Home Blog Page 3

पिलाटस की जगह लेने वाला ट्रेनर एयरक्राफ्ट HTT-40 अब उड़ान को तैयार, हनीवेल ने HAL को भेजे तीन नए इंजन

HTT-40 Trainer Aircraft Engine
TT-40 Trainer Aircraft

HTT-40 Trainer Aircraft Engine: भारत के स्वदेशी बेसिक ट्रेनर एयरक्राफ्ट एचटीटी-40 (हिंदुस्तान टर्बो ट्रेनर 40) प्रोग्राम के लिए अच्छी खबर है। लंबे समय से इंजन सप्लाई में देरी की वजह से रुका यह प्रोजेक्ट अब दोबारा रफ्तार पकड़ता दिख रहा है। अमेरिकी कंपनी हनीवेल ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल को टीपीई331-12बी टर्बोप्रॉप इंजन की पहली खेप सौंप दी है। इन इंजनों के मिलने के बाद एचटीटी-40 ट्रेनर विमान की डिलीवरी जल्द होने की उम्मीद बढ़ गई है। बता दें कि एचएएल ने पिछले साल सितंबर से एचटीटी-40 ट्रेनर विमानों की डिलीवरी करने की बात कही थी।

भारतीय वायुसेना पिछले कई वर्षों से नए बेसिक ट्रेनर एयरक्राफ्ट का इंतजार कर रही थी। पुराने ट्रेनर विमानों के धीरे-धीरे बाहर होने और नए पायलटों की ट्रेनिंग जरूरतों को देखते हुए एचटीटी-40 प्रोग्राम को बेहद अहम माना जा रहा है।

HTT-40 Trainer Aircraft Engine: एचएएल को मिले तीन नए इंजन

जानकारी के मुताबिक अमेरिकी कंपनी हनीवेल ने एचएएल को तीन टीपीई331-12बी टर्बोप्रॉप इंजन डिलीवर किए हैं। यह इंजन खास तौर पर एचटीटी-40 ट्रेनर एयरक्राफ्ट के लिए बनाए गए हैं। अधिकारियों का कहना है कि सप्लाई चेन से जुड़ी दिक्कतों के चलते इंजन डिलीवरी में देरी हो रही थी, लेकिन अब स्थिति धीरे-धीरे सामान्य हो रही है।

हनीवेल ने एचएएल को भरोसा दिया है कि आगे की सप्लाई तय समय पर की जाएगी। साथ ही हर महीने दो इजंन डिलीवरी करने की बात कही है। वहीं, भारतीय वायुसेना एचटीटी-40 को नए पायलटों की शुरुआती उड़ान ट्रेनिंग के लिए तैयार कर रही है। यह विमान युवा पायलटों को बेसिक फ्लाइंग स्किल्स सिखाने में अहम भूमिका निभाएगा।

तीन साल पहले दिया था बड़ा ऑर्डर

भारतीय वायुसेना ने करीब तीन साल पहले एचएएल को 70 एचटीटी-40 बेसिक ट्रेनर विमान बनाने का ऑर्डर दिया था। इस डील की कीमत लगभग 6,838 करोड़ रुपये बताई गई थी। समझौते के तहत एचएएल को वित्त वर्ष 2025-26 में 12 विमान वायुसेना को देने थे।

हालांकि इंजन सप्लाई नहीं होने की वजह से अब तक एक भी विमान डिलीवर नहीं किया जा सका। इसी कारण पूरे प्रोग्राम में देरी हुई। सूत्रों का कहना है कि विमान लगभग तैयार थे, लेकिन इंजन नहीं मिलने से अंतिम उत्पादन और टेस्टिंग प्रभावित हुई। अब जब इंजन मिलने लगे हैं तो एचएएल डिलीवरी प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाना चाहता है।

HTT-40 Trainer Aircraft Engine
HTT-40 Trainer Aircraft

क्या है टीपीई331-12बी इंजन

एचटीटी-40 में इस्तेमाल होने वाला टीपीई331-12बी एक टर्बोप्रॉप इंजन है। इसे अमेरिकी कंपनी हनीवेल बनाती है। यह इंजन करीब 1100 शाफ्ट हॉर्सपावर क्षमता वाला माना जाता है।

यह इंजन हल्के मिलिटरी और ट्रेनर विमानों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसकी खासियत कम ईंधन खपत, बेहतर भरोसेमंद प्रदर्शन और आसान मेंटेनेंस मानी जाती है।

करीब चार साल पहले एचएएल और हनीवेल के बीच 100 मिलियन डॉलर का समझौता हुआ था। इसके तहत कुल 88 इंजन और इंजन किट सप्लाई की जानी थीं। इनमें से कुछ इंजन सीधे हनीवेल देगा जबकि बाकी भारत में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के तहत बनाए जाएंगे। समझौते के अनुसार पहला इंजन सितंबर 2025 तक आना था, लेकिन सप्लाई में देरी हुई।

दो विमान पहले से भर रहे हैं उड़ान 

दिलचस्प बात यह है कि एचटीटी-40 के दो सीरियल प्रोडक्शन विमान पहले से उड़ान भर रहे हैं। इनमें पुराने कैटेगरी-बी इंजन लगाए गए हैं, जो पहले प्रोटोटाइप विमानों में इस्तेमाल किए गए थे। पहले सीरियल प्रोडक्शन विमान टीएच-4001 ने अक्टूबर 2025 में अपनी पहली उड़ान भरी थी। इसके बाद दूसरा विमान टीएच-4002 ने दिसंबर 2025 में उड़ान भरी।

कैसे शुरू हुआ एचटीटी-40 प्रोग्राम

एचटीटी-40 प्रोग्राम की शुरुआत 2013 में हुई थी। उस समय एचएएल ने इस प्रोजेक्ट को अपने इंटरनल फंड से शुरू किया था। शुरुआती निवेश करीब 350 करोड़ रुपये बताया गया था।

पहला प्रोटोटाइप फरवरी 2016 में सामने आया था जबकि पहली उड़ान मई 2016 में हुई। इसके बाद कई सालों तक टेस्टिंग और एयरवर्थिनेस से जुड़े परीक्षण चलते रहे।

इस दौरान विमान ने स्पिन टेस्ट, एरोबैटिक ट्रायल और विभिन्न सुरक्षा परीक्षण पूरे किए। जून 2022 में इसे प्रोविजनल एयरवर्थिनेस सर्टिफिकेट मिला। यह पूरी तरह भारत में डिजाइन और विकसित किया गया बेसिक ट्रेनर विमान है।

एचटीटी-40 की खासियतें

एचटीटी-40 एक टैंडम सीट बेसिक ट्रेनर विमान है। इसमें ट्रेनर एंड ट्रेनी पायलट एक के पीछे एक बैठते हैं। विमान पूरी तरह एरोबैटिक क्षमता वाला है और शुरुआती ट्रेनिंग के लिए डिजाइन किया गया है।

इसमें एयर-कंडीशंड कॉकपिट दिया गया है, ताकि गर्म इलाकों में भी ट्रेनिंग आसान हो सके। विमान में ग्लास कॉकपिट और आधुनिक एवियोनिक्स लगाए गए हैं, जिससे पायलटों को आधुनिक फाइटर विमान जैसी ट्रेनिंग मिलती है।

इसमें जीरो-जीरो इजेक्शन सीट भी है। इसका मतलब यह है कि कम ऊंचाई और कम गति पर भी पायलट सुरक्षित तरीके से बाहर निकल सकता है।

विमान में “हॉट रिफ्यूलिंग” सुविधा भी दी गई है। यानी इंजन बंद किए बिना जमीन पर ईंधन भरा जा सकता है। इससे ऑपरेशन तेज होते हैं।

HTT-40 Trainer Aircraft Engine
TT-40 Trainer Aircraft

तकनीकी क्षमता भी काफी मजबूत

एचटीटी-40 की लंबाई करीब 10.5 मीटर है जबकि विंगस्पैन लगभग 11 मीटर है। इसका अधिकतम टेकऑफ वजन करीब 2800 किलोग्राम बताया जाता है। यह विमान लगभग 400 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से उड़ सकता है। इसकी अधिकतम सीमा करीब 1000 किलोमीटर है।

विमान 6000 मीटर तक की ऊंचाई पर ऑपरेट कर सकता है। इसके अलावा यह +6 और -3 जी लिमिट्स तक एरोबैटिक मूवमेंट करने में सक्षम है। सूत्रों का कहना है कि यह केवल ट्रेनिंग विमान नहीं बल्कि जरूरत पड़ने पर हल्के हथियारों के साथ इस्तेमाल होने की क्षमता भी रखता है।

भारत में बढ़ेगा स्वदेशीकरण

एचटीटी-40 प्रोग्राम को आत्मनिर्भर भारत अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। फिलहाल इसमें करीब 56 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री इस्तेमाल हो रही है। एचएएल का फोकस इसे आगे बढ़ाकर 60 प्रतिशत से ज्यादा करना है। इसके लिए कई बड़े सिस्टम और सब-सिस्टम भारत में बनाए जाएंगे। इस प्रोग्राम से देश की 100 से ज्यादा एमएसएमई कंपनियां जुड़ी हुई हैं। इससे हजारों लोगों को रोजगार मिलने की बात कही जा रही है। इंजन टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के बाद भारत में भी इंजन असेंबली और निर्माण का रास्ता खुलेगा।

पिलाटस पीसी-7 की जगह लेगा एचटीटी-40

फिलहाल भारतीय वायुसेना शुरुआती उड़ान ट्रेनिंग के लिए स्विस कंपनी के पिलाटस पीसी-7 एमके-2 विमान इस्तेमाल करती है। स्टेज-1 ट्रेनिंग के दौरान सभी नए पायलट इन्हीं विमानों पर बेसिक फ्लाइंग सीखते हैं। इसके बाद उन्हें फाइटर, ट्रांसपोर्ट और हेलीकॉप्टर स्ट्रीम में बांटा जाता है।

फाइटर पायलटों को आगे किरण एमके-1ए और हॉक एडवांस्ड जेट ट्रेनर पर ट्रेनिंग दी जाती है। 2019 में पिलाटस कंपनी के साथ कारोबारी लेनदेन पर रोक लगने के बाद भारत ने नए स्वदेशी ट्रेनर विमान पर ज्यादा जोर देना शुरू किया। इसी वजह से एचटीटी-40 प्रोग्राम को तेजी से आगे बढ़ाया गया।

नासिक और बेंगलुरु में बन रहे विमान

एचएएल अब बेंगलुरु और नासिक दोनों जगह एचटीटी-40 का प्रोडक्शन कर रहा है। अक्टूबर 2025 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने नासिक में नई प्रोडक्शन लाइन का उद्घाटन किया था। इसी सुविधा में एलसीए एमके-1ए लड़ाकू विमान का उत्पादन भी किया जा रहा है। एचएएल का कहना है कि दोनों फैक्ट्रियों को मिलाकर हर साल लगभग 20 एचटीटी-40 विमान बनाए जा सकते हैं। हालांकि वास्तविक उत्पादन इंजन सप्लाई पर निर्भर करेगा।

वायुसेना के लिए क्यों जरूरी है यह विमान

भारतीय वायुसेना के पास इस समय ट्रेनर विमानों की कमी मानी जा रही है। अधिकारियों के अनुसार वायुसेना को बड़ी संख्या में नए ट्रेनर विमानों की जरूरत है ताकि पायलट ट्रेनिंग पर दबाव कम हो सके।

एचटीटी-40 के आने से पूरी ट्रेनिंग प्रणाली को मजबूती मिलेगी। खास तौर पर शुरुआती उड़ान प्रशिक्षण में यह बड़ा बदलाव माना जा रहा है।

सूत्रों का कहना है कि स्वदेशी ट्रेनर विमान होने से मेंटेनेंस, स्पेयर पार्ट्स और लॉजिस्टिक सपोर्ट भी आसान होगा। विदेशी निर्भरता कम होने से लंबे समय में खर्च भी कम आएगा।

उत्पादन में देरी क्यों हुई

एचटीटी-40 प्रोग्राम में सबसे बड़ी चुनौती इंजन सप्लाई रही। विमान का ढांचा और सिस्टम काफी हद तक तैयार थे, लेकिन इंजन समय पर नहीं पहुंचे।

ग्लोबल सप्लाई चेन संकट, एविएशन सेक्टर में देरी और तकनीकी कारणों से इंजन डिलीवरी प्रभावित हुई। इसी वजह से प्रोडक्शन लाइन फुल स्पीड से काम नहीं कर सकी।

अब इंजन की पहली खेप आने के बाद एचएएल उत्पादन को तेज करने की तैयारी में है। अधिकारियों का कहना है कि विमान निर्माण और टेस्टिंग प्रक्रिया को अब तेजी से आगे बढ़ाया जाएगा।

भारत के AMCA स्टेल्थ फाइटर प्रोजेक्ट के लिए रक्षा मंत्रालय ने जारी की RFP, दो इंजन, स्टेल्थ डिजाइन और AI सिस्टम से होगा लैस

AMCA Fighter Jet RFP

AMCA Fighter Jet RFP: भारत के सबसे बड़े और सबसे महत्वाकांक्षी लड़ाकू विमान प्रोजेक्ट एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) को लेकर बड़ा कदम उठाया गया है। रक्षा मंत्रालय ने आज इस स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के स्टेल्थ फाइटर विमान प्रोजेक्ट के लिए आधिकारिक रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) जारी कर दी। यह आरएफपी तीन शॉर्टलिस्टेड कंपनियों और कंसोर्टियम को भेजा गया है।

यह विमान स्टेल्थ तकनीक, आधुनिक सेंसर, लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता और नेटवर्क आधारित युद्ध प्रणाली से लैस होगा। यह विमान पूरी तरह मल्टी रोल होगा और दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को भेदने में सक्षम बनाया जाएगा।

यह प्रोजेक्ट भारतीय वायुसेना के भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा है। एएमसीए को भारत का पहला पूरी तरह स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का स्टेल्थ फाइटर विमान माना जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि यह विमान चीन के जे-20 और अमेरिका के एफ-35 जैसे आधुनिक फाइटर जेट्स की श्रेणी में भारत की एंट्री कराएगा।

AMCA Fighter Jet RFP: क्या है एएमसीए प्रोजेक्ट

एएमसीए यानी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट एक ट्विन इंजन, मल्टी रोल और लो ऑब्जर्वेबल स्टेल्थ फाइटर जेट है। इसे एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी यानी एडीए द्वारा डिजाइन किया गया है। यह एजेंसी डीआरडीओ के तहत काम करती है।

इस विमान को भारतीय वायुसेना की भविष्य की जरूरतों के हिसाब से विकसित किया जा रहा है। यह एयर-टू-एयर, एयर-टू-ग्राउंड और इंटेलिजेंस सर्विलांस एंड रिकॉनिसेंस यानी आईएसआर मिशन को अंजाम देने में सक्षम होगा।

एएमसीए को स्टेल्थ तकनीक के साथ तैयार किया जा रहा है ताकि दुश्मन के रडार इसे आसानी से पकड़ न सकें। इसमें इंटरनल वेपन बे, एडवांस्ड एवियोनिक्स, सेंसर फ्यूजन और सुपरक्रूज जैसी आधुनिक क्षमताएं होंगी।

