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ऑपरेशन सिंदूर के बाद बड़ा फैसला, थिएटराइजेशन से पहले भारतीय सेना और नौसेना के बीच जॉइंटनेस बढ़ाने को लेकर हुआ बड़ा समझौता

नई दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में भारतीय सेना की ओर से एडजुटेंट जनरल लेफ्टिनेंट जनरल वीपीएस कौशिक और भारतीय नौसेना की ओर से चीफ ऑफ पर्सनल वाइस एडमिरल गुरचरण सिंह ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए...

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📍नई दिल्ली | 14 May, 2026, 1:25 PM

Army-Navy MoA Agreement: भारतीय सेना और भारतीय नौसेना के बीच हाल ही में एक अहम समझौता हुआ है। नया “मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन ऑन अफिलिएशन” समझौता देश के मिलिट्री स्ट्रक्चर में बड़े बदलावों की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। इस समझौते के तहत सेना और नौसेना अब नियमित रूप से एक-दूसरे के साथ ट्रेनिंग, एक्सचेंज प्रोग्राम, ऑपरेशनल जानकारी और जॉइंट गतिविधियों में शामिल होंगी, ताकि भविष्य के मल्टी-डोमेन युद्धों में तेजी से और एकजुट होकर कार्रवाई की जा सके।

यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब भारत थिएटराइजेशन, जॉइंटनेस और इंटीग्रेटेड वॉरफेयर मॉडल की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। पिछले कुछ सालों में चीन और पाकिस्तान से जुड़े सुरक्षा खतरे, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती रणनीतिक चुनौतियां और ऑपरेशन सिंदूर जैसे सैन्य अभियानों ने यह दिखा दिया है कि भविष्य के युद्ध अब केवल जमीन, हवा या समुद्र तक सीमित नहीं रहेंगे।

Army Navy MoA Agreement: नई दिल्ली में हुआ समझौता

नई दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में भारतीय सेना की ओर से एडजुटेंट जनरल लेफ्टिनेंट जनरल वीपीएस कौशिक और भारतीय नौसेना की ओर से चीफ ऑफ पर्सनल वाइस एडमिरल गुरचरण सिंह ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस दौरान सेना के वाइस चीफ लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ और नौसेना के वाइस चीफ वाइस एडमिरल संजय वात्स्यायन भी मौजूद रहे।

इस समझौते का मकसद दोनों सेनाओं के बीच इंटर-सर्विस कोऑपरेशन और जॉइंटनेस को और मजबूत करना है। इसके तहत सेना की रेजिमेंट्स, नौसेना के जहाजों, ट्रेनिंग संस्थानों और मिलिट्री इंस्टॉलेशंस के बीच इंटीग्रेशन बढ़ाया जाएगा।

आसान शब्दों में समझें तो अब सेना और नौसेना की अलग-अलग यूनिट्स नियमित रूप से एक-दूसरे के साथ समय बिताएंगी, ट्रेनिंग करेंगी और ऑपरेशनल अनुभव साझा करेंगी। इससे दोनों सेनाओं के जवान और अधिकारी एक-दूसरे की कार्यप्रणाली और चुनौतियों को बेहतर तरीके से समझ सकेंगे।

सैन्य भाषा में अफिलिएशन का मतलब दो अलग सैन्य यूनिट्स के बीच औपचारिक संबंध बनाना होता है। उदाहरण के तौर पर सेना की किसी रेजिमेंट को नौसेना के किसी युद्धपोत या ट्रेनिंग संस्थान से जोड़ा जा सकता है। इसके बाद दोनों यूनिट्स के बीच रेगुलर विजिट, संयुक्त कार्यक्रम, खेल प्रतियोगिताएं, सेमिनार और ट्रेनिंग एक्सचेंज होते हैं। इसका मकसद ऑपरेशनल समझ और तालमेल को मजबूत करना होता है।

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हालांकि पहले भी भारतीय सेना और नौसेना की कुछ यूनिट्स के बीच ऐसे संबंध रहे हैं। उदाहरण के तौर पर आईएनएस तेग को सिख लाइट इन्फैंट्री से और आईएनएस सह्याद्री को पूना हॉर्स रेजिमेंट से जोड़ा गया था। लेकिन अब पहली बार पूरे स्तर पर एक औपचारिक नीति बनाई गई है, जिसके तहत भविष्य में होने वाले सभी अफिलिएशन को एक समान स्ट्रक्चर में लाया जाएगा।

क्यों जरूरी हो गया यह बदलाव

भारत का सुरक्षा माहौल तेजी से बदल रहा है। एक तरफ चीन सीमा पर दबाव बनाए हुए है, वहीं दूसरी तरफ हिंद महासागर क्षेत्र में भी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। इसके अलावा साइबर वॉरफेयर, ड्रोन अटैक, स्पेस टेक्नोलॉजी और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर जैसे नए खतरे भी सामने आ रहे हैं।

