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सेना की एयर डिफेंस ट्रेनिंग में बड़ा बदलाव! मल्टीरोटर कॉप्टर, स्वॉर्म ड्रोन और रॉकेट पर प्रैक्टिस करेंगे जवान

भारतीय सेना अब एयर डिफेंस ट्रेनिंग को केवल पारंपरिक टारगेट्स तक सीमित नहीं रखना चाहती। बदलते युद्धक्षेत्र में ड्रोन, स्वॉर्म और हीट सिग्नेचर आधारित खतरों को ध्यान में रखते हुए ट्रेनिंग स्ट्रक्चर को उसी स्तर पर ढालने की तैयारी की जा रही है...

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📍नई दिल्ली | 16 Jun, 2026, 8:39 AM

Indian Army Air Defence Training: आज बैटलफील्ड में ड्रोन, स्वॉर्म ड्रोन, क्रूज मिसाइल, स्मार्ट बम और हीट सीकिंग हथियारों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। ऐसे में इन खतरों से ग्राउंड पर निपटने वाली भारतीय सेना की एयर डिफेंस यूनिट्स को भी उसी स्तर की ट्रेनिंग की जरूरत है, जैसी उन्हें असली युद्ध के दौरान मिल सकती है।

भारतीय सेना के आर्मी एयर डिफेंस महानिदेशालय ने तीन अलग-अलग रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन यानी आरएफआई जारी की हैं। इनमें मल्टीरोटर कॉप्टर बेस्ड बेसिक टारगेट सिस्टम, स्वॉर्म ड्रोन बेस्ड बेसिक टारगेट सिस्टम और इंटरमीडिएट टारगेट सिस्टम रॉकेट शामिल हैं।

भारतीय सेना अब एयर डिफेंस ट्रेनिंग को केवल पारंपरिक टारगेट्स तक सीमित नहीं रखना चाहती। बदलते युद्धक्षेत्र में ड्रोन, स्वॉर्म और हीट सिग्नेचर आधारित खतरों को ध्यान में रखते हुए ट्रेनिंग स्ट्रक्चर को उसी स्तर पर ढालने की तैयारी की जा रही है, ताकि सैनिकों को अभ्यास के दौरान वास्तविक परिस्थितियों के सबसे करीब अनुभव मिल सके।

Indian Army Air Defence Training: क्यों बदल रही है एयर डिफेंस ट्रेनिंग

दुनिया भर के सैन्य अभियानों ने यह साबित किया है कि केवल बड़े लड़ाकू विमान ही खतरा नहीं हैं। छोटे ड्रोन भी अब निगरानी, लक्ष्य निर्धारण और सीधे हमले करने में सक्षम हो चुके हैं। कई देशों ने स्वॉर्म ड्रोन तकनीक विकसित कर ली है, जिसमें दर्जनों ड्रोन एक साथ कॉर्निडेटेड तरीके से हमला कर सकते हैं।

सेना की तरफ से जारी डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक एयर डिफेंस युनिट्स को चौथी और पांचवीं पीढ़ी के विमानों के साथ-साथ क्रूज मिसाइलों और अनमैन्ड एरियल सिस्टम जैसे नए खतरों का मुकाबला करने के लिए तैयार करना जरूरी हो गया है। इसी कारण ऐसे टारगेट सिस्टम की आवश्यकता महसूस की गई है जो वास्तविक दुश्मन की तरह व्यवहार कर सकें और सैनिकों को व्यावहारिक अनुभव दे सकें। (Indian Army Air Defence Training)

मल्टीरोटर कॉप्टर बनेगा टारगेट

पहला सिस्टम मल्टीरोटर कॉप्टर बेस्ड टारगेट सिस्टम है। इसका मुख्य उद्देश्य ऐसे टारगेट उपलब्ध कराना है जो धीमी गति से उड़ने वाले हेलीकॉप्टर या छोटे ड्रोन जैसे दिखाई दें।

यह सिस्टम पूरी तरह मॉड्यूलर होगा, यानी इसे अलग-अलग हिस्सों में ले जाकर मौके पर जल्दी से जोड़ा जा सकेगा। इसमें वर्टिकल टेक ऑफ और लैंडिंग क्षमता होगी। इसका मतलब यह है कि इसे रनवे की जरूरत नहीं होगी और यह सीधे जमीन से ऊपर उठ सकेगा।

सिस्टम में ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन और रेडियो डेटा लिंक भी शामिल होगा। एक ही कंट्रोल स्टेशन से कम से कम दो एरियल टारगेट्स को कंट्रोल किया जा सकेगा। इससे ट्रेनिंग के दौरान एक साथ कई तरह की परिस्थितियां बनाई जा सकेंगी।

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सेना चाहती है कि इस प्लेटफॉर्म पर अलग-अलग प्रकार के पेलोड लगाए जा सकें। इनमें रडार क्रॉस सेक्शन बढ़ाने वाला उपकरण शामिल होगा, जिससे टारगेट रडार स्क्रीन पर ज्यादा स्पष्ट दिखाई देगा। इसके अलावा इंफ्रा रेड सिग्नेचर बढ़ाने वाला सिस्ट्म भी होगी ताकि हीट सीकिंग मिसाइलें टारगेट को पहचान सकें।

