📍नई दिल्ली | 23 Jul, 2026, 4:32 PM
Heavy Lift Airship India: हैवी मिलिट्री कार्गो ले जाने के लिए अभी तक हेलीकॉप्टर और ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट्स का इस्तेमाल होता रहा है। वहीं अब ड्रोन की भी एंट्री हो गई है, लेकिन वे ज्यादा हैवी पेलोड नहीं ले जा सकते। वहीं, अब दुनिया ऐसे प्लेटफॉर्म विकसित कर रही है जो बिना लंबे रनवे के भारी सैन्य सामान दूर-दराज के इलाकों तक पहुंचा सकें, कई दिनों तक हवा में रहकर निगरानी कर सकें और सीमावर्ती क्षेत्रों में तेजी से सैन्य मदद पहुंचाने में सक्षम हों। इसी दिशा में भारत ने एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। भारत फोर्ज लिमिटेड और फ्रांस-कनाडा की कंपनी फ्लाइंग व्हेल्स ने भारत में अगली पीढ़ी के हैवी-लिफ्ट एयरशिप विकसित और निर्मित करने के लिए रणनीतिक समझौता किया है।
Heavy Lift Airship India: भारत फोर्ज और फ्लाइंग व्हेल्स के बीच क्या हुआ समझौता?
इंग्लैंड में आयोजित फार्नबरो इंटरनेशनल एयरशो 2026 के दौरान भारत फोर्ज लिमिटेड के एयरोस्पेस डिवीजन और फ्लाइंग व्हेल्स के बीच मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू) पर दस्तखत हुए। समझौते पर भारत फोर्ज के एयरोस्पेस डिवीजन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी गुरु बिस्वाल और फ्लाइंग व्हेल्स के अध्यक्ष सेबास्टियन बुगों ने दस्तखत किए।
इस साझेदारी का उद्देश्य भारत में रक्षा और रणनीतिक जरूरतों के लिए अत्याधुनिक एयरशिप का विकास, निर्माण, एकीकरण और उत्पादन करना है। दोनों कंपनियां “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” के तहत भारत में पूरी एयरशिप निर्माण क्षमता विकसित करने पर काम करेंगी।
क्या होता है एयरशिप?
एयरशिप को अक्सर लोग गुब्बारे जैसा समझ लेते हैं, लेकिन आधुनिक एयरशिप उससे कहीं अधिक एडवांस तकनीक वाला विमान होता है। इसमें हीलियम जैसी हल्की गैस भरी जाती है, जिससे यह हवा में तैरता रहता है। इसके साथ इंजन, डायरेक्शन कंट्रोल सिस्टम और आधुनिक नेविगेशन तकनीक भी लगी होती है।
सामान्य कार्गो विमान को उड़ान भरने और उतरने के लिए लंबे रनवे की जरूरत होती है, जबकि एयरशिप बिना रनवे के भी लगभग सीधे ऊपर यानी वर्टिकल टेकऑफ उठकर उड़ सकता है और सीमित स्थान पर उतर सकता है। यही क्षमता इसे कठिन पहाड़ी इलाकों, जंगलों, द्वीपों और सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए बेहद उपयोगी बनाती है। (Heavy Lift Airship India)
एलसीए60टी प्लेटफॉर्म क्या है?
इस साझेदारी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा फ्लाइंग व्हेल्स का एलसीए60टी एयरशिप प्लेटफॉर्म है। यह अगली पीढ़ी का हैवी-लिफ्ट एयरशिप है, जिसे विशेष रूप से बड़े और भारी सामान को ले जाने के लिए विकसित किया गया है।
एलसीए60टी एक बार में 60 टन तक कार्गो ले जाने में सक्षम होगा। इसकी सबसे बड़ी विशेषता वर्टिकल टेक-ऑफ एंड लैंडिंग क्षमता है। इसे पारंपरिक हवाई अड्डे या रनवे की आवश्यकता नहीं होगी। यह सीधे ऊपर उठ सकता है और सीमित जगह पर उतर सकता है।
इस एयरशिप में हाइब्रिड-इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन सिस्टम का इस्तेमाल किया जाएगा। इससे ईंधन की खपत कम होगी और लंबी दूरी तक संचालन संभव होगा। कम ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता होने के कारण इसे उन क्षेत्रों में भी तैनात किया जा सकता है जहां सामान्य परिवहन विमान नहीं पहुंच सकते।
भारतीय सेनाओं को क्या मिलेगा फायदा?
