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भारतीय नौसेना के MiG-29K को मिलेगी स्वदेशी ताकत, विदेशी घातक 80mm एयरो रॉकेट को देश में बनाने की तैयारी

यह रॉकेट भारतीय नौसेना के मिग-29के और मिग-29केयूबी लड़ाकू विमानों से दागा जाता है। अब तक इसकी आपूर्ति विदेशी कंपनियों से होती रही है, लेकिन नौसेना चाहती है कि इसका पूरा उत्पादन भारत में ही हो...

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📍नई दिल्ली | 4 Jun, 2026, 5:08 PM

Indian Navy 80mm Aero Rocket: भारतीय सेनाएं लगातार डिफेंस सेक्टर में विदेश से आने वाले हथियारों पर से अपनी निर्भरता कम करने पर फोकस कर रही हैं। भारतीय नौसेना ने 80 एमएम एयरो रॉकेट के स्वदेशी डिजाइन और डेवलपमेंट के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया है। इसका उद्देश्य इस रॉकेट को पूरी तरह देश में डेवलप करना और निर्मित करना है ताकि भविष्य में इसके लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर नहीं रहना पड़े।

यह रॉकेट भारतीय नौसेना के मिग-29के और मिग-29केयूबी लड़ाकू विमानों से दागा जाता है। अब तक इसकी आपूर्ति विदेशी कंपनियों से होती रही है, लेकिन नौसेना चाहती है कि इसका पूरा उत्पादन भारत में ही हो। इससे न केवल सैन्य जरूरतें समय पर पूरी होंगी बल्कि आत्मनिर्भर भारत अभियान को भी मजबूती मिलेगी।

Indian Navy 80mm Aero Rocket: क्या है 80 एमएम एयरो रॉकेट?

80 एमएम एयरो रॉकेट एक बिना गाइडेंस वाला एयर-टू-ग्राउंड रॉकेट है। इसका मतलब है कि इसे लक्ष्य की दिशा में दागा जाता है और यह अपने रफ्तार और बैलिस्टिक रूट के आधार पर टारगेट तक पहुंचता है। यह कोई गाइडेड मिसाइल नहीं है, लेकिन युद्ध के मैदान में इसकी उपयोगिता बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।

भारतीय नौसेना इस रॉकेट का इस्तेमाल जमीन पर मौजूद दुश्मन के ठिकानों, सैन्य वाहनों, रडार स्टेशनों, वेपंस सिस्टम्स और सैनिकों के खिलाफ करती है। इसकी खासियत यह है कि यह आर्मर्ड और सामान्य दोनों तरह के टारगेट्स को नुकसान पहुंचाने में सक्षम है।

दुश्मन के टैंक और रडार पर कर सकता है हमला

इस रॉकेट में होलो-चार्ज फ्रैगमेंटेशन वॉरहेड लगा होता है। सरल शब्दों में कहें तो यह दो तरह से हमला करता है। पहला, यह टैंक या आर्मर्ड व्हीकल के कवच को भेद सकता है। दूसरा, विस्फोट के बाद इसकी धातु के टुकड़े बड़े इलाके में फैलकर आसपास के टारगेट्स को नुकसान पहुंचाते हैं।

गोवा स्थित नौसेना के नेवल आर्मामेंट इंस्पेक्टरेट की तरफ से जारी ईओआई डॉक्यूमेंट के मुताबिक यह रॉकेट टैंक, आर्मर्ड पर्सनल कैरियर, रडार इंस्टॉलेशन, लॉन्चर, पार्क किए गए विमान और दुश्मन के सैनिकों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है। यही कारण है कि इसे नौसेना के लड़ाकू विमानों के लिए एक मल्टीपर्पज हथियार माना जाता है। (Indian Navy 80mm Aero Rocket)

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Indian Navy 80mm Aero Rocket
PM Modi at INS Vikrant Deck. Image Source: PIB/Indian Navy

मिग-29के की स्ट्राइक क्षमता का अहम हिस्सा

भारतीय नौसेना के एयरक्राफ्ट कैरियर्स पर तैनात मिग-29के लड़ाकू विमान समुद्र और तटीय इलाकों में हमले की क्षमता रखते हैं। 80 एमएम एयरो रॉकेट इन्हीं विमानों से बी8एम-1 लॉन्चर के जरिए दागा जाता है।

किसी भी युद्ध की स्थिति में लड़ाकू विमान को कम समय में अधिक संख्या में टारगेट नष्ट करने होते हैं। ऐसे में इस तरह के रॉकेट सटीक और कम लागत वाले हथियार का बेहतरीन विकल्प हैं।

आकार छोटा लेकिन मारक क्षमता बड़ी

इस रॉकेट का कैलिबर 80 एमएम है और इसकी लंबाई करीब डेढ़ मीटर से अधिक है। इसका कुल वजन लगभग 11.3 किलोग्राम है, जबकि वॉरहेड का वजन 3.6 किलोग्राम है।

रॉकेट की अधिकतम रफ्तार लगभग 600 मीटर प्रति सेकंड तक पहुंच सकती है। इसकी प्रभावी मारक दूरी 1300 मीटर से लेकर 4000 मीटर तक है। यानी लड़ाकू विमान सुरक्षित दूरी से दुश्मन के टारगेट को हिट कर सकता है।

