Is Pakistan Acquiring China’s LD-2000 Air Defence System After Operation Sindoor Airbase Strikes? (AI Image)
China LD-2000 Air Defence System: क्या पाकिस्तान वायुसेना चीन का एलडी-2000 नियर रेंज डिफेंस सिस्टम खरीदने की तैयारी कर रही है? हाल ही में पाकिस्तानी वायुसेना के इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस सिस्टम के एक आधिकारिक इन्फोग्राफिक में एलडी-2000 जैसा सिस्टम दिखाई दिया। हालांकि पाकिस्तान ने अभी तक इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की है, लेकिन ओपन सोर्स इंटेलिजेंस और कई मिलिट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि पाकिस्तान अपनी एयर वॉरफेयर रणनीति में बदलाव कर कर रहा है।
दरअसल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जिस तरह से भारतीय ब्रह्मोस मिसाइलों ने पकिस्तान के एयरबेस, रडार स्टेशन और कमांड सेंटर को निशाना बनाया था, उसके बाद से पाकिस्तान अपने एसेट्स की सुरक्षा को लेकर गंभीर हो गया है।
China LD-2000 Air Defence System: पाकिस्तान के इन्फोग्राफिक से खुला राज
हाल ही में पाकिस्तान वायुसेना द्वारा जारी एक इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस सिस्टम इन्फोग्राफिक में एक मोबाइल गन आधारित एयर डिफेंस सिस्टम दिखाई दिया। जो चीन के एलडी-2000 क्लोज-इन वेपन सिस्टम (सीआईडब्ल्यूएस) से काफी मिलता-जुलता था।
जिसके बाद बाद दावे किए जाने लगे कि यह सिस्टम चीनी नौसेना के टाइप-730 गैटलिंग गन पर आधारित एलडी-2000 हो सकता है। हालांकि पाकिस्तान एयर फोर्स या पाकिस्तान सरकार की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।
इसके बावजूद इस तस्वीर को गंभीरता से लिया जा रहा है क्योंकि मिलिट्री इन्फोग्राफिक्स में आमतौर पर उन्हीं प्लेटफॉर्मों को दिखाया जाता है जो किसी न किसी रूप में डिफेंस प्रोजेक्ट, मूल्यांकन या भविष्य के फॉरमेशंस का हिस्सा हों। (China LD-2000 Air Defence System)
China LD-2000 Air Defence System
क्या है एलडी-2000 सिस्टम?
एलडी-2000 चीन का बनाया एक नियर रेंज एयर डिफेंस सिस्टम है। इसे क्लोज-इन वेपन सिस्टम यानी सीआईडब्ल्यूएसक्लास में रखा जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य दुश्मन के उन हवाई खतरों को नष्ट करना है जो अंतिम चरण में टारगेट के बेहद करीब पहुंच चुके हों।
यह सिस्टम चीनी नौसेना के प्रसिद्ध टाइप-730 सात बैरल गैटलिंग गन सिस्टम के लैंड वर्जन के तौर पर देखा जाता है। इसमें 30 मिमी की सात बैरल वाली गैटलिंग गन लगाई जाती है, जो अत्यधिक तेज रफ्तार से फायरिंग कर सकती है।
इसका फायरिंग रेट लगभग 5,600 राउंड प्रति मिनट तक पहुंच सकता है। (China LD-2000 Air Defence System)
ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशंस को रोकेगा
एलडी-2000 को खास तौर पर कम ऊंचाई पर उड़ने वाले खतरों के खिलाफ बनाया गया है। इसमें क्रूज मिसाइल, ड्रोन, कामिकाजे ड्रोन, लॉइटरिंग म्यूनिशन, स्मार्ट वेपन और तेज गति वाले मानवरहित प्लेटफॉर्म (यूएवी) शामिल हैं।
आधुनिक युद्ध में कई हथियार रडार से बचते हुए बहुत कम ऊंचाई पर उड़ान भरते हैं। ऐसे टारगेट्स को इंटरसेप्ट करना अक्सर मुश्किल होता है। एलडी-2000 जैसे सिस्टम इन्हीं खतरों के खिलाफ अंतिम सुरक्षा घेरा बनाते हैं।
इसी कारण इसे “टर्मिनल डिफेंस सिस्टम” भी कहा जाता है। जब लंबी और मध्यम दूरी की एयर डिफेंस लेयर किसी खतरे को रोकने में विफल रहती है, तब एलडी-2000 जैसे सिस्टम एक्टिव हो जाते हैं। (China LD-2000 Air Defence System)
China LD-2000 Air Defence System
कैसे काम करता है यह सिस्टम?
एलडी-2000 केवल एक गन नहीं बल्कि खुद में एक पूरा एयर डिफेंस प्लेटफॉर्म है। इसमें आधुनिक रडार, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर और फायर कंट्रोल सिस्टम लगे होते हैं।
जब कोई टारगेट इसकी जद आता है तो रडार उसकी स्थिति, गति और दिशा का पता लगाता है। इसके बाद फायर कंट्रोल कंप्यूटर टारगेट की संभावित फ्लाइट डायरेक्शन की गणना करता है।
जैसे ही टारगेट प्रभावी मारक दूरी में आता है, गैटलिंग गन कुछ सेकंड के भीतर सैकड़ों गोलियां दाग सकती है। इसका उद्देश्य टारगेट को पूरी तरह नष्ट करना या उसे उसके मिशन को पूरा करने से पहले उसे निशाना बनाना होता है। (China LD-2000 Air Defence System)
China LD-2000 Air Defence System
एयरबेस की सुरक्षा बनी टेंशन
ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस मिसाइलोंने पााकिस्तान के कई एयरबेसों पर कहर बरपाया था और रनवे को निशाना बनाया था। इनमें पाकिस्तान के कई स्ट्रेटेजिक एयरबेस जिनमें इस्लामाबाद से करीब 10 किमी दूर नूर खान (रावलपिंडी/चकलाला), भोलारी, ड्रोन बेस मुरीद एयरबेस (चकवाल), जैकोबाबाद (शाहबाज), मुशफ (सरगोधा), रहीम यार खान और सुक्कुर शामिल थे। वहीं, जैकोबाबाद के एफ-16 हैंगर का एक हिस्से को नुकसान पहुंचा था, और कम से कम दो कमांड-कंट्रोल सेंटर भी क्षतिग्रस्त हुए थे।
आधुनिक युद्ध में एयरबेस किसी भी वायुसेना की रीढ़ होते हैं। अगर रनवे, हैंगर, ईंधन भंडार, हथियार डिपो या कमांड सेंटर क्षतिग्रस्त हो जाएं तो अत्याधुनिक फाइटर जेट भी प्रभावी ढंग से ऑपरेशन नहीं कर पाते।
किसी भी बड़े संघर्ष में एयरबेस और मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर शुरुआती टारगेट्स होते हैं। इसी वजह से कई देश अब मल्टी-लेयर एयर डिफेंस नेटवर्क डेवलप कर रहे हैं। इसमें लंबी दूरी की मिसाइलें, मध्यम दूरी के डिफेंस सिस्टम्स और टर्मिनल फेज गन बेस्ड सिस्टम्स शामिल होते हैं। एलडी-2000 को भी इसी अंतिम सुरक्षा परत का हिस्सा माना जा रहा है।
बता दें कि पाकिस्तान पहले से ही चीन के जेएफ-17 थंडर, जे-10सी फाइटर जेट, एचक्यू-9बीई लंबी दूरी के एयर डिफेंस सिस्टम और एलवाई-80 मध्यम दूरी का मिसाइल सिस्टम का इस्तेमाल कर रहा है। इन सिस्टम्स को पाकिस्तान के इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस नेटवर्क की रीढ़ माना जाता है। (China LD-2000 Air Defence System)
China LD-2000 Air Defence System
ब्रह्मोस को रोकना नामुमकिन
सूत्रों के मुताबिक, एलडी-2000 की प्रभावी रेंज लगभग 2.5 से 3.5 किलोमीटर तक होती है और यह एयर डिफेंस की आखिरी सुरक्षा परत (लास्ट-डिच लेयर) के रूप में काम करता है। यह सिस्टम सबसोनिक ड्रोन, कम ऊंचाई पर उड़ने वाली क्रूज मिसाइलों और रॉकेट तथा मोर्टार जैसे खतरों के खिलाफ तो कारगर है। लेकिन ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों के मामले में यह फेल है। ऐसी मिसाइलें लंबी दूरी से लॉन्च होकर तेज रफ्तार से टारगेट की ओर बढ़ती हैं, जिसके चलते उन्हें रोकने के लिए पूरा समय नहीं मिल पाता।
सूत्रों का कहना है कि गन बेस्ड सीआईडब्ल्यूएस (क्लोज-इन वेपन सिस्टम) रनवे को नुकसान पहुंचाने वाले हमलों या दूर से किए गए स्टैंडऑफ अटैक को नहीं रोक सकती। इसका मुख्य उद्देश्य केवल उस मिसाइल, ड्रोन या गोला-बारूद को मार गिराने की कोशिश करना होता है जो पहले ही एयरबेस के ऊपर या उसके बेहद करीब पहुंच चुका हो। (China LD-2000 Air Defence System)
DRDO Moves Ahead With Indigenous 30kW Laser Weapon System To Counter Drones And UAV Swarms. (AI Image)
DRDO 30kW Laser Weapon System: भारत अब अपने सबसे शक्तिशाली स्वदेशी लेजर हथियार को प्रोडक्शन फेज में ले जाने की तैयारी कर रहा है। डीआरडीओ की हैदराबाद स्थित प्रयोगशाला सेंटर फॉर हाई एनर्जी सिस्टम्स एंड साइंसेज (सीएचईएस) ने 30 किलोवॉट क्षमता वाले काउंटर-ड्रोन डायरेक्टेड एनर्जी वेपन (डीईडब्ल्यू) के लिए स्पेक्ट्रल बीम कंबाइंड (एसबीसी) लेजर सिस्टम के डेवलपमेंट और इंटीग्रेशन के लिए इंडस्ट्री से प्रस्ताव मांगे हैं। यह सिस्टम मुख्य रूप से ड्रोन, ड्रोन स्वार्म, फिक्स्ड-विंग यूएवी और दुश्मन के सर्विलांस सेंसर को नष्ट करने के लिए विकसित किया गया है।
यह ट्रक पर लगाया जाने वाला हाई-पावर लेजर सिस्टम है, जो लगभग 5 किलोमीटर तक की दूरी पर हवाई खतरों को निशाना बना सकता है। अगस्त 2025 में इसके अंतिम ट्रायल्स पूरे हो चुके हैं।
DRDO 30kW Laser Weapon System: क्या है नया लेजर प्रोजेक्ट?
डीआरडीओचाहता है कि भारतीय इंडस्ट्री पूरा सिस्टम खुद डिजाइन करे, बनाए, टेस्ट करे और सभी हिस्सों को एक साथ इंटीग्रेट करे। इस सिस्टम में हाई-पावर लेजर सोर्स, बीम डिलीवरी सिस्टम, कमांड एंड कंट्रोल मॉड्यूल, मैकेनिकल स्ट्रक्चर और टेस्टिंग फैसिलिटी शामिल होंगी।
मुख्य लक्ष्य ऐसा स्वदेशी लेजर सिस्टम तैयार करना है जो बहुत ज्यादा एनर्जी वाली एक सिंगल लेजर बीम पैदा कर सके और उसे बेहद सटीक तरीके से लक्ष्य पर फोकस कर सके।
कैसे काम करेगी यह तकनीक?
इस प्रोजेक्ट की सबसे खास तकनीक है स्पेक्ट्रल बीम कंबाइनिंग (एसबीसी)। आम तौर पर एक अकेले फाइबर लेजर की पावर सीमित होती है। लेकिन एसबीसी तकनीक में कई छोटे और बेहद सटीक फाइबर लेजर चैनलों को एक साथ जोड़कर एक शक्तिशाली लेजर बीम बनाई जाती है।
डीआरडीओ की योजना के अनुसार सिस्टम में लगभग 30 नैरो-लाइनविड्थ फाइबर लेजर चैनल होंगे। इन सभी चैनलों को विशेष डिफ्रैक्शन ग्रेटिंग की मदद से जोड़ा जाएगा। जब सभी चैनलों की एनर्जी एक साथ मिलती है तो एक हाई-पावर लेजर बीम तैयार होती है।
इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि पावर बढ़ने के बावजूद बीम की क्वालिटी खराब नहीं होती। इसका मतलब है कि लंबी दूरी पर भी टारगेट तक पर्याप्त एनर्जी पहुंचाई जा सकती है।
स्पेक्ट्रल बीम कंबाइनिंग आधुनिक लेजर तकनीक की सबसे एडवांस सिस्टम्स में से एक मानी जाती है। इसमें कई छोटे लेकिन बेहद सटीक फाइबर लेजर चैनलों को एक साथ जोड़कर एक ताकतवर बीम बनाई जाती है। (DRDO 30kW Laser Weapon System)
India’s Laser Power Unleashed!
DRDO successfully tests the Mk-II(A) Laser-Directed Energy Weapon (DEW) at Kurnool, disabling drones & enemy sensors with light-speed precision.
India now joins the elite club of nations with this futuristic tech!#LaserWeapon#DirectedEnergyWeapon… pic.twitter.com/ye5oVPqrQe
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) April 13, 2025
क्या है बीम डायरेक्टर?
