📍नई दिल्ली | 23 Jul, 2026, 12:06 PM
DRDO AEW&C MK-2 Explained: डीआरडीओ ने हाल ही में दो अहम कॉन्ट्रैक्ट साइन किए हैं। इनके जरिए छह एयरबस ए321 यात्री विमानों को अत्याधुनिक जासूसी और एरियल सर्विलांस विमान में बदला जाएगा। रक्षा मंत्रालय के अनुसार इन सभी विमानों को साल 2032-33 तक भारतीय वायुसेना में शामिल करने का टारगेट रखा गया है।
दरअसल आधुनिक युद्ध में केवल तेज रफ्तार फाइटर जेट होना काफी नहीं होता, बल्कि यह भी जरूरी होता है कि दुश्मन के विमान, मिसाइल, ड्रोन और अन्य खतरों का समय रहते पता चल जाए। इसी जरूरत को पूरा करने के लिए भारत ने अपने स्वदेशी एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (एईडब्ल्यू एंड सी) एमके-2 प्रोग्राम को आगे बढ़ाते हुए बड़ा कदम उठाया है।
DRDO AEW&C MK-2 Explained: क्या होता है एईडब्ल्यू एंड सी विमान?
एईडब्ल्यू एंड सी का पूरा नाम एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल है। आसान भाषा में इसे “उड़ता हुआ रडार स्टेशन” कहा जा सकता है। यह विमान हजारों फीट की ऊंचाई पर उड़ते हुए सैकड़ों किलोमीटर दूर तक दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखता है।
सामान्य ग्राउंड रडार धरती की सतह और पहाड़ों जैसी प्राकृतिक बाधाओं के चलते सीमित दूरी तक ही निगरानी कर पाते हैं। लेकिन आसमान में मौजूद एईडब्ल्यू एंड सी विमान ऊंचाई का लाभ उठाकर काफी बड़े इलाके पर नजर रख सकता है। यही वजह है कि आधुनिक युद्ध में इसे किसी भी वायुसेना की “आसमान की आंख” माना जाता है।
यह विमान केवल दुश्मन के विमान नहीं देखता, बल्कि क्रूज मिसाइल, स्टील्थ विमान, ड्रोन झुंड और कम ऊंचाई पर उड़ने वाले टारगेटों का भी पता लगा सकता है। इसके साथ ही यह अपने लड़ाकू विमानों को रियल टाइम में दिशा-निर्देश भी देता है।

डीआरडीओ ने किन कंपनियों के साथ किए कॉन्ट्रैक्ट?
इस प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी डीआरडीओ की बेंगलुरु स्थित सेंटर फॉर एयर बोर्न सिस्टम्स (कैब्स) के पास है, जिसने एईडब्ल्यू एंड सी एमके-2 सिस्टम का स्वदेशी विकास किया है।
पहला कॉन्ट्रैक्ट एआई इंजीनियरिंग सर्विसेज लिमिटेड (एआईईएसएल) के साथ किया गया है। इस कंपनी का काम छह एयरबस ए321 विमानों को पूरी तरह खोलकर उन्हें सैन्य जरूरतों के अनुसार “ग्रीन कॉन्फिगरेशन” में बदलना होगा। इसमें विमान के अंदर मौजूद यात्री सुविधाएं हटाई जाएंगी और मिशन सिस्टम लगाने के लिए पूरा स्ट्रक्चर तैयार किया जाएगा।
दूसरा कॉन्ट्रैक्ट अदाणी डिफेंस सिस्टम्स एंड टेक्नोलॉजीज लिमिटेड (एडीएसटीएल) के साथ किया गया है। कंपनी को डेवलपमेंट कम प्रोडक्शन पार्टनर बनाया गया है। इसका दायित्व मिशन सिस्टम का डेवलपमेंट, इंटीग्रेशन, टेस्टिंग, मेंटेनेंस, रिपेयरिंग, ओवरहॉल और लगभग 30 सालों तक तकनीकी मदद देना होगा।
🚀🇮🇳 Major boost for India’s AEW&C Mk-II programme!
DRDO has signed two key contracts with AI Engineering Services Limited (AIESL) and Adani Defence Systems & Technologies (ADSTL) to accelerate the development of the AEW&C Mk-II airborne early warning aircraft. The programme will… pic.twitter.com/g8tQGCAw4l— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) July 22, 2026
एयरबस ए321 को क्यों चुना गया?
