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Explained: ड्रोन से टैंक नहीं, पेंट करेगा रक्षा! रूस ने मिलिटरी ट्रकों को क्यों बना दिया चलता-फिरता जेब्रा?

रूस और यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष में अब एक-दूसरे की सप्लाई लाइनों को भी निशाना बनाया जा रहा रहा है। यूक्रेनी सेना और उसकी खुफिया एजेंसी लगातार रूस के उन ट्रकों, ईंधन टैंकरों और गोला-बारूद वाहनों पर हमले कर रही हैं जो मोर्चे पर सैनिकों तक जरूरी सामान पहुंचाते हैं...

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📍मॉस्को/कीव | 3 Jun, 2026, 8:21 PM

Russian Zebra Camouflage Trucks: रूस-यूक्रेन युद्ध में अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन और स्मार्ट सर्विलांस सिस्टम ने टैंकों, मिसाइलों और लड़ाकू विमानों की जगह ले ली है। लो कॉस्ट ड्रोन के आगे सब फेल हैं। ड्रोन जब चाहे, जिसे चाहे निशाना बना लेते हैं। यहां तक कि ग्राउंड बेस्ड वेपन सिस्टम और लॉजिस्टिक्स व्हीकल्स को ड्रोन की नजरों से बचाने में भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। इसी बीच रूस ने अपने मिलिटरी लॉजिस्टिक्स व्हीकल्स को बचाने के लिए एक नई और अनोखी रणनीति अपनाई है।

हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर रूस के कई सैन्य ट्रकों की तस्वीरें सामने आई हैं। इन ट्रकों पर काले और सफेद रंग की धारियां बनाई गई हैं, जो देखने में बिल्कुल जेब्रा की खाल जैसी लगती हैं। पहली नजर में यह रंग-रोगन किसी प्रयोग या कलात्मक डिजाइन जैसा दिखेगा, लेकिन इसके पीछे एक गंभीर वजह छिपी हुई है।

रूस का मानना है कि यह विशेष पेंट पैटर्न यूक्रेन के ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-बेस्ड टारगेट रिकॉग्निशन सिस्टम को कन्फ्यूज कर सकता है। इसी वजह से इसे आधुनिक युद्ध में इस्तेमाल होने वाले नए तरह के कैमोफ्लाज के रूप में देखा जा रहा है।

Russian Zebra Camouflage Trucks

Russian Zebra Camouflage Trucks: सप्लाई लाइनों पर बढ़े हमलों ने बढ़ाई चिंता

रूस और यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष में अब एक-दूसरे की सप्लाई लाइनों को भी निशाना बनाया जा रहा रहा है।
यूक्रेनी सेना और उसकी खुफिया एजेंसी लगातार रूस के उन ट्रकों, ईंधन टैंकरों और गोला-बारूद वाहनों पर हमले कर रही हैं जो मोर्चे पर सैनिकों तक जरूरी सामान पहुंचाते हैं। पश्चिमी रूस, क्रीमिया और रूस के कब्जे वाले यूक्रेनी इलाकों में ऐसे हमले बढ़े हैं।

किसी भी सेना के लिए लॉजिस्टिक्स उसकी लाइफलाइन मानी जाती है। यदि सैनिकों तक समय पर गोला-बारूद, ईंधन, भोजन और उपकरण नहीं पहुंचते, तो ऑपरेशन पर असर पड़ सकता है। यही कारण है कि रूस अब इन वाहनों की सुरक्षा के लिए नए-नए उपाय अपना रहा है।

Russian Zebra Camouflage Trucks

आखिर क्या है ‘जेब्रा पैटर्न’?

