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300 किमी तक हमला करने वाले सूर्यास्त्र का सफल ट्रायल, सेना को मिलेगी लंबी दूरी की स्ट्राइक पावर

ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना ने आकलन किया था कि पिनाका और गाइडेड पिनाका की रेंज 90 किमी तक है, इसके बाद एक गैप बन जाता है। वहीं लंबी रेंज के पिनाका आने में अभी लंबा वक्त है, जिसके बाद इस गैप को तुरंत भरने के लिए यूनिवर्सल मल्टी-कैलिबर रॉकेट लॉन्चर सिस्टम की जरूरत महसूस की गई...

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📍नई दिल्ली | 20 May, 2026, 11:49 AM

Suryastra Rocket System: भारत की निजी डिफेंस कंपनी नाइब लिमिटेड ने लंबी दूरी तक मार करने वाले अपने सूर्यास्त्र रॉकेट सिस्टम का सफल फायरिंग डेमो पूरा कर लिया है। ओडिशा के चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज (आईटीआर) में 18 और 19 मई को नाइब ने इन परीक्षणों को पूरा किया। इस दौरान 150 किलोमीटर और 300 किलोमीटर रेंज वाले रॉकेट दागे गए।

कंपनी के मुताबिक दोनों रॉकेट्स ने बेहद सटीकता के साथ टारगेट को हिट किया। 150 किलोमीटर रेंज वाले रॉकेट का सीईपी यानी सर्कुलर एरर प्रोबेबल 1.5 मीटर रहा, जबकि 300 किलोमीटर रेंज वाले रॉकेट का सीईपी 2 मीटर दर्ज किया गया। इतनी लंबी दूरी पर इतने कम सीईपी को किसी भी रॉकेट आर्टिलरी सिस्टम के लिए बड़ी उपलब्धि माना जाता है।

इन परीक्षणों को भारतीय सेना के इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट ऑर्डर का हिस्सा बताया जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि यह भारत के निजी रक्षा उद्योग के लिए बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि पहली बार किसी प्राइवेट कंपनी ने इतनी लंबी दूरी के प्रिसीजन रॉकेट सिस्टम का सफल प्रदर्शन किया है।

क्या है Suryastra Rocket System

सूर्यास्त्र भारत का स्वदेशी यूनिवर्सल मल्टी-कैलिबर रॉकेट लॉन्चर सिस्टम है। इसे नाइब लिमिटेड ने बनाया है। यह सिस्टम अलग-अलग तरह के रॉकेट दाग सकता है, और इसकी रेंज 30 किलोमीटर से लेकर 300 किलोमीटर तक बताई जा रही है।

सूर्यास्त्र को इजरायल के प्रसिद्ध पीयूएलएस यानी प्रिसाइज एंड यूनिवर्सल लॉन्चिंग सिस्टम तकनीक के आधार पर भारतीय जरूरतों के हिसाब से तैयार किया गया है। हालांकि कंपनी ने इसमें काफी हद तक भारतीय तकनीक और लोकल मैन्युफैक्चरिंग को शामिल किया है।

इस सिस्टम की सबसे बड़ी खासियत इसका मॉड्यूलर डिजाइन है। यानी एक ही लॉन्चर से अलग-अलग तरह के रॉकेट फायर किए जा सकते हैं।

‘शूट एंड स्कूट’ क्षमता

सूर्यास्त्र को आधुनिक युद्ध की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। यह एक हाई मोबिलिटी “शूट एंड स्कूट” सिस्टम है।

रॉकेट दागने के तुरंत बाद लॉन्चर अपनी जगह बदल सकता है। इससे दुश्मन के काउंटर अटैक से बचना आसान हो जाता है। आधुनिक युद्ध में यह क्षमता बेहद अहम मानी जाती है क्योंकि दुश्मन अक्सर रॉकेट लॉन्च होने के बाद उसकी लोकेशन ट्रैक करने की कोशिश करता है।

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चांदीपुर में क्यों हुए ट्रायल

इन परीक्षणों के लिए ओडिशा के चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज को चुना गया। यह डीआरडीओ का प्रमुख मिसाइल और रॉकेट परीक्षण केंद्र है।

