सुरक्षा और अस्तित्व से जुड़ा मुद्दा बन चुकी है। (Mechanised Infantry Raising Day)
बदलती दुनिया में नई चुनौतियां
आर्मी कमांडर ने अपने भाषण में यह भी बताया कि आज की दुनिया में सिर्फ सैन्य ताकत ही काफी नहीं है। उन्होंने कहा कि अब टेक्नोलॉजी, साइबर स्पेस, ऊर्जा, सप्लाई चेन और स्पेस जैसे क्षेत्रों में भी मजबूत होना जरूरी है।
उन्होंने यह भी कहा कि देशों को ऐसे साझेदारी मॉडल बनाने होंगे, जिनमें सहयोग तो हो लेकिन निर्भरता न हो। यानी देश मिलकर काम करें, लेकिन अपनी स्वतंत्रता बनाए रखें। (Mechanised Infantry Raising Day)
जनरल सुंदरजी की विरासत को किया याद
इस मौके पर जनरल कृष्णास्वामी सुंदरजी को भी याद किया गया, जिन्हें भारतीय सेना के सबसे दूरदर्शी नेताओं में गिना जाता है। उन्होंने सेना में कई बड़े बदलाव किए थे और आधुनिक युद्ध की सोच को आगे बढ़ाया था।
कार्यक्रम में यह बताया गया कि उनकी रणनीतिक सोच आज भी भारतीय सेना की योजना और प्रशिक्षण में दिखाई देती है। उनके योगदान को याद करते हुए इस लेक्चर का आयोजन किया गया।
इस सेमिनार में कई बड़े विशेषज्ञ भी शामिल हुए। पूर्व उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पंकज सरन और यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूशन के महानिदेशक वाइस एडमिरल संजय जसजीत सिंह ने भी अपने विचार साझा किए।
उन्होंने बताया कि आज के समय में भारत को अपनी विदेश नीति और सुरक्षा रणनीति को नए तरीके से ढालना होगा। उन्होंने मल्टी पोलर वर्ल्ड यानी कई ताकतों वाली दुनिया में संतुलन बनाने की जरूरत पर जोर दिया।
चर्चा के दौरान टेक्नोलॉजी के बढ़ते प्रभाव, समुद्री सुरक्षा, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की स्थिति और आर्थिक मजबूती जैसे मुद्दों पर भी विस्तार से बात हुई। (Mechanised Infantry Raising Day)
मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री की अहम भूमिका
मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री रेजिमेंट भारतीय सेना का एक अहम हिस्सा है। यह रेजिमेंट आधुनिक बख्तरबंद गाड़ियों के साथ काम करती है, जिन्हें इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल कहा जाता है। इन वाहनों की मदद से सैनिक तेजी से आगे बढ़ सकते हैं और दुश्मन के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई कर सकते हैं।
इस रेजिमेंट की खासियत यह है कि इसमें गति और ताकत दोनों का मेल होता है। एक तरफ यह तेजी से मूव कर सकती है, वहीं दूसरी तरफ इसमें भारी फायरपावर भी होती है। यही कारण है कि आधुनिक युद्ध में इसकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
ट्रेनिंग और तकनीक पर जोर
इस रेजिमेंट की ट्रेनिंग देने वाला मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री सेंटर एंड स्कूल समय के साथ काफी आधुनिक हो चुका है। यहां सैनिकों को नई तकनीक और आधुनिक युद्ध के तरीकों की ट्रेनिंग दी जाती है। इस संस्थान ने अब तक कई बटालियन के सैनिकों को प्रशिक्षित किया है। इसके अलावा भारतीय सेना के अन्य हिस्सों, भारतीय तटरक्षक बल और मित्र देशों के सैनिकों को भी यहां प्रशिक्षण दिया जाता है।
यहां एक अर्बन वारफेयर ट्रेनिंग सेंटर भी तैयार किया जा रहा है, जहां शहरों में होने वाले युद्ध के लिए खास ट्रेनिंग दी जाएगी। इससे सैनिकों को अलग-अलग परिस्थितियों में काम करने की तैयारी मिलती है। (Mechanised Infantry Raising Day)