किन कंपनियों को भेजा गया आरएफपी

रक्षा मंत्रालय ने यह आरएफपी तीन शॉर्टलिस्टेड कंपनियों और कंसोर्टियम को जारी किया है। इनमें पहला नाम लार्सन एंड टुब्रो और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के कंसोर्टियम का है। दूसरा नाम टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स का है और तीसरा नाम भारत फोर्ज और बीईएमएल के समूह का है।

इन कंपनियों को एएमसीए प्रोजेक्ट में इंडस्ट्री पार्टनर के तौर पर चुना जा सकता है। आरएफपी के अनुसार चुनी गई कंपनी को विमान के निर्माण, असेंबली, सिस्टम इंटीग्रेशन, टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन में अहम भूमिका निभानी होगी। लेकिन कुल प्रोजेक्ट 7 साल यानी 84 महीने में पूरा करना है। वहीं, पूरा प्रोजेक्ट 2034 तक पूरा करना होगा।

एएमसीए की सबसे बड़ी खासियत क्या होगी

एएमसीए को पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान कहा जा रहा है। इसका मतलब यह है कि इसमें स्टेल्थ तकनीक के साथ आधुनिक डिजिटल युद्ध प्रणाली होगी।

इस विमान में रडार अब्जॉर्बिंग मटेरियल का इस्तेमाल किया जाएगा ताकि इसका रडार क्रॉस सेक्शन बेहद कम रहे। विमान के अंदर ही हथियार रखने के लिए इंटरनल वेपन बे होगा, जिससे इसकी स्टेल्थ क्षमता और मजबूत होगी।

इसमें एडवांस्ड एईएसए रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम, हेलमेट माउंटेड डिस्प्ले और बड़े डिजिटल कॉकपिट स्क्रीन लगाए जाएंगे।

एएमसीए में आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट लगाया जाएगा। इसका काम दुश्मन के रडार और मिसाइल सिस्टम को भ्रमित करना होगा।

विमान में रडार वार्निंग रिसीवर, मिसाइल अप्रोच वार्निंग सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक काउंटर मेजर्स जैसी तकनीकें होंगी। इससे दुश्मन की मिसाइलों से बचाव आसान होगा। (AMCA Fighter Jet RFP)

पांच प्रोटोटाइप बनाए जाएंगे

रक्षा समाचार को मिली आरएफपी के मुताबिक इस प्रोजेक्ट के तहत पांच फ्लाइंग प्रोटोटाइप तैयार किए जाएंगे। इनके अलावा एक स्ट्रक्चरल टेस्ट स्पेसिमेन भी बनाया जाएगा।

इन प्रोटोटाइप्स का इस्तेमाल फ्लाइट टेस्टिंग, सिस्टम वैलिडेशन और अलग-अलग तकनीकी परीक्षणों में किया जाएगा। इसके साथ ही टेस्ट फैसिलिटीज, जिग्स, फिक्स्चर्स और ग्राउंड सपोर्ट सिस्टम भी तैयार किए जाएंगे।

विमान की टेस्टिंग लंबी और जटिल प्रक्रिया होगी। इसमें हजारों घंटे की उड़ान और अलग-अलग मौसम व ऑपरेशनल परिस्थितियों में परीक्षण शामिल होंगे।

ट्विन इंजन कॉन्फिगरेशन पर खास जोर

एएमसीए में दो इंजन लगाए जाएंगे। इसे ट्विन इंजन कॉन्फिगरेशन कहा जाता है। इससे विमान की ताकत और सुरक्षा दोनों बढ़ेंगी।

फिलहाल माना जा रहा है कि शुरुआती एएमसीए मार्क-1 में जीई एफ414 इंजन का इस्तेमाल किया जा सकता है। बाद के संस्करण यानी एएमसीए मार्क-2 में ज्यादा ताकतवर और संभवतः स्वदेशी इंजन लगाने की योजना है। इसके लिए भारत अलग इंजन विकास कार्यक्रम पर भी काम कर रहा है।

आरएफपी में प्रोपल्शन सिस्टम के लिए अलग एननेक्सर दिया गया है, जिसमें इंजन इंटीग्रेशन, टेस्ट रिग्स और ग्राउंड टेस्टिंग की विस्तृत जानकारी शामिल है। (AMCA Fighter Jet RFP)

सुपरक्रूज और स्टेल्थ तकनीक

एएमसीए की सबसे महत्वपूर्ण तकनीकों में सुपरक्रूज क्षमता भी शामिल है। इसका मतलब यह है कि विमान आफ्टरबर्नर का इस्तेमाल किए बिना भी सुपरसोनिक गति से उड़ सकेगा।

आमतौर पर लड़ाकू विमान तेज गति पाने के लिए आफ्टरबर्नर का इस्तेमाल करते हैं जिससे ईंधन की खपत बहुत बढ़ जाती है। लेकिन सुपरक्रूज क्षमता वाले विमान लंबे समय तक तेज गति बनाए रख सकते हैं और ईंधन भी कम खर्च होता है।

आरएफपी में इंफ्रारेड सिग्नेचर को कम करने पर भी विशेष जोर दिया गया है। आधुनिक मिसाइलें इंजन की गर्मी को ट्रैक करके हमला करती हैं। इसलिए एएमसीए में इंजन एग्जॉस्ट डिजाइन इस तरह तैयार किया जाएगा कि उसकी गर्मी कम दिखाई दे। विमान में रडार अब्जॉर्बिंग मटेरियल यानी विशेष कोटिंग का इस्तेमाल होगा जो रडार तरंगों को कम रिफ्लेक्ट करेगी। इससे विमान का रडार क्रॉस सेक्शन बहुत कम हो जाएगा।

एएमसीए में सेंसर फ्यूजन तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। इसका मतलब यह है कि विमान के अलग-अलग सेंसर से मिलने वाली जानकारी एक साथ पायलट को दिखाई जाएगी। इसमें एईएसए रडार, इंफ्रारेड सर्च एंड ट्रैक सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट और सुरक्षित डेटा लिंक शामिल होंगे।

विमान में एडवांस्ड एईएसए यानी एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड अरे रडार पारंपरिक रडार की तुलना में ज्यादा शक्तिशाली और तेज होगा। यह रडार एक साथ कई लक्ष्यों को ट्रैक कर सकेगा। इसके अलावा दुश्मन के इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग से बचने की क्षमता भी इसमें होगी।

आधुनिक एवियोनिक्स सिस्टम

एएमसीए का पूरा कॉकपिट डिजिटल होगा। आरएफपी में बड़े पैनोरमिक डिस्प्ले, हेलमेट माउंटेड डिस्प्ले और एडवांस्ड मिशन कंप्यूटर का जिक्र किया गया है।

पायलट को अलग-अलग स्क्रीन देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। विमान के सेंसर और रडार से मिलने वाली जानकारी एक साथ प्रोसेस होकर पायलट को दिखाई जाएगी। इसे सेंसर फ्यूजन कहा जाता है। (AMCA Fighter Jet RFP)

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बेस्ड मदद

आरएफपी के अनुसार विमान में एआई आधारित सहायता प्रणाली भी होगी। इससे पायलट को युद्ध के दौरान तेजी से निर्णय लेने में मदद मिलेगी।

सिस्टम खुद खतरे की पहचान कर पायलट को चेतावनी देगा और जरूरत पड़ने पर जवाबी कार्रवाई के विकल्प भी सुझाएगा।

होगा इंटरनल वेपन बे

एएमसीए में हथियार विमान के अंदर रखे जाएंगे। इसे इंटरनल वेपन बे कहा जाता है। इससे विमान की स्टेल्थ क्षमता बनी रहती है क्योंकि बाहरी हिस्से पर हथियार लटकाने से रडार सिग्नेचर बढ़ जाता है।

एएमसीए को कई प्रकार की मिसाइलों और बमों से लैस किया जाएगा। इसमें हवा से हवा में मार करने वाली अस्त्र मिसाइल, हवा से जमीन पर हमला करने वाले प्रिसिजन गाइडेड हथियार और लंबी दूरी की मिसाइलें शामिल की जा सकती हैं।

भविष्य में ब्रह्मोस-एनजी जैसी मिसाइलों को भी इसमें जोड़े जाने की संभावना बताई गई है।

एएमसीए में फ्लाई-बाय-वायर तकनीक का इस्तेमाल होगा। इसमें पायलट के कमांड को कंप्यूटर कंट्रोल्ड सिस्टम विमान तक पहुंचाते हैं।

इसके साथ एआई आधारित स्टेबिलिटी और फ्लाइट एनवेलप प्रोटेक्शन सिस्टम भी होगा। इससे विमान को संभालना आसान होगा और सुरक्षा बढ़ेगी।

लंबी टेस्टिंग प्रक्रिया होगी

आरएफपी में बताया गया है कि एएमसीए के प्रोटोटाइप्स पर करीब 1800 से ज्यादा फ्लाइट सॉर्टीज की जाएंगी।

इसके लिए अलग-अलग टेस्ट फैसिलिटीज बनाई जाएंगी। इनमें ग्राउंड टेस्ट रिग्स, ईएमआई-ईएमसी टेस्ट सेटअप, स्ट्रक्चरल टेस्ट फैसिलिटी और टेलीमेट्री सिस्टम शामिल हैं। सूत्रों के मुताबिक यह प्रक्रिया कई साल तक चल सकती है। (AMCA Fighter Jet RFP)

एडीए रखेगा डिजाइन कंट्रोल

आरएफपी के अनुसार एडीए इस पूरे प्रोजेक्ट का डिजाइन अथॉरिटी रहेगा। यानी विमान के डिजाइन और कॉन्फिगरेशन का पूरा नियंत्रण एडीए के पास रहेगा। इंडस्ट्री पार्टनर को डिजाइन डेटा और ड्रॉइंग्स के आधार पर मैन्युफैक्चरिंग और सिस्टम इंटीग्रेशन करना होगा।

आरएफपी में यह भी कहा गया है कि जो कंपनी या कंसोर्टियम यह प्रोजेक्ट जीतेगा, उसे तीन महीने के भीतर नई कंपनी बनानी होगी। इसी नई कंपनी के जरिए एएमसीए प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाया जाएगा। (AMCA Fighter Jet RFP)

माइलस्टोन आधारित पेमेंट सिस्टम

प्रोजेक्ट में भुगतान माइलस्टोन आधारित होगा। यानी अलग-अलग चरण पूरे होने पर भुगतान जारी किया जाएगा।
इन चरणों में टूलिंग, जिग्स, स्ट्रक्चरल मॉड्यूल, पहला प्रोटोटाइप, फर्स्ट फ्लाइट और आगे की टेस्टिंग शामिल हैं।

भारत के लिए क्यों अहम है एएमसीए

भारतीय वायुसेना लंबे समय से पांचवीं पीढ़ी के स्टेल्थ फाइटर विमान की जरूरत महसूस कर रही है। चीन पहले ही जे-20 को अपनी वायुसेना में शामिल कर चुका है। वहीं अमेरिका के पास एफ-22 और एफ-35 जैसे आधुनिक विमान मौजूद हैं।

ऐसे में एएमसीए को भारत की सामरिक जरूरतों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रोजेक्ट केवल एक लड़ाकू विमान नहीं बल्कि भारत की एयरोस्पेस और रक्षा निर्माण क्षमता की बड़ी परीक्षा भी है।

इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर फोकस

इस प्रोजेक्ट के तहत बड़े स्तर पर इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाएगा। इसमें हाई प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग, कंपोजिट स्ट्रक्चर निर्माण, टेस्ट फैसिलिटीज और डिजिटल इंजीनियरिंग शामिल हैं।

इसके साथ भारतीय कंपनियों को आधुनिक एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी पर काम करने का मौका मिलेगा।

कंपोजिट मटेरियल का इस्तेमाल

एएमसीए में बड़े पैमाने पर कंपोजिट मटेरियल का इस्तेमाल किया जाएगा। इससे विमान का वजन कम होगा और मजबूती बढ़ेगी।

कम वजन होने से विमान की गति, रेंज और हथियार ले जाने की क्षमता बेहतर होगी। (AMCA Fighter Jet RFP)

साइबर सिक्योरिटी पर खास फोकस

आरएफपी में साइबर सिक्योरिटी को अनिवार्य बनाया गया है। कंपनियों को रक्षा मंत्रालय की साइबर सुरक्षा गाइडलाइन का पालन करना होगा।

क्योंकि आधुनिक लड़ाकू विमान पूरी तरह नेटवर्क आधारित होते हैं, इसलिए साइबर हमलों से सुरक्षा बेहद जरूरी मानी जा रही है।

एएमसीए परियोजना में अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों को लागू किया जाएगा। आरएफपी में एएस9100 जैसे एयरोस्पेस क्वालिटी स्टैंडर्ड का जिक्र किया गया है।

सभी निर्माण इकाइयों और सप्लाई चेन को इन मानकों का पालन करना होगा। (AMCA Fighter Jet RFP)

लंबे समय तक रखरखाव की जिम्मेदारी

इंडस्ट्री पार्टनर को केवल विमान बनाना ही नहीं बल्कि उनके रखरखाव और सपोर्ट की जिम्मेदारी भी निभानी होगी। आरएफपी में एलआरयू और दूसरे सिस्टम्स के लिए वारंटी और लॉन्ग टर्म सपोर्ट की व्यवस्था का भी जिक्र किया गया है।

रक्षा अधिकारियों का कहना है कि एएमसीए प्रोजेक्ट भारत के रक्षा क्षेत्र में निजी कंपनियों की भूमिका को भी नए स्तर पर ले जाएगा। (AMCA Fighter Jet RFP)

जेन टेक्नोलॉजीज ने लॉन्च किया इंटीग्रेटेड स्मार्ट बॉर्डर सूट, शेयरों में जबरदस्त उछाल

Zen Technologies Smart Border Suite
AI-Generated Image

Zen Technologies Smart Border Suite: डिफेंस सेक्टर की कंपनी जेन टेक्नोलॉजीज के शेयरों में 27 मई को अचानक तेज उछाल देखने को मिला। कमजोर बाजार माहौल के बावजूद जेन टेक्नोलॉजीज का शेयर इंट्रा-डे ट्रेडिंग में 7 प्रतिशत से ज्यादा चढ़ गया। इसकी सबसे बड़ी वजह कंपनी की नई “इंटीग्रेटेड स्मार्ट बॉर्डर सूट” तकनीक रही, जिसे भारत की बदलती सीमा सुरक्षा जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।

कंपनी ने स्टॉक एक्सचेंज को दी जानकारी में बताया कि उसने एक नया एआई आधारित बॉर्डर सिक्योरिटी सिस्टम लॉन्च किया है। इसका मकसद भारत की सीमाओं पर बढ़ते खतरों से निपटना है। इसमें घुसपैठ, ड्रोन के जरिए तस्करी, नार्को-टेररिज्म और हाइब्रिड वॉरफेयर जैसे खतरों पर नजर रखने की क्षमता शामिल है।

