📍नई दिल्ली | 19 May, 2026, 10:25 PM
DRDO ULPGM-V3 Missile: भारत ने ड्रोन से लॉन्च होने वाली अपनी नई स्वदेशी मिसाइल ULPGM-V3 का सफल परीक्षण पूरा कर लिया है। डीआरडीओ ने इस मिसाइल के फाइनल डेवलपमेंट ट्रायल्स आंध्र प्रदेश के कुर्नूल स्थित टेस्ट रेंज में किए। खास बात यह रही कि इस मिसाइल का परीक्षण केवल जमीन पर मौजूद टारगेट्स पर ही नहीं, बल्कि हवा में उड़ने वाले ड्रोन और हेलीकॉप्टर जैसे टारगेट्स पर भी किया गया।
डीआरडीओ के मुताबिक ULPGM-V3 अब एयर-टू-ग्राउंड और एयर-टू-एयर दोनों मोड में काम कर सकती है। यह मिसाइल टैंक, बंकर और दुश्मन के ठिकानों को निशाना बनाने के साथ-साथ हवा में मौजूद दुश्मन ड्रोन और हेलीकॉप्टरों को भी मार सकती है।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इसे रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा रणनीतिक कदम बताया है। उन्होंने डीआरडीओ, रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों, निजी कंपनियों और इंडस्ट्री से जुड़े सभी भागीदारों को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी। वहीं, डीआरडीओ चेयरमैन डॉ. समीर वी. कामत ने इस उपलब्धि पर सभी वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और इंडस्ट्री पार्टनर्स को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह भारतीय रक्षा तकनीक की बड़ी उपलब्धि है।
क्या है DRDO ULPGM-V3 Missile
ULPGM का पूरा नाम अनमैन्ड एरियल व्हीकल लॉन्च्ड प्रिसीजन गाइडेड मिसाइल है। यह एक हल्की लेकिन बेहद सटीक मिसाइल है, जिसे ड्रोन यानी यूएवी से लॉन्च किया जाता है।
यह “फायर एंड फॉरगेट” तकनीक पर आधारित है। इसका मतलब है कि मिसाइल को लॉन्च करने के बाद ऑपरेटर को लगातार उसे कंट्रोल करने की जरूरत नहीं पड़ती। मिसाइल खुद अपने टारगेट को ट्रैक करती है और हमला करती है।
डीआरडीओ ने ULPGM के पिछले वर्जन के मुकाबले V3 में कई बड़े बदलाव किए हैं। इसमें नई गाइडेंस तकनीक, ज्यादा रेंज, बेहतर सीकर और मल्टी-रोल क्षमता जोड़ी गई है। (DRDO ULPGM-V3 Missile)
पहली बार मिली एयर-टू-एयर क्षमता
ULPGM-V3 की सबसे बड़ी खासियत इसकी नई एयर-टू-एयर क्षमता मानी जा रही है। अब तक इस तरह की हल्की मिसाइलें मुख्य रूप से जमीन पर मौजूद टारगेट्स के खिलाफ इस्तेमाल होती थीं, लेकिन अब यह हवा में मौजूद ड्रोन, हेलीकॉप्टर और दूसरे लो-स्पीड हवाई लक्ष्यों को भी निशाना बना सकती है।
सूत्रों का कहना है कि आधुनिक युद्ध में ड्रोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। छोटे और सस्ते ड्रोन अब निगरानी, हमला और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं। ऐसे में ड्रोन से लॉन्च होने वाली यह मिसाइल भारतीय सेना को नई क्षमता दे सकती है। (DRDO ULPGM-V3 Missile)
🇮🇳🚀DRDO has successfully completed development trials of the ULPGM-V3 (Unmanned Aerial Vehicle Launched Precision Guided Missile) in both Air-to-Ground and Air-to-Air modes at the DRDO test range near Kurnool.