यहीं पर अग्नि, ब्रह्मोस और पिनाका जैसे कई बड़े हथियार सिस्टम्स के परीक्षण किए जाते रहे हैं। समुद्र के किनारे होने की वजह से यहां लंबी दूरी के हथियारों का सुरक्षित परीक्षण संभव होता है।

सूत्रों के मुताबिक परीक्षण के दौरान रॉकेट्स ने तय टारगेट को बेहद कम त्रुटि के साथ हिट किया। यही वजह है कि इन ट्रायल्स को भारतीय प्रिसीजन स्ट्राइक क्षमता के लिए अहम माना जा रहा है।

कितना सटीक है सूर्यास्त्र

सूर्यास्त्र रॉकेट्स में जीपीएस और आईएनएस आधारित गाइडेंस सिस्टम का इस्तेमाल किया गया है। इसकी मदद से रॉकेट टारगेट तक पहुंचने के दौरान अपनी दिशा को लगातार सुधार सकता है।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक 300 किलोमीटर दूरी पर सिर्फ 2 मीटर का सीईपी हासिल करना बड़ी उपलब्धि माना जाता है। इसका मतलब है कि रॉकेट लगभग “पिन-पॉइंट एक्यूरेसी” के साथ टारगेट पर हमला कर सकता है।

यह क्षमता खासतौर पर दुश्मन के कमांड सेंटर, एयर डिफेंस सिस्टम, गोला-बारूद डिपो और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाने में उपयोगी मानी जाती है।

भारतीय सेना ने क्यों दिखाई दिलचस्पी

भारतीय सेना पिछले कुछ सालों से लंबी दूरी की प्रिसीजन स्ट्राइक क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रही है। चीन और पाकिस्तान दोनों के पास लंबी दूरी के रॉकेट और मिसाइल सिस्टम मौजूद हैं। ऐसे में भारतीय सेना भी ऐसे हथियार चाहती है जो दुश्मन के इलाके में अंदर तक हमला कर सकें।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना ने आकलन किया था कि पिनाका और गाइडेड पिनाका की रेंज 90 किमी तक है, इसके बाद एक गैप बन जाता है। वहीं लंबी रेंज के पिनाका आने में अभी लंबा वक्त है, जिसके बाद इस गैप को तुरंत भरने के लिए यूनिवर्सल मल्टी-कैलिबर रॉकेट लॉन्चर सिस्टम की जरूरत महसूस की गई।

सूत्रों के मुताबिक इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए जनवरी 2026 में सेना ने करीब 292.69 करोड़ रुपये का इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट कॉन्ट्रैक्ट दिया था। उसी ऑर्डर के तहत यह फायरिंग डेमोंस्ट्रेशन किया गया।

कैसे होते हैं इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट में ट्रायल

इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट (ईपी) का इस्तेमाल तब किया जाता है जब सेना को किसी नई क्षमता की तुरंत जरूरत होती है। सामान्य रक्षा खरीद प्रक्रिया में ट्रायल्स कई महीनों या कई बार सालों तक चलते हैं, लेकिन ईपी में इन्हें सीमित समय में पूरा किया जाता है ताकि हथियार जल्दी सेना तक पहुंच सके।

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सूत्रों के मुताबिक सूर्यास्त्र परियोजना भी इसी फास्ट ट्रैक प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाई गई। जनवरी 2026 में भारतीय सेना ने करीब 293 करोड़ रुपये का इमरजेंसी ऑर्डर जारी किया था। इसके बाद मई 2026 में सिर्फ दो दिनों के भीतर ओडिशा के आईटीआर चांदीपुर में 150 किलोमीटर और 300 किलोमीटर रेंज वाले रॉकेट्स के लाइव फायरिंग ट्रायल्स किए गए।

इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट में सबसे ज्यादा फोकस हथियार की जरूरी क्षमताओं को जल्दी परखने पर होता है। सूर्यास्त्र के मामले में भी सेना ने खास तौर पर सीईपी यानी निशाने की सटीकता, लॉन्च सिस्टम की परफॉर्मेंस और ऑपरेशनल क्षमता को परखा।

