HomeIndian Air Forceऑपरेशन सिंदूर के बाद कैसे बदली IAF की सोच, नेत्र के बाद...

ऑपरेशन सिंदूर के बाद कैसे बदली IAF की सोच, नेत्र के बाद वायुसेना चाहती है ऐसा AEW&C जो 700 किमी की रेंज और AI सिस्टम से हो लैस

पिछले डेढ़ साल में हवाई युद्ध की प्रकृति तेजी से बदली है। अब केवल लड़ाकू विमानों पर नजर रखना ही काफी नहीं माना जा रहा। बल्कि छोटे ड्रोन, लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलें, बैलिस्टिक मिसाइलें, हाइपरसोनिक हथियार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और नेटवर्क आधारित युद्ध ने वायुसेना की जरूरतों को पूरी तरह बदल दिया है...

रक्षा समाचार WhatsApp Channel Follow US

📍नई दिल्ली | 29 Jun, 2026, 12:07 PM

IAF AEWCS Requirements: हाल ही में भारतीय वायुसेना को डीआरडीओ के बनाए स्वदेशी नेत्र एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (AEW&C) सिस्टम का फाइनल ऑपरेशनल क्लियरेंस (एफओसी) मिला है। सूत्रों का कहना है कि नेत्र मौजूदा जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभाएगा, लेकिन मॉडर्न वॉरफेयर की जरूरत को देखते हुए भारतीय वायुसेना की जरूरतें अब इससे कहीं आगे निकल चुकी हैं।

सूत्रों के अनुसार, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान मिले अनुभवों ने यह साफ कर दिया कि भविष्य के युद्ध में केवल पारंपरिक एरियल सर्विलांस काफी नहीं होगी। अब वायुसेना को ऐसे एयरबोर्न प्लेटफॉर्म की जरूरत है, जो ज्यादा समय तक हवा में रह सके, अधिक ऊंचाई से निगरानी कर सके, हाइपरसोनिक हथियारों और बैलिस्टिक मिसाइलों का भी पता लगा सके, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित डेटा का विश्लेषण कर सके और पूरे एयर डिफेंस नेटवर्क के साथ रियल टाइम में जुड़कर काम करे।

यही वजह है कि भारतीय वायुसेना ने सबसे पहले जुलाई 2024 में छह नए एईडब्ल्यू एंड सी (AEW&C) विमानों के लिए रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन (आरएफआई) जारी की थी। लेकिन उसके बाद मई 2026 में हुए ऑपरेशन सिंदूर और बदलते सुरक्षा माहौल ने वायुसेना को अपनी जरूरतों का फिर से आकलन करने के लिए मजबूर किया। इसके बाद जनवरी 2026 में पहले से कहीं अधिक एडवांस और सख्त तकनीकी मानकों वाली नई आरएफआई जारी की गई।

सूत्रों के अनुसार, पिछले डेढ़ साल में हवाई युद्ध की प्रकृति तेजी से बदली है। अब केवल लड़ाकू विमानों पर नजर रखना ही काफी नहीं माना जा रहा। बल्कि छोटे ड्रोन, लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलें, बैलिस्टिक मिसाइलें, हाइपरसोनिक हथियार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और नेटवर्क आधारित युद्ध ने वायुसेना की जरूरतों को पूरी तरह बदल दिया है। यही वजह है कि जनवरी 2026 की नई आरएफआई में लगभग हर प्रमुख तकनीकी पैरामीटर को पहले से अधिक एडवांस बनाया गया।

IAF AEWCS Requirements: क्या होता है AEW&C

एईडब्ल्यू एंड सी यानी एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम को आम भाषा में उड़ता हुआ कमांड सेंटर कहा जाता है। यह केवल एक रडार विमान नहीं होता बल्कि हवा में मौजूद ऐसा प्लेटफॉर्म होता है जो सैकड़ों किलोमीटर दूर तक हवाई गतिविधियों पर नजर रख सकता है।

यह विमान हवा में उड़ते हुए लड़ाकू विमान, ड्रोन, हेलीकॉप्टर, क्रूज मिसाइल और कई अन्य टारगेट्स का पता लगाता है। इसके बाद यह जानकारी सीधे लड़ाकू विमानों, ग्राउंड कंट्रोल सेंटर और भारतीय वायुसेना के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम तक पहुंचाई जाती है।