The missile demonstrated capability against anti-tank targets as well… pic.twitter.com/8bahixbTg3— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) May 19, 2026
कितनी ताकतवर है मिसाइल
ULPGM-V3 का वजन करीब 12.5 किलोग्राम बताया जा रहा है। इसकी लंबाई लगभग 680 से 890 मिलीमीटर के बीच है, जबकि व्यास 100 मिलीमीटर है। हल्का डिजाइन होने की वजह से इसे छोटे क्वाडकॉप्टर ड्रोन से लेकर बड़े यूएवी और अटैक हेलीकॉप्टरों तक पर लगाया जा सकता है।
मिसाइल की रेंज को भी पहले से बढ़ाया गया है। दिन के समय यह करीब 4 से 10 किलोमीटर तक के टारगेट को निशाना बना सकती है। रात में भी इसकी मारक क्षमता 2.5 किलोमीटर से ज्यादा बताई जा रही है।
डीआरडीओ ने इसमें हाई-डेफिनिशन डुअल चैनल सीकर लगाया है। इसमें आईआईआर यानी इमेजिंग इंफ्रारेड और एस-बैंड आरएफ तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इसकी मदद से मिसाइल दिन और रात दोनों समय टारगेट को पहचान सकती है।
ट्रायल्स के दौरान एक इंटीग्रेटेड ग्राउंड कंट्रोल सिस्टम का इस्तेमाल किया गया। यह सिस्टम मिसाइल और ड्रोन दोनों को कंट्रोल करता है।
इसमें ऑटोमेटेड रेडीनेस और लॉन्च ऑपरेशन जैसी आधुनिक तकनीकें जोड़ी गई हैं। इससे ऑपरेटर को तेजी से टारगेट लॉक करने और लॉन्च करने में मदद मिलती है। (DRDO ULPGM-V3 Missile)
टारगेट बदलने की भी क्षमता
ULPGM-V3 में टू-वे डेटा लिंक तकनीक भी दी गई है। इसका मतलब है कि लॉन्च के बाद भी ऑपरेटर मिसाइल को नई जानकारी भेज सकता है।
अगर युद्ध के दौरान टारगेट बदल जाए या नया खतरा सामने आ जाए तो मिसाइल को री-टारगेट भी किया जा सकता है। इसे आधुनिक नेटवर्क-सेंट्रिक वारफेयर के लिए बेहद अहम क्षमता माना जा रहा है। यह फीचर खासतौर पर तेजी से बदलते बैटलफील्ड माहौल में उपयोगी होता है। (DRDO ULPGM-V3 Missile)
जामिंग में भी कर सकती है हमला
आधुनिक युद्ध में इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग बड़ी चुनौती बन चुकी है। दुश्मन अक्सर जीपीएस और कम्युनिकेशन सिस्टम को जाम करने की कोशिश करता है।
डीआरडीओ के मुताबिक ULPGM-V3 को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह जामिंग की स्थिति में भी काम कर सके। जरूरत पड़ने पर यह ऑटोनॉमस मोड में जाकर खुद टारगेट तक पहुंच सकती है।
इस क्षमता की वजह से इसे इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर वातावरण में भी प्रभावी माना जा रहा है।
लगा सकते हैं अलग-अलग तरह के वारहेड
ULPGM-V3 को मॉड्यूलर डिजाइन के साथ तैयार किया गया है। यानी जरूरत के हिसाब से इसमें अलग-अलग तरह के वारहेड लगाए जा सकते हैं।
इसका एंटी-आर्मर वारहेड आधुनिक टैंकों और एक्सप्लोसिव रिएक्टिव आर्मर यानी ईआरए वाले बख्तरबंद वाहनों को निशाना बनाने के लिए तैयार किया गया है। यह टॉप-अटैक मोड में हमला कर सकता है, जिसमें मिसाइल टैंक के ऊपर वाले कमजोर हिस्से पर वार करती है।
