📍नई दिल्ली | 14 Apr, 2026, 5:20 PM
Operation Tiranga: अगले कुछ महीनों में भारतीय सेनाओं के इतिहास में एक ऐसा अध्याय लिखा जा रहा है जिसे स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा रक्षा सुधार माना जाएगा। इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड्स को सबसे बड़े डिफेंस रिफॉर्म्स के तौर पर देखा जा रहा है। लेकिन थिएटर कमांड्स को आकार देने में सबसे अहम भूमिका निभाई है ऑपरेशन तिरंगा ने।
नाम भले ही किसी सैन्य अभियान जैसा लगे, लेकिन यह असल में एक टेबल टॉप एक्सरसाइज (TTX) थी, जिसमें तीनों सेनाओं ने बैठकर भविष्य के युद्ध का पूरा खाका तैयार किया। इस पूरी प्रक्रिया में जनरल अनिल चौहान की अगुवाई में सेना, नौसेना और वायुसेना के प्रमुखों ने मिलकर थिएटर कमांड का फॉर्मेट तय किया।
यह एक्सरसाइज कई महीनों तक चली और अप्रैल 2026 में इसका मुख्य काम पूरा हो गया। इसमें सबसे ज्यादा फोकस इस बात पर रहा कि युद्ध के समय तीनों सेनाएं एक साथ कैसे काम करें और फैसले जल्दी कैसे लिए जाएं।
Operation Tiranga पर क्या कहा सीडीएस ने
अप्रैल 2026 में बेंगलुरु में हुए रण संवाद कार्यक्रम के दौरान सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने पहली बार खुलकर “ऑपरेशन तिरंगा” का नाम लिया। उन्होंने साफ शब्दों में बताया कि यह कोई युद्ध अभ्यास नहीं था, बल्कि तीनों सेनाओं के बीच थिएटर कमांड बनाने को लेकर गहन चर्चा और योजना बनाने की प्रक्रिया थी। उन्होंने कहा कि “ऑपरेशन तिरंगा” के तहत जो भी बातचीत और विचार-विमर्श चल रहा था, वह अब पूरा हो चुका है। यानी सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच जो बड़े मुद्दे थे, उन पर चर्चा खत्म हो गई है और एक तरह से सहमति बन चुकी है।
जनरल चौहान ने एक और महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने बताया कि थिएटर कमांड बनने के बाद सर्विस चीफ्स की कुछ शक्तियां कम हो सकती हैं, लेकिन इसके बावजूद तीनों सेनाएं इस बदलाव के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा कि यह फैसला राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर लिया जा रहा है। यानी तीनों सेनाएं अपनी-अपनी सीमाओं से ऊपर उठकर देश के बड़े हित के लिए एक साथ काम करने को तैयार हैं।
जनरल चौहान ने सबसे अहम बात यह कही कि थिएटर कमांड के कॉन्सेप्ट पर तीनों सेनाओं के बीच कोई मतभेद नहीं है। उनके मुताबिक, सभी सर्विस चीफ इस बात से सहमत हैं कि भविष्य के युद्ध के लिए यह सिस्टम जरूरी है। उन्होंने यह भी बताया कि कोई भी सेवा प्रमुख यह नहीं कह रहा कि थिएटर कमांड नहीं बनना चाहिए।
