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भारतीय नौसेना बना रही डिजिटल कमांड प्लेटफॉर्म, AI से ट्रैक होंगे मिसाइल और टॉरपीडो

अगर किसी मिसाइल सिस्टम में बार-बार खराबी आ रही हो या किसी गोला-बारूद की स्टोरेज लाइफ खत्म होने वाली हो, तो सिस्टम पहले से अलर्ट दे सकेगा। इससे नौसेना का प्रेडिक्टिव मेंटेनेंस और इन्वेंट्री मैनेजमेंट बेहतर होगा...

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📍नई दिल्ली | 25 May, 2026, 2:06 PM

Indian Navy INAMS 2.0: भारतीय नौसेना अपने हथियारों, गोला-बारूद और विस्फोटक सामग्री के मैनेजमेंट को पूरी तरह डिजिटल और आधुनिक बनाने की तैयारी कर रही है। नौसेना ने इंडियन नेवल आर्मामेंट मैनेजमेंट सिस्टम वर्जन 2.0 (INAMS Ver 2.0) प्रोजेक्ट शुरू किया है। यह एक एडवांस डिजिटल प्लेटफॉर्म होगा, जिसकी मदद से नौसेना अपने हथियारों, मिसाइलों, माइंस, टॉरपीडो, गोला-बारूद, स्टोरेज, रिपेयर और सप्लाई सिस्टम को इंटीग्रेटेड तरीके से मैनेज कर सकेगी।

यह सिस्टम भारतीय नौसेना के डायरेक्टरेट जनरल ऑफ नेवल आर्मामेंट (DGoNA) के तहत काम करेगा। इसका उद्देश्य नेवल आर्मामेंट डिपो और नौसेना मुख्यालय में चल रहे कई अलग-अलग प्रक्रियाओं को एक डिजिटल नेटवर्क में जोड़ना है।

भारतीय नौसेना के अधिकारियों के मुताबिक INAMS Ver 2.0 पुराने INAMS-I सिस्टम का अपग्रेडेड वर्जन है। इसे ज्यादा सुरक्षित, तेज और डेटा आधारित निर्णय लेने वाला प्लेटफॉर्म बनाया जा रहा है।

Indian Navy INAMS 2.0: नौसेना के हथियार प्रबंधन का डिजिटल नेटवर्क

भारतीय नौसेना का नेवल आर्मामेंट ऑर्गनाइजेशन नौसेना और भारतीय तटरक्षक बल के लिए हथियार, गोला-बारूद और विस्फोटक सामग्री की खरीद, स्टोरेज, रिपेयर और सप्लाई का काम संभालता है।

डायरेक्टरेट जनरल ऑफ नेवल आर्मामेंट अलग-अलग रक्षा संस्थानों, डीआरडीओ लैब्स, रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों और नौसेना की दूसरी शाखाओं के साथ मिलकर काम करता है। इसमें मिसाइल, टॉरपीडो, माइन, छोटे हथियार और दूसरे विस्फोटक उपकरण शामिल होते हैं।

अब तक इन प्रक्रियाओं का बड़ा हिस्सा अलग-अलग सिस्टम और मैनुअल एंट्री पर निर्भर था। नए INAMS-II सिस्टम के जरिए इन्हें पूरी तरह वेब आधारित और इंटीग्रेटेड प्लेटफॉर्म में बदला जाएगा।

कई बड़े काम संभालेगा नया सिस्टम

रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन के मुताबिक INAMS 2.0 केवल स्टोर मैनेजमेंट सिस्टम नहीं होगा। बल्कि यह नौसेना के वेपन मैनेजमेंट से जुड़े लगभग हर हिस्से को कवर करेगा।

इसमें हथियारों की सप्लाई, गोला-बारूद की तैयारी, रिपेयर और मेंटेनेंस, खरीद प्रक्रिया, ट्रांसपोर्ट, फायर सेफ्टी, ट्रेनिंग, ऑडिट और प्रोडक्शन तक के मॉड्यूल शामिल होंगे।