लेजर सिस्टमका सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा केवल लेजर सोर्स नहीं बल्कि बीम डायरेक्टर भी होता है। लेजर सोर्स एनर्जी पैदा करता है, लेकिन उस एनर्जी को सही टारगेट तक पहुंचाने का काम बीम डायरेक्टर करता है। यह ऑप्टिकल और मैकेनिकल सिस्टम का एक कॉम्बिनेशन होता है जो लेजर किरण को अत्यधिक सटीकता के साथ लक्ष्य की ओर गाइड करता है।
हाई-पावर लेजर सिस्टम में बहुत छोटी गलती भी टारगेट को मिस कर सकती है। इसी कारण डीआरडीओ ने इस प्रोजेक्ट में सिक्स-एक्सिस हेक्सापॉड, इलेक्ट्रॉनिक ऑटोकॉलिमेटर और इंटरफेरोमीटर जैसे हाई-प्रिसिजन उपकरणों की मांग की है।
इन उपकरणों की मदद से लेजर बीम को लगातार सही दिशा में रखा जा सकेगा और उसकी सटीकता बनी रहेगी।
गर्मी को कंट्रोल करना सबसे बड़ी चुनौती
30 किलोवाट कैटेगरी का लेजर सिस्टम बहुत अधिक एनर्जी पैदा करता है। इसके साथ बड़ी मात्रा में गर्मी भी उत्पन्न होती है। अगर इस गर्मी को कंट्रोल नहीं किया जाए तो ऑप्टिकल सिस्टम को नुकसान पहुंच सकता है और लेजर की कार्यक्षमता कम हो सकती है। इसी वजह से डीआरडीओ ने इस प्रोजेक्ट में एडवांस्ड कूलिंग सिस्टम को जरूरी बनाया है। (DRDO 30kW Laser Weapon System)
ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी जरूरत
मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान दोनों देशों ने बड़ी संख्या में ड्रोन का इस्तेमाल किया था। वहीं, पाकिस्तान ने कम लागत वाले ड्रोन का उपयोग भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम की लोकेशन पता लगाने और महंगे इंटरसेप्टर मिसाइलों को खर्च करवाने के लिए किया।
छोटे और कम लागत वाले ड्रोन एयरबेस, रडार स्टेशन, कमांड सेंटर और महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों के लिए गंभीर खतरा बन सकते हैं। ऐसे ड्रोनों को पारंपरिक मिसाइलों से मार गिराना अक्सर महंगा साबित होता है। कई बार जिस ड्रोन की कीमत लाखों रुपये होती है, उसे गिराने के लिए करोड़ों रुपये की मिसाइल खर्च करनी पड़ती है।
डायरेक्टेड एनर्जी वेपन ऐसे हथियार होते हैं जो बारूद या मिसाइल की जगह अत्यधिक शक्तिशाली लेजर बीम या माइक्रोवेव एनर्जी का इस्तेमाल करते हैं। जब तक एनर्जी उपलब्ध है, सिस्टम बार-बार फायर कर सकता है।
जब लेजर बीम किसी ड्रोन या एरियल टारगेट पर फोकस की जाती है तो वह उसके मोटर, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर या अन्य महत्वपूर्ण हिस्सों को नुकसान पहुंचा सकती है। इससे लक्ष्य काम करना बंद कर देता है या पूरी तरह नष्ट हो जाता है।
लेजर बीम लगभग प्रकाश की गति से टारगेट तक पहुंचती है, जिससे प्रतिक्रिया समय बेहद कम हो जाता है और ड्रोन जैसे तेज लक्ष्यों को निशाना बनाना आसान हो जाता है। (DRDO 30kW Laser Weapon System)
एयर डिफेंस में कैसे काम करेगा?
आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम “ओओडीए लूप” पर आधारित होते हैं। इसका मतलब है ऑब्जर्व, ओरिएंट, डिसाइड और एक्ट। सबसे पहले रडार, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर, इन्फ्रारेड सिस्टम और अन्य निगरानी उपकरण हवाई क्षेत्र पर नजर रखते हैं। इसके बाद कंप्यूटर और ऑपरेटर यह पहचानते हैं कि कौन-सा टारगेट फ्रेंडली है और कौन-सा एनिमी।
जब खतरे की पहचान हो जाती है तो सिस्टम तय करता है कि किस हथियार का इस्तेमाल करना है। इसी चरण में हाई-एनर्जी लेजर एक विकल्प के रूप में सामने आता है। पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य टारगेट की पहचान और प्रतिक्रिया के बीच का समय न्यूनतम रखना होता है। (DRDO 30kW Laser Weapon System)
2 से 10 किलोवाट कैटेगरी के लेजर सिस्टम तैयार
भारत पिछले कई सालों से डायरेक्टेड एनर्जी वेपन तकनीक पर काम कर रहा है। डीआरडीओ पहले ही 2 किलोवाट और 10 किलोवाट कैटेगरी के लेजर सिस्टम तैयार कर चुका है।
इसके बाद अप्रैल 2025 में आंध्र प्रदेश के कुरनूल स्थित नेशनल ओपन एयर रेंज में वाहन पर लगे मल्टी-किलोवाट लेजर सिस्टम का सफल प्रदर्शन किया गया था।
इस परीक्षण के दौरान फिक्स्ड-विंग ड्रोन, स्वॉर्म ड्रोन और निगरानी उपकरणों को सफलतापूर्वक निष्क्रिय किया गया था।
अभी तक हाई-पावर लेजर तकनीक वर्तमान में दुनिया के चुनिंदा देशों के पास है। अमेरिका, चीन और कुछ अन्य देशों ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति की है। नया 30 किलोवाट एसबीसी लेजर प्रोग्राम इसी क्षमता को अगले स्तर तक ले जाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। (DRDO 30kW Laser Weapon System)
Pakistan Tests Rocket Mine Dispensing System To Counter India’s Cold Start Strategy And IBGs. (AI Image)
Pakistan Rocket Mine Dispensing System: सितंबर के आखिरी सप्ताह में पाकिस्तान आर्मी ने एक ऐसे हथियार सिस्टम का लाइव फायर टेस्ट किया, जो वाकई चौंकाने वाला है। इस सिस्टम का नाम है रॉकेट माइन डिस्पेंसिंग सिस्टम (आरएमडीएस)। इस सिस्टम के जरिए पाकिस्तान की सेना रॉकेटों के जरिए दूर बैठे-बैठे बड़े इलाके में माइंस बिखेरने की तैयारी कर रही है। पाकिस्तान ने अरब सागर के किनारे बलूचिस्तान तट पर फायरिंग एक्सरसाइज के दौरान 25-26 सितंबर को इस सिस्टम का टेस्ट किया।
Pakistan Rocket Mine Dispensing System: मई 2026 में पहली बार दिखाया गया था सिस्टम
यह कोई पारंपरिक माइनबिछाने वाला सिस्टम नहीं है। इसकी खूबी यह है कि सैनिकों को सीमा के पास जाकर जमीन में माइंस लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। इसके बजाय रॉकेट कई किलोमीटर दूर से दागे जाते हैं और टारगेट एरिया के ऊपर पहुंचकर दर्जनों माइंस फैला देते हैं। पाकिस्तान ने इसे अपनी नई “डायनामिक एरिया डिनायल” क्षमता के तौर डेवलप कर रहा है।
पाकिस्तान आर्मी ने मई 2026 में इस सिस्टम को पहली बार सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया था। उस समय इसे अन्य स्वदेशी हथियार प्रणालियों के साथ दिखाया गया था। हालांकि सितंबर 2026 में पहली बार इसका लाइव फायर टेस्ट सामने आया।
यह सिस्टम पाकिस्तान की आर्मी रॉकेट फोर्सकमांड के तहत रॉकेट आर्टिलरी प्लेटफॉर्म के साथ काम करता है। इसमें 122 मिमी और 300 मिमी मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है।
122 मिमी रॉकेट घजब और आजर प्रकार के लॉन्चरों से दागे जाते हैं, जबकि 300 मिमी रॉकेट ए-100ई और फतह-1 फैमिली के लॉन्चरों से छोड़े जाते हैं। यह सिस्टम एक साथ छह राकेट फायर कर सकता है, जिनके वॉरहेड्स में प्लास्टिक माइंस भरी होती हैं, ताकि मैग्नेट से भी इन्हें खोजा नहीं जा सके।
पाकिस्तान का कहना है कि इस सिस्टम को पूरी तरह से पाकिस्तान के अंदर ‘डायरेक्टरेट जनरल ऑफ़ डिफेंस डिज़ाइन एंड डेवलपमेंट’ (DGRDE) की देखरेख में डिजाइन और डेवलप किया गया था। यह सिस्टम मिलिट्री व्हीकल (शाहीन 6×6) पर लगाया गया है, जिसे रेगिस्तान और पहाड़ी इलाकों जैसे मुश्किल माहौल में तेजी से चलने-फिरने के लिए खास तौर पर डिजाइन किया गया है।
रॉकेट से माइन डिस्पेंसिंग
आम तौर पर माइनफील्ड बनाने के लिए इंजीनियर यूनिट्स को जमीन पर जाकर माइंस बिछानी पड़ती हैं। यह प्रक्रिया समय लेने वाली होती है और दुश्मन की फायरिंग के बीच काफी जोखिम भरी भी हो सकती है।
रॉकेट माइन डिस्पेंसिंग सिस्टम में कार्गो रॉकेट टारगेट एरिया तक पहुंचने के बाद हवा में खुल जाते हैं और अपने अंदर मौजूद माइंस को बड़े इलाके में बिखेर देते हैं।
ये माइंस जमीन पर गिरने के बाद एक्टिव हो जाती हैं। इनमें लगे मैग्नेटिक सेंसर किसी टैंक, बख्तरबंद वाहन या भारी सैन्य प्लेटफॉर्म की धातु को पहचान सकते हैं। जैसे ही कोई व्हीकल इनके पास में आता है, माइन एक्टिव हो सकती है।
122 मिमी रॉकेट अपेक्षाकृत कम दूरी पर बड़े क्षेत्र को कवर करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। वहीं 300 मिमी रॉकेट ज्यादा दूरी तक अधिक संख्या में माइंस पहुंचाने में सक्षम होते हैं। इन माइंस की रेंज 15 से 20 किलोमीटर तक हो सकती है। (Pakistan Rocket Mine Dispensing System)
चीन से आई है यह तकनीक
हालांकि पाकिस्तान इसे अपनी उपलब्धि के रूप में पेश कर रहा है, लेकिन असल में यह तकनीक चीन से मिली है।
122 मिमी घजब और आजर सिस्टम मूल रूप से सोवियत बीएम-21 ग्रैडरॉकेट सिस्टम के लोकल वर्जन हैं। पाकिस्तान ऑर्डनेंस फैक्ट्रीज इनके लिए यरमुक रॉकेट तैयार करती है।
दूसरी ओर 300 मिमी ए-100ई सिस्टम को चीन की डिफेंस कंपनियों ने बनाया था। चीन ने लगभग 2015 के आसपास पाकिस्तान को ये लॉन्चर दिए थे। 2019 में पाकिस्तान ने इसे “स्वदेशी” बताकर शामिल किया, लेकिन यह लाइसेंस के तहत स्थानीय उत्पादन या रॉकेट का स्थानीय संस्करण है।
वहीं, स्कैटरेबल माइन तकनीक भी चीनी टाइप-84 एंटी-टैंक माइन सिस्टम से जुड़ी हुई है। चीन लंबे समय से ऐसे रॉकेटों का इस्तेमाल कर रहा है जो हवा में जाकर माइंस बिखेर सकते हैं। चीन का टाइप-84 स्कैटरेबल एंटी-टैंक माइन ठीक इसी तरह 122 मिमी रॉकेट से दागा जाता है। हर रॉकेट में 6 से 8 माइंस होती हैं और मैग्नेटिक फ्यूज वाला वर्जन भी मौजूद है। यही सिस्टम पाकिस्तान ने अपने 122 मिमी और 300 मिमी लॉन्चरों पर लगाया है।
पाकिस्तान ने भी इस तकनीक को अपने मौजूदा रॉकेट लॉन्चरों के साथ जोड़कर इसका इस्तेमाल करना शुरू किया है। (Pakistan Rocket Mine Dispensing System)
क्या होता है “डायनामिक एरिया डिनायल”?
