📍जयपुर | 8 May, 2026, 12:55 PM
MUM-T Doctrine India: भारतीय सेना अब जंग के पुराने तरीकों से आगे बढ़कर नई तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सिस्टम पर तेजी से काम कर रही है। जयपुर में आयोजित जॉइंट कमांडर्स कॉन्फ्रेंस 2026 के दौरान चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ यानी सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने कई अहम मिलिटरी डॉक्यूमेंट्स जारी किए। इनमें सबसे अहम डॉक्ट्रिन “जॉइंट प्राइमर ऑन मैनड एंड अनमैनड टीमिंग” (MUM-T) भी शामिल है। सेना के अधिकारियों का कहना है कि यह सिर्फ एक नई गाइडलाइन नहीं, बल्कि भारत की पूरी युद्ध रणनीति में बड़ा बदलाव है।
जयपुर में हुई इस कॉन्फ्रेंस में जनरल अनिल चौहान ने “मिलिट्री साइबर स्पेस पॉलिसी” और “बाइलिंगुअल जॉइंट स्टाफ सर्विसेज ड्यूटी पैम्फलेट” भी जारी किया। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में युद्ध केवल टैंक, लड़ाकू विमान और सैनिकों के दम पर नहीं लड़े जाएंगे। बल्कि अब ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सिस्टम और डेटा आधारित नेटवर्क भी युद्ध का अहम हिस्सा बन चुके हैं।
सीडीएस ने साफ कहा कि यह बदलाव केवल प्रक्रियाओं का अपडेट नहीं है, बल्कि भारत की “वारफाइटिंग फिलॉसफी” यानी युद्ध लड़ने की सोच में बड़ा परिवर्तन है।
क्या है MUM-T Doctrine India
MUM-T का पूरा नाम “मैनड एंड अनमैनड टीमिंग” है। इसका मतलब है इंसानों द्वारा चलाए जाने वाले मिलिट्री प्लेटफॉर्म और बिना पायलट वाले सिस्टम का एक साथ मिलकर काम करना। MUM-T फोर्स मल्टीप्लायर की तरह काम करेगा।
इसमें लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, टैंक या दूसरे सैन्य प्लेटफॉर्म के साथ ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सिस्टम जोड़े जाएंगे। युद्ध के दौरान इंसान और मशीन दोनों मिलकर ऑपरेशन को अंजाम देंगे।
MUM-T सिस्टम के तहत एक लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर या दूसरा मैनड प्लेटफॉर्म एक साथ कई ड्रोन और अनमैन्ड सिस्टम को कंट्रोल कर सकेगा। यानी एक पायलट अपने साथ उड़ रहे 4 से 10 या उससे ज्यादा ड्रोन को ऑपरेशन के दौरान निर्देश दे पाएगा। इससे सेना की ताकत कई गुना बढ़ जाएगी।
उदाहरण के तौर पर अगर कोई लड़ाकू विमान दुश्मन के इलाके की तरफ जा रहा है, तो उसके साथ कई ड्रोन भी उड़ सकते हैं। ये ड्रोन पहले दुश्मन की लोकेशन, एयर डिफेंस सिस्टम और सैन्य गतिविधियों की जानकारी जुटाएंगे। कुछ ड्रोन दुश्मन के रडार को कन्फ्यूज्ड करेंगे, जबकि कुछ सीधे हमला भी कर सकते हैं। इस दौरान असली फाइटर जेट सुरक्षित दूरी पर रहेगा।
सूत्रों का कहना है कि इससे पायलट और सैनिकों का जोखिम काफी कम हो जाएगा। हाई थ्रेट एरिया यानी जहां दुश्मन का मजबूत एयर डिफेंस मौजूद हो, वहां सबसे पहले अनमैन्ड सिस्टम और ड्रोन भेजे जाएंगे।
अंतिम फैसला इंसान ही लेगा
सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने कहा कि MUM-T प्राइमर मानव दिमाग की समझ और मशीन की सटीकता को एक साथ जोड़ने का स्ट्रक्चर तैयार कर रहा है। उन्होंने कहा कि अब भारत ऐसे “सॉवरेन एआई ड्रिवन सिस्टम” पर काम कर रहा है, जो पूरी तरह भारतीय कंट्रोल में होंगे और युद्ध के दौरान मैनड प्लेटफॉर्म के साथ मिलकर काम करेंगे।