कंपनी की इस घोषणा के बाद निवेशकों में उत्साह बढ़ गया और शेयर बाजार में जेन टेक्नोलॉजीज के शेयर तेजी से ऊपर चले गए। (Zen Technologies Smart Border Suite)

Zen Technologies Smart Border Suite: शेयर बाजार में अचानक आई तेजी

जेन टेक्नोलॉजीज का शेयर 27 मई को करीब 1606 रुपये के स्तर पर खुला था। कुछ ही घंटों में इसमें तेज खरीदारी शुरू हो गई और शेयर करीब 1720 रुपये तक पहुंच गया। यानी एक ही दिन में शेयर में 7 प्रतिशत से ज्यादा की तेजी दर्ज की गई।

बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि जब पूरा बाजार सतर्क माहौल में कारोबार कर रहा था, तब जेन टेक्नोलॉजीज में आई तेजी ने निवेशकों का ध्यान खींचा। खास बात यह रही कि कंपनी की यह बढ़त किसी बड़े सरकारी ऑर्डर की वजह से नहीं, बल्कि नई तकनीक लॉन्च करने की घोषणा के बाद आई।

पिछले कुछ महीनों में भी जेन टेक्नोलॉजीज के शेयरों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। अप्रैल महीने में कंपनी के शेयरों में करीब 31 प्रतिशत की तेजी आई थी। वहीं इस साल अब तक कंपनी का शेयर लगभग 24 प्रतिशत ऊपर जा चुका है।

क्या है इंटीग्रेटेड स्मार्ट बॉर्डर सूट

जेन टेक्नोलॉजीज ने जिस नए सिस्टम की घोषणा की है, उसे “इंटीग्रेटेड स्मार्ट बॉर्डर सूट” यानी आईएसबीएस नाम दिया गया है। यह एक ऐसा सिस्टम है जिसमें कई आधुनिक तकनीकों को एक साथ जोड़ा गया है।

कंपनी के मुताबिक इसमें एंटी-ड्रोन सिस्टम, स्मार्ट सर्विलांस, ऑटोमेटेड मॉनिटरिंग, रियल टाइम अलर्ट और एआई आधारित खतरे की पहचान जैसी सुविधाएं मौजूद हैं।

इस सिस्टम का मकसद सीमा पर हर गतिविधि पर लगातार नजर रखना है। अगर कोई संदिग्ध गतिविधि दिखाई देती है, तो सिस्टम तुरंत सुरक्षा एजेंसियों को अलर्ट भेज सकता है।

कंपनी का कहना है कि भारत की पश्चिमी और पूर्वी सीमाओं पर पिछले कुछ वर्षों में ड्रोन आधारित हथियार और नशे की तस्करी तेजी से बढ़ी है। इसके अलावा सीमा पार से घुसपैठ और हाइब्रिड वॉरफेयर जैसे खतरे भी बढ़े हैं। इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखकर यह तकनीक तैयार की गई है।

अमित शाह के बयान के बाद बढ़ी चर्चा

जेन टेक्नोलॉजीज की यह घोषणा ऐसे समय आई है जब कुछ दिन पहले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने देशभर में “स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट” लागू करने की बात कही थी।

सरकार भारत-पाकिस्तान और भारत-बांग्लादेश सीमा के करीब 6000 किलोमीटर क्षेत्र में आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ाना चाहती है। इसमें ड्रोन, रडार, स्मार्ट कैमरे और ऑटोमेटेड सर्विलांस सिस्टम शामिल किए जाने की योजना है।

जेन टेक्नोलॉजीज ने भी अपने बयान में कहा कि उसका नया सिस्टम भारत के इसी “इम्पेनेट्रेबल स्मार्ट बॉर्डर” विजन को सपोर्ट करने के लिए बनाया गया है।

कंपनी के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर अशोक अटलुरी ने कहा कि यह पूरी तरह स्वदेशी तकनीक आधारित सिस्टम है। इसमें भारतीय जरूरतों के हिसाब से एआई आधारित सिक्योरिटी इकोसिस्टम तैयार किया गया है।

उन्होंने कहा कि सीमा सुरक्षा के लिए अब केवल सैनिकों की तैनाती काफी नहीं मानी जाती। आधुनिक तकनीक, रियल टाइम डेटा और स्मार्ट निगरानी सिस्टम भी उतने ही जरूरी हो चुके हैं। (Zen Technologies Smart Border Suite)

कैसे काम करेगा यह सिस्टम

कंपनी के अनुसार यह सिस्टम कई अलग-अलग तकनीकों को एक नेटवर्क के रूप में जोड़ता है। इसमें ड्रोन डिटेक्शन सिस्टम, कैमरे, सेंसर, सर्विलांस टावर और एआई आधारित सॉफ्टवेयर एक साथ काम करते हैं।

अगर सीमा के पास कोई ड्रोन दिखाई देता है, तो सिस्टम उसकी दिशा, ऊंचाई और गति का पता लगा सकता है। इसके बाद सुरक्षा एजेंसियों को तुरंत जानकारी मिलती है।

इसी तरह अगर किसी इलाके में संदिग्ध गतिविधि होती है, तो कैमरे और सेंसर उसे रिकॉर्ड करके कंट्रोल सेंटर तक भेज सकते हैं।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक सीमा सुरक्षा में अब “रियल टाइम सिचुएशनल अवेयरनेस” बेहद जरूरी हो चुकी है। यानी सुरक्षा बलों को हर समय सीमा की सटीक स्थिति की जानकारी मिलती रहनी चाहिए।

क्यों बढ़ रही है स्मार्ट बॉर्डर सिस्टम की जरूरत

पिछले कुछ वर्षों में भारत की सीमाओं पर ड्रोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। खासकर पंजाब और जम्मू सेक्टर में कई बार ड्रोन के जरिए हथियार, नकदी और नशे की खेप भेजे जाने के मामले सामने आए हैं।

इसके अलावा सीमा पार से सुरंगों, छोटे ड्रोन और डिजिटल नेटवर्क का इस्तेमाल भी बढ़ा है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि अब पारंपरिक निगरानी सिस्टम अकेले काफी नहीं हैं।

इसी वजह से भारत अब एआई आधारित स्मार्ट निगरानी सिस्टम पर ज्यादा ध्यान दे रहा है। इसमें कम मानव हस्तक्षेप के साथ ज्यादा बड़े इलाके पर नजर रखी जा सकती है। (Zen Technologies Smart Border Suite)

डिफेंस ट्रेनिंग सिमुलेटर बनाती थी जेन टेक्नोलॉजीज

हैदराबाद की जेन टेक्नोलॉजीज पिछले कुछ वर्षों में भारतीय रक्षा उद्योग की तेजी से उभरती कंपनियों में शामिल हो चुकी है। कंपनी पहले मुख्य रूप से डिफेंस ट्रेनिंग सिमुलेटर बनाती थी, लेकिन अब उसने एंटी-ड्रोन सिस्टम, स्मार्ट वेपन प्लेटफॉर्म और बॉर्डर सिक्योरिटी टेक्नोलॉजी में भी तेजी से विस्तार किया है।

कंपनी को पहले भी रक्षा मंत्रालय से कई बड़े प्रोजेक्ट मिल चुके हैं। इसमें एंटी-ड्रोन सिस्टम, कॉम्बैट ट्रेनिंग सिस्टम और सिमुलेटर से जुड़े बड़े ऑर्डर शामिल हैं।

हाल ही में जेन टेक्नोलॉजीज को आर्मर्ड व्हीकल्स निगम लिमिटेड यानी एवीएनएल के एक बड़े टेंडर में एल-1 बिडर भी घोषित किया गया था। यह टेंडर आर्मर्ड रिकवरी व्हीकल्स के लिए रिमोट कंट्रोल वेपन सिस्टम से जुड़ा था।

रक्षा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि कंपनी अब केवल ट्रेनिंग टेक्नोलॉजी तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि वह पूरी तरह एक एडवांस्ड डिफेंस टेक्नोलॉजी कंपनी के रूप में खुद को स्थापित करने की कोशिश कर रही है। (Zen Technologies Smart Border Suite)

डिफेंस शेयरों में क्यों बढ़ी दिलचस्पी

पिछले कुछ महीनों में डिफेंस सेक्टर के शेयरों में निवेशकों की दिलचस्पी काफी बढ़ी है। पश्चिम एशिया में तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध और भारत के बढ़ते रक्षा आधुनिकीकरण कार्यक्रम की वजह से डिफेंस कंपनियों पर निवेशकों का फोकस बढ़ा है।

मार्केट डेटा के मुताबिक फरवरी 2026 के बाद से निफ्टी डिफेंस इंडेक्स में 13 प्रतिशत से ज्यादा की तेजी आई है, जबकि उसी दौरान निफ्टी-50 इंडेक्स में गिरावट दर्ज की गई।

एमटीएआर टेक्नोलॉजीज, अपोलो माइक्रो सिस्टम्स, पारस डिफेंस और सोलर इंडस्ट्रीज जैसी कंपनियों के शेयरों में भी तेजी देखी गई है।

बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार का “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” अभियान भी डिफेंस कंपनियों को मजबूती दे रहा है। अब भारतीय सेना और सुरक्षा एजेंसियां ज्यादा से ज्यादा स्वदेशी तकनीक खरीदने पर जोर दे रही हैं।

दूसरे डिफेंस शेयरों पर भी नजर

बजाज ब्रोकिंग के रिसर्च डिपार्टमेंट ने हाल ही में कुछ अन्य डिफेंस कंपनियों के शेयरों पर भी सकारात्मक राय दी है। इसमें भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड यानी बीईएल, गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स यानी जीआरएसई और अशोक लेलैंड शामिल हैं।

विश्लेषकों का कहना है कि इन कंपनियों के शेयरों में हाल की गिरावट के बाद फिर से खरीदारी देखने को मिल सकती है।

बीईएल को भारत की सबसे बड़ी डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी माना जाता है। वहीं जीआरएसई युद्धपोत निर्माण में सक्रिय है और अशोक लेलैंड सैन्य वाहनों की सप्लाई में अहम भूमिका निभाती है।

रक्षा क्षेत्र में लगातार बढ़ते सरकारी खर्च और आधुनिक तकनीकों की मांग की वजह से निवेशकों की नजरें अब इस सेक्टर पर बनी हुई हैं। (Zen Technologies Smart Border Suite)

टैंक रिकवरी व्हीकल पर लगेगा रिमोट कंट्रोल वेपन सिस्टम! AVNL के बड़े टेंडर में जेन टेक्नोलॉजीज ने लगाई सबसे कम बोली

Zen Technologies RCWS Tender
AI-Generated Image

Zen Technologies RCWS Tender: हैदराबाद की डिफेंस कंपनी जेन टेक्नोलॉजीज लिमिटेड ने आर्मर्ड व्हीकल्स निगम लिमिटेड (AVNL) के एक बड़े टेंडर में सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी यानी एल-1 बिडर बनी है। यह टेंडर आर्मर्ड रिकवरी व्हीकल्स के लिए रिमोट कंट्रोल वेपन सिस्टम (RCWS) का है, जिसकी कुल कीमत करीब 85.21 करोड़ रुपये बताई जा रही है।

इस प्रोजेक्ट के तहत भारतीय सेना के आर्मर्ड रिकवरी व्हीकल्स पर आधुनिक रिमोट कंट्रोल वेपन सिस्टम लगाए जाएंगे। इन सिस्टम्स की मदद से सैनिक वाहन के अंदर सुरक्षित रहते हुए मशीन गन चला सकेंगे। इससे युद्ध के दौरान सैनिकों की सुरक्षा और फायरपावर दोनों बढ़ेंगी।

यह टेंडर अप्रैल में एवीएनएल की अवाडी स्थित हेवी व्हीकल फैक्ट्री की ओर से जारी किया गया था। इस प्रोजेक्ट के तहत 81 रिमोट कंट्रोल वेपन स्टेशन सप्लाई किए जाने हैं। (Zen Technologies RCWS Tender)

Zen Technologies RCWS Tender: क्या होता है आर्मर्ड रिकवरी व्हीकल

आर्मर्ड रिकवरी व्हीकल (ARV) सेना के लिए बेहद अहम सपोर्ट प्लेटफॉर्म माना जाता है। इसका इस्तेमाल युद्ध के मैदान में खराब हो चुके टैंक या दूसरे भारी सैन्य वाहनों को खींचने, हटाने और रिपेयर करने के लिए किया जाता है।

भारतीय सेना के पास टी-72 और टी-90 जैसे मुख्य युद्धक टैंक मौजूद हैं। अगर किसी ऑपरेशन के दौरान इनमें तकनीकी खराबी आ जाए या दुश्मन की फायरिंग में नुकसान पहुंचे, तो एआरवी उन्हें सुरक्षित जगह तक पहुंचाने का काम करता है।

इन वाहनों में भारी शील्ड, क्रेन, विंच और रिपेयर उपकरण लगे होते हैं। लेकिन अब आधुनिक युद्ध में केवल रिकवरी क्षमता काफी नहीं मानी जाती। ड्रोन हमले, स्नाइपर और घात लगाकर किए जाने वाले हमलों के खतरे को देखते हुए इन वाहनों को भी हथियारों से लैस करना जरूरी माना जा रहा है।

इसी वजह से भारतीय सेना अब एआरवी पर रिमोट कंट्रोल वेपन सिस्टम लगाने जा रही है।

क्या है रिमोट कंट्रोल वेपन सिस्टम

रिमोट कंट्रोल वेपन सिस्टम यानी आरसीडब्ल्यूएस एक ऐसा हथियार प्लेटफॉर्म होता है, जिसे वाहन के अंदर बैठकर ऑपरेट किया जा सकता है।

पहले सैनिकों को मशीन गन चलाने के लिए वाहन के ऊपर निकलना पड़ता था। इससे वे दुश्मन की गोलीबारी और ड्रोन हमलों की जद में आ जाते थे। लेकिन नए सिस्टम में सैनिक पूरी तरह कवच के अंदर रहकर फायरिंग कर सकेंगे।

इस सिस्टम में कैमरा, थर्मल इमेजर, डे-नाइट विजन, ऑटो ट्रैकिंग और स्टेबलाइजेशन जैसी तकनीकें होती हैं। इससे चलते वाहन से भी सटीक निशाना लगाया जा सकता है।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक आधुनिक युद्ध में ऐसे सिस्टम तेजी से जरूरी होते जा रहे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों में भी रिमोट वेपन सिस्टम का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर देखा गया है।

Zen Technologies RCWS Tender

जेन टेक्नोलॉजीज को क्यों मिली बढ़त

जेन टेक्नोलॉजीज पिछले कुछ वर्षों में भारतीय रक्षा सेक्टर की तेजी से उभरती कंपनियों में शामिल हो चुकी है। कंपनी का मुख्यालय हैदराबाद में है और यह डिफेंस ट्रेनिंग सिमुलेटर, एंटी-ड्रोन सिस्टम और कॉम्बैट टेक्नोलॉजी डेवलप करती है।

