📍नई दिल्ली/कानपुर | 3 Jun, 2026, 12:01 PM
Drone Recovery Parachute System: भारत में ड्रोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में किसी तकनीकी खराबी, बैटरी फेल होने या ऑपरेशन के दौरान दुर्घटना की स्थिति में महंगे ड्रोन और उनके पेलोड को सुरक्षित बचाना एक बड़ी चुनौती बन गया है।
इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए रक्षा मंत्रालय के अधीन ग्लाइडर्स इंडिया लिमिटेड की कानपुर स्थित यूनिट ऑर्डनेंस पैराशूट फैक्टरी (ओपीएफ) ने ड्रोन रिकवरी पैराशूट सिस्टम के डेवलपमेंट के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया है। इस पहल का उद्देश्य भारतीय ड्रोन उद्योग, डिफेंस आर्गेनाइजेशंस, रिसर्च आर्गेनाइजेशंस और टेक्निकल कंपनियों के साथ मिलकर ऐसे स्वदेशी रिकवरी सिस्टम तैयार करना है, जो किसी आपात स्थिति में ड्रोन को सुरक्षित तरीके से जमीन पर उतार सकें और महंगे उपकरणों को नुकसान से बचा सकें।
Drone Recovery Parachute System: ड्रोन के बढ़ते इस्तेमाल के साथ बढ़ी सुरक्षा की जरूरत
पिछले कुछ वर्षों में भारत में ड्रोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। रक्षा क्षेत्र, सीमा निगरानी, पुलिसिंग, कृषि, आपदा प्रबंधन, मेडिकल सप्लाई, लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक सर्वेक्षण जैसे क्षेत्रों में ड्रोन महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
हालांकि ड्रोन तकनीक जितनी उपयोगी है, उससे जुड़े जोखिम भी उतने ही गंभीर हैं। उड़ान के दौरान बैटरी खराब होना, मोटर फेल होना, जीपीएस सिग्नल खोना या किसी तकनीकी खराबी के कारण ड्रोन अचानक जमीन पर गिर सकता है। ऐसे मामलों में न केवल लाखों रुपये का ड्रोन नष्ट हो सकता है, बल्कि उसमें लगे कैमरे, सेंसर या अन्य महंगे उपकरण भी खराब हो सकते हैं।
इसी चुनौती से निपटने के लिए ड्रोन रिकवरी पैराशूट सिस्टम जरूरी माना जा रहा है। यह सिस्टम किसी आपात स्थिति में तुरंत एक्टिव होकर ड्रोन की स्पीड को कंट्रोल करता है और उसे सुरक्षित तरीके से जमीन पर उतारने में मदद करता है।
आयातित रिकवरी सिस्टम पर निर्भर
कानपुर स्थित ऑर्डनेंस पैराशूट फैक्टरी लंबे समय से डिफेंस प्रोडक्शन से जुड़ी रही है। साल 1941 में स्थापित यह फैक्टरी सेना के लिए विभिन्न प्रकार के पैराशूट, एयरोस्पेस टेक्सटाइल और विशेष सुरक्षा उपकरण बनाती रही है।
ओपीएफ पहले से सैनिकों के पैराशूट, कार्गो पैराशूट, ब्रेक पैराशूट और अन्य विशेष उपयोग वाले सिस्टम तैयार करती है। अब फैक्टरी अपने इसी अनुभव का उपयोग ड्रोन रिकवरी पैराशूट विकसित करने में करना चाहती है।
सूत्रों का कहना है कि वर्तमान में कई भारतीय ड्रोन निर्माता विदेशी तकनीक या आयातित रिकवरी सिस्टम पर निर्भर हैं। यदि यह तकनीक देश में विकसित होती है तो लागत कम होगी और घरेलू उद्योग को भी मजबूती मिलेगी। (Drone Recovery Parachute System)
किन-किन ड्रोन के लिए बनेगा सिस्टम
ओपीएफ ने कहा है कि वह हर कैटेगरी के ड्रोन के लिए रिकवरी सॉल्युशन डेवलप करने की संभावनाएं तलाश रही है।
इसमें छोटे नैनो ड्रोन से लेकर बड़े मिलिटरी यूएवी तक शामिल हैं। फैक्टरी ने ड्रोन को उनके अधिकतम टेक-ऑफ वजन के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा है। इनमें 250 ग्राम तक के नैनो ड्रोन, 2 किलोग्राम तक के माइक्रो ड्रोन, 25 किलोग्राम तक के स्मॉल ड्रोन, 150 किलोग्राम तक के मीडियम यूएवी, 600 किलोग्राम तक के बड़े यूएवी और उससे ऊपर की कैटेगरी के ड्रोन शामिल हैं।
