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Explainer: ब्रह्मोस में बड़ा बदलाव! अब रूस नहीं, भारत बनाएगा मिसाइल का सबसे खतरनाक हिस्सा, समझिए क्यों है यह मील का पत्थर

ब्रह्मोस मिसाइल के कई हिस्सों का स्वदेशीकरण पहले ही किया जा चुका है। लॉन्चर, एयरफ्रेम, इलेक्ट्रॉनिक्स, कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम और बूस्टर जैसे कई महत्वपूर्ण कंपोनेंट अब भारत में बनाए जा रहे हैं...

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📍नई दिल्ली/नागपुर | 18 Jun, 2026, 12:52 PM

Indigenous BrahMos Warhead: भारत के सबसे ताकतवर हथियारों में शामिल ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल को लेकर आज एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल होने जा रही है। नागपुर स्थित सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड (एसडीएएल) पहली बार ब्रह्मोस मिसाइल के लिए पूरी तरह स्वदेशी वारहेड की डिलीवरी करेगी। सूत्रों के मुताबिक यह केवल एक मिसाइल कंपोनेंट की डिलीवरी नहीं है, बल्कि भारत के मिसाइल स्वदेशीकरण कार्यक्रम में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

खास बात यह है कि एसडीएएल इसी कार्यक्रम के तहत अपने यहां निर्मित 100वें ब्रह्मोस बूस्टर की भी डिलीवरी करेगा। कंपनी ने पहले मिसाइल को उड़ाने वाले सिस्टम में महारत हासिल की, वही अब टारगेट को नष्ट करने वाले सबसे संवेदनशील हिस्से का निर्माण भी कर रही है।

अब तक ब्रह्मोस कार्यक्रम में कई हिस्सों का स्वदेशीकरण हो चुका है, लेकिन वारहेड उन चुनिंदा तकनीकों में शामिल था जहां विदेशी निर्भरता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी।

बता दें कि अभी तक वारहेड की मुख्य सप्लाई अभी भी रूस से हो रही थी। (Indigenous BrahMos Warhead)

Indigenous BrahMos Warhead: क्या होता है वारहेड?

आम भाषा में समझें तो किसी भी मिसाइल के दो सबसे महत्वपूर्ण हिस्से होते हैं। पहला उसे टारगेट तक पहुंचाने वाला सिस्टम और दूसरा टारगेट को नष्ट करने वाला सिस्टम।

ब्रह्मोस मिसाइल में बूस्टर और इंजन उसे तेज रफ्तार से टारगेट तक पहुंचाते हैं। लेकिन असली विनाशकारी ताकत वारहेड में होती है। यही वह हिस्सा है जो टारगेट से टकराने के बाद विस्फोट करता है और दुश्मन के जहाज, बंकर, कमांड सेंटर या अन्य सैन्य ठिकानों को नष्ट करता है।

यदि मिसाइल को एक तेज रफ्तार व्हीकल माना जाए तो वारहेड उसका सबसे घातक हथियार होता है। यही वजह है कि वारहेड तकनीक को दुनिया के सबसे संवेदनशील रक्षा क्षेत्रों में गिना जाता है।

ब्रह्मोस की ताकत का असली राज

ब्रह्मोस दुनिया की सबसे तेज ऑपरेशनल सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में शामिल है। इसकी गति मैक 2.8 से मैक 3.5 के बीच है। यानी यह ध्वनि की गति से लगभग तीन गुना तेज उड़ान भर सकती है।

भारत और रूस के संयुक्त सहयोग से विकसित यह मिसाइल जमीन, समुद्र, हवा और पनडुब्बी से लॉन्च की जा सकती है। भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना तीनों इसकी अलग-अलग वेरिएंट का इस्तेमाल करती हैं।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी ब्रह्मोस की क्षमताओं की चर्चा हुई थी। इसके बाद से इस मिसाइल को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी रुचि बढ़ी है। (Indigenous BrahMos Warhead)

क्यों महत्वपूर्ण है स्वदेशी वारहेड?