भारत की लंबी सीमाएं हिमालय, रेगिस्तान, घने जंगल और समुद्री क्षेत्रों में फैली हुई हैं। कई अग्रिम सैन्य चौकियों तक भारी हथियार, रडार, इंजीनियरिंग उपकरण और रसद सामग्री पहुंचाना आज भी चुनौती बना रहता है।
एलसीए60टी जैसे एयरशिप सीमावर्ती अग्रिम ऑपरेटिंग बेस तक भारी सैन्य उपकरण, गोला-बारूद, ईंधन, संचार प्रणाली और इंजीनियरिंग संसाधन सीधे पहुंचा सकते हैं। चूंकि इन्हें रनवे की जरूरत नहीं होती, इसलिए दुर्गम इलाकों में भी सैन्य आपूर्ति संभव हो जाती है। (Heavy Lift Airship India)
केवल लॉजिस्टिक्स नहीं, निगरानी भी
एयरशिप को कई प्रकार के मिशनों में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें इंटेलिजेंस, सर्विलांस, रिकॉनिसेंस, कम्युनिकेशन रिले, मानवीय सहायता, आपदा राहत और सीमावर्ती क्षेत्रों में तेज़ तैनाती जैसे मिशन शामिल हैं। लंबे समय तक हवा में बने रहने की क्षमता के कारण एयरशिप किसी क्षेत्र की लगातार निगरानी भी कर सकता है।
भारत भी बना रहा है स्ट्रैटोस्फेरिक एयरशिप
वहीं भारतीय वायुसेना भी एक और अत्याधुनिक परियोजना पर काम कर रही है। इसका नाम एयरशिप आधारित हाई एल्टीट्यूड प्सूडो सैटेलाइट (एएस-एचएपीएस) है। यह परियोजना भारतीय वायुसेना के डायरेक्टरेट ऑफ ऑपरेशंस (रिमोट) की निगरानी में तैयार की जा रही है। इसे रक्षा मंत्रालय की मेक-1 खरीद प्रक्रिया के तहत मंजूरी मिली है, जिसमें सरकार अनुसंधान एवं विकास लागत का 70 प्रतिशत तक वित्तीय सहयोग दे सकती है।
इस पूरी परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 15,000 करोड़ रुपये बताई गई है। (Heavy Lift Airship India)
एएस-एचएपीएस क्या करेगा?
यह एयरशिप सामान्य परिवहन एयरशिप से बिल्कुल अलग होगा। इसे लगभग 20 किलोमीटर से अधिक ऊंचाई पर लगातार कई महीनों तक उड़ने के लिए डिजाइन किया जा रहा है।
इस ऊंचाई पर यह एक तरह के “प्सूडो सैटेलाइट” की तरह काम करेगा। यानी उपग्रह जैसी निगरानी क्षमता देगा, लेकिन उपग्रह की तुलना में कम लागत पर और आवश्यकता के अनुसार अपनी स्थिति बदल सकेगा।
इसमें अत्याधुनिक ऑप्टिकल सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस प्रणाली, लंबी दूरी के संचार उपकरण और रडार लगाए जाएंगे।
ड्रोन और सैटेलाइट के बीच की कड़ी
एएस-एचएपीएस को ड्रोन और लो-अर्थ ऑर्बिट सैटेलाइट के बीच की कड़ी माना जाता है। सामान्य हाई एल्टीट्यूड ड्रोन लगभग 12 किलोमीटर तक उड़ते हैं, जबकि लो-अर्थ ऑर्बिट सैटेलाइट 500 से 2,000 किलोमीटर की ऊंचाई पर होते हैं। एएस-एचएपीएस लगभग 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर लगातार मौजूद रहकर इन दोनों के बीच का अंतर भर सकता है।
इससे किसी क्षेत्र की लगातार निगरानी संभव होगी और जमीन से प्राप्त आंकड़ों को सीधे उपग्रह नेटवर्क तक भी भेजा जा सकेगा।
डीआरडीओ पहले ही कर चुका है परीक्षण
भारत इस तकनीक पर शुरुआती स्तर से काम नहीं कर रहा है। डीआरडीओ ने मई 2025 में मध्य प्रदेश में अपने स्ट्रैटोस्फेरिक एयरशिप प्लेटफॉर्म का पहला सफल उड़ान परीक्षण किया था।
उस परीक्षण के दौरान एयरशिप लगभग 17 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचा था और अपने साथ वैज्ञानिक उपकरण भी ले गया था। इस परीक्षण से भारत को ऊंचाई पर लंबे समय तक संचालित होने वाले एयरशिप तैयार करने का शुरुआती अनुभव मिला। (Heavy Lift Airship India)
निजी कंपनियों के लिए नया अवसर
सरकार इस परियोजना में भारतीय निजी उद्योग को भी शामिल करना चाहती है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार एयरोस्पेस क्षेत्र में काम कर रही कई भारतीय कंपनियों से तकनीकी प्रस्ताव मांगे गए हैं। तकनीकी क्षमता और वित्तीय मजबूती के आधार पर कम से कम दो विकास साझेदार चुने जाने की योजना है।
इससे केवल एयरशिप निर्माण ही नहीं, बल्कि सेंसर, एवियोनिक्स, संचार प्रणाली, संरचनात्मक सामग्री, ग्राउंड कंट्रोल सिस्टम और मिशन सॉफ्टवेयर जैसे क्षेत्रों में भी स्वदेशी औद्योगिक क्षमता विकसित होगी। (Heavy Lift Airship India)
दुनिया में कौन-कौन आगे है?
स्ट्रैटोस्फेरिक एयरशिप तकनीक पर कई देश काम कर रहे हैं। यूरोप का यूरोहैप्स कार्यक्रम अभी प्रोटोटाइप फेज में है। थेल्स एलेनिया का स्ट्रैटोबस भी इसी दिशा में तैयार किया जा रहा है।
अमेरिका ने ऊंचाई वाले एयरशिप का सफल परीक्षण किया है, हालांकि अभी तक पूरी तरह से कोई ऑपरेशनल नहीं है।
चीन का कार्यक्रम काफी गोपनीय माना जाता है। हाल के वर्षों में चीनी उच्च ऊंचाई वाले गुब्बारों की गतिविधियां कई देशों में देखी गई हैं। अमेरिका ने वर्ष 2023 में लगभग 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर उड़ रहे एक चीनी गुब्बारे को मार गिराया था। रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि चीन सैन्य उपयोग वाले स्ट्रैटोस्फेरिक एयरशिप और प्सूडो सैटेलाइट तकनीकों पर भी काम कर रहा है। (Heavy Lift Airship India)
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