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हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: पीस स्टेशन में हुई बीमारी पर भी मिलेगी डिसेबिलिटी पेंशन, रद्द किया ट्रिब्यूनल का आदेश

बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि बीमारी का पता एक नियमित ईसीजी जांच के दौरान चला था और यह नौकरी के हालात से संबंधित नहीं है। इसी रिपोर्ट के आधार पर उनका दिव्यांगता पेंशन का दावा खारिज कर दिया गया...

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📍नई दिल्ली/तिरुवनंतपुरम | 10 Jun, 2026, 7:45 PM

Indian Army Disability Pension: भारतीय सेना के पूर्व सैनिकों के अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में केरल हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कहा है कि किसी सैनिक को सिर्फ इसलिए दिव्यांगता पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता क्योंकि उसकी बीमारी ऐसे इलाके में सामने आई थी जिसे सेना की भाषा में “पीस स्टेशन” कहा जाता है। अदालत ने कहा कि सैन्य सेवा अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण और तनावपूर्ण कार्य है, इसलिए केवल पोस्टिंग के आधार पर बीमारी और सैन्य सेवा के बीच संबंध को नकारा नहीं जा सकता।

यह मामला भारतीय सेना के पूर्व मानद सूबेदार मेजर चंद्रशेखर से जुड़ा है, जिन्होंने लगभग 28 वर्ष तक सेना में सेवा दी। सेवा के दौरान उन्हें हृदय संबंधी बीमारी का पता चला था। मेडिकल बोर्ड ने उनकी स्थायी दिव्यांगता 20 प्रतिशत आंकी, लेकिन यह भी कहा कि बीमारी का संबंध सैन्य सेवा से नहीं है। इसी आधार पर उन्हें दिव्यांगता पेंशन देने से इनकार कर दिया गया था।

लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अब हाईकोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए केंद्र सरकार और रक्षा मंत्रालय को दिव्यांगता पेंशन जारी करने का आदेश दिया है।

Indian Army Disability Pension: लगभग तीन दशक तक की सैन्य सेवा

अदालती रिकॉर्ड के अनुसार चंद्रशेखर ने 26 अप्रैल 1991 को भारतीय सेना में भर्ती होकर अपना सैन्य जीवन शुरू किया था। करीब 28 वर्षों तक उनकी तैनाती कई जगहों पर रही। अप्रैल 2019 में उन्हें सेना से मुक्त किया गया।

नौकरी के आखिरी सालों में नियमित स्वास्थ्य जांच के दौरान डॉक्टरों को उनके हृदय में समस्या दिखाई दी। इसके बाद विस्तृत मेडिकल परीक्षण कराया गया।

दिसंबर 2017 में आयोजित रिलीज मेडिकल बोर्ड की जांच में उन्हें “एपिकल हाइपरट्रॉफिक कार्डियोमायोपैथी” नामक हृदय रोग से पीड़ित पाया गया। यह एक ऐसी बीमारी है जिसमें हृदय की मांसपेशियां असामान्य रूप से मोटी हो जाती हैं और हृदय की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है।

मेडिकल बोर्ड ने इस बीमारी के कारण उन्हें 20 प्रतिशत स्थायी दिव्यांग माना और उन्हें लो मेडिकल कैटेगरी में रखा गया। (Indian Army Disability Pension)

क्यों रोकी गई पेंशन?

मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि मेडिकल बोर्ड ने बीमारी को सैन्य सेवा से जुड़ा हुआ नहीं माना।

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बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि बीमारी का पता एक नियमित ईसीजी जांच के दौरान चला था और यह नौकरी के हालात से संबंधित नहीं है। इसी रिपोर्ट के आधार पर उनका दिव्यांगता पेंशन का दावा खारिज कर दिया गया।

चंद्रशेखर का कहना था कि उन्होंने लगभग तीन दशक तक सेना में सेवा की है। यदि बीमारी सेवा के दौरान सामने आई है तो उसके कारणों की गहराई से जांच होनी चाहिए थी। लेकिन अधिकारियों ने केवल मेडिकल बोर्ड की राय के आधार पर उनका दावा अस्वीकार कर दिया। (Indian Army Disability Pension)

आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल से नहीं मिली राहत

दिव्यांगता पेंशन से इनकार किए जाने के बाद चंद्रशेखर ने कोच्चि स्थित आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने तर्क दिया कि बीमारी सेवा के दौरान सामने आई और मेडिकल बोर्ड ने यह बताने का कोई ठोस कारण नहीं दिया कि इसका सैन्य सेवा से कोई संबंध क्यों नहीं है।

लेकिन ट्रिब्यूनल ने भी उनकी याचिका खारिज कर दी। ट्रिब्यूनल ने माना कि बीमारी उस समय सामने आई जब सैनिक की पोस्टिंग एक पीस स्टेशन में थी। इसलिए मेडिकल बोर्ड की राय को स्वीकार किया गया और पेंशन का दावा अस्वीकार कर दिया गया।

इसके बाद चंद्रशेखर ने केरल हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

हाईकोर्ट में दी ये दलील?