नौसेना के अलग-अलग आर्मामेंट डिपो में मौजूद डिवीजनों को भी इसी सिस्टम से जोड़ा जाएगा। इनमें गाइडेड वेपंस डिवीजन, एम्युनिशन वर्कशॉप, मटेरियल मैनेजमेंट, ट्रांसपोर्ट, एचआरडी एंड ट्रेनिंग, सिक्योरिटी और मेडिकल जैसे विभाग शामिल हैं।

मिसाइल और टॉरपीडो तक का रिकॉर्ड रखेगा

नए सिस्टम के जरिए नौसेना अपने मिसाइल, टॉरपीडो, डिकॉय, माइन और दूसरे हथियारों का पूरा डिजिटल रिकॉर्ड रख सकेगी।

किस हथियार की कितनी संख्या मौजूद है, कौन सा सिस्टम रिपेयर में है, कौन सा उपकरण जहाज पर भेजा गया है और किस गोला-बारूद की लाइफ एक्सटेंशन करनी है, यह सारी जानकारी रियल टाइम में उपलब्ध रहेगी।

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सिस्टम बार कोड और क्यूआर कोड आधारित ट्रैकिंग भी सपोर्ट करेगा। इससे स्टोर मूवमेंट और सप्लाई की निगरानी आसान होगी। (Indian Navy INAMS 2.0)

AI और मशीन लर्निंग भी होगी शामिल

INAMS 2.0 की सबसे बड़ी खासियत इसमें शामिल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग आधारित एनालिटिक्स है।

आरएफआई के मुताबिक सिस्टम को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग रेडी बनाया जा रहा है। भविष्य में यह सिस्टम डेटा पैटर्न पहचानने, अनुमान लगाने और फैसले लेने में मदद कर सकेगा।

उदाहरण के तौर पर अगर किसी मिसाइल सिस्टम में बार-बार खराबी आ रही हो या किसी गोला-बारूद की स्टोरेज लाइफ खत्म होने वाली हो, तो सिस्टम पहले से अलर्ट दे सकेगा। इससे नौसेना का प्रेडिक्टिव मेंटेनेंस और इन्वेंट्री मैनेजमेंट बेहतर होगा। (Indian Navy INAMS 2.0)

साइबर सुरक्षा पर खास फोकस

क्योंकि यह सिस्टम संवेदनशील मिलिट्री डेटा संभालेगा, इसलिए इसमें साइबर सिक्योरिटी को सबसे बड़ी प्राथमिकता दी गई है। सिस्टम मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन, एईएस एन्क्रिप्शन, ऑडिट ट्रेल, रोल बेस्ड एक्सेस कंट्रोल और वल्नरेबिलिटी असेसमेंट जैसी सुरक्षा तकनीकों से लैस होगा।

हर साल वल्नरेबिलिटी असेसमेंट एंड पेनिट्रेशन टेस्टिंग (VAPT) भी अनिवार्य होगी। नौसेना के साइबर ग्रुप की मंजूरी के बिना सिस्टम में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया जा सकेगा। एआई सिस्टम को डेटा पॉयजनिंग, सिस्टम मैनिपुलेशन और प्राइवेसी ब्रीच जैसे खतरों से बचाने के लिए भी अलग सुरक्षा प्रोटोकॉल बनाए जाएंगे।

भारतीय नौसेना का अपना नेटवर्क बनेगा रीढ़

INAMS-II सॉफ्टवेयर को इस तरह बनाया जा रहा है कि इसे पूरे भारत में एक समय पर करीब 1200 लोग इस्तेमाल कर सकें। यह सिस्टम भारतीय नौसेना के सेंट्रल डेटा सेंटर (CDC), रीजनल डेटा सेंटर (RDC) और नेवल हेडक्वार्टर में लगाया जाएगा, ताकि अलग-अलग जगहों से जुड़े अधिकारी और यूनिट एक ही नेटवर्क पर काम कर सकें।

