📍नई दिल्ली/महू | 19 Jun, 2026, 1:12 PM
Garudastra Mortar System: आधुनिक युद्ध में केवल लंबी दूरी तक मार करने वाले हथियार ही काफी नहीं माने जाते, बल्कि यह भी जरूरी है कि कोई हथियार कितनी तेजी से हमला कर सकता है, कितनी जल्दी अपनी जगह बदल सकता है और दुश्मन के जवाबी हमले से खुद को कितना सुरक्षित रख सकता है। भारतीय कंपनी निबे लिमिटेड ने अपने नए गरुड़ास्त्र लॉन्ग रेंज 120 मिमी व्हीकल माउंटेड मोर्टार सिस्टम का प्रदर्शन भारतीय सेना के सामने किया है।
मध्य प्रदेश के महू स्थित इन्फैंट्री स्कूल में इवैल्यूशन ट्रायल के दौरान गरुड़ास्त्र ने ऐसी कई क्षमताओं का प्रदर्शन किया, जिन्हें आधुनिक युद्ध की जरूरत माना जा रहा है। खास बात यह है कि यह परीक्षण नो कॉस्ट-नो कमिटमेंट (एनसी-एनसी) आधार पर किया गया, यानी सेना ने सिस्टम की क्षमता को परखा लेकिन किसी खरीद प्रतिबद्धता के बिना।
हाल ही में भारतीय सेना ने पांच जून को मोर्टार स्पेशलिस्ट व्हीकल को लेकर रिक्वेस्ट फॉर इनफॉरमेशन (RFI) जारी की थी। इस खबर को रक्षा समाचार ने ही ब्रेक किया था। जिसके बाद निबे कंपनी अपने गरुड़ास्त्र लॉन्ग रेंज 120 मिमी व्हीकल माउंटेड मोर्टार एंड बॉम्ब सिस्टम का प्रदर्शन भारतीय सेना के सामने किया है।
Garudastra Mortar System: क्या होता है व्हीकल माउंटेड मोर्टार?
मोर्टार को आमतौर पर पैदल सेना का सबसे भरोसेमंद इनडायरेक्ट फायर सपोर्ट वेपन माना जाता है। इसका इस्तेमाल दुश्मन की ऐसी स्थिति पर हमला करने के लिए किया जाता है जो सीधे दिखाई नहीं देती।
पारंपरिक मोर्टार सिस्टम में सैनिकों को पहले मोर्टार को वाहन से उतारना पड़ता है, बेस प्लेट लगानी पड़ती है, दिशा तय करनी पड़ती है और उसके बाद फायरिंग शुरू होती है। इस पूरी प्रक्रिया में कई मिनट लग सकते हैं।
लेकिन गरुड़ास्त्र जैसे सिस्टम में यह पूरी प्रक्रिया काफी हद तक ऑटोमेटेड है। वाहन रुकता है, सिस्टम टारगेट की दिशा और दूरी की कैल्कुलेशन करता है, मोर्टार फायर करता है और फिर तुरंत वहां से निकल जाता है।
यही वजह है कि ऐसे सिस्टम आधुनिक सेनाओं के लिए तेजी से महत्वपूर्ण बनते जा रहे हैं। (Garudastra Mortar System)
महू में गरुड़ास्त्र ने क्या किया ट्रायल में?