हालांकि उन्होंने यह भी माना कि कुछ मुद्दों पर अलग-अलग राय है, लेकिन ये मतभेद केवल इस बात को लेकर हैं कि इसे लागू कैसे किया जाए। इसे उन्होंने “मैनिफेस्टेशन” यानी कार्यान्वयन का हिस्सा बताया।
उनके अनुसार, मुख्य सवाल यह है कि यह बदलाव कितनी तेजी से हो, किस क्रम में हो और संसाधनों का बंटवारा कैसे किया जाए। खास तौर पर एयर एसेट्स यानी फाइटर जेट और दूसरे हवाई संसाधनों को लेकर चर्चा ज्यादा हुई है। लेकिन उन्होंने साफ कहा कि ये सभी मुद्दे सुलझाए जा सकते हैं।
सीडीएस ने यह भी बताया कि तीनों सेनाओं की तरफ से जो काम होना था, वह लगभग पूरा हो चुका है। उन्होंने कहा कि अब वह अपनी पूरी रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं और इसे जल्द ही रक्षा मंत्री को सौंप दिया जाएगा, जिसके बाद इस पर अंतिम फैसला लिया जाएगा।
क्या है Operation Tiranga
ऑपरेशन तिरंगा को समझने के लिए पहले यह समझना जरूरी है कि यह कोई जमीनी ऑपरेशन नहीं था। यह ऑपरेशन एक “टेबल टॉप एक्सरसाइज” यानी टीटीएक्स के रूप में किया गया, जहां असली युद्ध नहीं लड़ा गया, बल्कि अलग-अलग संभावित परिस्थितियों पर बैठकर चर्चा की गई। इसमें सेना, नौसेना और वायुसेना के प्रमुखों ने हिस्सा लिया और यह समझने की कोशिश की कि भविष्य में अगर एक साथ कई तरह के खतरे सामने आएं, तो उनसे कैसे निपटा जाए।
इस एक्सरसाइज में अलग-अलग हालात बनाए गए, जैसे अगर एक साथ दो सीमाओं पर तनाव बढ़ जाए या समुद्र में दुश्मन सक्रिय हो जाए, तो तीनों सेनाएं कैसे प्रतिक्रिया देंगी। इन सभी परिस्थितियों पर विस्तार से चर्चा हुई और हर स्थिति में फैसले लेने का तरीका तय किया गया।
कैसे हुई टेबल टॉप एक्सरसाइज
ऑपरेशन तिरंगा के दौरान कई तरह के काल्पनिक हालात तैयार किए गए। इनमें चीन के साथ सीमा तनाव, पाकिस्तान के साथ युद्ध, समुद्री खतरे, साइबर हमले और स्पेस से जुड़े खतरे शामिल थे। इन सभी स्थितियों पर बैठकर चर्चा की गई कि अगर ऐसा होता है तो कौन क्या करेगा और कैसे करेगा।
इस प्रक्रिया में “रोल प्ले” भी किया गया। यानी कुछ अधिकारियों को थिएटर कमांडर की भूमिका दी गई, कुछ को डिप्टी कमांडर की और कुछ को सर्विस चीफ की भूमिका में रखा गया। इसके जरिए यह समझा गया कि आदेश कैसे दिए जाएंगे, किसके पास कितना अधिकार होगा और किस तरह से संसाधनों का इस्तेमाल किया जाएगा।
मल्टी-डोमेन युद्ध पर फोकस
इस दौरान एक महत्वपूर्ण बात सामने आई कि केवल एक डोमेन यानी जमीन, हवा या समुद्र के आधार पर अब युद्ध नहीं जीता जा सकता। सभी डोमेन्स को एक साथ जोड़कर ही काम करना होगा। इसमें साइबर हमले, स्पेस टेक्नोलॉजी, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और जानकारी की लड़ाई भी शामिल होती है। यही वजह है कि इसे मल्टी-डोमेन अप्रोच कहा जाता है।
