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EXPLAINER: क्या टेलीमेडिसिन से जवानों की बचेगी जान? ISRO की मदद से कैसे फ्रंटलाइन पर बैठे सैनिकों तक पहुंचेगा डॉक्टर!

हाल ही में भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना ने मिलकर इसरो के साथ एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग यानी एमओयू साइन किया है। इस समझौते के तहत पहले से मौजूद टेलीमेडिसिन सिस्टम को मजबूत किया जाएगा और नए सेंटर भी जोड़े जाएंगे...

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📍नई दिल्ली | 22 Mar, 2026, 4:45 PM

ISRO Army Telemedicine MoU: देश की सीमाओं पर तैनात जवानों के लिए भारतीय सेनाओं और इसरो के बीच एक अहम समझौता हुआ है। इस समझौते के तहत अब दूर-दराज और कठिन इलाकों में तैनात सैनिकों को बेहतर मेडिकल सुविधा मिल सकेगी। इस समझौते का मकसद सैटेलाइट के जरिए टेलीमेडिसिन सेवाओं का विस्तार करना है, ताकि जहां अस्पताल पहुंचना मुश्किल है, वहां डॉक्टर खुद सैनिक तक पहुंच सके।

ISRO Army Telemedicine MoU: 53 नए टेलीमेडिसिन नोड्स

हाल ही में भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना ने मिलकर इसरो के साथ एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग यानी एमओयू साइन किया है। इस समझौते के तहत पहले से मौजूद टेलीमेडिसिन सिस्टम को मजबूत किया जाएगा और नए सेंटर भी जोड़े जाएंगे।

पहले चरण में इसरो 53 नए टेलीमेडिसिन नोड्स स्थापित करेगा। ये नोड्स पहले से मौजूद 20 नोड्स के साथ मिलकर काम करेंगे। यानी आने वाले समय में सेना के पास कुल 70 से ज्यादा ऐसे मेडिकल कनेक्शन पॉइंट होंगे, जहां से सैनिक सीधे बड़े अस्पतालों के डॉक्टरों से जुड़ सकेंगे। (ISRO Army Telemedicine MoU)

क्यों जरूरी है यह सुविधा

भारत के कई ऐसे बेहद दुर्गम इलाके ऐसे हैं, जहां हालात बेहद कठिन होते हैं। जिनमें सियाचिन ग्लेशियर, लद्दाख की ऊंची पहाड़ियां या पूर्वोत्तर के दूर-दराज इलाके शामिल हैं। इन जगहों पर जवानों की तैनाती की जाती है। यहां तापमान कई बार माइनस 40-50 डिग्री तक चला जाता है और बर्फबारी के कारण कई महीनों तक सड़क और हेलीकॉप्टर दोनों का संपर्क टूट जाता है।

ऐसे हालात में अगर कोई जवान बीमार पड़ जाए या घायल हो जाए, तो उसे तुरंत अस्पताल पहुंचाना बहुत मुश्किल होता है। पहले छोटी बीमारी भी गंभीर बन जाती थी, क्योंकि स्पेशलिस्ट डॉक्टर तक पहुंचने में काफी समय लग जाता था।

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अब टेलीमेडिसिन के जरिए यह समस्या काफी हद तक खत्म हो जाएगी। जवान वहीं बैठे-बैठे बड़े अस्पताल के डॉक्टर से बात कर सकेगा और तुरंत इलाज शुरू किया जा सकेगा। (ISRO Army Telemedicine MoU)

कैसे काम करेगा टेलीमेडिसिन सिस्टम

यह पूरा सिस्टम सैटेलाइट पर आधारित है। इसमें वीसेट यानी वेरी स्मॉल एपर्चर टर्मिनल तकनीक का इस्तेमाल होता है। आसान भाषा में समझें तो यह एक छोटा डिश एंटेना होता है, जो इसरो के सैटेलाइट से जुड़कर इंटरनेट और वीडियो कनेक्शन उपलब्ध कराता है।

हर टेलीमेडिसिन नोड पर एक मेडिकल सेटअप होता है, जिसमें ईसीजी मशीन, डिजिटल एक्स-रे, ब्लड प्रेशर और ऑक्सीजन मापने वाले उपकरण और अन्य जरूरी मेडिकल डिवाइस होते हैं। यहां तैनात मेडिकल ऑफिसर मरीज का पूरा डेटा तैयार करता है।