इस प्रोजेक्ट के लिए जिन छह एयरबस ए321 विमानों का इस्तेमाल किया जाएगा, वे पहले एयर इंडिया के बेड़े का हिस्सा थे। साल 2021 में एयर इंडिया के निजीकरण से पहले इन्हें भारतीय वायुसेना को ट्रांसफर कर दिया गया था। तब से ये विमान ट्रांसफॉर्मेशन का इंतजार कर रहे थे।
ए321 एक बड़ा नैरो-बॉडी विमान है। इसके अंदर काफी जगह होती है, जिससे बड़े रडार, मिशन कंप्यूटर, ऑपरेटर कंसोल, अतिरिक्त ईंधन टैंक और इलेक्ट्रिसिटी जनरेशन प्लांट आसानी से लगाया जा सकता है।
डीआरडीओ के अनुसार इस विमान में बड़े फ्यूजलेज ईंधन टैंक लगाए जाएंगे, जिससे इसकी फ्लाइंग टाइम पहले की तुलना में काफी बढ़ जाएगा। लंबे समय तक हवा में बने रहने की क्षमता किसी भी एईडब्ल्यू एंड सी प्लेटफॉर्म की सबसे बड़ी जरूरत मानी जाती है।
एयरबस के लिए भी होगा पहला अनुभव
इस प्रोजेक्ट की एक खास बात यह भी है कि एयरबस ने इससे पहले अपने ए321 विमान को एईडब्ल्यू एंड सी प्लेटफॉर्म में बदलने का काम कभी नहीं किया है।
सूत्रों के अनुसार एयरबस डिफेंस एंड स्पेस (स्पेन) के साथ पहले ही विमान की स्ट्रक्चरल बदलाव संबंधी कॉन्ट्रैक्ट किया जा चुका है। लंबी कीमत वार्ता के बाद यह समझौता अंतिम रूप तक पहुंचा।
यानी ए321 का यह मिलिट्री ट्रांसफॉर्मेशन एयरबस के लिए भी पहली बार होने जा रहा है। इसमें विमान के स्ट्रक्चर को मजबूत करना, अतिरिक्त वजन संभालने योग्य बनाना, बड़े रडार लगाने के लिए स्ट्रक्चरल बदलाव और विशेष मिशन उपकरणों का इंटीग्रेशन शामिल होगा।
एमके-2 में क्या होंगे नए तकनीकी बदलाव?
एईडब्ल्यू एंड सी एमके-2 को मौजूदा नेत्र एमके-1 से काफी अधिक एडवांस बनाया गया है। इसमें ऊपर की ओर लगा 240 डिग्री डॉर्सल एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे (एईएसए) रडार होगा। इसके अलावा विमान के अगले हिस्से में अलग रडार एंटीना लगाया जाएगा। दोनों मिलकर लगभग 300 डिग्री तक निगरानी क्षमता उपलब्ध कराएंगे।
रडार में गैलियम नाइट्राइड (जीएएन) आधारित एईएसए तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। यह तकनीक अधिक शक्ति, बेहतर संवेदनशीलता, लंबी दूरी तक टारगेट पहचान और एक साथ अनेक टारगेट्स की ट्रैकिंग की क्षमता प्रदान करती है।
रिपोर्टों के अनुसार यह सिस्टम 500 किलोमीटर से अधिक दूरी तक टारगेट पहचानने में सक्षम होगी। यह क्षमता मौजूदा नेत्रा एमके-1 की तुलना में काफी अधिक मानी जा रही है।
किन खतरों को पहचान सकेगा यह सिस्टम?
एईडब्ल्यू एंड सी एमके-2 लड़ाकू विमानों की निगरानी करने के अलावा स्टील्थ विमान, कम दृश्यता वाले टारगेट, क्रूज मिसाइल, ड्रोन झुंड, हेलीकॉप्टर और जमीन पर मौजूद कई सैन्य गतिविधियों की पहचान भी कर सकेगा। मिशन सिस्टम एक साथ बड़ी संख्या में टारगेटों को ट्रैक कर वास्तविक समय में भारतीय वायुसेना के कमांड सेंटर तक जानकारी पहुंचाएगा।
इसके जरिए लड़ाकू विमानों को इंटरसेप्शन, एयर डिफेंस और हवाई अभियान के दौरान लगातार दिशा-निर्देश भी मिलते रहेंगे।
आईएसीसीएस से जुड़ने का क्या फायदा होगा?