National War Memorial
दिल्ली में शहीदों को दी गई श्रद्धांजलि
रेजिंग डे के मौके पर दिल्ली स्थित नेशनल वॉर मेमोरियल पर एक श्रद्धांजलि समारोह भी आयोजित किया गया। इसमें मेजर जनरल आर प्रेमराज और अन्य सैनिकों ने शहीदों को याद करते हुए पुष्पांजलि अर्पित की।
इस दौरान उन सैनिकों के बलिदान को याद किया गया, जिन्होंने देश की रक्षा करते हुए अपनी जान दी। समारोह में मौजूद सभी लोगों ने मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। (Mechanised Infantry Raising Day)
Raksha Rajya Mantri Flags Off IOS SAGAR from Mumbai
IOS Sagar Mission: भारतीय नौसेना का ऑफशोर पेट्रोल वेसल आईएनएस सुनयना अब “आईओएस सागर” के रूप में एक खास अंतरराष्ट्रीय मिशन पर रवाना हो गया है। इस मिशन को मुंबई के नेवल डॉकयार्ड से हरी झंडी दिखाई गई। इस मौके पर नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी ने कहा कि दुनिया में बढ़ते तनाव और समुद्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच देशों के बीच सहयोग बेहद जरूरी हो गया है। उन्होंने कहा कि हिंद महासागर क्षेत्र अब सिर्फ व्यापार का रास्ता नहीं, बल्कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा और सुरक्षा चुनौतियों का केंद्र बनता जा रहा है।
इस मिशन की खास बात यह है कि इसमें भारत के साथ-साथ 16 मित्र देशों के नौसैनिक भी जहाज पर सवार हैं। सभी देशों के प्रतिनिधि एक साथ मिलकर इस पूरे अभियान में हिस्सा लेंगे। (IOS Sagar Mission)
IOS Sagar Mission: आईओएस सागर का दूसरा संस्करण
नौसेना प्रमुख ने कहा कि यह उनके लिए गर्व का क्षण है कि आईओएस सागर के दूसरे संस्करण को हरी झंडी दिखाई जा रही है। उन्होंने कहा कि भारत का विजन साफ है, हिंद महासागर क्षेत्र में सहयोग बढ़ाना और अपनी क्षमताओं का उपयोग सभी के हित में करना है।
उन्होंने प्रधानमंत्री के विचारों का जिक्र करते हुए कहा कि भारत की सोच हमेशा से यह रही है कि क्षेत्र में मिलकर काम किया जाए और साझा समुद्री क्षेत्र को सुरक्षित और स्थिर बनाया जाए। नौसेना प्रमुख ने कहा कि इसी सोच के तहत भारत लगातार क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा दे रहा है और आईओएस सागर उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
“बदल रहे वैश्विक हालात, असर सबसे पहले समुद्र में”
अपने संबोधन में एडमिरल त्रिपाठीने कहा कि आज दुनिया एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहां हालात तेजी से बदल रहे हैं। उन्होंने कहा कि इन बदलावों का असर सबसे पहले समुद्र में देखने को मिलता है। उन्होंने बताया कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और होरमुज जलडमरूमध्य में आई रुकावटों ने पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित किया है।
नौसेना प्रमुख के अनुसार अब समुद्र में प्रतिस्पर्धा सिर्फ तेल और गैस तक सीमित नहीं रही। यह अब रेयर अर्थ मिनरल, क्रिटिकल मिनरल, नए फिशिंग एरिया और डेटा जैसे संसाधनों तक फैल चुकी है। (IOS Sagar Mission)
समुद्री अपराध और अवैध गतिविधियां बड़ी चुनौती
नौसेना प्रमुख ने यह भी कहा कि समुद्र में अवैध गतिविधियां तेजी से बढ़ रही हैं। पायरेसी, हथियारबंद लूट और ड्रग्स तस्करी जैसे खतरे अब ज्यादा जटिल हो गए हैं। नौसेना प्रमुख ने बताया कि पिछले साल हिंद महासागर क्षेत्र में करीब 3700 समुद्री घटनाएं दर्ज की गईं। वहीं 2025 में ड्रग्स की जब्ती एक अरब डॉलर से ज्यादा रही।
उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक अब नॉन-स्टेट एक्टर्स तक भी पहुंच रही है, जिससे इन खतरों से निपटना और चुनौतीपूर्ण हो गया है।
एडमिरल त्रिपाठी ने कहा कि ऐसे समय में 16 देशों का एक साथ आना और इस मिशन में हिस्सा लेना बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि जब अलग-अलग देश अपने संसाधन, अनुभव और क्षमता साझा करते हैं, तो इससे पूरे क्षेत्र की सुरक्षा मजबूत होती है। यह पहल न सिर्फ हिंद महासागर क्षेत्र बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक उदाहरण है। उन्होंने इसे एक ऐसा मंच बताया जहां सहयोग, विश्वास और साझा उद्देश्य को आगे बढ़ाया जा रहा है।
एडमिरल त्रिपाठी ने कहा कि इस मिशन में शामिल सभी लोग एक तरह से पूरे क्षेत्र के 2.7 अरब लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह मिशन सिर्फ एक नौसैनिक अभियान नहीं है, बल्कि साझा जिम्मेदारी और सहयोग का प्रतीक है, जो हिंद महासागर क्षेत्र को सुरक्षित और स्थिर बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
मिशन करीब 50 दिनों तक चलेगा
आईओएस सागर मिशन को हिंद महासागर क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए शुरू किया गया है। यह मिशन करीब 50 दिनों तक चलेगा और इस दौरान जहाज दक्षिण-पूर्वी हिंद महासागर क्षेत्र के कई देशों का दौरा करेगा। इस जहाज पर अलग-अलग देशों के नौसैनिक मौजूद हैं, जो एक साथ ट्रेनिंग लेंगे और समुद्र में एक्सरसाइज करेंगे। इस दौरान संयुक्त अभ्यास, प्रशिक्षण और आपसी संवाद के जरिए देशों के बीच तालमेल बेहतर होगा और एक-दूसरे की कार्यशैली को समझने का मौका मिलेगा। (IOS Sagar Mission)
किन-किन देशों में जाएगा जहाज
आईओएस सागर अपने मिशन के दौरान कई महत्वपूर्ण देशों के बंदरगाहों पर जाएगा। जहाज श्रीलंका के कोलंबो, थाईलैंड के फुकेट, इंडोनेशिया के जकार्ता, सिंगापुर, बांग्लादेश के चटगांव, म्यांमार के यांगून और मालदीव के माले जैसे स्थानों पर पहुंचेगा। इसके बाद यह मिशन कोच्चि में समाप्त होगा। हर पड़ाव पर नौसैनिकों के बीच प्रशिक्षण, चर्चा और अभ्यास कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। (IOS Sagar Mission)
कोच्चि में मिली ट्रेनिंग का होगा इस्तेमाल
इस मिशन में शामिल विदेशी नौसैनिकों ने पहले कोच्चि में ट्रेनिंग ली है। अब वे उसी ट्रेनिंग का उपयोग समुद्र में करेंगे। जहाज पर किए जाने वाले अभ्यास से यह समझने में मदद मिलेगी कि अलग-अलग देशों की नौसेनाएं एक साथ कैसे काम कर सकती हैं। इससे भविष्य में संयुक्त ऑपरेशन करना आसान होगा। (IOS Sagar Mission)
Army corruption case: भारतीय सेना से जुड़े एक मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सीबीआई, केंद्र सरकार और सीएजी को नोटिस जारी किया है। यह याचिका एक लेफ्टिनेंट कर्नल द्वारा दाखिल की गई है, जिसमें उन्होंने सेना के अंदर कथित भ्रष्टाचार की जांच की मांग की है।
Army corruption case: कोर्ट ने मांगा जवाब, अगली सुनवाई तय
इस मामले की सुनवाई जस्टिस प्रतीक जैन कर रहे हैं। कोर्ट ने सभी संबंधित पक्षों से चार हफ्ते के भीतर जवाब देने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 19 मई को होगी। अदालत के आदेश में कहा गया है कि याचिकाकर्ता ने सीबीआई जांच और कोर्ट की निगरानी में जांच कराने की मांग की है।