इसके बाद यह डेटा और लाइव वीडियो कनेक्शन के जरिए कमांड हॉस्पिटल या बड़े स्पेशलिटी अस्पताल में बैठे डॉक्टरों तक पहुंचाया जाता है। वहां से डॉक्टर तुरंत सलाह देते हैं कि मरीज का इलाज कैसे करना है या उसे तुरंत निकालने की जरूरत है या नहीं। इस पूरी प्रक्रिया में कुछ ही मिनट लगते हैं, जो पहले कई घंटों या दिनों में संभव हो पाता था। (ISRO Army Telemedicine MoU)

सियाचिन जैसे इलाकों में बड़ा फायदा

इस सिस्टम का सबसे ज्यादा फायदा उन इलाकों में होगा, जहां हालात बेहद कठिन हैं। सियाचिन ग्लेशियर को दुनिया का सबसे ऊंचा युद्धक्षेत्र कहा जाता है। यहां ऑक्सीजन कम होती है और ठंड बेहद ज्यादा होती है।

ऐसे इलाकों में हाई अल्टीट्यूड बीमारी, फ्रॉस्टबाइट, हार्ट से जुड़ी दिक्कतें और चोट लगने के मामले आम हैं। अब टेलीमेडिसिन के जरिए इन सभी समस्याओं का तुरंत इलाज संभव हो पाएगा।

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यहां तक कि कुछ खास टेलीमेडिसिन नोड्स को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि वे बेहद ठंड में भी काम कर सकें। इन्हें गर्म कमरों में रखा जाता है ताकि मशीनें सही तरीके से चलती रहें। (ISRO Army Telemedicine MoU)

साल 2001 में की थी शुरुआत

भारत में टेलीमेडिसिन की शुरुआत इसरो ने साल 2001 में की थी। शुरुआत में इसका इस्तेमाल ग्रामीण और दूर-दराज इलाकों के लोगों के इलाज के लिए किया गया था। बाद में इसे सेना के लिए भी अपनाया गया।

पिछले कुछ सालों में सेना के कई इलाकों में टेलीमेडिसिन नोड्स लगाए गए, लेकिन अब तकनीक को और बेहतर बनाने और कवरेज बढ़ाने की जरूरत महसूस हुई। इसी को ध्यान में रखते हुए यह नया समझौता किया गया है।

इस समझौते के तहत सिर्फ नए नोड्स ही नहीं लगाए जाएंगे, बल्कि पुराने सिस्टम को भी अपडेट किया जाएगा, ताकि बेहतर क्वालिटी का वीडियो और डेटा ट्रांसमिशन हो सके। (ISRO Army Telemedicine MoU)

सैनिकों की जान बचाने में मददगार

इस नई व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे सैनिकों की जान बचाई जा सकेगी। कई बार मौसम खराब होने के कारण हेलीकॉप्टर भी नहीं उड़ पाते और मरीज को निकालना संभव नहीं होता।

ऐसे में टेलीमेडिसिन ही एकमात्र सहारा बन जाता है। डॉक्टर तुरंत सलाह देकर इलाज शुरू करवा सकते हैं, जिससे हालत बिगड़ने से पहले ही मरीज को संभाला जा सके।

इसके अलावा इससे हेलीकॉप्टर के जरिए मरीजों को निकालने की जरूरत भी कम होगी, जिससे समय और खर्च दोनों की बचत होगी। (ISRO Army Telemedicine MoU)

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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का होगा इस्तेमाल

साथ ही, आने वाले समय में टेलीमेडिसिन सिस्टम को और स्मार्ट बनाया जाएगा। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे बीमारी की पहचान और जल्दी हो सके। इसके अलावा बेहतर वीडियो क्वालिटी, पोर्टेबल डिवाइस और डिजिटल रिकॉर्ड सिस्टम को भी जोड़ा जाएगा। इससे सैनिकों का पूरा मेडिकल रिकॉर्ड एक जगह उपलब्ध रहेगा और जरूरत पड़ने पर कहीं से भी देखा जा सकेगा। (ISRO Army Telemedicine MoU)

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  • News Desk

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