400 मिमी तक कवच भेदने की क्षमता

इस रॉकेट की सबसे बड़ी ताकत इसकी होलो-चार्ज तकनीक है। डॉक्यूमेंट के अनुसार यह आदर्श स्थिति में 400 मिमी तक के कवच को भेद सकता है।

युद्ध के दौरान यह क्षमता महत्वपूर्ण होती है क्योंकि दुश्मन के आर्मर्ड व्हीकल और मिलिट्री प्लेटफॉर्म मजबूत सुरक्षा कवच से लैस होते हैं। ऐसे टारगेट्स को नष्ट करने के लिए विशेष प्रकार के हथियारों की आवश्यकता होती है। (Indian Navy 80mm Aero Rocket)

विस्फोट के बाद बनते हैं सैकड़ों घातक टुकड़े

रॉकेट के फ्रैगमेंटेशन जैकेट को इस तरह डिजाइन किया गया है कि विस्फोट के समय यह सैकड़ों धातु के टुकड़ों में टूट जाए। तकनीकी डॉक्यूमेंट के अनुसार इसमें कम से कम 400 फ्रैगमेंट बनते हैं, जिनमें प्रत्येक का वजन लगभग 3 ग्राम होता है।

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ये टुकड़े तेजी से से चारों ओर फैलते हैं और बड़े इलाके में नुकसान पहुंचाते हैं। इसी वजह से यह रॉकेट सैनिकों के समूह, हल्के सैन्य ठिकानों और खुले में मौजूद टारगेट्स के खिलाफ भी प्रभावी माना जाता है।

कैसे काम करता है यह रॉकेट?

जब पायलट रॉकेट दागने का आदेश देता है तो विमान से एक इलेक्ट्रिकल सिग्नल रॉकेट तक पहुंचता है। इससे रॉकेट मोटर एक्टिव हो जाती है और सॉलिड फ्यूल जलने लगता है। इसके बाद रॉकेट लॉन्चर से बाहर निकलता है और उसके पीछे लगे फिन खुल जाते हैं, जो उड़ान को स्टेबल बनाए रखते हैं।

उड़ान के लगभग एक से डेढ़ सेकंड बाद इसका फ्यूज एक्टिव हो जाता है। टारगेट से टकराने पर विस्फोट होता है और होलो-चार्ज तथा फ्रैगमेंटेशन प्रभाव पैदा होता है। (Indian Navy 80mm Aero Rocket)

कठिन मौसम में भी कर सकता है काम

नौसेना के लिए विकसित इस रॉकेट को बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करने के लिए बनाया गया है। डॉक्यूमेंट के अनुसार इसे माइनस 60 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 60 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में सुरक्षित रखा जा सकता है।

इसके अलावा यह उच्च आर्द्रता और समुद्री वातावरण को भी झेल सकता है। नौसेना के लिए यह जरूरी है क्योंकि समुद्र में तैनाती के दौरान हथियारों को नमक और नमी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

15 साल तक सुरक्षित रह सकता है स्टॉक

रॉकेट की एक और महत्वपूर्ण विशेषता इसकी लंबी शेल्फ लाइफ है। डॉक्यूमेंट के अनुसार इसे 15 वर्ष तक सुरक्षित रखा जा सकता है। जरूरत पड़ने पर इसकी उम्र बढ़ाने की व्यवस्था भी मौजूद है।

यह किसी भी सैन्य बल के लिए अहम है क्योंकि हथियारों का बड़ा भंडार लंबे समय तक स्टोर करके रखना पड़ता है। (Indian Navy 80mm Aero Rocket)

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नौसेना को कितने रॉकेट चाहिए?

ईओआई डॉक्यूमेंट में बताया गया है कि सफल प्रोटोटाइप विकास के बाद नौसेना शुरुआती चरण में 273 हाई एक्सप्लोसिव रॉकेट और 2400 प्रैक्टिस या इनर्ट रॉकेट खरीद सकती है।

प्रैक्टिस रॉकेट ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं, जबकि हाई एक्सप्लोसिव संस्करण एक्चुअल ऑपरेशन में इस्तेमाल होता है। (Indian Navy 80mm Aero Rocket)

स्वदेशीकरण पर है फोकस

नौसेना ने साफ कहा है कि वर्तमान में 80 एमएम एयरो रॉकेट के लिए कोई स्वदेशी सोर्स उपलब्ध नहीं है और मौजूदा स्टॉक विदेशी ओरिजनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर (OEM) से खरीदा गया था।

यही वजह है कि अब इस पूरे सिस्टम को देश में डेवलप करने की योजना बनाई गई है। डॉक्यूमेंट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि सभी सब-असेंबली स्वदेशी रूप से डेवलप की जानी चाहिए और किसी विदेशी कंपनी पर निर्भरता नहीं होनी चाहिए।

नौसेना ने केवल उन्हीं भारतीय कंपनियों को आवेदन करने के लिए कहा है जिनके पास सैन्य स्तर के रॉकेट बनाने का अनुभव हो। चयनित कंपनियों को डिजाइन, अनुसंधान, परीक्षण, प्रमाणन और उत्पादन की पूरी प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

इसके लिए एयरवर्थीनेस सर्टिफिकेशन, गुणवत्ता परीक्षण और कई तकनीकी मानकों को पूरा करना होगा। सफल विकास के बाद बड़े पैमाने पर उत्पादन का रास्ता खुलेगा। (Indian Navy 80mm Aero Rocket)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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