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अब जमीन में छिपे प्लास्टिक IED की तुरंत होगी पहचान, सेना खरीदेगी ये खास माइन डिटेक्टर

यह परियोजना इसलिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि आज आतंकवादी संगठन और दुश्मन सेनाएं ऐसे माइंस और इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइसेज (आईईडी) का इस्तेमाल कर रही हैं, जिनमें मेटल बहुत कम होती है या बिल्कुल नहीं होती...

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📍नई दिल्ली | 20 May, 2026, 8:00 AM

Dual Technology Mine Detector: भारतीय सेना अब ऐसी नई तकनीक वाले माइन डिटेक्टर्स खरीदने की तैयारी कर रही है, जो जमीन में दबे मेटल और नॉन-मेटल वाले दोनों तरह के माइंस और आईईडी का पता लगा सकेंगे। रक्षा मंत्रालय के अधीन डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स (डीएमए) ने करीब 290.11 करोड़ रुपये का टेंडर जारी किया है। यह खरीद “डुअल टेक्नोलॉजी माइन डिटेक्टर” के लिए की जा रही है, जिसे मॉडर्न बैटलफील्ड की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।

यह परियोजना इसलिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि आज आतंकवादी संगठन और दुश्मन सेनाएं ऐसे माइंस और इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइसेज (आईईडी) का इस्तेमाल कर रही हैं, जिनमें मेटल बहुत कम होती है या बिल्कुल नहीं होती। ऐसे हालात में पुराने मेटल डिटेक्टर्स कई बार बेअसर साबित होते हैं।

भारतीय सेना ऐसे डुअल टेक्नोलॉजी माइन डिटेक्टर की 386 यूनिट्स खरीदने की योजना बना रही है। डॉक्यूमेंट में साफ कहा गया है कि चुनी गई कंपनी को सप्लाई ऑर्डर मिलने के बाद 540 दिनों यानी करीब 18 महीनों के भीतर सभी उपकरणों की डिलीवरी पूरी करनी होगी। इसकी अंतिम तारीख 5 जून रखी गई है।

Dual Technology Mine Detector: क्यों जरूरी हैं नए माइन डिटेक्टर

भारतीय सेना के पास अभी मुख्य रूप से शिबेल और मेटेक्स जैसे माइन डिटेक्टर्स मौजूद हैं। ये पारंपरिक मेटल डिटेक्टर हैं, जो जमीन के नीचे दबे मेटल के हिस्सों को खोजते हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों में युद्ध और आतंकवाद का तरीका तेजी से बदला है।

अब प्लास्टिक, लकड़ी, सिरेमिक और दूसरी नॉन-मेटलिक सामग्री से बने माइंस और आईईडी का इस्तेमाल बढ़ा है। इनमें मेटल की मात्रा बेहद कम होती है। कई बार एक ग्राम से भी कम मेटल इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे माइंस को सामान्य डिटेक्टर पकड़ नहीं पाते।

इसी वजह से सेना अब डुअल टेक्नोलॉजी माइन डिटेक्टर पर फोकस कर रही है। यह सिस्टम केवल मेटल नहीं खोजेगा, बल्कि जमीन के अंदर छिपी वस्तु की बनावट, डेंसिटी और अन्य सिग्नल्स के आधार पर भी उसकी पहचान कर सकेगा।

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कैसे काम करेगा डुअल टेक्नोलॉजी सिस्टम

यह नया सिस्टम दो तकनीकों को एक साथ इस्तेमाल करेगा। पहला पारंपरिक मेटल डिटेक्शन सिस्टम होगा और दूसरा ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार यानी जीपीआर या आईआर तकनीक होगी।

जीपीआर तकनीक जमीन के नीचे मौजूद वस्तु की पहचान उसके डाइइलेक्ट्रिक गुणों और डेंसिटी में बदलाव के आधार पर करती है। इससे यह पता लगाया जा सकता है कि मिट्टी के नीचे कोई संदिग्ध वस्तु दबाई गई है या नहीं।

यह तकनीक खासतौर पर उन इलाकों में उपयोगी होती है जहां दुश्मन कम मेटल वाले माइंस का इस्तेमाल करता है।

डीएमए की तरफ से जारी डॉक्यूमेंट में कहा गया है कि दोनों सब-सिस्टम स्वतंत्र रूप से भी काम कर सकेंगे और जरूरत पड़ने पर एक साथ भी इस्तेमाल किए जा सकेंगे। इससे ऑपरेटर अलग-अलग परिस्थितियों में यूज कर सकेगा।

एक ग्राम मेटल तक पहचानने की क्षमता

जीएसक्यूआर के मुताबिक यह सिस्टम जमीन में दबे ऐसे माइंस और आईईडी को पहचान सकेगा, जिनमें कम से कम एक ग्राम मेटल मौजूद हो।

डिवाइस को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वह रियल टाइम में खतरे की पहचान कर सके। दस्तावेज में छह सेंटीमीटर व्यास और चार सेंटीमीटर ऊंचाई वाले ऑब्जेक्ट को रेफरेंस के रूप में लिया गया है।

सूखे इलाके जैसे लेटराइट, मिट्टी और रेतीली जमीन में यह सिस्टम 12 सेंटीमीटर तक गहराई में दबे माइंस का पता लगा सकेगा। वहीं बर्फ, पानी या नमक वाली मिट्टी में भी इसकी क्षमता करीब 10 सेंटीमीटर तक रखी गई है।