जेन टेक्नोलॉजीज को पहले भी रक्षा मंत्रालय से कई बड़े ऑर्डर मिल चुके हैं। कंपनी को करीब 404 करोड़ रुपये का एंटी-ड्रोन सिस्टम और सिमुलेटर कॉन्ट्रैक्ट मिला था। इसके अलावा 289 करोड़ रुपये का एक बड़ा अपग्रेडेशन ऑर्डर भी कंपनी को मिला था।

एयरो इंडिया 2025 के दौरान जेन टेक्नोलॉजीज ने अपने नए रिमोट कंट्रोल वेपन सिस्टम यानी आरसीडब्ल्यूएस मॉडल भी पेश किए थे। इन सिस्टम्स को खासतौर पर आर्मर्ड फाइटिंग व्हीकल्स के लिए डिजाइन किया गया था।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक एवीएनएल के इस टेंडर में कंपनी की तकनीकी क्षमता और प्रतिस्पर्धी कीमत दोनों ने अहम भूमिका निभाई।

जेन टेक्नोलॉजीज पहले ही अपने कई रिमोट कंट्रोल वेपन सिस्टम मॉडल्स पेश कर चुकी है। इनमें “परशु” और “फणिश” जैसे प्लेटफॉर्म शामिल हैं। (Zen Technologies RCWS Tender)

कौन सा सिस्टम लगाया जा सकता है

हालांकि अभी तक आधिकारिक तौर पर यह साफ नहीं किया गया है कि एआरवी पर कंपनी का कौन सा आरसीडब्ल्यूएस लगाया जाएगा, लेकिन सूत्रों का कहना है कि “फणिश” सिस्टम सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है।

फणिश को खासतौर पर टैंक और भारी बख्तरबंद वाहनों के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें 12.7 मिमी हैवी मशीन गन लगाने की क्षमता है।

यह सिस्टम वाहन के अंदर बैठे ऑपरेटर द्वारा कंट्रोल किया जाता है। इसमें कूल्ड थर्मल कैमरा, डे कैमरा और ऑटो ट्रैकिंग जैसी सुविधाएं मौजूद हैं।

बताया जाता है कि यह सिस्टम 14 किलोमीटर तक टारगेट पहचानने की क्षमता रखता है। इसके अलावा यह दिन और रात दोनों समय काम कर सकता है। (Zen Technologies RCWS Tender)

Zen Technologies RCWS Tender

सेना को क्या मिलेगा फायदा

इस प्रोजेक्ट का सबसे बड़ा फायदा सैनिकों की सुरक्षा माना जा रहा है। युद्ध के दौरान रिकवरी वाहन अक्सर दुश्मन की नजर में रहते हैं क्योंकि वे युद्ध क्षेत्र के बीच जाकर खराब टैंकों को निकालते हैं।

अगर ऐसे समय पर दुश्मन की गोलीबारी या ड्रोन हमला हो जाए, तो वाहन के ऊपर मौजूद सैनिक सबसे पहले निशाने पर आते हैं। लेकिन आरसीडब्ल्यूएस लगने के बाद सैनिक कवच के अंदर रहकर ही जवाबी कार्रवाई कर सकेंगे।

इसके अलावा वाहन की फायरपावर भी बढ़ जाएगी। अगर किसी इलाके में घात लगाकर हमला हो या ड्रोन दिखाई दें, तो वाहन तुरंत जवाब दे सकेगा।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक युद्ध में सपोर्ट व्हीकल्स को भी “कॉम्बैट रेडी” बनाना जरूरी हो चुका है। (Zen Technologies RCWS Tender)

एआई और ऑटो ट्रैकिंग जैसी तकनीक

जेन टेक्नोलॉजीज के वेपन सिस्टम में कई आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। इनमें एआई आधारित टारगेट पहचान, ऑटो ट्रैकिंग और फाइबर ऑप्टिक जायरो स्टेबलाइजेशन जैसी सुविधाएं शामिल हैं।

इन तकनीकों की मदद से सिस्टम चलते वाहन पर भी लक्ष्य को लॉक कर सकता है। इससे निशाना ज्यादा सटीक होता है।

थर्मल कैमरे की वजह से रात या खराब मौसम में भी लक्ष्य दिखाई देता है। यही वजह है कि सेना अब पुराने मैनुअल सिस्टम की जगह स्मार्ट हथियार प्लेटफॉर्म पर ज्यादा ध्यान दे रही है।

बता दें कि आर्मर्ड व्हीकल्स निगम लिमिटेड भारत सरकार की डिफेंस पब्लिक सेक्टर की कंपनी है। इसका गठन 2021 में ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड के पुनर्गठन के बाद किया गया था।

एवीएनएल मुख्य रूप से भारतीय सेना के लिए आर्मर्ड फाइटिंग व्हीकल्स बनाता है। इसमें अर्जुन मेन बैटल टैंक, टी-90 टैंक, सारथ आईसीवी और आर्मर्ड रिकवरी व्हीकल जैसे कई महत्वपूर्ण सैन्य प्लेटफॉर्म शामिल हैं। भारतीय सेना के कई आर्मर्ड सिस्टम की मरम्मत और अपग्रेडेशन का काम भी इसी नेटवर्क के जरिए होता है।

सूत्रों के मुताबिक आधुनिक युद्ध में केवल टैंक ही नहीं, बल्कि उन्हें सपोर्ट करने वाले रिकवरी सिस्टम भी बेहद महत्वपूर्ण हो चुके हैं। इसी वजह से एवीएनएल अब आर्मर्ड रिकवरी व्हीकल्स को आधुनिक तकनीक से लैस करने पर जोर दे रहा है। (Zen Technologies RCWS Tender)

एआरवी पर आरसीडब्ल्यूएस लगाने का फैसला उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

आरसीडब्ल्यूएस यानी रिमोट कंट्रोल वेपन सिस्टम लगने के बाद एआरवी की सुरक्षा और फायरपावर दोनों बढ़ जाएंगी। खासकर ऐसे इलाकों में जहां दुश्मन ड्रोन, स्नाइपर या घात लगाकर हमला कर सकता है, वहां यह सिस्टम काफी मददगार माना जा रहा है। (Zen Technologies RCWS Tender)

टेंडर की प्रक्रिया अब किस चरण में

जेन टेक्नोलॉजीज को फिलहाल एल-1 बिडर घोषित किया गया है। इसका मतलब यह है कि कंपनी ने सबसे कम बोली लगाई है और तकनीकी रूप से भी शर्तों को पूरा किया है।

अब आगे कॉन्ट्रैक्ट फाइनलाइजेशन, प्रोटोटाइप टेस्टिंग और सेना के ट्रायल की प्रक्रिया होगी। इसके बाद सप्लाई शुरू की जाएगी।

टेंडर दस्तावेजों के मुताबिक इस प्रोजेक्ट में डिजाइन, डेवलपमेंट, प्रोटोटाइप, टेस्टिंग और सप्लाई सभी शामिल हैं।

सूत्रों का कहना है कि सेना अब ऐसे सिस्टम चाहती है जो पूरी तरह भारतीय जरूरतों के हिसाब से तैयार किए जाएं और भविष्य में आसानी से अपग्रेड भी किए जा सकें। (Zen Technologies RCWS Tender)

दलाई लामा के पुनर्जन्म मुद्दे पर भड़का चीन, धर्मशाला में तिब्बती समारोह में शामिल होंगे भाजपा के दो सांसद

Dalai Lama Reincarnation

Dalai Lama Reincarnation: तिब्बत और दलाई लामा को लेकर एक बार फिर चीन भारत को गीदड़ भभकी दी है। चीन ने भारत से कहा है कि वह “तिब्बती स्वतंत्रता” से जुड़ी गतिविधियों को मंच न दे और दलाई लामा के पुनर्जन्म की प्रक्रिया में किसी तरह का हस्तक्षेप न करे।

यह बयान ऐसे समय आया है जब धर्मशाला में सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन यानी सीटीए के राजनीतिक प्रमुख पेनपा त्सेरिंग के शपथ ग्रहण समारोह की तैयारी चल रही है। इस समारोह में 14वें दलाई लामा की मौजूदगी भी तय मानी जा रही है।

Dalai Lama Reincarnation: क्या कहा चीन ने

भारत में चीनी दूतावास की प्रवक्ता यू जिंग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बयान जारी किया। उन्होंने कहा कि दलाई लामा के पुनर्जन्म की प्रक्रिया सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं और ऐतिहासिक नियमों के अनुसार होती है और इसके लिए चीन की केंद्रीय सरकार की मंजूरी जरूरी होती है।

यू जिंग ने कहा कि 14वें दलाई लामा की पहचान भी इसी प्रक्रिया के जरिए हुई थी। उन्होंने यह भी कहा कि दलाई लामा के पुनर्जन्म का मामला चीन का “आंतरिक विषय” है और इसमें किसी बाहरी दखल की जरूरत नहीं है।

चीनी प्रवक्ता ने भारत से उम्मीद जताई कि वह तिब्बत से जुड़े मामलों पर अपने पुराने वादों का सम्मान करेगा और “तिब्बती स्वतंत्रता” से जुड़ी गतिविधियों को मंच नहीं देगा।

उन्होंने कहा कि ऐसा करने से भारत और चीन के बीच स्थिर और सकारात्मक संबंध बनाए रखने में मदद मिलेगी।

धर्मशाला में क्यों बढ़ी हलचल

यह बयान उस समय सामने आया जब धर्मशाला में सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन यानी निर्वासित तिब्बती प्रशासन के नए कार्यकाल का शपथ ग्रहण समारोह होने वाला है।

पेनपा त्सेरिंग दोबारा सिक्योंग यानी राजनीतिक प्रमुख के तौर पर पद संभालने जा रहे हैं। सिक्योंग को निर्वासित तिब्बती प्रशासन का राजनीतिक प्रमुख माना जाता है।

धर्मशाला पिछले कई दशकों से दलाई लामा और तिब्बती निर्वासित समुदाय का मुख्य केंद्र बना हुआ है। यहीं से तिब्बती प्रशासन अपने सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक कार्यक्रम चलाता है।

अमेरिकी दूतावास के दो अधिकारी होंगे शामिल

27 मई को धर्मशाला में होने वाले पेनपा त्सेरिंग के शपथ ग्रहण समारोह में भारत के दो सांसद शामिल होंगे।

इनमें भाजपा सांसद निशिकांत दुबे भी शामिल हैं, जो झारखंड के गोड्डा लोकसभा क्षेत्र से सांसद हैं। उनके साथ भाजपा के ही तापिर गाओ भी समारोह में मौजूद रहेंगे। तापिर गाओ अरुणाचल पूर्व लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं। जानकारी के मुताबिक इस कार्यक्रम में अमेरिकी दूतावास के दो अधिकारी भी शामिल होंगे।

चीन क्यों करता है विरोध

चीन सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन को मान्यता नहीं देता। बीजिंग का कहना है कि यह संस्था किसी संप्रभु देश द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है और इसका नेतृत्व तिब्बती लोगों का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार नहीं रखता।

चीन लंबे समय से दलाई लामा को “अलगाववादी” बताता रहा है। वहीं तिब्बती समुदाय का कहना है कि उनका संघर्ष सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान बचाने के लिए है।

क्या कहना है दलाई लामा का

14वें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो पहले ही साफ कर चुके हैं कि उनके पुनर्जन्म की पहचान का अधिकार केवल गदेन फोद्रांग ट्रस्ट के पास होगा। यह ट्रस्ट दलाई लामा के कार्यालय से जुड़ा है।

दलाई लामा ने पिछले वर्षों में कहा था कि चीन को इस प्रक्रिया में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने यह भी कहा था कि भविष्य का दलाई लामा किसी स्वतंत्र देश में जन्म ले सकता है।

उनके कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया था कि राजनीतिक उद्देश्य से चुने गए किसी उम्मीदवार को मान्यता नहीं दी जानी चाहिए।

कौन हैं पेनपा त्सेरिंग

पेनपा त्सेरिंग का जन्म कर्नाटक के बायलाकुप्पे तिब्बती शिविर में हुआ था। उन्होंने लंबे समय तक निर्वासित तिब्बती संसद में काम किया है।

वह पहले संसद के स्पीकर भी रह चुके हैं। 2021 में उन्हें सिक्योंग चुना गया था और अब वे फिर से इस पद पर आ रहे हैं।

तिब्बती समुदाय के बीच उन्हें एक अनुभवी और शांत स्वभाव के नेता के रूप में देखा जाता है।

पुनर्जन्म को लेकर क्या है विवाद

तिब्बती बौद्ध धर्म में दलाई लामा को आध्यात्मिक गुरु माना जाता है। दलाई लामा की मृत्यु के बाद उनके अगले अवतार की खोज धार्मिक प्रक्रिया के जरिए की जाती है।

इसमें बौद्ध भिक्षु, धार्मिक संकेत, ज्योतिषीय गणनाएं और कई पारंपरिक प्रक्रियाएं शामिल होती हैं।

लेकिन चीन का कहना है कि अंतिम मंजूरी बीजिंग सरकार की होगी। चीन “गोल्डन अर्न” नाम की पुरानी प्रक्रिया का हवाला देता है, जिसका इस्तेमाल किंग राजवंश के दौर में किया जाता था।

तिब्बती निर्वासित समुदाय का आरोप है कि चीन इस धार्मिक प्रक्रिया को राजनीतिक नियंत्रण में लेना चाहता है।

भारत के लिए क्यों संवेदनशील है मुद्दा

भारत 1959 से दलाई लामा और हजारों तिब्बती शरणार्थियों को शरण देता आ रहा है। दलाई लामा चीन से निकलकर भारत आए थे, जिसके बाद धर्मशाला में निर्वासित तिब्बती प्रशासन की स्थापना हुई।

आज भारत में एक लाख से ज्यादा तिब्बती रहते हैं। हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख में तिब्बती समुदाय की बड़ी आबादी मौजूद है।

भारत आधिकारिक तौर पर “वन चाइना पॉलिसी” का सम्मान करता है, लेकिन दलाई लामा को धार्मिक नेता के तौर पर रहने की अनुमति देता है। इसी वजह से तिब्बत का मुद्दा हमेशा भारत और चीन के संबंधों में संवेदनशील बना रहता है।

अमेरिका का भी आया नाम

हाल के दिनों में अमेरिका ने भी तिब्बती नेतृत्व को कुछ कार्यक्रमों में आमंत्रित किया था। रिपोर्ट्स के अनुसार पेनपा त्सेरिंग को नई दिल्ली में अमेरिका के 250वें स्वतंत्रता दिवस समारोह से जुड़े कार्यक्रम में बुलाया गया था।

चीन अक्सर ऐसे कार्यक्रमों पर आपत्ति जताता रहा है। बीजिंग का कहना है कि दूसरे देशों को तिब्बत से जुड़े राजनीतिक मामलों में शामिल नहीं होना चाहिए।

तिब्बत का भारत-चीन संबंधों पर असर

तिब्बत का मुद्दा दशकों से भारत और चीन के रिश्तों का संवेदनशील हिस्सा रहा है। 1962 के युद्ध के बाद यह और ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया।

