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सेवा के दौरान हुई बीमारी पर पूर्व सैनिक को मिलेगा पूरा पेंशन लाभ, हाईकोर्ट ने बढ़ाई दिव्यांगता पेंशन, केंद्र की याचिका खारिज

अदालत ने कहा कि केवल मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर सैनिक के अधिकारों को नहीं छीना जा सकता, खासकर तब जब रिपोर्ट में इस निष्कर्ष को साबित करने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद न हो...

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📍नई दिल्ली/चंडीगढ़ | 10 Jun, 2026, 6:08 PM

Ex Army Man Disability Pension: सेना के पूर्व जवानों के लिए एक महत्वपूर्ण फैसले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक पूर्व सैनिक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उसकी दिव्यांगता पेंशन (डिसेबिलिटी पेंशन) को बरकरार रखा है। अदालत ने केंद्र सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (एएफटी) के आदेश को चुनौती दी गई थी। एएफटी ने पूर्व सैनिक को दिव्यांगता पेंशन देने के साथ उसकी 30 प्रतिशत दिव्यांगता को बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक कर दिया था।

Ex Army Man Disability Pension: क्या था पूरा मामला?

मामला सुनील कुमार (बदला हुआ नाम) से जुड़ा है, जिन्होंने साल 2004 में भारतीय सेना जॉइन की थी। भर्ती के समय उसका पूरा मेडिकल परीक्षण किया गया था और उसे पूरी तरह स्वस्थ पाया गया था। मेडिकल रिकॉर्ड में किसी भी गंभीर बीमारी का उल्लेख नहीं था।

करीब 17 सालों तक सेना में सेवा देने के दौरान उसे “प्राइमरी हाइपरटेंशन” नामक बीमारी हो गई। इसमें व्यक्ति का रक्तचाप लगातार सामान्य स्तर से अधिक बना रहता है। समय के साथ यह हृदय, किडनी और शरीर के अन्य अंगों पर असर डाल सकती है।

वर्ष 2021 में जब सुनील कुमार सेना से रिटायर हुए, तब मेडिकल बोर्ड ने उसकी दिव्यांगता का आकलन 30 प्रतिशत किया। हालांकि मेडिकल बोर्ड ने यह भी कहा कि यह बीमारी न तो सैन्य सेवा के कारण हुई और न ही सैन्य सेवा से बढ़ी।

इसी आधार पर उसे दिव्यांगता पेंशन का पूरा लाभ नहीं दिया गया। इसके बाद सैनिक ने आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया।

एएफटी ने सैनिक के पक्ष में दिया फैसला

आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल ने मामले की सुनवाई के बाद कहा कि सैनिक भर्ती के समय पूरी तरह स्वस्थ था। यदि सेवा के दौरान उसे कोई बीमारी हुई है तो सामान्य रूप से यह माना जाएगा कि बीमारी का संबंध सैन्य सेवा से है, जब तक कि इसके विपरीत कोई ठोस प्रमाण पेश न किया जाए।

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एएफटी ने सैनिक को दिव्यांगता पेंशन देने का आदेश दिया। साथ ही 30 प्रतिशत दिव्यांगता को बढ़ाकर 50 प्रतिशत मानने का लाभ भी प्रदान किया। इसके बाद केंद्र सरकार ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

क्या कहा हाईकोर्ट?

न्यायमूर्ति हरसिमरन सिंह सेठी और न्यायमूर्ति दीपक मंचंदा की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि जब सैनिक भर्ती के समय पूरी तरह फिट पाया गया था और सेवा के दौरान उसे “प्राइमरी हाइपरटेंशन” हुआ, तो इस बीमारी को सैन्य सेवा से जुड़ा माना जाएगा।

अदालत ने कहा कि केवल मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर सैनिक के अधिकारों को नहीं छीना जा सकता, खासकर तब जब रिपोर्ट में इस निष्कर्ष को साबित करने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद न हो।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि सैनिक को दिव्यांगता पेंशन का लाभ मिलना चाहिए और उसकी 30 प्रतिशत दिव्यांगता को 50 प्रतिशत मानकर भुगतान किया जाना चाहिए।

