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China PL-15 missiles: बड़ा खुलासा! यूएई की मदद से चीन ने अपनी मिसाइलों को किया अपग्रेड, अमेरिकी जासूसों का दावा

रिपोर्ट में कहा गया है कि यूएई से ट्रांसफर की गई तकनीक में मशीन लर्निंग मॉड्यूल और डिजिटल सिग्नल प्रोसेसर शामिल थे, जो मिसाइल को उड़ान के दौरान अपनी डायरेक्शन और स्पीड को ऑटो एडजस्ट करने में मदद करते हैं...

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📍नई दिल्ली | 27 Oct, 2025, 7:23 PM

China PL-15 missiles: अमेरिकी इंटेलिजेंस एजेंसियों ने दावा किया है कि चीन ने संयुक्त अरब अमिरात की एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंपनी की मदद से अपनी एयर-टू-एयर मिसाइलों को अपग्रेड किया। इसी तकनीकी सहयोग के चलते चीन को अपनी मिसाइलों की रेंज बढ़ाने में मदद मिली।

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ब्रिटिश अखबार फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट में अमेरिकी जासूसी एजेंसियों के हवाले से बताया गया है कि यह मामला 2022 का है जब बाइडेन प्रशासन के दौरान अमेरिकी खुफिया विभागों ने यह पता लगाया कि यूएई की प्रमुख एआई कंपनी जी42 ने चीन की हुवावे कंपनी को एक ऐसा सॉफ्टवेयर उपलब्ध कराया था, जिसका इस्तेमाल चीन ने अपनी पीएल-15 और पीएल-17 मिसाइलों की फ्लाइट कंट्रोल और टारगेटिंग सिस्टम को बेहतर बनाने के लिए किया।

इन मिसाइलों को चीन के जे-20 स्टेल्थ फाइटर जेट्स में लगाया है। रिपोर्ट के अनुसार, इस अपग्रेड के बाद इन जेट्स की रेंज और सटीकता अमेरिकी एफ-15 और एप-18 विमानों से ज्यादा हो गई है। यह रिपोर्ट अमेरिकी प्रशासन के छह अधिकारियों के हवाले से प्रकाशित की गई है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि यूएई से ट्रांसफर की गई तकनीक में मशीन लर्निंग मॉड्यूल और डिजिटल सिग्नल प्रोसेसर शामिल थे, जो मिसाइल को उड़ान के दौरान अपनी डायरेक्शन और स्पीड को ऑटो एडजस्ट करने में मदद करते हैं। इससे मिसाइल दुश्मन की काउंटर-मेजर तकनीक से बचकर लंबी दूरी तक जा सकती है।

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इस तकनीक का कुछ हिस्सा फ्रांस और ब्रिटेन में बनी मिसाइलों जैसे मीका और असराम से डेवलप किया गया था, जिन्हें यूएई ने पहले आयात किया था। अमेरिकी एजेंसियों का कहना है कि यही तकनीकी बाद में चीन तक पहुंची।

सिविल एआई प्रोजेक्ट के बहाने ट्रांसफर

रिपोर्ट के मुताबिक, हुवावे को यह तकनीक सिविल इस्तेमाल के बहाने दी गई, लेकिन वास्तव में इसका इस्तेमाल सैन्य उद्देश्यों के लिए किया गया। बता दें कि जी42 अबू धाबी स्थित यूएई की प्रमुख एआई कंपनी है, जिसके चेयरमैन शेख ताहनून बिन जायद अल नाहयान हैं। वे यूएई के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी हैं।

कंपनी का कहना है कि उसने किसी भी सैन्य तकनीक का ट्रांसफर नहीं किया और वह केवल “अंतरराष्ट्रीय मानकों के तहत” काम करती है। जी42 के प्रवक्ता का कहना है कि “हम किसी भी ऐसी गतिविधि से अनजान हैं।”

क्या यूएई को सजा देंगे ट्रंप?

इस खुलासे के बाद वाशिंगटन में बहस शुरू हो गई कि क्या अमेरिका को यूएई जैसे सहयोगी देश को दंडित करना चाहिए। कुछ अधिकारियों का मानना था कि यूएई चीन के प्रभाव में जा रहा है, जबकि कुछ अन्य अधिकारी यह तर्क दे रहे थे कि यूएई अमेरिका का पुराना रणनीतिक साझेदार है और वहां अमेरिकी बेस भी मौजूद हैं।

व्हाइट हाउस के अंदर इस पर चर्चा हुई कि क्या जी42 पर प्रतिबंध लगाया जाए या नहीं। हालांकि, सहमति इस पर बनी कि ईरान के खिलाफ यूएई की रणनीतिक अहमियत है, और इतनी बड़ी है कि उस पर कठोर कदम उठाना उचित नहीं होगा।

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हालांकि अमेरिकी कांग्रेस के रिपब्लिकन सांसद जॉन मोलिनार ने इस रिपोर्ट पर चिंता जताते हुए कहा, “यूएई और चीन के बीच बढ़ते संबंध राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं।” पूर्व सीआईए विशेषज्ञों का कहना है कि यह घटना अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए “टेक्नोलॉजिकल अलर्ट” है।

मिसाइल अपग्रेड से चीन को क्या मिला?

रिपोर्ट के मुताबिक, चीन की पीएल-15 और पीएल-17 मिसाइलें पहले से ही 200–400 किलोमीटर रेंज की थीं, लेकिन इस तकनीकी सुधार के बाद उनकी रेंज और टारगेटिंग और सटीक हो गई। पूर्व सीआईए अधिकारियों ने कहा कि चीन की मिसाइलें पहले से ही अमेरिका की एआईएम-120 अमराम मिसाइल से ज्यादा ताकवर थीं, लेकिन अब इस अपग्रेड से यह अंतर और बढ़ गया है।

यूएई ने पिछले कुछ सालों में चीन के साथ तकनीकी और आर्थिक रिश्ते मजबूत किए हैं। उसने हुवावे को अपने 5जी नेटवर्क के लिए चुना, जबकि अमेरिका इसके विरोध में था। 2023 में, जी42 ने हालांकि हुवावे से अपने संबंध खत्म कर माइक्रोसॉफ्ट के साथ साझेदारी की, लेकिन अमेरिकी एजेंसियों का कहना है कि यह कदम उस समय उठाया गया जब तकनीकी ट्रांसफर पहले ही हो चुका था। 2025 की शुरुआत में यूएई अधिकारियों ने चीन का दौरा भी किया था, जिससे पता चलता है कि दोनों देशों के बीच रिश्ते और गहरे हुए है।

पाकिस्तान ने मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन से मिली पीएल-15 मिसाइलों का इस्तेमाल किया था। उस दौरान पाकिस्तान के फाइटर्स जेट्स ने पीएल-15 दागी थीं, लेकिन भारतीय वायुसेना के इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम्स ने इन्हें जाम कर दिया था। जिससे ये टारगेट तक नहीं पहुंच सकीं और रास्ता भटक कर भारतीय सीमा में ही गिर गईं।

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