📍नई दिल्ली | 12 May, 2026, 6:07 PM
India ISR-ISTAR Doctrine: भारतीय सेना आने वाले समय के युद्धों के लिए अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करने जा रही है। सेना अब ऐसी जॉइंट डॉक्ट्रिन तैयार कर रही है, जिसमें थलसेना, नौसेना और वायुसेना एक साथ मिलकर दुश्मन पर तेजी से कार्रवाई कर सकें। इस नई रणनीति का सबसे अहम हिस्सा होगा- आईएसआर और टारगेटिंग सिस्टम। यानी दुश्मन की हर गतिविधि पर नजर रखना, सही समय पर जानकारी जुटाना और तुरंत हमला करना।
रक्षा सूत्रों के मुताबिक इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ यानी आईडीएस मुख्यालय ने दो नई जॉइंट डॉक्ट्रिन तैयार की हैं। इनमें पहली आईएसआर यानी इंटेलिजेंस, सर्विलांस एंड रिकॉनिसेंस से जुड़ी है, जबकि दूसरी टारगेटिंग से संबंधित है। माना जा रहा है कि अगले दो महीनों के भीतर इन्हें आधिकारिक रूप से जारी किया जा सकता है।
बता दें कि रक्षा समाचार ने सबसे पहले भारत की नई जॉइंट आईएसआर और टारगेटिंग डॉक्ट्रिन से जुड़ी यह एक्सक्लूसिव खबर प्रकाशित की थी। RakshaSamachar Exclusive Report
यह बदलाव ऐसे समय हो रहा है जब भारतीय सेना थिएटराइजेशन की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। इसका मकसद तीनों सेनाओं की ताकत को एक साथ जोड़कर युद्ध के दौरान तेजी से फैसला लेना और दुश्मन को ज्यादा नुकसान पहुंचाना है।
India ISR-ISTAR Doctrine: क्या है आईएसआर और यह इतना अहम क्यों
आईएसआर का मतलब है इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस। आसान शब्दों में समझें तो युद्ध के दौरान दुश्मन की हर गतिविधि पर नजर रखना, उसकी लोकेशन, हथियार, सैनिक मूवमेंट और संचार नेटवर्क की जानकारी जुटाना ही आईएसआर कहलाता है।
आज का युद्ध केवल बंदूक और टैंक का नहीं रह गया है। अब युद्ध में सैटेलाइट, ड्रोन, रडार, साइबर सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बड़ी भूमिका है। अगर किसी देश के पास दुश्मन की सही और रियल टाइम जानकारी नहीं होगी, तो उसके लिए सटीक हमला करना मुश्किल हो जाएगा।
नई डॉक्ट्रिन में सेना इन सभी सिस्टम्स को एक नेटवर्क में जोड़ना चाहती है। यानी जमीन, समुद्र, हवा, अंतरिक्ष और साइबर डोमेन से मिलने वाली जानकारी को एक साथ जोड़कर कमांडरों तक पहुंचाया जाएगा ताकि वे तुरंत फैसला ले सकें।
रक्षा अधिकारियों का कहना है कि मॉडर्न वॉरफेयर में डेटा सबसे बड़ी ताकत बन चुका है। जिसके पास बेहतर डेटा होगा, वही तेजी से हमला कर सकेगा।
लेकिन इसी बीच कई पूर्व सैन्य अधिकारियों ने केवल डॉक्ट्रिन बनाने से ज्यादा सिस्टम की वास्तविक कमियों पर सवाल उठाए हैं।
पूर्व रियर एडमिरल एमडी सुरेश ने उठाए गंभीर सवाल
भारतीय नौसेना के पूर्व रियर एडमिरल एमडी सुरेश ने आईएसआर सिस्टम की मौजूदा स्थिति पर गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि केवल नई डॉक्ट्रिन बना देने से समस्या हल नहीं होगी, जब तक सेना को समय पर आधुनिक आईएसआर प्लेटफॉर्म नहीं मिलते।
उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर समस्या डॉक्ट्रिन की कमी है या फिर आईएसआर सिस्टम्स की खरीद और उपलब्धता में लगातार हो रही देरी।