सीमा विवाद, लद्दाख तनाव और अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन की आपत्तियों के बीच तिब्बत का सवाल अक्सर सामने आता है।

रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि दलाई लामा केवल धार्मिक नेता नहीं, बल्कि हिमालयी क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का भी बड़ा चेहरा हैं।

लद्दाख, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और हिमाचल प्रदेश जैसे इलाकों में तिब्बती बौद्ध धर्म का गहरा प्रभाव है।

चीन की बढ़ती चिंता

विशेषज्ञों का मानना है कि चीन को सबसे ज्यादा चिंता अगले दलाई लामा की पहचान को लेकर है। अगर निर्वासित तिब्बती समुदाय और चीन अलग-अलग उम्मीदवार घोषित करते हैं, तो स्थिति और जटिल हो सकती है।

इसी वजह से बीजिंग पहले से ही इस मुद्दे पर अपना दावा मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

चीन तिब्बत में धार्मिक संस्थाओं और मठों पर नियंत्रण भी लगातार बढ़ा रहा है। वहां भाषा, शिक्षा और धार्मिक गतिविधियों पर भी निगरानी बढ़ाई गई है।

भारत ने अभी क्या कहा

भारत सरकार की ओर से इस नए बयान पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन भारत पहले भी कह चुका है कि वह दलाई लामा को एक सम्मानित धार्मिक नेता मानता है और उन्हें धार्मिक गतिविधियों की स्वतंत्रता प्राप्त है।

धर्मशाला में होने वाले कार्यक्रम पर भी फिलहाल भारत सरकार की ओर से कोई टिप्पणी नहीं की गई है। रक्षा और विदेश नीति से जुड़े जानकारों का कहना है कि भारत इस मुद्दे पर संतुलित रुख बनाए रखने की कोशिश करता है, ताकि चीन के साथ तनाव और न बढ़े।

भारतीय सेना के लिए घातक ड्रोन बनाएगी जॉनेट, म्यूनिशन्स इंडिया के साथ वारहेड इंटीग्रेशन पर हुआ बड़ा समझौता

Johnnette JM-1 Loitering Munition
Johnnette Technologies CEO John Livingstone

Johnnette JM-1 Loitering Munition: भारत के डिफेंस सेक्टर में तेजी से उभर रहे स्टार्टअप जॉनेट टेक्नोलॉजीज ने म्यूनिशन्स इंडिया लिमिटेड (एमआईएल) के साथ एक अहम समझौता किया है। इस समझौते के तहत दोनों कंपनियां मिलकर भारतीय सेना के लिए लॉइटरिंग म्यूनिशन्स और अनमैन्ड कॉम्बैट एरियल व्हीकल (यूसीएवी) प्लेटफॉर्म्स पर काम करेंगी।

जॉनेट टेक्नोलॉजीज के सीईओ जॉन लिविंगस्टोन ने बताया कि एमआईएल के साथ हुआ यह एमओयू भविष्य में जॉनेट की जेएम सीरीज लॉइटरिंग म्यूनिशन्स और आने वाले यूसीएवी प्रोग्राम्स में वारहेड इंटीग्रेशन के लिए अहम भूमिका निभाएगा।

बता दें कि जॉनेट टेक्नोलॉजीज नोएडा स्थित एक भारतीय डिफेंस स्टार्टअप है, जो ड्रोन, लॉइटरिंग म्यूनिशन और अनमैन्ड सिस्टम्स पर काम करता है।

कंपनी का सबसे चर्चित प्रोडक्ट जेएम-1 लॉइटरिंग म्यूनिशन है। यह एक ऐसा ड्रोन बेस्ड वेपन है जो हवा में कुछ समय तक मंडरा कर सही टारगेट मिलने पर सीधे उस पर हमला कर सकता है।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक भारतीय सेना पहले ही जॉनेट से 150 से ज्यादा जेएम-1 लॉइटरिंग म्यूनिशन खरीद चुकी है। जॉनेट के सिस्टम्स को खास तौर पर हाई एल्टीट्यूड इलाकों को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा है।

लद्दाख और उत्तरी सीमाओं पर ऊंचाई वाले इलाकों में सामान्य ड्रोन को ऑपरेट करना मुश्किल होता है। कम ऑक्सीजन, तेज हवा और बेहद ठंडे मौसम में सिस्टम की क्षमता प्रभावित होती है। कंपनी का दावा है कि जेएम-1 ऐसे हालात में भी ऑपरेशन कर सकता है। (Johnnette JM-1 Loitering Munition)

लॉइटरिंग म्यूनिशन को आम भाषा में “सुसाइड ड्रोन” भी कहा जाता है। यह ड्रोन और मिसाइल का मिला-जुला रूप होता है। इसे किसी इलाके में भेजा जाता है, जहां यह कुछ समय तक हवा में रहकर टारगेट तलाशता है।

जैसे ही टारगेट मिलता है, यह सीधे उससे टकराकर विस्फोट कर देता है। आधुनिक युद्ध में ऐसे सिस्टम का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है।

रूस-यूक्रेन युद्ध, इजराइल और मध्य पूर्व के संघर्षों में लॉइटरिंग म्यूनिशन का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल देखा गया है।

जेएम-1 की क्या हैं खासियतें

जॉनेट का जेएम-1 सिस्टम खास तौर पर पहाड़ी और कठिन इलाकों के लिए डिजाइन किया गया है। कंपनी के मुताबिक इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित एल्गोरिदम इस्तेमाल किया गया है।

यह सिस्टम 18 हजार फीट से ज्यादा ऊंचाई वाले इलाकों में भी सटीक हमला कर सकता है। यही वजह है कि इसे लद्दाख और ऊंचाई वाले सीमावर्ती इलाकों के लिए उपयोगी माना जा रहा है।

जेएम-1 लगभग 25 मिनट तक हवा में रह सकता है और कई किलोमीटर दूर तक लक्ष्य पर हमला कर सकता है। इसे कम लागत वाला और तेजी से तैनात होने वाला हथियार बताया जाता है।

कंपनी का दावा है कि इस सिस्टम में 85 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। (Johnnette JM-1 Loitering Munition)

एमआईएल क्या करती है

म्यूनिशन्स इंडिया लिमिटेड (एमआईएल) भारत सरकार की रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी है। यह कंपनी देश के लिए गोला-बारूद, बम, रॉकेट और दूसरे विस्फोटक हथियार तैयार करती है।

ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड के पुनर्गठन के बाद एमआईएल का गठन किया गया था। कंपनी भारतीय सेना, नौसेना और वायु सेना को अलग-अलग तरह की युद्ध सामग्री उपलब्ध कराती है।

अब जॉनेट और एमआईएल मिलकर ड्रोन प्लेटफॉर्म्स में आधुनिक वारहेड इंटीग्रेशन पर काम करेंगे।

इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा “वारहेड इंटीग्रेशन” है। यानी जॉनेट के ड्रोन और यूसीएवी प्लेटफॉर्म्स में एमआईएल के बनाए विस्फोटक और वारहेड लगाए जाएंगे।

इससे ड्रोन की स्ट्राइक क्षमता और ज्यादा प्रभावी होगी। अलग-अलग मिशन के हिसाब से अलग तरह के वारहेड इस्तेमाल किए जा सकेंगे।

रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि आधुनिक युद्ध में केवल ड्रोन बनाना काफी नहीं होता। उसके साथ सही सेंसर, गाइडेंस और वारहेड का तालमेल भी जरूरी होता है।

एमआईएल के पास गोला-बारूद और विस्फोटक सिस्टम का बड़ा अनुभव है। वहीं जॉनेट नई ड्रोन टेक्नोलॉजी पर काम कर रही है। इसलिए दोनों कंपनियों का यह सहयोग महत्वपूर्ण माना जा रहा है। (Johnnette JM-1 Loitering Munition)

यूसीएवी प्रोग्राम पर भी काम

जॉनेट ने कहा है कि यह साझेदारी उसके आने वाले यूसीएवी प्रोग्राम्स के लिए भी अहम होगी। यूसीएवी यानी अनमैन्ड कॉम्बैट एरियल व्हीकल ऐसे लड़ाकू ड्रोन होते हैं जो बिना पायलट के ऑपरेशन कर सकते हैं। इन्हें निगरानी, हमला और हाई रिस्क मिशन के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

दुनिया के कई बड़े देश अब यूसीएवी बेस्ड वॉरफेयर सिस्टम पर तेजी से काम कर रहे हैं। भारत भी अब इस क्षेत्र में अपनी क्षमता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

वहीं, कंपनी UCAV प्रोग्राम के साथ कंपनी मीडियम अल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस (MALE) कैटेगरी में भी एंट्री करने की तैयारी कर रही है। (Johnnette JM-1 Loitering Munition)

भारतीय सेना में बढ़ रहा ड्रोन का इस्तेमाल

पिछले कुछ सालों में भारतीय सेना ने तेजी से ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन की खरीदे हैं। सीमा पर निगरानी, दुश्मन की पोस्ट पर हमला और रियल टाइम इंटेलिजेंस के लिए इन सिस्टम्स का इस्तेमाल बढ़ा है।

विशेषकर चीन और पाकिस्तान सीमा पर छोटे ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

आत्मनिर्भर भारत पर जोर

भारत सरकार लंबे समय से रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने पर जोर दे रही है। सरकार चाहती है कि भारतीय सेना ज्यादा से ज्यादा स्वदेशी हथियार इस्तेमाल करे।

इसी वजह से निजी स्टार्टअप्स को भी रक्षा क्षेत्र में तेजी से अवसर दिए जा रहे हैं। iDEX जैसे कार्यक्रमों के जरिए नई कंपनियों को सेना और रक्षा मंत्रालय के साथ काम करने का मौका मिल रहा है। (Johnnette JM-1 Loitering Munition)

डिफेंस पेंशनर्स के लिए बड़ी राहत, खत्म हुई CSD कार्ड की सबसे बड़ी परेशानी, अब ऐसे करा सकेंगे रिन्यू

CSD Card Renewa
AI-Generated Image

CSD Card Renewal: देश के लाखों पूर्व सैनिकों और डिफेंस पेंशनर्स के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है। रक्षा मंत्रालय ने नया सर्कुलर जारी कर साफ कर दिया है कि अब सीएसडी यानी कैंटीन सर्विसेज डिपार्टमेंट स्मार्ट कार्ड का रिन्यूअल देश के किसी भी हिस्से से कराया जा सकेगा। अब रिटायर सैनिकों और उनके परिवारों को अपने पुराने यूनिट या पैरेंट यूनिट के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।

रक्षा मंत्रालय की तरफ से जारी इस आदेश के बाद उन बुजुर्ग पेंशनर्स को सबसे ज्यादा राहत मिलने वाली है, जो रिटायरमेंट के बाद दूसरे शहरों या राज्यों में जाकर बस गए हैं। कई पूर्व सैनिक लंबे समय से इस समस्या को उठा रहे थे कि कार्ड रिन्यू कराने के लिए उन्हें सैकड़ों किलोमीटर दूर अपने पुराने यूनिट तक जाना पड़ता था। अब सरकार ने इस प्रक्रिया को आसान बनाने का फैसला किया है।

हाल ही में रक्षा समाचार के संवाददाता को भी नए बने कतर्व्य भवन में एक ऐसे ही बुजुर्ग महावीर सिंह मिले थे, जिन्होंने इस प्रक्रिया की शिकायत की थी। आगरा से दिल्ली आए 90 साल के बुजुर्ग महावीर सिंह 30 साल पहले दिल्ली से डिफेंस सर्विसेज से रिटायर हुए थे। उन्होंने बताया था कि उन्हें भी कहा गया है वे जहां से वे रिटायर हुए हैं, उन्हें वहीं से दस्तखत कराने होंगे। उनका कहना था कि वे अपने पोतों के साथ दिल्ली आए हैं और वो दफ्तर खोज रहे हैं, जहां से वे रिटायर हुए थे। क्योंकि वो दफ्तर अब कहीं और शिफ्ट हो चुका है और अब उनका कोई संपर्क नहीं है। वे बस दफ्तरों की दौड़ लगा रहे हैं। कहीं कोई सही से बताने वाला नहीं है, जो जैसा बता देता है, वे वहां पहुंच जाते हैं। वे निराश हैं कि कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है। जिसके बाद रक्षा समाचार ने संबंधित अधिकारियों से संपर्क कर इस आदेश के बारे में जानकारी दी थी। संबंधित अधिकारियों ने भरोसा दिलाया था कि जल्द ही इस समस्या का हल निकाला जाएगा।

CSD Card Renewal: 19 मई को जारी हुआ सर्कुलर

रक्षा मंत्रालय के डायरेक्टरेट ऑफ ऑर्डनेंस (कोऑर्डिनेशन एंड सर्विसेज) के वेलफेयर सेक्शन की ओर से 19 मई को यह सर्कुलर जारी किया गया। यह आदेश कोलकाता स्थित कार्यालय से जारी हुआ है।

सर्कुलर में कहा गया है कि मंत्रालय के पास लगातार ऐसी शिकायतें पहुंच रही थीं कि कई पेंशनर्स को सीएसडी कार्ड रिन्यू कराने में परेशानी हो रही है। कुछ अधिकारियों की तरफ से यह कहा जा रहा था कि पेंशनर पहले अपने पैरेंट यूनिट से अनुमति या एंडोर्समेंट लेकर आएं। इसी वजह से कई लोगों के कार्ड समय पर रिन्यू नहीं हो पा रहे थे।

रक्षा मंत्रालय ने साफ किया कि रिटायरमेंट के बाद कोई भी पूर्व सैनिक देश के किसी भी हिस्से में बस सकता है। ऐसे में उसका नया निवास स्थान सीएसडी कार्ड रिन्यू कराने में बाधा नहीं बनना चाहिए। मंत्रालय ने सभी संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे अपने अधिकार क्षेत्र में रहने वाले योग्य पेंशनर्स के कार्ड रिन्यूअल आवेदन स्वीकार करें और जरूरी दस्तावेज जांचने के बाद प्रक्रिया पूरी करें। (CSD Card Renewal)

क्या होता है CSD कार्ड

सीएसडी यानी कैंटीन स्टोर्स डिपार्टमेंट रक्षा मंत्रालय के तहत काम करने वाली एक विशेष सुविधा है। इसका फायदा सेना, नौसेना, वायु सेना, पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों को मिलता है।

इस कार्ड की मदद से लाभार्थी कैंटीन से कई सामान बाजार कीमत से कम दाम पर खरीद सकते हैं। इनमें राशन, किराना, इलेक्ट्रॉनिक्स, घरेलू उपकरण, बाइक, कार और दूसरी जरूरी चीजें शामिल होती हैं।

पूर्व सैनिकों के लिए यह सुविधा काफी अहम मानी जाती है, क्योंकि इससे उनका मासिक खर्च कम होता है। खासकर महंगाई के दौर में सीएसडी कैंटीन से मिलने वाली छूट बड़ी राहत देती है। (CSD Card Renewal)

रिटायरमेंट के बाद शुरू होती थी परेशानी

कई सैनिक रिटायरमेंट के बाद अपने गांव लौट जाते हैं। कुछ लोग बच्चों के पास दूसरे शहरों में रहने लगते हैं। ऐसे में उनका पुरानी यूनिट उनसे काफी दूर हो जाती है।