सूत्रों के मुताबिक सामान्य परिस्थितियों में किसी नए रॉकेट सिस्टम के ट्रायल्स रेगिस्तान, ऊंचाई वाले इलाके, अलग-अलग मौसम और कई चरणों में किए जाते हैं। लेकिन इमरजेंसी प्रक्रिया में “रिप्रेजेंटेटिव कंडीशंस” में सीमित लेकिन महत्वपूर्ण परीक्षण किए जाते हैं। यही वजह रही कि सूर्यास्त्र के ट्रायल्स चांदीपुर जैसी प्रमुख टेस्ट रेंज में कम समय में पूरे किए गए।

दाग सकता है अलग-अलग तरह के हथियार

सूर्यास्त्र केवल साधारण रॉकेट सिस्टम नहीं है। इसमें अलग-अलग प्रकार के हथियार इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

यह गाइडेड रॉकेट्स के अलावा लॉइटरिंग म्यूनिशन भी लॉन्च कर सकता है। लॉइटरिंग म्यूनिशन ऐसे ड्रोन जैसे हथियार होते हैं जो टारगेट के ऊपर कुछ समय तक मंडराने के बाद हमला करते हैं।

हालांकि भारत पहले से पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम इस्तेमाल कर रहा है। पिनाका की अलग-अलग वैरिएंट्स की रेंज 40 किलोमीटर से लेकर 90 किलोमीटर तक है।

हालांकि डीआरडीओ पिनाका के लंबी दूरी वाले वर्जन पर भी काम कर रहा है, लेकिन सूर्यास्त्र फिलहाल 300 किलोमीटर तक की क्षमता के साथ सामने आया है।

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सूत्रों का कहना है कि सूर्यास्त्र और पिनाका दोनों सिस्टम भारतीय सेना की अलग-अलग जरूरतों को पूरा कर सकते हैं।

इजरायल से लिया तकनीकी सहयोग

नाइब लिमिटेड ने 2025 में इजरायल की एल्बिट सिस्टम्स के साथ टेक्नोलॉजी कोलैबोरेशन एग्रीमेंट किया था।
इसी समझौते के तहत कंपनी को पीयूएलएस तकनीक तक पहुंच मिली। इसके बाद भारतीय जरूरतों के हिसाब से सूर्यास्त्र सिस्टम को डेवलप किया गया।

हालांकि कंपनी का कहना है कि उत्पादन का बड़ा हिस्सा भारत में किया जा रहा है और इसमें स्थानीय उद्योगों की भी भागीदारी है।

आधुनिक युद्ध में क्यों अहम हैं ऐसे सिस्टम

रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने दिखाया है कि लंबी दूरी के रॉकेट सिस्टम आधुनिक युद्ध में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

ऐसे हथियार दुश्मन की सप्लाई लाइन, कमांड पोस्ट और एयर डिफेंस सिस्टम को दूर से निशाना बना सकते हैं।

सूर्यास्त्र जैसे सिस्टम भारतीय सेना को “डीप स्ट्राइक” क्षमता देते हैं। यानी सीमा पार काफी अंदर तक मौजूद सैन्य ठिकानों को टारगेट किया जा सकता है।

नेटवर्क आधारित युद्ध के लिए तैयार

सूर्यास्त्र में एडवांस फायर कंट्रोल सिस्टम लगाया गया है। यह नेटवर्क-सेंट्रिक वारफेयर के लिए तैयार किया गया है।

यह सिस्टम दूसरे मिलिट्री प्लेटफॉर्म्स और कमांड नेटवर्क के साथ जुड़कर काम कर सकता है। इससे टारगेट की जानकारी तेजी से साझा की जा सकती है और हमला ज्यादा सटीक बनाया जा सकता है।

गणतंत्र दिवस पर भी दिखा था सूर्यास्त्र

सूर्यास्त्र सिस्टम को इस साल जयपुर में हुई सेना परेड और गणतंत्र दिवस परेड में भी प्रदर्शित किया गया था। उस दौरान इसे ब्रह्मोस जैसे बड़े हथियार सिस्टम्स के साथ दिखाया गया था।

इसके बाद से रक्षा क्षेत्र में इस सिस्टम को लेकर काफी चर्चा थी। अब सफल फायरिंग परीक्षण के बाद इसकी क्षमताओं को लेकर और ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है।

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