रियर एडमिरल सुरेश ने कहा कि भारत में कई महत्वपूर्ण सैन्य प्रोजेक्ट शुरुआत से ही बेहद लंबी समयसीमा के साथ चलते हैं। फिर बाद में उनमें लगातार देरी होती रहती है। उन्होंने कहा कि सिस्टम केवल लागत को लेकर चिंतित रहता है, लेकिन समय की कीमत को गंभीरता से नहीं लिया जाता।
उनके मुताबिक कई बार फाइनेंशियल एडवाइजर और अकाउंटिंग सिस्टम प्रक्रिया पूरी होने से संतुष्ट रहते हैं, लेकिन देरी की वजह से होने वाले रणनीतिक नुकसान पर कोई ध्यान नहीं देता।
उन्होंने साफ कहा कि अगर डेटा ही उपलब्ध नहीं होगा, तो डॉक्ट्रिन केवल किताबों तक सीमित रह जाएगी। युद्ध में असली ताकत रियल टाइम जानकारी से आती है।
उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि अगर सरकारी सिस्टम में देरी हो रही है तो प्राइवेट सेक्टर से आईएसआर सिस्टम खरीदने में भी संकोच नहीं होना चाहिए।
पूर्व नौसेना प्रमुख बोले- आईएसटीएआर की जरूरत
भारत के पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश ने भी इस मुद्दे पर कहा कि अब केवल आईएसआर पर नहीं, बल्कि आईएसटीएआर पर ध्यान देने की जरूरत है।
आईएसटीएआर का मतलब है इंटेलिजेंस, सर्विलांस, टारगेट एक्विजिशन एंड रिकॉनिसेंस। यानी केवल जानकारी जुटाना ही नहीं, बल्कि सही लक्ष्य की पहचान करके तुरंत हमला करने की क्षमता भी जरूरी है।
उन्होंने कहा कि अगर हथियारों की सटीकता कमजोर होगी, तो आधुनिक युद्ध में बढ़त हासिल करना मुश्किल हो जाएगा।
एडमिरल अरुण प्रकाश ने खास तौर पर भारत के नेविगेशन सिस्टम “नाविक” को लेकर चिंता जताई। उनका कहना था कि अगर नाविक सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन पूरी तरह काम नहीं कर रहा है और सेना को जीपीएस या ग्लोनास जैसे विदेशी सिस्टम्स पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जिससे हथियारों की सटीकता पर असर पड़ सकता है।
रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक आधुनिक मिसाइल और प्रिसिजन गाइडेड हथियारों में सीईपी यानी सर्कुलर एरर प्रोबेबलिटी बेहद महत्वपूर्ण होता है। इसका मतलब है कि मिसाइल टारगेट के कितने करीब जाकर गिरती है। अगर नेविगेशन सिस्टम कमजोर होगा तो हथियार टारगेट से भटक सकते हैं।
ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी जॉइंटनेस की जरूरत
भारतीय सेना में जॉइंटनेस यानी तीनों सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाने पर लंबे समय से काम चल रहा है। हाल के वर्षों में सेना ने कई जॉइंट डॉक्ट्रिन जारी की हैं। इनमें स्पेशल फोर्स ऑपरेशन, एयरबोर्न ऑपरेशन, हेलिबोर्न ऑपरेशन, मल्टी डोमेन ऑपरेशन और इंटीग्रेटेड कम्युनिकेशन आर्किटेक्चर शामिल हैं।
सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान के साथ हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी तीनों सेनाओं ने एक साथ काम किया था। उसी अनुभव के बाद आईएसआर और टारगेटिंग सिस्टम को और मजबूत करने पर जोर बढ़ा।
सेना का मानना है कि भविष्य के युद्ध में अलग-अलग सेनाओं का अकेले काम करना पर्याप्त नहीं होगा। अगर किसी लक्ष्य पर हमला करना है, तो यह तय होना चाहिए कि कौन सी सेना सबसे तेजी और सटीक तरीके से कार्रवाई कर सकती है।
नई टारगेटिंग डॉक्ट्रिन में टारगेट की पहचान होने के बाद थलसेना, वायुसेना या नौसेना में से जो सबसे बेहतर स्थिति में होगी, वही हमला करेगी। कई मामलों में दो सेनाएं मिलकर भी कार्रवाई कर सकेंगी।
