📍नई दिल्ली | 20 Apr, 2026, 9:05 PM
Pahalgam Attack Anniversary: 22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम के बैसरन इलाके में हुए आतंकी हमले को हुए एक साल हो चुका है। इस भीषण आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इस हमले में पर्यटकों को निशाना बनाया गया और कई निर्दोष लोगों की जान चली गई। घटना के तुरंत बाद सुरक्षा बलों के लिए यह सिर्फ एक आतंकी हमला नहीं था, बल्कि जिम्मेदार आतंकियों को खोजकर उन्हें सजा देना एक बड़ा ऑपरेशन बन गया।
इसी के बाद शुरू हुआ “ऑपरेशन महादेव”, जो अगले कई हफ्तों तक लगातार चलता रहा और अंत में उसी इलाके में खत्म हुआ, जहां आतंकियों ने छिपने की कोशिश की थी।
Pahalgam Attack Anniversary: हमले के तुरंत बाद शुरू हुई कार्रवाई
सूत्रों ने बताया कि हमले के कुछ ही घंटों के अंदर भारतीय सेना और अन्य सुरक्षा एजेंसियां मौके पर पहुंच गईं। सबसे पहले इलाके को घेर लिया गया और वहां मौजूद लोगों से जानकारी जुटाई गई। प्रत्यक्षदर्शियों के बयान लिए गए और घटना की पूरी कड़ी को समझने की कोशिश की गई।
सूत्रों का कहना है कि इस दौरान साफ हो गया कि हमले में तीन आतंकवादी शामिल थे। अलग-अलग इनपुट्स को जोड़कर उनकी पहचान की पुष्टि की गई। इसमें ह्यूमन इंटेलिजेंस ने बहुत मदद की। लोगों से मिली जानकारी, टेक्निकल इनपुट और जिंदा बचे हुए लोगों के बयानों के आधार पर रणनीति तैयार की गई।
ऊंचाई वाले इलाकों की तरफ बढ़ रहे थे आतंकी
सूत्रों ने बताया कि जांच के दौरान जिन तीन आतंकियों की पहचान हुई, वे लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े बताए गए। इसके बाद सुरक्षा एजेंसियों ने उनके संभावित रास्तों और ठिकानों का अंदाजा लगाना शुरू किया। शुरुआत में यह माना गया कि हमले के बाद आतंकी इलाके से बाहर निकलने की कोशिश करेंगे। इसलिए सबसे पहले संभावित एस्केप रूट्स यानी बाहर निकलने के रास्तों को सील किया गया। घाटी से बाहर जाने वाले रास्तों पर सुरक्षा बढ़ा दी गई।
सूत्रों के मुताबिक जांच के दौरान यह पता चला कि आतंकी दक्षिण कश्मीर के ऊंचाई वाले इलाकों की तरफ बढ़ रहे हैं। वे हापतनार, बुगमार और त्राल जैसे इलाकों से होते हुए घने जंगलों की तरफ चले गए।
मुश्किल इलाके में ऑपरेशन की चुनौती
सूत्रों का कहनाा है कि आतंकी जिस इलाके में पहुंचे, वह घना जंगल और ऊंचाई वाला क्षेत्र था। यह इलाका दाचीगाम और महादेव रिज के आसपास का माना जाता है। यहां पेड़ों की घनी परत, ऊबड़-खाबड़ रास्ते और कम दृश्यता के चलते ऑपरेशन करना आसान नहीं था।
इस तरह के इलाके में न सिर्फ आतंकियों को छिपने का मौका मिलता है, बल्कि सुरक्षा बलों के लिए भी मूवमेंट आसान नहीं होता। इसी वजह से ऑपरेशन को धीरे-धीरे और सावधानी से आगे बढ़ाया गया।
बढ़ाया गया ऑपरेशन का दायरा
सूत्रों ने आगे बताया कि मई के आखिर तक सुरक्षा एजेंसियों को आतंकियों की मूवमेंट का एक साफ पैटर्न समझ आने लगा। इसके बाद ऑपरेशन का दायरा बढ़ाया गया। ज्यादा संख्या में जवानों को तैनात किया गया और खास यूनिट्स को शामिल किया गया।
इस दौरान पैरा स्पेशल फोर्सेज को भी ऑपरेशन में शामिल किया गया। इन यूनिट्स को खास तौर पर ऐसे मुश्किल इलाकों में ऑपरेशन के लिए तैयार किया जाता है।
ऑपरेशन के शुरुआती दिनों में जो इलाका 300 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा में फैला हुआ था, उसे धीरे-धीरे छोटा किया गया।
कई एजेंसियों ने मिलकर चलाया अभियान
ऑपरेशन महादेव केवल सेना का अभियान नहीं था। इसमें कई एजेंसियां एक साथ काम कर रही थीं। भारतीय सेना, जम्मू-कश्मीर पुलिस और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के बीच लगातार कॉर्डिनेशन बना रहा।
हर एजेंसी अपने-अपने इनपुट साझा कर रही थी। जिससे ऑपरेशन को लगातार मदद मिल रही थी और आतंकियों की लोकेशन की स्पष्ट सामने आ रही थी।
सूत्रों ने बताया कि इस ऑपरेशन में टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल लगातार किया गया। ड्रोन और रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट के जरिए जंगलों में नजर रखी गई। इसके अलावा इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर जैसे उपकरणों का भी इस्तेमाल हुआ।
