📍नई दिल्ली | 7 May, 2026, 10:44 AM
INS Baaz Expansion: हिंद महासागर में ग्रेट निकोबार द्वीप के कैंपबेल बे पर स्थित भारत के सबसे अहम स्ट्रेटेजिक फॉरवर्ड बेस में शामिल भारतीय नौसेना का आईएनएस बाज का विस्तार पिछले करीब पांच साल से मंजूरी का इंतजार कर रहा है। भारतीय नौसेना का दक्षिणी सबसे नौसैनिक एयर स्टेशन भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री रास्तों में शामिल मलक्का स्ट्रेट के बेहद करीब स्थित है।
भारतीय नौसेना यहां रनवे बढ़ाने और नई नौसैनिक जेटी बनाने की योजना पर काम कर रही है, लेकिन जमीन अधिग्रहण और मंजूरी से जुड़ी प्रक्रियाओं के कारण यह प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ पा रहा है। इसी बीच, इसी द्वीप के दूसरे हिस्से गलतिया बे में 81 हजार करोड़ रुपये की राशि से विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना पर तेजी से काम चल रहा है।
रक्षा और रणनीतिक मामलों से जुड़े विशेषज्ञ मानते हैं कि ग्रेट निकोबार सिर्फ एक द्वीप नहीं, बल्कि हिंद महासागर में भारत की “फॉरवर्ड पोस्ट” है। यही वजह है कि यहां सैन्य और आर्थिक दोनों तरह के इंफ्रास्ट्रक्चर को एक साथ डेवलप किया जा रहा है।
INS Baaz Expansion: क्या है आईएनएस बाज
आईएनएस बाज भारतीय नौसेना का सबसे दक्षिण में स्थित एयर स्टेशन है। यह ग्रेट निकोबार द्वीप के कैंपबेल बे इलाके में मौजूद है। इसे जुलाई 2012 में कमीशन किया गया था।
यह एयर स्टेशन मलक्का स्ट्रेट के मुहाने के पास स्थित है। यह सिक्स डिग्री चैनल और मलक्का स्ट्रेट के मुहाने से लगभग 130-150 नॉटिकल माइल या 240 किमी दूर है। यही वह समुद्री रास्ता है, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का व्यापारिक और रणनीतिक जहाजों का आवागमन होता है।
चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और कई अन्य देशों का तेल और व्यापार इसी रास्ते से गुजरता है। इसलिए इस इलाके पर नजर रखना भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
एक नौसैनिक अधिकारी ने कहा, “आईएनएस बाज हिंद महासागर में भारत की आंख की तरह काम करता है। यहां से गुजरने वाली गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जाती है।”
रनवे बढ़ाने की योजना क्यों जरूरी
अभी आईएनएस बाज का रनवे करीब 3000 फीट लंबा है। इस रनवे पर डोर्नियर 228 जैसे छोटे समुद्री निगरानी विमान और वायुसेना के सी-130जे सुपर हरक्यूलिस विमान सीमित क्षमता में ऑपरेट कर सकते हैं।
भारतीय नौसेना लंबे समय से इस रनवे को बढ़ाकर करीब 9000 से 10000 फीट तक करने की योजना बना रही है।
अगर रनवे बड़ा हो जाता है, तो बोइंग पी-8आई जैसे लंबी दूरी के समुद्री निगरानी विमान सीधे ग्रेट निकोबार से उड़ान भर सकेंगे। अभी इन विमानों को मुख्य भूमि भारत या पोर्ट ब्लेयर से ऑपरेट करना पड़ता है।
पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश ने कहा कि बहुत कम लोग इस बात का जिक्र करते हैं कि ग्रेट निकोबार द्वीप में 2016 से भारतीय नौसेना का एयर स्टेशन आईएनएस बाज मौजूद है। उन्होंने बताया कि कैंपबेल बे में मलक्का स्ट्रेट की तरफ एक बेहद अच्छा प्राकृतिक बंदरगाह भी है।
उनके मुताबिक, अंडमान और निकोबार कमांड कई वर्षों से यहां रनवे बढ़ाने और बंदरगाह को अपग्रेड करने की मांग कर रहा है, ताकि बड़े सैन्य विमान और बड़े नौसैनिक जहाज वहां तैनात किए जा सकें। लेकिन अब तक इस दिशा में कोई ठोस प्रगति नहीं हो सकी है।
रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, इससे हिंद महासागर में निगरानी क्षमता काफी मजबूत हो जाएगी। आईएनएस बाज अकेले पूरे क्षेत्र की जरूरतें पूरी नहीं कर सकता। एक एयर स्टेशन निगरानी तो कर सकता है, लेकिन बड़े ऑपरेशन के लिए बंदरगाह, ईंधन भंडारण, मरम्मत सुविधा, सैनिकों की तैनाती और रसद नेटवर्क भी जरूरी होते हैं। इसी वजह से पूरे अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह को धीरे-धीरे विकसित किया जा रहा है।