सेना के अधिकारियों के मुताबिक आधुनिक युद्ध में कुछ सेकंड की देरी भी भारी पड़ सकती है। ऐसे में एआई आधारित सिस्टम तेजी से डेटा प्रोसेस कर कमांडरों की मदद करेंगे। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से युद्ध के दौरान फैसले लेने की रफ्तार भी तेज होगी। सेना इसे OODA लूप कहती है, यानी स्थिति को देखना, समझना, फैसला लेना और तुरंत कार्रवाई करना। एआई सिस्टम तेजी से डेटा एनालिसिस कर कमांडरों को तुरंत जानकारी देंगे, जिससे सटीक और तेज कार्रवाई संभव होगी।
ड्रोन और लॉयल विंगमैन सिस्टम पर बढ़ा फोकस
भारतीय सेना पहले से ही कई अनमैन्ड सिस्टम पर काम कर रही है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड का “कॉम्बैट एयर टीमिंग सिस्टम” (कैट्स वॉरियर) भी शामिल है। जिसमें लॉयल विंगमैन ड्रोन जैसे CATS Warrior, Hunter और Alfa-S जैसे अनमैन्ड सिस्टम तेजस या दूसरे लड़ाकू विमानों के साथ के साथ इंटीग्रेट होंगे। ये ड्रोन मुख्य विमान के साथ रहकर कई तरह के काम करेंगे। इनमें निगरानी, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, दुश्मन के रडार की पहचान और हमला शामिल हो सकता है। “लॉयल विंगमैन” कॉन्सेप्ट में ड्रोन लड़ाकू विमान के साथ उड़ते हैं और उसके लिए सुरक्षा, निगरानी और हमला जैसे काम करते हैं।
सेना का मानना है कि आधुनिक युद्ध में अब केवल महंगे लड़ाकू विमान और बड़े हथियारों पर निर्भरता नहीं रह गई है। भविष्य के युद्धों में स्वार्म ड्रोन यानी बड़ी संख्या में एक साथ उड़ने वाले ड्रोन भी बड़ी भूमिका निभाएंगे। स्वार्म अटैक यानी एक साथ बड़ी संख्या में ड्रोन भेजकर दुश्मन के सिस्टम पर दबाव बनाया जा सकता है।
भारतीय सेना भी टैक्टिकल यूएवी, लॉइटरिंग म्यूनिशन और अनमैन्ड ग्राउंड व्हीकल्स को इन्फैंट्री और आर्मर्ड यूनिट्स के साथ जोड़ने पर काम कर रही है। यानी भविष्य में सैनिकों और टैंकों के साथ रोबोटिक सिस्टम और ड्रोन भी ऑपरेशन का हिस्सा होंगे।
वहीं, भारतीय नौसेना भी इस दिशा में आगे बढ़ रही है। नौसेना जहाजों के साथ यूएवी और अनमैन्ड सरफेस व्हीकल्स यानी बिना चालक वाली बोट्स को जोड़ने की तैयारी कर रही है, ताकि समुद्र में निगरानी और हमले की क्षमता बढ़ाई जा सके।
डीआरडीओ भी कई बड़े प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। इनमें तपस ड्रोन, घातक यूसीएवी और अस्त्र आधारित कामिकाजे ड्रोन जैसे सिस्टम शामिल हैं। इनका इस्तेमाल निगरानी, दुश्मन की पहचान और सटीक हमलों के लिए किया जाएगा।
इसके साथ ही भारत सुरक्षित और तेज डाटा लिंक सिस्टम पर भी काम कर रहा है। बीईएल और एल एंड टी जैसी भारतीय कंपनियों के साथ मिलकर हाई-बैंडविड्थ डाटा लिंक तैयार किए जा रहे हैं। इनके जरिए रियल टाइम वीडियो फीड, सेंसर डेटा और ड्रोन कंट्रोल संभव होगा। शुरुआत में इन्हें सुखोई-30 एमकेआई, तेजस, एलसीएच और एएमसीए जैसे प्लेटफॉर्म्स के साथ जोड़ा जाएगा।
MUM-T प्राइमर इन सभी को एक मिलिट्री स्ट्रक्चर देने का काम करेगा। इसके जरिए कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम, ट्रेनिंग, लॉजिस्टिक्स, अलग-अलग सेनाओं के बीच तालमेल और ऑपरेशन के नियमों को एक समान बनाया जाएगा।
