📍नई दिल्ली | 11 May, 2026, 12:47 PM
Defence Procurement New Rules: रक्षा खरीद में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए रक्षा मंत्रालय ने बड़े बदलाव करते हुए नए संशोधित दिशानिर्देश जारी किए हैं। अब अगर कोई कंपनी भ्रष्टाचार, कॉन्ट्रैक्ट उल्लंघन, खराब गुणवत्ता, सप्लाई में देरी या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में दोषी पाई जाती है, तो उसे पांच से लेकर दस साल तक के लिए बैन किया जा सकता है। नए नियमों के तहत सिर्फ मुख्य कंपनी ही नहीं, बल्कि उससे जुड़ी सहयोगी कंपनियां, जॉइंट वेंचर और मर्जर के बाद बनी नई इकाइयां भी कार्रवाई के दायरे में आएंगी।
रक्षा मंत्रालय ने 27 अप्रैल को “एमेंडेड गाइडलाइंस ऑफ द मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस फॉर पेनल्टीज इन बिजनेस डीलिंग्स विद एंटिटीज” नाम का नया दस्तावेज जारी किया है। इसके साथ ही 21 नवंबर 2016 के पुराने नियमों को पूरी तरह खत्म कर दिया गया है। यह नया फ्रेमवर्क तुरंत प्रभाव से लागू हो चुका है।
रक्षा मंत्रालय का कहना है कि रक्षा खरीद में “जीरो टॉलरेंस” यानी भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के प्रति बिल्कुल भी नरमी नहीं बरती जाएगी। मंत्रालय ने यह भी साफ किया है कि अब केवल हथियार खरीदने पर ही फोकस नहीं होगा, बल्कि समय पर डिलीवरी, बेहतर परफॉर्मेंस और ऑपरेशनल रेडीनेस भी उतनी ही अहम होगी।
Defence Procurement New Rules: क्यों बदले गए पुराने नियम
रक्षा मंत्रालय ने अपने नए दस्तावेज में माना है कि 2016 के बाद डिफेंस प्रोक्योरमेंट का पूरा स्ट्रक्चर काफी बदल चुका है। अब सेना को हाई-टेक सिस्टम, एडवांस सेंसर, नेटवर्क-बेस्ड वारफेयर सिस्टम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और तेज सप्लाई चेन की जरूरत है। ऐसे में पुराने नियम काफी नहीं रह गए थे।
मंत्रालय ने कहा है कि नए दिशानिर्देशों का मकसद “हाइएस्ट स्टैंडर्ड्स ऑफ प्रॉप्रायटी, पब्लिक अकाउंटेबिलिटी, ट्रांसपेरेंसी और फेयर कॉम्पिटिशन” सुनिश्चित करना है। दस्तावेज में साफ लिखा गया है कि रक्षा खरीद केवल उन्हीं कंपनियों से की जाएगी, जिनका रिकॉर्ड साफ और विश्वसनीय हो।
“अंडर परफॉर्मेंस” प्रोडक्ट्स देना पड़ेगा भारी
पुराने नियमों में भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी पर कार्रवाई का प्रावधान तो था, लेकिन सप्लाई में देरी, खराब गुणवत्ता और तकनीकी परफॉर्मेंस को लेकर बहुत स्पष्ट व्यवस्था नहीं थी। नए नियमों में पहली बार सर्विसेबिलिटी, डाउनटाइम और फेलियर रेट जैसे तकनीकी मानकों को भी शामिल किया गया है।
अगर कोई कंपनी समय पर उपकरण नहीं देती, बार-बार तकनीकी खराबी आती है या सिस्टम लगातार फेल होता है, तो उसे “अंडर परफॉर्मेंस” माना जाएगा। ऐसी स्थिति में कंपनी पर पांच साल तक का प्रतिबंध लगाया जा सकता है।
रक्षा अधिकारियों का कहना है कि कई बार महंगे हथियार समय पर नहीं पहुंचते या लंबे समय तक खराब पड़े रहते हैं, जिससे सेना की ऑपरेशनल तैयारी प्रभावित होती है। नए नियम इसी समस्या को रोकने के लिए लाए गए हैं।
भ्रष्टाचार पर अधिकतम 10 साल तक बैन