रक्षा उद्योग से जुड़े सूत्रों के अनुसार पिछले कुछ सालों में भारत ने ब्रह्मोस के कई हिस्सों का स्वदेशीकरण किया है। लॉन्चर, एयरफ्रेम, इलेक्ट्रॉनिक्स, कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम और कई अन्य सब-सिस्टम अब भारत में बनाए जा रहे हैं।

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हालांकि वारहेड तकनीक सबसे मुश्किल मानी जाती है। इसके लिए उच्च गुणवत्ता वाले विस्फोटकों, विशेष धातुओं, फ्यूजिंग सिस्टम, सुरक्षा तंत्र और सटीक इंजीनियरिंग की जरूरत होती है।

इसी कारण लंबे समय तक ब्रह्मोस कार्यक्रम में इस क्षेत्र में विदेशी सहयोग बना रहा। अब एसडीएएल के बनाए वारहेड को भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी मिसाइल कार्यक्रम में पूर्ण आत्मनिर्भरता तभी मानी जाती है जब उसके सभी महत्वपूर्ण हिस्से देश के भीतर विकसित और निर्मित किए जा सकें। (Indigenous BrahMos Warhead)

भारत ने ब्रह्मोस का वारहेड देश में बनाने का फैसला क्यों लिया?

रक्षा सूत्रों के अनुसार ब्रह्मोस मिसाइल का वारहेड उन सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में शामिल है जो टारगेट को वास्तविक नुकसान पहुंचाते हैं। अब तक इस क्षेत्र में भारत को विदेशी तकनीक और सप्लाई पर कुछ हद तक निर्भर रहना पड़ता था। यही वजह है कि सरकार और रक्षा क्षेत्र से जुड़ी एजेंसियों ने वारहेड के स्वदेशीकरण पर जोर दिया।

सूत्रों का कहना है कि किसी भी युद्ध या अंतरराष्ट्रीय संकट की स्थिति में विदेशी सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है। ऐसे में यदि मिसाइल के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों के लिए दूसरे देश पर निर्भरता हो, तो ऑपरेशनल जरूरतों पर असर पड़ सकता है। देश में वारहेड बनने से यह निर्भरता कम होगी और सप्लाई अधिक सुरक्षित बनेगी।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक ब्रह्मोस मिसाइल के कई हिस्सों का स्वदेशीकरण पहले ही किया जा चुका है। लॉन्चर, एयरफ्रेम, इलेक्ट्रॉनिक्स, कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम और बूस्टर जैसे कई महत्वपूर्ण कंपोनेंट अब भारत में बनाए जा रहे हैं। हालांकि वारहेड सबसे संवेदनशील और तकनीकी रूप से जटिल हिस्सों में शामिल था। इसलिए इसका देश में विकसित होना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

सूत्र बताते हैं कि वारहेड तकनीक में उच्च गुणवत्ता वाले विस्फोटक, विशेष धातुएं, फ्यूजिंग सिस्टम और सटीक इंजीनियरिंग की जरूरत होती है। यही कारण है कि दुनिया के बहुत कम देश इस तकनीक में पूरी तरह आत्मनिर्भर हैं।

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कैसे काम करता है ब्रह्मोस का वारहेड?

ब्रह्मोस के सामान्य संस्करण में लगभग 200 किलोग्राम का वारहेड लगाया जाता है। वहीं एयर लॉन्च वेरिएंट ब्रह्मोस-ए में यह क्षमता लगभग 300 किलोग्राम तक पहुंच जाता है।

सूत्रों के अनुसार यह सेमी-आर्मर पियर्सिंग हाई एक्सप्लोसिव डिजाइन पर बेस्ड है। इसका मतलब यह है कि मिसाइल पहले टारगेट की बाहरी सुरक्षा या कवच को भेदती है और उसके बाद अंदर जाकर विस्फोट करती है।

यदि टारगेट कोई युद्धपोत हो तो वारहेड जहाज के डेक या स्ट्रक्चर को भेदकर अंदर विस्फोट कर सकता है। इसी तरह यदि टारगेट कोई मजबूत बंकर या कमांड सेंटर हो तो यह उसकी सुरक्षा परतों को पार करने के बाद अधिक नुकसान पहुंचा सकता है।

यही तकनीक इसे सामान्य विस्फोटक हथियारों से अलग बनाती है। (Indigenous BrahMos Warhead)

क्या है एडवांस्ड सीकर इंटीग्रेशन?