नई सीडीएस टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती
नई जॉइंट डॉक्ट्रिन ऐसे समय लाई जा रही है, जब लेफ्टिनेंट जनरल एनएस राजा सुब्रमणि नए चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ यानी सीडीएस का पद संभालने जा रहे हैं। माना जा रहा है कि थिएटर कमांड्स को आगे बढ़ाने में उनकी अहम भूमिका होगी।
थिएटर कमांड का मतलब है कि किसी खास क्षेत्र में तीनों सेनाओं की ताकत एक कमांडर के अधीन काम करेगी। उदाहरण के तौर पर चीन सीमा के लिए अलग थिएटर कमांड, पाकिस्तान सीमा के लिए अलग और समुद्री क्षेत्र के लिए अलग कमांड बनाई जा सकती है।
सूत्रों के मुताबिक मौजूदा योजना के तहत लखनऊ में चीन केंद्रित नॉर्दर्न थिएटर कमांड, जयपुर में पाकिस्तान केंद्रित वेस्टर्न थिएटर कमांड और तिरुवनंतपुरम में मैरीटाइम थिएटर कमांड बनाने पर काम चल रहा है।
ड्रोन, सैटेलाइट और एआई होंगे युद्ध के नए हथियार
नई जॉइंट डॉक्ट्रिन में ड्रोन, सैटेलाइट, साइबर वॉरफेयर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बड़ी भूमिका तय की जा रही है। रक्षा अधिकारियों के मुताबिक भविष्य के युद्धों में केवल पारंपरिक हथियार पर्याप्त नहीं होंगे। युद्ध अब मल्टी डोमेन में लड़ा जाएगा। यानी जमीन, समुद्र, हवा, अंतरिक्ष और साइबर क्षेत्र एक साथ सक्रिय रहेंगे।
नई आईएसआर डॉक्ट्रिन में सेंसर फ्यूजन पर विशेष जोर दिया गया है। इसका मतलब है कि अलग-अलग प्लेटफॉर्म से मिलने वाले डेटा को जोड़कर एक साझा तस्वीर तैयार की जाएगी।
उदाहरण के तौर पर अगर किसी दुश्मन की गतिविधि को ड्रोन देखता है, रडार उसे ट्रैक करता है और सैटेलाइट उसकी लोकेशन कन्फर्म करता है, तो यह पूरी जानकारी तुरंत कमांड सेंटर तक पहुंचेगी।
इसके बाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम खतरे का विश्लेषण करेगा और कमांडर को संभावित कार्रवाई के विकल्प बताएगा। सेना का मानना है कि इससे फैसले लेने में लगने वाला समय काफी कम होगा।
भारतीय सेना लंबे समय से थिएटर कमांड मॉडल पर काम कर रही है। अमेरिका और चीन जैसे कई बड़े देशों में यह सिस्टम पहले से लागू है। अभी भारत में थलसेना, नौसेना और वायुसेना अलग-अलग कमांड स्ट्रक्चर में काम करती हैं। कई बार ऑपरेशन के दौरान तालमेल में समय लगता है।
थिएटर कमांड मॉडल में एक क्षेत्र के सभी सैन्य संसाधन एक ही कमांडर के अधीन होंगे। इससे संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सकेगा और दोहराव कम होगा। सरकार ने भी 2025 के लिए थिएटराइजेशन को प्रमुख रक्षा सुधारों में शामिल किया है। रक्षा मंत्रालय का मानना है कि इससे ऑपरेशनल एफिशिएंसी और कमांड एफेक्टिवनेस बढ़ेगी। वहीं, नई जॉइंट डॉक्ट्रिन इसी बड़े सैन्य बदलाव का हिस्सा मानी जा रही है। (India IISR-ISTAR Doctrine)
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रक्षा समाचार न्यूज डेस्क भारत की अग्रणी हिंदी रक्षा समाचार टीम है, जो Indian Army, Navy, Air Force, DRDO, रक्षा उपकरण, युद्ध रणनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी विश्वसनीय और विश्लेषणात्मक खबरें पेश करती है। हम लाते हैं सटीक, सरल और अपडेटेड Defence News in Hindi। हमारा उद्देश्य है – "हर खबर, देश की रक्षा से जुड़ी।"