ऑपरेशन तिरंगा में इस बात पर खास ध्यान दिया गया कि कैसे एक कमांडर एक साथ सभी डोमेन्स को समझ सके और उनका इस्तेमाल कर सके। उदाहरण के तौर पर, अगर जमीन पर सेना आगे बढ़ रही है, तो उसी समय वायुसेना एयर सपोर्ट दे रही हो और नौसेना समुद्र में दुश्मन की सप्लाई रोक रही हो। (Operation Tiranga)
नए थिएटर कमांड्स की तैयारी
आज भारतीय सेनाएं अलग-अलग कमांड के तहत काम करती हैं। कुल मिलाकर करीब 17 कमांड हैं, जिनमें आर्मी, नेवी और वायुसेना की अपनी-अपनी व्यवस्था है। हर सर्विस का अपना अलग कमांड सिस्टम होता है। जैसे आर्मी का वेस्टर्न कमांड पाकिस्तान सीमा को देखता है, नॉर्दर्न कमांड चीन सीमा को संभालता है, जबकि वायुसेना का वेस्टर्न एयर कमांड जरूरत पड़ने पर एयर सपोर्ट देता है।
इस पूरे अभ्यास के बाद तीन बड़े थिएटर कमांड का प्रस्ताव तैयार किया गया। पहला वेस्टर्न थिएटर, जो पाकिस्तान पर फोकस करेगा। दूसरा नॉर्दर्न या ईस्टर्न थिएटर, जो चीन से जुड़े क्षेत्रों को संभालेगा। तीसरा मैरिटाइम थिएटर, जो समुद्री क्षेत्र की जिम्मेदारी संभालेगा।
इन तीनों थिएटर में अलग-अलग सेवाओं के अधिकारी कमांडर बनेंगे, लेकिन उनके साथ दूसरी सेवाओं के अधिकारी भी डिप्टी के रूप में काम करेंगे। इससे तीनों सेनाओं के बीच तालमेल बना रहेगा।
इसके अलावा एक और प्रस्ताव सामने आया, जिसमें वाइस चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की नई पोस्ट बनाने की बात कही गई है, जो ऑपरेशन के स्तर पर कॉर्डिनेशन में मदद करेगा।
इसके अलावा यह भी तय हुआ कि कुछ खास संसाधन, जैसे एयर रिफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट या बड़े सर्विलांस सिस्टम, सीधे वायुसेना के पास ही रहेंगे, ताकि जरूरत के हिसाब से उन्हें कहीं भी भेजा जा सके। (Operation Tiranga)
कौन लेगा ऑपरेशनल फैसले
इस नई व्यवस्था में सबसे बड़ा बदलाव फैसले लेने के तरीके में आएगा। अभी किसी ऑपरेशन के लिए अलग-अलग स्तर पर अनुमति लेनी पड़ती है। थिएटर कमांड में यह प्रक्रिया छोटी हो जाएगी।
इससे समय की बचत होगी और किसी भी आपात स्थिति में तेजी से प्रतिक्रिया दी जा सकेगी। साथ ही, अलग-अलग संसाधनों का बेहतर उपयोग भी हो पाएगा, क्योंकि सब कुछ एक ही कमांड के तहत होगा।
क्योंकि तीनों सेनाएं अभी अपने-अपने संसाधनों का इस्तेमाल अलग-अलग करती हैं। इससे कई बार एक ही तरह के संसाधन अलग-अलग जगहों पर उपयोग होते हैं, जिससे खर्च भी बढ़ता है और प्रभाव भी कम होता है।
थिएटर कमांड के जरिए सभी संसाधनों को एक साथ लाकर जरूरत के अनुसार इस्तेमाल किया जाएगा। इससे लॉजिस्टिक्स यानी सप्लाई सिस्टम भी मजबूत होगा और ऑपरेशन में कोई रुकावट नहीं आएगी। (Operation Tiranga)
ट्रेनिंग और तैयारी में बदलाव
थिएटर कमांड लागू होने के बाद सैनिकों की ट्रेनिंग में भी बदलाव आएगा। अब उन्हें सिर्फ अपने डोमेन की नहीं, बल्कि दूसरे डोमेन्स की भी जानकारी दी जाएगी।