रूस द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा यह पैटर्न सामान्य सैन्य रंगों से बिल्कुल अलग है। इसमें ट्रकों के पूरे ढांचे पर सफेद और काले रंग की मोटी धारियां बनाई जाती हैं।

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कुछ ट्रकों पर सीधी धारियां दिखाई देती हैं, जबकि कुछ पर पत्तियों या घुमावदार आकृतियों जैसी डिजाइन बनाई गई है। खास बात यह है कि यह पैटर्न केवल वाहन के बॉडी हिस्से तक सीमित नहीं है। पहियों, टायरों और कई बाहरी हिस्सों पर भी यही रंग किया गया है। इनका उद्देश्य वाहन को छिपाना नहीं, बल्कि उसकी ऑरिजनल शेप को तोड़ना है। (Russian Zebra Camouflage Trucks)

Russian Zebra Camouflage Trucks

प्रथम विश्व युद्ध से मिली प्रेरणा

हालांकि यह रणनीति पूरी तरह नई नहीं है। लगभग एक सदी पहले प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश नौसेना ने अपने युद्धपोतों पर इसी तरह का कैमोफ्लाज इस्तेमाल किया था।

उस समय जर्मन पनडुब्बियां समुद्र में ब्रिटिश जहाजों को निशाना बना रही थीं। जहाजों को पूरी तरह छिपाना संभव नहीं था, इसलिए एक अलग तरीका अपनाया गया। जहाजों पर काले और सफेद रंग के बड़े-बड़े जियोमेट्रिक पैटर्न बनाए गए।

इस तकनीक को डैजल कैमोफ्लाज कहा गया। इसका मकसद जहाज को अदृश्य बनाना नहीं था, बल्कि दुश्मन को उसकी दिशा, गति और दूरी का सही अनुमान लगाने से रोकना था। आज रूस उसी रणनीति का युद्ध में फिर से इस्तेमाल कर रहा है।

Russian Zebra Camouflage Trucks

AI बेस्ड ड्रोन को कैसे कन्फ्यूज करता है यह पेंट?

आधुनिक युद्ध में इस्तेमाल होने वाले कई ड्रोन अब केवल कैमरे पर निर्भर नहीं रहते। उनमें मशीन विजन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक भी लगी होती है।

यह तकनीक ड्रोन को वाहन, टैंक, रडार, तोप और अन्य मिलिटरी टारगेट्स की पहचान करने में मदद करती है। ड्रोन का सॉफ्टवेयर हजारों तस्वीरों के आधार पर सीखता है कि किसी टारगेट को कैसे पहचाना जाए।

जब किसी ट्रक पर असामान्य पैटर्न बना दिया जाता है, तो उसकी सामान्य आकृति टूट जाती है। वाहन के किनारे, छत और पहियों की पहचान करना कठिन हो जाता है।

ऐसी स्थिति में एआई बेस्ड सिस्टम कभी-कभी लक्ष्य को सही ढंग से क्लासिफाइड नहीं कर पाता। इससे टारगेट पहचानने में अधिक समय लग सकता है या ड्रोन को दोबारा पुष्टि करनी पड़ सकती है। (Russian Zebra Camouflage Trucks)

मशीन विजन के लिए क्यों चुनौती है यह डिजाइन?

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-बेस्ड टारगेट रिकॉग्निशन सिस्टम वस्तुओं की रूपरेखा, आकार और किनारों के आधार पर काम करती है।

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जेब्रा जैसी धारियां वाहन के वास्तविक आकार को छिपा देती हैं। कैमरे को कई अतिरिक्त रेखाएं और नकली किनारे दिखाई देते हैं। इससे सॉफ्टवेयर के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि सामने वास्तव में ट्रक है या कुछ और।

जानकारों के मुताबिक तरीका टारगेट रिकॉग्निशन सिस्टम को धीमा कर सकता है। कई बार ड्रोन को टारगेट की पुष्टि करने में अतिरिक्त समय लग सकता है।

ऑपरेटरों के लिए भी पैदा हो सकती है परेशानी

सिर्फ एआई ही नहीं, ड्रोन उड़ाने वाले ह्यूमन ऑपरेटरों को भी इस तरह के पैटर्न से दिक्कत हो सकती है।

जब कोई ट्रक तेज रफ्तार से चल रहा हो और उसके आसपास पेड़, झाड़ियां या अन्य वाहन मौजूद हों, तब उसकी दिशा और रफ्तार का अनुमान लगाना कठिन हो सकता है। (Russian Zebra Camouflage Trucks)