गति और उड़ान क्षमता पर विशेष जोर

सेना ने इस सिस्टम के लिए कई तकनीकी मानक तय किए हैं। बिना अतिरिक्त पेलोड के इसकी अधिकतम गति कम से कम 30 मीटर प्रति सेकंड होनी चाहिए। अलग अलग स्पीड पर इसकी फ्लाइट ड्यूरेशन भी तय किय गया है ताकि लंबे समय तक अभ्यास कराया जा सके।

ऑपरेशनल रेंज 15 किलोमीटर या उससे अधिक रखने की मांग की गई है। इसके अलावा यह ऊंचाई वाले इलाकों में भी काम करने में सक्षम होना चाहिए। सेना चाहती है कि इसे समुद्र तल से 4200 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई पर भी ऑपरेट किया जा सके।

इस तरह की क्षमता विशेष रूप से लद्दाख और अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में उपयोगी साबित होती है, जहां सामान्य ड्रोन का प्रदर्शन प्रभावित हो सकता है। (Indian Army Air Defence Training)

स्वॉर्म ड्रोन से होगी नई तरह की ट्रेनिंग

दूसरा आरएफआई स्वॉर्म ड्रोन टारगेट सिस्टम से जुड़ा है। स्वॉर्म तकनीक में कई ड्रोन एक समूह के रूप में काम करते हैं और एक-दूसरे के साथ कॉर्डिनेट करके मिशन पूरा करते हैं।

सेना जिस सिस्टम की तलाश कर रही है उसमें 12 ड्रोन का एक सेट होगा। ये सभी ड्रोन ऑटोनॉमस तरीके से उड़ान भर सकेंगे और समूह में ऑपरेट होंगे। प्रत्येक ड्रोन में वर्टिकल टेक ऑफ और लैंडिंग क्षमता होगी।

ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन के माध्यम से पूरे स्वॉर्म को प्रोग्राम किया जा सकेगा। ऑपरेटर पहले से उड़ान मार्ग निर्धारित कर सकेंगे और ड्रोन उसी के अनुसार काम करेंगे।

इस तरह के टारगेट्स एयर डिफेंस वेपंस के लिए चुनौतीपूर्ण स्थिति तैयार करते हैं क्योंकि एक साथ कई टारगेट दिखाई देते हैं। इससे जवानों को वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियों में निर्णय लेने का अनुभव मिलता है।

कमांड लिंक टूटने पर भी मिशन जारी

स्वॉर्म सिस्टम की एक दिलचस्प विशेषता उसकी सुरक्षा व्यवस्था है। यदि किसी कारण से कंट्रोल लिंक टूट जाए तो ड्रोन स्वतः निर्धारित मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं।

पहले मोड में ड्रोन पहले से तय वेपॉइंट के अनुसार उड़ान जारी रखेंगे और फिर निर्धारित लैंडिंग क्षेत्र में लौट आएंगे। दूसरे मोड में वे सीधे रिटर्न टू होम प्रक्रिया शुरू कर देंगे।

इससे ट्रेनिंग के दौरान दुर्घटना की संभावना कम होती है और महंगे उपकरणों को सुरक्षित वापस लाया जा सकता है।

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रॉकेट बेस्ड टारगेट क्यों है खास

तीसरा और सबसे अलग सिस्टम इंटरमीडिएट टारगेट सिस्टम रॉकेट है। यह विशेष रूप से इंफ्रा रेड होमिंग मिसाइलों की ट्रेनिंग के लिए तैयार किया जा रहा है।

ऐसी मिसाइलें टारगेट की गर्मी को पहचानकर उसकी ओर बढ़ती हैं। इसलिए अभ्यास के दौरान ऐसे टारगेट की जरूरत होती है जो वास्तविक विमान या हेलीकॉप्टर जैसी गर्मी पैदा कर सके।

सेना के दस्तावेज में स्पष्ट किया गया है कि रॉकेट पूरे ऑपरेशन के दौरान इंफ्रा रेड सिग्नेचर देता रहे ताकि हीट सीकिंग मिसाइलें उस पर लॉक कर सकें। (Indian Army Air Defence Training)

रॉकेट की तकनीकी क्षमताएं

सेना ने रॉकेट के लिए न्यूनतम रफ्तार 180 मीटर प्रति सेकंड निर्धारित की है। इसकी उड़ान अवधि कम से कम 30 सेकंड होनी चाहिए। साथ ही इंफ्रा रेड सोर्स कम से कम 20 सेकंड तक लगातार पर्याप्त गर्मी प्रदान करे ताकि मिसाइल प्रभावी ढंग से लक्ष्य को ट्रैक कर सके।

रॉकेट की प्रभावी रेंज 6 किलोमीटर से अधिक होनी चाहिए। लॉन्च की तैयारी 15 मिनट से कम समय में पूरी हो जानी चाहिए। इसके अलावा इसकी चढ़ाई दर 30 मीटर प्रति सेकंड से ज्यादा मांगी गई है।