ओपीएफ ने ईओआई के तहत हिस्सा लेने वाली कंपनियों और संस्थानों से उनके ड्रोन प्लेटफॉर्म से जुड़ी विस्तृत जानकारी मांगी है।
कंपनियों को अपने ड्रोन का मॉडल, प्रकार, वजन, पेलोड क्षमता, उड़ान ऊंचाई, गति और वर्तमान रिकवरी सिस्टम की जानकारी देनी होगी। इसके अलावा यह भी बताना होगा कि उन्हें किस प्रकार के पैराशूट सिस्टम की जरूरत है।
ओपीएफ यह जानना चाहती है कि ड्रोन के लिए इमरजेंसी रिकवरी सिस्टम चाहिए या मिशन पूरा होने के बाद सुरक्षित लैंडिंग के लिए अलग पैराशूट चाहिए। इसके अलावा पेलोड रिकवरी, नाइट रिकवरी, समुद्र में रिकवरी और फ्लोटेशन जैसी विशेष जरूरतों पर भी सुझाव मांगे गए हैं। (Drone Recovery Parachute System)
तकनीकी मानकों पर रहेगा विशेष फोकस
ईओआई में रिकवरी सिस्टम से जुड़े कई महत्वपूर्ण तकनीकी पहलुओं का भी जिक्र किया गया है। इसमें ड्रोन का वजन, पैराशूट खुलने की न्यूनतम ऊंचाई, अधिकतम गति, सुरक्षित अवतरण दर, सिस्टम की विश्वसनीयता और पैकिंग आकार जैसी जानकारियां शामिल हैं।
ओपीएफ यह भी जानना चाहती है कि अलग-अलग ऑपरेशनल परिस्थितियों में सिस्टम को कैसे काम करना चाहिए। इसमें अत्यधिक गर्मी, ठंड, बारिश, नमी और समुद्री वातावरण जैसी परिस्थितियां शामिल हैं।
मिलिटरी और सिविल दोनों क्षेत्रों के लिए समाधान
ओपीएफ ने स्पष्ट किया है कि वह केवल रक्षा उपयोग तक सीमित नहीं रहना चाहती। ड्रोन रिकवरी पैराशूट सिस्टम का उपयोग मेडिकल सप्लाई ड्रोन, कृषि ड्रोन, सर्विलांस प्लेटफॉर्म, मैपिंग ड्रोन, लॉजिस्टिक्स ड्रोन और समुद्री निगरानी ड्रोन में भी किया जा सकता है।
डिफेंस सेक्टर में इनका इस्तेमाल टोही मिशन, सीमा निगरानी और अन्य संवेदनशील अभियानों में किया जा सकता है। वहीं नागरिक क्षेत्र में यह तकनीक महंगे उपकरणों और संवेदनशील पेलोड की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है।
उद्योग के साथ मिलकर होगा विकास
ओपीएफ ने इस परियोजना के लिए कई प्रकार के सहयोग का प्रस्ताव रखा है। इसमें संयुक्त अनुसंधान, प्रोटोटाइप विकास, तकनीकी हस्तांतरण, दीर्घकालिक उत्पादन समझौते और निर्यात केंद्रित विनिर्माण शामिल हैं।
फैक्टरी का मानना है कि निजी कंपनियों, स्टार्टअप्स, अनुसंधान संस्थानों और रक्षा उद्योग के साथ साझेदारी करके बेहतर और व्यावहारिक समाधान विकसित किए जा सकते हैं। (Drone Recovery Parachute System)
ओपीएफ के पास मौजूद हैं आधुनिक सुविधाएं
ड्रोन रिकवरी सिस्टम डेवलप करने के लिए ओपीएफ के पास पहले से मजबूत तकनीकी आधार मौजूद है। फैक्टरी में पैराशूट डिजाइन, एयरोस्पेस टेक्सटाइल इंजीनियरिंग, कंप्यूटर आधारित डिजाइन, प्रोटोटाइप निर्माण, ग्राउंड टेस्टिंग और फ्लाइट टेस्टिंग जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं।
इसके अलावा क्वॉलिटी कंट्रोल, एन्वायरनमेंटल टेस्टिंग और बड़े पैमाने पर उत्पादन की क्षमता भी मौजूद है। यही कारण है कि ओपीएफ खुद को इस क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाने के लिए तैयार मान रही है।
ड्रोन उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षित रिकवरी सिस्टम किसी भी ड्रोन इकोसिस्टम का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। ऐसे सिस्टम न केवल महंगे प्लेटफॉर्म को बचाते हैं बल्कि मिशन की सफलता और ऑपरेशनल सेफ्टी को भी बढ़ाते हैं। भारत में इस तकनीक का विकास रक्षा और नागरिक दोनों क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। (Drone Recovery Parachute System)