रक्षा सूत्रों के अनुसार ट्रायल की शुरुआत एक “शूट एंड स्कूट” मिशन से हुई। आधुनिक युद्ध में यह क्षमता सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है।
गरुड़ास्त्र निर्धारित फायरिंग पोजीशन पर पहुंचा और 30 सेकंड से भी कम समय में युद्ध के लिए तैयार हो गया। इसके बाद केवल 15 सेकंड के भीतर दो राउंड फायर किए गए।
सबसे खास बात यह रही कि फायरिंग के तुरंत बाद सिस्टम ने केवल 15 सेकंड में अपनी जगह छोड़ दी और दूसरी जगह पहुंचकर दोबारा टारगेट को निशाना बनाया। इसका उद्देश्य दुश्मन की काउंटर बैटरी फायर से बचना था।
शूट एंड स्कूट इसलिए जरूरी है क्योंकि आधुनिक रडार कुछ ही सेकंड में तोप या मोर्टार की स्थिति का पता लगा सकते हैं।
“शूट एंड स्कूट” क्यों है इतना जरूरी
पिछले कुछ सालों में युद्ध का स्वरूप तेजी से बदला है। अब लगभग हर आधुनिक सेना के पास ऐसे रडार मौजूद हैं जो किसी भी तोप या मोर्टार द्वारा दागे गए गोले की दिशा को ट्रैक करके उसकी फायरिंग लोकेशन का पता लगा सकते हैं।
इसे काउंटर बैटरी रडार कहा जाता है।
यदि कोई मोर्टार या तोप फायरिंग के बाद लंबे समय तक एक ही स्थान पर खड़ी रहती है तो दुश्मन कुछ ही मिनटों में जवाबी हमला कर सकता है।
यूक्रेन युद्ध में यह बार-बार देखने को मिला कि जो आर्टिलरी सिस्टम तेजी से स्थान नहीं बदल सके, वे दुश्मन के ड्रोन और जवाबी गोलाबारी का शिकार बन गए।
इसी वजह से दुनिया भर की सेनाएं ऐसे हथियारों की तलाश कर रही हैं जो हमला करने के बाद तुरंत अपनी लोकेशन बदल सकें। (Garudastra Mortar System)
🚨Recently, Nibe Limited has successfully demonstrated its advanced Garudastra Long-Range 120mm Vehicle Mounted Mortar System at the Infantry School, Mhow.
The demonstration showcased key operational capabilities, including rapid shoot-and-scoot operations, a high rate of fire,… pic.twitter.com/gtAjd3byYO
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) June 18, 2026
केवल दो सैनिकों ने एक मिनट में किए 12 राउंड फायर
ट्रायल के दौरान गरुड़ास्त्र की फायरिंग क्षमता का भी प्रदर्शन किया गया। रक्षा सूत्रों के मुताबिक केवल दो सैनिकों की टीम ने इस सिस्टम को ऑपरेट करते हुए एक मिनट में 12 राउंड फायर किए।
इतनी तेज फायरिंग के बावजूद सिस्टम ने लक्ष्य पर सटीकता बनाए रखी। आम तौर पर मोर्टार ऑपरेशन में ज्यादा सैनिकों की जरूरत होती है, लेकिन ऑटोमेशन और डिजिटल फायर कंट्रोल तकनीक की वजह से गरुड़ास्त्र कम मानव संसाधन के साथ भी ज्यादा फायरपावर दे सकता है।
युद्ध में यह एक बड़ा फायदा माना जाता है क्योंकि कम सैनिकों के साथ ज्यादा प्रभावी फायर सपोर्ट दिया जा सकता है।
एमआरएसआई क्षमता ने भी किया प्रदर्शन
महू में हुए प्रदर्शन में मल्टीपल राउंड्स सिमल्टेनियस इम्पैक्ट मिशन (एमआरएसआई) भी शामिल हुआ। यह आधुनिक आर्टिलरी की सबसे एडवांस तकनीकों में गिना जाता है।
आमतौर पर यदि तीन गोले दागे जाएं तो पहला गोला पहले और तीसरा गोला सबसे बाद में टारगेट तक पहुंचेगा। लेकिन एमआरएसआई तकनीक में अलग-अलग कोणों और अलग-अलग उड़ान समय का इस्तेमाल करके गोले इस तरह दागे जाते हैं कि वे एक ही समय पर टारगेट पर गिरें।