युद्ध के दौरान यही प्लेटफॉर्म तय करता है कि किस दिशा से खतरा आ रहा है, किस लड़ाकू विमान को किस टारगेट की तरफ भेजना है और किस सेक्टर में एयर डिफेंस को एक्टिव करना है। (IAF AEWCS Requirements)

जुलाई 2024 में क्या थीं वायुसेना की जरूरतें

भारतीय वायुसेना ने 19 जुलाई 2024 को छह नए एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (एईडब्ल्यू एंड सी) विमानों की खरीद के लिए पहली रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन (आरएफआई) जारी की थी। उस समय वायुसेना का मुख्य उद्देश्य अपनी मौजूदा हवाई निगरानी क्षमता को बढ़ाना और पुराने प्लेटफॉर्म के साथ मिलकर एक मजबूत एयर सर्विलांस नेटवर्क तैयार करना था। उस दौर में फोकस ऐसे प्लेटफॉर्म पर था, जो लंबी दूरी तक दुश्मन के लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, ड्रोन और अन्य हवाई लक्ष्यों की पहचान कर सके और भारतीय वायुसेना के कमांड एंड कंट्रोल नेटवर्क को लगातार जानकारी उपलब्ध कराता रहे।

सूत्रों के मुताबिक, 2024 की आरएफआई में सबसे ज्यादा जोर प्लेटफॉर्म की विश्वसनीयता और लंबे समय तक ऑपरेशन करने की क्षमता पर दिया गया था। वायुसेना चाहती थी कि विमान कम से कम आठ घंटे तक लगातार मिशन पर उड़ान भर सके। यदि जरूरत पड़े तो उसमें हवा में ईंधन भरने यानी एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग की क्षमता भी हो, ताकि मिशन की अवधि और बढ़ाई जा सके। उस समय इसे लंबी दूरी की निगरानी के लिए पर्याप्त माना जा रहा था।

उस आरएफआई में विमान की ऑपरेशनल ऊंचाई 40 हजार फीट से अधिक रखने की शर्त भी रखी गई थी। इतनी ऊंचाई से उड़ने वाला एईडब्ल्यू एंड सी विमान जमीन पर लगे रडार की तुलना में कहीं बड़े इलाके की निगरानी कर सकता है। ऊंचाई बढ़ने से रडार का कवरेज भी बढ़ जाता है और कम ऊंचाई पर उड़ने वाले विमानों या ड्रोन का जल्दी पता लगाया जा सकता है।

यह भी पढ़ें:  BrahMos supersonic cruise missiles: ऑपरेशन सिंदूर के बाद सबकी फेवरेट बनी ब्रह्मोस, एयरफोर्स और नेवी बड़ा ऑर्डर देने की तैयारी में

उस समय वायुसेना की मांग यह भी थी कि विमान में 360 डिग्री कवरेज देने वाला एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे (एईएसए) रडार हो, जो कम से कम 550 किलोमीटर तक बड़े एरियल टारगेट्स का पता लगा सके। साथ ही वह कम रडार सिग्नेचर वाले टारगेट्स, जैसे छोटे ड्रोन और हेलीकॉप्टर, को भी ट्रैक करने में सक्षम हो। हालांकि उस समय हाइपरसोनिक हथियारों या बैलिस्टिक मिसाइलों की पहचान को लेकर कोई अलग और स्पष्ट तकनीकी शर्त नहीं रखी गई थी।

सूत्रों का कहना है कि , 2024 की आरएफआई में इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर्स (ईएसएम), आइडेंटिफिकेशन फ्रेंड ऑर फो (आईएफएफ), सुरक्षित डेटा लिंक और कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम जैसी क्षमताएं जरूर मांगी गई थीं, लेकिन इन सिस्टमों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग या ऑटोमैटिक डेटा एनालिसिस जैसी नई तकनीकों को जरूरी नहीं बनाया गया था। मिशन सिस्टम का उद्देश्य मुख्य रूप से रडार, आईएफएफ और इलेक्ट्रॉनिक सेंसर से मिलने वाली जानकारी को जोड़कर ऑपरेटर तक पहुंचाना था, ताकि वह हालात के मुताबिक फैसले ले सके।