रूस पहले भी आजमा चुका है कई अनोखे उपाय

यह पहली बार नहीं है जब रूस ने ड्रोन हमलों से बचने के लिए असामान्य उपाय अपनाए हों।

युद्ध के शुरुआती चरण में कई रूसी ट्रकों पर लकड़ियों का अस्थायी कवच लगाया गया था। इसका उद्देश्य छोटे ड्रोन और गोलियों से कुछ अतिरिक्त सुरक्षा प्राप्त करना था।

इसके बाद रूसी टैंकों पर लोहे की जालीदार संरचनाएं लगाई गईं, जिन्हें बाद में कोप केज और टर्टल टैंक जैसे नाम मिले। जिसे पूरी दुनिया की सेनाओं ने फॉलो किया।

कई वाहनों पर जाल, अतिरिक्त प्लेटें और स्पाइक जैसे स्ट्रक्चर भी लगाए गए ताकि ड्रोन सीधे वाहन से टकराने से पहले ही रूक जाएं। (Russian Zebra Camouflage Trucks)

विमानों पर भी अपनाई गई थी ऐसी रणनीति

साल 2023 में सैटेलाइट तस्वीरों में रूस के कुछ बॉम्बर्स पर पुराने टायर रखे हुए दिखाई दिए थे। उस समय कई विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया था कि यह यूक्रेनी ड्रोन और क्रूज मिसाइलों की इमेज-मैचिंग टेक्नोलॉजी को कन्फ्यूज्ड करने की कोशिश भी हो सकती है।

बाद में अमेरिकी सैन्य तकनीकी विशेषज्ञों ने भी संकेत दिया कि किसी विमान के आइडेंटिफिकेशन सिस्टम कन्फ्यूज करने के लिए ऐसा किया जा सकता है।

क्योंकि टायरों के कारण विमान का सामान्य आकार बदल जाता है और कंप्यूटर विजन मॉडल को लक्ष्य पहचानने में परेशानी हो सकती है। (Russian Zebra Camouflage Trucks)

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क्या सफल है यह रणनीति?

सैन्य विशेषज्ञों की राय इस मुद्दे पर बंटी हुई है। कुछ का मानना है कि यदि ड्रोन पूरी तरह ऑटोनॉमस मोड में टारगेट खोज रहा हो, तो इस तरह का कैमोफ्लाज उसके आइडेंटिफिकेशन सिस्टम को प्रभावित कर सकता है।

वहीं कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक ड्रोन केवल कैमरों पर निर्भर नहीं रहते। कई सिस्टम्स में थर्मल सेंसर, इन्फ्रारेड कैमरे और दूसरे एडवांस उपकरण भी होते हैं।

ऐसी स्थिति में केवल रंग बदल देने से हर प्रकार के सेंसर को धोखा देना संभव नहीं होगा। (Russian Zebra Camouflage Trucks)

ड्रोन युद्ध ने बदल दी सैन्य सोच

रूस-यूक्रेन युद्ध को दुनिया का पहला बड़े पैमाने का ड्रोन युद्ध भी कहा जा रहा है।

दोनों देश हजारों ड्रोन का इस्तेमाल कर रहे हैं। छोटे एफपीवी ड्रोन से लेकर लंबी दूरी तक मार करने वाले कामिकाजे ड्रोन तक, सब हमलों में इस्तेमाल हो रहे हैं। इन ड्रोन की वजह से टैंक, ट्रक, रडार और गोला-बारूद डिपो पहले की तुलना में अधिक असुरक्षित हो गए हैं।

वहीं, युद्ध के दौरान अग्रिम मोर्चे पर लड़ रहे सैनिकों तक जरूरी सामग्री पहुंचाना किसी भी सेना की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। रूस के लिए भी यह चुनौती कम नहीं है। लंबी दूरी तक फैले मोर्चों पर लगातार ईंधन, गोला-बारूद और अन्य सामग्री भेजनी पड़ती है।

यूक्रेनी ड्रोन इन्हीं सप्लाई मार्गों को निशाना बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में जेब्रा पैटर्न वाले ट्रकों को रूस की एक कम लागत वाली लेकिन सुरक्षा रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। (Russian Zebra Camouflage Trucks)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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