📍नई दिल्ली | 10 May, 2026, 5:14 PM
DRDO Hypersonic Scramjet Engine Test: भारत ने हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल टेक्नोलॉजी को लेकर बड़ी कामयाबी हासिल की है। डीआरडीओ ने एक्टिवली कूल्ड फुल स्केल स्क्रैमजेट कॉम्बस्टर का 1200 सेकंड से ज्यादा समय तक सफल ट्रायल किया है। यह टेस्ट डीआरडीओ की अत्याधुनिक “स्क्रैमजेट कनेक्ट पाइप टेस्ट फैसिलिटी” में किया गया। डीआरडीओ के मुताबिक यह ट्रायल करीब 20 मिनट तक चला, जो हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल टेक्नोलॉजी के लिए बेहद बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। इससे पहले डीआरडीओ ने इसी साल जनवरी में इसी सिस्टम का 700 सेकंड का टेस्ट किया था।
रक्षा मंत्रालय ने इसे भारत के हाइपरसोनिक मिसाइल कार्यक्रम में बड़ी कामयाबी बताया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने डीआरडीओ, इंडस्ट्री पार्टनर्स और वैज्ञानिकों को बधाई देते हुए कहा कि यह उपलब्धि भारत के हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम की मजबूत नींव बनेगी। आइए जानते हैं इस टेस्ट के बारे में…
DRDO Hypersonic Scramjet Engine Test: क्या होती है हाइपरसोनिक मिसाइल
हाइपरसोनिक मिसाइलें दुनिया की सबसे खतरनाक और तेज हथियारों में गिनी जाती हैं। ऐसी मिसाइलें ध्वनि की रफ्तार से पांच गुना या उससे ज्यादा रफ्तार से उड़ती हैं।
जहां ध्वनि की रफ्तार लगभग 1235 किलोमीटर प्रति घंटा मानी जाती है। वहीं, मैक-5 की स्पीड लगभग 6100 किलोमीटर प्रति घंटा होती है। कई हाइपरसोनिक सिस्टम मैक-10 से लेकर मैक-20 तक की रफ्तार हासिल कर सकते हैं।
इतनी तेज गति की वजह से इन्हें रोकना बेहद मुश्किल होता है। आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम भी ऐसी मिसाइलों को आसानी से इंटरसेप्ट नहीं कर पाते हैं।
जहां सामान्य बैलिस्टिक मिसाइलें तय रास्ते पर चलती हैं, लेकिन हाइपरसोनिक मिसाइलें उड़ान के दौरान दिशा बदल सकती हैं। यही वजह है कि रडार और मिसाइल डिफेंस सिस्टम के लिए इनको ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है।
दो तरह की होती हैं हाइपरसोनिक मिसाइलें
विशेषज्ञ हाइपरसोनिक हथियारों को मुख्य रूप से दो हिस्सों में बांटते हैं। पहली होती है हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल यानी एचजीवी। इसमें मिसाइल को पहले रॉकेट से ऊंचाई तक ले जाया जाता है और फिर वह ग्लाइड करते हुए टारगेट तक पहुंचती है।
India achieves major breakthrough in hypersonic missile tech 🇮🇳🚀
In a significant leap forward, Defence Research and Development Organisation successfully conducted a long-duration test of an Actively Cooled Full Scale Scramjet Combustor, marking a key milestone in hypersonic… pic.twitter.com/ZRDGXm1UZC
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) May 9, 2026
दूसरी होती है हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल यानी एचसीएम। यह स्क्रैमजेट इंजन की मदद से लगातार हाइपरसोनिक स्पीड पर उड़ सकती है। डीआरडीओ ने हाल ही में जो टेस्ट किया है वह हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल यानी एचसीएम का ही है।
क्या होता है स्क्रैमजेट इंजन
