📍नई दिल्ली | 25 May, 2026, 3:59 PM
Su-30MKI Antenna Upgrade: भारतीय वायु सेना अपने सबसे भरोसेमंद फाइटर जेट सुखोई-30एमकेआई को और आधुनिक बनाने की तैयारी में जुट गई है। इसके तहत वायु सेना ने पुराने नेविगेशन सिस्टम को बदलकर नई मल्टी-कॉन्स्टेलेशन जीएनएसएस एंटीना लगाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह अपग्रेड इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और जीपीएस जैमिंग जैसे खतरों से निपटने के लिए किया जा रहा है।
भारतीय वायु सेना ने इसके लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) जारी की है। इस प्रोजेक्ट का मकसद सु-30 विमानों में इस्तेमाल हो रही पुरानी नेविगेशन एंटीना को नई मल्टी-कॉन्स्टेलेशन एंटीना से बदलना है। इससे विमान की नेविगेशन क्षमता, सटीकता, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर में सर्वाइवल और लंबी दूरी तक ऑपरेशन करने की ताकत बढ़ेगी। (Su-30MKI Upgrade)
Su-30MKI Antenna Upgrade: भारतीय वायु सेना की रीढ़ है सुखोई-30
सुखोई-30 भारतीय वायु सेना का सबसे अहम मल्टीरोल फाइटर एयरक्राफ्ट माना जाता है। भारत के पास ऐसे करीब 260 से ज्यादा विमान हैं। इन्हें रूस के सहयोग से डेवलप किया गया था और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) इन्हें भारत में लाइसेंस के तहत इनका निर्माण करता है।
यह विमान लंबी दूरी तक उड़ान भरने, एयर सुपीरियरिटी मिशन, ग्राउंड अटैक और प्रिसिजन स्ट्राइक के लिए इस्तेमाल होता है। यह प्लेटफॉर्म ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक मिसाइल से भी लैस है।
हालांकि आधुनिक युद्ध में केवल ताकतवर इंजन और हथियार काफी नहीं माने जाते। अब नेविगेशन, डेटा लिंक और इलेक्ट्रॉनिक सिक्योरिटी भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो चुकी है। इसी वजह से भारतीय वायु सेना अब सुखोई-30 के नेविगेशन सिस्टम को नए लेवल पर ले जाना चाहती है। (Su-30MKI Antenna Upgrade)
क्यों जरूरी हुआ यह अपग्रेड
अभी सुखोई-30 में जीपीएस और ग्लोनास बेस्ड नेविगेशन सिस्टम का इस्तेमाल होता है। लेकिन आधुनिक युद्ध में दुश्मन देश जीपीएस जैमिंग, स्पूफिंग और इलेक्ट्रॉनिक अटैक जैसी तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
अगर किसी लड़ाकू विमान का सैटेलाइट सिग्नल ब्लॉक हो जाए तो इससे उसकी एक्यूरेसी पर असर पड़ता है। मिसाइल टारगेटिंग, लंबी दूरी की उड़ान और हथियारों की गाइडेंस पर असर पड़ सकता है।
रक्षा सूत्रों के मुताबिक मौजूदा सिस्टम सीमित फ्रीक्वेंसी बैंड पर काम करता है। कुछ इलाकों में सैटेलाइट कवरेज कम होने और इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग के कारण नेविगेशन में दिक्कत आ सकती है।
इसी वजह से भारतीय वायु सेना अब ऐसा सिस्टम चाहती है, जो एक साथ कई सैटेलाइट नेटवर्क से जुड़ सके।
बता दें कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने भारतीय विमानों, मिसाइलों और ड्रोन की नेविगेशन क्षमता को प्रभावित करने के लिए जीपीएस जैमिंग और स्पूफिंग तकनीक का इस्तेमाल करने की कोशिश की। इसका मकसद भारतीय सिस्टम्स को गलत लोकेशन दिखाना या उनके सैटेलाइट सिग्नल को बाधित करना था।
इससे पहले अमृतसर और जम्मू जैसे सीमावर्ती इलाकों में पहले भी जीपीएस स्पूफिंग के कई मामले सामने आ चुके थे। ऑपरेशन के दौरान ऐसी गतिविधियों में और बढ़ोतरी देखी गई थी।
सूत्रों के अनुसार भारतीय वायु सेना के कुछ प्लेटफॉर्म, जैसे सी-130जे ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और सु-30एमकेआई व राफेल जैसे लड़ाकू विमानों को भी जीपीएस स्पूफिंग का सामना करना पड़ा है। हालांकि भारतीय वायु सेना ने बैकअप सिस्टम के तौर पर भारतीय नाविक (NavIC) और इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम (INS) का इस्तेमाल किया, जिसकी वजह से मिशन प्रभावित नहीं हुए।