इससे सैनिक और अधिकारी बेहतर तरीके से समझ पाएंगे कि युद्ध के समय किस तरह अलग-अलग सिस्टम एक साथ काम करते हैं। इससे उनकी तैयारी भी मजबूत होगी और ऑपरेशन के दौरान गलतियों की संभावना कम होगी।
अंडमान-निकोबार कमांड से मिली सीख
भारत में पहले से एक जॉइंट कमांड मौजूद है, जिसे अंडमान-निकोबार कमांड कहा जाता है। इसे मॉडल के तौर पर देखा गया।
यह कमांड तीनों सेनाओं को एक साथ लेकर काम करता है और लंबे समय से सक्रिय है। ऑपरेशन तिरंगा में इसके अनुभव का इस्तेमाल किया गया, ताकि नई व्यवस्था को बेहतर बनाया जा सके। (Operation Tiranga)
कमांड और कंट्रोल सिस्टम में बदलाव
थिएटर कमांड के साथ कमांड और कंट्रोल सिस्टम भी बदलेगा। इसमें कम्युनिकेशन, डेटा और इंटेलिजेंस को एक साथ जोड़ा जाएगा।
इसका मतलब है कि जमीन पर मौजूद सैनिक से लेकर ऊपर बैठे कमांडर तक, सभी को एक ही समय में एक जैसी जानकारी मिलेगी। इससे फैसले लेने में आसानी होगी।
थिएटर कमांड लागू होने के बाद क्या करेंगे सर्विस चीफ
सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने साफ बताया है कि थिएटर कमांड लागू होने के बाद आर्मी चीफ, नेवी चीफ और एयर चीफ की भूमिका बदल जाएगी। पहले ये चीफ्स ऑपरेशन भी संभालते थे और अपनी-अपनी सेना की तैयारी भी करते थे, लेकिन अब ये दोनों काम अलग हो जाएंगे।
अब युद्ध लड़ने की जिम्मेदारी थिएटर कमांडर के पास होगी। यानी किसी इलाके में अगर ऑपरेशन होता है, तो वहां एक ही कमांडर तीनों सेनाओं को मिलाकर काम करेगा।
थिएटर कमांड बनने के बाद सेवा चीफ्स का मुख्य काम अपनी-अपनी सेना को तैयार रखना होगा। इसे आसान भाषा में “रेज, ट्रेन और सस्टेन” कहा जाता है। (Operation Tiranga)
रेज का मतलब है नई यूनिट बनाना, भर्ती करना और नए हथियार व उपकरण शामिल करना। ट्रेन का मतलब है सैनिकों और अधिकारियों को अच्छी ट्रेनिंग देना, ताकि वे हर स्थिति में तैयार रहें। सस्टेन का मतलब है सेना को हमेशा तैयार रखना, जिसमें हथियारों की मरम्मत, गोला-बारूद, ईंधन और दूसरी जरूरी चीजों की सप्लाई शामिल है।
इसके अलावा सेवा चीफ्स अपने-अपने फोर्स की परंपरा और सिस्टम को बनाए रखेंगे। वे जरूरत पड़ने पर थिएटर कमांडर को तैयार और ट्रेन की हुई फोर्स उपलब्ध कराएंगे। साथ ही, वे रणनीतिक स्तर पर सीडीएस की मदद भी करेंगे।
पहले सेवा चीफ्स ही ऑपरेशन भी चलाते थे और सेना भी तैयार करते थे, जिससे कई बार तालमेल की कमी और देरी होती थी। अब ऑपरेशन और तैयारी दोनों काम अलग हो जाएंगे, जिससे काम ज्यादा तेजी और बेहतर तरीके से हो सकेगा। (Operation Tiranga)
क्या होगा स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड (SFC) का?
