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क्या रूस खरीदेगा दुनिया की सबसे तेज मिसाइल ब्रह्मोस? इंडो-रशिया जॉइंट वेंचर ने दिया बड़ा संकेत

ब्रह्मोस मिसाइल भारत और रूस की संयुक्त परियोजना है, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि अब तक इसका सबसे बड़ा खरीदार भारत ही रहा है। भारतीय थल सेना, नौसेना और वायुसेना तीनों इस मिसाइल का इस्तेमाल करती हैं...

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📍नई दिल्ली/मॉस्को | 11 Jun, 2026, 11:39 AM

Russia BrahMos Missile: दुनिया की सबसे खतरनाक और तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में गिनी जाने वाली ब्रह्मोस रूस को भी सप्लाई की जा सकती है। भारत और रूस के जॉइंट वेंचर ब्रह्मोस एयरोस्पेस ने कहा है कि यदि रूस आधिकारिक तौर पर अनुरोध करता है तो कंपनी रूसी आर्म्ड फोर्सेज को भी ब्रह्मोस मिसाइलें उपलब्ध कराने के लिए तैयार है।

यह बयान ऐसे समय आया है जब रूस अपनी सैन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए आधुनिक वेपन सिस्टम्स बढ़ाने में जुटा हुआ है। ब्रह्मोस एयरोस्पेस के रूसी सह-प्रबंध निदेशक अलेक्जेंडर मक्सिचेव ने सेंट पीटर्सबर्ग में आयोजित अंतरराष्ट्रीय समुद्री रक्षा प्रदर्शनी “फ्लीट-2026” के दौरान रूसी समाचार एजेंसी तास से बातचीत में यह बात कही।

उन्होंने कहा कि यदि रूसी की ओर से औपचारिक मांग आती है तो कंपनी उस ऑर्डर को पूरा करने के लिए पूरी तरह तैयार है। उनके अनुसार ब्रह्मोस मिसाइलें नौसेना या जमीनी सेना, दोनों के लिए उपलब्ध कराई जा सकती हैं और कंपनी के पास पर्याप्त उत्पादन क्षमता मौजूद है।

Russia BrahMos Missile: पहली बार रूस के लिए खुलकर सामने आई पेशकश

ब्रह्मोस मिसाइल भारत और रूस की संयुक्त परियोजना है, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि अब तक इसका सबसे बड़ा खरीदार भारत ही रहा है। भारतीय थल सेना, नौसेना और वायुसेना तीनों इस मिसाइल का इस्तेमाल करती हैं। दूसरी ओर रूस ने अभी तक अपनी सेनाओं में ब्रह्मोस को शामिल नहीं किया है।

यही वजह है कि ब्रह्मोस एयरोस्पेस का यह बयान काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। रूस के पास पहले से ओनिक्स और अन्य क्रूज मिसाइलें मौजूद हैं, लेकिन ब्रह्मोस को उनके एडवांस वर्जन के तौर पर देखा जाता है। यह मिसाइल जॉइंट डेवलपमेंट का परिणाम है और पिछले दो दशकों में इसमें कई तकनीकी सुधार किए जा चुके हैं।

अलेक्जेंडर मक्सिचेव ने कहा कि कंपनी रूस की जरूरतों को अच्छी तरह समझती है और उत्पादन व्यवस्था पहले से तैयार है। इसलिए यदि ऑर्डर मिलता है तो सप्लाई में किसी बड़ी बाधा की संभावना नहीं है। (Russia BrahMos Missile)

कैसे शुरू हुई थी ब्रह्मोस परियोजना

ब्रह्मोस की कहानी भारत और रूस के रक्षा सहयोग की सबसे सफल कहानियों में गिनी जाती है। वर्ष 1998 में दोनों देशों के बीच एक अंतर-सरकारी समझौते के बाद ब्रह्मोस एयरोस्पेस की स्थापना की गई थी।

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इस संयुक्त उद्यम में भारत की ओर से रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी डीआरडीओ शामिल है, जबकि रूस की ओर से एनपीओ माशिनोस्ट्रोयेनिया भागीदार है।

