📍नई दिल्ली | 10 Jul, 2026, 4:38 PM
DRDO S-Band Tracking Radar: देश की मिसाइल परीक्षण क्षमता को और मजबूत करने के लिए डीआरडीओ नए एस-बैंड इंस्ट्रूमेंटेशन ट्रैकिंग रडार को डेवलप करने की तैयारी कर रहा है। चांदीपुर स्थित डीआरडीओ के इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज (आईटीआर) ने इस अत्याधुनिक रडार सिस्टम के प्रोक्योरमेंट और डेवलपमेंट के लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) जारी किया है। यह रडार मिसाइल, रॉकेट, लड़ाकू विमान और अन्य एरियल टारगेट्स की सटीक ट्रैकिंग करने में मदद करेगा। इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से बैलिस्टिक मिसाइल, एयर डिफेंस सिस्टम और अन्य उड़ान परीक्षणों के दौरान किया जाएगा।
DRDO S-Band Tracking Radar: क्या होता है एस-बैंड इंस्ट्रूमेंटेशन ट्रैकिंग रडार
सामान्य निगरानी रडार और इंस्ट्रूमेंटेशन ट्रैकिंग रडार में बड़ा अंतर होता है। सामान्य रडार का उद्देश्य एरियल टारगेट्स की खोज और निगरानी करना होता है, जबकि इंस्ट्रूमेंटेशन ट्रैकिंग रडार का काम परीक्षण के दौरान किसी मिसाइल या हवाई प्लेटफॉर्म की हर गतिविधि को बेहद सटीक तरीके से रिकॉर्ड करना होता है।
यह रडार दो अलग-अलग तरीकों से टारगेट को ट्रैक करेगा। पहला स्किन मोड, जिसमें टारगेट से वापस आने वाली रडार तरंगों के आधार पर उसकी स्थिति पता लगाई जाती है। दूसरा बीकन या ट्रांसपोंडर मोड, जिसमें मिसाइल या परीक्षण प्लेटफॉर्म पर लगे विशेष ट्रांसपोंडर से मिलने वाले संकेतों के आधार पर ट्रैकिंग की जाती है। इससे लंबी दूरी और अधिक ऊंचाई पर उड़ रहे टारगेटों की भी सटीक निगरानी संभव होती है। (DRDO S-Band Tracking Radar)
एक्टिव फेज्ड एरे तकनीक पर आधारित होगा सिस्टम
सूत्रों के अनुसार नया रडार सॉलिड स्टेट एक्टिव फेज्ड एरे तकनीक पर आधारित होगा। यह रडार एस-बैंड (2900 मेगाहर्ट्ज से 3300 मेगाहर्ट्ज) फ्रीक्वेंसी पर काम करेगा। इसमें पारंपरिक घूमने वाले एंटीना की जगह हजारों छोटे ट्रांसमिट और रिसीव मॉड्यूल लगे होंगे, जो इलेक्ट्रॉनिक तरीके से बीम को अलग-अलग दिशाओं में भेज सकेंगे।
इसके साथ डिजिटल बीम फॉर्मिंग तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। इससे एक ही समय में कई टारगेटों पर नजर रखना आसान होगा और ट्रैकिंग की सटीकता भी बढ़ेगी। (DRDO S-Band Tracking Radar)
250 किलोमीटर से अधिक दूरी तक करेगा ट्रैक
आरएफपी के अनुसार यह रडार कम से कम 250 किलोमीटर दूरी पर मौजूद लगभग 2 वर्ग मीटर रडार क्रॉस सेक्शन वाले टारगेट्स को स्किन मोड में ट्रैक करने में सक्षम होगा। इसकी न्यूनतम डिटेक्शन रेंज लगभग 3 किलोमीटर रखी गई है। यानी बहुत पास और काफी दूर दोनों तरह के लक्ष्यों की निगरानी की जा सकेगी।
यह सिस्टम कम रडार क्रॉस सेक्शन वाले टारगेटों, क्रूज मिसाइलों, सामरिक मिसाइलों, लड़ाकू विमानों, मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों और लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल के बूस्ट चरण तक की निगरानी कर सकेगी।
अलग-अलग तरह के टारगेटों पर रख सकेगा नजर
इस रडार को इस तरह तैयार किया जा रहा है कि एक ही सिस्टम से कई तरह के एरियल प्लेटफॉर्म को ट्रैक किया जा सके। इसमें लड़ाकू विमान, क्रूज मिसाइल, सामरिक मिसाइल, रॉकेट बूस्टर, मिसाइल के अलग होने वाले चरण और बैलिस्टिक मिसाइल पेलोड शामिल हैं।
सूत्रों का कहना है कि अलग-अलग कैटेगरी के टारगेट्स के लिए इसमें हाई और लो रेंज रिजॉल्यूशन मोड भी उपलब्ध होंगे, जिससे छोटी और बड़ी दोनों तरह की वस्तुओं की ट्रैकिंग अधिक सटीक हो सकेगी। (DRDO S-Band Tracking Radar)
चार डाइमेंशन में होगी ट्रैकिंग
यह नया सिस्टम केवल टारगेट की दूरी ही नहीं बताएगा, बल्कि चार महत्वपूर्ण जानकारियां एक साथ उपलब्ध कराएगा। इनमें टारगेट की दूरी, दिशा (एजिमुथ), ऊंचाई (एलिवेशन) और उसकी रफ्तार (डॉप्लर) शामिल होगी। हर माप के साथ समय की जानकारी भी रिकॉर्ड होगी, जिससे पूरी उड़ान का विश्लेषण किया जा सकेगा।