पहले जब सीएसडी कार्ड की वैधता खत्म होती थी, तब कई जगहों पर अधिकारियों की तरफ से कहा जाता था कि कार्ड रिन्यू कराने के लिए संबंधित व्यक्ति को अपने मूल यूनिट से सत्यापन कराना होगा।

इस वजह से बुजुर्ग पेंशनर्स को लंबी यात्रा करनी पड़ती थी। कई लोगों को ट्रेन टिकट, होटल और दूसरे खर्च उठाने पड़ते थे। कुछ ऐसे भी मामले सामने आए जहां 75-80 साल के बुजुर्ग पूर्व सैनिक केवल कार्ड रिन्यू कराने के लिए दूसरे राज्यों तक गए।

पूर्व सैनिक संगठनों ने कई बार इस मुद्दे को उठाया था। सोशल मीडिया पर भी कई शिकायतें सामने आई थीं। कई पेंशनर्स का कहना था कि कार्ड एक्सपायर होने के बाद उन्हें कैंटीन सुविधा नहीं मिल रही थी। (CSD Card Renewal)

CSD Card Renewal
AI-Generated Image

मंत्रालय ने क्या निर्देश दिए

सर्कुलर में साफ शब्दों में कहा गया है कि किसी भी पेंशनर को केवल इसलिए रिन्यूअल से वंचित नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि वह अपने पैरेंट यूनिट से दूर रह रहा है।

यह आदेश सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी के बाद जारी किया गया है। दस्तावेज पर स्टाफ ऑफिसर वेलफेयर माधुपर्णा रॉय के हस्ताक्षर हैं।

सर्कुलर में रक्षा मंत्रालय ने सभी सीएमडी, यूनिट हेड्स, डीपीएसयू अधिकारियों और संबंधित प्रशासनिक प्रमुखों को निर्देश दिया है कि वे पेंशनर्स की मदद करें।

अब अगर कोई पूर्व सैनिक अपने इलाके में मौजूद किसी यूनिट, डिपो या कार्यालय में आवेदन देता है, तो वहां के अधिकारी जरूरी दस्तावेज देखकर कार्ड रिन्यू कर सकेंगे।

इसके लिए पेंशन पेमेंट ऑर्डर यानी पीपीओ, ई-पीपीओ और दूसरे जरूरी दस्तावेजों की जांच की जाएगी। सही पाए जाने पर आवेदन को काउंटर साइन और एंडोर्स किया जाएगा। (CSD Card Renewal)

अब क्या करना होगा पेंशनर्स को

रक्षा मंत्रालय के निर्देश के बाद अब पूर्व सैनिक अपने नजदीकी सीएसडी कार्यालय या संबंधित रक्षा यूनिट से संपर्क कर सकते हैं।

नई व्यवस्था के तहत पेंशनर अपने नजदीकी कार्यालय में जाकर आवेदन दे सकेंगे। इसके लिए उन्हें पुराना सीएसडी कार्ड, पीपीओ, पहचान पत्र, पता प्रमाण और जरूरी दस्तावेज दिखाने होंगे।

दस्तावेजों की जांच के बाद अधिकारी आवेदन को मंजूरी देंगे और कार्ड रिन्यू करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। कई जगहों पर यह प्रक्रिया पहले से डिजिटल हो चुकी है। इसलिए अब पहले की तुलना में काम तेजी से होने की उम्मीद है।

अगर किसी का कार्ड एक्सपायर होने वाला है या पहले से समाप्त हो चुका है, तो वह जरूरी दस्तावेज लेकर आवेदन कर सकता है।

इस फैसले के बाद उम्मीद की जा रही है कि लंबी दूरी की यात्रा और अनावश्यक देरी जैसी परेशानियां काफी कम हो जाएंगी। (CSD Card Renewal)

बुजुर्ग पेंशनर्स को सबसे ज्यादा राहत

इस फैसले का सबसे बड़ा फायदा उन बुजुर्ग पूर्व सैनिकों को होगा जो स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। कई पूर्व सैनिक पहाड़ी इलाकों, गांवों और दूरदराज क्षेत्रों में रहते हैं। वहां से पुराने यूनिट तक पहुंचना काफी मुश्किल होता है। कई विधवा महिलाएं भी कार्ड रिन्यू कराने में परेशानी का सामना करती थीं।

अब उन्हें केवल अपने नजदीकी सीएसडी कार्यालय या संबंधित यूनिट तक जाना होगा। इससे समय और पैसे दोनों की बचत होगी।

भारत में बड़ी संख्या में पूर्व सैनिक और डिफेंस पेंशनर्स रहते हैं। इनमें सेना, नौसेना, वायु सेना और रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों से जुड़े लोग शामिल हैं।

सीएसडी सुविधा का इस्तेमाल लाखों परिवार करते हैं। ऐसे में यह फैसला काफी बड़े स्तर पर असर डालने वाला माना जा रहा है। क्योंकि लंबे समय से इस बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही थी। कई बार केवल प्रक्रिया की वजह से पेंशनर्स को परेशान होना पड़ता था। (CSD Card Renewal)

पूर्व सैनिक संगठनों ने जताई खुशी

सर्कुलर सामने आने के बाद पूर्व सैनिक संगठनों ने सरकार के फैसले का स्वागत किया है। एक पूर्व सैनिक संगठन के प्रतिनिधि ने कहा कि यह फैसला लंबे समय से उठाई जा रही मांग को पूरा करता है। उन्होंने कहा कि कई बुजुर्ग सैनिक केवल प्रक्रिया की वजह से परेशान हो रहे थे। अब उन्हें राहत मिलेगी।

कुछ संगठनों ने यह भी कहा कि इसी तरह ईसीएचएस और दूसरी सैन्य सुविधाओं में भी प्रक्रियाएं आसान बनाई जानी चाहिए। (CSD Card Renewal)

भारतीय सेना की 105 मिमी गन अब हुई ‘स्मार्ट’, अब नहीं मिलेगा दुश्मन को संभलने का मौका

105mm Light Field Gun Upgrade
Photo: X

105mm Light Field Gun Upgrade: भारतीय सेना ने अपनी पुरानी लेकिन बेहद भरोसेमंद 105 मिमी लाइट फील्ड गन को नई डिजिटल तकनीक से लैस कर दिया है। सेना ने हाल ही में मध्य प्रदेश के इटारसी स्थित सेंट्रल प्रूफ एस्टेब्लिशमेंट (CPE) में इस गन के ऑटो लेइंग टेक्नोलॉजी अपग्रेड का सफल फायरिंग ट्रायल और वैलिडेशन पूरा किया। यह अपग्रेडन 506 आर्मी बेस वर्कशॉप (506 ABW) ने किया है।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक मई 2026 के मध्य में इस सिस्टम का ट्रायल किया गया था। इस अपग्रेड के बाद अब गन को निशाने पर सेट करने के लिए जवानों को हाथ से डायल घुमाने और लंबी कैलकुलेशंस करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। नया इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम कुछ ही सेकंड में गन को सही दिशा और एंगल पर सेट कर देगा। इससे गन की फायरिंग स्पीड, एक्यूरेसी और युद्ध के दौरान सर्वाइवल क्षमता काफी बढ़ जाएगी।

105mm Light Field Gun Upgrade: भारतीय सेना की भरोसेमंद फील्ड गन

105 मिमी लाइट फील्ड गन लंबे समय से भारतीय सेना की आर्टिलरी ताकत का अहम हिस्सा रही है। यह गन खास तौर पर पहाड़ी इलाकों, रेगिस्तान और कठिन युद्ध क्षेत्रों में इस्तेमाल की जाती है। वजन में हल्की होने के कारण इसे हेलीकॉप्टर, ट्रक या खच्चरों की मदद से भी फॉरवर्ड पोस्ट्स तक पहुंचाया जा सकता है।

भारतीय सेना ने इस गन का इस्तेमाल कई दशकों से किया है। लाइन ऑफ कंट्रोल और ऊंचाई वाले इलाकों में यह गन काफी प्रभावी मानी जाती रही है। हालांकि समय के साथ आधुनिक युद्ध का तरीका बदल गया। अब युद्ध में गोले दागने के अलावा तेजी से निशाना साधना और तुरंत पोजिशन बदलना भी जरूरी हो गया है। इसी जरूरत को देखते हुए सेना ने पुरानी गन को नई तकनीक से अपग्रेड करने का फैसला किया।

पहले कैसे काम करती थी गन

पुराने सिस्टम में गन को टारगेट पर सेट करने का पूरा काम मैनुअली होता था। गन क्रू को हाथ से डायल घुमाकर दिशा और ऊंचाई सेट करनी पड़ती थी। इसके अलावा हवा की रफ्तार, तापमान, गोले के प्रकार और बैरल की स्थिति जैसी चीजों की गणना भी मैनुअली की जाती थी।

सूत्रों का कहना है कि जंग के दौरान यह प्रक्रिया समय लेती थी। कई बार दुश्मन की जवाबी फायरिंग शुरू होने से पहले गन पोजिशन बदलना मुश्किल हो जाता था। मॉडर्न काउंटर-बैटरी रडार कुछ ही सेकंड में पता लगा लेते हैं कि किस जगह से गोले दागे गए हैं। इसके बाद दुश्मन की तरफ से तुरंत जवाबी हमला हो सकता है। यही वजह थी कि भारतीय सेना अपनी पुरानी आर्टिलरी को ज्यादा तेज और डिजिटल बनाना चाहती थी।

क्या है ऑटो लेइंग टेक्नोलॉजी

ऑटो लेइंग टेक्नोलॉजी का मतलब है कि गन खुद इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम की मदद से निशाने पर सेट हो जाए। इसमें डिजिटल फायर कंट्रोल सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक सेंसर और मोटराइज्ड कंट्रोल लगाए गए हैं।

अब गन में मौजूद कंप्यूटर खुद यह तय करेगा कि टारगेट पर हमला करने के लिए गन को किस दिशा और एगंल पर सेट करना है। इसके लिए सिस्टम हवा की दिशा, तापमान, बैरल वियर और इस्तेमाल किए जा रहे गोले का डेटा खुद प्रोसेस करेगा।

इसके बाद इलेक्ट्रॉनिक मोटर गन को अपने आप सही दिशा में घुमा देगी। इससे समय भी बचेगा और गलती की संभावना भी काफी कम हो जाएगी। (105mm Light Field Gun Upgrade)

कुछ सेकंड में रेडी होगी गन 

रक्षा सूत्रों के मुताबिक पहले जहां गन को तैयार करने में दो से तीन मिनट तक लगते थे, वहीं नए सिस्टम के बाद यह काम कुछ ही सेकंड में हो जाएगा।

युद्ध के मैदान में यह बड़ा बदलाव माना जा रहा है। क्योंकि अब गन तेजी से फायर कर तुरंत दूसरी जगह शिफ्ट हो सकेगी। “शूट एंड स्कूट” क्षमता को मॉडर्न युद्ध में यह बहुत जरूरी माना जाता है। खासकर तब, जब दुश्मन के पास काउंटर-बैटरी रडार और लंबी दूरी की आर्टिलरी मौजूद हो।

इटारसी स्थित सेंट्रल प्रूफ एस्टेब्लिशमेंट में इस सिस्टम की टेस्टिंग ऑपरेशनल परिस्थितियों में की गई। अलग-अलग मौसम और फायरिंग स्थितियों में गन की परफॉर्मेंस जांची गई।

सूत्रों के मुताबिक ट्रायल के दौरान गन ने कम समय में ज्यादा सटीक तरीके से टारगेट को हिट किया। गन क्रू का काम भी पहले की तुलना में काफी आसान हो गया। इस अपग्रेड के बाद फर्स्ट राउंड हिट प्रोबेबिलिटी यानी पहले गोले में टारगेट को हिट करने की संभावना भी बढ़ गई है। (105mm Light Field Gun Upgrade)

506 आर्मी बेस वर्कशॉप की बड़ी भूमिका

इस अपग्रेड को 506 आर्मी बेस वर्कशॉप ने तैयार किया है। यह वर्कशॉप सेना के इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स (EME) नेटवर्क का हिस्सा है। सेना की ये वर्कशॉप्स पुराने हथियारों और सैन्य उपकरणों को अपग्रेड करने का काम करती हैं। पिछले कुछ वर्षों में इन वर्कशॉप्स ने कई पुराने सिस्टम्स को डिजिटल तकनीक से जोड़ने का काम किया है।

रक्षा जानकारों का कहना है कि यह प्रोजेक्ट “आत्मनिर्भर भारत” अभियान का भी हिस्सा है। क्योंकि इसमें इस्तेमाल की गई तकनीक और इंटीग्रेशन का बड़ा हिस्सा देश में ही विकसित किया गया है। (105mm Light Field Gun Upgrade)

पुरानी गन को मिली नई लाइफ

भारतीय सेना के पास बड़ी संख्या में 105 मिमी फील्ड गन मौजूद हैं। नई गन खरीदने में काफी ज्यादा खर्च आता। इसलिए सेना ने पुरानी गन को ही आधुनिक तकनीक से अपग्रेड करने का रास्ता चुना।

सूत्रों के मुताबिक यह तरीका ज्यादा किफायती और व्यावहारिक माना जाता है। इससे सेना को नई क्षमता भी मिल जाती है और पुराने सिस्टम का उपयोग भी जारी रहता है। इस अपग्रेड के बाद गन की सर्विस लाइफ भी बढ़ जाएगी।

यह गन खास तौर पर पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में इस्तेमाल होती है। लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) और लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) जैसे क्षेत्रों में इसकी तैनाती महत्वपूर्ण मानी जाती है। (105mm Light Field Gun Upgrade)

काउंटर-बैटरी फायर बड़ा खतरा

आधुनिक युद्ध में सबसे बड़ा खतरा काउंटर-बैटरी फायर होता है। जब कोई गन फायर करती है, तो दुश्मन का रडार तुरंत उसकी लोकेशन ट्रैक कर लेता है। इसके बाद उसी स्थान पर जवाबी हमला किया जाता है।

नई ऑटो लेइंग तकनीक से गन तेजी से फायर करके तुरंत अपनी पोजिशन बदल सकेगी। इससे दुश्मन के जवाबी हमले से बचने की संभावना बढ़ जाएगी।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक यही तकनीक दुनिया के आधुनिक आर्टिलरी सिस्टम्स में इस्तेमाल हो रही है।

बता दें कि भारतीय सेना पिछले कुछ वर्षों से अपने आर्टिलरी सिस्टम को तेजी से आधुनिक बना रही है। सेना ने धनुष, के-9 वज्र, एम-777 और एटीएजीएस जैसी नई तोपें शामिल की हैं।

इसके अलावा पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट सिस्टम और प्रिसिजन गाइडेड म्यूनिशन पर भी जोर दिया जा रहा है। 105 मिमी लाइट फील्ड गन का यह अपग्रेड उसी बड़े आधुनिकीकरण कार्यक्रम का हिस्सा माना जा रहा है। (105mm Light Field Gun Upgrade)