सेना अधिकारी ने लगाए ये आरोप
याचिका लेफ्टिनेंट कर्नल सुमित श्योराण की तरफ से दाखिल की गई है। उन्होंने आरोप लगाया है कि जब वह नई दिल्ली में तैनात थे, तब उन्होंने खरीद प्रक्रिया में बड़े स्तर पर गड़बड़ियां देखीं।
उनके मुताबिक, यह मामला “एनुअल कंटिन्जेंट ग्रांट” यानी एसीजी से जुड़ा है, जिसके तहत जरूरी सामान खरीदा जाता है।
याचिका में कहा गया है कि खरीद प्रक्रिया में हेरफेर किया गया, रिकॉर्ड में गलत जानकारी दी गई और सरकारी सामान का गलत इस्तेमाल किया गया। आरोप यह भी है कि कुछ सामान को अधिकारियों के मेस का बताकर दिखाया गया, ताकि जांच से बचा जा सके। (Army corruption case)
शिकायत के बावजूद कार्रवाई नहीं होने का आरोप
लेफ्टिनेंट कर्नलने दावा किया है कि उन्होंने सितंबर 2024 से लगातार इस मामले में शिकायतें दीं। उन्होंने अपने आरोपों के साथ दस्तावेज भी जमा किए और कुछ अधिकारियों की इस मामले में भूमिका होने की भी जानकारी दी।
इसके बावजूद किसी भी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। याचिका में कहा गया है कि शिकायतों को नजरअंदाज किया गया, जिससे कथित गड़बड़ियां जारी रहीं और सबूतों के साथ छेड़छाड़ की आशंका भी बनी रही।
उन्होंने यह भी कहा कि जिन अधिकारियों के खिलाफ शिकायत की गई, वही सिस्टम के अंदर जांच की जिम्मेदारी में थे।
साइबर घुसपैठ का भी दावा
याचिका में अफसर ने एक और गंभीर आरोप लगाया गया है। अधिकारी का कहना है कि उनके कंप्यूटर सिस्टम को बिना अनुमति एक्सेस किया गया। इसे उन्होंने एक तरह की टारगेटेड साइबर घुसपैठ बताया है, जिससे उनके पास मौजूद जानकारी तक पहुंचने की कोशिश की गई।
सीबीआई ने नहीं दर्ज की एफआईआर
लेफ्टिनेंट कर्नल ने जनवरी 2025 में सीबीआई को भी इस मामले की विस्तृत शिकायत दी थी। उनका कहना है कि इतनी गंभीर शिकायत के बावजूद अब तक एफआईआर दर्ज नहीं की गई। इसी वजह से उन्होंने अदालत का रुख किया और कोर्ट से जांच की निगरानी करने की मांग की। (Army corruption case)
शिकायत के बाद बनाया दबाव
याचिका में यह भी कहा गया है कि शिकायत करने के बाद उन्हें दबाव का सामना करना पड़ा। उनके अनुसार, उनकी परफॉर्मेंस रिपोर्ट खराब की गई और उनका ट्रांसफर नागपुर कर दिया गया। इसे उन्होंने कार्रवाई से बचने के लिए उठाया गया कदम बताया है।
पेशे से वकील और पूर्व सैन्य अधिकारी कर्नल मुकुल देव ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखा, इस मामले की गहराई से जांच होना बेहद जरूरी है। अधिकारी द्वारा उठाए गए मुद्दे काफी गंभीर हैं और इनकी जांच किसी बाहरी एजेंसी से कराई जानी चाहिए। पहली नजर में ऐसा लगता है कि बड़े स्तर पर गड़बड़ियां हुई हैं, जिनमें वरिष्ठ रैंक के अधिकारी भी शामिल हो सकते हैं।
उन्होंने लिखा, सवाल यह उठता है कि जब छोटे अधिकारियों पर छोटी-छोटी बातों पर कोर्ट मार्शल हो जाता है, तो वरिष्ठ अधिकारियों को कानून से बाहर क्यों रखा जाए। जवाबदेही तय होना जरूरी है। उन्होंने आगे लिखा कि शिकायत करने वाले अधिकारी को लगातार परेशान किया जा रहा है और बार-बार उनका तबादला किया जा रहा है, ताकि जांच से बचा जा सके। अब समय आ गया है कि सेना जैसी प्रतिष्ठित संस्था अपने अंदर की कमियों को ठीक करे। (Army corruption case)
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