📍नई दिल्ली | 9 Jun, 2026, 11:37 AM
AI Anti Drone System: कुछ साल पहले तक लड़ाकू विमान, टैंक और मिसाइलें किसी भी सेना की पहचान मानी जाती थीं, लेकिन अब छोटे और सस्ते ड्रोन भी युद्ध का समीकरण बदल रहे हैं। यूक्रेन से लेकर पश्चिम एशिया तक हुए संघर्षों ने दिखाया है कि कम लागत वाले ड्रोन पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम के लिए नई चुनौती बन चुके हैं। ऐसे माहौल में भारतीय रक्षा उद्योग भी तेजी से नई तकनीकों पर काम कर रहा है।
हैदराबाद स्थित जेन टेक्नोलॉजीज और वेक्टर टेक्निक्स ऐसी दो कंपनियां हैं, जो ड्रोन युद्ध के दो अलग-अलग पहलुओं पर काम कर रही हैं। एक कंपनी दुश्मन के ड्रोन को रोकने और मार गिराने की तकनीक डेवलप कर रही है, जबकि दूसरी लंबे समय तक उड़ान भरने वाले ड्रोन के लिए स्वदेशी इंजन बनाने में जुटी है।
रक्षा क्षेत्र से जुड़े सूत्रों का कहना है कि भारतीय सेनाओं की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए अब फोकस केवल ड्रोन खरीदने पर नहीं, बल्कि पूरे ड्रोन इकोसिस्टम को देश में डेवलप करने पर है। इसी दिशा में एआई बेस्ड एंटी-ड्रोन सिस्टम, इंटरसेप्टर ड्रोन, स्मार्ट हथियार, रोबोटिक्स और लंबी दूरी तक उड़ान भरने वाले यूएवी इंजन जैसे प्रोजेक्ट आगे बढ़ रहे हैं।
AI Anti Drone System: स्वॉर्म ड्रोन से निपटने के लिए तैयार हो रहा नया सिस्टम
जेन टेक्नोलॉजीज के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर अशोक अत्लुरी के अनुसार कंपनी एक ऐसे इंटीग्रेटेड एंटी-ड्रोन सिस्टम पर काम कर रही है, जो एक साथ कई ड्रोन के हमले को रोक सके। सैन्य भाषा में ऐसे हमलों को “स्वॉर्म अटैक” कहा जाता है, जहां बड़ी संख्या में छोटे ड्रोन एक साथ टारगेट की ओर बढ़ते हैं।
इस सिस्टम की सबसे बड़ी खासियत यह होगी कि इसमें “सॉफ्ट किल” और “हार्ड किल” दोनों क्षमताओं को एक ही प्लेटफॉर्म पर जोड़ा जा रहा है।
सॉफ्ट किल तकनीक में दुश्मन ड्रोन के कम्युनिकेशन नेटवर्क, डेटा लिंक और नेविगेशन सिस्टम को ब्लॉक किया जाता है। इसके बाद ड्रोन अपना रास्ता खो देता है या कंट्रोल से बाहर हो जाता है। दूसरी तरफ हार्ड किल तकनीक में ड्रोन को सीधे हथियारों से निशाना बनाकर नष्ट किया जाता है।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि केवल एक तकनीक पर निर्भर रहने के बजाय दोनों क्षमताओं को साथ जोड़ने से सफलता की संभावना बढ़ जाती है, खासकर तब जब बड़ी संख्या में ड्रोन एक साथ हमला करें।
सैनिकों को खतरे से दूर रखने की कोशिश
अशोक अत्लुरी का कहना है कि कंपनी का उद्देश्य सैनिकों को सीधे खतरे वाले क्षेत्र में भेजने की जरूरत को कम करना है। इसी वजह से पूरे सिस्टम को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की मदद से अधिकतम ऑटोमैटिक बनाया जा रहा है।
उनके अनुसार आधुनिक युद्ध में निर्णय लेने के लिए समय बहुत कम होता है। ड्रोन कुछ ही मिनटों में टारगेट तक पहुंच सकते हैं। ऐसे में सेंसर से मिले डेटा का तुरंत विश्लेषण करना और कुछ सेकंड में प्रतिक्रिया देना जरूरी हो जाता है।
नया सिस्टम टारगेट की पहचान, ट्रैकिंग और रिएक्शन प्रोसेस को काफी हद तक ऑटोमेट करेगा। इससे ऑपरेटर को केवल निगरानी करनी होगी, जबकि कई तकनीकी प्रक्रियाएं सिस्टम खुद संभालेगा।