सैन्य भाषा में एरिया डिनायल का मतलब होता है किसी इलाके को दुश्मन के लिए असुरक्षित बना देना ताकि वह वहां आसानी से आगे न बढ़ सके।
पहले यह काम स्थायी माइनफील्ड, खाइयों और अन्य बाधाओं के जरिए किया जाता था। पाकिस्तान लंबे समय से सीमा क्षेत्रों में डिट्च-कम-बंड जैसी डिफेंसिव फॉरमेशंस पर निर्भर रहा है।
लेकिन डायनामिक एरिया डिनायल का मतलब है कि जरूरत पड़ने पर किसी भी समय और किसी भी स्थान पर नई बाधा खड़ी कर दी जाए।
रॉकेट माइन डिस्पेंसिंग सिस्टम इसी कॉन्सैप्ट पर आधारित है। अगर किसी इलाके में आर्मर्ड टुकड़ी आगे बढ़ रही हो तो उसके पीछे या आसपास अचानक माइनफील्ड बनाया जा सकता है।
इससे रफ्तार धीमी पड़ सकती है और उसकी सप्लाई लाइन प्रभावित हो सकती है। (Pakistan Rocket Mine Dispensing System)
कोल्ड स्टार्ट रणनीति में सीमित समय में तेजी से सैन्य कार्रवाई की जाती है। इसके तहत अग्रिम मोर्चे पर मौजूद सैन्य बल कम समय में जवाबी कार्रवाई कर सकते हैं।
वहीं, आईबीजी भी इसी सोच का हिस्सा माने जाते हैं। आईबीजी छोटी लेकिन अत्यधिक मोबाइल कॉम्बैट ग्रुप होते हैं, जिनमें टैंक, मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री, आर्टिलरी और इंजीनियरिंग रिसोर्सेज शामिल होते हैं।
पाकिस्तान का सोचना है कि अगर ऐसे कॉम्बैट ग्रुप तेजी से आगे बढ़ते हैं तो उनके पीछे के ब्रिजहेड, सप्लाई कॉरिडोर और रसद मार्गों पर माइंस बिखेरकर उनकी रफ्तार को धीमा किया जा सकता है। (Pakistan Rocket Mine Dispensing System)
बढ़ जाता है जोखिम
यदि किसी मिलिट्री ऑपरेशन के दौरान पीछे के इलाकों में अचानक माइनफील्ड बन जाएं तो केवल आगे चल रहे टैंक ही प्रभावित नहीं होते, बल्कि ईंधन, गोला-बारूद और अन्य रसद ले जाने वाले वाहन भी प्रभावित हो सकते हैं।
इस स्थिति में इंजीनियर यूनिट्स को कई स्थानों पर एक साथ माइन क्लियरेंस करनी पड़ सकती है। इससे रफ्तार में 24 से 48 घंटे की देरी हो सकती है। इतने समय में पाकिस्तान अपनी रिजर्व फोर्स लाकर जवाबी हमला कर सकता है।
बता दें कि भारतीय सेना पहले से ही माइन प्लॉ, माइन रोलर, लाइन चार्ज सिस्टम और विशेष इंजीनियरिंग व्हीकल्स का इस्तेमाल करती है। इसके अलावा ड्रोन बेस्ड माइन डिटेक्शन और आधुनिक सर्विलांस सिस्टम्स पर भी काम चल रहा है। (Pakistan Rocket Mine Dispensing System)
गलत दिशा में गिर सकती हैं माइंस
रॉकेट माइन डिस्पेंसिंग सिस्टम का सबसे बड़ा फायदा इसकी रफ्तार है। कुछ मिनटों में कई किलोमीटर लंबे इलाके में माइंस बिखेरी जा सकती हैं।
दूसरा फायदा यह है कि सैनिकों को दुश्मन के करीब जाने की जरूरत नहीं पड़ती। पूरा काम सुरक्षित दूरी से किया जा सकता है।
तीसरा फायदा यह है कि रियल टाइम खुफिया जानकारी के आधार पर किसी भी इलाके को तत्काल माइनफील्ड में बदला जा सकता है।
हालांकि इसकी कुछ सीमाएं भी हैं। स्कैटरेबल माइंस हमेशा एक समान तरीके से जमीन पर नहीं गिरतीं। कुछ माइंस गलत दिशा में गिर सकती हैं या पूरी तरह प्रभावी स्थिति में नहीं पहुंच पातीं। वहीं, अगर माइंस में भरोसेमंद सेल्फ-डिस्ट्रक्ट मैकेनिज्म नहीं है तो लंबे समय तक इलाके को प्रभावित कर सकती हैं।
मौसम, मिट्टी और घने पेड़-पौधे या नरम जमीन माइन की कार्यक्षमता कम कर सकते हैं। इसके अलावा रॉकेट दागने वाले लॉन्चर दुश्मन की काउंटर-बैटरी फायर का निशाना भी बन सकते हैं। (Pakistan Rocket Mine Dispensing System)
आर्मी रॉकेट फोर्स कमांड की ताकत बढ़ा रहा है पाकिस्तान
पाकिस्तान लगातार अपनी आर्मी रॉकेट फोर्स कमांड को मजबूत कर रहा है। इस कमांड का उद्देश्य लंबी दूरी की पारंपरिक फायरपावर को इंटीग्रेट करना है।
फतह सीरीज के गाइडेड रॉकेट, लंबी दूरी की मारक क्षमता और अब माइन डिस्पेंसिंग सिस्टम को एक साथ जोड़कर पाकिस्तान अपनी काउंटर-मोबिलिटी क्षमता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
पहले जहां माइंस मुख्य रूप से इंजीनियर यूनिट्स की जिम्मेदारी मानी जाती थीं, वहीं अब यह क्षमता सीधे आर्टिलरी और रॉकेट फोर्स के हाथ में भी आ गई है। (Pakistan Rocket Mine Dispensing System)
Gliders India Launches Indigenous G-11 Heavy Drop Platform Project For Air Dropping Up To 19 Tons From C-130J And C-17 Aircraft. (AI Image)
G-11 Heavy Drop Platform: सीमावर्ती क्षेत्रों, ऊंचे पर्वतीय इलाकों और युद्धक्षेत्रों में भारी सैन्य सामग्री की रैपिड सप्लाई के लिए ग्लाइडर्स इंडिया लिमिटेड (जीआईएल) ने स्वदेशी जी-11 हेवी ड्रॉप प्लेटफॉर्म प्रोजेक्ट शुरू किया है। इस प्रोजेक्ट से भारतीय वायुसेना की स्ट्रेटेजिक एयरड्रॉप क्षमता को और मजबूती मिलेगी।
इस अत्याधुनिक प्लेटफॉर्म से सी-130जे सुपर हरक्यूलिस और सी-17 ग्लोबमास्टर-III जैसे ट्रांसपोर्ट विमानों से करीब 19 टन तक के भारी सैन्य उपकरण, वाहन, इंजीनियरिंग स्टोर, गोला-बारूद और लॉजिस्टिक सामग्री को पैराशूट के जरिए दुर्गम इलाकों में सुरक्षित उतारा जा सकेगा। कानपुर स्थित ऑर्डनेंस पैराशूट फैक्ट्री ने इस प्रोजेक्ट के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट जारी किया है।
G-11 Heavy Drop Platform: सैन्य एयरड्रॉप सिस्टम का प्रमुख हिस्सा
जी-11 प्लेटफॉर्म एक विशेष सैन्य एयरड्रॉप सिस्टम का मुख्य स्ट्रक्चरल हिस्सा है। इसे डीआरडीओ की आगरा स्थित एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट (ADRDE) की बनाई तकनीक के आधार पर तैयार किया जा रहा है।
जब किसी सैन्य अभियान, आपदा राहत मिशन या दुर्गम क्षेत्र में भारी सामान पहुंचाने की जरूरत होती है, तब इस प्लेटफॉर्म पर मिलिट्री इक्विपमेंट को सुरक्षित तरीके से बांधा जाता है। इसके बाद प्लेटफॉर्म को ट्रांसपोर्ट विमान में लोड किया जाता है और निर्धारित स्थान पर पैराशूट के जरिए नीचे उतारा जाता है।
इस प्रक्रिया में प्लेटफॉर्म को विमान से बाहर निकालने, हवा में स्थिर रखने और जमीन पर सुरक्षित लैंडिंग तक पूरे भार को संभालना पड़ता है। यही वजह है कि इसकी डिजाइन और स्ट्रक्चरल मजबूती बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
19,050 किलोग्राम तक भार ले जाने की क्षमता
जीआईएल का कहना है कि जी-11 सिस्टम का ऑल-अप मास (एयूएम) अधिकतम 19,050 किलोग्राम तक होगा। इसका मतलब है कि लगभग 19 टन तक का सैन्य सामान एक बार में एयरड्रॉप किया जा सकेगा।
इस सिस्टम को भारतीय वायुसेना के दो प्रमुख सामरिक परिवहन विमानों सी-130जे सुपर हरक्यूलिस और सी-17 ग्लोबमास्टर-III के साथ जोड़ा जाएगा।
प्लेटफॉर्म छह अलग-अलग लंबाई में उपलब्ध रहेगा। इनमें 12 फुट, 16 फुट, 20 फुट, 24 फुट, 28 फुट और 32 फुट के विकल्प शामिल हैं। अलग-अलग आकार के सैन्य उपकरण और वाहनों के अनुसार उपयुक्त प्लेटफॉर्म चुना जा सकेगा। (G-11 Heavy Drop Platform)
पैराशूट सिस्टम की भी खास भूमिका
हेवी ड्रॉप मिशन में केवल प्लेटफॉर्म ही नहीं, बल्कि पैराशूट सिस्टम भी बेहद महत्वपूर्ण होता है। जी-11 सिस्टम में 100 फुट व्यास वाले मुख्य पैराशूट का इस्तेमाल किया जाएगा। जरूरत के अनुसार एक से लेकर आठ कैनोपी तक का क्लस्टर इस्तेमाल किया जा सकता है।
विमान से प्लेटफॉर्म को बाहर निकालने के लिए एक्सट्रैक्टर पैराशूट लगाए जाएंगे। इनके आकार 15 फुट, 22 फुट और 28 फुट व्यास के होंगे।
एयरड्रॉप के दौरान विमान की गति 140 से 145 नॉट इंडिकेटेड एयर स्पीड (आईएएस) रखी जाएगी। इस स्पीड पर प्लेटफॉर्म को नियंत्रित तरीके से बाहर निकालकर सुरक्षित लैंडिंग सुनिश्चित की जाती है। (G-11 Heavy Drop Platform)
कैसे काम करता है हेवी ड्रॉप सिस्टम?
लो-वेलोसिटी एयरड्रॉप तकनीक में सबसे पहले एक्सट्रैक्टर पैराशूट खुलता है। यह पैराशूट विमान के कार्गो कम्पार्टमेंट से पूरे प्लेटफॉर्म को बाहर खींचता है।
जैसे ही प्लेटफॉर्म विमान से अलग होता है, मुख्य पैराशूट खुल जाते हैं। इसके बाद हैवी लोड नियंत्रित गति से जमीन की ओर उतरता है।
इस पूरी प्रक्रिया में प्लेटफॉर्म को कई प्रकार के लोड और झटकों का सामना करना पड़ता है। इसलिए उसकी डिजाइन में स्ट्रक्चरल स्ट्रेंथ, बैलेंसिंग, शॉक एब्जॉर्प्शन और लोड डिस्ट्रिब्यूशन का विशेष ध्यान रखा जाता है। (G-11 Heavy Drop Platform)
भारतीय वायुसेना के लिए क्यों अहम है यह प्रोजेक्ट?
भारतीय वायुसेना के सी-130जे और सी-17 विमान देश की स्ट्रेटेजिक एयरलिफ्ट क्षमता की रीढ़ माने जाते हैं।
सी-130जे का इस्तेमाल छोटे रनवे, पहाड़ी इलाकों और अग्रिम मोर्चों तक सैन्य सामग्री पहुंचाने के लिए किया जाता है। वहीं सी-17 लंबी दूरी तक भारी सैन्य उपकरण और वाहन ले जाने में सक्षम है।
ऐसे क्षेत्रों में जहां सड़क संपर्क नहीं होता या आपात स्थिति में रैपिड सप्लाई की जरूरत होती है, वहां एयरड्रॉप सिस्टम बेहद उपयोगी साबित होता है। इसी वजह से स्वदेशी हेवी ड्रॉप प्लेटफॉर्म का विकास रक्षा क्षेत्र में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। (G-11 Heavy Drop Platform)
डीआरडीओ पहले भी कर चुका है सफल परीक्षण
डीआरडीओ की एडीआरडीई प्रयोगशाला पहले ही हेवी ड्रॉप सिस्टम के कई परीक्षण कर चुकी है। दिसंबर 2023 में सी-17 ग्लोबमास्टर विमान से लगभग 16 टन वजन वाले 24 फुट लंबे प्लेटफॉर्म का सफल एयरड्रॉप परीक्षण किया गया था।
इन परीक्षणों में सिस्टम की स्ट्रक्चरल मजबूती, पैराशूट प्रदर्शन और सुरक्षित लैंडिंग क्षमता का मूल्यांकन किया गया था। क्वालिफिकेशन प्रक्रिया में सिमिलैक द्वारा निर्धारित मानकों की भी जांच की गई थी।
कानपुर स्थित ऑर्डनेंस पैराशूट फैक्ट्री के पास देश में पैराशूट निर्माण का लंबा अनुभव है। साल 1941 से यह फैक्ट्री विभिन्न प्रकार के सैन्य पैराशूट तैयार करती रही है।
2021 में ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड के कॉरपोरेट पुनर्गठन के बाद यह ग्लाइडर्स इंडिया लिमिटेड का हिस्सा बनी। कंपनी वर्तमान में पायलट पैराशूट, ब्रेक पैराशूट, सप्लाई ड्रॉप सिस्टम, कॉम्बैट पैराशूट और हेवी ड्रॉप पैराशूट का निर्माण करती है।
हाल के सालों में कंपनी ने डीआरडीओ के साथ मिलकर पी-7 हेवी ड्रॉप सिस्टम, एडीसी-150 एयरड्रॉपेबल कंटेनर और मिलिट्री कॉम्बैट पैराशूट सिस्टम जैसी प्रोजेक्ट्स पर भी काम किया है। (G-11 Heavy Drop Platform)
China Unveils 70mm Rocket-Based Anti-Drone System With 40km Radar Detection Range. (AI Image)
China Anti-Drone System: आधुनिक युद्ध में ड्रोन सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व के संघर्ष और हाल के कई सैन्य अभियानों ने दिखाया है कि छोटे और सस्ते ड्रोन भी बड़े सैन्य ठिकानों, एयर डिफेंस सिस्टम और महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसी चुनौती से निपटने के लिए चीन की कंपनी कांगशुओ इलेक्ट्रिक ग्रुप ने एक नया 70 मिमी मिसाइल आधारित एंटी-ड्रोन सिस्टम पेश किया है।
यह सिस्टम सितंबर 2026 में बीजिंग में आयोजित चाइना इंटरनेशनल डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स एग्जीबिशन (सीआईडीईएक्स-2026) में प्रदर्शित किया गया। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह महंगी एयर डिफेंस मिसाइलों की जगह कम लागत वाले 70 मिमी (2.75 इंच) रॉकेट का इस्तेमाल करके ड्रोन और ड्रोन स्वार्म को निशाना बनाने के लिए डिजाइन किया गया है।
China Anti-Drone System: डोंगफेंग मेंगशी 6×6 चेसिस पर आधारित है पूरा सिस्टम
कांगशुओ इलेक्ट्रिक ग्रुप का यह सिस्टम पूरी तरह मोबाइल है। इसे चीन के डोंगफेंग मेंगशी 6×6 हाई-मोबिलिटी ऑफ-रोड चेसिस पर तैयार किया गया है।
सिस्टम में चार अलग-अलग व्हीकल शामिल हैं। इनमें कमांड व्हीकल, लॉन्च व्हीकल, एम्युनिशन सप्लाई व्हीकल और सपोर्ट व्हीकल शामिल हैं।
कमांड व्हीकल पूरे सिस्टम का कंट्रोल सेंटर है। लॉन्च व्हीकल रॉकेट दागने का काम करता है। सप्लाई व्हीकल अतिरिक्त मिसाइल और रॉकेट लेकर चलता है, जबकि सपोर्ट व्हीकल तकनीकी मदद और मेंटेनेंस के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
कंपनी के मुताबिक यह सिस्टम काफी हद तक ऑटोमेटेड है और जरूरत पड़ने पर सीमित मानवीय हस्तक्षेप के साथ काम कर सकता है। (China Anti-Drone System)
40 किलोमीटर दूर से खोज सकता है टारगेट
इस सिस्टम की सबसे महत्वपूर्ण खूबियों में इसका रडार नेटवर्क शामिल है। कमांड व्हीकल पर लगाया गया सर्च रडार लगभग 40 किलोमीटर तक टारगेट का पता लगाने का दावा करता है। इसका इस्तेमाल शुरुआती चेतावनी और टारगेट की पहचान के लिए किया जाता है।
इसके अलावा लॉन्च व्हीकल पर भी एक अलग फेज्ड एरे रडार लगाया गया है, जिसकी डिटेक्शन रेंज लगभग 20 किलोमीटर बताई गई है। यह रडार टारगेट को ट्रैक करता है और आखिरी चरण में रॉकेट को टारगेट की ओर गाइड करने में मदद करता है।
दो अलग-अलग रडार का इस्तेमाल सिस्टम को एक क्लोज्ड लूप एयर डिफेंस प्लेटफॉर्म बनाता है। जिससे टारगेट की पहचान से लेकर हमला करने तक की पूरी प्रक्रिया एक ही नेटवर्क के भीतर पूरी की जा सकती है।
लॉन्चर में 30 रॉकेट तक ले जाने की क्षमता
एंटी-ड्रोन सिस्टम का लॉन्च व्हीकल एक बार में लगभग 24 से 30 रॉकेट ले जा सकता है। कंपनी का दावा है कि सिस्टम एक साथ कई टारगेटों के खिलाफ काम कर सकता है।
वहीं, इसकी अधिकतम कॉम्बैट रेंज लगभग 6 किलोमीटर है। वहीं अधिकतम कॉम्बैट ऊंचाई 4.5 किलोमीटर है।
यह ऊंचाई और दूरी छोटे तथा मध्यम आकार के अधिकांश मिलिट्री ड्रोन, सर्विलांस यूएवी और लॉइटरिंग म्यूनिशन को निशाना बनाने के लिए काफी मानी जाती है। (China Anti-Drone System)
China Kangshuo Electric Group recently revealed a concept of an on-board anti-drone system, with 70mm missiles as the main means of interception.