चीन-पाकिस्तान की GPS जामिंग से निपटेगा Sukhoi-30! वायुसेना इस फाइटर जेट में लगाने जा रही खास एंटी-जैम एंटीना

Su-30MKI Antenna Upgrade
AI-Generated Image

Su-30MKI Antenna Upgrade: भारतीय वायु सेना अपने सबसे भरोसेमंद फाइटर जेट सुखोई-30एमकेआई को और आधुनिक बनाने की तैयारी में जुट गई है। इसके तहत वायु सेना ने पुराने नेविगेशन सिस्टम को बदलकर नई मल्टी-कॉन्स्टेलेशन जीएनएसएस एंटीना लगाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह अपग्रेड इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और जीपीएस जैमिंग जैसे खतरों से निपटने के लिए किया जा रहा है।

भारतीय वायु सेना ने इसके लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) जारी की है। इस प्रोजेक्ट का मकसद सु-30 विमानों में इस्तेमाल हो रही पुरानी नेविगेशन एंटीना को नई मल्टी-कॉन्स्टेलेशन एंटीना से बदलना है। इससे विमान की नेविगेशन क्षमता, सटीकता, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर में सर्वाइवल और लंबी दूरी तक ऑपरेशन करने की ताकत बढ़ेगी। (Su-30MKI Upgrade)

Su-30MKI Antenna Upgrade: भारतीय वायु सेना की रीढ़ है सुखोई-30

सुखोई-30 भारतीय वायु सेना का सबसे अहम मल्टीरोल फाइटर एयरक्राफ्ट माना जाता है। भारत के पास ऐसे करीब 260 से ज्यादा विमान हैं। इन्हें रूस के सहयोग से डेवलप किया गया था और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) इन्हें भारत में लाइसेंस के तहत इनका निर्माण करता है।

यह विमान लंबी दूरी तक उड़ान भरने, एयर सुपीरियरिटी मिशन, ग्राउंड अटैक और प्रिसिजन स्ट्राइक के लिए इस्तेमाल होता है। यह प्लेटफॉर्म ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक मिसाइल से भी लैस है।

हालांकि आधुनिक युद्ध में केवल ताकतवर इंजन और हथियार काफी नहीं माने जाते। अब नेविगेशन, डेटा लिंक और इलेक्ट्रॉनिक सिक्योरिटी भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो चुकी है। इसी वजह से भारतीय वायु सेना अब सुखोई-30 के नेविगेशन सिस्टम को नए लेवल पर ले जाना चाहती है। (Su-30MKI Antenna Upgrade)

क्यों जरूरी हुआ यह अपग्रेड

अभी सुखोई-30 में जीपीएस और ग्लोनास बेस्ड नेविगेशन सिस्टम का इस्तेमाल होता है। लेकिन आधुनिक युद्ध में दुश्मन देश जीपीएस जैमिंग, स्पूफिंग और इलेक्ट्रॉनिक अटैक जैसी तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

अगर किसी लड़ाकू विमान का सैटेलाइट सिग्नल ब्लॉक हो जाए तो इससे उसकी एक्यूरेसी पर असर पड़ता है। मिसाइल टारगेटिंग, लंबी दूरी की उड़ान और हथियारों की गाइडेंस पर असर पड़ सकता है।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक मौजूदा सिस्टम सीमित फ्रीक्वेंसी बैंड पर काम करता है। कुछ इलाकों में सैटेलाइट कवरेज कम होने और इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग के कारण नेविगेशन में दिक्कत आ सकती है।

इसी वजह से भारतीय वायु सेना अब ऐसा सिस्टम चाहती है, जो एक साथ कई सैटेलाइट नेटवर्क से जुड़ सके।

बता दें कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने भारतीय विमानों, मिसाइलों और ड्रोन की नेविगेशन क्षमता को प्रभावित करने के लिए जीपीएस जैमिंग और स्पूफिंग तकनीक का इस्तेमाल करने की कोशिश की। इसका मकसद भारतीय सिस्टम्स को गलत लोकेशन दिखाना या उनके सैटेलाइट सिग्नल को बाधित करना था।

इससे पहले अमृतसर और जम्मू जैसे सीमावर्ती इलाकों में पहले भी जीपीएस स्पूफिंग के कई मामले सामने आ चुके थे। ऑपरेशन के दौरान ऐसी गतिविधियों में और बढ़ोतरी देखी गई थी।

सूत्रों के अनुसार भारतीय वायु सेना के कुछ प्लेटफॉर्म, जैसे सी-130जे ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और सु-30एमकेआई व राफेल जैसे लड़ाकू विमानों को भी जीपीएस स्पूफिंग का सामना करना पड़ा है। हालांकि भारतीय वायु सेना ने बैकअप सिस्टम के तौर पर भारतीय नाविक (NavIC) और इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम (INS) का इस्तेमाल किया, जिसकी वजह से मिशन प्रभावित नहीं हुए।

रक्षा जानकारों का कहना है कि इसी अनुभव के बाद भारतीय वायु सेना अब सुखोई-30एमकेआई जैसे प्लेटफॉर्म्स में मल्टी-कॉन्स्टेलेशन एंटीना और एंटी-जैम नेविगेशन सिस्टम जोड़ने पर ज्यादा जोर दे रही है, ताकि भविष्य में जीपीएस डिनाइड माहौल में भी विमान सुरक्षित और सटीक तरीके से ऑपरेशन कर सकें।

क्या होगी नई एंटीना की खासियत

नई मल्टी-कॉन्स्टेलेशन जीएनएसएस एंटीना एक साथ कई सैटेलाइट सिस्टम को सपोर्ट करेगा। इसमें अमेरिका का जीपीएस, रूस का ग्लोनास, यूरोप का गैलीलियो, चीन का बैदोउ (BeiDou) और भारत का नाविक सिस्टम शामिल होगा। इससे 100 से ज्यादा सैटेलाइट्स उपलब्ध होंगे, जो सिग्नल की निरंतरता और सटीकता बढ़ाएंगे।

इसके अलावा इसमें भारत का अपना सैटेलाइट-बेस्ड आगमेंटेशन सिस्टम (SBAS) GAGAN (GPS Aided GEO Augmented Navigation) भी शामिल होगा। GAGAN मुख्य रूप से दो फ्रीक्वेंसी पर काम करता है। पहली L1 फ्रीक्वेंसी है, जो 1575.42 MHz पर काम करती है। यह पारंपरिक GPS सिग्नल के साथ कम्पैटेबल है और अभी सबसे ज्यादा इस्तेमाल होती है। दूसरी L5 फ्रीक्वेंसी है, जो 1176.45 MHz पर काम करती है। यह ज्यादा एडवांस मानी जाती है और ड्यूल-फ्रीक्वेंसी सपोर्ट देती है।

सूत्रों के मुताबिक सुखोई-30 जैसे तेज रफ्तार और हाई-मैन्युवर फाइटर जेट्स के लिए L1 और L5 दोनों फ्रीक्वेंसी को सपोर्ट करने वाला ड्यूल-फ्रीक्वेंसी एंटीना बहुत जरूरी माना जाता है।

ऐसे लड़ाकू विमान बहुत तेज गति और कठिन मूवमेंट में उड़ान भरते हैं, जहां सामान्य जीपीएस सिग्नल में ज्यादा एरर आ सकता है। ड्यूल-फ्रीक्वेंसी सिस्टम इन एरर को कम करता है और विमान को ज्यादा सटीक पोजिशनिंग देता है।

इसके बाद जेट केवल एक या दो सैटेलाइट नेटवर्क पर निर्भर नहीं रहेगा। अगर किसी सिस्टम का सिग्नल बाधित हो जाए, तो दूसरा नेटवर्क काम करता रहेगा। इससे विमान को ज्यादा सैटेलाइट उपलब्ध होंगे और उसकी पोजिशनिंग ज्यादा सटीक होगी। (Su-30MKI Antenna Upgrade)

जैमिंग के बीच भी करेगा काम

नए एंटीना को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि वह इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग के बीच भी काम कर सके। आधुनिक युद्ध में दुश्मन देश इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम के जरिए सैटेलाइट सिग्नल बाधित करने की कोशिश करते हैं।

आरएफपी के अनुसार नए सिस्टम में एंटी-जैम और एंटी-स्पूफिंग तकनीक शामिल होगी। इसका मतलब यह है कि अगर दुश्मन नकली सिग्नल भेजने या असली सिग्नल रोकने की कोशिश करे, तब भी विमान सही दिशा में उड़ान जारी रख सकेगा।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि चीन और पाकिस्तान जैसे देशों के पास पहले से एडवांस इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम मौजूद हैं। इसलिए भारतीय वायु सेना अब अपने लड़ाकू विमानों को भी उसी स्तर की सुरक्षा देना चाहती है।

ज्यादा सटीक होंगे हमले

नया एंटीना लगने के बाद सुखोई-30 की नेविगेशन सटीकता काफी बेहतर हो जाएगी। आरएफपी के मुताबिक सिस्टम 1 से 2 मीटर तक की सटीकता दे सकेगा। इसका सीधा असर मिसाइल और प्रिसिजन गाइडेड हथियारों पर पड़ेगा। ब्रह्मोस, स्पाइस और दूसरी स्मार्ट म्यूनिशन को ज्यादा सटीक टारगेट डेटा मिल सकेगा।

सूत्रों का कहना है कि भविष्य के युद्धों में प्रिसिजन स्ट्राइक सबसे अहम भूमिका निभाएंगी। ऐसे में नेविगेशन की सटीकता बहुत जरूरी मानी जाती है। (Su-30MKI Antenna Upgrade)

लंबे मिशन में भी मिलेगा फायदा

नया मल्टी-कॉन्स्टेलेशन एंटीना लंबी दूरी के मिशन में भी मदद करेगा। बेहतर नेविगेशन और रूट प्लानिंग से ईंधन की बचत होगी। अगर विमान को ज्यादा भरोसेमंद पोजिशनिंग डेटा मिलता रहेगा, तो वह कठिन इलाकों और खराब मौसम में भी ज्यादा सुरक्षित तरीके से ऑपरेशन कर सकेगा।

वहीं, यह अपग्रेड समुद्री इलाकों, पहाड़ी क्षेत्रों और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर वाले वातावरण में काफी उपयोगी साबित होगा।

पुराने सिस्टम की जगह नई टेक्नोलॉजी

सुखोई-30 में अभी इस्तेमाल हो रहे नेविगेशन सिस्टम में इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम, लेजर जायरो और सैटेलाइट रिसीवर शामिल हैं। लेकिन यह तकनीक अब पुरानी मानी जा रही है।

नई प्रणाली में मल्टी-बैंड और मल्टी-फ्रीक्वेंसी सपोर्ट दिया जाएगा। इससे आयनोस्फेरिक एरर और मल्टीपाथ जैसी समस्याएं कम होंगी।

नई एंटीना में राइट हैंड सर्कुलर पोलराइजेशन और हाई गेन तकनीक भी शामिल होगी। इसे बेहद छोटे और हल्के डिजाइन में तैयार किया जाएगा ताकि विमान के वजन और एरोडायनामिक्स पर असर न पड़े।

‘सुपर सुखोई’ प्रोग्राम का हिस्सा

यह अपग्रेड भारतीय वायु सेना के बड़े “सुपर सुखोई” प्रोग्राम का हिस्सा माना जा रहा है। इस कार्यक्रम के तहत सुखोई-30 विमानों में नए रडार, आधुनिक एवियोनिक्स, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और नए हथियार जोड़ने की योजना है।

नया एंटीना सिस्टम उसी आधुनिकीकरण कार्यक्रम का हिस्सा है, इससे विमान की सर्विस लाइफ भी बढ़ेगी।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक भारतीय वायु सेना चाहती है कि सुखोई-30 आने वाले कई दशकों तक आधुनिक युद्ध के लिए तैयार रहे। (Su-30MKI Antenna Upgrade)

भारतीय कंपनियों को मिलेगा मौका

आरएफपी में भारतीय कंपनियों, रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों और विदेशी साझेदारों के साथ काम करने वाले कंसोर्टियम को भाग लेने की अनुमति दी गई है।

एचएएल, बीईएल और कई निजी रक्षा कंपनियां इस प्रोजेक्ट में हिस्सा ले सकती हैं। सरकार ने इसमें “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” पर खास जोर दिया है।

आरएफपी के अनुसार जिन कंपनियों का लोकल कंटेंट ज्यादा होगा, उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी। वहीं, यह प्रोजेक्ट अलग-अलग चरणों में पूरा किया जाएगा। पहले चरण में डिजाइन और प्रोटोटाइप तैयार होंगे। इसके बाद कुछ विमानों पर ग्राउंड और फ्लाइट ट्रायल किए जाएंगे।

सर्टिफिकेशन पूरा होने के बाद बड़े पैमाने पर इंस्टॉलेशन शुरू होगा। शुरुआती चरण में 50 से ज्यादा विमानों पर यह सिस्टम लगाया जा सकता है। इसके बाद पूरे बेड़े में अपग्रेड किया जाएगा। (Su-30MKI Antenna Upgrade)

पायलट और तकनीकी स्टाफ को मिलेगी ट्रेनिंग

नए सिस्टम के साथ भारतीय वायु सेना और एचएएल के तकनीकी स्टाफ को भी ट्रेनिंग दी जाएगी। इसके अलावा स्पेयर पार्ट्स, ग्राउंड सपोर्ट इक्विपमेंट और वारंटी सपोर्ट भी दिया जाएगा।

आरएफपी में कहा गया है कि सिस्टम को पुराने विमान सिस्टम के साथ बिना बड़ी स्ट्रक्चरल बदलाव के जोड़ना होगा।

इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में बढ़ेगी ताकत

आधुनिक युद्ध तेजी से नेटवर्क-सेंट्रिक और इलेक्ट्रॉनिक आधारित हो चुका है। केवल मिसाइल और लड़ाकू विमान ही काफी नहीं हैं। अब डेटा, नेविगेशन और इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा युद्ध जीतने में अहम भूमिका निभाते हैं।

अगर कोई विमान जीपीएस डिनाइड यानी सिग्नल बाधित माहौल में भी सटीक हमला कर सके, तो उसकी ऑपरेशनल क्षमता कई गुना बढ़ जाती है। भारतीय वायु सेना का यह अपग्रेड उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

चीन और पाकिस्तान दोनों तेजी से इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और सैटेलाइट बेस्ड सैन्य क्षमताएं बढ़ा रहे हैं। चीन पहले ही एडवांस जैमिंग सिस्टम और एंटी-सैटेलाइट तकनीक विकसित कर चुका है। ऐसे में भारतीय वायु सेना अपने सबसे अहम लड़ाकू विमान को आधुनिक नेविगेशन और एंटी-जैम तकनीक से लैस करना चाहती है। (Su-30MKI Antenna Upgrade)

भारतीय नौसेना बना रही डिजिटल कमांड प्लेटफॉर्म, AI से ट्रैक होंगे मिसाइल और टॉरपीडो

