📍नई दिल्ली/कराची | 26 Apr, 2026, 12:51 PM
Pakistan NYT censorship: पाकिस्तान में मीडिया पर सेंसरशिप कितनी जबरदस्त है, इसका अंदाजा हाल ही में हुई एक घटना से लगाया जा सकता है। यह मामला अंतरराष्ट्रीय अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स से जुड़ा है। अखबार के मुताबिक पाकिस्तान में छपने वाले इसके इंटरनेशनल एडिशन से एक अहम खबर हटा दी गई। यह खबर पाकिस्तान के शिया समुदाय के गुस्से और उनके हालात से जुड़ी हुई थी। इस खबर से पाकिस्तान के हुक्मरान इतना घबरा गए कि उन्होंने इसे हटाने का फरमान जारी कर दिया। वहीं न्यूयॉर्क टाइम्स ने खबर हटा तो दी, लेकिन पहले पन्ने पर छपी खबर के स्पेस को खाली छोड़ दिया और एक नोट लिख दिया, “यह खबर पाकिस्तान में प्रिंट होने से पहले हटा दी गई है और इसमें अखबार के एडिटोरियल स्टाफ की कोई भूमिका नहीं है।”
Pakistan Media Censorship: न्यूयॉर्क टाइम्स की खबर क्यों हटाई गई?
इस खबर में पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के बीच पाकिस्तान के शिया समुदाय के गुस्से और उनकी आवाज को दिखाया गया था। लेकिन पाकिस्तान में इसे छापने की अनुमति नहीं दी गई। यह पहली बार नहीं है जब न्यूयॉर्क टाइम्स की खबर पाकिस्तान में रोकी गई हो। इससे पहले भी कुछ संवेदनशील विषयों पर खबरों को सेंसर किया जा चुका है।
NYT Report on Pakistan: क्या था ओरिजिनल आर्टिकल में?
इस खबर की हेडलाइन थी…ईरान युद्ध में मध्यस्थ की भूमिका, अल्पसंख्यक समुदाय के तेहरान से रिश्तों के कारण जटिल हुई…
इसे न्यूयॉर्क टाइम्स के रिपोर्टर जिया-उर-रहमान ने लिखा था। इस रिपोर्ट में बताया गया था कि पाकिस्तान एक तरफ अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन दूसरी तरफ देश के अंदर हालात संभालना मुश्किल हो रहा है।
पढ़ें ओरिजिनल खबर…
पाकिस्तान इस समय अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध खत्म कराने की बातचीत में एक अहम मध्यस्थ बन गया है, लेकिन उसके नेताओं के लिए देश के अंदर पैदा हो रहे असर को संभालना मुश्किल हो रहा है।
18 मार्च को, अमेरिका और ईरान के बीच मुख्य वार्ताकार की भूमिका निभाने वाले पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने कुछ दिन पहले पाकिस्तान के प्रमुख शिया धर्मगुरुओं को बैठक के लिए बुलाया था। दुनिया भर के कई शिया मुसलमान ईरान के सुप्रीम लीडर को अपना धार्मिक मार्गदर्शक मानते हैं, लेकिन उनकी हत्या की खबर के बाद पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में हालात बिगड़ गए। वहीं, इस बैठक को हिंसा फैलने की आशंका से रोकने की कोशिश के तौर पर देखा गया।
सेना के मीडिया विंग के अनुसार, फील्ड मार्शल ने धर्मगुरुओं से कहा, “किसी दूसरे देश में हुई घटना के आधार पर पाकिस्तान में हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी।”
बैठक में शामिल कुछ धर्मगुरुओं ने इसे तनावपूर्ण बताया और कहा कि उन्हें लगा जैसे पाकिस्तान ने उनकी वफादारी पर सवाल उठाया है। वहीं कुछ अन्य लोगों ने कहा कि सेना प्रमुख के बयान को गलत समझा गया और उन्होंने व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश के लिए उनकी सराहना की।
अयातुल्लाह खामेनेई के भाषण सुनकर बड़ी हुईं सैयदा फातिमा बटूल ने कहा कि उन्होंने भी लाखों अन्य शिया मुसलमानों की तरह उन्हें अपना धार्मिक और नैतिक मार्गदर्शक माना है।
इस बीच, पाकिस्तान की कूटनीति को जहां अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप और अन्य नेताओं से तारीफ मिली है, वहीं देश के लगभग 3.5 करोड़ शिया मुसलमानों के बीच असंतोष और बढ़ गया है। यह एक ऐसा अल्पसंख्यक समुदाय है, जो अक्सर आतंकी हिंसा का निशाना बनता रहा है।
ईरान में चल रहा युद्ध अब पाकिस्तान के अंदर एक बड़ा मुद्दा बन गया है। यह महंगाई और लंबे समय से चल रही बिजली कटौती के बाद दूसरा सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है। अधिकारियों को चिंता है कि इससे फिर से सांप्रदायिक हिंसा भड़क सकती है और पाकिस्तान की “शांतिदूत” की छवि को नुकसान पहुंच सकता है।
पाकिस्तान की लगभग 25 करोड़ की आबादी में शिया एक अल्पसंख्यक हैं, लेकिन इस युद्ध ने उनके बीच वफादारी और पहचान को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। कुछ लोग “विलायत अल-फकीह” नाम की विचारधारा को मानते हैं, जिसके तहत ईरान के सुप्रीम लीडर को शिया मुसलमानों पर धार्मिक और राजनीतिक अधिकार दिया जाता है।