थिएटर कमांड बनने की प्रक्रिया के बीच एक बड़ा सवाल यह है कि स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड यानी SFC का क्या होगा। इस बारे में कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिला है। लेकिन सूत्रों का कहना है, एसएफसी को अलग ही रखा जाएगा। इसे थिएटर कमांड में शामिल नहीं किया जाएगा। क्योंकि चीन और रूस में भी स्ट्रेटेजिक फोर्सेस अलग-अलग हैं।
स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड की स्थापना 2003 में की गई थी। इसका मुख्य काम भारत के परमाणु हथियारों से जुड़ी पूरी व्यवस्था को संभालना है। इसमें जमीन से छोड़ी जाने वाली मिसाइलें, पनडुब्बी से दागी जाने वाली मिसाइलें और हवाई माध्यम से इस्तेमाल होने वाले परमाणु हथियार शामिल होते हैं। इनमें अग्नि मिसाइलें, सबमरीन-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइलें (SLBM), और एयर-ड्रॉप्ड न्यूक्लियर वेपंस शामिल हैं।
फिलहाल स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड के वर्तमान कमांडर-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल दिनेश सिंह राणा हैं, जो सीडीएस को रिपोर्ट करते हैं।
यह कमांड पहले से ही तीनों सेनाओं का संयुक्त सिस्टम है, यानी आर्मी, नेवी और वायुसेना, तीनों की न्यूक्लियर ताकत इसमें शामिल रहती है। इसका कंट्रोल बहुत ही उच्च स्तर पर होता है और यह सीधे राष्ट्रीय नेतृत्व के दिशा-निर्देशों के तहत काम करता है।
सूत्रों ने बताया कि थिएटर कमांड का काम सामान्य युद्ध यानी जमीन, हवा और समुद्र में होने वाले ऑपरेशन को संभालना होगा। लेकिन स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड का काम इससे अलग और ज्यादा संवेदनशील है, क्योंकि यह परमाणु हथियारों से जुड़ा है। (Operation Tiranga)
इसी वजह से इसे किसी क्षेत्रीय थिएटर कमांडर के अधीन नहीं रखा जा सकता। अगर ऐसा किया गया तो कमांड और कंट्रोल सिस्टम में जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड को अलग ही रखा जाएगा, ताकि इसका कंट्रोल सीधे राष्ट्रीय स्तर पर बना रहे।
स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड पहले की तरह अपनी जिम्मेदारी निभाता रहेगा। यह परमाणु हथियारों की सुरक्षा, नियंत्रण और जरूरत पड़ने पर उनके इस्तेमाल की तैयारी से जुड़ा रहेगा। थिएटर कमांडर्स को इसके संसाधनों पर सीधा कंट्रोल नहीं मिलेगा।
सूत्रों का कहना है कि अगर किसी स्थिति में कॉर्डिनेशन की जरूरत पड़ेगी, तो यह काम सीडीएस के जरिए किया जाएगा। यानी स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड और थिएटर कमांड्स के बीच तालमेल रहेगा, लेकिन कंट्रोल अलग-अलग रहेगा। (Operation Tiranga)
थिएटर कमांड बनने के बाद कितने 4-स्टार अफसर
थिएटर कमांड लागू होने के बाद भारतीय सेना में 4-स्टार अधिकारियों की संख्या बढ़ जाएगी। अभी स्थिति यह है कि सिर्फ चार ही 4-स्टार अधिकारी होते हैं, जिनमें एक सीडीएस, एक आर्मी चीफ, एक नेवी चीफ और एक एयर चीफ शामिल हैं।
लेकिन नई व्यवस्था लागू होने के बाद कुल 8 चार-स्टार अधिकारी होंगे। इनमें सबसे ऊपर सीडीएस होंगे। उनके अलावा एक नया पद बनेगा, जिसे वाइस चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (VCDS) कहा जाएगा। यह भी 4-स्टार रैंक का होगा।
इसके बाद तीनों सेनाओं के प्रमुख यानी आर्मी चीफ, नेवी चीफ और एयर चीफ पहले की तरह 4-स्टार रहेंगे। साथ ही तीन नए थिएटर कमांडर भी बनाए जाएंगे, जो अलग-अलग इलाकों की कमान संभालेंगे और ये भी 4-स्टार रैंक के होंगे। इस तरह कुल मिलाकर 8 बड़े अधिकारी होंगे। (Operation Tiranga)