ऑपरेशन सिंदूर में इस्तेमाल हो चुके हैं कंपनी के सिस्टम
जेन टेक्नोलॉजीज पहले भी भारतीय सेनाओं बलों को कई तरह के काउंटर-ड्रोन सिस्टम उपलब्ध करा चुकी है। कंपनी के कुछ सिस्टम हाल के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी तैनात किए गए थे।
सूत्रों के अनुसार कंपनी द्वारा डेवलप एक हार्ड किल सिस्टम पुरानी एल-70 एयर डिफेंस गन को आधुनिक सेंसर और फायर कंट्रोल तकनीक से जोड़ता है। जब सेंसर किसी ड्रोन की पहचान करते हैं तो सिस्टम ऑटोमैटिक ही टारगेट का ट्रैक तैयार करता है और गन को उसी दिशा में मोड़ देता है।
इसके अलावा कंपनी ने ऐसे सॉफ्ट किल सिस्टम भी उपलब्ध कराए हैं जो ड्रोन के कम्युनिकेशन और नेविगेशन लिंक को बाधित कर सकते हैं।
एआई और ऑटोमेशन पर बढ़ता जोर
हैदराबाद स्थित कंपनी का मानना है कि आने वाले समय में एआई बेस्ड वेपन सिस्टम्स की भूमिका लगातार बढ़ेगी। इसी वजह से विभिन्न युद्ध परिस्थितियों के डिजिटल सिमुलेशन तैयार किए जा रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक इंजीनियर अलग-अलग परिस्थितियों में ड्रोन हमलों के मॉडल तैयार कर रहे हैं। इनमें यह देखा जा रहा है कि यदि कुछ ड्रोन आएं तो सिस्टम कैसे प्रतिक्रिया देगा और यदि एक साथ दर्जनों ड्रोन हमला करें तो कौन-सी रणनीति सबसे प्रभावी होगी।
इसी प्रक्रिया के आधार पर यह भी तय किया जा रहा है कि किस तरह के रिमोट कंट्रोल्ड हथियार सिस्टम और इंटरसेप्टर ड्रोन इस नेटवर्क का हिस्सा बनाए जाएं।
इंटरसेप्टर ड्रोन भी होंगे सिस्टम का हिस्सा
जानकारी के अनुसार केवल लैंड बेस्ड वेपंस पर निर्भर रहने के बजाय नए सिस्टम में इंटरसेप्टर ड्रोन भी शामिल किए जाएंगे।
ये इंटरसेप्टर ड्रोन दुश्मन के ड्रोन के पास पहुंचकर उन्हें रोकने, भ्रमित करने या नष्ट करने का काम करेंगे। इसके साथ जमीन पर मौजूद हथियार सिस्टम और सेंसर नेटवर्क लगातार जानकारी साझा करेंगे।
सूत्रों का कहना है कि इस तरह का मल्टी-लेयर्ड सिक्युरिटी फ्रेमवर्क बड़े सैन्य ठिकानों, एयरबेस और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की सुरक्षा में उपयोगी हो सकता है।
ऑपरेशन सिंदूर की वर्षगांठ पर लॉन्च हुआ नया सिस्टम
ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगांठ के अवसर पर प्रयागराज में आयोजित नॉर्थ टेक सिम्पोजियम के दौरान कंपनी ने भारत का पहला इंटीग्रेटेड एआई बेस्ड एंटी-ड्रोन सिस्टम पेश किया।
यह सिस्टम ऐसे समय में सामने आया है जब दुनिया के कई युद्ध क्षेत्रों में कम लागत वाले ड्रोन बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं। कई मामलों में पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम को भी इन ड्रोन झुंडों से निपटने में मुश्किलें होती हैं।
केवल एंटी-ड्रोन तक सीमित नहीं है काम
जेन टेक्नोलॉजीज का काम केवल एंटी-ड्रोन तकनीक तक सीमित नहीं है। कंपनी भारतीय सेना के लिए फायरिंग प्रशिक्षण सिमुलेटर, आर्टिलरी प्रशिक्षण सिस्टम, टैंक और ट्रक ड्राइविंग सिमुलेटर भी तैयार कर चुकी है।