ट्रायल के दौरान गरुड़ास्त्र ने तीन राउंड फायर किए और सभी गोले एक साथ टारगेट पर पहुंचे।
इससे दुश्मन को प्रतिक्रिया देने का समय नहीं मिलता और एक ही क्षण में भारी मात्रा में फायरपावर टारगेट पर गिरती है।
3 मीटर × 3 मीटर के टारगेट पर सीधा वार
ट्रायल का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा प्रिसीजन गाइडेड म्यूनिशन रहा। गरुड़ास्त्र से एक जीपीएस और लेजर गाइडेड राउंड दागा गया जिसने लंबी दूरी पर मौजूद केवल 3 मीटर × 3 मीटर साइज के टारगेट को सीधे निशाना बनाया।
यह क्षमता इसलिए महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि पारंपरिक मोर्टार आमतौर पर किसी बड़े क्षेत्र पर फायरिंग करते हैं। लेकिन गाइडेड म्यूनिशन के साथ अब मोर्टार भी बेहद सटीक हमले कर सकते हैं। इससे गोला-बारूद की बचत होती है और टारगेट को कम राउंड में निष्क्रिय किया जा सकता है। (Garudastra Mortar System)
गरुड़ास्त्र की कितनी है रेंज
गरुड़ास्त्र की मारक क्षमता इस्तेमाल किए जाने वाले गोला-बारूद के प्रकार पर निर्भर करती है। ट्रायल के दौरान सबसे ज्यादा ध्यान इसके जीपीएस और लेजर गाइडेड प्रिसीजन म्यूनिशन पर रहा। कंपनी ने प्रदर्शन के दौरान ऐसे गाइडेड राउंड का इस्तेमाल किया, जो करीब 7 से 10 किलोमीटर दूर मौजूद टारगेट को बेहद सटीकता के साथ निशाना बना सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि गाइडेड तकनीक की वजह से हवा, तापमान और अन्य मौसम संबंधी कारकों का असर काफी कम हो जाता है, जिससे सटीकता बढ़ जाती है।
वहीं अगर सामान्य 120 मिमी हाई एक्सप्लोसिव (एचई) मोर्टार गोला-बारूद की बात करें तो उसकी सटीक रेंज का आंकड़ा अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है। हालांकि रक्षा क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि इस श्रेणी के आधुनिक 120 मिमी मोर्टार सिस्टम आमतौर पर 6 से 8 किलोमीटर तक प्रभावी फायरिंग कर सकते हैं। चूंकि गरुड़ास्त्र को लॉन्ग रेंज मोर्टार सिस्टम के रूप में पेश किया गया है, इसलिए इसकी वास्तविक क्षमता इस्तेमाल होने वाले गोला-बारूद और प्रोपेलेंट पर भी निर्भर करेगी।
ट्रायल के दौरान एक और महत्वपूर्ण क्षमता का प्रदर्शन किया गया। कंपनी के अनुसार गरुड़ास्त्र से दागा गया 17 किलोग्राम वॉरहेड वाला गाइडेड राउंड लगभग 20 सेंटीमीटर मोटी रीइन्फोर्स्ड कंक्रीट संरचना को भेदने में सक्षम है। ऐसे गोला-बारूद का उपयोग बंकर, मजबूत सैन्य ठिकानों और अन्य संरक्षित टारगेट्स के खिलाफ किया जा सकता है। (Garudastra Mortar System)
दुनिया में बढ़ी व्हीकल माउंटेड मोर्टार की बढ़ती मांग
पिछले दो दशकों में दुनिया की कई सेनाओं ने व्हीकल माउंटेड मोर्टार को अपनाया है। अमेरिका के पास अपने स्ट्राइकर प्लेटफॉर्म पर मोर्टार सिस्टम तैनात है। इजराइल के पास कार्डोम और स्पीयर जैसे सिस्टम हैं। यूरोप की कई सेनाएं भी इसी प्रकार की मोबाइल फायर सपोर्ट सिस्टम का इस्तेमाल कर रही हैं।
इन सिस्टमों का उद्देश्य इन्फैंट्री यानी पैदल सेना को तेज और सटीक फायर पावर सर्पोट देना है।
इजरायली सिस्टम से क्यों हो रही तुलना?
