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15 साल पुराने केस में AFT का बड़ा फैसला, कर्नल को 18 आरोपों से किया बरी, सेना की कार्रवाई पर उठाए सवाल

कर्नल नवराज सिंह ग्रेवाल को अक्टूबर 2008 में एक इन्फैंट्री बटालियन का कमांडिंग ऑफिसर बनाया गया था। सितंबर 2010 में उनके खिलाफ कई शिकायतें सामने आईं, जिनमें महिलाओं के साथ कथित अनुचित व्यवहार और प्रोफेशनल कंडक्ट से जुड़े आरोप भी शामिल थे...

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📍नई दिल्ली | 10 Jul, 2026, 12:29 PM

AFT Colonel Dismissal Case: आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (एएफटी) ने भारतीय सेना के एक कर्नल की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए कहा है कि उनके खिलाफ चलाई गई अनुशासनात्मक कार्रवाई “कलरेबल” और “मालाफाइड” (दुर्भावनापूर्ण) थी। एएफटी ने अपने आदेश में कहा कि मामले में हुई लंबी देरी का कोई उचित कारण रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं है और इससे यह संकेत मिलता है कि प्रशासनिक शक्तियों का इस्तेमाल सही उद्देश्य से नहीं किया गया।

हालांकि ट्रिब्यूनल ने अधिकारी की दोबारा सेवा में बहाली का आदेश नहीं दिया, क्योंकि वह अब कर्नल के पद पर रिटायरमेंट की उम्र पार कर चुके हैं। इसके बजाय ट्रिब्यूनल ने कहा कि उन्हें “डिसमिस” नहीं बल्कि “रिमूव फ्रॉम सर्विस” माना जाएगा। इसके चलते उन्हें अपनी पूरी सेवा अवधि के आधार पर पेंशन और अन्य रिटायरमेंट संबंधी लाभ मिलेंगे।

AFT Colonel Dismissal Case: क्या था पूरा मामला

यह मामला करीब 15 साल पुराना है। कर्नल नवराज सिंह ग्रेवाल को अक्टूबर 2008 में एक इन्फैंट्री बटालियन का कमांडिंग ऑफिसर बनाया गया था। सितंबर 2010 में उनके खिलाफ कई शिकायतें सामने आईं, जिनमें महिलाओं के साथ कथित अनुचित व्यवहार और प्रोफेशनल कंडक्ट से जुड़े आरोप भी शामिल थे। कुल 18 आरोपों के आधार पर कोर्ट ऑफ इंक्वायरी का आदेश दिया गया।

मार्च 2011 में कोर्ट ऑफ इंक्वायरी पूरी हुई। इसके बाद समरी ऑफ एविडेंस यानी एसओई की प्रक्रिया शुरू हुई, जो मई 2011 में पूरी हो गई। सेना में किसी जनरल कोर्ट मार्शल से पहले यह एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रक्रिया होती है, जिसमें उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयानों को दर्ज किया जाता है।

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अधिकारी ने खुद मांगी थी जल्द सुनवाई

एएफटी के आदेश के अनुसार, एसओई पूरी होने के बाद कर्नल ग्रेवाल ने 28 जुलाई 2011 को लिखित रूप से अनुरोध किया था कि मामले का जल्द निपटारा किया जाए। उन्होंने यह भी कहा था कि जिन गवाहों ने उनके खिलाफ बयान दिए हैं, उन्हें संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन के लिए कांगो न भेजा जाए, क्योंकि इससे सुनवाई में देरी होगी।

उस समय सभी जरूरी गवाह भारत में मौजूद थे। इसके बावजूद प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी। दिसंबर 2011 में वेस्टर्न कमांड ने उन्हें जानकारी दी कि जनरल कोर्ट मार्शल जनवरी 2012 में शुरू हो सकता है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

दो साल से ज्यादा की देरी पर उठे सवाल

बटालियन अक्टूबर 2012 में कांगो से वापस लौट आई, लेकिन उसके बाद भी कोर्ट मार्शल शुरू नहीं किया गया। आखिरकार जनवरी 2014 में जनरल कोर्ट मार्शल की कार्रवाई शुरू हुई।

इस दौरान अधिकारी ने अदालत के सामने यह आपत्ति उठाई कि निर्धारित समय सीमा बीत जाने के कारण कोर्ट मार्शल अब कानूनन नहीं चलाया जा सकता। इस दलील को स्वीकार कर लिया गया और जुलाई 2014 में इसकी पुष्टि भी हो गई। यानी मामला समय सीमा समाप्त होने के कारण आगे नहीं बढ़ सका।

फिर अपनाया गया प्रशासनिक रास्ता

कोर्ट मार्शल की समय सीमा खत्म होने के करीब एक साल बाद सेना ने कर्नल ग्रेवाल को कारण बताओ नोटिस जारी किया। इसके बाद नवंबर 2017 में सेना अधिनियम की धारा 19 और आर्मी रूल 14 के तहत उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। इस कार्रवाई के साथ उनकी पेंशन और ग्रेच्युटी भी रोक दी गई। इसी आदेश को उन्होंने आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल में चुनौती दी थी।

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एएफटी ने क्यों माना कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण

ट्रिब्यूनल ने अपने 8 जुलाई को दिए आदेश में कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस कारण नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि कोर्ट मार्शल बुलाने में हुई देरी उचित थी। ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा कि एसओई पूरी होने के बाद अधिकारी ने खुद जल्द सुनवाई की मांग की थी, लेकिन संबंधित अधिकारियों ने समय पर कार्रवाई नहीं की।

एएफटी ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि मौजूदा रिकॉर्ड से यह संकेत मिलता है कि एसओई में ऐसा कोई मजबूत आधार नहीं था, जिससे कोर्ट मार्शल में अधिकारी के खिलाफ प्रतिकूल फैसला आने की संभावना दिखाई देती। इसके बावजूद कार्रवाई को लंबा खींचा गया और जब कोर्ट मार्शल समय सीमा के कारण संभव नहीं रहा, तब प्रशासनिक अधिकारों का इस्तेमाल कर बर्खास्तगी का आदेश जारी किया गया।

इसी आधार पर ट्रिब्यूनल ने इसे प्रशासनिक शक्ति का “कलरेबल एक्सरसाइज” और “मालाफाइड” कार्रवाई माना।

अधिकारी के वकील ने क्या दलील दी

अधिकारी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव आनंद ने ट्रिब्यूनल में कहा कि यदि किसी मामले में कोर्ट मार्शल समय सीमा के कारण नहीं हो पाता, तो कुछ परिस्थितियों में प्रशासनिक कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन यदि यह साबित हो जाए कि देरी अधिकारियों की वजह से हुई और वह जानबूझकर की गई थी, तो बाद में प्रशासनिक कार्रवाई करना कानून के दायरे से बाहर माना जाएगा। एएफटी ने इस कानूनी तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि इस मामले में देरी के पीछे कोई उचित कारण रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं है।

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एएफटी ने रद्द की बर्खास्तगी

ट्रिब्यूनल ने 27 नवंबर 2017 का बर्खास्तगी आदेश रद्द कर दिया। हालांकि अधिकारी अब सेवा में वापस नहीं लौट सकते क्योंकि वह सेवानिवृत्ति की आयु पार कर चुके हैं। इसलिए एएफटी ने निर्देश दिया कि उन्हें चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ द्वारा सेवा से “रिमूव” माना जाए, न कि “डिसमिस”। इस आदेश के बाद उन्हें अपनी पूरी सेवा अवधि के आधार पर पेंशन और अन्य सभी पेंशन संबंधी लाभ दिए जाएंगे।

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