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Explained: क्या है DRDO का नया हथियार TARA? जो साधारण बम को बना देता है स्मार्ट, जगुआर से हुआ सफल ट्रायल

तारा यानी “टैक्टिकल एडवांस्ड रेंज ऑगमेंटेशन” एक ग्लाइड वेपन सिस्टम है। इसे खास तौर पर इस तरह बनाया गया है कि पुराने और साधारण बमों को भी आधुनिक “प्रिसीजन गाइडेड वेपन” में बदला जा सके...

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📍नई दिल्ली | 8 May, 2026, 11:16 AM

TARA Glide Weapon System: डीआरडीओ और भारतीय वायुसेना ने 7 मई को ओडिशा तट के पास “टैक्टिकल एडवांस्ड रेंज ऑगमेंटेशन” यानी तारा (TARA) वेपन सिस्टम का पहला सफल फ्लाइट ट्रायल किया। यह भारत का पहला स्वदेशी ग्लाइड वेपन सिस्टम है, जो साधारण बमों को लंबी दूरी तक मार करने वाले प्रिसिजन वेपन्स में बदल सकता है।

तारा एक मॉड्यूलर रेंज एक्सटेंशन किट है। आसान भाषा में समझें तो यह ऐसा सिस्टम है, जिसे सामान्य बमों पर लगाया जाता है और फिर वही बम “स्मार्ट प्रिसीजन वेपन” बन जाता है। इसकी मदद से वायुसेना दुश्मन के ठिकानों पर ज्यादा दूरी से और ज्यादा सटीक हमला कर सकती है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस सफल परीक्षण पर डीआरडीओ, वायुसेना और रक्षा उद्योग से जुड़ी कंपनियों को बधाई दी। उन्होंने इसे भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमता के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया।

क्या है TARA Glide Weapon System?

तारा यानी “टैक्टिकल एडवांस्ड रेंज ऑगमेंटेशन” एक ग्लाइड वेपन सिस्टम है। इसे खास तौर पर इस तरह बनाया गया है कि पुराने और साधारण बमों को भी आधुनिक “प्रिसीजन गाइडेड वेपन” में बदला जा सके।

आमतौर पर जब कोई साधारण बम जहाज से गिराया जाता है, तो वह सीधे नीचे गिरता है और उसकी दूरी सीमित होती है। लेकिन तारा किट लगने के बाद वही बम हवा में लंबी दूरी तक ग्लाइड कर सकता है और तय टारगेट तक पहुंच सकता है।

यही वजह है कि इसे “रेंज एक्सटेंशन किट” कहा जा रहा है। यह बम की मारक दूरी और सटीकता दोनों बढ़ा देता है।

डीआरडीओ ने किया डिजाइन

तारा सिस्टम को हैदराबाद स्थित रिसर्च सेंटर इमारत (आरसीआई) ने तैयार किया है। यह डीआरडीओ की प्रमुख लैब मानी जाती है, जो मिसाइल गाइडेंस, नेविगेशन और एवियोनिक्स सिस्टम पर काम करती है।

तारा (TARA) प्रोजेक्ट को सबसे पहले 2022 में गणतंत्र दिवस परेड की झांकी में दिखाया गया था। उसी समय पहली बार सार्वजनिक तौर पर इस नए स्वदेशी ग्लाइड वेपन सिस्टम की जानकारी सामने आई थी।

इसके बाद 2023 और 2024 के दौरान इसके ग्राउंड फिटमेंट ट्रायल किए गए। इन परीक्षणों में तारा सिस्टम को जगुआर और मिग-29के जैसे लड़ाकू विमानों पर लगाकर जांचा गया कि यह विमान के साथ सही तरीके से फिट और काम कर रहा है या नहीं।

इस परियोजना में सिर्फ आरसीआई ही नहीं, बल्कि डीआरडीओ की दूसरी लैब्स जैसे डीआरडीएल और एएसएल ने भी अहम भूमिका निभाई है। इसके अलावा कई निजी भारतीय कंपनियां भी इससे जुड़ी रहीं। अपोलो माइक्रो सिस्टम्स जैसी कंपनियों ने इसमें इस्तेमाल होने वाले एवियोनिक्स और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम तैयार करने में सहयोग दिया।

साधारण बम कैसे बनता है स्मार्ट हथियार?

