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DFPDS 2026 Explained: आखिर फील्ड कमांडर्स को क्यों मिले दोगुने वित्तीय अधिकार? जानें इससे भारतीय सेना को क्या होगा फायदा?

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक कई मामलों में वित्तीय अधिकारों को 100 फीसदी तक बढ़ाया गया है, जबकि कुछ श्रेणियों में यह बढ़ोतरी दोगुने से भी अधिक है...

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📍नई दिल्ली | 4 Jun, 2026, 2:55 PM

DFPDS 2026 Explained: युद्ध केवल टैंकों, मिसाइलों और लड़ाकू विमानों से नहीं जीते जाते। किसी भी सेना की असली ताकत इस बात में होती है कि जरूरत पड़ने पर उसे जरूरी उपकरण, स्पेयर पार्ट्स, हथियार, ईंधन और तकनीकी संसाधन कितनी तेजी से मिल पाते हैं। अगर सीमा पर तैनात किसी कमांडर को जरूरी सामान खरीदने के लिए महीनों तक फाइलें दिल्ली भेजनी पड़ें, तो इससे ऑपरेशनल तैयारी प्रभावित हो सकती है।

इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 4 जून को डिफेंस सर्विसेज के लिए वित्तीय शक्तियों के नए नियम जारी किए हैं। इसे डेलीगेशन ऑफ फाइनेंशियल पावर्स फॉर डिफेंस सर्विसेज (DFPDS-2026) कहा जाता है। नए नियमों के तहत सेना, नौसेना और वायुसेना के फील्ड कमांडरों को पहले के मुकाबले कहीं अधिक वित्तीय अधिकार दिए गए हैं।

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक कई मामलों में वित्तीय अधिकारों को 100 फीसदी तक बढ़ाया गया है, जबकि कुछ श्रेणियों में यह बढ़ोतरी दोगुने से भी अधिक है। सरकार का मानना है कि इससे खरीद प्रक्रिया तेज होगी, निर्णय लेने में समय कम लगेगा और सेनाओं को जरूरत के मुताबिक संसाधन समय पर मिल सकेंगे।

DFPDS 2026 Explained: क्या होते हैं वित्तीय अधिकार?

इसे बहुत आसान भाषा में समझा जाए तो वित्तीय अधिकार का मतलब है कि कोई अधिकारी कितनी राशि तक का खर्च या खरीदारी अपने स्तर पर मंजूर कर सकता है।

मान लीजिए किसी मिलिट्री यूनिट को अचानक स्पेयर पार्ट्स, विशेष उपकरण, संचार प्रणाली या अन्य जरूरी सामग्री की आवश्यकता पड़ जाती है। अगर कमांडर के पास पर्याप्त वित्तीय अधिकार हैं, तो वह सीधे खरीद की मंजूरी दे सकता है। लेकिन अगर अधिकार सीमित हैं तो फाइल को कई स्तरों से गुजरना पड़ता है।

यही कारण है कि युद्ध या तनावपूर्ण परिस्थितियों में अधिक वित्तीय अधिकार तेजी से फैसले लेने में मदद करते हैं।

सरकार ने क्यों किया यह बदलाव?

रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि पिछली बार वित्तीय शक्तियों में बड़ा संशोधन 2021 में किया गया था। उसके बाद सेनाओं का आकार बढ़ा है, ऑपरेशनल जिम्मेदारियां बढ़ी हैं और रक्षा बजट में भी बढ़ोतरी हुई है।

सीमा पर लगातार बदलते सुरक्षा माहौल, आधुनिक वेपन सिस्टम्स के रखरखाव और नई तकनीकों के इस्तेमाल के कारण खर्च भी बढ़ा है। ऐसे में 2021 के नियम कई जगहों पर पर्याप्त नहीं रह गए थे।

इसी वजह से नए सिरे से समीक्षा कर वित्तीय अधिकारों को बढ़ाने का फैसला लिया गया। (DFPDS 2026 Explained)

फील्ड कमांडरों को क्या फायदा मिलेगा?

इस फैसले का सबसे बड़ा लाभ उन अधिकारियों को मिलेगा जो सीधे ऑपरेशनल क्षेत्रों में जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
पहले कई मामलों में छोटी-छोटी खरीद के लिए भी हेड क्वॉर्टर की मंजूरी लेनी पड़ती थी। अब फील्ड कमांडर अपने स्तर पर अधिक राशि तक खरीदारी कर सकेंगे।

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इसका मतलब यह है कि सीमा पर तैनात सैनिकों को जरूरी उपकरण, वाहन स्पेयर पार्ट्स, तकनीकी सामग्री या अन्य संसाधन जल्दी मिल सकेंगे।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक युद्ध में समय सबसे महत्वपूर्ण संसाधन होता है। अगर फैसले लेने में देरी होती है तो उसका असर ऑपरेशनल क्षमता पर पड़ता है।

1.25 लाख करोड़ रुपये की खरीद का क्या मतलब है?