कंपनी में भारत की हिस्सेदारी 50.5 प्रतिशत और रूस की 49.5 प्रतिशत है। मिसाइल का नाम भी दोनों देशों की नदियों के नामों को जोड़कर रखा गया था। भारत की ब्रह्मपुत्र नदी और रूस की मॉस्कवा नदी के नाम से “ब्रह्मोस” बना।

यह परियोजना शुरू होने के बाद दोनों देशों के वैज्ञानिकों ने मिलकर एक ऐसी सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल डेवलप की, जो दुनिया की सबसे तेज ऑपरेशन वाली मिसाइलों में शामिल हो गई।

ब्रह्मोस की सबसे बड़ी ताकत इसकी स्पीड है। यह ध्वनि की गति से लगभग तीन गुना तेज उड़ान भर सकती है। इसकी गति मैक 2.8 से मैक 3 तक पहुंचती है।

सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी मिसाइल को रोकने के लिए उसके खिलाफ प्रतिक्रिया देने का समय बहुत महत्वपूर्ण होता है। ब्रह्मोस की अत्यधिक गति दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम के लिए चुनौती पैदा करती है।

यह मिसाइल उड़ान के दौरान बहुत कम ऊंचाई पर भी चल सकती है। समुद्र की सतह के बेहद करीब उड़ने की क्षमता के कारण रडार पर इसे देर से देखा जाता है। यही वजह है कि इसे रोकना और मुश्किल हो जाता है। (Russia BrahMos Missile)

ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस ने कैसे दिखाई अपनी ताकत

मई 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने जवाबी कार्रवाई के तहत ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। इस अभियान के दौरान भारतीय सशस्त्र बलों ने आतंकवादी ठिकानों और पाकिस्तान के महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। इस ऑपरेशन में ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ने अहम भूमिका निभाई।

10 मई 2025 को भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के कई प्रमुख एयरबेसों पर सटीक हमले किए। इनमें नूर खान (चकला), राफिकी, मुरीद, सरगोधा, सियालकोट और भोलारी जैसे महत्वपूर्ण एयरबेस शामिल बताए गए। इन हमलों में भारतीय वायुसेना के सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमानों से एयर-लॉन्च्ड 15 से 19 ब्रह्मोस मिसाइलें दागी गईं। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार इस दौरान 15 से 19 ब्रह्मोस मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया।

वहीं, ब्रह्मोस की तेज गति और सटीक निशाना लगाने की क्षमता के सामने पाकिस्तान के एयर डिफेंस सिस्टम जवाब नहीं दे पाए। मिसाइलों ने अपने निर्धारित लक्ष्यों को सटीकता से निशाना बनाया। इस ऑपरेशन के बाद ब्रह्मोस की मारक क्षमता और विश्वसनीयता पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा बढ़ गई।

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कई प्लेटफॉर्म से दागी जा सकती है ब्रह्मोस

ब्रह्मोस की एक और बड़ी खासियत इसकी बहुउद्देश्यीय क्षमता है। इसे जमीन से, समुद्र से, पनडुब्बी से और लड़ाकू विमान से दागा जा सकता है।

भारतीय नौसेना के कई आधुनिक युद्धपोतों पर ब्रह्मोस तैनात है। भारतीय थल सेना की विशेष मिसाइल रेजिमेंटें इसका संचालन करती हैं। भारतीय वायुसेना ने इसे सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमानों के साथ भी इंटीग्रेट किया है जो बेहद घातक कॉम्बिनेशन है।

इस वजह से ब्रह्मोस केवल एक मिसाइल नहीं बल्कि तीनों सेनाओं के लिए एक साझा मारक क्षमता का हिस्सा बन चुकी है।

लगातार बढ़ाई गई ऑपरेशनल रेंज

शुरुआत में ब्रह्मोस की मारक दूरी लगभग 290 किलोमीटर थी। उस समय अंतरराष्ट्रीय निर्यात नियंत्रण नियमों के कारण इसकी सीमा सीमित थी।