अदालत ने पुराने फैसलों का भी दिया हवाला

सुनवाई के दौरान अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख किया। कोर्ट ने “धरमवीर सिंह बनाम भारत संघ” मामले का हवाला देते हुए कहा कि यदि कोई सैनिक भर्ती के समय स्वस्थ पाया गया हो और बाद में सेवा के दौरान किसी बीमारी का शिकार हो जाए, तो सामान्य धारणा यही होगी कि बीमारी सैन्य सेवा के दौरान हुई या सैन्य सेवा के कारण बढ़ी।

अदालत ने यह भी कहा कि यह सिद्धांत 1982 के “एंटाइटलमेंट रूल्स फॉर कैजुअल्टी पेंशनरी अवार्ड्स” के नियम 5 और 9 से भी समर्थित है। इन नियमों के तहत संदेह की स्थिति में लाभ सैनिक के पक्ष में दिया जाता है।

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30 प्रतिशत से 50 प्रतिशत पेंशन क्यों?

मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू दिव्यांगता प्रतिशत को बढ़ाकर 50 प्रतिशत मानना था। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के “राम अवतार बनाम भारत संघ” फैसले का हवाला दिया। इस फैसले में कहा गया था कि यदि किसी सैनिक की दिव्यांगता सैन्य सेवा से जुड़ी पाई जाती है तो उसे “राउंडिंग ऑफ” का लाभ मिलेगा।

इसका मतलब यह है कि यदि दिव्यांगता 20 से 49 प्रतिशत के बीच है तो उसे 50 प्रतिशत माना जाएगा। इसी नियम के तहत इस सैनिक की 30 प्रतिशत दिव्यांगता को बढ़ाकर 50 प्रतिशत माना गया।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस कानूनी स्थिति को लेकर अब कोई विवाद नहीं है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही इस विषय पर स्पष्ट फैसला दे चुका है।

प्राइमरी हाइपरटेंशन क्या है?

मेडिकल विशेषज्ञों के मुताबिक प्राइमरी हाइपरटेंशन उच्च रक्तचाप की सबसे सामान्य श्रेणी है। कई बार इसका कोई एक निश्चित कारण नहीं मिलता। सेना जैसे पेशे में लंबे समय तक तनावपूर्ण परिस्थितियों में काम करना, कठिन मौसम, लगातार तैनाती, शारीरिक दबाव और जिम्मेदारियां स्वास्थ्य पर प्रभाव डाल सकती हैं।

इसी कारण सैन्य सेवा से जुड़े कई मामलों में अदालतें इस बात पर जोर देती रही हैं कि यदि कोई बीमारी सेवा के दौरान सामने आई है तो उसे सीधे तौर पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

पूर्व सैनिकों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

देश में बड़ी संख्या में पूर्व सैनिक ऐसे हैं जो सेवा के दौरान विभिन्न बीमारियों और स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करते हैं। कई मामलों में मेडिकल बोर्ड बीमारी को सैन्य सेवा से असंबंधित बताता है, जिसके कारण दिव्यांगता पेंशन को लेकर विवाद खड़े हो जाते हैं।

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यह फैसला ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण संदर्भ बनेगा जहां सैनिक भर्ती के समय पूरी तरह स्वस्थ था लेकिन सेवा के दौरान बीमारी विकसित हुई।

अदालत ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि सैन्य सेवा के दौरान उत्पन्न हुई बीमारी के मामलों में सैनिकों को संदेह का लाभ मिलना चाहिए।

दिव्यांगता पेंशन कैसे काम करती है?

भारतीय सेनाओंमें दिव्यांगता पेंशन उन सैनिकों को दी जाती है जो सेवा के दौरान घायल हो जाते हैं या किसी बीमारी से प्रभावित होते हैं और जिसकी वजह से उनकी कार्य क्षमता प्रभावित होती है।

दिव्यांगता का प्रतिशत मेडिकल बोर्ड तय करता है। इसी आधार पर पेंशन की राशि निर्धारित होती है।

राउंडिंग ऑफ का नियम लागू होने के बाद कई सैनिकों को वास्तविक दिव्यांगता प्रतिशत से अधिक लाभ मिलता है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर रहती है।

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