उस समय नेटवर्क आधारित युद्ध (नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर) को ध्यान में रखते हुए डेटा लिंक और भारतीय वायुसेना के कमांड नेटवर्क से जुड़ने की व्यवस्था तो मांगी गई थी, लेकिन भारतीय नेविगेशन सिस्टम नाविक, भारतीय क्रिप्टो मॉड्यूल, सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो या जीएनएसएस उपलब्ध न होने की स्थिति में भी काम करने जैसी विस्तृत जरूरतें उसमें शामिल नहीं थीं।

विमान की सुरक्षा के लिए इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और सेल्फ प्रोटेक्शन उपकरणों की मांग जरूर की गई थी, लेकिन मिसाइल अप्रोच वार्निंग सिस्टम, डायरेक्टेड इंफ्रारेड काउंटर मेजर, एडवांस्ड जैमर और एआई आधारित इलेक्ट्रॉनिक थ्रेट एनालिसिस जैसी क्षमताओं पर उस समय उतना जोर नहीं था।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि जुलाई 2024 की आरएफआई उस समय के ऑपरेशनल माहौल के हिसाब से तैयार की गई थी। उसका मुख्य उद्देश्य भारतीय वायुसेना की हवाई निगरानी, एयर डिफेंस कंट्रोल और नेटवर्क आधारित ऑपरेशन को मजबूत करना था।

ऑपरेशन सिंदूर ने बदल दी तस्वीर

सूत्रों के अनुसार, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना ने लंबी दूरी की हवाई निगरानी, लगातार एयरस्पेस मॉनिटरिंग और नेटवर्क बेस्ड कॉम्बैट ऑपरेशन संचालन से जुड़े कई महत्वपूर्ण अनुभव हासिल किए। इन्हीं अनुभवों के बाद वायुसेना ने अपनी भविष्य की जरूरतों का दोबारा आकलन किया और जनवरी 2026 में पहले के मुकाबले कहीं अधिक एडवांस तकनीकी जरूरतों वाली नई आरएफआई जारी की। (IAF AEWCS Requirements)

एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग के साथ बढ़ाई उड़ान क्षमता

सूत्रों का कहना है कि ऑपरेशन के दौरान सबसे बड़ी चुनौती लंबे समय तक लगातार हवाई निगरानी बनाए रखने की रही। मौजूदा एईडब्ल्यू एंड सी और अवाक्स प्लेटफॉर्म सीमित संख्या में होने के कारण लगातार 24 घंटे कवरेज देना आसान नहीं था।

पहली आरएफआई में विमान से कम से कम आठ घंटे हवा में रहने की क्षमता मांगी गई थी। नई आरएफआई में इसे बढ़ाकर कम से कम दस घंटे कर दिया गया है। अगर कोई प्लेटफॉर्म इतनी देर लगातार नहीं उड़ सकता तो उसमें हवा में ईंधन भरने यानी एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग की सुविधा जरूरी होगी।

लंबे समय तक हवा में रहने वाला एईडब्ल्यू एंड सी विमान किसी सीमा क्षेत्र पर लगातार निगरानी बनाए रख सकता है। इससे बार-बार विमान बदलने की जरूरत कम होती है और पूरे ऑपरेशन के दौरान एक ही कमांड प्लेटफॉर्म सक्रिय रह सकता है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग हुए शामिल

सूत्रों के अनुसार, ऑपरेशन के दौरान अलग-अलग प्लेटफॉर्म से आने वाली जानकारी को एक साथ जोड़कर तुरंत निर्णय लेने की जरूरत भी महसूस हुई। इसी अनुभव के आधार पर नई आरएफआई में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और सेंसर डेटा फ्यूजन जैसी क्षमताओं को शामिल किया गया है। इससे रडार, इलेक्ट्रॉनिक सेंसर और दूसरे स्रोतों से मिलने वाली जानकारी का विश्लेषण पहले से कहीं तेजी से किया जा सकेगा। (IAF AEWCS Requirements)