रक्षा मंत्रालय ने साफ कहा है कि नए वित्तीय अधिकारों के जरिए चालू वित्तीय वर्ष के बजट के अनुसार 1.25 लाख करोड़ रुपये से अधिक की खरीद प्रक्रिया आसान हो जाएगी।

यह राशि रेवेन्यू रूट के तहत खर्च की जाएगी। रेवेन्यू रूट का मतलब उन खर्चों से है जो रोजमर्रा की सैन्य जरूरतों, रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स, मरम्मत, गोला-बारूद और अन्य संचालन संबंधी जरूरतों पर किए जाते हैं।

इस फैसले से बड़ी संख्या में खरीद प्रस्तावों को तेजी से मंजूरी मिल सकेगी। (DFPDS 2026 Explained)

आत्मनिर्भर भारत को कैसे मिलेगा फायदा?

नए नियमों की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वदेशीकरण और अनुसंधान एवं विकास के लिए वित्तीय शक्तियों को दोगुना कर दिया गया है। इसका सीधा संबंध आत्मनिर्भर भारत अभियान से है।

पिछले कुछ सालों से सरकार लगातार यह कोशिश कर रही है कि भारतीय सेनाएं विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम करें और अधिक से अधिक उपकरण देश में ही विकसित और निर्मित किए जाएं।

अब मिलिट्री यूनिट्स और कमांडरों के पास स्वदेशी उत्पादों और तकनीकों की खरीद के लिए अधिक अधिकार होंगे।

इससे रक्षा क्षेत्र में काम कर रहे स्टार्टअप, एमएसएमई, निजी कंपनियां और सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा कंपनियों को भी फायदा मिल सकता है।

विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम करने की कोशिश

कई महत्वपूर्ण सैन्य प्रणालियों के लिए भारत अभी भी विदेशी मूल उपकरण निर्माताओं पर निर्भर है। जब कोई उपकरण विदेश से आता है तो उसके स्पेयर पार्ट्स, रखरखाव और तकनीकी सहायता के लिए भी उसी देश या कंपनी पर निर्भर रहना पड़ता है। सरकार चाहती है कि ऐसी निर्भरता धीरे-धीरे कम हो।

नए वित्तीय अधिकार इसी दिशा में एक कदम माने जा रहे हैं क्योंकि इससे स्थानीय स्तर पर विकसित तकनीकों और उत्पादों की खरीद आसान होगी। (DFPDS 2026 Explained)

जॉइंट प्रोक्योरमेंट सिस्टम को बढ़ावा

रक्षा मंत्रालय ने इस बार एक और महत्वपूर्ण बदलाव किया है। तीनों सेनाओं के बीच संयुक्त खरीद को बढ़ावा देने के लिए नए प्रावधान जोड़े गए हैं।

अक्सर ऐसा होता है कि सेना, नौसेना और वायुसेना को कुछ समान प्रकार के उपकरणों की जरूरत होती है। पहले कई बार अलग-अलग खरीद प्रक्रिया चलती थी।

अब जिस सेवा को लीड सर्विस बनाया जाएगा, उसे ज्यादा वित्तीय अधिकार दिए जाएंगे ताकि वह सभी के लिए संयुक्त खरीद कर सके। इससे समय की बचत होगी और लागत भी कम हो सकती है। (DFPDS 2026 Explained)

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2021 में क्या हुए थे बदलाव?

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इससे पहले सितंबर 2021 में रक्षा सेवाओं के वित्तीय अधिकारों में बड़ा बदलाव किया था। उस समय भी सेना, नौसेना और वायुसेना के अधिकारियों को पहले के मुकाबले ज्यादा वित्तीय शक्तियां दी गई थीं।

2021 में ज्यादातर कंपीटेंट फाइनेंशियल अथॉरिटीज (सीएफए) के अधिकार दोगुने कर दिए गए थे। यानी जो अधिकारी पहले एक निश्चित सीमा तक खरीदारी या खर्च की मंजूरी दे सकते थे, उन्हें उससे दोगुनी राशि तक फैसला लेने का अधिकार मिल गया था।

इसके अलावा, कोर, डिवीजन और ब्रिगेड स्तर के फील्ड कमांडरों को कुछ मामलों में पांच से दस गुना तक अधिक वित्तीय शक्तियां दी गई थीं, ताकि ऑपरेशनल जरूरतों को तेजी से पूरा किया जा सके।

उसी दौरान स्वदेशीकरण और रक्षा अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) से जुड़े प्रोजेक्ट्स के लिए वित्तीय अधिकारों को तीन गुना तक बढ़ाया गया था। इसका उद्देश्य विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम करना और देश में रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देना था।

वहीं, वाइस चीफ स्तर के अधिकारियों की वित्तीय सीमा भी बढ़ाकर 500 करोड़ रुपये कर दी गई थी। (DFPDS 2026 Explained)

2021 और 2026 के नियमों में क्या अंतर है?

