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डीआरडीओ बना रहा 500 किमी तक ‘हैकप्रूफ’ कम्युनिकेशन नेटवर्क, दुश्मन के साइबर अटैक होंगे फेल

QKDN का पूरा नाम है क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन ओवर नेटवर्क। आसान भाषा में समझें तो यह एक ऐसी तकनीक है, जिसमें डेटा को सुरक्षित रखने के लिए क्वांटम फिजिक्स का इस्तेमाल किया जाता है...

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📍नई दिल्ली | 27 Apr, 2026, 11:50 AM

DRDO QKDN Technology: साइबर सिक्योरिटी और सुरक्षित कम्युनिकेशन को लेकर डीआरडीओ बड़ी तैयारी कर रहा है। डीआरडीओ ने क्वांटम टेक्नोलॉजी पर आधारित हैकप्रूफ कम्यूनिकेशन टेक्नोलॉजी को और विस्तृत रूप देने जा रहा है। डीआरडीओ ने 500 किमी तक हैक-प्रूफ कम्युनिकेशन के लिए “एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट” यानी ईओआई नोटिस जारी किया है। इसके तहत ‘क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन ओवर नेटवर्क’ (QKDN) सिस्टम बनाया जाएगा।

क्या है DRDO QKDN Technology?

QKDN का पूरा नाम है क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन ओवर नेटवर्क। आसान भाषा में समझें तो यह एक ऐसी तकनीक है, जिसमें डेटा को सुरक्षित रखने के लिए क्वांटम फिजिक्स का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें दो जगहों के बीच एक खास तरह की “की” यानी कोड भेजी जाता है, जो डेटा को एन्क्रिप्ट करती है।

इस तकनीक की सबसे बड़ी खूबी यह है कि अगर कोई तीसरा व्यक्ति इस कम्युनिकेशन को बीच में पकड़ने की कोशिश करता है, तो सिस्टम तुरंत पहचान लेता है कि कोई हैकिंग की कोशिश कर रहा है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि क्वांटम सिस्टम में सिग्नल को छूते ही उसकी स्थिति बदल जाती है। इसी वजह से इसे “अनहैकबल” या बेहद सुरक्षित कम्युनिकेशन माना जाता है।

QKDN सिस्टम कैसे करता है काम?

डीआरडीओ के नए प्रोजेक्ट में अब केवल दो पॉइंट के बीच नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क में क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम को जोड़ने की योजना है। इसका मतलब है कि स्टार, रिंग, हाइब्रिड और पॉइंट-टू-पॉइंट जैसे अलग-अलग नेटवर्क टोपोलॉजी में यह सिस्टम काम करेगा।

इस प्रोजेक्ट का टारगेट है कि लगभग 500 किलोमीटर तक की दूरी में सुरक्षित क्वांटम कम्युनिकेशन नेटवर्क बनाया जाए। इसके लिए क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन यूनिट्स और सॉफ्टवेयर डिफाइंड नेटवर्किंग (SDN) का इस्तेमाल किया जाएगा। एसडीएन एक ऐसा सिस्टम होता है, जिसमें नेटवर्क को सॉफ्टवेयर के जरिए कंट्रोल किया जाता है, जिससे उसे जरूरत के हिसाब से जल्दी बदला जा सके।

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स्वदेशी तकनीक पर फोकस

इस प्रोजेक्ट में COTS यानी कमर्शियल ऑफ द शेल्फ प्रोडक्ट्स का स्वदेशी वर्जन इस्तेमाल किया जाएगा। यानी भारत में ही बने हुए सिस्टम को नेटवर्क में लगाया जाएगा और उसे एसडीएन के साथ जोड़ा जाएगा।

डीआरडीओ की योजना है कि यह पूरा सिस्टम देश में ही डिजाइन और डेवलप हो, ताकि डिफेंस और अन्य महत्वपूर्ण सेक्टर के लिए पूरी तरह सुरक्षित और कंट्रोल्ड नेटवर्क तैयार किया जा सके।

