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चीन की टेंशन बढ़ाएगा भारत का ‘ब्रह्मास्त्र’! वियतनाम बना ब्रह्मोस मिसाइल का खरीदार, अब इंडोनेशिया की बारी

भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने पहली बार सार्वजनिक रूप से कहा कि वियतनाम के साथ ब्रह्मोस डील साइन हो चुकी है, हालांकि इसकी औपचारिक घोषणा अभी नहीं हुई है...

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📍नई दिल्ली | 30 May, 2026, 11:07 PM

Vietnam BrahMos Missile Deal: भारत की सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस अब दुनिया के कई देशों की पसंद बनती जा रही है। फिलीपींस के बाद अब वियतनाम ने भी भारत के साथ ब्रह्मोस मिसाइल खरीद समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। वहीं इंडोनेशिया के साथ भी डील अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। इस बात की पहली आधिकारिक पुष्टि सिंगापुर में आयोजित शांगरी-ला डायलॉग के दौरान भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने की।

रक्षा विशेषज्ञ इस डील को सिर्फ हथियार बिक्री नहीं बल्कि एशिया में बदलते सामरिक संतुलन से जोड़कर देख रहे हैं। खासकर दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती गतिविधियों के बीच भारत की यह रक्षा साझेदारी बेहद अहम मानी जा रही है। भारत अब केवल दुनिया का बड़ा हथियार आयातक देश नहीं रहा, बल्कि आधुनिक सैन्य तकनीक बेचने वाला उभरता रक्षा निर्यातक बन चुका है।

Vietnam BrahMos Missile Deal: शांगरी-ला डायलॉग में हुआ बड़ा खुलासा

सिंगापुर में आयोजित 23वें शांगरी-ला डायलॉग में एशिया, यूरोप और पश्चिमी देशों के रक्षा मंत्री, सैन्य अधिकारी और रणनीतिक विशेषज्ञ मौजूद थे। इसी मंच पर भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने पहली बार सार्वजनिक रूप से कहा कि वियतनाम के साथ ब्रह्मोस डील साइन हो चुकी है, हालांकि इसकी औपचारिक घोषणा अभी नहीं हुई है।

उन्होंने कहा कि वियतनाम और इंडोनेशिया दोनों के साथ बातचीत अंतिम चरण में थी और वियतनाम के मामले में समझौता पहले ही हो चुका है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत केवल उन्हीं मित्र देशों के साथ इतनी एडवांस टेक्नोलॉजी साझा करता है, जिन पर भरोसा किया जा सके।

भारत और रूस के संयुक्त सहयोग से बनी ब्रह्मोस मिसाइल को दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में गिना जाता है। यही वजह है कि कई एशियाई देश अब इसे अपनी नौसैनिक सुरक्षा का अहम हिस्सा बनाना चाहते हैं।

कितनी बड़ी है वियतनाम डील

सूत्रों के मुताबिक वियतनाम के साथ हुई ब्रह्मोस डील की कीमत लगभग 5,800 करोड़ रुपये बताई जा रही है। इस पैकेज में तटीय रक्षा के लिए मिसाइल बैटरियां, शुरुआती मिसाइल सप्लाई, ट्रेनिंग और लॉजिस्टिक सपोर्ट शामिल है।

बताया जा रहा है कि वियतनाम भविष्य में एयर लॉन्च वर्जन यानी लड़ाकू विमान से दागी जाने वाली ब्रह्मोस मिसाइल में भी रूचि दिखाई है। इससे उसकी समुद्री मारक क्षमता में और इजाफा होगा।

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भारत और वियतनाम के बीच पिछले कुछ महीनों में रक्षा सहयोग तेजी से बढ़ा है। मई 2026 में वियतनाम के राष्ट्रपति टो लाम भारत आए थे। इसके कुछ ही दिनों बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हनोई का दौरा किया। इसी दौरान दोनों देशों ने रणनीतिक साझेदारी पर विस्तार से चर्चा की थी।