स्क्रैमजेट का पूरा नाम “सुपरसोनिक कंबशन रैमजेट” है। यह एक खास तरह का एयर ब्रीदिंग इंजन होता है। सामान्य जेट इंजन में टर्बाइन और कई घूमने वाले हिस्से होते हैं, लेकिन स्क्रैमजेट इंजन में ऐसा नहीं होता। इसमें हवा बहुत तेज रफ्तार से इंजन के अंदर जाती है और उसी दौरान ईंधन के साथ उसका कंबस्शन यानी दहन होता है।
यह तकनीक बेहद मुश्किल मानी जाती है क्योंकि हाइपरसोनिक स्पीड पर इंजन के अंदर आने वाली हवा का तापमान हजारों डिग्री तक पहुंच जाता है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक मैक-6 या उससे ज्यादा रफ्तार पर तापमान 2000 से 3000 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। इतनी गर्मी में आम मेटल भी पिघल सकता है।
यही वजह है कि स्क्रैमजेट इंजन को डेवलप करना दुनिया की सबसे कठिन डिफेंस टेक्नोलॉजी में गिना जाता है।
डीआरडीओ ने यह परीक्षण हैदराबाद स्थित “स्क्रैमजेट कनेक्ट पाइप टेस्ट फैसिलिटी” में किया। इस फैसिलिटी में जमीन पर ही ऐसी परिस्थितियां बनाई गईं, जैसी हाइपरसोनिक उड़ान के दौरान होती हैं। टेस्ट के दौरान इंजन को लगातार हाइपरसोनिक एयरफ्लो दिया गया और पूरे समय उसके तापमान, दहन, दबाव और एयरफ्लो की निगरानी की गई। वैज्ञानिकों के मुताबिक टेस्ट ने एक्टिव कूल्ड स्क्रैमजेट डिजाइन और टेस्ट फैसिलिटी दोनों को सफलतापूर्वक वैलिडेट किया।
सबसे बड़ी चुनौती थी इंजन को ठंडा रखना
डीआरडीओ के वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती इंजन के कॉम्बस्टर को सुरक्षित रखना होता है। कॉम्बस्टर वह हिस्सा होता है जहां हवा और ईंधन मिलकर जलते हैं। हाइपरसोनिक स्पीड पर यह हिस्सा बेहद गर्म हो जाता है।
लेकिन “एक्टिव कूलिंग” तकनीक के जरिए इसका हल निकाला जाता है।
डीआरडीओ ने ऐसा सिस्टम तैयार किया जिसमें ईंधन को पहले इंजन की दीवारों के आसपास घुमाया जाता है। इससे ईंधन गर्मी को सोख लेता है और इंजन ठंडा रहता है। उसके बाद वही ईंधन कंबस्शन के लिए इस्तेमाल होता है। वैज्ञानिकों ने इसके लिए स्वदेशी “लिक्विड हाइड्रोकार्बन एंडोथर्मिक फ्यूल” डेवलप किया है।
1200 सेकंड का टेस्ट क्यों है अहम
हाइपरसोनिक इंजन को कुछ सेकंड तक चलाना ही बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। लेकिन डीआरडीओ ने इसे 1200 सेकंड यानी 20 मिनट से ज्यादा समय तक सफलतापूर्वक चलाया। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इतना लंबा रन टाइम दिखाता है कि भारत अब लंबे समय तक उड़ान भरने वाली हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल विकसित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ चुका है।
वहीं, डीआरडीओ ने फुल स्केल यानी वास्तविक आकार के कॉम्बस्टर का परीक्षण किया। इसका मतलब है कि डीआरडीओ इस तकनीक में काफी आगे तक कदम बढ़ा चुका है।
भारत पिछले कई सालों से हाइपरसोनिक तकनीक पर काम कर रहा है। डीआरडीओ ने 2016 के आसपास “हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर व्हीकल” यानी एचएसटीडीवी प्रोग्राम शुरू किया था।
2020 में डीआरडीओ ने पहली बार मैक-6 स्पीड पर स्क्रैमजेट तकनीक का सफल प्रदर्शन किया था। उस समय यह टेस्ट कुछ सेकंड तक चला था। इसके बाद लगातार इंजन डिजाइन, एयरफ्लो कंट्रोल, थर्मल मैनेजमेंट और फ्यूल सिस्टम पर काम हुआ।
इस साल जनवरी में डीआरडीओ ने 700 सेकंड का लंबा परीक्षण किया। अब मई 2026 में यह अवधि बढ़कर 1200 सेकंड से ज्यादा हो गई है।
किन तकनीकों का हुआ इस्तेमाल