दो तरह के 70 मिमी रॉकेट
इस सिस्टम में इस्तेमाल होने वाले 70 मिमीरॉकेट दो अलग-अलग कॉन्फिगरेशन में उपलब्ध हैं। पहला वर्जन लेजर गाइडेड रॉकेट है। इसका इस्तेमाल उन टारगेट्स के खिलाफ किया जा सकता है जो घातक हों या तेज रफ्तार से उड़ रहे हों। लेजर गाइडेंस टारगेट पर अधिक सटीक हमला करने में मदद करती है।
दूसरा वर्जन प्रोग्रामेबल टाइमिंग फ्यूज वाला रॉकेट है। इसे एक निश्चित दूरी या समय पर हवा में फटने के लिए सेट किया जा सकता है।
इस तकनीक का इस्तेमाल विशेष रूप से ड्रोन स्वार्म के खिलाफ किया जाता है। जब रॉकेट टारगेट के पास पहुंचता है तो वह हवा में विस्फोट करता है और बड़ी संख्या में मेटल के टुकड़े फैलाता है। (China Anti-Drone System)
1,920 धातु के टुकड़ों से है बना
हर 70 मिमी रॉकेट में लगभग 1,920 प्री-फॉर्म्ड फ्रैगमेंट यानी पहले से तैयार मेटल के टुकड़े लगाए गए हैं।
रॉकेट के विस्फोट के बाद ये टुकड़े तेज गति से चारों ओर फैलते हैं। कंपनी का दावा है कि इनकी प्रभावी किल रेडियस 15 मीटर तक है।
इसका मतलब है कि ड्रोन को सीधे हिट करना जरूरी नहीं है। यदि रॉकेट टारगेट के पास फटता है तो उसके टुकड़े ड्रोन के मोटर, सेंसर, पंख या कंट्रोल सिस्टम को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
एंटी-ड्रोन ऑपरेशंस में यह तरीका काफी प्रभावी माना जाता है क्योंकि छोटे ड्रोन का साइज बहुत कम होता है और उन्हें सीधे मारना हमेशा आसान नहीं होता। (China Anti-Drone System)
महंगी मिसाइलों का सस्ता विकल्प
हाल के सालों में दुनिया भर की सेनाओं को एक बड़ी समस्या का सामना करना पड़ा है। कई बार कुछ हजार डॉलर की कीमत वाला ड्रोन गिराने के लिए लाखों डॉलर की एयर डिफेंस मिसाइल दागनी पड़ती है।
यही वजह है कि अमेरिका, यूरोप, चीन और अन्य देश कम लागत वाले इंटरसेप्टर हथियारों पर काम कर रहे हैं।
वहीं, 70 मिमी (2.75 इंच) कैलिबर का रॉकेट कोई नई तकनीक नहीं है। यह पुराने हाइड्रा और एफएफएआर (फोल्डिंग-फिन एरियल रॉकेट) परिवार का हिस्सा है।
अमेरिका ने इसी रॉकेट में एपीकेडब्ल्यूएस हाइड्रा 70 मिमी (एडवांस्ड प्रिसिजन किल वेपन सिस्टम) किट जोड़कर इसे सटीक निशाना लगाने वाला लेजर गाइडेड रॉकेट बना दिया। इसकी एक रॉकेट की कीमत लगभग 15,000 से 20,000 डॉलर होती है, जो पैट्रियट जैसी महंगी एयर डिफेंस मिसाइलों की तुलना में काफी कम है। इस सिस्टम का इस्तेमाल लाल सागर क्षेत्र में हूती ड्रोन को मार गिराने में भी किया गया है।
साल 2026 में फ्रांस की कंपनी थेल्स ने एलजीआर-275 प्रॉक्सी नाम का नया वर्जन पेश किया है, जिसमें लेजर गाइडेंस के साथ प्रॉक्सिमिटी सेंसर भी लगाया गया है। इससे रॉकेट टारगेट के बिल्कुल पास पहुंचते ही फट सकता है। वहीं, ताइवान भी 70 मिमी रॉकेट पॉड और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल डायरेक्टर आधारित अपने सिस्टम पर काम कर रहा है।
चीन का नया सिस्टम भी इसी कॉन्सैप्ट पर है, लेकिन उसने इसे सिर्फ रॉकेट तक सीमित नहीं रखा। चीन ने पूरे सिस्टम को ग्राउंड-बेस्ड एयर डिफेंस बैटरी के तौर पर डेवलप किया है, जिसे मेंगशी सैन्य वाहन पर लगाया गया है। (China Anti-Drone System)
मोबाइल एयर डिफेंस पर चीन का जोर
चीन पहले से कई मोबाइल एयर डिफेंस सिस्टम ऑपरेट करता है। इनमें एफबी-10ए एयर डिफेंस मिसाइल, एसडब्ल्यूएस-3 गन और मिसाइल सिस्टम, ओडब्ल्यू-5/गुआंगजियान लेजर हथियार और यहां तक कि लीजियान पोर्टेबल लेजर सिस्टम भी शामिल हैं।
नया 70 मिमी एंटी-ड्रोन सिस्टम विशेष रूप से फील्ड फोर्सेज, सैन्य काफिलों और महत्वपूर्ण ठिकानों की सुरक्षा के लिए तैयार किया गया है। डोंगफेंग मेंगशी 6×6 चेसिस कठिन इलाकों में भी तेजी से तैनाती की जा सकती है।
वहीं, 70 मिमी रॉकेट सिस्टम को सबसे निचली और सबसे सस्ती डिफेंस लेयर माना जा रहा है। इसका उद्देश्य छोटे और कम कीमत वाले ड्रोन को महंगी मिसाइलों से नहीं, बल्कि कम लागत वाले रॉकेट से नष्ट करना है। चीन की यह रणनीति “चिड़िया को तोप से नहीं, रॉकेट से मारने” जैसी है, ताकि दुश्मन के सस्ते ड्रोन को गिराने में अत्यधिक महंगे हथियारों का इस्तेमाल न करना पड़े। (China Anti-Drone System)
200 years of Gunners Day 2026: From Kargil to Operation Sindoor, How Indian Artillery Evolved Into a High-Tech Precision Strike Force. (AI Image)
Indian Artillery Gunners Day 2026: भारत की सैन्य ताकत की बात होती है तो अक्सर फाइटर जेट, टैंक और मिसाइलों का जिक्र होता है। लेकिन युद्ध के मैदान में एक ऐसी ताकत भी है जो दुश्मन को दिखाई दिए बिना उसके ठिकानों पर सटीक हमला करती है। यह ताकत है भारतीय सेना की रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी, जिसे आम भाषा में तोपखाना कहा जाता है। आर्टिलरी को गॉड ऑफ वॉर” भी कहा जाता है। 28 सितंबर को भारतीय सेना का तोपखाना अपना 200वां गनर्स डे मना रहा है। यह सिर्फ एक सैन्य परंपरा का दिन नहीं, बल्कि दो सदियों की उस विरासत का प्रतीक है जिसने भारत के लगभग हर बड़े सैन्य अभियान में अहम भूमिका निभाई है।
हाल के सालों में कारगिल युद्ध और ऑपरेशन सिंदूर में आर्टिलरी ने एक बार फिर दिखाया है कि आधुनिक युद्ध में आर्टिलरी की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है। आज आर्टिलरी सिर्फ भारी तोपों तक सीमित नहीं है। यह ड्रोन, रडार, सैटेलाइट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और प्रिसिजन गाइडेड गोला-बारूद से जुड़ा एक हाई-टेक नेटवर्क बन चुकी है।
Indian Artillery Gunners Day 2026: 28 सितंबर आर्टिलरी के लिए क्यों है खास?
भारतीय सेना में हर साल 28 सितंबर को गनर्स डे मनाया जाता है। इसी दिन साल 1827 में 5 (बॉम्बे) माउंटेन बैटरी का गठन किया गया था। इसे भारतीय आर्टिलरी की आधुनिक परंपरा की शुरुआत माना जाता है।
उस समय इस यूनिट के पास 2.5 इंच की माउंटेन गन थीं। पहाड़ी इलाकों में इन्हें जानवरों की मदद से ले जाया जाता था। यही यूनिट आगे चलकर भारतीय तोपखाने की ऐतिहासिक पहचान का आधार बनी। साल 2026 और भी विशेष है क्योंकि यह उस ऐतिहासिक स्थापना की 200वीं वर्षगांठ है।
भारत में तोपखाने का इतिहास 1827 से भी पुराना
हालांकि आधुनिक आर्टिलरी की परंपरा 1827 से जुड़ी है, लेकिन भारत में तोपों का इस्तेमाल इससे कई सदियों पहले शुरू हो चुका था।
दक्कन के बहमनी शासकों ने युद्ध में बारूद आधारित तोपों का इस्तेमाल किया था। इसके बाद मुगल साम्राज्य ने तोपखाने को अपनी सैन्य रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया। मराठा सेना, हैदर अली और टीपू सुल्तान की सेनाओं तथा महाराजा रणजीत सिंह की फौजों ने भी तोपखाने को मजबूत किया।
उस दौर की तोपें भारी होती थीं और उनकी मारक क्षमता सीमित थी। फिर भी उन्होंने युद्ध की रणनीति बदली क्योंकि पहली बार सैनिक दूर बैठकर दुश्मन पर हमला कर सकते थे। (Indian Artillery Gunners Day 2026)
ब्रिटिश काल में बदला तोपखाने का स्वरूप
ब्रिटिश शासन के दौरान तोपखाने का संगठन और अधिक व्यवस्थित हुआ। अलग-अलग तरह की आर्टिलरी यूनिट बनाई गईं, जिनमें फील्ड आर्टिलरी और माउंटेन आर्टिलरी प्रमुख थीं।
1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश प्रशासन ने भारतीय सैनिकों की आर्टिलरी यूनिट्स पर कई प्रतिबंध लगाए। इसके बावजूद पहाड़ी इलाकों में कुछ आर्टिलरी युनिट्स काम करती रहीं।
20वीं सदी में परिस्थितियां बदलीं और भारतीय सैनिकों की भागीदारी बढ़ी। नई ट्रेनिंग व्यवस्था विकसित हुई, आधुनिक हथियार आए और आर्टिलरी सेना की बड़ी फॉरमेशन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई। (Indian Artillery Gunners Day 2026)
💥 Raksha Samachar extends warm greetings on the 200th Gunners’ Day! 🇮🇳
Today, we salute the brave men and women of the Regiment of Artillery, whose precision, professionalism and firepower have been at the heart of countless battlefield successes.