बाद में भारत के मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम का सदस्य बनने के बाद इसकी रेंज बढ़ाने का रास्ता खुला। हाल के सालों में परीक्षणों के दौरान इसकी मारक दूरी को 800 किलोमीटर से अधिक तक बढ़ाया गया है।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि लंबी दूरी और तेज रफ्तार ही इसकी सबसे बड़ी खूबी है। (Russia BrahMos Missile)

रूस को क्यों पड़ सकती है इसकी जरूरत

रूस के पास पहले से कई प्रकार की क्रूज मिसाइलें मौजूद हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों में उसकी सैन्य जरूरतों में काफी बढ़ोतरी हुई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक युद्धों में मिसाइलों की खपत बहुत अधिक होती है। ऐसे में उत्पादन क्षमता बढ़ाना और नए सिस्टम्स को शामिल करना किसी भी देश के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।

ब्रह्मोस की खूबी यह है कि यह पहले से परीक्षण की हुई और ऑपरेशनल है। भारतीय सेनाएं सालों से इसका इस्तेमाल कर रही हैं और कई अलग-अलग हालात में इसकी क्षमता को परखा जा चुका है। (Russia BrahMos Missile)

भारत में हो रहा है बड़े पैमाने पर उत्पादन

ब्रह्मोस परियोजना की एक बड़ी उपलब्धि यह भी है कि आज इसका अधिकांश उत्पादन भारत में होता है। पिछले कुछ वर्षों में स्वदेशीकरण का स्तर लगातार बढ़ाया गया है।

मिसाइल के कई महत्वपूर्ण हिस्से भारतीय कंपनियां तैयार कर रही हैं। इससे देश में रक्षा उत्पादन को बढ़ावा मिला है और बड़ी संख्या में कुशल रोजगार भी पैदा हुए हैं।

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सरकार की आत्मनिर्भर भारत पहल के तहत ब्रह्मोस को एक सफल उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। (Russia BrahMos Missile)

फिलीपींस बना पहला विदेशी ग्राहक

भारत के रक्षा निर्यात इतिहास में ब्रह्मोस ने एक नया अध्याय तब लिखा जब फिलीपींस ने इसे खरीदने का फैसला किया। जनवरी 2022 में हुए समझौते के तहत फिलीपींस ने तटीय रक्षा के लिए ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली खरीदी। इसके बाद मिसाइलों की खेप वहां पहुंचाई गई।

यह पहली बार था जब भारत ने इतनी एडवांस मिसाइल किसी विदेशी देश को निर्यात की। फिलीपींस के अलावा इंडोनेशिया, वियतनाम और कई अन्य देशों ने भी इस प्रणाली में रुचि दिखाई है। वितयनाम के साथ डील साइन हो चुकी है लेकिन अभी दोनों देशों की तरफ से आधिकारिक रूप से सार्वजनिक घोषणा नहीं की गई है। भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने 30-31 मई को सिंगापुर में शांगरी-ला डायलॉग (Shangri-La Dialogue) के दौरान मीडिया से बात करते हुए कहा था, “वियतनाम के साथ ब्रह्मोस मिसाइल डील पहले ही साइन हो चुकी है। हालांकि इसे अभी सार्वजनिक रूप से घोषित नहीं किया गया है।” उन्होंने यह भी बताया कि इंडोनेशिया के साथ भी डील फाइनल स्टेज में है।

ब्रह्मोस-एनजी पर भी तेजी से काम

ब्रह्मोस एयरोस्पेस केवल मौजूदा संस्करण तक सीमित नहीं है। कंपनी मिसाइल के अगले संस्करण पर भी काम कर रही है, जिसे ब्रह्मोस-एनजी कहा जाता है। यह मौजूदा मिसाइल की तुलना में हल्की और आकार में छोटी होगी। इसका लाभ यह होगा कि लड़ाकू विमान एक साथ अधिक संख्या में मिसाइलें ले जा सकेंगे। इस संस्करण को मॉडर्न एयर आपरेशंस की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किया जा रहा है। (Russia BrahMos Missile)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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