तारा का सबसे अहम हिस्सा उसका “गाइडेंस और ग्लाइड सिस्टम” है। तारा के डिजाइन में खास एरोडायनामिक सिस्टम लगाए गए हैं। इसके पीछे कंट्रोल फिन्स और विंग्स लगे होते हैं, जो इसे हवा में ज्यादा स्थिर और लंबी दूरी तक ग्लाइड करने में मदद करते हैं। यह डिजाइन दुश्मन के रडार से बचने में भी मदद करता है।

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जब विमान से बम छोड़ा जाता है, तो ये विंग्स खुल जाते हैं और बम हवा में आगे की तरफ ग्लाइड करने लगता है। इसके बाद गाइडेंस सिस्टम उसे लक्ष्य तक पहुंचाता है। इस पूरी प्रक्रिया में इंजन का इस्तेमाल नहीं होता। यही वजह है कि इसे “ग्लाइड बम” कहा जाता है।

वहीं, जब तारा अपने टारगेट के करीब पहुंचता है, तो वह उड़ान के अंतिम चरण में दिशा बदलने और खुद को एडजस्ट करने की क्षमता रखता है। इससे लक्ष्य पर ज्यादा सटीक हमला करना संभव होता है।

कितनी दूरी तक कर सकता है हमला?

तारा की आधिकारिक रेंज सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि यह लगभग 150 से 180 किलोमीटर तक मार कर सकता है। अगर तारा को 5 किलोमीटर की ऊंचाई से और तेज रफ्तार में लॉन्च किया जाए, तो यह काफी दूर तक ग्लाइड करते हुए टारगेट तक पहुंच सकता है।

इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि भारतीय लड़ाकू विमान दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम की सीमा से बाहर रहते हुए हमला कर सकते हैं। इसे लगाने के बाद विमान को दुश्मन के बेहद करीब जाने की जरूरत नहीं होगी। वह दूर से ही बम छोड़ सकेगा और तारा सिस्टम उसे टारगेट तक पहुंचा देगा।

अलग-अलग वर्जन में तैयार

तारा को अलग-अलग वजन वाले बमों के लिए तैयार किया गया है। इसमें 250 किलोग्राम, 450 किलोग्राम और 500 किलोग्राम वाले वर्जन शामिल हैं। यानी जरूरत के हिसाब से अलग-अलग मिशन में इसका इस्तेमाल किया जा सकेगा। छोटे लक्ष्य के लिए हल्का वर्जन इस्तेमाल होगा, जबकि मजबूत बंकर या बड़े सैन्य ठिकानों के लिए भारी वर्जन काम आएंगे।

दिन और रात दोनों समय करेगा काम

तारा में एडवांस गाइडेंस सिस्टम लगाया गया है। इसमें जीपीएस, इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इंफ्रारेड तकनीक शामिल है। इस वजह से यह दिन और रात दोनों समय काम कर सकता है। खराब मौसम में भी इसकी प्रिसीजन क्षमता बनी रहती है।

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सूत्रों के मुताबिक यह सिस्टम लक्ष्य को बहुत कम गलती के साथ हिट कर सकता है। इसकी सर्कुलर एरर प्रोबेबल (सीईपी) 5 मीटर से कम से कम है।

किन विमानों से किया जा सकेगा इस्तेमाल?

तारा को भारतीय वायुसेना के कई लड़ाकू विमानों के साथ इस्तेमाल किया जा सकता है। इनमें जगुआर, सुखोई-30 एमकेआई, मिराज-2000 और एलसीए तेजस जैसे विमान शामिल हैं। 2025 में इसके कुछ परीक्षण जगुआर विमान पर किए जा चुके थे। अब सफल फ्लाइट ट्रायल के बाद इसे ऑपरेशनल इस्तेमाल के लिए आगे बढ़ाया जा रहा है।

आज किस जहाज से हुआ ट्रायल

7 मई को हुआ तारा (TARA) वेपन सिस्टम का ट्रायल भारतीय वायुसेना के जगुआर लड़ाकू विमान से किया गया। TARA 500 सिस्टम जगुआर विमान के विंग के नीचे लगे पाइलॉन पर फिट किया गया है।