From traditional artillery guns… pic.twitter.com/YO2KUiVoef
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) September 28, 2026
भारतीय सेना में रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी
इन्फैंट्री की तरह इसमें पंजाब रेजिमेंट, सिख रेजिमेंट या गोरखा रेजिमेंट जैसी अलग-अलग रेजिमेंटल पहचान नहीं होती। पूरी शाखा को सामूहिक रूप से रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी कहा जाता है। इसकी कॉम्बैट युनिट्स को भी “रेजिमेंट” कहा जाता है, जो साइज में लगभग एक बटालियन के बराबर होती हैं और आमतौर पर 18 तोपों या लॉन्चरों से लैस रहती हैं।
वर्तमान समय में भारतीय सेना के पास करीब 220 से 230 आर्टिलरी रेजिमेंट हैं। इनमें फील्ड रेजिमेंट, मीडियम रेजिमेंट, सेल्फ-प्रोपेल्ड रेजिमेंट, लाइट रेजिमेंट, रॉकेट रेजिमेंट, मिसाइल रेजिमेंट, सर्विलांस एंड टारगेट एक्विजिशन (SATA) रेजिमेंट और पैराशूट फील्ड रेजिमेंट शामिल हैं।
फील्ड और मीडियम रेजिमेंट पारंपरिक तोपखाने की रीढ़ मानी जाती हैं। इनमें 105 मिमी और 155 मिमी कैलिबर की तोपें शामिल हैं। इनमें मीडियम रेजिमेंट्स में तैनात एम777 अल्ट्रा लाइट हॉवित्जर भी शामिल हैं, जो विशेष रूप से पर्वतीय इलाकों के लिए हैं। इसका वजन कम होने के कारण इसे हेलीकॉप्टर से भी ले जाया जा सकता है। वहीं, फील्ड रेजिमेंट्स में सारंग और धनुष तोपें तैनात हैं।
धनुष तोप बोफोर्स तकनीक पर आधारित स्वदेशी सिस्टम है। इसकी मारक क्षमता पुरानी तोपों की तुलना में अधिक है।
वहीं, सारंग आर्टिलरी सिस्टम पुराने प्लेटफॉर्म का आधुनिक संस्करण है, जिसे अपग्रेड कर लंबी दूरी तक फायरिंग के लिए तैयार किया गया है।
जबकि सेल्फ-प्रोपेल्ड रेजिमेंट में 155 मिमी होवित्जर के-9 वज्रजैसी आधुनिक ट्रैक्ड गन सिस्टम तैनात हैं। रॉकेट रेजिमेंट लंबी दूरी तक भारी फायरपावर देने के लिए बनाई गई हैं, जबकि मिसाइल रेजिमेंट ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक मिसाइलों को ऑपरेट करती हैं।
रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी में सबसे पुरानी 5 (बॉम्बे) माउंटेन बैटरी है, इसके अलावा 2 (देराजत) माउंटेन बैटरी और 4 (हजारा) माउंटेन बैटरी भी भारतीय तोपखाने की सबसे पुरानी युनिट्स में शामिल हैं।
आधुनिक भारतीय आर्टिलरी ने 1965, 1971, में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 40 फील्ड रेजिमेंट को 1965 के असल उत्तर युद्ध के लिए जाना जाता है, जबकि 108 फील्ड रेजिमेंट ने कारगिल संघर्ष में अहम योगदान दिया था।
इसी रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है पिनाकामल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम। पिनाका को डीआरडीओ ने बनाया है और यह भारतीय सेना की रॉकेट आर्टिलरी क्षमता का प्रमुख आधार बन चुका है। यह पारंपरिक तोपों से अलग एक रॉकेट आर्टिलरी सिस्टम है, जिसे विशेष रूप से रॉकेट रेजिमेंट्स में तैनात किया जाता है।
पिनाका का मुख्य उद्देश्य दुश्मन के बड़े इलाके में एक साथ भारी फायरपावर पहुंचाना है। इसे सैन्य भाषा में एरिया सैचुरेशन कहा जाता है। यह कम समय में बड़ी संख्या में रॉकेट दागकर दुश्मन के ठिकानों, कमांड पोस्ट, सैन्य जमावड़ों और लॉजिस्टिक केंद्रों को निशाना बना सकता है।
पिनाका के कई संस्करण सेवा में हैं। इनमें पिनाका एमके-1 और गाइडेड पिनाका प्रमुख हैं। गाइडेड पिनाका में बेहतर नेविगेशन और लक्ष्य भेदन क्षमता दी गई है, जिससे इसकी सटीकता और मारक दूरी दोनों बढ़ी हैं। यह सिस्टम भारतीय सेना को लंबी दूरी से तेज और प्रभावी फायर सपोर्ट उपलब्ध कराता है।
कारगिल युद्ध में दिखी आर्टिलरी की ताकत
भारतीय आर्टिलरी का मूल मंत्र है “सर्वत्र इज्जत-ओ-इकबाल”। इसका अर्थ है “हर जगह सम्मान और गौरव”।
1999 का कारगिल युद्ध भारतीय आर्टिलरी के इतिहास का सबसे चर्चित अध्याय माना जाता है।
पाकिस्तानी घुसपैठियों और सैनिकों ने ऊंची पहाड़ियों पर कब्जा कर लिया था। ऐसे में भारतीय सेना के लिए सीधी लड़ाई बेहद कठिन थी। इस दौरान बोफोर्स एफएच-77बी 155 मिमी होवित्जर ने निर्णायक भूमिका निभाई।
भारतीय तोपों ने दुश्मन की चौकियों, बंकरों और सप्लाई रूट्स को लगातार निशाना बनाया। कठिन पहाड़ी इलाकों में की गई इस फायरिंग ने जमीनी सैनिकों के लिए रास्ता तैयार किया।
उस दौरान आर्टिलरी का खौफ इतना जबरदस्त था कि पहाड़ों पर पाकिस्तानी चिल्लाते थे– हमें बचाओ, हमारे ऊपर कहर टूट पड़ा है। वो इतने डरे हुए थे कि अपनी पोजिशन छोड़ना ही बेहतर समझते थे।
खुद प्रसिद्ध पाकिस्तानी पत्रकार और लेखिका नसीम जेहरा ने अपनी पुस्तक फ्रॉम कारगिल टू द कूप में लिखा है कि भारतीय बोफोर्स तोपों ने युद्ध में निर्णायक भूमिका निभाई थी। उनके अनुसार, भारतीय आर्टिलरी की लगातार गोलाबारी के चलते पाकिस्तानी ठिकानों पर भारी दबाव बना। ऊंचाई पर स्थित पोस्ट लगातार निशाने पर रहीं, सप्लाई लाइनें प्रभावित हुईं और सैनिकों का मनोबल भी कमजोर पड़ा। उन्होंने माना कि भारतीय तोपखाने ने युद्ध का रुख बदलने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
(Indian Artillery Gunners Day 2026)
विदेशों में भी हुई स्टडी
कारगिल युद्ध में भारतीय आर्टिलरी (तोपखाना) की भूमिका का अध्ययन विदेशों में भी किया गया। कई विदेशी सैन्य विशेषज्ञों, शोध संस्थानों और विश्लेषकों ने भी इसे पहाड़ी युद्ध (माउंटेन वॉरफेयर) का महत्वपूर्ण उदाहरण माना है। अमेरिकी सेना और डिफेंस टेक्निकल इन्फॉर्मेशन सेंटर (DTIC) से जुड़े कुछ रिसर्च पेपर्स में कारगिल युद्ध का जिक्र किया गया है। इन रिपोर्टों का निष्कर्ष था कि ऊंचे और कठिन इलाकों में दुश्मन के मजबूत ठिकानों को नष्ट करने के लिए फील्ड आर्टिलरी बेहद महत्वपूर्ण होती है। शोधकर्ताओं ने कारगिल युद्ध की तुलना सोवियत संघ के अफगानिस्तान अभियान और बाद में अमेरिका के अफगानिस्तान अभियानों से भी की।
कारगिल युद्ध के अनुभवों के आधार पर भारत ने फील्ड आर्टिलरी रेशनलाइजेशन प्लान (FARP) शुरू किया। इसके तहत 155 मिमी कैलिबर को भारतीय सेना की स्टैंडर्ड आर्टिलरी सिस्टम बनाने का फैसला लिया गया।
ऑपरेशन सिंदूर में भी महत्वपूर्ण रही भूमिका
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना की आर्टिलरी ने ऐसी भूमिका निभाई, जिसकी चर्चा अपेक्षाकृत कम हुई, लेकिन अभियान की सफलता में उसका योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा। पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में भारतीय सेनाओं ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में मौजूद आतंकी ढांचों को निशाना बनाया।
इस संयुक्त अभियान में कुल 9 आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई की गई। इनमें से दो बड़े और अंदर स्थित ठिकाने, मुरिदके में लश्कर-ए-तैयबा का मुख्यालय और बहावलपुर में जैश-ए-मोहम्मद का मुख्यालय, भारतीय वायुसेना ने निशाना बनाए। बाकी सात ठिकानों को भारतीय सेना के जिम्मे सौंपा गया, जहां आर्टिलरी ने सटीक प्रिसिजन स्ट्राइक कर उन्हें तबाह किया। ये लक्ष्य मुख्य रूप से नियंत्रण रेखा (एलओसी) से 6 से 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित थे।
अभियान के दौरान सेना की एयर डिफेंस युनिट्स ने पूरे ऑपरेशन को सुरक्षा कवच प्रदान किया, जबकि आर्टिलरी ने मुख्य फायरपावर की जिम्मेदारी संभाली। इस मिशन में आधुनिक एम-777 अल्ट्रा-लाइट हॉवित्जर तोपों का इस्तेमाल किया गया, जिनसे एम-982 एक्सकैलिबरप्रिसिजन-गाइडेड गोले दागे गए। इन गोलों की मारक क्षमता लगभग 40 किलोमीटर है और ये टारगेट को लगभग 2 मीटर की सटीकता से भेद सकते हैं। इसके अलावा बोफोर्स एफएच-77 और सोल्तम तोपों का भी इस्तेमाल किया गया।
ऑपरेशन में ड्रोन का इस्तेमाल निगरानी, टागरेट की पहचान और फायर डायरेक्शन के लिए भी किया गया। इससे गन पोजिशन ऑफिसर्स को वास्तविक समय में जानकारी मिलती रही और टारगेट पर सटीक फायर संभव हो सका।
ऑपरेशन सिंदूर में 302 मीडियम रेजिमेंट ने भी इतिहास रचा। पहली बार इस रेजिमेंट की एम-777 तोपों को हेलीकॉप्टरों के जरिए एयर मोबिलाइज किया गया। चिनूक और एमआई-17 हेलीकॉप्टरों की मदद से इन तोपों को तेजी से नॉर्दर्न कमांड के ऑपरेशनल क्षेत्र में पहुंचाया गया। इस तैनाती और नेतृत्व के लिए रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल कोशांक लांबा को वीर चक्र से भी सम्मानित किया गया।
कार्रवाई के बाद पाकिस्तान की ओर से हुई गोलाबारी का जवाब भी भारतीय आर्टिलरी ने प्रभावी तरीके से दिया। एलओसी के पार स्थित कई बंकरों और फायरिंग पोजिशनों को गोलाबारी से नष्ट किया गया। उस समय के डायरेक्टर जनरल आर्टिलरी लेफ्टिनेंट जनरल आदोष कुमार ने कहा था कि भारतीय सेना के स्वदेशी और आधुनिक हथियारों ने दुश्मन के आयातित हथियारों को प्रभावी रूप से निष्क्रिय कर दिया।
ऑपरेशन सिंदूर ने यह दिखाया कि भारतीय आर्टिलरी अब केवल पारंपरिक “सपोर्ट आर्म” नहीं रह गई है। आधुनिक प्रिसिजन गोला-बारूद, एम-777 हॉवित्जर, ड्रोन इंटीग्रेशन और तेज एयर मोबिलिटी जैसी क्षमताओं के कारण आर्टिलरी ने सीधे लक्ष्य भेदने वाली “प्रिसिजन स्ट्राइक आर्म” की भूमिका निभाई। (Indian Artillery Gunners Day 2026)
नेटवर्क सेंट्रिक सिस्टम का हिस्सा
आर्टिलरी का नाम सुनते ही अक्सर बड़ी-बड़ी तोपों की तस्वीर सामने आती है। लेकिन आधुनिक युद्ध में आर्टिलरी केवल गन सिस्टम नहीं रह गई है।