नए नियमों के सेक्शन 4 में उन कारणों को विस्तार से बताया गया है, जिनके आधार पर कार्रवाई की जाएगी। इनमें इंटीग्रिटी पैक्ट का उल्लंघन, रिश्वत, गलत जानकारी देना, एजेंट कमीशन नियम तोड़ना, राष्ट्रीय सुरक्षा को नुकसान पहुंचाना, विदेशी अदालत में भ्रष्टाचार साबित होना और भारतीय कानूनों के तहत दोषी पाए जाना शामिल है।
ऐसे मामलों में शुरुआत में एक साल का प्रतिबंध लगाया जाएगा, जिसे हर साल रिव्यू के बाद बढ़ाया जा सकता है। कुल अवधि अधिकतम दस साल तक जा सकती है।
इससे पहले प्रतिबंध की अवधि को लेकर स्पष्ट समय सीमा नहीं थी। अब पहली बार अधिकतम सजा तय कर दी गई है।
सस्पेंशन और प्रतिबंध में क्या फर्क
नए दिशानिर्देशों में “सस्पेंशन” और “डिबारमेंट” को अलग-अलग तरीके से परिभाषित किया गया है। सस्पेंशन अस्थायी रोक है, जबकि डिबारमेंट लंबी अवधि का प्रतिबंध माना जाएगा।
अगर किसी कंपनी के खिलाफ सीबीआई या दूसरी एजेंसी जांच शुरू करती है, एफआईआर दर्ज होती है या चार्जशीट दायर होती है, तो विभागीय सचिव कंपनी को सस्पेंड कर सकते हैं। शुरुआत में यह सस्पेंशन छह महीने का होगा। जरूरत पड़ने पर इसे छह-छह महीने के लिए बढ़ाया जा सकता है। सामान्य तौर पर यह अवधि दो साल तक सीमित रहेगी।
सस्पेंशन के दौरान कंपनी नई टेंडर प्रक्रिया में हिस्सा नहीं ले पाएगी। अगर कोई कंपनी एल-1 यानी सबसे कम बोली लगाने वाली भी हो, तब भी उसे प्रक्रिया से बाहर किया जा सकता है।
सहयोगी कंपनियां भी नहीं बच पाएंगी
नए नियमों का सबसे बड़ा बदलाव यह माना जा रहा है कि अब केवल मुख्य कंपनी पर ही कार्रवाई नहीं होगी। अगर किसी डिबार्ड या सस्पेंड कंपनी की दूसरी सहयोगी फर्म, जॉइंट वेंचर, मर्जर यूनिट या नई बनाई गई यूनिट है, तो उस पर भी कार्रवाई लागू हो सकती है।
दस्तावेज में “एलाइड फर्म्स” की विस्तृत परिभाषा दी गई है। अगर किसी दूसरी कंपनी में समान मैनेजमेंट, समान शेयरहोल्डिंग या कंट्रोल मौजूद है, तो उसे भी उसी श्रेणी में रखा जाएगा।
रक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि पहले कई कंपनियां बैन से बचने के लिए नया नाम या नई यूनिट बनाकर फिर से टेंडर में हिस्सा ले लेती थीं। अब ऐसा करना मुश्किल होगा।
हेवी पेनल्टी का भी प्रावधान
नए दिशानिर्देशों में सिर्फ बैन ही नहीं, बल्कि भारी आर्थिक दंड का भी प्रावधान किया गया है। सेक्शन 13 के अनुसार, इंटीग्रिटी पैक्ट उल्लंघन की स्थिति में ईएमडी, परफॉर्मेंस बैंक गारंटी और एडिशनल बैंक गारंटी जब्त की जा सकती है।
अगर किसी कंपनी को पहले भुगतान किया जा चुका है, तो वह रकम ब्याज समेत वापस ली जा सकती है। ब्याज की दर एसबीआई बेस रेट से दो प्रतिशत ज्यादा या लिबोर प्लस दो प्रतिशत तक हो सकती है।
अगर एजेंट कमीशन या गिफ्ट से जुड़ा मामला सामने आता है, तो वह रकम भी वापस वसूली जाएगी।
30 दिन का शो-कॉज नोटिस अनिवार्य
नए नियमों में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत को भी शामिल किया गया है। अब किसी कंपनी पर सीधे कार्रवाई नहीं होगी। पहले उसे कारण बताओ नोटिस दिया जाएगा। कंपनी को जवाब देने के लिए 30 दिन का समय मिलेगा।