INAMS-II भारतीय नौसेना के इंडियन नेवी सेंट्रिक नेटवर्क (NCN) पर चलेगा। यही नेटवर्क नौसेना के डेटा सेंटर, कमांड मुख्यालय और अलग-अलग डिपो को जोड़ता है। रडार, लॉजिस्टिक्स सिस्टम और दूसरे ऑपरेशनल प्लेटफॉर्म से मिलने वाली जानकारी भी इसी नेटवर्क के जरिए शेयर की जाएगी।

अगर किसी जगह इंटरनेट या नेटवर्क कनेक्शन सीमित हो, तब भी सिस्टम ऑफलाइन मोड में काम कर सकेगा। बाद में नेटवर्क मिलने पर डेटा सिंक्रोनाइज हो जाएगा। (Indian Navy INAMS 2.0)

डिजिटल पेन और टैबलेट से होगी एंट्री

सिस्टम के लिए नौसेना नए हार्डवेयर भी खरीदेगी। इसमें डेस्कटॉप कंप्यूटर, डिजिटल पेन, टैबलेट, क्यूआर कोड स्कैनर, प्रिंटर और नेटवर्क उपकरण शामिल होंगे। फील्ड यूनिट और डिपो में मौजूद कर्मचारी सीधे टैबलेट या डिजिटल डिवाइस से डेटा दर्ज कर सकेंगे।

इससे मैनुअल पेपरवर्क कम होगा और डेटा एंट्री में होने वाली गलतियां घटेंगी। साथ ही सिस्टम अलग-अलग ऑपरेटिंग सिस्टम जैसे विंडोज, लिनक्स और एंड्रॉयड को भी सपोर्ट करेगा। (Indian Navy INAMS 2.0)

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सोर्स कोड भारतीय नौसेना के पास

इस सॉफ्टवेयर का पूरा सोर्स कोड हर चरण के बाद भारतीय नौसेना को दिया जाएगा। फाइनल वर्जन के साथ पूरी डॉक्यूमेंटेशन भी दी जाएगी, जिसमें हर मॉड्यूल और फीचर के काम करने का तरीका विस्तार से समझाया जाएगा।
अगर भविष्य में सॉफ्टवेयर में कोई बदलाव या नया फीचर जोड़ना हो, तो उसके निर्देश भी डॉक्यूमेंट में साफ तौर पर दिए जाएंगे, ताकि सिस्टम को आसानी से अपडेट किया जा सके।

नौसेना ने साफ किया है कि इस सॉफ्टवेयर का पूरा मालिकाना हक भारतीय नौसेना के पास रहेगा। यह प्रोजेक्ट खास तौर पर भारतीय नौसेना के लिए बनाया जा रहा है। इसलिए इसका सोर्स कोड, डिजाइन और दूसरी तकनीकी जानकारी किसी दूसरी संस्था या प्रोजेक्ट में बिना नौसेना की अनुमति के इस्तेमाल नहीं की जा सकेगी।

कई चरणों में लागू होगा प्रोजेक्ट

INAMS 2.0 को कई चरणों में लागू किया जाएगा। पहले पुराने वर्जन की स्टडी की जाएगी। इसके बाद डिजाइन, डेवलपमेंट और टेस्टिंग होगी। फिर डेटा माइग्रेशन, यूजर ट्रेनिंग और सिस्टम इंटीग्रेशन का काम होगा।

नौसेना के मुताबिक इंटरमीडिएट गो-लाइव और फाइनल गो-लाइव जैसे चरण भी रखे गए हैं। फाइनल लॉन्च के बाद तीन साल तक ऑपरेशन और मेंटेनेंस सपोर्ट भी दिया जाएगा।

मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भरता पर जोर

नौसेना ने इस सिस्टम के इंडिजेनाइजेशन पर भी जोर दिया है। सिस्टम में अलग मॉड्यूल होंगे, जो यह ट्रैक करेंगे कि कौन सा उपकरण या स्पेयर पार्ट स्वदेशी है और कौन सा विदेशी। भारतीय नौसेना का उद्देश्य रक्षा सप्लाई चेन में घरेलू उद्योग की भागीदारी बढ़ाना है।