पुराने समय में फायरिंग के लिए गणनाएं हाथ से की जाती थीं। टारगेट देखने के लिए सैनिकों को ऊंची जगहों पर तैनात किया जाता था। कम्युनिकेशन के लिए आधुनिक रेडियो या सैटेलाइट जैसी सुविधाएं मौजूद नहीं थीं।
आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। भारतीय सेना के पास 155 मिमी श्रेणी की आधुनिक तोपें हैं जो कई दर्जन किलोमीटर दूर तक सटीक हमला कर सकती हैं।
आज एक फायर मिशन को सफल बनाने के लिए ऑब्जर्वेशन पोस्ट, सर्विलांस सिस्टम, रडार, कम्युनिकेशन नेटवर्क, मौसम संबंधी डेटा, ड्रोन और डिजिटल फायर कंट्रोल सिस्टम की जरूरत होती है।
दुश्मन का लक्ष्य पहले ड्रोन या सेंसर की मदद से खोजा जाता है। उसके बाद डिजिटल सिस्टम दूरी, दिशा, हवा की गति और अन्य आंकड़ों का विश्लेषण करते हैं। फिर गन क्रू को फायरिंग डेटा भेजा जाता है।
इसके बाद कमांड सेंटर से फायरिंग का आदेश जारी होता है।
आधुनिक आर्टिलरी में गन क्रू, ऑब्जर्वर, ड्रोन ऑपरेटर, रडार एक्सपर्ट, कम्युनिकेशन टीम और लॉजिस्टिक स्टाफ सभी मिलकर काम करते हैं। यानी अब आर्टिलरी एक नेटवर्क सेंट्रिक सिस्टम बन चुकी है, जहां कई तकनीकें एक साथ काम करती हैं। (Indian Artillery Gunners Day 2026)
लोइटिंग म्यूनिशन बन रहे हैं आर्टिलरी का हिस्सा
पहले आर्टिलरी के पास मुख्य रूप से दो बड़े हथियार थे, तोप और रॉकेट। अब इनके साथ लोइटिंग म्यूनिशन को तीसरे हथियार के रूप में शामिल किया जा रहा है। इसी सोच के तहत भारतीय सेना ने शक्तिबाण रेजिमेंट और दिव्यास्त्र बैटरी जैसी नई यूनिटें बनाई हैं।
जहां तोपें 40 से 50 किलोमीटर तक बड़े पैमाने पर और अपेक्षाकृत कम लागत में फायर सपोर्ट देती हैं। वहीं पिनाका जैसे मल्टी-बैरल रॉकेट सिस्टम इससे कहीं अधिक दूरी तक हमला कर सकते हैं। लेकिन बैटल फील्ड में कई ऐसे टारगेट होते हैं, जो लगातार अपनी जगह बदलते रहते हैं, जैसे एयर डिफेंस सिस्टम, मिलिट्री व्हीकल, कमांड पोस्ट या एम्युनिशन। ऐसे टारगेट्स पर तुरंत और सटीक हमला करने के लिए एक नए विकल्प की जरूरत महसूस की जा रही थी।
लोइटिंग म्यूनिशन यह जरूरतें पूरी करते हैं। यह एक ऐसा ड्रोन है जो टारगेट एरिया के ऊपर लंबे समय तक उड़ सकता है, निगरानी कर सकता है और टारगेट की पुष्टि होने के बाद सीधे उस पर हमला कर सकता है। इसमें सेंसर और हथियार दोनों एक ही प्लेटफॉर्म में मौजूद होते हैं। इसी वजह से सेना ने इसे सीधे आर्टिलरी कमांडरों के कंट्रोल में रखा है, ताकि उन्हें इन्फैंट्री या वायुसेना के संसाधनों का इंतजार न करना पड़े।
शक्तिबाण रेजिमेंट को इसीलिए तैयार किया गया है। शक्तिबाण का अर्थ है “शक्ति का बाण”। यह रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी के भीतर बनाई गई नई ड्रोन-फोकस्ड यूनिट है। इसका एलान जुलाई 2025 में कारगिल विजय दिवस के अवसर पर सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने किया था।
शक्तिबाण रेजिमेंट पारंपरिक आर्टिलरी रेजिमेंट से अलग है। सामान्य तौर पर एक आर्टिलरी रेजिमेंट में तोपें मुख्य हथियार होती हैं, लेकिन शक्तिबाण में मुख्य भूमिका ड्रोन और लोइटिंग म्यूनिशन निभाते हैं।
प्रत्येक शक्तिबाण रेजिमेंट में तीन बैटरियां हैं, इनमें से दो बैटरियां मध्यम और लंबी दूरी के लोइटिंग म्यूनिशन ऑपरेट करेंगी, जबकि तीसरी बैटरी स्वार्म ड्रोन और आरपीएएस यानी रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम से लैस होगी। कुछ फॉरमेशंस में काउंटर-ड्रोन क्षमताओं को भी शामिल किया जा रहा है।
सेना की योजना 15 से 20 शक्तिबाण रेजिमेंट खड़ी करने की है। इन्हें विशेष रूप से स्ट्राइक फॉर्मेशन और माउंटेन स्ट्राइक कोर के साथ तैनात किया जाएगा।
शक्तिबाण रेजिमेंट का मुख्य उद्देश्य 50 किलोमीटर से 500 किलोमीटर के बीच की दूरी वाले टारगेटों पर सटीक हमला करना है। यह वह क्षेत्र है जहां पारंपरिक तोपों की पहुंच सीमित हो जाती है, जबकि ब्रह्मोस जैसी मिसाइलों का इस्तेमाल महंगा पड़ता है। ऐसे में लोइटिंग म्यूनिशन एक प्रभावी और किफायती विकल्प हैं।
वहीं, दिव्यास्त्र बैटरी को शक्तिबाण रेजिमेंट से अलग है। जहां शक्तिबाण पूरी तरह ड्रोन और लोइटिंग म्यूनिशन आधारित नई रेजिमेंट है, वहीं दिव्यास्त्र बैटरी मौजूदा आर्टिलरी रेजिमेंटों के भीतर बनाई जा रही एक विशेष हाइब्रिड यूनिट है।
इसमें पारंपरिक तोपों के साथ ड्रोन और लोइटिंग म्यूनिशन भी शामिल रहते हैं। यानी एक ही बैटरी निगरानी, टारगेट पहचान, फायर करेक्शन और सटीक हमले जैसे कई काम कर सकती है।
पहले चरण में कम से कम पांच आर्टिलरी रेजिमेंट्स में एक-एक दिव्यास्त्र बैटरी बनाई जा रही है। भविष्य में इनकी संख्या और बढ़ाई जा सकती है। इनका प्रमुख कार्य बैटलफील्ड की निगरानी करना, टारगेट्स को ट्रैक करना, तोपखाने की गोलाबारी को अधिक सटीक बनाना और हमले के बाद नुकसान का आकलन करना है।
दरअसल सेना लोइटिंग म्यूनिशन को आर्टिलरी की “आंख और चाकू” के रूप में देख रही है। ड्रोन टारगेट खोजेंगे, लोइटिंग म्यूनिशन सटीक हमला करेगा और जरूरत पड़ने पर पारंपरिक तोपें बड़े पैमाने पर फायर सपोर्ट देंगी। (Indian Artillery Gunners Day 2026)
रडार और सेंसर बने नई ताकत
आधुनिक आर्टिलरी में वेपन लोकेटिंग रडार का विशेष महत्व है। ये रडार दुश्मन की तोप से निकले गोले की दिशा देखकर उसकी लोकेशन का पता लगा सकते हैं।
इससे भारतीय सेना तुरंत जवाबी कार्रवाई कर सकती है। इसके अलावा ग्राउंड सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस सिस्टम और सैटेलाइट डेटा भी आर्टिलरी नेटवर्क का हिस्सा बन चुके हैं। साथ ही, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बेस्ड सिस्टम टारगेट सिलेक्शन, डेटा एनालिसिस और फायरिंग सॉल्युशन तैयार करने में मदद कर रहे हैं। (Indian Artillery Gunners Day 2026)
Indian Army To Install Anti-Drone Screen Over Military Buildings In Jaisalmer After Operation Sindoor. (AI Image)
Indian Army Anti-Drone Shield: सीमावर्ती इलाकों में भारतीय सेना अब अपने महत्वपूर्ण सैन्य भवनों को ड्रोन खतरों से बचाने के लिए विशेष सुरक्षा कवच लगाने जा रही है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पश्चिमी सीमा पर बड़ी संख्या में ड्रोन गतिविधियां सामने आने के बाद सेना ने महत्वपूर्ण इमारतों की सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने का फैसला किया है। जिसके तहत मौजूदा इमारतों के ऊपर एंटी-ड्रोन स्क्रीन लगाई जाएगी। जिसकी शुरुआत जैसलमेर मिलिट्री स्टेशन से की जा रही है।
सदर्न कमांड के तहत भारतीय सेना की 53 इंजीनियर रेजिमेंट इस प्रोजेक्ट को संभालेगी। करीब 6.34 करोड़ रुपये की इस प्रोजेक्ट के तहत सैन्य परिसरों की छतों को ऐसे मजबूत सुरक्षा ढांचे से कवर किया जाएगा, जो किसी भी संदिग्ध ड्रोन को भवन तक पहुंचने से पहले रोक सके।
Indian Army Anti-Drone Shield: ऑपरेशन सिंदूर के बाद बदला सुरक्षा का नजरिया
7 मई 2025 को भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया था। इस अभियान के दौरान भारतीय सेनाओं ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया था। इसके बाद पाकिस्तान की तरफ से ड्रोन और अन्य हवाई माध्यमों का उपयोग करने की कोशिशें सामने आईं।
राजस्थान के जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर और श्रीगंगानगर जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों में कई संदिग्ध ड्रोन गतिविधियों की रिपोर्ट मिली थी। बीएसएफ राजस्थान फ्रंटियर के सूत्रों के मुताबिक ऑपरेशन सिंदूर के दौरान राजस्थान के चार जिलों में कुल 413 ड्रोन हमलों या घुसपैठ की कोशिशों को भारतीय सुरक्षा बलों ने विफल किया था।
इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि खतरा केवल सीमा चौकियों या सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं है। अब ड्रोन सीधे भवनों, कमांड सेंटरों, स्टोरेज क्षेत्रों और प्रशासनिक परिसरों तक पहुंचने की क्षमता रखते हैं। (Indian Army Anti-Drone Shield)
तीन लेयर की एंटी-ड्रोन स्क्रीन?
सेना जिस सिक्योरिटी सिस्टम को बनाने जा रही है, वह कोई रडार या इलेक्ट्रॉनिक जैमर नहीं है। यह एक मजबूत फिजिकल सिक्योरिटी इंफ्रास्ट्रक्चर है, जिसे इमारतों के ऊपर बनाया जाएगा।
इस स्ट्रक्चर में स्टील के खंभे, बीम और मजबूत फ्रेम लगाए जाएंगे। इनके ऊपर तीन अलग-अलग परतों वाली स्टील जाली बिछाई जाएगी। पहली लेयर इंटरवोवन स्टील मेश होगी, जबकि दूसरी और तीसरी परत कॉर्कस्क्रू स्टील नेट की होगी।
इन तीनों परतों के बीच उचित दूरी रखी जाएगी ताकि यदि कोई ड्रोन पहली जाली से टकराकर आगे बढ़ने की कोशिश करे तो दूसरी और तीसरी लेयर उसे रोक सकें। सैन्य भाषा में इसे “स्टेज्ड इंटरसेप्शन” कहा जाता है।
इसका उद्देश्य ड्रोन को भवन की छत तक पहुंचने से पहले ही निष्क्रिय करना है। (Indian Army Anti-Drone Shield)
रेगिस्तानी इलाके को ध्यान में रखकर तैयार होगा डिजाइन
जैसलमेर का इलाका अत्यधिक गर्मी, तेज हवाओं और धूल भरी आंधियों के लिए जाना जाता है। इसी वजह से एंटी-ड्रोन स्क्रीन का डिजाइन सामान्य स्ट्रक्चर्स से अलग होगा। पूरे स्ट्रक्चर को उच्च तापमान, तेज हवा और रेत के दबाव को सहने लायक बनाया जाएगा। स्टील पर विशेष एंटी-कोरोजन कोटिंग की जाएगी ताकि जंग न लगे।
इसके अलावा बाहरी हिस्से को ऐसे रंग और फिनिश दी जाएगी, जिससे यह आसपास के रेगिस्तानी वातावरण में आसानी से घुल-मिल जाए। इससे स्ट्रक्चर दूर से कम दिखाई देगी और सैन्य परिसरों की पहचान सीमित रहेगी। (Indian Army Anti-Drone Shield)
ड्रोन क्यों बन गए हैं बड़ी चुनौती?