मार्च में भारतीय डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स की एक टीम भी वियतनाम गई थी, जहां डिफेंस प्रोक्योरमेंट को लेकर बातचीत हुई थी।

इंडोनेशिया भी खरीदना चाहता है ब्रह्मोस

वियतनाम के बाद अब इंडोनेशिया को ब्रह्मोस का अगला बड़ा ग्राहक माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच बातचीत अंतिम चरण में बताई जा रही है। अनुमान है कि यह डील लगभग 450 मिलियन डॉलर की हो सकती है।

भारत और इंडोनेशिया ने इसके लिए जॉइंट डिफेंस इंडस्ट्री कोऑपरेशन कमेटी भी बनाई है। इसके तहत टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, जॉइंट रिसर्च, सप्लाई चेन और रक्षा उत्पादन सहयोग पर काम हो रहा है।

इंडोनेशिया लंबे समय से अपनी समुद्री सुरक्षा मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। दक्षिण चीन सागर और आसपास के समुद्री इलाकों में चीन की गतिविधियों के कारण वह आधुनिक एंटी-शिप मिसाइल सिस्टम चाहता है। ब्रह्मोस उसकी इसी जरूरत को पूरा कर सकती है।

फिलीपींस पहले ही इस्तेमाल कर रहा है ब्रह्मोस

फिलीपींस भारत से ब्रह्मोस खरीदने वाला पहला विदेशी देश बना था। जनवरी 2022 में भारत और फिलीपींस के बीच करीब 375 मिलियन डॉलर यानी लगभग 2,770 करोड़ रुपये की डील हुई थी।

फिलीपींस ने 2024 से इन मिसाइलों का इस्तेमाल शुरू कर दिया। वहां इन मिसाइलों को तटीय रक्षा के लिए तैनात किया गया है। फिलीपींस और चीन के बीच दक्षिण चीन सागर को लेकर लंबे समय से तनाव बना हुआ है। ऐसे में ब्रह्मोस को वहां गेम चेंजर हथियार माना जा रहा है। (Vietnam BrahMos Missile Deal)

आखिर इतनी खास क्यों है ब्रह्मोस मिसाइल

ब्रह्मोस मिसाइल भारत और रूस का संयुक्त प्रोजेक्ट है। इसका नाम भारत की ब्रह्मपुत्र नदी और रूस की मोस्कवा नदी को मिलाकर रखा गया है। यह दुनिया की सबसे तेज ऑपरेशनल सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में शामिल है।

एक्सपोर्ट वर्जन की रेंज करीब 290 किलोमीटर है। यह जमीन, समुद्र, हवा और पनडुब्बी से दागी जा सकती है। इसकी गति आवाज की रफ्तार से लगभग तीन गुना ज्यादा है, जिससे दुश्मन के लिए इसे रोकना बेहद मुश्किल हो जाता है।

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ब्रह्मोस बेहद कम ऊंचाई पर उड़ते हुए दुश्मन के जहाज या सैन्य ठिकाने पर सटीक हमला कर सकती है। इसकी सटीकता और तेज गति ही इसे दूसरे मिसाइल सिस्टम से अलग बनाती है।

भारतीय सेना और नौसेना लंबे समय से इसका इस्तेमाल कर रही हैं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी ब्रह्मोस की मारक क्षमता चर्चा में रही थी। (Vietnam BrahMos Missile Deal)

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी मांग

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद ब्रह्मोस को लेकर दुनिया का भरोसा और बढ़ा। इस ऑपरेशन के दौरान भारतीय प्रिसिजन स्ट्राइक क्षमता ने कई देशों का ध्यान खींचा।

ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम ने बेहद सटीक तरीके से टारगेट्स को हिट किया और दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम पर भारी दबाव बनाया। इसके बाद कई देशों ने भारतीय रक्षा तकनीक में दिलचस्पी दिखानी शुरू कर दी। (Vietnam BrahMos Missile Deal)