इससे पहले 2025 में इसके “कैप्टिव कैरी ट्रायल” भी जगुआर पर किए गए थे। इन ट्रायल्स में हथियार को विमान के साथ लगाकर उड़ाया गया था, लेकिन उसे छोड़ा नहीं गया था। इसका मकसद यह जांचना था कि विमान और हथियार का इंटीग्रेशन सही तरीके से काम कर रहा है या नहीं।

जगुआर को भारतीय वायुसेना में “शमशेर” के नाम से भी जाना जाता है। यह विमान लंबे समय से डीप स्ट्राइक और ग्राउंड अटैक मिशनों के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। इसी वजह से तारा जैसे प्रिसीजन ग्लाइड वेपन के परीक्षण के लिए इसे उपयुक्त प्लेटफॉर्म माना गया।

क्यों अहम माना जा रहा है यह सिस्टम?

आधुनिक युद्ध में दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम लगातार मजबूत हो रहे हैं। ऐसे में लड़ाकू विमानों के लिए सीधे दुश्मन के ऊपर जाकर हमला करना ज्यादा जोखिम भरा हो गया है।

इसी वजह से दुनिया की बड़ी वायु सेनाएं अब “स्टैंड-ऑफ वेपन” पर जोर दे रही हैं। यानी ऐसे हथियार जो लंबी दूरी से दागे जा सकें।

तारा इसी श्रेणी का सिस्टम माना जा रहा है। इससे भारतीय वायुसेना की “डीप स्ट्राइक” क्षमता मजबूत होगी। यानी दुश्मन के अंदर मौजूद ठिकानों पर भी सुरक्षित दूरी से हमला किया जा सकेगा।

कम लागत में बड़ा फायदा

तारा की एक बड़ी खासियत इसकी कम लागत भी मानी जा रही है। आमतौर पर लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलें काफी महंगी होती हैं। लेकिन तारा पुराने बमों को ही स्मार्ट हथियार में बदल देता है। इससे लागत कम हो जाती है। और वायुसेना को पूरी तरह नए हथियार खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी। सूत्रों का कहना है कि यह सिस्टम कम लागत में ज्यादा असर देने की रणनीति का हिस्सा है।

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कई देशों के पास है यह सिस्टम

दुनिया के कई देशों के पास ऐसे ग्लाइड बम सिस्टम पहले से मौजूद हैं। तारा (TARA) को आसान भाषा में समझें तो यह अमेरिका के जेडीएएम और इजरायल के स्पाइस-1000 जैसे स्मार्ट ग्लाइड बम सिस्टम की तरह है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे पूरी तरह भारत में विकसित किया गया है।

डीआरडीओ के दूसरे ग्लाइड बम “गौरव” की तुलना में तारा आकार में छोटा और ज्यादा टैक्टिकल सिस्टम माना जा रहा है। वहीं एसएएडब्ल्यू यानी स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड वेपन जहां खास तौर पर एयरबेस और रनवे को निशाना बनाने के लिए तैयार किया गया था, वहीं तारा का मुख्य फोकस साधारण बमों की मारक दूरी बढ़ाना और उन्हें ज्यादा सटीक बनाना है।

इसका डिजाइन मॉड्यूलर रखा गया है। यानी जरूरत के हिसाब से इसमें नए सेंसर, गाइडेंस सिस्टम या दूसरे अपग्रेड आसानी से जोड़े जा सकते हैं।

आधुनिक युद्ध में इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर यानी दुश्मन द्वारा जीपीएस और गाइडेंस सिस्टम को जाम करने की कोशिश बड़ी समस्या बन चुकी है। ऐसे में हथियार की प्रिसिजन क्षमता बनाए रखना जरूरी होता है। इसी वजह से तारा में डुअल और ट्राई-मोड गाइडेंस जैसी तकनीकों पर काम किया जा रहा है। वहीं भविष्य में इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित टारगेटिंग और ज्यादा एडवांस सेंसर जैसी तकनीकें भी जोड़ी जा सकती हैं।

रक्षा मंत्रालय ने तारा सिस्टम के लिए भारतीय उद्योगों के साथ मिलकर उत्पादन प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। कई निजी कंपनियां और रक्षा क्षेत्र की भारतीय फर्म इस प्रोजेक्ट में शामिल हैं। इससे देश में रक्षा उत्पादन और तकनीकी क्षमता दोनों बढ़ेंगी।

TARA Explained: India’s Indigenous Glide Weapon System Successfully Tested From Jaguar Fighter Jet.

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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