एमके-2 को भारतीय वायुसेना के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (आईएसीसीएस) से जोड़ा जाएगा। आईएसीसीएस देशभर में फैला ऐसा नेटवर्क है, जो ग्राउंड रडार, मिसाइल सिस्टम, लड़ाकू विमान, एयर डिफेंस यूनिट और अन्य निगरानी संसाधनों को एक ही डिजिटल नेटवर्क में जोड़ता है।
जब एईडब्ल्यू एंड सी एमके-2 इस नेटवर्क का हिस्सा बनेगा, तब आसमान में मिली जानकारी सीधे कमांड सेंटर तक पहुंचेगी। इससे फैसले लेने की रफ्तार बढ़ेगी, अलग-अलग सैन्य प्लेटफॉर्म के बीच कॉर्डिनेशन बेहतर होगा और एरियल मिशन का ऑपरेशन अधिक प्रभावी तरीके से किया जा सकेगा।
भारत की मौजूदा स्थिति क्या है?
वर्तमान समय में भारतीय वायुसेना के पास केवल छह एईडब्ल्यू एंड सी प्लेटफॉर्म हैं। इनमें तीन इजरायली फाल्कन सिस्टम रूसी आईएल-76 विमान पर आधारित हैं, जबकि तीन स्वदेशी नेत्र एमके-1 विमान एम्ब्रेयर प्लेटफॉर्म पर तैनात हैं।
भारतीय वायुसेना का अनुमान है कि पश्चिमी और उत्तरी दोनों मोर्चों पर लगातार निगरानी बनाए रखने के लिए कम से कम 18 ऐसे विमानों की जरूरत है। यही कारण है कि छह नेत्र एमके-1ए और छह एमके-2 विमान शामिल करने की योजना बनाई गई है, जिससे अगले दशक की शुरुआत तक कुल संख्या 18 तक पहुंच सके।
पड़ोसी देशों की तुलना में कहां खड़ा है भारत?
रक्षा आंकड़ों के अनुसार पाकिस्तान के पास लगभग 10 से 12 एईडब्ल्यू एंड सी प्लेटफॉर्म हैं। इनमें साब-2000 एरिआई और चीनी जेडडीके-03 सिस्टम शामिल हैं। दूसरी ओर चीन के पास 40 से अधिक ऐसे विमान हैं, जिनमें केजे-500 जैसे आधुनिक प्लेटफॉर्म भी शामिल हैं। ऐसे माहौल में भारत अपनी स्वदेशी क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रहा है ताकि निगरानी, कमांड एंड कंट्रोल और हवाई युद्ध संचालन में किसी प्रकार की कमी न रहे।
ऑपरेशन सिंदूर से क्या मिला सबक?
रिपोर्टों के अनुसार ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना के सीमित एईडब्ल्यू एंड सी बेड़े पर काफी दबाव पड़ा था। उपलब्ध विमानों का लगातार इस्तेमाल करना पड़ा और कई परिस्थितियों में ग्राउंड आधारित रडार नेटवर्क पर अधिक निर्भर रहना पड़ा।
इसी अनुभव ने यह स्पष्ट किया कि भविष्य के अभियानों के लिए अधिक संख्या में आधुनिक एईडब्ल्यू एंड सी प्लेटफॉर्म की आवश्यकता है, ताकि एक साथ कई दिशाओं में लगातार हवाई निगरानी बनाए रखी जा सके।
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रक्षा समाचार न्यूज डेस्क भारत की अग्रणी हिंदी रक्षा समाचार टीम है, जो Indian Army, Navy, Air Force, DRDO, रक्षा उपकरण, युद्ध रणनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी विश्वसनीय और विश्लेषणात्मक खबरें पेश करती है। हम लाते हैं सटीक, सरल और अपडेटेड Defence News in Hindi। हमारा उद्देश्य है – "हर खबर, देश की रक्षा से जुड़ी।"