30 वर्षीय शिया कार्यकर्ता सैयद अली ओवैस ने कहा, “हम पाकिस्तानी हैं।” उन्होंने 1 मार्च को कराची में हुए उस प्रदर्शन में हिस्सा लिया था, जिसमें प्रदर्शनकारियों ने अमेरिकी दूतावास पर धावा बोल दिया था और जिसमें 11 लोगों की मौत हो गई थी।
उन्होंने कहा, “लेकिन जब हमारे धार्मिक नेताओं पर हमला होता है, तो चुप रहना संभव नहीं है। और जब हम शोक मनाते हैं, तो हमें गोलियां मिलती हैं।” उन्होंने बताया कि उनके एक दोस्त सैयद अदील जैदी भी इस घटना में मारे गए।
कराची और देश के अन्य हिस्सों में शिया समुदाय के लोग रैलियों और निजी बैठकों में अयातुल्लाह अली खामेनेई के लिए शोक मना रहे हैं और उनके बेटे व उत्तराधिकारी मोजतबा खामेनेई के प्रति समर्थन जता रहे हैं। शिया धर्मगुरु इस संघर्ष को धार्मिक युद्ध के रूप में पेश कर रहे हैं और इसकी तुलना सातवीं सदी की करबला की लड़ाई से कर रहे हैं, जो शिया इतिहास की एक अहम घटना है।
25 साल की डॉक्टर सैयदा फातिमा बटूल ने बताया कि उनके बचपन से ही खामेनेई के भाषण सुनना उनकी जिंदगी का हिस्सा रहा है। उनके घर, आसपास की गलियों और पूजा स्थलों में उनकी तस्वीरें हमेशा लगी रहती थीं।
उन्होंने कहा, “वह भले ही ईरान के राष्ट्राध्यक्ष रहे हों, लेकिन मैंने, और लाखों अन्य शिया मुसलमानों ने, उन्हें अपना धार्मिक और नैतिक मार्गदर्शक चुना है।”
अमेरिकी दूतावास पर हुआ था हमला
जब ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत की खबर सामने आई, तो पाकिस्तान के कई हिस्सों में शिया समुदाय के बीच गुस्सा फैल गया और कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन हुए और हालात तनावपूर्ण हो गए थे।
कराची में प्रदर्शनकारियों ने अमेरिकी कॉन्सुलेट पर धावा बोल दिया था, जिसके बाद अमेरिकी मरीन ने गोलीबारी की और कम से कम 10 लोगों की मौत हो गई। इस्लामाबाद में डिप्लोमैटिक एन्क्लेव की ओर बढ़ रही भीड़ को रोकने के लिए पुलिस ने आंसू गैस का इस्तेमाल किया। स्कर्दू में प्रदर्शनकारियों ने संयुक्त राष्ट्र के एक दफ्तर में आग लगा दी। वहीं स्थानीय सूत्रों के अनुसार गिलगित-बाल्टिस्तान में भी कई लोगों की जान गई।
सूचना को रोकने पर उठे सवाल
इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि ईरान का युद्ध अब पाकिस्तान के अंदर एक बड़ा मुद्दा बन गया है। यह महंगाई और लंबे समय से चल रही बिजली कटौती के बाद दूसरा सबसे बड़ा घरेलू मुद्दा है। अधिकारियों को डर है कि इससे फिर से सांप्रदायिक हिंसा भड़क सकती है।
इस खबर को हटाए जाने के बाद पाकिस्तान के पत्रकारों और मीडिया से जुड़े लोगों ने इसकी आलोचना की। उनका कहना है कि जनता को ऐसी खबरों से दूर रखना सही नहीं है। कुछ पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर लिखा कि सरकार नहीं चाहती कि लोग शिया समुदाय के गुस्से और असली स्थिति को समझें।
पाकिस्तान के पत्रकार अलिफ्या सोहैल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि पाकिस्तान में छपे न्यूयॉर्क टाइम्स के पहले पेज को खाली छोड़ दिया गया, क्योंकि उसमें शिया समुदाय के नजरिए और सरकार की मध्यस्थता की कोशिशों पर रिपोर्ट थी। उन्होंने कहा कि सरकार नहीं चाहती कि लोग ऐसी खबर पढ़ें।
मुनीर ने कहा था धर्मगुरुओं से ईरान जाने के लिए
इससे पहले पिछले महीने रावलपिंडी में एक इफ्तार कार्यक्रम के दौरान पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने शिया धर्मगुरुओं से कहा था, “अगर आपको ईरान से इतना प्यार है, तो वहां चले जाओ।” इस बयान को लेकर काफी विवाद हुआ था।
पाकिस्तान में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शिया समुदाय रहता है, जो कुल आबादी का लगभग 15 प्रतिशत है।
शिया धर्म गुरुओं ने इस बयान को अपमानजनक बताते हुए इसे भड़काऊ बताया और आरोप लगाया कि पाकिस्तान की सेना अमेरिका और इजरायल के दबाव में काम कर रही है और देश के हितों के खिलाफ फैसले ले रही है।
शिया उलेमा काउंसिल के नेता अल्लामा सैयद सिब्तैन हैदर सब्जवारी ने भी जवाब देते हुए कहा कि अगर सेना प्रमुख को अमेरिका और इजरायल से इतना लगाव है, तो उन्हें पाकिस्तान छोड़ देना चाहिए।
मार्च में एक अन्य शिया धर्मगुरु शेख करामत हुसैन नजफी ने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और उनकी पार्टी से गाजा पीस बोर्ड से बाहर निकलने की मांग की थी। उनका आरोप था कि यह मंच बाहरी दबाव में बनाया गया है।
सेना प्रमुख का यह बयान उसी दिन आया था, जब पाकिस्तान ने खाड़ी क्षेत्र में ईरान की जवाबी कार्रवाई की आलोचना करने वाले अरब और इस्लामी देशों के समूह का समर्थन किया था।