Indian Navy INAMS 2.0
AI-Generated Image

Indian Navy INAMS 2.0: भारतीय नौसेना अपने हथियारों, गोला-बारूद और विस्फोटक सामग्री के मैनेजमेंट को पूरी तरह डिजिटल और आधुनिक बनाने की तैयारी कर रही है। नौसेना ने इंडियन नेवल आर्मामेंट मैनेजमेंट सिस्टम वर्जन 2.0 (INAMS Ver 2.0) प्रोजेक्ट शुरू किया है। यह एक एडवांस डिजिटल प्लेटफॉर्म होगा, जिसकी मदद से नौसेना अपने हथियारों, मिसाइलों, माइंस, टॉरपीडो, गोला-बारूद, स्टोरेज, रिपेयर और सप्लाई सिस्टम को इंटीग्रेटेड तरीके से मैनेज कर सकेगी।

यह सिस्टम भारतीय नौसेना के डायरेक्टरेट जनरल ऑफ नेवल आर्मामेंट (DGoNA) के तहत काम करेगा। इसका उद्देश्य नेवल आर्मामेंट डिपो और नौसेना मुख्यालय में चल रहे कई अलग-अलग प्रक्रियाओं को एक डिजिटल नेटवर्क में जोड़ना है।

भारतीय नौसेना के अधिकारियों के मुताबिक INAMS Ver 2.0 पुराने INAMS-I सिस्टम का अपग्रेडेड वर्जन है। इसे ज्यादा सुरक्षित, तेज और डेटा आधारित निर्णय लेने वाला प्लेटफॉर्म बनाया जा रहा है।

Indian Navy INAMS 2.0: नौसेना के हथियार प्रबंधन का डिजिटल नेटवर्क

भारतीय नौसेना का नेवल आर्मामेंट ऑर्गनाइजेशन नौसेना और भारतीय तटरक्षक बल के लिए हथियार, गोला-बारूद और विस्फोटक सामग्री की खरीद, स्टोरेज, रिपेयर और सप्लाई का काम संभालता है।

डायरेक्टरेट जनरल ऑफ नेवल आर्मामेंट अलग-अलग रक्षा संस्थानों, डीआरडीओ लैब्स, रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों और नौसेना की दूसरी शाखाओं के साथ मिलकर काम करता है। इसमें मिसाइल, टॉरपीडो, माइन, छोटे हथियार और दूसरे विस्फोटक उपकरण शामिल होते हैं।

अब तक इन प्रक्रियाओं का बड़ा हिस्सा अलग-अलग सिस्टम और मैनुअल एंट्री पर निर्भर था। नए INAMS-II सिस्टम के जरिए इन्हें पूरी तरह वेब आधारित और इंटीग्रेटेड प्लेटफॉर्म में बदला जाएगा।

कई बड़े काम संभालेगा नया सिस्टम

रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन के मुताबिक INAMS 2.0 केवल स्टोर मैनेजमेंट सिस्टम नहीं होगा। बल्कि यह नौसेना के वेपन मैनेजमेंट से जुड़े लगभग हर हिस्से को कवर करेगा।

इसमें हथियारों की सप्लाई, गोला-बारूद की तैयारी, रिपेयर और मेंटेनेंस, खरीद प्रक्रिया, ट्रांसपोर्ट, फायर सेफ्टी, ट्रेनिंग, ऑडिट और प्रोडक्शन तक के मॉड्यूल शामिल होंगे।

नौसेना के अलग-अलग आर्मामेंट डिपो में मौजूद डिवीजनों को भी इसी सिस्टम से जोड़ा जाएगा। इनमें गाइडेड वेपंस डिवीजन, एम्युनिशन वर्कशॉप, मटेरियल मैनेजमेंट, ट्रांसपोर्ट, एचआरडी एंड ट्रेनिंग, सिक्योरिटी और मेडिकल जैसे विभाग शामिल हैं।

मिसाइल और टॉरपीडो तक का रिकॉर्ड रखेगा

नए सिस्टम के जरिए नौसेना अपने मिसाइल, टॉरपीडो, डिकॉय, माइन और दूसरे हथियारों का पूरा डिजिटल रिकॉर्ड रख सकेगी।

किस हथियार की कितनी संख्या मौजूद है, कौन सा सिस्टम रिपेयर में है, कौन सा उपकरण जहाज पर भेजा गया है और किस गोला-बारूद की लाइफ एक्सटेंशन करनी है, यह सारी जानकारी रियल टाइम में उपलब्ध रहेगी।

सिस्टम बार कोड और क्यूआर कोड आधारित ट्रैकिंग भी सपोर्ट करेगा। इससे स्टोर मूवमेंट और सप्लाई की निगरानी आसान होगी। (Indian Navy INAMS 2.0)

AI और मशीन लर्निंग भी होगी शामिल

INAMS 2.0 की सबसे बड़ी खासियत इसमें शामिल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग आधारित एनालिटिक्स है।

आरएफआई के मुताबिक सिस्टम को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग रेडी बनाया जा रहा है। भविष्य में यह सिस्टम डेटा पैटर्न पहचानने, अनुमान लगाने और फैसले लेने में मदद कर सकेगा।

उदाहरण के तौर पर अगर किसी मिसाइल सिस्टम में बार-बार खराबी आ रही हो या किसी गोला-बारूद की स्टोरेज लाइफ खत्म होने वाली हो, तो सिस्टम पहले से अलर्ट दे सकेगा। इससे नौसेना का प्रेडिक्टिव मेंटेनेंस और इन्वेंट्री मैनेजमेंट बेहतर होगा। (Indian Navy INAMS 2.0)

साइबर सुरक्षा पर खास फोकस

क्योंकि यह सिस्टम संवेदनशील मिलिट्री डेटा संभालेगा, इसलिए इसमें साइबर सिक्योरिटी को सबसे बड़ी प्राथमिकता दी गई है। सिस्टम मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन, एईएस एन्क्रिप्शन, ऑडिट ट्रेल, रोल बेस्ड एक्सेस कंट्रोल और वल्नरेबिलिटी असेसमेंट जैसी सुरक्षा तकनीकों से लैस होगा।

हर साल वल्नरेबिलिटी असेसमेंट एंड पेनिट्रेशन टेस्टिंग (VAPT) भी अनिवार्य होगी। नौसेना के साइबर ग्रुप की मंजूरी के बिना सिस्टम में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया जा सकेगा। एआई सिस्टम को डेटा पॉयजनिंग, सिस्टम मैनिपुलेशन और प्राइवेसी ब्रीच जैसे खतरों से बचाने के लिए भी अलग सुरक्षा प्रोटोकॉल बनाए जाएंगे।

भारतीय नौसेना का अपना नेटवर्क बनेगा रीढ़

INAMS-II सॉफ्टवेयर को इस तरह बनाया जा रहा है कि इसे पूरे भारत में एक समय पर करीब 1200 लोग इस्तेमाल कर सकें। यह सिस्टम भारतीय नौसेना के सेंट्रल डेटा सेंटर (CDC), रीजनल डेटा सेंटर (RDC) और नेवल हेडक्वार्टर में लगाया जाएगा, ताकि अलग-अलग जगहों से जुड़े अधिकारी और यूनिट एक ही नेटवर्क पर काम कर सकें।

INAMS-II भारतीय नौसेना के इंडियन नेवी सेंट्रिक नेटवर्क (NCN) पर चलेगा। यही नेटवर्क नौसेना के डेटा सेंटर, कमांड मुख्यालय और अलग-अलग डिपो को जोड़ता है। रडार, लॉजिस्टिक्स सिस्टम और दूसरे ऑपरेशनल प्लेटफॉर्म से मिलने वाली जानकारी भी इसी नेटवर्क के जरिए शेयर की जाएगी।

अगर किसी जगह इंटरनेट या नेटवर्क कनेक्शन सीमित हो, तब भी सिस्टम ऑफलाइन मोड में काम कर सकेगा। बाद में नेटवर्क मिलने पर डेटा सिंक्रोनाइज हो जाएगा। (Indian Navy INAMS 2.0)

डिजिटल पेन और टैबलेट से होगी एंट्री

सिस्टम के लिए नौसेना नए हार्डवेयर भी खरीदेगी। इसमें डेस्कटॉप कंप्यूटर, डिजिटल पेन, टैबलेट, क्यूआर कोड स्कैनर, प्रिंटर और नेटवर्क उपकरण शामिल होंगे। फील्ड यूनिट और डिपो में मौजूद कर्मचारी सीधे टैबलेट या डिजिटल डिवाइस से डेटा दर्ज कर सकेंगे।

इससे मैनुअल पेपरवर्क कम होगा और डेटा एंट्री में होने वाली गलतियां घटेंगी। साथ ही सिस्टम अलग-अलग ऑपरेटिंग सिस्टम जैसे विंडोज, लिनक्स और एंड्रॉयड को भी सपोर्ट करेगा। (Indian Navy INAMS 2.0)

सोर्स कोड भारतीय नौसेना के पास

इस सॉफ्टवेयर का पूरा सोर्स कोड हर चरण के बाद भारतीय नौसेना को दिया जाएगा। फाइनल वर्जन के साथ पूरी डॉक्यूमेंटेशन भी दी जाएगी, जिसमें हर मॉड्यूल और फीचर के काम करने का तरीका विस्तार से समझाया जाएगा।
अगर भविष्य में सॉफ्टवेयर में कोई बदलाव या नया फीचर जोड़ना हो, तो उसके निर्देश भी डॉक्यूमेंट में साफ तौर पर दिए जाएंगे, ताकि सिस्टम को आसानी से अपडेट किया जा सके।

नौसेना ने साफ किया है कि इस सॉफ्टवेयर का पूरा मालिकाना हक भारतीय नौसेना के पास रहेगा। यह प्रोजेक्ट खास तौर पर भारतीय नौसेना के लिए बनाया जा रहा है। इसलिए इसका सोर्स कोड, डिजाइन और दूसरी तकनीकी जानकारी किसी दूसरी संस्था या प्रोजेक्ट में बिना नौसेना की अनुमति के इस्तेमाल नहीं की जा सकेगी।

कई चरणों में लागू होगा प्रोजेक्ट

INAMS 2.0 को कई चरणों में लागू किया जाएगा। पहले पुराने वर्जन की स्टडी की जाएगी। इसके बाद डिजाइन, डेवलपमेंट और टेस्टिंग होगी। फिर डेटा माइग्रेशन, यूजर ट्रेनिंग और सिस्टम इंटीग्रेशन का काम होगा।

नौसेना के मुताबिक इंटरमीडिएट गो-लाइव और फाइनल गो-लाइव जैसे चरण भी रखे गए हैं। फाइनल लॉन्च के बाद तीन साल तक ऑपरेशन और मेंटेनेंस सपोर्ट भी दिया जाएगा।

मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भरता पर जोर

नौसेना ने इस सिस्टम के इंडिजेनाइजेशन पर भी जोर दिया है। सिस्टम में अलग मॉड्यूल होंगे, जो यह ट्रैक करेंगे कि कौन सा उपकरण या स्पेयर पार्ट स्वदेशी है और कौन सा विदेशी। भारतीय नौसेना का उद्देश्य रक्षा सप्लाई चेन में घरेलू उद्योग की भागीदारी बढ़ाना है।

इसी वजह से इस प्रोजेक्ट में सोर्स कोड और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स पूरी तरह भारतीय नौसेना के पास रहेंगे। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इससे विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम होगी और भविष्य में सिस्टम को भारत में ही अपग्रेड किया जा सकेगा। (Indian Navy INAMS 2.0)

नेवल आर्मामेंट डिपो का काम होगा आसान

भारतीय नौसेना के नेवल आर्मामेंट डिपो देश के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद हैं। यही डिपो नौसेना के युद्धपोतों और तटरक्षक बल को हथियार और गोला-बारूद उपलब्ध कराते हैं। इन डिपो में स्टोरेज, ट्रांसपोर्ट, रिपेयर, टेस्टिंग और डिस्पोजल जैसे कई काम एक साथ चलते हैं।

INAMS-II आने के बाद हर डिपो का डेटा एक सेंट्रल सिस्टम से जुड़ जाएगा। अगर किसी जहाज को मिसाइल या गोला-बारूद की जरूरत होगी, तो उसकी जानकारी तुरंत नेटवर्क पर दिखाई देगी। इसी तरह ट्रांसपोर्ट, फायर सेफ्टी और मेंटेनेंस से जुड़ी गतिविधियां भी डिजिटल रूप से ट्रैक की जा सकेंगी।

ऑडिट और रिकॉर्ड मैनेजमेंट भी होगा मजबूत

नए सिस्टम में ऑडिट मॉड्यूल भी शामिल होगा। इससे हथियारों और विस्फोटक सामग्री का पूरा रिकॉर्ड डिजिटल तरीके से सुरक्षित रहेगा। किस अधिकारी ने कब डेटा एक्सेस किया, किसने बदलाव किया और कौन सी फाइल डाउनलोड की गई, इसका रिकॉर्ड भी सिस्टम में सेव होगा।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक इससे जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ेगी। साथ ही सुरक्षा जांच और जांच एजेंसियों के लिए डेटा ट्रैक करना आसान होगा। (Indian Navy INAMS 2.0)

नेचुरल लैंग्वेज सर्च भी मिलेगा

INAMS 2.0 में नेचुरल लैंग्वेज सर्च फीचर भी होगा। इसका मतलब है कि यूजर साधारण भाषा में जानकारी खोज सकेंगे। उदाहरण के तौर पर अगर कोई अधिकारी किसी खास मिसाइल बैच या गोला-बारूद की स्थिति जानना चाहता है, तो वह सीधे सिस्टम में सर्च कर सकेगा।

सिस्टम स्ट्रक्चर्ड और अनस्ट्रक्चर्ड दोनों तरह के डेटा को संभाल सकेगा। इसमें इमेज, वीडियो और स्कैन डॉक्यूमेंट भी जोड़े जा सकेंगे। (Indian Navy INAMS 2.0)

डेटा सेंटर और बैकअप सिस्टम भी होंगे मजबूत

नौसेना ने डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने की बात भी कही है। सिस्टम के लिए सेंट्रल डेटा सेंटर और डिजास्टर रिकवरी सेंटर बनाए जाएंगे। अगर किसी वजह से मुख्य सर्वर बंद हो जाए, तो बैकअप सिस्टम तुरंत काम संभाल सकेगा।

लोड बैलेंसिंग, क्लस्टरिंग और हाई अवेलेबिलिटी जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा, ताकि सिस्टम लगातार चालू रहे। रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक यह प्रोजेक्ट भारतीय नौसेना के डिजिटल मॉडर्नाइजेशन का अहम हिस्सा माना जा रहा है।

नौसेना का मानना है कि हथियार, गोला-बारूद और लॉजिस्टिक्स से जुड़ा डेटा अब आधुनिक युद्ध में उतना ही महत्वपूर्ण है जितना खुद हथियार। इसी वजह से INAMS 2.0 को केवल एक सॉफ्टवेयर सिस्टम नहीं, बल्कि नौसेना के पूरे आर्मामेंट नेटवर्क का डिजिटल कमांड प्लेटफॉर्म माना जा रहा है। (Indian Navy INAMS 2.0)