सूत्रों के अनुसार अब कंपनी भारतीय वायुसेना के लिए एयरक्राफ्ट सिमुलेटर डेवलप कर रही है। भारतीय नौसेना के लिए भी कई ट्रेनिंग सिस्टम्स बनाए गए हैं।
कंपनी की विभिन्न सहयोगी इकाइयां स्मार्ट बम, एयर बर्स्ट हथियार, लॉइटरिंग म्यूनिशन, यूएवी इंजन और सैन्य रोबोटिक्स से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर भी काम कर रही हैं।
ड्रोन के लिए स्वदेशी इंजन बनाने की कोशिश
जहां जेन टेक्नोलॉजीज एंटी-ड्रोन सिस्टम डेवलप कर रही है, वहीं हैदराबाद की एक अन्य कंपनी वेक्टर टेक्निक्स लंबे समय तक उड़ान भरने वाले ड्रोन के लिए स्वदेशी इंजन तैयार करने में लगी हुई है।
कंपनी पहले विभिन्न श्रेणी के ड्रोन के लिए डीसी प्रोपल्शन सिस्टम और मोटर डेवलप कर चुकी है। इसके ग्राहकों में टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स और भारत फोर्ज जैसी कंपनियां शामिल हैं।
अब कंपनी इंटरनल कंबशन यानी फ्यूल बेस्ड इंजन डेवलप कर रही है, जिनका इस्तेमाल लंबे समय तक हवा में रहने वाले यूएवी में किया जा सके।
लंबे मिशन वाले ड्रोन पर फोकस
रक्षा क्षेत्र से जुड़े जानकारों के अनुसार बैटरी आधारित ड्रोन कई कामों के लिए उपयोगी हैं, लेकिन लंबी दूरी और लंबे समय तक निगरानी जैसे मिशनों के लिए ईंधन आधारित इंजन अधिक उपयुक्त माने जाते हैं।
इसी कारण वेक्टर टेक्निक्स ऐसे इंजन पर काम कर रही है जो पांच से आठ घंटे तक लगातार उड़ान भरने वाले प्लेटफॉर्म को शक्ति दे सके।
कंपनी के सीईओ पृथ्वी राज पाकलापति का कहना है कि ड्रोन तकनीक बेहद तेजी से बदल रही है। उनके अनुसार लगातार परीक्षण और सुधार ही सफल तकनीक डेवलप करने का सबसे अच्छा तरीका है।
सौ घंटे का परीक्षण पूरा कर चुका है इंजन
कंपनी के इंजीनियर वर्तमान में जिस इंजन पर काम कर रहे हैं, उसका शुरुआती परीक्षण काफी आगे बढ़ चुका है।
सूत्रों के अनुसार विकासाधीन इंजन लगभग सौ घंटे की रनिंग टेस्ट प्रक्रिया पूरी कर चुका है। इंजीनियर इसके प्रदर्शन, ईंधन खपत, विश्वसनीयता और विभिन्न परिस्थितियों में काम करने की क्षमता का अध्ययन कर रहे हैं।
कंपनी के सह-संस्थापक और मुख्य तकनीकी अधिकारी कर्ण राज का कहना है कि उनका टारगेट केवल एक इंजन बनाना नहीं बल्कि यूएवी उद्योग के लिए एक मजबूत तकनीकी आधार तैयार करना है।
कर्ण राज बताते हैं कि कुछ वर्ष पहले जब उन्होंने स्वदेशी इंजन निर्माण की दिशा में काम शुरू किया था तब रक्षा क्षेत्र का बड़ा हिस्सा बैटरी और हाइब्रिड प्रोपल्शन सिस्टम पर केंद्रित था।
उनके अनुसार उस समय पारंपरिक ईंधन आधारित इंजन डेवलप करने वाली कंपनियों को अपेक्षित ध्यान नहीं मिला। लेकिन अब लंबे मिशन वाले ड्रोन की जरूरत बढ़ने के साथ इस क्षेत्र में रुचि भी बढ़ी है।
हार्डवेयर में आगे, टेस्टिंग एक्सपीरिएंस की जरूरत
कर्ण राज का मानना है कि भारतीय कंपनियां हार्डवेयर डिजाइन और निर्माण के मामले में अंतरराष्ट्रीय स्तर की कंपनियों के बराबर पहुंच रही हैं। हालांकि फील्ड परीक्षण और एक्चुअल आपरेशन अनुभव के मामले में अभी अधिक काम की जरूरत है।
उनका कहना है कि उपयोगकर्ताओं से मिलने वाली प्रतिक्रिया को व्यवस्थित तरीके से उत्पाद विकास प्रक्रिया में शामिल करना जरूरी है ताकि सिस्टम लगातार बेहतर होते रहें।