पूर्व सैनिक की ओर से अदालत में कहा गया कि मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में केवल निष्कर्ष लिखा गया है लेकिन उसके पीछे कोई वैज्ञानिक या तथ्यात्मक आधार नहीं दिया गया।

याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि बीमारी सेवा से संबंधित नहीं है। इसके लिए विस्तृत कारण भी बताने जरूरी हैं।

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि यदि कोई सैनिक पीस स्टेशन में तैनात है तो इसका मतलब यह नहीं कि वह तनावमुक्त जीवन जी रहा है। सैन्य सेवा की प्रकृति हर जगह कठिन होती है।

याचिका में कहा गया कि पीस स्टेशन वाली दलील के आधार पर दिव्यांगता पेंशन से इनकार करना नियमों और न्याय दोनों के खिलाफ है। (Indian Army Disability Pension)

मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट पर अदालत की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट का विस्तार से अध्ययन किया। न्यायमूर्ति के. नटराजन और न्यायमूर्ति जॉनसन जॉन की पीठ ने पाया कि रिपोर्ट में बीमारी को सैन्य सेवा से असंबंधित बताने के लिए पर्याप्त कारण नहीं दिए गए थे।

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अदालत ने कहा कि मेडिकल बोर्ड ने केवल एक निष्कर्ष लिखा लेकिन यह नहीं बताया कि वह इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंचा। कोर्ट ने कहा कि जब किसी सैनिक के अधिकारों की बात हो तो केवल निष्कर्षात्मक राय के आधार पर उसका दावा खारिज नहीं किया जा सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि बिना पर्याप्त कारणों वाली मेडिकल राय न्यायिक समीक्षा के दायरे में आती है और अदालत उसकी जांच कर सकती है। (Indian Army Disability Pension)

पीस स्टेशन वाली दलील को किया खारिज

इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा अदालत द्वारा “पीस स्टेशन” वाली दलील को खारिज करना रहा। कोर्ट ने कहा कि सेना के मेडिकल नियमों में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि केवल फील्ड एरिया में होने वाली बीमारी ही सेवा से जुड़ी मानी जाएगी।

अदालत ने सशस्त्र बलों की मेडिकल सर्विसेज रेगुलेशन के नियम 423 का हवाला दिया। इसमें स्पष्ट कहा गया है कि यह मायने नहीं रखता कि बीमारी फील्ड एरिया में हुई, या युद्ध क्षेत्र में हुई या सामान्य शांति वाले क्षेत्र में हुई। महत्वपूर्ण बात यह है कि बीमारी और सैन्य सेवा के बीच कोई संबंध मौजूद है या नहीं।

कोर्ट ने कहा कि सैन्य जीवन हर जगह अनुशासन, जिम्मेदारी और मानसिक दबाव से भरा होता है। सैनिकों को लंबे समय तक परिवार से दूर रहना पड़ता है। अचानक तैनाती, अनिश्चित कार्य परिस्थितियां और हर समय तैयार रहने का दबाव बना रहता है।

इसलिए केवल पीस स्टेशन का आधार लेकर पेंशन से इनकार नहीं किया जा सकता।

भर्ती के समय पूरी तरह से थे स्वस्थ

मामले में एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह सामने आया कि जब चंद्रशेखर सेना में भर्ती हुए थे तब उनकी मेडिकल जांच हुई थी और उन्हें पूरी तरह फिट घोषित किया गया था।

अदालत के सामने ऐसा कोई रिकॉर्ड पेश नहीं किया गया जिससे साबित हो कि उन्हें पहले से कोई हृदय रोग था।

सरकार यह भी साबित नहीं कर सकी कि बीमारी वंशानुगत थी या भर्ती से पहले मौजूद थी। इसी आधार पर अदालत ने कहा कि सैनिक को उन कानूनी प्रावधानों का लाभ मिलेगा जो सेवा के दौरान उत्पन्न बीमारी के मामलों में लागू होते हैं।

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सुनवाई के दौरान अदालत ने पेंशन से जुड़े कानूनों की प्रकृति पर भी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि पेंशन और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े नियमों का उद्देश्य सैनिकों और उनके परिवारों को आर्थिक सुरक्षा देना है।

ऐसे मामलों में नियमों की व्याख्या संकीर्ण तरीके से नहीं बल्कि सैनिकों के हित में की जानी चाहिए। अदालत ने कहा कि यदि किसी सैनिक के दावे पर संदेह हो तो परिस्थितियों को व्यापक रूप से देखा जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी हवाला

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि यदि मेडिकल बोर्ड अपनी राय के पीछे ठोस कारण नहीं देता तो उसकी रिपोर्ट को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक संस्थाएं यह जांच सकती हैं कि मेडिकल बोर्ड ने नियमों और तथ्यों का सही पालन किया या नहीं।

इसी सिद्धांत को अपनाते हुए हाईकोर्ट ने चंद्रशेखर के मामले में भी मेडिकल बोर्ड की राय को पर्याप्त नहीं माना। (Indian Army Disability Pension)

तीन महीने में पेंशन जारी करने का आदेश

मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद हाईकोर्ट ने आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने केंद्र सरकार और रक्षा अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे नया पेंशन भुगतान आदेश जारी करें और चंद्रशेखर को दिव्यांगता पेंशन का लाभ दें।

कोर्ट ने यह प्रक्रिया तीन महीने के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया है। साथ ही कहा गया कि यदि तय समय सीमा के भीतर भुगतान नहीं किया गया तो बकाया राशि पर सात प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा। (Indian Army Disability Pension)

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