पिछले कुछ सालों में दुनिया भर के युद्धों ने दिखाया है कि छोटे ड्रोन भी बड़े नुकसान पहुंचा सकते हैं। कम कीमत वाले क्वाडकॉप्टर ड्रोन अब हाई-रिजोल्यूशन कैमरों, जीपीएस सिस्टम और विस्फोटक ले जाने की क्षमता के साथ उपलब्ध हैं। इनका उपयोग निगरानी, खुफिया जानकारी जुटाने, हथियार पहुंचाने और हमले करने तक में किया जा रहा है।
रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया के संघर्ष और दक्षिण एशिया की सुरक्षा चुनौतियों ने यह साबित किया है कि छोटे ड्रोन अब आधुनिक युद्ध का अहम हिस्सा बन चुके हैं।
भारतीय सुरक्षा एजेंसियां भी पिछले कुछ सालों में सीमा पार से आने वाले ड्रोन, हथियारों की तस्करी और निगरानी गतिविधियों के कई मामलों का सामना कर चुकी हैं। (Indian Army Anti-Drone Shield)
पश्चिमी सीमा पर लगातार मिल रहे ड्रोन
रक्षा मंत्रालय और सुरक्षा एजेंसियों के सार्वजनिक आंकड़ों के अनुसार 2025 के दौरान पश्चिमी सीमा पर 863 ड्रोन घुसपैठ की घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें से ज्यादातर पंजाब-राजस्थान अंतरराष्ट्रीय सीमा पर थीं।
इनमें से 237 ड्रोन को बरामद या निष्क्रिय किया गया। कई मामलों में ड्रोन का उपयोग नशीले पदार्थ, हथियार और अन्य सामग्री पहुंचाने के लिए किया गया था।
राजस्थान सीमा क्षेत्र में भी कई संदिग्ध ड्रोन बरामद हुए। अगस्त 2025 में जैसलमेर के पास एक चीनी निर्मित ड्रोन मिलने की खबरें सामने आई थीं। (Indian Army Anti-Drone Shield)
निर्माण से पहले होगी तकनीकी जांच
प्रोजेक्ट के तहत केवल जाली लगाना ही नहीं बल्कि पूरा इंजीनियरिंग डिजाइन तैयार करना भी कॉन्ट्रैक्टर की जिम्मेदारी होगी। मिट्टी की जांच, स्ट्रक्चरल डिजाइन, मैटेरियल की सप्लाई, फ्रेम निर्माण, जाल स्थापना और अंतिम परीक्षण का काम एक ही एजेंसी करेगी।
सेना ने यह भी तय किया है कि डिजाइन को किसी आईआईटी या एनआईटी जैसे प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान से सत्यापित कराया जाएगा ताकि स्ट्रक्चर की मजबूती सुनिश्चित की जा सके। (Indian Army Anti-Drone Shield)
Indian Army Launches Modernisation of 12 Regional Ordnance Depots to Upgrade Logistics and Supply Chain Network. (AI Image)
Indian Army Ordnance Depots Modernisation: भारतीय सेना ने देशभर में मौजूद अपने 12 रीजनल ऑर्डनेंस डिपो (आरओडी) के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया शुरू कर दी है। सेना मुख्यालय के डायरेक्टरेट जनरल ऑफ ऑर्डनेंस सर्विसेज की तरफ से एक एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी कर इंडस्ट्री पार्टनर्स और कंसल्टेंट्स से प्रस्ताव मांगे हैं। इन डिपो को आधुनिक वेयरहाउसिंग, ऑटोमेशन, सिक्योरिटी और डिजिटल लॉजिस्टिक्स सिस्टम से लैस किया जाएगा।
सेना के अनुसार ये डिपो लगभग 60 साल पुराने हैं और बदलती जरूरतों के अनुसार अब इन्हें नई तकनीकों से अपग्रेड करना जरूरी हो गया है। यह कदम भारतीय सेना की सप्लाई चेन को अधिक तेज, सुरक्षित और कुशल बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
Indian Army Ordnance Depots Modernisation: सेना की लॉजिस्टिक्स चेन की अहम कड़ी हैं ऑर्डनेंस डिपो
रीजनल ऑर्डनेंस डिपो भारतीय सेना की लॉजिस्टिक्स व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन डिपो का काम विभिन्न मिलिट्री स्टोर्स, उपकरणों, स्पेयर पार्ट्स और अन्य सामग्री को प्राप्त करना, सुरक्षित रखना, उनका रिकॉर्ड बनाए रखना और जरूरत के अनुसार फील्ड फॉर्मेशनों तक पहुंचाना होता है।
ये डिपो सेना की रणनीतिक और सामरिक जरूरतों के अनुसार सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित करते हैं। हालांकि ऑर्डनेंस डिपो और एम्युनिशन डिपो अलग-अलग होते हैं। ऑर्डनेंस डिपो में गोलियां, बम, रॉकेट, मिसाइल या विस्फोटक सामग्री नहीं रखी जाती। ऐसे हथियार और गोला-बारूद अलग सप्लाई चेन के जरिए ऑपरेट किए जाते हैं।
60 साल पुराने स्ट्रक्चर होंगे अपग्रेड
ईओआई डॉक्युमेंट में सेना ने कहा है कि मौजूदा समय में आधुनिक वेयरहाउसिंग तकनीक, सुरक्षा उपकरण और ऑटोमेटेड लॉजिस्टिक्स सिस्टम उपलब्ध हैं। ऐसे में पुराने ऑर्डनेंस इशेलॉन्स को आधुनिक बनाना जरूरी हो गया है।
दस्तावेज में कहा गया है, “बदलते समय और आधुनिक वेयरहाउसिंग तकनीकों की उपलब्धता को देखते हुए वेयरहाउसिंग, सुरक्षा, फायर प्रिवेंशन, टेलीकम्युनिकेशन, स्टोर हैंडलिंग और अत्याधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करना आवश्यक है।”
सेना चाहती है कि इन डिपो में आधुनिक सुविधाओं का विकास किया जाए ताकि बड़े पैमाने पर सामग्री का प्रबंधन तेज और सुरक्षित तरीके से हो सके। (Indian Army Ordnance Depots Modernisation)
आधुनिक वेयरहाउसिंग पर रहेगा विशेष फोकस
आधुनिकीकरण योजना के तहत पुराने भवनों को फिर से डिजाइन किया जाएगा। नए कॉम्पैक्ट लेआउट के साथ स्पेस मैनेजमेंट को बेहतर बनाया जाएगा ताकि सीमित क्षेत्र में अधिक सामग्री सुरक्षित रूप से रखी जा सके।
वेयरहाउसिंग सुविधाओं को आधुनिक बनाया जाएगा और बल्क स्टोरेज तथा रिटेल स्टोरेज क्षेत्रों को अलग-अलग व्यवस्थित किया जाएगा। इससे रोजमर्रा के ऑपरेशन, सामग्री की पहचान, ट्रैकिंग तथा वितरण में आसानी होगी।
सेना का उद्देश्य ऐसा सिस्टम विकसित करना है जहां स्टोरेज और रिट्रीवल प्रक्रिया तेजी से पूरी हो सके और मानव श्रम पर निर्भरता कम हो।
ऑटोमेशन और स्मार्ट लॉजिस्टिक्स सिस्टम होंगे शामिल
नई योजना में ऑटोमेशन को विशेष महत्व दिया गया है। भारी पैलेट्स और बड़े आकार के सैन्य उपकरणों को स्थानांतरित करने के लिए आधुनिक मैटेरियल हैंडलिंग इक्विपमेंट लगाए जाएंगे।
इसके अलावा अलग-अलग लॉजिस्टिक्स मॉड्यूल्स को एकीकृत डिजिटल नेटवर्क से जोड़ा जाएगा। इससे स्टॉक मैनेजमेंट, इन्वेंट्री ट्रैकिंग और सप्लाई चेन मॉनिटरिंग रियल टाइम में संभव हो सकेगी।
सेना एक ऐसा इंटीग्रेटेड सिस्टम विकसित करना चाहती है जिसमें किसी भी सामग्री की उपलब्धता और उसकी स्थिति का पता तुरंत लगाया जा सके। (Indian Army Ordnance Depots Modernisation)
सुरक्षा और निगरानी सिस्टम भी होगा अपग्रेड
आधुनिकीकरण के इस प्रोजेक्ट में सिक्योरिटी फ्रेमवर्क को भी पूरी तरह नया रूप दिया जाएगा। इसके तहत अत्याधुनिक सर्विलांस सिस्टम, इंट्रूजन डिटेक्शन सिस्टम और एक्सेस कंट्रोल तकनीक लगाई जाएगी।
सभी डिपो को एक इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर से जोड़ा जाएगा। इससे किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर तुरंत नजर रखी जा सकेगी और सुरक्षा प्रतिक्रिया समय कम होगा।
बढ़ती साइबर और फिजिकल सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए यह कदम काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
फायर फाइटिंग सिस्टम भी होगा हाई-टेक
सेना ने आधुनिक फायर प्रिवेंशन और फायर फाइटिंग सिस्टम लगाने की भी योजना बनाई है। इसमें फायर मॉनिटरिंग, डिटेक्शन और सप्रेशन सिस्टम शामिल होंगे।
वेयरहाउस में बड़ी मात्रा में सैन्य सामग्री और उपकरण रखे जाते हैं। ऐसे में आग लगने की किसी भी घटना को रोकने और तत्काल नियंत्रित करने के लिए एडवांस सिक्योरिटी सिस्टम डेवलप किया जाएगा।
इसके अलावा इलेक्ट्रिकल नेटवर्क, टेलीकम्युनिकेशन सिस्टम, सिविल वर्क्स और क्षेत्रीय विकास कार्य भी परियोजना का हिस्सा होंगे। (Indian Army Ordnance Depots Modernisation)
हर डिपो की जरूरत होगी अलग
सेना ने स्पष्ट किया है कि सभी 12 डिपो के लिए एक जैसी योजना लागू नहीं होगी। प्रत्येक डिपो की भूमिका, वहां रखी जाने वाली सामग्री, भौगोलिक स्थिति और पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुसार आवश्यकताएं अलग होंगी।
इसी वजह से कंसल्टेंट्स को हर डिपो का विस्तृत अध्ययन करना होगा और उसके अनुरूप आधुनिकीकरण की योजना तैयार करनी होगी। (Indian Army Ordnance Depots Modernisation)
360 दिनों में तैयार होगी विस्तृत रिपोर्ट
सेना ने विस्तृत परियोजना रिपोर्ट यानी डीपीआर तैयार करने के लिए 360 दिनों का वक्त दिय है। इस दौरान विशेषज्ञ टीम प्रत्येक डिपो की प्रक्रियाओं, संचालन प्रणाली और मौजूदा बुनियादी ढांचे का अध्ययन करेगी।
डीपीआर में वर्तमान और भविष्य की स्टोरेज जरूरतों का मूल्यांकन किया जाएगा। साथ ही यह तय किया जाएगा कि अधिकृत इन्वेंट्री और भविष्य में आने वाली सामग्री के लिए कौन सा स्टोरेज और रिट्रीवल सिस्टम सबसे उपयुक्त रहेगा।
इसके अलावा बजट अनुमान, लागत प्रभाव और पूरे प्रोजेक्ट के क्रियान्वयन की योजना भी इसी रिपोर्ट में शामिल की जाएगी। (Indian Army Ordnance Depots Modernisation)
DRDO Invites Industry Proposals For Electromagnetic Launcher Components, Boosting India's Indigenous Hypersonic Weapon Program (AI Image)
India Electromagnetic Railgun Program: भविष्य के बैटलफील्ड में गेम-चेंजर मानी जाने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेलगन टेक्नोलॉजी पर भारत ने एक और बड़ा कदम बढ़ाया है। आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (एआरडीई) लैब ने इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्चर सिस्टम के महत्वपूर्ण हिस्सों बैरल प्लेटफॉर्म और ड्राइव्स के डिजाइन, डेवलपमेंट और मैन्युफैक्चरिंग के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया है। रक्षा क्षेत्र में यह तकनीक भविष्य के हाइपरसोनिक हथियारों, लंबी दूरी की सटीक मारक क्षमता और आधुनिक नौसैनिक प्रणालियों के लिए बेहद अहम मानी जाती है।
India Electromagnetic Railgun Program: क्या है इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्चर?
पारंपरिक तोपों में गोले को आगे बढ़ाने के लिए बारूद या कैमिकल प्रोपेलेंट का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्चर पूरी तरह अलग सिद्धांत पर काम करता है।
इस तकनीक में अत्यधिक इलेक्ट्रिक करेंट और शक्तिशाली चुंबकीय बल का इस्तेमाल किया जाता है। दो समानांतर रेलों के बीच लाखों एम्पीयर करंट प्रवाहित किया जाता है, जिससे लोरेंज फोर्स पैदा होती है। यही फोर्स प्रोजेक्टाइल को बेहद तेज रफ्तार से आगे धकेलता है।
इस प्रक्रिया में किसी विस्फोटक प्रोपेलेंट की जरूरत नहीं होती। एनर्जी सीधे पावर सिस्टम से आती है, जिससे प्रोजेक्टाइल बहुत अधिक रफ्तार प्राप्त कर सकता है। यही वजह है कि रेलगन को भविष्य की हाइपरसोनिक हथियार तकनीक के रूप में देखा जाता है।
डीआरडीओ ने पहले भी हासिल की है बड़ी सफलता
एआरडीई पिछले कई सालों से इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेलगन तकनीक पर काम कर रहा है। संगठन ने 10 मेगाजूल क्षमता वाला रेलगन सिस्टम डेवलप किया है।
इस सिस्टम की क्षमता लगभग एक किलोग्राम वजन वाले प्रोजेक्टाइल को 2000 मीटर प्रति सेकंड से अधिक रफ्तार देने की है। यह रफ्तार ध्वनि की रफ्तार से कई गुना अधिक है।
अब डीआरडीओ का लक्ष्य शक्तिशाली 100 मेगाजूल क्षमता वाले सिस्टम का डेवलपमेंट करना है। इस स्तर का सिस्टम लगभग 50 किलोग्राम वजन के प्रोजेक्टाइल को करीब 200 किलोमीटर दूरी तक हाइपरसोनिक रफ्तार से लॉन्च कर सकता है।
यही कारण है कि बैरल प्लेटफॉर्म और ड्राइव्स जैसे महत्वपूर्ण सब-सिस्टम्स के डेवलपमेंट को कार्यक्रम का अगला बड़ा चरण माना जा रहा है। (India Electromagnetic Railgun Program)
बैरल प्लेटफॉर्म क्यों है सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा?