रक्षा जानकारों का कहना है कि इसी अनुभव के बाद भारतीय वायु सेना अब सुखोई-30एमकेआई जैसे प्लेटफॉर्म्स में मल्टी-कॉन्स्टेलेशन एंटीना और एंटी-जैम नेविगेशन सिस्टम जोड़ने पर ज्यादा जोर दे रही है, ताकि भविष्य में जीपीएस डिनाइड माहौल में भी विमान सुरक्षित और सटीक तरीके से ऑपरेशन कर सकें।
क्या होगी नई एंटीना की खासियत
नई मल्टी-कॉन्स्टेलेशन जीएनएसएस एंटीना एक साथ कई सैटेलाइट सिस्टम को सपोर्ट करेगा। इसमें अमेरिका का जीपीएस, रूस का ग्लोनास, यूरोप का गैलीलियो, चीन का बैदोउ (BeiDou) और भारत का नाविक सिस्टम शामिल होगा। इससे 100 से ज्यादा सैटेलाइट्स उपलब्ध होंगे, जो सिग्नल की निरंतरता और सटीकता बढ़ाएंगे।
इसके अलावा इसमें भारत का अपना सैटेलाइट-बेस्ड आगमेंटेशन सिस्टम (SBAS) GAGAN (GPS Aided GEO Augmented Navigation) भी शामिल होगा। GAGAN मुख्य रूप से दो फ्रीक्वेंसी पर काम करता है। पहली L1 फ्रीक्वेंसी है, जो 1575.42 MHz पर काम करती है। यह पारंपरिक GPS सिग्नल के साथ कम्पैटेबल है और अभी सबसे ज्यादा इस्तेमाल होती है। दूसरी L5 फ्रीक्वेंसी है, जो 1176.45 MHz पर काम करती है। यह ज्यादा एडवांस मानी जाती है और ड्यूल-फ्रीक्वेंसी सपोर्ट देती है।
सूत्रों के मुताबिक सुखोई-30 जैसे तेज रफ्तार और हाई-मैन्युवर फाइटर जेट्स के लिए L1 और L5 दोनों फ्रीक्वेंसी को सपोर्ट करने वाला ड्यूल-फ्रीक्वेंसी एंटीना बहुत जरूरी माना जाता है।
ऐसे लड़ाकू विमान बहुत तेज गति और कठिन मूवमेंट में उड़ान भरते हैं, जहां सामान्य जीपीएस सिग्नल में ज्यादा एरर आ सकता है। ड्यूल-फ्रीक्वेंसी सिस्टम इन एरर को कम करता है और विमान को ज्यादा सटीक पोजिशनिंग देता है।
इसके बाद जेट केवल एक या दो सैटेलाइट नेटवर्क पर निर्भर नहीं रहेगा। अगर किसी सिस्टम का सिग्नल बाधित हो जाए, तो दूसरा नेटवर्क काम करता रहेगा। इससे विमान को ज्यादा सैटेलाइट उपलब्ध होंगे और उसकी पोजिशनिंग ज्यादा सटीक होगी। (Su-30MKI Antenna Upgrade)
जैमिंग के बीच भी करेगा काम
नए एंटीना को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि वह इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग के बीच भी काम कर सके। आधुनिक युद्ध में दुश्मन देश इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम के जरिए सैटेलाइट सिग्नल बाधित करने की कोशिश करते हैं।
आरएफपी के अनुसार नए सिस्टम में एंटी-जैम और एंटी-स्पूफिंग तकनीक शामिल होगी। इसका मतलब यह है कि अगर दुश्मन नकली सिग्नल भेजने या असली सिग्नल रोकने की कोशिश करे, तब भी विमान सही दिशा में उड़ान जारी रख सकेगा।
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि चीन और पाकिस्तान जैसे देशों के पास पहले से एडवांस इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम मौजूद हैं। इसलिए भारतीय वायु सेना अब अपने लड़ाकू विमानों को भी उसी स्तर की सुरक्षा देना चाहती है।
ज्यादा सटीक होंगे हमले
नया एंटीना लगने के बाद सुखोई-30 की नेविगेशन सटीकता काफी बेहतर हो जाएगी। आरएफपी के मुताबिक सिस्टम 1 से 2 मीटर तक की सटीकता दे सकेगा। इसका सीधा असर मिसाइल और प्रिसिजन गाइडेड हथियारों पर पड़ेगा। ब्रह्मोस, स्पाइस और दूसरी स्मार्ट म्यूनिशन को ज्यादा सटीक टारगेट डेटा मिल सकेगा।
सूत्रों का कहना है कि भविष्य के युद्धों में प्रिसिजन स्ट्राइक सबसे अहम भूमिका निभाएंगी। ऐसे में नेविगेशन की सटीकता बहुत जरूरी मानी जाती है। (Su-30MKI Antenna Upgrade)
लंबे मिशन में भी मिलेगा फायदा
नया मल्टी-कॉन्स्टेलेशन एंटीना लंबी दूरी के मिशन में भी मदद करेगा। बेहतर नेविगेशन और रूट प्लानिंग से ईंधन की बचत होगी। अगर विमान को ज्यादा भरोसेमंद पोजिशनिंग डेटा मिलता रहेगा, तो वह कठिन इलाकों और खराब मौसम में भी ज्यादा सुरक्षित तरीके से ऑपरेशन कर सकेगा।