सूत्रों का कहना है कि गरुड़ास्त्र जिस कैटेगरी का सिस्टम है, उसमें दुनिया के सबसे चर्चित प्लेटफॉर्म इजराइल की एल्बिट सिस्टम्स के स्पीयर और कार्डोम मोर्टार सिस्टम हैं।
इनकी पहचान तेज तैनाती, डिजिटल फायर कंट्रोल, कम क्रू और सटीक निशाने की क्षमता है। गरुड़ास्त्र में भी इसी प्रकार की कई आधुनिक क्षमताएं दिखाई गईं। हालांकि निबे कंपनी ने अपने अंतरराष्ट्रीय तकनीकी साझेदार के बारे में सार्वजनिक रूप से कोई जानकारी साझा नहीं की है।
भारतीय सेना को क्यों है ऐसे सिस्टम की जरूरत
भारतीय सेना दुनिया के सबसे कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में तैनात रहती है। लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और अन्य ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पारंपरिक तोपखाने को तैनात करना हमेशा आसान नहीं होता।
ऐसे इलाकों में मोबाइल मोर्टार सिस्टम तेजी से आगे बढ़ सकती पैदल सेना को तत्काल फायर सपोर्ट दे सकते हैं।
रक्षा सूत्रों के अनुसार सेना पहले ही सीमित संख्या में व्हीकल माउंटेड इन्फैंट्री मोर्टार सिस्टम का उपयोग कर रही है। अब ज्यादा आधुनिक और अधिक ऑटोमेटेड सिस्टम का मूल्यांकन किया जा रहा है। (Garudastra Mortar System)
एमएसवी प्रोग्राम से क्या है कनेक्शन
हाल ही में भारतीय सेना ने मोर्टार स्पेशलिस्ट व्हीकल (एमएसवी) कार्यक्रम के लिए आरएफआई जारी की थी। सेना ऐसे सिस्टम चाहती है जो 81 मिमी और 120 मिमी दोनों तरह के मोर्टार चला सकें, 20 सेकंड से कम समय में फायरिंग के लिए तैयार हो जाएं और कम क्रू के साथ ऑपरेट किए जा सकें।
एमएसवी कार्यक्रम की तकनीकी जरूरतों में भी तेज तैनाती, ऑटोमेशन, डिजिटल फायर कंट्रोल और “शूट एंड स्कूट” जैसी क्षमताओं पर विशेष जोर दिया गया है। (Garudastra Mortar System)
एमएसवी और वीएमआईएमएस में क्या है अंतर
एमएसवी (मोर्टार स्पेशलिस्ट व्हीकल) और वीएमआईएमएस (व्हीकल माउंटेड इन्फैंट्री मोर्टार सिस्टम) एक-दूसरे से जुड़े हुए कार्यक्रम हैं, लेकिन दोनों के बीच तकनीकी स्तर पर बड़ा अंतर भी है। भारतीय सेना ने पहले चरण में वीएमआईएमएस के तहत करीब 50 सिस्टम शामिल किए थे। इनमें महिंद्रा एएलएसवी 4×4 वाहन पर स्पेन की एनटीजीएस अलाकरान-एल 81 मिमी ऑटोमेटेड मोर्टार सिस्टम लगाया गया थी। इन सिस्टमों को तेजी से तैनाती और तुरंत फायर सपोर्ट देने के लिए बनाया गया था।
रक्षा सूत्रों के मुताबिक इनमें से कुछ सिस्टम्स को एलएसी के पास भी तैनात किया गया है। यह अपेक्षाकृत हल्के और अत्यधिक मोबाइल प्लेटफॉर्म हैं, जो कम समय में फायरिंग कर सकते हैं और फिर अपनी जगह बदल सकते हैं।
अब सेना इससे एक कदम आगे बढ़ रही है। एमएसवी यानी मोर्टार स्पेशलिस्ट व्हीकल को वीएमआईएमएस का ज्यादा एडवांस और अगली पीढ़ी का वर्जन माना जा रहा है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य पूरी तरह मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत के तहत स्वदेशी रूप से विकसित और निर्मित आधुनिक मोर्टार प्लेटफॉर्म हासिल करना है।
सेना ऐसे सिस्टम चाहती है जो 81 मिमी और 120 मिमी दोनों मोर्टारों को ऑपरेट कर सकें, 20 सेकंड से भी कम समय में फायरिंग के लिए तैयार हो जाएं, केवल दो सैनिक ऑपरेट कर सके। इसमें एडवांस बैलिस्टिक कंप्यूटर, ऑटोमेटेड फायर कंट्रोल, डिजिटल कम्युनिकेशन और उच्च स्तर की मोबिलिटी जैसी क्षमताओं की भी मांग की गई है। (Garudastra Mortar System)