सेना चाहती है कि लॉन्चर को अलग-अलग दिशा और कोण में घुमाया जा सके। इससे विभिन्न प्रकार की उड़ान प्रोफाइल बनाई जा सकेंगी और मिसाइल ऑपरेटरों को अलग-अलग परिस्थितियों में अभ्यास मिलेगा। (Indian Army Air Defence Training)

सुरक्षा को लेकर भी कड़े मानक

रॉकेट सिस्टम में फ्लेयर गिरने से रोकने के लिए विशेष सुरक्षा उपाय मांगे गए हैं। दस्तावेज में स्टेनलेस स्टील मेश या उससे बेहतर व्यवस्था की मांग की गई है।

इसके अलावा यह सिस्टम हल्की बारिश, कोहरे और बादलों वाली परिस्थितियों में भी काम करने में सक्षम होना चाहिए। सेना ने यह भी स्पष्ट किया है कि पूरा सिस्टम सड़क, रेल, वायु और समुद्री मार्ग से आसानी से परिवहन योग्य होना चाहिए।

रिकॉर्डिंग और डेटा विश्लेषण पर फोकस

मॉडर्न मिलिटरी ट्रेनिंग सिस्टम केवल फायरिंग तक सीमित नहीं है। हर अभ्यास के बाद डेटा का विश्लेषण भी किया जाता है।

इसी कारण सेना ने रिकॉर्डिंग सुविधा को अनिवार्य बनाया है। ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन कम से कम दो घंटे तक मिशन डेटा रिकॉर्ड कर सके और उसके पास न्यूनतम 256 जीबी डेटा स्टोरेज हो।

इस रिकॉर्डिंग से ट्रेनर यह देख सकते हैं कि टारगेट किस दिशा में गया, मिसाइल या हथियार का रेस्पॉन्स कैसा रही और ऑपरेटर ने किस तरह निर्णय लिए। (Indian Army Air Defence Training)

स्वदेशीकरण पर विशेष जोर

रक्षा खरीद प्रक्रिया में इस बार भी स्वदेशी सामग्री को बड़ी प्राथमिकता दी गई है। सेना ने स्पष्ट किया है कि कुल इंडिजिनस कंटेंट कम से कम 50 प्रतिशत होना चाहिए। इसमें भारत में निर्मित मटेरियल, कंपोनेंट और सॉफ्टवेयर शामिल होंगे।

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वेंडर्स को यह भी बताना होगा कि कौन-कौन से सबसिस्टम्स पूरी तरह देश में बनाए गए हैं और किन तकनीकों के लिए विदेशी निर्भरता बनी हुई है।

इससे सेना केवल तैयार उत्पाद नहीं बल्कि उसकी तकनीकी आत्मनिर्भरता का भी मूल्यांकन कर सकेगी। (Indian Army Air Defence Training)

कैसे चलेगी खरीद प्रक्रिया

तीनों सिस्टम्स के लिए सिंगल स्टेज टू बिड सिस्टम अपनाया जाएगा। कंपनियों को तकनीकी और व्यावसायिक प्रस्ताव अलग-अलग सीलबंद लिफाफों में जमा करने होंगे। व्यावसायिक प्रस्ताव कम से कम 18 महीने तक वैध रहेगा।

तकनीकी मूल्यांकन समिति पहले प्रस्तावों की जांच करेगी। जो कंपनियां इस चरण में सफल होंगी उनके उपकरणों का भारत में परीक्षण किया जाएगा। यह परीक्षण नो कॉस्ट नो कमिटमेंट आधार पर होगा, यानी सेना पर कोई वित्तीय दायित्व नहीं होगा।

इसके बाद स्टाफ मूल्यांकन और अंतिम चयन की प्रक्रिया पूरी होगी। सबसे कम कीमत वाले पात्र विक्रेता को अनुबंध दिया जाएगा। (Indian Army Air Defence Training)

वेंडर्स को देनी होगी विस्तृत जानकारी

वेंडर्स को यह बताना होगा कि उनका सिस्टम कितनी ऊंचाई तक काम कर सकता है, उसकी अधिकतम गति क्या है, उसमें कितनी स्वदेशी तकनीक है और भविष्य में उसका रखरखाव कैसे किया जाएगा।

कंपनियों से यह भी पूछा गया है कि क्या वे प्रशिक्षण सिम्युलेटर, रखरखाव उपकरण और तकनीकी साहित्य उपलब्ध करा सकती हैं, ताकि सेना लंबे समय तक इन प्रणालियों का उपयोग कर सके।

आरएफआई के अनुसार प्री सबमिशन बैठक 17 जुलाई 2026 को आयोजित की जाएगी, जहां कंपनियां अपनी शंकाओं का समाधान कर सकेंगी। इसके बाद प्रस्ताव जमा करने की अंतिम प्रक्रिया अगस्त में पूरी होगी। दस्तावेज जमा करने के लिए सेना भवन में विशेष ड्रॉप बॉक्स की व्यवस्था की जाएगी। (Indian Army Air Defence Training)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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