ऊंचाई भी बढ़ा दी गई

एक और महत्वपूर्ण बदलाव विमान की उड़ान ऊंचाई को लेकर किया गया है। नई आरएफआई में ऑपरेशनल सीलिंग 40 हजार फीट से बढ़ाकर 45 हजार फीट कर दी गई है। साथ ही यह भी जरूरी किया गया है कि विमान लगभग 3,300 मीटर यानी लगभग 10,800 फीट की ऊंचाई वाले एयरफील्ड से भी उड़ान भर सके। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह आवश्यकता उत्तरी और पूर्वी सीमाओं पर ऊंचाई वाले इलाकों में तेजी से ऑपरेशन चलाने की जरूरत को ध्यान में रखकर जोड़ी गई है।

यह भी पढ़ें:  Indian Air Force: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने यौन उत्पीड़न मामले में वायुसेना के अधिकारी के खिलाफ जांच जारी रखने का दिया आदेश

सूत्रों का कहना है कि जितनी अधिक ऊंचाई पर रडार होगा, उतना बड़ा क्षेत्र उसकी निगरानी में आएगा। अधिक ऊंचाई से जमीन की वक्रता का असर कम होता है और कम ऊंचाई पर उड़ने वाले लक्ष्यों को भी पहले देखा जा सकता है।

रक्षा सूत्रों के अनुसार, यह जरूरत ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ऑपरेशन को ध्यान में रखकर रखी गई है, जहां कम हवा, कम इंजन प्रदर्शन और लंबी टेकऑफ दूरी जैसी चुनौतियां होती हैं।

ऐसे एयरफील्ड से ऑपरेशन करने के लिए विमान के इंजन, ब्रेकिंग सिस्टम, लैंडिंग गियर और फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम को विशेष रूप से तैयार करना पड़ता है।

रडार अब पहले से कहीं ज्यादा ताकतवर

नई आरएफआई का सबसे बड़ा बदलाव रडार से जुड़ा रहा। पहले जहां लगभग 550 किलोमीटर तक टारगेट खोजने की क्षमता पर्याप्त मानी जा रही थी, वहीं ऑपरेशन सिंदूर के बाद जरूरतें बदल गईं और 700 किलोमीटर से अधिक दूरी पर टारगेट पहचानने वाला फोर-डी एईएसए रडार मांगा गया।

सूत्रों के मुताबिक, फोर-डी एईएसए रडार केवल टारगेट की दिशा और दूरी ही नहीं बताता बल्कि उसकी ऊंचाई, गति और लगातार बदलती स्थिति की भी सटीक जानकारी देता है। इससे एक साथ बड़ी संख्या में टारगेट्स पर नजर रखना आसान हो जाता है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद नई आरएफआई में पहली बार सी सरफेस मोड को अनिवार्य जरूरत के तौर पर शामिल किया गया। जिसमें नया एईडब्ल्यू एंड सी विमान केवल आसमान में उड़ रहे लड़ाकू विमान, ड्रोन या मिसाइलों पर ही नजर नहीं रखेगा, बल्कि समुद्र में होने वाली गतिविधियों की भी निगरानी कर सकेगा। (IAF AEWCS Requirements)

नेटवर्क से पूरी तरह जुड़ने की तैयारी

नेटवर्क आधारित युद्ध अब भारतीय वायुसेना की प्राथमिकता बन चुका है। इसी कारण नई आरएफआई में आईएसीसीएस, सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो, नाविक नेविगेशन सिस्टम, भारतीय क्रिप्टो सिस्टम और का-बैंड सैटकॉम के साथ पूरी तरह जुड़ने की क्षमता अनिवार्य की गई है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि एईडब्ल्यू एंड सी विमान केवल हवाई रडार प्लेटफॉर्म न रहकर पूरे एयर ऑपरेशन का उड़ता हुआ कमांड सेंटर बन सके।

मिशन सिस्टम भी पहले से ज्यादा स्मार्ट

नई आरएफआई में मिशन सॉफ्टवेयर को भी पूरी तरह बदला गया है। अब सेंसर डेटा फ्यूजन, ऑटोमैटिक एनालिसिस, मिशन सपोर्ट और निर्णय लेने में मदद करने वाले एआई आधारित टूल्स मांगे गए हैं।

