📍नई दिल्ली | 25 May, 2026, 12:01 PM
SIPRI UN Peacekeeping Crisis: दुनिया भर में चल रहे संयुक्त राष्ट्र और दूसरे बहुराष्ट्रीय शांति मिशन अब गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं। सैनिकों की संख्या लगातार घट रही है, बड़े देश फंड देने में देरी कर रहे हैं और वैश्विक राजनीति के कारण कई मिशनों का भविष्य अनिश्चित हो गया है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की नई रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर यही स्थिति जारी रही, तो आने वाले समय में संयुक्त राष्ट्र जैसे संस्थानों की भूमिका और कमजोर हो सकती है।
रिपोर्ट के मुताबिक साल 2025 के अंत तक दुनिया भर के शांति मिशनों में तैनात अंतरराष्ट्रीय सैनिकों और कर्मचारियों की संख्या घटकर 78,633 रह गई। यह पिछले 25 सालों में सबसे कम आंकड़ा माना जा रहा है। SIPRI ने बताया कि 2016 के मुकाबले यह संख्या लगभग 49 प्रतिशत कम हो चुकी है। केवल 2025 में ही इसमें 17 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।
सिपरी के पीस ऑपरेशंस एंड कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट प्रोग्राम के निदेशक डॉ. जायर वान डर लाइन ने कहा कि अगर यही हाल रहा तो मल्टीलेटरल कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट मेकेनिज्म बहुत कमजोर हो सकती है। उनके मुताबिक फंडिंग संकट, राजनीतिक दबाव और भू-राजनीतिक टकराव मिलकर संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं को किनारे कर रहे हैं। (SIPRI UN Peacekeeping Crisis)
रिपोर्ट में बताया गया कि साल 2025 में दुनिया के 34 देशों और क्षेत्रों में कुल 58 बहुपक्षीय शांति मिशन सक्रिय थे। यह संख्या 2024 के मुकाबले तीन कम रही। सबसे ज्यादा मिशन सब-सहारन अफ्रीका और यूरोप में रहे, जहां 18-18 मिशन ऑपरेट किए गए। मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में 14, अमेरिका क्षेत्र में 5 और एशिया-ओशिनिया में 3 मिशन सक्रिय रहे।
रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के कुल शांति सैनिकों में से लगभग 70 फीसदी केवल सब-सहारन अफ्रीका में तैनात थे। हालांकि सबसे ज्यादा कटौती भी इसी क्षेत्र में हुई। अफ्रीका में तैनात सैनिकों की संख्या में 21 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई।
SIPRI UN Peacekeeping Crisis: संयुक्त राष्ट्र पर बढ़ा फंडिंग संकट
सिपरी रिपोर्ट में सबसे बड़ी चिंता संयुक्त राष्ट्र के फंडिंग संकट को बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक कई बड़े देशों ने संयुक्त राष्ट्र को अपनी निर्धारित आर्थिक मदद समय पर नहीं दी। कुछ देशों ने पूरा पैसा भी जमा नहीं किया। इसी कारण जुलाई 2025 तक संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों के सामने करीब 2 अरब डॉलर की कमी आ गई थी। यह रकम पूरे 5.6 अरब डॉलर के बजट का लगभग 35 प्रतिशत हिस्सा थी।
इस संकट के कारण संयुक्त राष्ट्र को अपने खर्चों में भारी कटौती करनी पड़ी। रिपोर्ट में कहा गया कि खर्च कम करने के लिए कई मिशनों में सैनिकों और कर्मचारियों की संख्या घटाई गई। कुछ मिशनों में यूनिफॉर्म पहनने वाले कर्मियों की संख्या में करीब 25 फीसदी तक कटौती हुई। साथ ही सिविलियन स्टाफ भी कम किया गया।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी 2026 की शुरुआत में चेतावनी दी थी कि अगर सदस्य देशों ने समय पर फंड नहीं दिया तो संगठन आर्थिक पतन की स्थिति में पहुंच सकता है।
लेबनान मिशन पर भी बढ़ा विवाद
रिपोर्ट में लेबनान में तैनात संयुक्त राष्ट्र अंतरिम बल (UNIFIL) का भी जिक्र किया गया है। अमेरिका चाहता था कि इस मिशन को पूरी तरह खत्म कर दिया जाए। हालांकि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कई देशों ने इसका विरोध किया। आखिरकार समझौते के तहत मिशन को दिसंबर 2026 तक आखिरी बार बढ़ाया गया।