लड़ाकू विमानों की तैनाती भी हो सकेगी
रनवे विस्तार का एक बड़ा फायदा यह भी होगा कि यहां से लड़ाकू विमानों को ऑपरेट करना संभव हो सकेगा।
भारतीय नौसेना के पास मिग-29के जैसे मैरिटाइम फाइटर जेट हैं। वहीं भारतीय वायुसेना के सुखोई-30 एमकेआई और जगुआर विमान भी समुद्री मिशनों में इस्तेमाल किए जाते हैं।
अगर बड़ा रनवे तैयार हो जाता है, तो इन विमानों को भी जरूरत पड़ने पर ग्रेट निकोबार में तैनात किया जा सकेगा।
जेटी प्रोजेक्ट भी अटका
सिर्फ रनवे ही नहीं, बल्कि कैंपबेल बे में प्रस्तावित नौसैनिक जेटी का काम भी मंजूरी का इंतजार कर रहा है। इस जेटी का उद्देश्य नौसैनिक जहाजों को सपोर्ट देना, ईंधन और रसद उपलब्ध कराना और लंबे समय तक समुद्री ऑपरेशन को बनाए रखना है।
सूत्रों के अनुसार, जमीन और पर्यावरण से जुड़ी मंजूरियों के कारण इस परियोजना में देरी हो रही है।
दूसरी तरफ तेजी से चल रहा है मेगा प्रोजेक्ट
दिलचस्प बात यह है कि आईएनएस बाज से कुछ किलोमीटर दूर गलतिया बे में विशाल ग्रेट निकोबार इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पर काम तेजी से आगे बढ़ रहा है।
करीब 81 हजार करोड़ रुपये की इस परियोजना में इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, नया एयरपोर्ट, टाउनशिप और बिजली परियोजनाएं शामिल हैं।
इस परियोजना का मुख्य हिस्सा एक बड़ा ट्रांसशिपमेंट पोर्ट है, जिसे सिंगापुर और कोलंबो जैसे वैश्विक बंदरगाहों से मुकाबले के लिए तैयार किया जा रहा है।
नया एयरपोर्ट भी बन रहा
ग्रेट निकोबार परियोजना के तहत चिंगेन इलाके में एक नया ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट भी बनाया जा रहा है। करीब 8573 करोड़ रुपये की लागत वाले इस एयरपोर्ट प्रोजेक्ट को एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया संभाल रही है।
हालांकि इसे नागरिक उड्डयन के लिए बनाया जा रहा है, लेकिन जरूरत पड़ने पर इसका इस्तेमाल नौसेना और वायुसेना के विमान भी कर सकेंगे। इस तरह ग्रेट निकोबार में दो एयरफील्ड मौजूद होंगे, एक आईएनएस बाज और दूसरा नया एयरपोर्ट।
आखिर क्यों इतना अहम है ग्रेट निकोबार
ग्रेट निकोबार द्वीप बंगाल की खाड़ी और अंडमान सागर के बीच बेहद रणनीतिक स्थान पर स्थित है। यह इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप से करीब 150 किलोमीटर दूर है।
यह इलाका “सिक्स डिग्री चैनल” और मलक्का स्ट्रेट के बेहद करीब आता है। यही वजह है कि भारत यहां अपनी सैन्य मौजूदगी लगातार मजबूत करना चाहता है।
रक्षा मामलों के जानकार बताते हैं कि केवल निगरानी करना काफी नहीं होता। लंबे समय तक ऑपरेशन चलाने के लिए लॉजिस्टिक्स, एयरबेस, जेटी, ईंधन और सपोर्ट सिस्टम भी जरूरी होते हैं।
एक रणनीतिक विशेषज्ञ ने कहा, “आईएनएस बाज सिर्फ निगरानी का केंद्र नहीं है। इसे पूरी सैन्य क्षमता वाले फॉरवर्ड बेस में बदलने की कोशिश हो रही है।”
अंडमान-निकोबार कमांड की भूमिका
अंडमान और निकोबार कमांड भारत का एकमात्र ट्राई-सर्विस कमांड है, जहां सेना, नौसेना और वायुसेना एक साथ काम करती हैं।
इस कमांड के तहत पोर्ट ब्लेयर में आईएनएस जरावा, उत्तर अंडमान में आईएनएस कोहासा, कार निकोबार एयरबेस और ग्रेट निकोबार का आईएनएस बाज़ जैसे महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाने आते हैं।
इन सभी ठिकानों को मिलाकर भारत हिंद महासागर में अपनी निगरानी और प्रतिक्रिया क्षमता बनाए रखता है।
चीन पर नजर रखने में अहम भूमिका
मलक्का स्ट्रेट से चीन का 80% व्यापार और तेल सप्लाई गुजरता है। इसी वजह से चीन इस इलाके को लेकर हमेशा संवेदनशील रहता है।
भारत के लिए ग्रेट निकोबार ऐसा स्थान है, जहां से हिंद महासागर और दक्षिण-पूर्व एशिया की समुद्री गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है। यही कारण है कि भारत यहां सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि आर्थिक इंफ्रास्ट्रक्चर भी विकसित कर रहा है।