वहीं, यह अपग्रेड समुद्री इलाकों, पहाड़ी क्षेत्रों और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर वाले वातावरण में काफी उपयोगी साबित होगा।
पुराने सिस्टम की जगह नई टेक्नोलॉजी
सुखोई-30 में अभी इस्तेमाल हो रहे नेविगेशन सिस्टम में इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम, लेजर जायरो और सैटेलाइट रिसीवर शामिल हैं। लेकिन यह तकनीक अब पुरानी मानी जा रही है।
नई प्रणाली में मल्टी-बैंड और मल्टी-फ्रीक्वेंसी सपोर्ट दिया जाएगा। इससे आयनोस्फेरिक एरर और मल्टीपाथ जैसी समस्याएं कम होंगी।
नई एंटीना में राइट हैंड सर्कुलर पोलराइजेशन और हाई गेन तकनीक भी शामिल होगी। इसे बेहद छोटे और हल्के डिजाइन में तैयार किया जाएगा ताकि विमान के वजन और एरोडायनामिक्स पर असर न पड़े।
‘सुपर सुखोई’ प्रोग्राम का हिस्सा
यह अपग्रेड भारतीय वायु सेना के बड़े “सुपर सुखोई” प्रोग्राम का हिस्सा माना जा रहा है। इस कार्यक्रम के तहत सुखोई-30 विमानों में नए रडार, आधुनिक एवियोनिक्स, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और नए हथियार जोड़ने की योजना है।
नया एंटीना सिस्टम उसी आधुनिकीकरण कार्यक्रम का हिस्सा है, इससे विमान की सर्विस लाइफ भी बढ़ेगी।
रक्षा सूत्रों के मुताबिक भारतीय वायु सेना चाहती है कि सुखोई-30 आने वाले कई दशकों तक आधुनिक युद्ध के लिए तैयार रहे। (Su-30MKI Antenna Upgrade)
भारतीय कंपनियों को मिलेगा मौका
आरएफपी में भारतीय कंपनियों, रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों और विदेशी साझेदारों के साथ काम करने वाले कंसोर्टियम को भाग लेने की अनुमति दी गई है।
एचएएल, बीईएल और कई निजी रक्षा कंपनियां इस प्रोजेक्ट में हिस्सा ले सकती हैं। सरकार ने इसमें “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” पर खास जोर दिया है।
आरएफपी के अनुसार जिन कंपनियों का लोकल कंटेंट ज्यादा होगा, उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी। वहीं, यह प्रोजेक्ट अलग-अलग चरणों में पूरा किया जाएगा। पहले चरण में डिजाइन और प्रोटोटाइप तैयार होंगे। इसके बाद कुछ विमानों पर ग्राउंड और फ्लाइट ट्रायल किए जाएंगे।
सर्टिफिकेशन पूरा होने के बाद बड़े पैमाने पर इंस्टॉलेशन शुरू होगा। शुरुआती चरण में 50 से ज्यादा विमानों पर यह सिस्टम लगाया जा सकता है। इसके बाद पूरे बेड़े में अपग्रेड किया जाएगा। (Su-30MKI Antenna Upgrade)
पायलट और तकनीकी स्टाफ को मिलेगी ट्रेनिंग
नए सिस्टम के साथ भारतीय वायु सेना और एचएएल के तकनीकी स्टाफ को भी ट्रेनिंग दी जाएगी। इसके अलावा स्पेयर पार्ट्स, ग्राउंड सपोर्ट इक्विपमेंट और वारंटी सपोर्ट भी दिया जाएगा।
आरएफपी में कहा गया है कि सिस्टम को पुराने विमान सिस्टम के साथ बिना बड़ी स्ट्रक्चरल बदलाव के जोड़ना होगा।
इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में बढ़ेगी ताकत
आधुनिक युद्ध तेजी से नेटवर्क-सेंट्रिक और इलेक्ट्रॉनिक आधारित हो चुका है। केवल मिसाइल और लड़ाकू विमान ही काफी नहीं हैं। अब डेटा, नेविगेशन और इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा युद्ध जीतने में अहम भूमिका निभाते हैं।
अगर कोई विमान जीपीएस डिनाइड यानी सिग्नल बाधित माहौल में भी सटीक हमला कर सके, तो उसकी ऑपरेशनल क्षमता कई गुना बढ़ जाती है। भारतीय वायु सेना का यह अपग्रेड उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
चीन और पाकिस्तान दोनों तेजी से इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और सैटेलाइट बेस्ड सैन्य क्षमताएं बढ़ा रहे हैं। चीन पहले ही एडवांस जैमिंग सिस्टम और एंटी-सैटेलाइट तकनीक विकसित कर चुका है। ऐसे में भारतीय वायु सेना अपने सबसे अहम लड़ाकू विमान को आधुनिक नेविगेशन और एंटी-जैम तकनीक से लैस करना चाहती है। (Su-30MKI Antenna Upgrade)


