📍नई दिल्ली | 10 Jun, 2026, 4:05 PM
ECGNSS Jammer Indian Navy: भारतीय नौसेना की इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर क्षमता को मजबूत करने के लिए रक्षा मंत्रालय ने बेंगलुरु की भारतीय कंपनी एकॉर्ड सॉफ्टवेयर एंड सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड के साथ 449 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट किया है। इस समझौते के तहत भारतीय नौसेना के लिए 20 एन्हांस्ड कैपेबिलिटी ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (ECGNSS) जैमर खरीदे जाएंगे।
रक्षा मंत्रालय के अनुसार यह खरीद “बाय इंडियन-इंडिजिनसली डिजाइन्ड, डेवलप्ड एंड मैन्युफैक्चर्ड” कैटेगरी के तहत की गई है। इसका मतलब है कि इस सिस्टम का डिजाइन, विकास और निर्माण भारत में हुआ है और इसमें कम से कम 75 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है। नई दिल्ली में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की मौजूदगी में इस कॉन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर किए गए। (ECGNSS Jammer Indian Navy)
ECGNSS Jammer Indian Navy: क्या होता है जीएनएसएस?
आज दुनिया के लगभग हर आधुनिक मिलिट्री सिस्टम किसी न किसी सैटेलाइट बेस्ड नेविगेशन सिस्टम पर निर्भर हैं। जहाजों, पनडुब्बियों, लड़ाकू विमानों, ड्रोन, मिसाइलों और कई अन्य सैन्य उपकरणों को सही दिशा और स्थान की जानकारी सैटेलाइट से ही मिलती है। इसी को ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम यानी जीएनएसएस कहा जाता है।
अमेरिका का जीपीएस, रूस का ग्लोनास, यूरोप का गैलीलियो, चीन का बेइदौ और भारत का नाविक इसी कैटेगरी के सिस्टम हैं।
ये सैटेलाइट लगातार पृथ्वी पर सिग्नल भेजते रहते हैं। इन सिग्नलों की मदद से कोई भी रिसीवर अपनी सटीक स्थिति, दिशा और समय की जानकारी प्राप्त कर सकता है।
आधुनिक नौसैनिक युद्ध में इन सिग्नलों का महत्व बहुत अधिक है। बड़े युद्धपोतों से लेकर छोटे ड्रोन तक इन पर निर्भर रहते हैं।

जीएनएसएस की सबसे बड़ी कमजोरी
सैटेलाइट से आने वाले सिग्नल बहुत कमजोर होते हैं। यही वजह है कि दुश्मन इन्हें जाम करने की कोशिश करता है। यदि किसी युद्ध के दौरान दुश्मन किसी जहाज या मिसाइल को सही सैटेलाइट सिग्नल मिलने से रोक दे तो उसकी दिशा बदल सकती है या वह अपना टारगेट से भटक सकता है।
इसी कमजोरी को दूर करने और दुश्मन की इसी निर्भरता का फायदा उठाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक युद्ध सिस्टम डेवलप की जाती हैं। ईसीजीएनएसएस जैमर इसी कैटेगरी का अत्याधुनिक सिस्टम है। (ECGNSS Jammer Indian Navy)
🚨 Major Aatmanirbhar Bharat boost for Indian Navy 🇮🇳⚓
The Ministry of Defence has signed a ₹449 crore contract with Bengaluru-based Accord Software & Systems Pvt Ltd for the procurement of 20 Enhanced Capability Global Navigation Satellite System (ECGNSS) Jammers for the… pic.twitter.com/9Y90Fsm8Id— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) June 10, 2026
क्या करता है जैमर?
जैमर दुश्मन के सैटेलाइट आधारित नेविगेशन सिस्टम को काम करने से रोक देता है। जब दुश्मन का ड्रोन, मिसाइल या जहाज सैटेलाइट सिग्नल प्राप्त करने की कोशिश करता है, तब जैमर उससे कहीं अधिक शक्तिशाली सिग्नल भेजता है।
इस वजह से रिसीवर असली सिग्नल नहीं पकड़ पाता और उसकी नेविगेशन क्षमता प्रभावित हो जाती है। नतीजतन दुश्मन का सिस्टम अपनी सही स्थिति नहीं जान पाता और उसकी कार्यक्षमता कम हो जाती है। (ECGNSS Jammer Indian Navy)
क्या होती है स्पूफिंग?
आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध केवल सिग्नल रोकने तक सीमित नहीं है। आज कई देशों ने ऐसी तकनीक विकसित कर ली है जिसमें दुश्मन के सिस्टम को गलत जानकारी दी जाती है। इसे स्पूफिंग कहा जाता है। इस तकनीक में जैमर ऐसा नकली सिग्नल भेजता है जो बिल्कुल असली सैटेलाइट सिग्नल जैसा दिखाई देता है।
दुश्मन का रिसीवर उसे असली मान लेता है और गलत स्थान या दिशा की जानकारी प्राप्त करने लगता है। इसका परिणाम यह हो सकता है कि उसका ड्रोन गलत दिशा में चला जाएगा या मिसाइल टारगेट से भटक जाएगी या फिर उसका जहाज गलत रास्ते पर जाा सकता है। वहीं, एकॉर्ड सॉफ्टवेयर के नए सिस्टममें ऐसी क्षमताएं भी शामिल हैं।
नई प्रणाली को खास क्या बनाता है?
भारतीय नौसेना को मिलने वाले नए ईसीजीएनएसएस जैमर आम जैमर नहीं हैं। इनमें कई आधुनिक क्षमताएं शामिल की गई हैं। ये एक साथ कई सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम्स को प्रभावित कर सकते हैं। यानी केवल अमेरिकी जीपीएस ही नहीं बल्कि ग्लोनास, गैलीलियो, बेइदौ और भारतीय नाविक प्रणाली से जुड़े रिसीवरों पर भी प्रभाव डाल सकते हैं।
इसके अलावा इनमें डायरेक्शन बेस्ड एंटीना लगाए गए हैं, जिससे जरूरत पड़ने पर केवल दुश्मन के क्षेत्र में प्रभाव डाला जा सके और अपने प्लेटफॉर्म सुरक्षित रहें। ये सिस्टम रियल टाइम में स्थिति के अनुसार अपने काम करने के तरीके को भी बदल सकती है। (ECGNSS Jammer Indian Navy)
भारतीय नौसेना को इसकी जरूरत क्यों?
पिछले कुछ सालों में समुद्री सुरक्षा का माहौल तेजी से बदला है। हिंद महासागर क्षेत्र में कई देशों की नौसैनिक गतिविधियां बढ़ी हैं। आधुनिक युद्धपोत, ड्रोन, लंबी दूरी की मिसाइलें और मानव रहित प्लेटफॉर्म लगातार इस्तेमाल किए जा रहे हैं। ऐसे माहौल में केवल हथियार होना काफी नहीं है।
दुश्मन के कम्यूनिकेशन और नेविगेशन सिस्टम को प्रभावित करने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है।
भारतीय नौसेना के पास एयरक्राफ्ट कैरियर्स, डेस्ट्रॉयर्स, फ्रिगेट, पनडुब्बियां और नौसैनिक हेलीकॉप्टर हैं। इन सभी को सुरक्षित ऑपरेशन के लिए मजबूत इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा की जरूरत होती है। नए सिस्टम नौसेना को मल्टी-हेजार्ड एन्वायर्नमेंट में अधिक सुरक्षित तरीके से काम करने में मदद करेगी।
ड्रोन और मिसाइलों के खिलाफ इस्तेमाल
हाल के सालों में दुनिया भर के संघर्षों ने दिखाया है कि ड्रोन युद्ध का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों में हजारों ड्रोन इस्तेमाल किए गए हैं। इनमें से अधिकांश किसी न किसी प्रकार की सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम पर निर्भर रहते हैं। यदि उनका नेविगेशन ब्लॉक कर दिया जाए तो उनकी प्रभावशीलता काफी कम हो सकती है। नया भारतीय सिस्टम दुश्मन के ड्रोन और कुछ प्रकार की प्रिसिजन-गाइडेड वेपन सिस्टम्स को कन्फ्यूज करने में मदद कर सकता है। (ECGNSS Jammer Indian Navy)