कम्युनिकेशन सपोर्ट सिस्टम में भी मशीन लर्निंग और बड़े भाषा मॉडल आधारित निर्णय सहायता प्रणाली की मांग की गई है। इसका उद्देश्य बड़ी मात्रा में आने वाली जानकारी को तेजी से समझना और सही ऑपरेटर तक पहुंचाना है।

सुरक्षा प्रणाली भी हुई मजबूत

विशेषज्ञों का कहना है कि इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर के बढ़ते खतरे को देखते हुए सेल्फ प्रोटेक्शन सिस्टम को भी पहले से काफी मजबूत बनाया गया है। नई आरएफआई में मिसाइल अप्रोच वार्निंग सिस्टम, डायरेक्टेड इंफ्रारेड काउंटर मेजर, सेल्फ प्रोटेक्शन जैमर और एडवांस इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम जैसी क्षमताओं को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है।

सूत्रों के अनुसार, आधुनिक युद्ध में एईडब्ल्यू एंड सी विमान स्वयं भी दुश्मन का प्रमुख टारगेट होता है। इसलिए उसकी सुरक्षा पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है। (IAF AEWCS Requirements)

नेत्र के अनुभवों में भी दिख रहा असर

नेत्र में डीआरडीओ के सेंटर फॉर एयरबोर्न सिस्टम्स (सीएबीएस) द्वारा विकसित स्वदेशी एईएसए (एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे) रडार लगाया गया है, जो एक साथ कई टारगेट्स की निगरानी और ट्रैकिंग कर सकता है।

इसका रडार लगभग 240 डिग्री क्षेत्र में लगातार निगरानी करता है, जिससे दुश्मन के लड़ाकू विमान, ड्रोन और अन्य हवाई लक्ष्यों का समय रहते पता लगाया जा सकता है।

वहीं, टारगेट के साइज के अनुसार यह सिस्टम लगभग 250 से 375 किलोमीटर दूर तक हवाई गतिविधियों का पता लगाने में सक्षम है। साथ ही, नेत्र एक समय में 200 से ज्यादा एरियल टारगेट्स पर नजर रख सकता है और उनकी गतिविधियों पर लगातार निगरानी बनाए रख सकता है।

इसमें रडार के साथ आईएफएफ (आइडेंटिफिकेशन फ्रेंड ऑर फो), ईएसएम (इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर्स) और सीएसएम (कम्युनिकेशन सपोर्ट मेजर्स) जैसे सिस्टम लगे हैं। इससे दुश्मन के रडार और संचार संकेतों का भी पता लगाया जा सकता है।

यह भी पढ़ें:  जवानों को 'रोबोट' बनाने की तैयारी कर रही भारतीय सेना, पहाड़ों पर 30 किलो वजन के साथ भी नहीं थकेंगे सैनिक

इसके अलावा नेत्र भारतीय वायुसेना के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (आईएसीसीएस) से जुड़कर लड़ाकू विमानों और ग्राउंड कंट्रोल सेंटर तक वास्तविक समय में जानकारी भेज सकता है।

वहीं, नेत्र करीब 8 से 9 घंटे तक लगातार मिशन पर रह सकता है। कुछ कॉन्फिगरेशन में हवा में ईंधन भरने की क्षमता के साथ इसकी मिशन अवधि और बढ़ाई जा सकती है।

नेत्र मॉडिफाइड एम्ब्रेयर ईआरजे-145 ट्विन इंजन जेट पर बेस्ड है। छोटा प्लेटफॉर्म होने के बावजूद यह भारतीय वायुसेना को मध्यम दूरी की हवाई निगरानी और नेटवर्क आधारित युद्ध संचालन में महत्वपूर्ण क्षमता प्रदान करता है। (IAF AEWCS Requirements)