सूत्रों का कहना है कि भविष्य के युद्धों में केवल थलसेना या नौसेना अकेले काम नहीं कर सकतीं। अगर समुद्र में किसी सैन्य कार्रवाई की जरूरत पड़े तो नौसेना को सेना के साथ तालमेल बैठाना होगा। इसी तरह जमीन पर होने वाले बड़े ऑपरेशन में वायुसेना और नौसेना की भूमिका भी अहम होगी।

इसी वजह से भारत अब मल्टी-डोमेन ऑपरेशन मॉडल पर काम कर रहा है। इसमें जमीन, समुद्र, हवा, साइबर और स्पेस सभी क्षेत्रों में एक साथ कार्रवाई की जाती है।

इसके तहत आने वाले समय के सैन्य अभियानों में तेजी से फैसले लेना, अलग-अलग डोमेन्स के बीच कॉर्डिनेशन और इंटरऑपरेबल क्षमता बेहद जरूरी होगी। यही वजह है कि सेवाओं के बीच सहज तालमेल को मजबूत किया जा रहा है।

Army-Navy MoA Agreement

ऑपरेशन सिंदूर से मिली बड़ी सीख

इस समझौते के पीछे ऑपरेशन सिंदूर का अनुभव भी बड़ा कारण माना जा रहा है। मई 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान और पीओके में आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए थे।

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करीब 88 घंटे तक चले इस ऑपरेशन में भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना ने एक साथ मिलकर कार्रवाई की थी। सेना ने जमीन से प्रिसिजन फायर किए, वायुसेना ने लंबी दूरी की मिसाइलों और लड़ाकू विमानों से हमले किए, जबकि नौसेना ने अरब सागर में अपनी फॉरवर्ड तैनाती मजबूत की।

रक्षा अधिकारियों का कहना है कि इस ऑपरेशन ने यह साबित कर दिया कि जब तीनों सेनाएं एक साथ काम करती हैं तो ऑपरेशन की क्षमता कई गुना बढ़ जाती है।

सेना की तरफ से जारी आधिकारिक बयान में कहा गया है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तीनों सेनाओं एक साथ मिल कर कार्रवाई की और सफलता मिली। इसी अनुभव के आधार पर अब इंटर-सर्विस सहयोग को और संस्थागत रूप दिया जा रहा है। (Army-Navy MoA Agreement)

क्या यह थिएटराइजेशन की शुरुआत है?

सूत्रों के मुताबिक यह समझौता थिएटराइजेशन की शुरुआत नहीं है, लेकिन उसकी दिशा में एक अहम कदम जरूर माना जा रहा है।

थिएटराइजेशन भारतीय सेनाओं का सबसे बड़ा सैन्य सुधार कार्यक्रम माना जा रहा है। इसके तहत तीनों सेनाओं को अलग-अलग कमांड की बजाय इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड्स के तहत लाया जाएगा।

उदाहरण के तौर पर चीन सीमा के लिए अलग थिएटर कमांड, पाकिस्तान सीमा के लिए अलग और समुद्री क्षेत्र के लिए अलग कमांड बनाई जा सकती है। इनमें एक ही कमांडर के अधीन थलसेना, वायुसेना और नौसेना काम करेंगी।

इसका उद्देश्य कमांड चेन को छोटा करना, संसाधनों का बेहतर उपयोग करना और युद्ध के दौरान तेजी से फैसले लेना है।

सूत्रों के मुताबिक थिएटराइजेशन की योजना अब अंतिम चरण में पहुंच चुकी है और इस पर पिछले दिनों जयपुर में हुई जॉइंट कमांडर्स कॉन्फ्रेंस में भी इस पर चर्चा हुई थी। (Army-Navy MoA Agreement)

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जमीनी स्तर पर बढ़ेगा तालमेल

सेना और नौसेना के बीच हुए इस समझौते का सबसे बड़ा असर जमीनी स्तर पर दिखाई देगा। अब सेना और नौसेना की यूनिट्स के बीच नियमित संपर्क रहेगा। जवान और अधिकारी एक-दूसरे के बेस, जहाजों और ट्रेनिंग संस्थानों का दौरा करेंगे।

इससे भविष्य में संयुक्त ऑपरेशन के दौरान गलतफहमी और समन्वय की समस्या कम होगी। सैन्य योजनाओं और ऑपरेशनल जरूरतों को समझना आसान होगा।

दुनिया के कई बड़े देश पहले से इसी मॉडल पर काम कर रहे हैं। अमेरिका, ब्रिटेन और चीन जैसी सेनाएं लंबे समय से जॉइंट कमांड और इंटर-सर्विस इंटीग्रेशन पर जोर देती रही हैं। (Army-Navy MoA Agreement)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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