रिपोर्ट में कहा गया कि यह मामला दिखाता है कि अब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सहमति बनाना कितना मुश्किल हो गया है। स्थायी सदस्य देशों के बीच टकराव और वीटो की राजनीति के कारण नए मिशन शुरू करना और पुराने मिशनों को जारी रखना कठिन हो रहा है। (SIPRI UN Peacekeeping Crisis)
अफ्रीका में लगातार घट रहे मिशन
सिपरी रिपोर्ट के मुताबिक अफ्रीकी क्षेत्रीय संगठनों को भी गंभीर आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। अफ्रीकी यूनियन, इकॉनमिक कम्यूनिटी ऑफ वेस्ट अफ्रीकन स्टेट्स (ECOWAS) और दूसरे संगठनों के कई मिशन या तो बंद हो गए या उनमें कटौती की गई।
रिपोर्ट में बताया गया कि सोमालिया में अफ्रीकन यूनियन ट्रांजिशन मिशन (ATMIS) को बंद करके उसकी जगह अफ्रीकन यूनियन सपोर्ट एंड स्टेबलाइजेशन मिशन इन सोमालिया (AUSSOM) मिशन शुरू किया गया। हालांकि नए मिशन का उद्देश्य लगभग वही रखा गया है। इसका मकसद सोमालिया सरकार को अल-शबाब जैसे आतंकी संगठनों से लड़ने में मदद करना है।
वहीं डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में साउथर्न अफ्रीकन डेवलपमेंट कम्यूनिटी मिशन इन द डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ द कांगो (SAMIDRC) को मार्च 2025 में बंद कर दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार वहां सुरक्षा हालात लगातार बिगड़ रहे थे और मिशन के जवान भी हमलों का शिकार हुए थे।
भारत समेत ग्लोबल साउथ देशों की बड़ी भूमिका
सिपरी रिपोर्ट में कहा गया कि शांति मिशनों में सबसे ज्यादा सैनिक देने वाले सभी शीर्ष 10 देश ग्लोबल साउथ से थे। युगांडा सबसे बड़ा सैन्य योगदानकर्ता देश बना। इसके बाद नेपाल, बांग्लादेश और भारत का नाम शामिल रहा।
भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाता रहा है। भारतीय सैनिक अफ्रीका, मध्य पूर्व और दूसरे संवेदनशील इलाकों में कई दशकों से तैनात रहे हैं। रिपोर्ट में भारत को दुनिया के प्रमुख सैन्य योगदानकर्ताओं में शामिल किया गया है। (SIPRI UN Peacekeeping Crisis)
हैती और गाजा में नए प्रयोग
रिपोर्ट के अनुसार 2025 में दो नए मिशन शुरू किए गए। पहला सोमालिया में AUSSOM और दूसरा हैती में गैंग सप्रेशन फोर्स (GSF)।
हैती में पहले मौजूद मल्टीनेशनल सिक्योरिटी सपोर्ट मिशन को बंद कर दिया गया था। उसकी जगह नई GSF फोर्स बनाई गई। हालांकि रिपोर्ट के मुताबिक यह मिशन अभी भी अपनी पूरी ताकत तक नहीं पहुंच पाया है।
इसी तरह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने गाजा में एक अंतरराष्ट्रीय स्टेबिलाइजेशन फोर्स को भी मंजूरी दी, लेकिन 2025 के अंत तक वहां कोई सैनिक तैनात नहीं किया गया था। मिशन केवल तैयारी के चरण में था। (SIPRI UN Peacekeeping Crisis)
यूक्रेन और सूडान जैसे संघर्षों में गतिरोध
रिपोर्ट में कहा गया कि यूक्रेन, सूडान, सीरिया और यमन जैसे संघर्षों में नए बहुपक्षीय मिशन शुरू नहीं हो पाए। इसका कारण राजनीतिक मतभेद और बड़े देशों के बीच टकराव बताया गया है।
सिपरी के शोधकर्ताओं ने कहा कि कई क्षेत्रीय संगठन भी अब संयुक्त राष्ट्र की तरह विभाजित हो चुके हैं। ऐसे में संघर्ष प्रबंधन की जिम्मेदारी धीरे-धीरे छोटे समूहों, द्विपक्षीय समझौतों और अस्थायी सैन्य गठबंधनों की तरफ जा रही है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि रवांडा, यूएई, तुर्किये, कतर और सऊदी अरब जैसे देश अब अलग-अलग क्षेत्रों में सीधे हस्तक्षेप कर रहे हैं। कई जगह ये देश अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर सैन्य या राजनीतिक भूमिका निभा रहे हैं।
सिपरी ने अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि अगर बहुपक्षीय शांति मिशनों की संख्या और संसाधन इसी तरह घटते रहे, तो संघर्ष प्रबंधन और कठिन हो सकता है। रिपोर्ट में कहा गया कि दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध और हिंसा पहले से ही बढ़ रही है, जबकि शांति मिशनों की क्षमता लगातार कमजोर पड़ रही है। (SIPRI UN Peacekeeping Crisis)