इसके अलावा इसमें पेनेट्रेशन-कम-ब्लास्ट वारहेड भी लगाया जा सकता है, जो बंकर और कंक्रीट स्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचाने के लिए बनाया गया है।
तीसरा विकल्प प्री-फ्रैगमेंटेड वारहेड का है, जिसका इस्तेमाल सैनिकों और दूसरे सॉफ्ट टारगेट्स के खिलाफ किया जा सकता है।
लगाई है डुअल-थ्रस्ट रॉकेट मोटर
मिसाइल में डुअल-थ्रस्ट सॉलिड रॉकेट मोटर का इस्तेमाल किया गया है। इसका फायदा यह होता है कि मिसाइल लॉन्च के बाद पहले तेजी से गति पकड़ती है और बाद में लंबे समय तक एक रफ्तार पर उड़ती रहती है। इससे मिसाइल की रेंज और सटीकता दोनों बेहतर होती हैं।
सूत्रों के मुताबिक ULPGM-V3 की सटीकता यानी सीईपी करीब 10 सेंटीमीटर तक बताई जा रही है। यानी यह बेहद छोटे क्षेत्र में सटीक वार कर सकती है। (DRDO ULPGM-V3 Missile)
क्यों महत्वपूर्ण है ULPGM-V3
रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक आधुनिक युद्ध तेजी से ड्रोन आधारित होता जा रहा है। छोटे ड्रोन अब केवल निगरानी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि हथियार लेकर हमले भी कर रहे हैं।
ऐसे माहौल में हल्की, सस्ती और सटीक मिसाइलों की जरूरत बढ़ रही है। ULPGM-V3 को इसी जरूरत को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
यह मिसाइल महंगी एंटी-टैंक या एयर डिफेंस मिसाइलों का कम लागत वाला विकल्प भी मानी जा रही है। इसकी मदद से छोटे ड्रोन भी बड़े सैन्य टारगेट्स पर सटीक हमला कर सकते हैं।
पूरी तरह स्वदेशी परियोजना
डीआरडीओ ने इस मिसाइल को पूरी तरह भारतीय डिफेंस इकोसिस्टम के साथ मिलकर डेवलप किया है। इसका नेतृत्व हैदराबाद स्थित रिसर्च सेंटर इमारत यानी आरसीआई ने किया।
इसके अलावा डीआरडीओ की कई अन्य लैब्स भी इस परियोजना में शामिल रहीं। इनमें डीआरडीएल हैदराबाद, टीबीआरएल चंडीगढ़ और एचईएमआरएल पुणे शामिल हैं।
मिसाइल के विकास और उत्पादन में भारत डायनेमिक्स लिमिटेड यानी बीडीएल और अदाणी डिफेंस सिस्टम्स एंड टेक्नोलॉजीज लिमिटेड भी शामिल हैं।
इस परियोजना में बेंगलुरु की भारतीय स्टार्टअप कंपनी न्यूस्पेस रिसर्च एंड टेक्नोलॉजीज का भी बड़ा योगदान रहा। कंपनी के यूएवी प्लेटफॉर्म्स पर इस मिसाइल का परीक्षण किया गया।
यह पहली बार है जब डीआरडीओ, सरकारी कंपनियां, निजी रक्षा कंपनियां, स्टार्टअप्स और एमएसएमई इतने बड़े स्तर पर एक साथ काम करते दिखाई दिए हैं।
डीआरडीओ के मुताबिक इस परियोजना में 30 से ज्यादा एमएसएमई और इंडस्ट्री पार्टनर्स शामिल रहे।
सीरियल प्रोडक्शन के लिए तैयार
डीआरडीओ ने कहा है कि ट्रायल्स के दौरान यह साबित हो गया कि मिसाइल की घरेलू सप्लाई चेन पूरी तरह तैयार है। अब इस मिसाइल का बड़े स्तर पर उत्पादन शुरू किया जा सकता है। इसे भारतीय रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। (DRDO ULPGM-V3 Missile)