सूत्रों का कहना है कि MUM-T प्राइमर के जरिए ट्रेनिंग, सैन्य अभ्यास, हथियार खरीद और रिसर्च से जुड़ी गाइडलाइंस भी तय की जाएंगी। इसके तहत भविष्य में जॉइंट MUM-T वॉर गेम्स और एक्सरसाइज भी कराए जाएंगे, जहां सैनिक और ड्रोन मिलकर ऑपरेशन का अभ्यास करेंगे।
मल्टी डोमेन ऑपरेशन का है हिस्सा
यह पूरी व्यवस्था मल्टी डोमेन ऑपरेशन (MDO) का हिस्सा है, जिसे 2025 में जारी किया गया था। इसका मकसद यह है कि जमीन, हवा, समुद्र, साइबर और स्पेस जैसे सभी क्षेत्रों में एक साथ मिलकर युद्ध लड़ा जा सके। सेना के अधिकारियों के मुताबिक 2026 को “नेटवर्किंग और डेटा सेंट्रिक वॉरफेयर” का साल माना जा रहा है, जहां सबसे बड़ी ताकत केवल हथियार नहीं बल्कि सही समय पर सही डेटा होगा।
सीडीएस जनरल अनिल चौहान का मानना है कि MUM-T भारत को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोनॉमस सिस्टम और स्वार्म ड्रोन जैसी नई तकनीकों में आगे ले जाएगा। खास तौर पर चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों को देखते हुए भारत तेजी से ऐसे सिस्टम डेवलप कर रहा है, जो युद्ध के दौरान तेज और सटीक कार्रवाई कर सकें।
ऑपरेशन सिंदूर से मिले सबक
जयपुर में जॉइंट कमांडर्स कॉन्फ्रेंस ऐसे समय में हो रही है, जब ऑपरेशन सिंदूर को एक साल पूरा हुआ है। इस ऑपरेशन के दौरान भारतीय सेना ने मल्टी डोमेन ऑपरेशन का इस्तेमाल किया था। सेना के अधिकारियों का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर से मिले अनुभवों को भी इस प्राइमर में शामिल किया गया है।
सेना के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया कि आधुनिक युद्ध केवल जमीन, हवा और समुद्र तक सीमित नहीं है। अब साइबर स्पेस, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और डेटा नेटवर्क भी युद्ध का हिस्सा बन चुके हैं।
क्या है मिलिट्री साइबर स्पेस पॉलिसी
कॉन्फ्रेंस के दौरान जारी की गई “मिलिट्री साइबर स्पेस पॉलिसी” भी काफी अहम मानी जा रही है। इसके जरिए सेना अपने साइबर नेटवर्क और सैन्य डेटा को सुरक्षित रखने की रणनीति पर काम करेगी।
आधुनिक युद्ध में साइबर अटैक बड़ा खतरा बन चुके हैं। दुश्मन किसी देश के कम्युनिकेशन सिस्टम, रडार नेटवर्क, सैटेलाइट लिंक और एयर डिफेंस नेटवर्क को निशाना बना सकता है।
इसी वजह से भारतीय सेना अब साइबर सुरक्षा को युद्ध का अहम हिस्सा मान रही है।
अधिकारियों के मुताबिक इस पॉलिसी के तहत आर्मी, नेवी और एयरफोर्स की साइबर यूनिट्स मिलकर काम करेंगी। इसमें डीआरडीओ, एनटीआरओ और दूसरी राष्ट्रीय एजेंसियों के साथ भी तालमेल बढ़ाया जाएगा।
बाइलिंगुअल जॉइंट स्टाफ पैम्फलेट क्यों अहम
कॉन्फ्रेंस में जारी किया गया “बाइलिंगुअल जॉइंट स्टाफ सर्विसेज ड्यूटी पैम्फलेट” को हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में तैयार किया गया है ताकि तीनों सेनाओं के अधिकारी एक जैसी प्रक्रिया और शब्दावली का इस्तेमाल कर सकें। अधिकारियों का मानना है कि इससे आपसी तालमेल बेहतर होगा।
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।


