📍नई दिल्ली | 30 May, 2026, 1:26 PM
Indian Army Exoskeleton System: भारतीय सेना अब अपने जवानों को अब ‘रोबोट’ बनाने की तैयारी कर रही है। सेना ऐसी तकनीक इस्तेमाल करने जा रही है, जो लंबे समय तक भारी वजन उठाकर चलने के दौरान उनकी थकान कम करेगी। रक्षा मंत्रालय के तहत डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स और भारतीय सेना ने 520 पैसिव एक्सोस्केलेटन सिस्टम खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह सिस्टम सैनिकों को पहाड़ी इलाकों, बर्फीले मोर्चों और कठिन युद्ध क्षेत्रों में भारी सामान उठाने में मदद करेगा।
सेना को जरूरतों को पूरा करने वाले एक्सोस्केलेटन सिस्टम की खरीद का सबसे अहम हिस्सा यह है कि यह तकनीक बिना बैटरी और बिना बिजली के काम करेगी। यानी सैनिकों को किसी चार्जिंग सिस्टम या अतिरिक्त पावर सोर्स पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
सेना को 90 दिनों के अंदर इसकी डिलीवरी पूरी करनी होगी। इन सिस्टम्स का इस्तेमाल उच्च हिमालयी इलाकों में किया जाएगा, जहां जवानों को रोजाना कई किलो वजन उठाकर ऊंचाई वाले इलाकों में ऑपरेशन करने पड़ते हैं।
Indian Army Exoskeleton System: आखिर क्या होता है एक्सोस्केलेटन?
एक्सोस्केलेटन को आसान भाषा में समझें तो यह एक पहनने वाला मैकेनिकल सपोर्ट सिस्टम है। यह किसी रोबोटिक सूट जैसा दिखता है, लेकिन इसमें मोटर या बैटरी नहीं होती। सैनिक इसे शरीर पर पहनते हैं और यह उनकी कमर, पीठ, कंधों, हाथों और घुटनों को अतिरिक्त ताकत देता है।
सेना के टेक्निकल स्पेसिफिकेशन डॉक्यूमेंट में इसे ऐसे सिस्टम के रूप में बताया गया है जो सैनिकों की स्ट्रेंथ, एंड्योरेंस और मोबिलिटी बढ़ाने के लिए बनाया गया है। इसमें कहा गया है कि यह कार्बन फाइबर जैसे हल्के लेकिन मजबूत मटेरियल से तैयार किया जाता है और कठिन इलाकों में तेजी से मूवमेंट में मदद करता है।
भारतीय सेना के लिए यह इसलिए भी अहम है क्योंकि सियाचिन, लद्दाख और ऊंचाई वाले इलाकों में जवानों को कई किलो राशन, हथियार और गोला-बारूद लेकर घंटों चलना पड़ता है। लंबे समय तक वजन उठाने से रीढ़, घुटनों और कंधों पर दबाव बढ़ता है। एक्सोस्केलेटन इस दबाव को कम करेगा। (Indian Army Exoskeleton System)
बिना बिजली के काम करेगा पूरा सिस्टम
इस खरीद की सबसे बड़ी खासियत यह है कि सेना ने पूरी तरह पैसिव एक्सोस्केलेटन सिस्टम मांगा है। टेक्निकल स्पेसिफिकेशन में साफ लिखा गया है कि सिस्टम “विदाउट एनी एक्सटर्नल पावर” होना चाहिए। यानी यह बैटरी या इलेक्ट्रिक मोटर के बिना काम करेगा।
इसका फायदा यह होगा कि जवानों को ऑपरेशन के दौरान चार्जिंग की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। ऊंचाई वाले इलाकों में अत्यधिक ठंड के कारण बैटरियां जल्दी खत्म हो जाती हैं, लेकिन यह सिस्टम मैकेनिकल सपोर्ट पर आधारित होगा।
सैनिक जरूरत पड़ने पर इसे तुरंत ऑन या ऑफ भी कर सकेंगे। इसके लिए मैनुअल कंट्रोल स्विच दिया जाएगा। जवान बिना सूट उतारे इसे बंद या चालू कर पाएंगे। (Indian Army Exoskeleton System)
सैनिकों को कितना सपोर्ट मिलेगा?