घने जंगलों में जहां इंसानी नजर सीमित हो जाती है, वहां इन उपकरणों की मदद से मूवमेंट को ट्रैक किया गया। इससे आतंकियों पर लगातार दबाव बना रहा।
धीरे-धीरे घिरते गए आतंकी
वहीं, जैसे-जैसे ऑपरेशन आगे बढ़ा, सुरक्षा बलों ने इलाके को छोटे हिस्सों में बांटना शुरू किया। हर हिस्से में सर्च ऑपरेशन चलाया गया और मूवमेंट को सीमित किया गया।
लगातार निगरानी और दबाव के कारण आतंकियों के पास विकल्प कम होते गए। वे एक छोटे इलाके में सिमटते चले गए। इस दौरान उनकी मूवमेंट पर लगातार नजर रखी जा रही थी।
सूत्रों ने आगे बताया कि करीब 93 दिनों तक चले इस ऑपरेशन में सुरक्षा बलों ने 250 किलोमीटर से ज्यादा इलाके में आतंकियों का पीछा किया।
वहीं, 10 जुलाई 2025 के आसपास ऑपरेशन एक निर्णायक मोड़ पर पहुंचा। नई जानकारी के आधार पर बड़े स्तर पर कार्रवाई शुरू की गई। लिडवास, हरवान और दाचीगाम इलाके में एक साथ ऑपरेशन चलाया गया।
इस दौरान सभी संभावित रास्तों को बंद कर दिया गया, ताकि आतंकी बाहर न निकल सकें। इलाके को पूरी तरह से घेर लिया गया और मूवमेंट पर रोक लगा दी गई।
25 वर्ग किलोमीटर में सिमटे आतंकी
जुलाई के आखिर तक ऑपरेशन का दायरा घटकर लगभग 25 वर्ग किलोमीटर रह गया। इसी इलाके में आतंकियों के होने की पुष्टि हुई।
सूत्रों का कहना है कि 28 जुलाई 2025 को पैरा स्पेशल फोर्सेज की एक टीम को अंतिम कार्रवाई के लिए भेजा गया। टीम ने बेहद कठिन रास्तों से होकर आगे बढ़ना शुरू किया। लगभग 3 किलोमीटर का रास्ता पैदल तय करने में करीब 10 घंटे का समय लगा।
टीम ने पूरी तरह चुपचाप आगे बढ़ते हुए अपनी पोजीशन बनाई। इसके बाद जैसे ही आतंकियों की पहचान हुई, तुरंत कार्रवाई शुरू की गई।
तीनों आतंकियों का हुआ खात्मा
इस कार्रवाई में तीनों आतंकियों को मार गिराया गया। ऑपरेशन तेजी से और सटीक तरीके से पूरा किया गया। इसके साथ ही बैसरन हमले में शामिल सभी आतंकियों का अंत हो गया।
मौके से हथियार, गोला-बारूद और अन्य सामान भी बरामद किया गया, जिससे उनकी गतिविधियों के बारे में और जानकारी मिली।
ऑपरेशन की खास बात क्या रही
इस पूरे ऑपरेशन में कई चीजें खास रहीं। सबसे पहले, घटना के तुरंत बाद शुरू हुई कार्रवाई और लगातार जारी प्रयास। दूसरे, अलग-अलग एजेंसियों के बीच तालमेल, जिसने ऑपरेशन को दिशा दी।
तीसरा, टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल, जिससे घने जंगलों में भी निगरानी संभव हो सकी। और चौथा, लंबा समय लगने के बावजूद ऑपरेशन को लगातार जारी रखना।
“टाइम-स्पेस कंट्रोल” की रणनीति
इस ऑपरेशन में एक अहम रणनीति देखने को मिली, जिसे साधारण भाषा में “टाइम और स्पेस कंट्रोल” कहा जा सकता है। इसका मतलब है कि आतंकियों को न समय मिल सके और न ही जगह बदलने का मौका।
सुरक्षा बलों ने न सिर्फ इलाके को धीरे-धीरे छोटा किया, बल्कि आतंकियों की हर मूवमेंट पर नजर रखी। इससे वे लगातार दबाव में रहे और अपनी योजना के मुताबिक काम नहीं कर पाए।
यह तरीका पारंपरिक सर्च ऑपरेशन से अलग था, जिसमें सिर्फ इलाके को खंगाला जाता है। यहां पर लगातार ट्रैकिंग और मूवमेंट को सीमित करने पर ज्यादा ध्यान दिया गया।
लोगों के बयान भी बने अहम कड़ी
इस ऑपरेशन में सिर्फ तकनीक ही नहीं, बल्कि लोगों से मिली जानकारी भी अहम रही। हमले के बाद जो लोग बचे थे, उनके बयान से शुरुआती जानकारी मिली। इसी तरह स्थानीय स्तर पर मिली सूचनाओं ने भी ऑपरेशन को आगे बढ़ाने में मदद की। इससे यह साफ हुआ कि जमीनी स्तर की जानकारी अभी भी उतनी ही जरूरी है।
ऑपरेशन का लंबा सफर
हमले के दिन से लेकर अंतिम कार्रवाई तक, यह ऑपरेशन लगातार चलता रहा। इसमें कई बार दिशा बदली गई, नई जानकारी के आधार पर रणनीति बदली गई और इलाके को धीरे-धीरे सीमित किया गया। करीब तीन महीने तक चले इस अभियान में हर चरण पर अलग तरह की चुनौती सामने आई, जिसे देखते हुए ऑपरेशन को आगे बढ़ाया गया।
इस तरह ऑपरेशन महादेव एक लंबा और लगातार चलने वाला अभियान रहा, जिसमें अलग-अलग स्तर पर काम करते हुए आतंकियों तक पहुंच बनाई गई और उन्हें खत्म किया गया।