नेत्र एमके-2: ज्यादा ताकतवर और लंबी दूरी तक निगरानी करने वाला स्वदेशी सिस्टम

नेत्र एमके-1 को ऑपरेशनल मंजूरी मिलने के बाद अब डीआरडीओ का फोकस उसके अगले और ज्यादा एडवांस वर्जन नेत्र एमके-2 पर है। यह सिस्टम मौजूदा एम्ब्रेयर ईआरजे-145 प्लेटफॉर्म की जगह बड़े एयरबस ए321 विमान पर तैयार किया जाएगा। भारतीय वायुसेना के पास एयर इंडिया से खरीदे हुए एयरबस ए321 विमान हैं, जिन्हें मिशन प्लेटफॉर्म में बदला जाएगा।

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, बड़े एयरफ्रेम की वजह से नेत्र एमके-2 में ज्यादा ईंधन, अधिक बिजली उत्पादन और बेहतर कूलिंग सिस्टम उपलब्ध होगा। इससे बड़े और ज्यादा शक्तिशाली सेंसर लगाने के साथ-साथ विमान की उड़ान अवधि भी बढ़ाई जा सकेगी। अनुमान है कि यह विमान 10 घंटे से अधिक समय तक लगातार मिशन पर रह सकेगा, जबकि नेत्र एमके-1 की उड़ान क्षमता करीब 8 से 9 घंटे है।

नेत्र एमके-2 में नई पीढ़ी का एईएसए रडार लगाया जाएगा, जो डीआरडीओ के उत्तम रडार से विकसित तकनीक और गैलियम नाइट्राइड (जीएएन) आधारित ट्रांसमिट-रिसीव मॉड्यूल का उपयोग करेगा। यह रडार मौजूदा सिस्टम की तुलना में अधिक ताकतवर होगा और लगभग 300 डिग्री तक निगरानी करने में सक्षम माना जा रहा है। इसकी टारगेट पहचानने की क्षमता भी बढ़कर 500 किलोमीटर से अधिक होने का अनुमान है, जबकि नेत्र एमके-1 की रेंज लगभग 250 से 375 किलोमीटर तक है।

सूत्रों के अनुसार, इस नए सिस्टम में कम रडार सिग्नेचर वाले टारगेट्स, जैसे छोटे ड्रोन और स्टेल्थ विमानों का पता लगाने की क्षमता भी बेहतर होगी। साथ ही यह एक साथ ज्यादा हवाई लक्ष्यों की निगरानी और ट्रैकिंग कर सकेगा।

नेत्र एमके-2 में केवल रडार ही नहीं, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर्स (ईएसएम), कम्युनिकेशन सपोर्ट मेजर्स (सीएसएम), सेल्फ प्रोटेक्शन सिस्टम और सुरक्षित डेटा लिंक को भी पहले से अधिक एडवांस बनाया जाएगा। यह भारतीय वायुसेना के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (आईएसीसीएस) के साथ बेहतर तरीके से जुड़कर रियल टाइम में जानकारी साझा कर सकेगा।

बड़े प्लेटफॉर्म की वजह से विमान में अधिक मिशन ऑपरेटरों के लिए जगह होगी, जिससे लंबी अवधि के अभियानों के दौरान अलग-अलग टीमों के बीच काम का बेहतर बंटवारा किया जा सकेगा। इसके अलावा अतिरिक्त स्थान मिलने से भविष्य में नए सेंसर और अन्य उपकरण जोड़ना भी आसान होगा।

सूत्रों का कहना है कि नेत्र एमके-2 को इस तरह डेवलप किया जा रहा है कि यह लंबी दूरी के एरियल सर्विलांस, नेटवर्क बेस्ड कॉम्बैट ऑपरेशंस, फाइटर कंट्रोल और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध की जरूरतों को पहले से अधिक प्रभावी ढंग से पूरा कर सके। हालांकि, भारतीय वायुसेना ने 2026 की नई आरएफआई में 360 डिग्री रडार कवरेज और 700 किलोमीटर से अधिक की टारगेट आइडेंटिफिकेशन क्षमता जैसी और भी एडवांस जरूरतें शामिल की हैं, जो भविष्य के बड़े एईडब्ल्यू एंड सी प्लेटफॉर्म के लिए तय की गई हैं। (IAF AEWCS Requirements)

Author

  • Herry Photo

    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

रक्षा समाचार WhatsApp Channel Follow US
हरेंद्र चौधरी
हरेंद्र चौधरी
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

Most Popular