सेना ने इस सिस्टम के लिए काफी सख्त तकनीकी मानक तय किए हैं। दस्तावेज के मुताबिक एक्सोस्केलेटन सैनिक को कम से कम 30 किलो वजन उठाने और ले जाने में मदद करेगा।
कमर और रीढ़ वाले हिस्से में सिस्टम को ऐसा बनाया जाएगा कि जवान जब जमीन से वजन उठाए तो उसे कम से कम 20 किलो का अतिरिक्त सपोर्ट मिले। वहीं दोनों हाथों को मिलाकर 15 किलो तक अतिरिक्त सपोर्ट देने की शर्त रखी गई है।
इसका मतलब यह हुआ कि जवान का शरीर पूरा बोझ अकेले नहीं उठाएगा। सूट वजन का हिस्सा अपने ऊपर ले लेगा। इससे सैनिक की ऊर्जा कम खर्च होगी और थकान धीरे आएगी।
पहाड़ों और बर्फीले इलाकों के लिए खास डिजाइन
भारतीय सेना ने जो तापमान सीमा तय की है, उससे साफ है कि यह सिस्टम बेहद कठिन मौसम के लिए खरीदा जा रहा है। ऑपरेटिंग टेम्परेचर माइनस 30 डिग्री से प्लस 50 डिग्री तक रखा गया है। वहीं स्टोरेज टेम्परेचर माइनस 40 डिग्री तक होना चाहिए। यानी यह सिस्टम सियाचिन जैसे ग्लेशियर क्षेत्र से लेकर राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों तक इस्तेमाल किया जा सकेगा।
इसके अलावा पूरा सिस्टम वाटरप्रूफ कैरिंग केस में आएगा, ताकि बारिश, बर्फ या कीचड़ वाले इलाकों में भी इसे सुरक्षित रखा जा सके। (Indian Army Exoskeleton System)
केवल 5.5 किलो होगा वजन
दिलचस्प बात यह है कि सैनिकों को अतिरिक्त ताकत देने वाला यह पूरा सिस्टम खुद बहुत हल्का होगा। सेना ने इसकी अधिकतम वजन सीमा 5.5 किलो तय की है।
इसके लिए कार्बन फाइबर, हाई स्ट्रेंथ एल्यूमिनियम अलॉय, टफ नायलॉन और कुशन मटेरियल का इस्तेमाल किया जाएगा। ये सभी मटेरियल हल्के होने के साथ मजबूत भी होते हैं।
सेना ने यह भी कहा है कि सिस्टम ऐसा होना चाहिए जिसे जवान आसानी से पहन और उतार सकें। किसी मुश्किल प्रक्रिया की जरूरत नहीं होगी। (Indian Army Exoskeleton System)
तीन हिस्सों में बंटा होगा एक्सोस्केलेटन
सेना ने 3-इन-1 मॉड्यूलर डिजाइन मांगा है। इसमें बैक मॉड्यूल, आर्म मॉड्यूल और नी मॉड्यूल शामिल होंगे। बैक मॉड्यूल सैनिक की कमर और रीढ़ को सपोर्ट देगा। आर्म मॉड्यूल हथियार या भारी उपकरण उठाने के दौरान हाथों पर दबाव कम करेगा। वहीं नी मॉड्यूल घुटनों को सहारा देगा ताकि ऊंचाई वाले इलाकों में चढ़ाई करते समय शरीर पर कम असर पड़े।
टेक्निकल डॉक्यूमेंट में यह भी कहा गया है कि जरूरत के हिसाब से अतिरिक्त मॉड्यूल जोड़े जा सकेंगे। (Indian Army Exoskeleton System)
सेना को क्यों चााहिए यह सूट
भारतीय सेना पिछले कुछ सालों से हाई अल्टीट्यूड इलाकों में सैनिकों की फिजिकल स्ट्रेस कम करने वाली तकनीकों पर ध्यान दे रही है। पूर्वी लद्दाख और उत्तरी सीमाओं पर लंबे समय तक तैनाती के दौरान जवानों को भारी उपकरण लेकर गश्त करनी पड़ती है।