सियाचिन से रेगिस्तान तक इस्तेमाल

भारतीय सेना को अलग-अलग मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों में ऑपरेशन करने पड़ते हैं। इसी वजह से नए सिस्टम को बेहद कठिन वातावरण के लिए डिजाइन किया गया है।

डॉक्यूमेंट के मुताबिक यह इक्विपमेंट माइनस 10 डिग्री सेल्सियस से लेकर 42 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में काम कर सकेगा। यानी इसे बर्फीले इलाकों से लेकर रेगिस्तान तक इस्तेमाल किया जा सकेगा।

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सिस्टम को इस तरह तैयार करने की शर्त रखी गई है कि सैनिक एनबीसी सूट या भारी सर्दियों के कपड़ों में भी इसे आसानी से चला सकें। इसे दोनों हाथों से इस्तेमाल करने की सुविधा भी होगी।

लंबे समय तक ऑपरेशन के दौरान सैनिकों को कम थकान हो, इसके लिए इसमें सपोर्ट हार्नेस और स्लिंग सिस्टम भी दिया जाएगा।

ऑडियो और विजुअल अलार्म की सुविधा

नए डिटेक्टर में दो तरह के अलार्म सिस्टम होंगे। पहला ऑडियो अलार्म और दूसरा विजुअल अलार्म।

अगर जमीन के नीचे कोई संदिग्ध वस्तु मिलती है तो सिस्टम आवाज और स्क्रीन दोनों के जरिए संकेत देगा। दोनों तकनीकों के लिए अलग-अलग तरह की ध्वनि रखी जाएगी ताकि ऑपरेटर आसानी से समझ सके कि किस सिस्टम ने खतरा पकड़ा है।

इसमें हेडफोन के साथ इनबिल्ट स्पीकर का विकल्प भी होगा। विजुअल डिस्प्ले को दिन और रात दोनों समय साफ दिखाई देने लायक बनाया जाएगा। (Dual Technology Mine Detector)

वजन कम रखने पर जोर

भारतीय सेना ने इस सिस्टम के वजन को लेकर भी साफ मानक तय किए हैं। ऑपरेशनल मोड में बैटरी सहित इसका वजन आठ किलो से ज्यादा नहीं होना चाहिए। रक्सैक सहित मैन पोर्टेबिलिटी मोड में वजन 12 किलो से कम रखना होगा। ट्रांसपोर्टेशन मोड में पूरा सिस्टम 20 किलो से अधिक नहीं होना चाहिए।

सूत्रों का कहना है कि भारतीय सैनिक पहले से ही हथियार, गोला-बारूद और दूसरे उपकरण लेकर चलते हैं। ऐसे में हल्का सिस्टम उनकी मोबिलिटी बढ़ाने में मदद करेगा।

कई पोजिशन में इस्तेमाल करने की सुविधा

जीएसक्यूआर में यह भी कहा गया है कि सैनिक इस उपकरण को खड़े होकर, घुटनों के बल या लेटकर भी आसानी से इस्तेमाल कर सकें।

इसके अलावा इसमें “सेलेक्टिव म्यूटिंग” की सुविधा भी होगी। यानी ऑपरेटर जरूरत पड़ने पर अनचाहे सिग्नल्स को बंद कर सकेगा।

ट्रेनिंग के लिए एक्सटर्नल स्पीकर जोड़ने का विकल्प भी दिया जाएगा ताकि जवानों को अभ्यास के दौरान अलार्म स्पष्ट सुनाई दे सके। (Dual Technology Mine Detector)

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बैटरी और फील्ड सपोर्ट पर फोकस

सिस्टम में कमर्शियली उपलब्ध रिचार्जेबल बैटरियों का इस्तेमाल किया जाएगा। सेना ने बैटरी बैकअप के लिए भी मानक तय किए हैं।

माइनस 10 डिग्री से लेकर 50 डिग्री तापमान तक यह कम से कम चार घंटे लगातार काम कर सके। वहीं सामान्य तापमान में आठ घंटे तक ऑपरेशन की क्षमता होनी चाहिए।

फील्ड में रखरखाव आसान बनाने के लिए इसमें बिल्ट-इन टेस्ट इक्विपमेंट यानी बीआईटीई सिस्टम भी होगा। इससे सैनिक मौके पर ही खराबी की पहचान कर सकेंगे। (Dual Technology Mine Detector)

बारिश और खराब मौसम में भी काम करेगा

भारतीय सेना चाहती है कि यह सिस्टम बारिश और खराब मौसम में भी प्रभावी तरीके से काम करे।

इसी वजह से इसे ऑल-वेदर ऑपरेशन के लिए डिजाइन किया गया है। हर यूनिट के साथ कैरींग केस और रक्सैक भी उपलब्ध कराए जाएंगे ताकि उपकरण को सुरक्षित तरीके से ले जाया जा सके।

बैटलफील्ड में इंजीनियरिंग यूनिट्स का सबसे महत्वपूर्ण काम सैनिकों और वाहनों के लिए सुरक्षित रास्ता तैयार करना होता है।

माइंस और आईईडी इस काम में सबसे बड़ा खतरा बनते हैं। कई बार सड़क, पुल या सीमावर्ती इलाकों में छिपाए गए विस्फोटक जवानों के लिए गंभीर खतरा पैदा करते हैं।

नया डुअल टेक्नोलॉजी माइन डिटेक्टर ऐसी परिस्थितियों में सैनिकों को तेजी से खतरे की पहचान करने में मदद करेगा। (Dual Technology Mine Detector)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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