डीआरडीओ ने इस परीक्षण में कई अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया। वैज्ञानिकों ने हाई टेम्परेचर थर्मल बैरियर कोटिंग का उपयोग किया, जो इंजन को अत्यधिक गर्मी से बचाती है। इसके अलावा एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग तकनीकों और खास सुपर अलॉय मटेरियल का भी इस्तेमाल किया गया।
सूत्रों के मुताबिक कुछ हिस्सों में 3डी प्रिंटिंग आधारित निर्माण तकनीक भी इस्तेमाल की गई। यह पूरा सिस्टम डीआरडीओ की डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरेटरी ने डिजाइन किया जबकि कई भारतीय इंडस्ट्री पार्टनर्स ने इसके निर्माण में सहयोग दिया।
हाइपरसोनिक मिसाइलें बदल देंगी युद्ध का तरीका
दुनिया की बड़ी सैन्य ताकतें अब हाइपरसोनिक हथियारों पर तेजी से काम कर रही हैं। रूस के पास जिरकोन और अवांगार्ड जैसी हाइपरसोनिक मिसाइलें हैं। वहीं, चीन डीएफ-17 और दूसरे हाइपरसोनिक सिस्टम पर काम कर चुका है। जबकि अमेरिका भी एचएडब्ल्यूसी और एक्स-51 वेवराइडर जैसे प्रोग्राम चला रहा है।
हाइपरसोनिक मिसाइलों की सबसे बड़ी ताकत उनकी गति और मैन्यूवर करने की क्षमता है। ये मिसाइलें दुश्मन के एयर डिफेंस नेटवर्क को चकमा देकर बेहद कम समय में हमला कर सकती हैं। यही वजह है कि इन्हें भविष्य के युद्ध का अहम हथियार माना जा रहा है।
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इस तकनीक के सफल होने से भारत की स्ट्राइक क्षमता काफी मजबूत होगी। ऐसी मिसाइलें समुद्र, जमीन या हवा से लॉन्च की जा सकती हैं। इनका इस्तेमाल दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम, कमांड सेंटर, रडार स्टेशन और हाई वैल्यू टारगेट्स पर तेज हमला करने के लिए किया जा सकता है। इतनी तेज रफ्तार की वजह से दुश्मन को प्रतिक्रिया देने का समय बहुत कम मिलेगा।
डीआरडीओ के इस प्रोजेक्ट में कई इंडस्ट्री पार्टनर्स, निजी कंपनियां और शैक्षणिक संस्थानों ने भी सहयोग किया।
हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और कई निजी कंपनियों ने अलग-अलग तकनीकी हिस्सों पर काम किया। आईआईटी और आईआईएससी जैसे संस्थानों के वैज्ञानिक भी रिसर्च में शामिल रहे है।
डिफेंस गलियारों में इस टेस्ट को ब्रह्मोस-2 जैसी भविष्य की हाइपरसोनिक मिसाइल परियोजनाओं से भी जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि डीआरडीओ ने किसी विशेष मिसाइल का नाम नहीं लिया, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी लंबी अवधि का स्क्रैमजेट टेस्ट भविष्य की लंबी दूरी वाली हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइलों के लिए बेहद अहम कदम है। भारत पहले ही ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल के क्षेत्र में दुनिया के अग्रणी देशों में गिना जाता है। अब हाइपरसोनिक तकनीक को अगला बड़ा कदम माना जा रहा है।
DRDO Achieves Major Breakthrough In Hypersonic Missile Technology With 1200-Second Scramjet Test
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रक्षा समाचार न्यूज डेस्क भारत की अग्रणी हिंदी रक्षा समाचार टीम है, जो Indian Army, Navy, Air Force, DRDO, रक्षा उपकरण, युद्ध रणनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी विश्वसनीय और विश्लेषणात्मक खबरें पेश करती है। हम लाते हैं सटीक, सरल और अपडेटेड Defence News in Hindi। हमारा उद्देश्य है – "हर खबर, देश की रक्षा से जुड़ी।"