रेलगन का बैरल सामान्य तोप के बैरल जैसा नहीं होता। यह पूरे सिस्टम का सबसे संवेदनशील और तकनीकी रूप से जटिल हिस्सा होता है।
हर फायरिंग के दौरान रेलों के बीच अत्यधिक करंट प्रवाहित होता है। इससे बहुत अधिक गर्मी पैदा होती है और धातु पर भारी मेकेनिकल प्रेशर पड़ता है। लगातार इस्तेमाल के दौरान रेलों का घिसाव भी एक बड़ी समस्या बन जाता है।
इसी वजह से बैरल प्लेटफॉर्म को ऐसे डिजाइन और सामग्री से बनाना पड़ता है जो उच्च तापमान, अत्यधिक विद्युत प्रवाह और लगातार फायरिंग के दबाव को सह सके।
साथ ही प्रभावी थर्मल मैनेजमेंट भी जरूरी होता है ताकि सिस्टम का तापमान नियंत्रित रखा जा सके और उसकी कार्यक्षमता प्रभावित न हो। (India Electromagnetic Railgun Program)
ड्राइव्स की भूमिका भी बेहद अहम
ईओआई में जिन ड्राइव्स का उल्लेख किया गया है, वे लॉन्च सिस्टम की सटीकता और स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण हैं।
इनका काम प्रोजेक्टाइल की रफ्तार को कंट्रोल करना, लॉन्च प्रक्रिया को स्थिर बनाना और पूरे सिस्टम को निर्धारित दिशा में संचालित रखना होता है। हाइपरसोनिक रफ्तार पर मामूली गलती भी टारगेट पर बड़े अंतर का कारण बन सकती है। इसलिए ड्राइव सिस्टम का डिजाइन अत्यधिक सटीक होना जरूरी है।
मई 2025 में डीआरडीओ ने पुणे में सेंटर फॉर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च टेक्नोलॉजी (सीईएमएएलटी) की स्थापना की थी। यह केंद्र विशेष रूप से रेलगन और अन्य इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च सिस्टम्स के रिसर्च एवं डेवलपमेंट के लिए बनाया गया है।
यहां पल्स पावर सप्लाई, आर्मेचर डिजाइन, बैरल इंजीनियरिंग, थर्मल मैनेजमेंट और एडवांस मैटेरियल साइंस जैसे क्षेत्रों में काम चल रहा है। (India Electromagnetic Railgun Program)
भारत दो अलग-अलग तकनीकी रास्तों पर कर रहा काम
भारत में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च टेक्नोलॉजी केवल रेलगन तक सीमित नहीं है। जहां एआरडीई रेलगन का डेवलपमेंट कर रहा है, वहीं गांधीनगर स्थित इंस्टीट्यूट फॉर प्लाज्मा रिसर्च (आईपीआर) भी इस क्षेत्र में काम कर रहा है।
मई 2026 में आईपीआर ने 8 किलोन्यूटन क्षमता वाले लीनियर इंडक्शन मोटर बेस्ड लॉन्चर का सफल प्रदर्शन किया था। यह सिस्टम लगभग 170 किलोग्राम वजन को 18 से 20 मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार दे सकता है।
यह तकनीक भविष्य में नौसेना के विमानवाहक पोतों और औद्योगिक प्रणालियों में इस्तेमाली हो सकती है। (India Electromagnetic Railgun Program)
भारतीय नौसेना की भी है बड़ी रुचि
इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च टेक्नोलॉजी में भारतीय नौसेना की विशेष दिलचस्पी है। दुनिया के सबसे आधुनिक विमानवाहक पोतों में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक एयरक्राफ्ट लॉन्च सिस्टम (ईएमएएलएस) का इस्तेमाल किया जा रहा है।
अमेरिका के फोर्ड क्लास एयरक्राफ्ट कैरियर पर यह सिस्टम पहले से तैनात है। चीन ने भी अपने फुजियान विमानवाहक पोत में इसी तरह की तकनीक को शामिल किया है।
भारत भविष्य के इंडिजिनस एयरक्राफ्ट कैरियर-3 के लिए स्वदेशी ईएमएएलएस डेवलप करने की दिशा में काम कर रहा है। (India Electromagnetic Railgun Program)
आसान नहीं हैं तकनीकी चुनौतियां
रेलगन तकनीक दुनिया की सबसे जटिल डिफेंस टेक्नोलॉजीज में गिनी जाती है। सबसे बड़ी चुनौती रेलों का तेजी से घिसना है। इसके अलावा विशाल पल्स पावर सिस्टम को कॉम्पैक्ट बनाना, एनर्जी स्टोरेज, कूलिंग सिस्टम और लगातार फायरिंग की क्षमता डेवलपमेंट करना भी मुश्किल काम है।
डीआरडीओ के मौजूदा 10 मेगाजूल सिस्टम में 25 मॉड्यूलर कैपेसिटर बैंक लगाए गए हैं। प्रत्येक बैंक की क्षमता लगभग 400 किलोजूल है। इन्हें लिथियम बैटरी बैंक और 15 किलोवाट डीजल जनरेटर की मदद से चार्ज किया जाता है। (India Electromagnetic Railgun Program)
उद्योग को सीधे जोड़ा जा रहा है
आमतौर पर डीआरडीओ किसी तकनीक का प्रोटोटाइप डेवलपमेंट करने के बाद उसे सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों या निजी उद्योग को ट्रांसफर करता है। लेकिन इस बार बैरल प्लेटफॉर्म जैसे कॉम्प्लैक्स कंपोनेंट्स के लिए शुरुआती चरण में ही उद्योग से साझेदारी मांगी गई है।
चयनित कंपनियां डिजाइन, प्रोटोटाइप निर्माण, परीक्षण और अंतिम सप्लाई प्रक्रिया में भाग लेंगी। इससे देश में उच्च स्तरीय रक्षा विनिर्माण क्षमता डेवलपमेंट करने में मदद मिलेगी।
चुनिंदा देशों के क्लब में शामिल होने की कोशिश
दुनिया में अमेरिका, चीन और कुछ यूरोपीय देश ही इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च टेक्नोलॉजी पर गंभीरता से काम कर रहे हैं। अमेरिका ने कुछ समय के लिए अपने रेलगन कार्यक्रम की रफ्तार धीमी की थी, लेकिन काउंटर-ड्रोन सिस्टम और स्पेस लॉन्च जैसे सेक्टर्स में इसके इस्तेमाल पर फिर से काम हो रहा है। चीन भी इस तकनीक में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है। (India Electromagnetic Railgun Program)
DRDO’s SAT-SAAW Will Give Indian Air Force Long-Range Precision Strike Capability Against Enemy Airbases. (Photo: PIB)
SAT-SAAW glide bomb: रक्षा मंत्रालय ने भारत डायनामिक्स लिमिटेड (बीडीएल) के साथ 810.79 करोड़ रुपये के अनुबंध पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते के तहत भारतीय वायुसेना के लिए 160 सैटेलाइट स्मार्ट एंटी एयरफील्ड वेपन (SAT-SAAW) खरीदे जाएंगे। डीआरडीओ का बनाया यह स्वदेशी प्रिसिजन गाइडेड ग्लाइड बम दुश्मन के एयरबेस, रनवे, बंकर और मिलिट्री स्ट्रक्चर को सुरक्षित दूरी से निशाना बनाने में सक्षम है। नई दिल्ली में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की मौजूदगी में हुए इस समझौते को भारतीय वायुसेना की स्ट्राइक क्षमता बढ़ाने और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
यह सौदा “बाय इंडियन – इंडिजेनसली डिजाइन्ड, डेवलप्ड एंड मैन्युफैक्चर्ड” कैटेगरी के तहत किया गया है, जिसका मतलब है कि हथियार का डिजाइन, विकास और निर्माण भारत में ही होगा।
क्या है SAT-SAAW glide bomb?
SAT-SAAW यानी सैटेलाइट स्मार्ट एंटी एयरफील्ड वेपन एक प्रिसिजन गाइडेड ग्लाइड बम है। यह हवा से जमीन पर मार करने वाला ऐसा हथियार है, जिसे लड़ाकू विमान से छोड़ने के बाद यह बिना इंजन के अपने पंखों की मदद से टारगेट की ओर बढ़ता है।
इसका मुख्य उद्देश्य दुश्मन के एयरबेस, रनवे, टैक्सी ट्रैक, एयरक्राफ्ट शेल्टर, कमांड सेंटर, बंकर और अन्य महत्वपूर्ण मिलिट्री स्ट्रक्चर्स को नष्ट करना है। यह हथियार लंबी दूरी से छोड़ा जा सकता है, जिससे हमला करने वाले विमान को दुश्मन की एयर डिफेंस रेंज में जाने की जरूरत नहीं पड़ती।
यही वजह है कि इसे स्टैंड-ऑफ वेपनकी श्रेणी में रखा जाता है। स्टैंड-ऑफ वेपन ऐसे हथियार होते हैं जिन्हें सुरक्षित दूरी से दागकर टारगेट को निशाना बनाया जाता है। (SAT-SAAW glide bomb)
कैसे काम करता है यह स्मार्ट हथियार?
SAT-SAAW को लड़ाकू विमान से रिलीज करने के बाद इसके फोल्डिंग विंग्स खुल जाते हैं। इसके बाद यह हवा में ग्लाइड करते हुए टारगेट की ओर बढ़ता है।
इस हथियार में सैटेलाइट नेविगेशन और इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है। इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम लगातार इसकी स्थिति, दिशा और रफ्तार को मापता रहता है, जबकि सैटेलाइट बेस्ड नेविगेशन सिस्टम इसे टारगेट तक पहुंचने में मदद करता है।
हथियार के अंदर मौजूद मिशन कंप्यूटर लगातार फ्लाइट पाथ की गणना करता है और जरूरी सुधार करता रहता है। इसके कारण यह टारगेट पर अत्यधिक सटीकता के साथ हमला कर सकता है। (SAT-SAAW glide bomb)
किन विमानों से किया जा सकता है लॉन्च?
भारतीय वायुसेना के कई प्लेटफॉर्म इस हथियार को इस्तेमाल कर सकते हैं। SAT-SAAW को जगुआर, हॉक और सुखोई-30 एमकेआई जैसे विमानों से लॉन्च किया जा सकता है। सुखोई-30 एमकेआई जैसे भारी लड़ाकू विमान एक मिशन में कई SAT-SAAW लेकर उड़ान भर सकते हैं।
इससे एक ही सॉर्टी के दौरान कई अलग-अलग टारगेट्स पर हमला कर सकते हैं। वायुसेना के मौजूदा बेड़े के साथ इसका इंटीग्रेशन एक बड़ी बात मानी जा रही है। (SAT-SAAW glide bomb)
🇮🇳🎯 Breaking: Major Firepower Boost for IAF: MoD Signs ₹811 Crore SAT-SAAW Contract with BDL…
Ministry of Defence has signed an Rs 810.79 crore contract with Bharat Dynamics Limited (BDL) for the procurement of 160 Satellite Smart Anti-Airfield Weapons (SAT-SAAW) for the… pic.twitter.com/LeHeRQZmio
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) September 23, 2026
एयरफील्ड पर हमला क्यों होता है महत्वपूर्ण?
किसी भी आधुनिक युद्ध में एयरबेस सबसे महत्वपूर्ण मिलिट्री एसेट्स में गिने जाते हैं। लड़ाकू विमान, फ्यूल स्टोरेज, हथियार डिपो, रडार नेटवर्क और कमांड सेंटर आमतौर पर एयरबेस से जुड़े होते हैं।
यदि किसी एयरफील्ड का रनवे क्षतिग्रस्त हो जाए तो वहां से विमान उड़ान नहीं भर सकते। इससे दुश्मन की एयर पावर पर सीधा असर पड़ता है।
SAT-SAAW को इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इसकी मदद से रनवे पर गहरे गड्ढे बनाए जा सकते हैं या एयरबेस के महत्वपूर्ण बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचाया जा सकता है।
लंबी दूरी से हमला करने की क्षमता के कारण यह हथियार दुश्मन की एयर डिफेंस सिस्टम से सुरक्षित दूरी बनाए रखते हुए ऑपरेशन को अंजाम देने में मदद करता है। (SAT-SAAW glide bomb)
ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान के कई एयरबेस को बनाया था टारगेट
मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के कई अहम एयरबेस को निशाना बनाया था। इनमें सरगोधा स्थित मुशफ एयरबेस भी शामिल था। इस हमले में भारत ने ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का इस्तेमाल किया था। हमले के बाद सामने आई सैटेलाइट तस्वीरों में रनवे पर बड़े गड्ढे साफ दिखाई दिए थे। रनवे पर दो जगह बेहद सटीक हमला किया गया था। यह हमला इतना जबदस्त था कि सिंदूर के 16 महीने बाद इस साल सितंबर तक पाकिस्तान रनवे की पूरी तरह मरम्मत नहीं कर पाया था। पहले किए गए रिपेयर पैच भी हटाने पड़े और कई हिस्सों में दोबारा खुदाई करनी पड़ी।
ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस को सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमान से लॉन्च किया गया था।
अब भारतीय वायुसेना ने SAT-SAAW को शामिल किया है। हालांकि ब्रह्मोस और SAT-SAAW में मुख्य अंतर यह है कि ब्रह्मोस एक भारी, महंगी और लंबी दूरी की मिसाइल है, जबकि SAT-SAAW एक अपेक्षाकृत हल्का और कम लागत वाला ग्लाइड बम है। इसकी मारक क्षमता लगभग 100 किलोमीटर तक है और एक विमान इसे अधिक संख्या में लेकर जा सकता है। (SAT-SAAW glide bomb)
डीआरडीओ ने बनाया
इस प्रोजेक्ट की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि डीआरडीओ ने इस हथियार को पूरी तरह भारतीय जरूरतों को ध्यान में रखते हुए डेवलप किया है।
रक्षा मंत्रालय के अनुसार SAT-SAAW में लगभग 60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके साथ कई महत्वपूर्ण सब-सिस्टम का भी स्वदेशीकरण किया जा रहा है।
इनमें इनिशियल मेजरमेंट यूनिट, लॉन्ग इम्पैक्ट डिले फ्यूज और ट्विन स्टोर कैरियर जैसे प्रमुख उपकरण शामिल हैं।
इनिशियल मेजरमेंट यूनिट हथियार की स्थिति और दिशा का सटीक आकलन करती है। लॉन्ग इम्पैक्ट डिले फ्यूज टारगेट पर प्रभाव के बाद विस्फोट का समय कंट्रोल करता है। वहीं ट्विन स्टोर कैरियर की मदद से विमान एक साथ दो हथियार लेकर उड़ान भर सकता है।
वहीं, भारत डायनामिक्स लिमिटेड पहले से कई मिसाइल और हथियार प्रणालियों का उत्पादन कर रही है। अब SAT-SAAW का उत्पादन भी बीडीएल के जिम्मे होगा। (SAT-SAAW glide bomb)
कब तक मिलेगी वायुसेना को डिलीवरी?
रक्षा मंत्रालय के अनुसार इसकी डिलीवरी दो चरणों में होगी। पहला चरण वित्तीय वर्ष 2027-28 के दौरान पूरा किया जाएगा, जबकि शेष हथियारों की सप्लाई 2028-29 में की जाएगी।
160 हथियारों की यह खेप भारतीय वायुसेना को विभिन्न ऑपरेशनल जरूरतों के लिए उपलब्ध कराई जाएगी। इससे वायुसेना के पास पर्याप्त संख्या में प्रिसिजन गाइडेड एयर-टू-ग्राउंड हथियार मौजूद होंगे। (SAT-SAAW glide bomb)
To provide the best experiences, we use technologies like cookies to store and/or access device information. Consenting to these technologies will allow us to process data such as browsing behavior or unique IDs on this site. Not consenting or withdrawing consent, may adversely affect certain features and functions.
Functional
Always active
The technical storage or access is strictly necessary for the legitimate purpose of enabling the use of a specific service explicitly requested by the subscriber or user, or for the sole purpose of carrying out the transmission of a communication over an electronic communications network.
Preferences
The technical storage or access is necessary for the legitimate purpose of storing preferences that are not requested by the subscriber or user.
Statistics
The technical storage or access that is used exclusively for statistical purposes.The technical storage or access that is used exclusively for anonymous statistical purposes. Without a subpoena, voluntary compliance on the part of your Internet Service Provider, or additional records from a third party, information stored or retrieved for this purpose alone cannot usually be used to identify you.
Marketing
The technical storage or access is required to create user profiles to send advertising, or to track the user on a website or across several websites for similar marketing purposes.