दस्तावेज के अनुसार इसकी दूरी मापने की सटीकता लगभग 20 मीटर के भीतर होगी। वहीं डॉप्लर आधारित गति मापने की सटीकता लगभग 4 मीटर प्रति सेकंड तक रखी गई है।
रडार जरूरत के अनुसार हाई और लो दोनों प्रकार के रेंज रिजॉल्यूशन मोड में काम करेगा। हाई रिजॉल्यूशन में लगभग 75 मीटर और लो रिजॉल्यूशन में लगभग 200 मीटर तक की दूरी का अंतर स्पष्ट पहचान सकेगा।
तेजी से बदलती दिशा में भी करेगा काम
रडार इलेक्ट्रॉनिक तरीके से लगभग 50 डिग्री तक दाएं-बाएं और 70 डिग्री तक ऊंचाई की दिशा में बिना एंटीना घुमाए बीम भेज सकेगा। एंटीना को अलग-अलग जरूरत के अनुसार झुकाया भी जा सकेगा। सामान्य ऑपरेशन के लिए इसे 12 डिग्री पर रखा जाएगा। बहुत ऊंचाई और अधिक गति वाले टारगेट्स के लिए इसे 40 डिग्री तक झुकाया जा सकेगा। रखरखाव के समय इसे 0 डिग्री और परिवहन के दौरान 90 डिग्री की स्थिति में रखा जा सकेगा।
यह सिस्टम बहुत तेज रफ्तार से उड़ने वाले टारगेट्स की भी निगरानी कर सकेगी। आरएफपी के अनुसार इसकी डॉप्लर क्षमता 2500 मीटर प्रति सेकंड से अधिक होगी।
परीक्षण के दौरान यदि मिसाइल बहुत तेज गति से दिशा बदलती है या ऊंचाई तेजी से बढ़ती है, तब भी यह प्रणाली लगातार ट्रैक बनाए रख सकेगी। (DRDO S-Band Tracking Radar)
पूरा सिस्टम होगा मोबाइल
आरएफपी में इस रडार को री-लोकेटेबल सिस्टम के रूप में डेवलप करने की शर्त रखी गई है। इसका मतलब है कि आवश्यकता पड़ने पर इसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाकर फिर से स्थापित किया जा सकेगा।
पूरे सिस्टम में एक्टिव एंटीना एरे, मोटर चालित पेडेस्टल, प्रोसेसिंग इलेक्ट्रॉनिक्स, रेक्टिफायर यूनिट, लिक्विड कूलिंग सिस्टम, रडार कंट्रोल सिस्टम और सेल्फ कैलिब्रेशन जैसी सुविधाएं शामिल होंगी।
इसमें अतिरिक्त सुरक्षा के लिए रेडोम भी लगाया जाएगा, जिससे मौसम और बाहरी परिस्थितियों का असर कम हो।
लिक्विड कूलिंग और सेल्फ कैलिब्रेशन जैसी आधुनिक सुविधाएं
रडार में बड़ी संख्या में इलेक्ट्रॉनिक मॉड्यूल लगातार काम करेंगे। इन्हें सामान्य तापमान पर रखने के लिए रेडंडेंट लिक्विड कूलिंग सिस्टम लगाया जाएगा ताकि किसी एक यूनिट में खराबी आने पर दूसरी यूनिट काम संभाल सके।
इसके साथ सेल्फ कैलिब्रेशन सुविधा भी होगी। इससे रडार समय-समय पर अपनी सटीकता स्वयं जांच सकेगा और जरूरत पड़ने पर अपने मापदंड स्वतः ठीक कर सकेगा। (DRDO S-Band Tracking Radar)
कंट्रोल शेल्टर से होगी पूरी निगरानी
पूरे सिस्टम के ऑपरेशन के लिए वातानुकूलित ऑपरेशन शेल्टर बनाया जाएगा। इसमें रडार प्रोसेसिंग यूनिट, वाइड बैंड रिकॉर्डर, दो मॉनिटरिंग कंसोल और डेटा विश्लेषण के लिए कई हाई परफॉर्मेंस वर्कस्टेशन लगाए जाएंगे।
यहीं से ऑपरेटर रडार की निगरानी करेंगे और उड़ान परीक्षण के दौरान मिलने वाले आंकड़ों का विश्लेषण करेंगे।
मिसाइल परीक्षणों में निभाता है अहम रोल
आरएफपी डॉक्युमेंट के मुताबिक 18 महीने के भीतर पूरा सिस्टम उपलब्ध कराना होगा। रडार की इंस्टॉलेशन और कमीशनिंग का काम भी वही कंपनी करेगी। यह काम आईटीआर चांदीपुर या डीआरडीओ द्वारा तय किए गए भारत के किसी अन्य स्थान पर किया जा सकता है। साथ ही, रडार को चलाने और उसका ऑपरेशन समझाने के लिए कंपनी को संबंधित कर्मचारियों को प्रशिक्षण भी देना होगा। सिस्टम की वारंटी 36 महीने की होगी।
चांदीपुर स्थित आईटीआर देश की सबसे महत्वपूर्ण मिसाइल परीक्षण सुविधाओं में शामिल है। यहां बैलिस्टिक मिसाइल, एयर डिफेंस मिसाइल, सामरिक हथियार प्रणाली और अन्य उड़ान परीक्षण नियमित रूप से किए जाते हैं।
ऐसे प्रत्येक परीक्षण में इंस्ट्रूमेंटेशन ट्रैकिंग रडार सबसे अहम भूमिका निभाता है। यह उड़ान के हर चरण का रिकॉर्ड तैयार करता है और वैज्ञानिकों को यह पता लगाने में मदद करता है कि मिसाइल तय ट्रैजेक्टरी पर उड़ रही है या नहीं। इसी डेटा के आधार पर किसी भी परीक्षण की तकनीकी सफलता का मूल्यांकन किया जाता है। (DRDO S-Band Tracking Radar)
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हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।