इसी वजह से इस प्रोजेक्ट में सोर्स कोड और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स पूरी तरह भारतीय नौसेना के पास रहेंगे। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इससे विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम होगी और भविष्य में सिस्टम को भारत में ही अपग्रेड किया जा सकेगा। (Indian Navy INAMS 2.0)

नेवल आर्मामेंट डिपो का काम होगा आसान

भारतीय नौसेना के नेवल आर्मामेंट डिपो देश के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद हैं। यही डिपो नौसेना के युद्धपोतों और तटरक्षक बल को हथियार और गोला-बारूद उपलब्ध कराते हैं। इन डिपो में स्टोरेज, ट्रांसपोर्ट, रिपेयर, टेस्टिंग और डिस्पोजल जैसे कई काम एक साथ चलते हैं।

INAMS-II आने के बाद हर डिपो का डेटा एक सेंट्रल सिस्टम से जुड़ जाएगा। अगर किसी जहाज को मिसाइल या गोला-बारूद की जरूरत होगी, तो उसकी जानकारी तुरंत नेटवर्क पर दिखाई देगी। इसी तरह ट्रांसपोर्ट, फायर सेफ्टी और मेंटेनेंस से जुड़ी गतिविधियां भी डिजिटल रूप से ट्रैक की जा सकेंगी।

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ऑडिट और रिकॉर्ड मैनेजमेंट भी होगा मजबूत

नए सिस्टम में ऑडिट मॉड्यूल भी शामिल होगा। इससे हथियारों और विस्फोटक सामग्री का पूरा रिकॉर्ड डिजिटल तरीके से सुरक्षित रहेगा। किस अधिकारी ने कब डेटा एक्सेस किया, किसने बदलाव किया और कौन सी फाइल डाउनलोड की गई, इसका रिकॉर्ड भी सिस्टम में सेव होगा।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक इससे जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ेगी। साथ ही सुरक्षा जांच और जांच एजेंसियों के लिए डेटा ट्रैक करना आसान होगा। (Indian Navy INAMS 2.0)

नेचुरल लैंग्वेज सर्च भी मिलेगा

INAMS 2.0 में नेचुरल लैंग्वेज सर्च फीचर भी होगा। इसका मतलब है कि यूजर साधारण भाषा में जानकारी खोज सकेंगे। उदाहरण के तौर पर अगर कोई अधिकारी किसी खास मिसाइल बैच या गोला-बारूद की स्थिति जानना चाहता है, तो वह सीधे सिस्टम में सर्च कर सकेगा।

सिस्टम स्ट्रक्चर्ड और अनस्ट्रक्चर्ड दोनों तरह के डेटा को संभाल सकेगा। इसमें इमेज, वीडियो और स्कैन डॉक्यूमेंट भी जोड़े जा सकेंगे। (Indian Navy INAMS 2.0)

डेटा सेंटर और बैकअप सिस्टम भी होंगे मजबूत

नौसेना ने डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने की बात भी कही है। सिस्टम के लिए सेंट्रल डेटा सेंटर और डिजास्टर रिकवरी सेंटर बनाए जाएंगे। अगर किसी वजह से मुख्य सर्वर बंद हो जाए, तो बैकअप सिस्टम तुरंत काम संभाल सकेगा।

लोड बैलेंसिंग, क्लस्टरिंग और हाई अवेलेबिलिटी जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा, ताकि सिस्टम लगातार चालू रहे। रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक यह प्रोजेक्ट भारतीय नौसेना के डिजिटल मॉडर्नाइजेशन का अहम हिस्सा माना जा रहा है।

नौसेना का मानना है कि हथियार, गोला-बारूद और लॉजिस्टिक्स से जुड़ा डेटा अब आधुनिक युद्ध में उतना ही महत्वपूर्ण है जितना खुद हथियार। इसी वजह से INAMS 2.0 को केवल एक सॉफ्टवेयर सिस्टम नहीं, बल्कि नौसेना के पूरे आर्मामेंट नेटवर्क का डिजिटल कमांड प्लेटफॉर्म माना जा रहा है। (Indian Navy INAMS 2.0)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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