एक सामान्य सैनिक कई बार 25 से 35 किलो तक वजन लेकर चलता है। इसमें हथियार, गोला-बारूद, राशन, रेडियो सेट और सर्वाइवल उपकरण शामिल होते हैं। ऐसे में कमर और घुटनों की चोटें बढ़ जाती हैं।
सेना का मानना है कि एक्सोस्केलेटन से जवान ज्यादा समय तक एक्टिव रह सकेंगे और तेजी से मूवमेंट कर पाएंगे। (Indian Army Exoskeleton System)
मेक इन इंडिया को प्रथमिकता
इस पूरी खरीद प्रक्रिया में “मेक इन इंडिया” को प्राथमिकता दी गई है। इसमें केवल क्लास-1 और क्लास-2 लोकल सप्लायर्स ही इसमें भाग ले सकेंगे। क्लास-1 सप्लायर के लिए कम से कम 50 प्रतिशत लोकल कंटेंट जरूरी है, जबकि क्लास-2 के लिए 20 प्रतिशत।
सरकार ने माइक्रो और स्मॉल एंटरप्राइजेज को भी विशेष छूट दी है। एमएसई कंपनियों को प्राइस प्रेफरेंस और क्वांटिटी प्रेफरेंस दोनों मिलेंगे। इससे भारतीय डिफेंस स्टार्टअप्स और घरेलू कंपनियों को बड़ा मौका मिलेगा।
सेना ने सिस्टम खरीद के साथ ट्रेनिंग की शर्त भी जोड़ी है। सप्लायर के दो व्यक्तियों को एक सप्ताह की ट्रेनिंग देनी होगी। यह ट्रेनिंग यूजर लोकेशन पर होगी, ताकि जवान वास्तविक परिस्थितियों में सिस्टम इस्तेमाल करना सीख सकें।
सिस्टम की वारंटी तीन साल तय की गई है। इसके अलावा छह साल की शेल्फ लाइफ मांगी गई है। (Indian Army Exoskeleton System)
दुनियाभर की सेनाओं में तेजी से बढ़ रहा इस्तेमाल
अमेरिका, चीन और रूस जैसी बड़ी सेनाएं पिछले कई वर्षों से एक्सोस्केलेटन तकनीक पर काम कर रही हैं। अमेरिकी सेना ने लॉजिस्टिक्स और लोड कैरिंग के लिए कई प्रोटोटाइप तैयार किए हैं। चीन ने हाई अल्टीट्यूड सैनिकों के लिए हल्के एक्सोस्केलेटन का परीक्षण किया है।
वहीं अब भारतीय सेना भी सैनिकों की फिजिकल परफॉर्मेंस बढ़ाने के लिए नई तकनीक को तेजी से अपनाना चाहती है। खास बात यह है कि भारतीय सेना ने शुरुआत में पॉसिव सिस्टम चुना है क्योंकि यह कम मुश्लकिल, कम खर्चीला और फील्ड में ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है। (Indian Army Exoskeleton System)
The Indian Army is set to procure 520 passive exoskeleton systems to enhance the physical endurance and operational efficiency of soldiers deployed in high-altitude and extreme terrain areas such as Ladakh and Siachen. These wearable assistive devices will help troops carry heavy loads of up to 30 kilograms with reduced fatigue and lower stress on the spine, knees, shoulders, and arms. Unlike powered robotic suits, the passive exoskeleton works without batteries or external power sources, making it ideal for harsh environments. The move is part of the Army’s modernisation drive and supports the government’s “Make in India” initiative in the defence sector.