इस प्रोजेक्ट के तहत करीब 500 किलोमीटर के नेटवर्क को कवर करने के लिए कई क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन यूनिट्स लगाई जाएंगी। इनमें डीपीएस क्यूकेडी (Differential Phase Shift) और सीओडब्ल्यू क्यूकेडी (Coherent One-Way) यूनिट्स शामिल होंगी, जो नेटवर्क में अलग-अलग जगहों पर लगाकर पूरे सिस्टम को सुरक्षित बनाएंगी। इसके साथ एसडीएन के जरूरी कंपोनेंट्स भी लगाए जाएंगे।

हालांकि डीआरडीओ ने साफ किया है कि ये संख्या और डिजाइन भविष्य में बदल भी सकते हैं, क्योंकि यह प्रोजेक्ट अभी शुरुआती चरण में है और आगे की जरूरतों के हिसाब से इसमें बदलाव किया जाएगा।

पहले भी हो चुके हैं सफल परीक्षण

भारत में क्वांटम कम्युनिकेशन पर काम नया नहीं है। पहले भी डीआरडीओ और आईआईटी दिल्ली ने मिलकर कई अहम टेस्ट किए हैं। साल 2022 में पहली बार प्रयागराज और विंध्याचल के बीच 100 किलोमीटर से ज्यादा दूरी पर क्वांटम कम्युनिकेशन लिंक बनाया गया था। यह देश का पहला इंटर-सिटी क्यूकेडी डेमो था, जिसमें टेलीकॉम ग्रेड ऑप्टिकल फाइबर का इस्तेमाल किया गया था।

इससे पहले 2020 में हैदराबाद में डीआरडीओ की दो लैब्स के बीच भी क्यूकेडी का शुरुआती टेस्ट किया गया था। इसके बाद 2024 में 100 किलोमीटर लंबी फाइबर लाइन पर क्वांटम की ट्रांसमिशन को सफलतापूर्वक दिखाया गया।

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फ्री-स्पेस क्वांटम कम्युनिकेशन में बड़ी उपलब्धि

पिछले साल 16 जून को डीआरडीओ और आईआईटी दिल्ली ने मिल कर बिना फाइबर की मदद के हवा के जरिए क्वांटम कम्युनिकेशन का डेमो किया गया था। इस प्रयोग में एक किलोमीटर से ज्यादा दूरी पर लेजर आधारित ऑप्टिकल लिंक के जरिए सुरक्षित की ट्रांसफर की गई।

इस दौरान सिक्योर की रेट करीब 240 बिट्स प्रति सेकंड रहा और एरर रेट 7 प्रतिशत से कम था, जो इस तरह के सिस्टम के लिए अच्छा माना जाता है। इस तरह का फ्री-स्पेस सिस्टम पहाड़ों और दूर-दराज के इलाकों में बेहद उपयोगी है, जहां फाइबर केवल बिछाना मुश्किल होता है।

क्यों जरूरी है यह तकनीक

आज के डिजिटल युग में जहां डेटा ही सबसे बड़ी ताकत है, उनमें ज्यादातर कम्युनिकेशन सिस्टम क्लासिकल एन्क्रिप्शन पर आधारित होते हैं। लेकिन जैसे-जैसे क्वांटम कंप्यूटर विकसित हो रहे हैं, वैसे-वैसे पुराने एन्क्रिप्शन सिस्टम को हैक करने का खतरा बढ़ रहा है। DRDO QKDN Technology भारत के सिक्योरिटी सिस्टम में एक क्रांतिकारी बदलाव लाने वाली है। क्योंकि  500 किमी तक बनने वाले इस हैक-प्रूफ कम्युनिकेशन नेटवर्क के तैयार होने से न केवल हमारी सैन्य सूचनाएं सुरक्षित होंगी, बल्कि दुश्मन के बड़े से बड़े साइबर अटैक भी पूरी तरह विफल हो जाएंगे।

ऐसे में क्यूकेडी और क्यूकेडीएन जैसी तकनीक भविष्य की जरूरत बनती जा रही है। इसका इस्तेमाल डिफेंस कम्युनिकेशन, बैंकिंग नेटवर्क, डेटा सेंटर, 5जी और 6जी नेटवर्क जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है, जहां डेटा की सुरक्षा सबसे ज्यादा जरूरी होती है। (DRDO QKDN Technology)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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