अगर कंपनी जवाब नहीं देती, तो विभाग एक्स-पार्टी कार्रवाई कर सकता है। लेकिन हर आदेश लिखित कारणों के साथ जारी करना होगा। इसे “स्पीकिंग ऑर्डर” कहा गया है। रक्षा मंत्रालय की विजिलेंस शाखा सस्पेंड और डिबार कंपनियों की सूची वेबसाइट पर अपडेट करेगी।
राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में विशेष छूट
हालांकि नियम सख्त किए गए हैं, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में सरकार ने लचीला रुख भी अपनाया है। अगर किसी वेपन सिस्टम का कोई दूसरा विकल्प नहीं है, तो सरकार विशेष अनुमति देकर उसी कंपनी से स्पेयर पार्ट्स, अपग्रेड या मेंटेनेंस का काम जारी रख सकती है।
इसके लिए सेना के वरिष्ठ अधिकारियों या डीआरडीओ के सक्षम अधिकारी का प्रमाणपत्र जरूरी होगा कि संबंधित उपकरण राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है।
यह प्रावधान खास तौर पर उन मामलों के लिए रखा गया है, जहां किसी विदेशी सिस्टम या विशेष तकनीक का विकल्प उपलब्ध नहीं होता।
कर्मचारियों और एजेंटों पर भी कार्रवाई
नए दिशानिर्देशों में केवल कंपनियों ही नहीं, बल्कि उनके कर्मचारियों और एजेंटों को भी दायरे में लाया गया है। अगर किसी एजेंट या कर्मचारी के खिलाफ भ्रष्टाचार या अनियमितता की जांच चल रही है, तो उसे रक्षा खरीद प्रक्रिया में हिस्सा लेने से रोका जा सकता है। अगर अदालत में दोष साबित हो जाता है, तो ऐसे व्यक्ति का नाम भी विजिलेंस वेबसाइट पर डाला जाएगा।
रक्षा उद्योग पर पड़ेगा क्या असर
रक्षा क्षेत्र से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि नए नियमों का असर छोटे और बड़े दोनों वेंडर्स पर पड़ेगा। अब केवल कम कीमत पर टेंडर जीतना काफी नहीं होगा। कंपनियों को समय पर सप्लाई, तकनीकी गुणवत्ता और बेहतर सर्विस सपोर्ट भी देना होगा।
एलएंडटी, टाटा, एचएएल, बीईएल, अदाणी डिफेंस जैसी बड़ी कंपनियों के लिए भी परफॉर्मेंस मॉनिटरिंग पहले से ज्यादा सख्त हो जाएगी। वहीं छोटे और मध्यम उद्योगों को भी कॉन्ट्रैक्ट शर्तों का पालन बेहद सावधानी से करना होगा।
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि नए नियमों के बाद कंपनियां मर्जर या एक्विजिशन से पहले ड्यू डिलिजेंस ज्यादा गंभीरता से करेंगी, क्योंकि अब पुरानी देनदारियां नई इकाइयों पर भी लागू हो सकती हैं।
पूरे रक्षा मंत्रालय पर लागू होंगे नियम
ये दिशानिर्देश रक्षा मंत्रालय के सभी विभागों पर लागू होंगे। इसमें डिपार्टमेंट ऑफ डिफेंस, डिपार्टमेंट ऑफ डिफेंस प्रोडक्शन, डीआरडीओ, डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स और रक्षा मंत्रालय के अधीन आने वाले सभी संगठन शामिल हैं।
दस्तावेज में साफ लिखा गया है कि ये नियम डीएपी, डीपीएम और रक्षा खरीद से जुड़े दूसरे नियमों का हिस्सा माने जाएंगे। रक्षा मंत्रालय ने इसे रक्षा खरीद प्रक्रिया में “पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिकता” मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम बताया है।
India Tightens Defence Procurement Rules, Up To 10-Year Ban For Corruption And Delayed Supply