चीन की बढ़ती चिंता

दक्षिण चीन सागर में चीन लंबे समय से अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है। वियतनाम, फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे देशों का चीन के साथ समुद्री विवाद भी है। ऐसे में इन देशों के पास ब्रह्मोस जैसी तेज एंटी-शिप मिसाइलों का पहुंचना चीन के लिए रणनीतिक चुनौती माना जा रहा है।

रक्षा विश्लेषकों के मुताबिक अगर दक्षिण चीन सागर के कई तटीय देशों के पास ब्रह्मोस तैनात हो जाती है तो चीन की समुद्री रणनीति पर दबाव बढ़ सकता है।

भारत भी इसे केवल रक्षा निर्यात नहीं बल्कि अपनी “एक्ट ईस्ट” नीति और क्षेत्रीय रणनीति के हिस्से के रूप में देख रहा है।

इंर्पोटर से एक्सपोर्टर बना भारत

दशकों तक भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश माना जाता था। लड़ाकू विमान, पनडुब्बियां और मिसाइल सिस्टम तक के लिए भारत दूसरे देशों पर निर्भर था। लेकिन अब स्थिति तेजी से बदल रही है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2024-25 में भारत का रक्षा निर्यात लगभग 2.76 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यह पिछले साल की तुलना में 12 प्रतिशत ज्यादा है।

सरकार का लक्ष्य 2030 तक रक्षा निर्यात को 50 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचाना है। वियतनाम और इंडोनेशिया जैसी डील्स इस लक्ष्य को हासिल करने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं।

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केवल दोस्त देशों को मिलती है ब्रह्मोस

ब्रह्मोस मिसाइल की बिक्री को लेकर एक खास शर्त भी है। क्योंकि यह भारत और रूस का संयुक्त प्रोजेक्ट है, इसलिए इसे केवल उन्हीं देशों को बेचा जा सकता है जो दोनों देशों के “फ्रेंडली फॉरेन कंट्री” माने जाते हों।

इसी वजह से हर देश को यह मिसाइल नहीं दी जाती। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने भी साफ कहा कि वियतनाम उन मित्र देशों में शामिल है जिनके साथ भारत ऐसी एडवांस टेक्नोलॉजी साझा करने को तैयार है। (Vietnam BrahMos Missile Deal)

मलेशिया और थाईलैंड भी संपर्क में

सूत्रों के मुताबिक मलेशिया और थाईलैंड भी ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने को लेकर भारत के साथ बातचीत कर रहे हैं। हालांकि अभी इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

अगर ये डील्स भी आगे बढ़ती हैं तो दक्षिण चीन सागर के आसपास कई देशों के पास भारतीय ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम मौजूद होगा। इससे भारत की रक्षा कूटनीति और मजबूत होती दिखाई दे रही है। (Vietnam BrahMos Missile Deal)

भारत की डिफेंस डिप्लोमेसी को मिली नई पहचान

ब्रह्मोस डील्स को भारत की नई डिफेंस डिप्लोमेसी का हिस्सा माना जा रहा है। भारत अब केवल सैन्य अभ्यास या राजनीतिक बातचीत तक सीमित नहीं है, बल्कि आधुनिक हथियारों और रक्षा तकनीक के जरिए भी अपने रणनीतिक संबंध मजबूत कर रहा है।

वियतनाम, इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे देशों के साथ बढ़ता रक्षा सहयोग यह दिखाता है कि एशिया में भारत की भूमिका लगातार मजबूत हो रही है। ब्रह्मोस अब केवल एक मिसाइल नहीं बल्कि भारत की सैन्य क्षमता, तकनीकी ताकत और रणनीतिक भरोसे का प्रतीक बनती जा रही है। (Vietnam BrahMos Missile Deal)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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