एसडीएएल के स्वदेशी वारहेड को लेकर सामने आई जानकारी के अनुसार इसमें एडवांस्ड सीकर इंटीग्रेशन और बेहतर टारगेट एंगेजमेंट क्षमताओं पर विशेष ध्यान दिया गया है।

सीकर किसी भी आधुनिक मिसाइल का वह हिस्सा होता है जो अंतिम चरण में टारगेट की पहचान करता है और मिसाइल को सही दिशा में मार्गदर्शन देता है।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक ब्रह्मोस में मिड-कोर्स गाइडेंस के लिए इनर्शियल नेविगेशन और सैटेलाइट आधारित सिस्टम का उपयोग किया जाता है। जबकि अंतिम चरण में एक्टिव रडार सीकर टारगेट को लॉक करता है।

नई स्वदेशी क्षमता का उद्देश्य मिसाइल की सटीकता और प्रभावशीलता को और मजबूत करना बताया जा रहा है।

टेस्टिंग के लिए नागपुर से जाएगा चंडीगढ़

सूत्रों के अनुसार डिलीवरी मिलने के बाद वारहेड को चंडीगढ़ स्थित डीआरडीओ की टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेटरी (टीबीआरएल) भेजा जाएगा। टीबीआरएल देश की प्रमुख रक्षा अनुसंधान प्रयोगशालाओं में शामिल है। यहां वारहेड के विभिन्न तकनीकी परीक्षण किए जाएंगे।

इन परीक्षणों में सुरक्षा, विश्वसनीयता, विस्फोटक प्रदर्शन, टर्मिनल इफेक्ट और ऑपरेशनल इफेक्टिवनेस जैसे कई पहलुओं की जांच की जाएगी। जब तक यह सभी ट्रायल्स पूरे नहीं होते, तब तक किसी भी नए वारहेड को पूर्ण ऑपरेशनल मंजूरी नहीं दी जाती। (Indigenous BrahMos Warhead)

100वें ब्रह्मोस बूस्टर की भी डिलीवरी

वहीं, एसडीएएल अपने यहां निर्मित 100वें ब्रह्मोस बूस्टर की भी डिलीवरी कर रहा है। बूस्टर वह हिस्सा होता है जो लॉन्च के बाद मिसाइल को शुरुआती तेज रफ्तार देता है। इसके बाद मिसाइल का मुख्य इंजन सक्रिय होता है और वह टारगेट की ओर बढ़ती है।

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रक्षा उद्योग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि 100 बूस्टर का निर्माण इस बात का संकेत है कि निजी क्षेत्र अब ब्रह्मोस जैसी रणनीतिक परियोजनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। (Indigenous BrahMos Warhead)

निजी क्षेत्र की बढ़ती भूमिका

एक समय ऐसा था जब देश के अधिकांश रणनीतिक हथियार कार्यक्रमों में सरकारी संस्थानों और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का दबदबा था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में निजी क्षेत्र की भागीदारी तेजी से बढ़ी है।

एसडीएएल इसका प्रमुख उदाहरण बनकर उभरा है। कंपनी पहले मिसाइल बूस्टर और अन्य रक्षा प्रणालियों के निर्माण में सक्रिय थी। अब वारहेड जैसे अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्र में प्रवेश करना इसकी तकनीकी क्षमता को दर्शाता है।

रक्षा मंत्रालय द्वारा आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया पर दिए जा रहे जोर का असर अब कई बड़े रक्षा कार्यक्रमों में दिखाई देने लगा है। (Indigenous BrahMos Warhead)

ब्रह्मोस-एनजी और अन्य मिसाइल कार्यक्रमों को भी मिलेगा फायदा

ब्रह्मोस वारहेड कार्यक्रम में मिली सफलता का असर अन्य भारतीय मिसाइल कार्यक्रमों पर भी पड़ सकता है। भारत इस समय ब्रह्मोस-एनजी, अस्त्र, प्रलय, रुद्रम और एलआर-एलएसीएम जैसी कई एडवांस मिसाइल परियोजनाओं पर काम कर रहा है।

इन कार्यक्रमों में भी उच्च तकनीक वाले वारहेड, गाइडेंस सिस्टम और अन्य महत्वपूर्ण सब-सिस्टम की जरूरत होती है। ऐसे में घरेलू उद्योग की बढ़ती क्षमता पूरे रक्षा इकोसिस्टम के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

वहीं, ब्रह्मोस अब केवल भारतीय सशस्त्र बलों तक सीमित नहीं है। फिलीपींस को इसकी आपूर्ति शुरू हो चुकी है, जबकि कई अन्य देश भी इसमें रुचि दिखा रहे हैं।

रक्षा क्षेत्र से जुड़े सूत्रों का कहना है कि जब किसी हथियार प्रणाली के अधिक से अधिक हिस्से देश के भीतर बनते हैं तो उत्पादन क्षमता और सप्लाई चेन दोनों मजबूत होती हैं। इसी कारण स्वदेशी वारहेड का विकास ब्रह्मोस कार्यक्रम के लिए एक महत्वपूर्ण तकनीकी उपलब्धि माना जा रहा है। (Indigenous BrahMos Warhead)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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