2021 में ज्यादातर अधिकारियों के वित्तीय अधिकार दोगुने किए गए थे। अब 2026 में इन्हें फिर से 100 फीसदी तक बढ़ाया गया है। कुछ मामलों में यह बढ़ोतरी दो गुने से भी ज्यादा है। इससे अधिकारी पहले की तुलना में अधिक राशि की खरीद और मंजूरी खुद दे सकेंगे।

2021 में कोर, डिवीजन और ब्रिगेड स्तर के कमांडरों को ऑपरेशनल जरूरतों के लिए 5 से 10 गुना तक अधिक वित्तीय अधिकार दिए गए थे।

अब 2026 में इन शक्तियों को और बढ़ा दिया गया है। सीमा पर तैनात कमांडर आपात जरूरतों के लिए पहले से ज्यादा तेजी से खरीदारी कर सकेंगे।

वहीं, 2021 में स्वदेशी रक्षा उपकरणों और अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) परियोजनाओं के लिए वित्तीय सीमा तीन गुना तक बढ़ाई गई थी।

2026 में इन अधिकारों को फिर से दोगुना कर दिया गया है। इसका मतलब है कि 2016 की तुलना में अब स्वदेशीकरण और रक्षा अनुसंधान के लिए उपलब्ध वित्तीय शक्तियां कई गुना बढ़ चुकी हैं। इससे भारतीय कंपनियों, स्टार्टअप्स और रक्षा उद्योग को फायदा मिलेगा।

2021 में सेना, नौसेना और वायुसेना के वाइस चीफ की वित्तीय सीमा बढ़ाकर 500 करोड़ रुपये कर दी गई थी। 2026 के दस्तावेज में अलग से नई सीमा का उल्लेख नहीं किया गया है, लेकिन कुल वित्तीय अधिकारों में हुई बढ़ोतरी का लाभ इस स्तर के अधिकारियों को भी मिलेगा।

2021 में नौसेना और वायुसेना को भी वे विशेष वित्तीय शक्तियां दी गई थीं, जो पहले मुख्य रूप से सेना के पास थीं। 2026 में तीनों सेनाओं के कमांडरों के लिए इन विशेष अधिकारों को और बढ़ा दिया गया है। आपातकालीन और ऑपरेशनल जरूरतों के लिए उपलब्ध कुल वित्तीय सीमा भी दोगुनी कर दी गई है।

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2021 में संयुक्त खरीद की व्यवस्था सीमित स्तर पर मौजूद थी। वहीं, अब 2026 में नया प्रावधान जोड़ा गया है, जिसके तहत यदि किसी उपकरण की खरीद तीनों सेनाओं के लिए एक साथ करनी हो तो जिस सेवा को लीड एजेंसी बनाया जाएगा, उसे सामान्य से अधिक वित्तीय अधिकार दिए जाएंगे। इससे संयुक्त खरीद प्रक्रिया तेज होगी और समय की बचत होगी।

2021 में कुछ नए अधिकारियों को वित्तीय अधिकार दिए गए थे। 2026 में और अधिक अधिकारियों को सक्षम वित्तीय प्राधिकरण (सीएफए) बनाया गया है। इससे फैसले लेने की प्रक्रिया ज्यादा विकेंद्रीकृत होगी और छोटे-छोटे मामलों के लिए फाइलें ऊपर नहीं भेजनी पड़ेंगी।

2021 में फील्ड कमांडरों को सीमित स्तर पर तुरंत खरीद की सुविधा मिली थी। 2026 में सरकार का अनुमान है कि 1.25 लाख करोड़ रुपये से अधिक की खरीद प्रक्रिया को फील्ड स्तर पर ही गति मिल सकेगी। इससे सेनाओं को जरूरी उपकरण, स्पेयर पार्ट्स और सेवाएं समय पर मिल पाएंगी। (DFPDS 2026 Explained)

क्या इससे युद्धकालीन तैयारी बेहतर होगी?

रक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि किसी भी सैन्य बल की तैयारी केवल हथियारों की संख्या से तय नहीं होती। महत्वपूर्ण यह भी होता है कि जरूरत पड़ने पर मरम्मत, रखरखाव और पुनः आपूर्ति कितनी तेजी से हो सकती है।

यदि फील्ड कमांडरों को पर्याप्त अधिकार हों तो वे तत्काल जरूरतों को पूरा कर सकते हैं। यही कारण है कि दुनिया की अधिकांश आधुनिक सेनाएं निर्णय प्रक्रिया को अधिक डिसेंट्रलाइजेशन बनाने की दिशा में काम कर रही हैं। (DFPDS 2026 Explained)

डिफेंस प्रोक्योरमेंट मैनुअल 2025 से क्या है संबंध?

रक्षा मंत्रालय ने अक्टूबर 2025 में संशोधित डिफेंस प्रोक्योरमेंट मैनुअल जारी किया था। उसका उद्देश्य खरीद प्रक्रिया को सरल और तेज बनाना था। अब वित्तीय अधिकारों में यह नया संशोधन उसी प्रक्रिया को और मजबूत बनाता है।

एक तरफ खरीद के नियमों को आसान बनाया गया है और दूसरी तरफ खरीद को मंजूरी देने वाले अधिकारियों की शक्तियां बढ़ाई गई हैं। दोनों कदम मिलकर रक्षा खरीद प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में काम करेंगे। (DFPDS 2026 Explained)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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