📍कारवार, कर्नाटक | 22 Jul, 2026, 11:10 AM
INS Malvan Commissioned: भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा है कि भारतीय वायुसेना को स्वदेशीकरण के मामले में भारतीय नौसेना के मॉडल से सीख लेनी चाहिए। उन्होंने कहा कि नौसेना ने जहाज निर्माण परियोजनाओं में शुरुआत से ही अपने अधिकारियों को शिपयार्ड के साथ जोड़कर एक ऐसा सिस्टम तैयार किया है, जिसने आज भारत को 80 फीसदी से अधिक स्वदेशी युद्धपोत बनाने की क्षमता दी है। वायुसेना को भी यही मॉडल अपनाना होगा, ताकि विमानन क्षेत्र में आत्मनिर्भरता तेजी से हासिल की जा सके।
वेस्टर्न नेवल कमांड के तहत आने वाले भारतीय नौसेना के बेहद स्ट्रेटेजिक नौसैनिक अड्डे कारवार के आईएनएस कदंबा पर माहे क्लास के दूसरे एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट (एएसडब्ल्यू-एसडब्ल्यूसी) आईएनएस मालवन के कमीशनिंग समारोह में एयर चीफ मार्शल ने कहा कि नौसेना ने आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को बहुत पहले अपना लिया था। अब इसका परिणाम साफ दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा कि डिफेंस प्रोडक्शन में देरी का मतलब कई बार तकनीक से पीछे रह जाना होता है।
INS Malvan Commissioned: नौसेना के मॉडल से सीखने की जरूरत
एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा कि भारतीय नौसेना की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उसके अधिकारी किसी जहाज के निर्माण की शुरुआत से ही शिपयार्ड के साथ जुड़े रहते हैं। वे डिजाइन, निर्माण, परीक्षण और कमीशनिंग तक पूरी प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। यही अधिकारी बाद में वरिष्ठ पदों तक पहुंचते हैं और रिटायर होने के बाद भी अपने अनुभव से शिपयार्ड की मदद करते हैं।
उन्होंने कहा कि विमान निर्माण के क्षेत्र में भी इसी तरह की व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है। इससे स्वदेशी विमान और डिफेंस सिस्टम्स के विकास की गति तेज होगी और आत्मनिर्भरता का लक्ष्य जल्दी हासिल किया जा सकेगा।
तकनीक में देरी का मतलब तकनीक से वंचित होना
एयर चीफ मार्शल ने कहा कि केवल स्वदेशी तकनीक विकसित करना ही काफी नहीं है, बल्कि उसे समय पर तैयार करना भी उतना ही जरूरी है।
उन्होंने कहा, “अगर किसी तकनीक को विकसित करते-करते दुनिया उससे आगे निकल जाए तो उसका कोई मतलब नहीं रह जाता। मेरे हिसाब से तकनीक में देरी का मतलब तकनीक से वंचित रह जाना है।”
उन्होंने कहा कि अनुसंधान, विकास और उत्पादन को उसी गति से आगे बढ़ाना होगा, जिस गति से दुनिया में नई तकनीक विकसित हो रही है। (INS Malvan Commissioned)
2026 में सातवां युद्धपोत, अभी 12 और आने बाकी
एयर चीफ मार्शल ने कहा कि यह भारतीय नौसेना का साल 2026 में शामिल होने वाला यह सातवां युद्धपोत है। उन्होंने खुशी जताई कि नौसेना लगातार अपनी ताकत बढ़ा रही है और आने वाले समय में 12 और युद्धपोत नौसेना में शामिल किए जाएंगे।
उन्होंने कहा कि आईएनएस मालवन में करीब 80 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है, जो आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ी उपलब्धि है। (INS Malvan Commissioned)
कारवार बना आधुनिक नौसैनिक शक्ति का केंद्र
एयर चीफ मार्शल ने प्रोजेक्ट सीबर्ड के तहत विकसित करवार नौसैनिक अड्डे की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि करवार आज दुनिया के सबसे आधुनिक नौसैनिक अड्डों में शामिल है। यहां विश्वस्तरीय आधारभूत ढांचा और अत्याधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं।
उन्होंने कहा कि उन्होंने स्वयं इस अड्डे का दौरा किया है और यहां उपलब्ध सुविधाएं किसी भी विकसित नौसैनिक अड्डे से कम नहीं हैं।
भविष्य के युद्ध तीनों सेनाएं मिलकर लड़ेंगी
उन्होंने कहा कि भविष्य का कोई भी युद्ध केवल एक सेना नहीं लड़ेगी। भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना को एक संयुक्त बल के रूप में काम करना होगा। उन्होंने कहा कि चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) की व्यवस्था बनने के बाद तीनों सेनाओं के बीच जॉइंटनेस लगातार बढ़ी है और भविष्य में यह सहयोग और मजबूत होगा।
उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर का भी उल्लेख करते हुए कहा कि हाल के अभियानों ने यह दिखा दिया है कि संयुक्त अभियान ही भविष्य का रास्ता हैं। (INS Malvan Commissioned)
आईएनएस मालवन सिर्फ युद्धपोत नहीं, एक विरासत
एयर चीफ मार्शल ने आईएनएस मालवन के कमांडिंग ऑफिसर और चालक दल को संबोधित करते हुए कहा कि उन्हें केवल एक आधुनिक युद्धपोत नहीं मिला है, बल्कि भारतीय नौसेना की गौरवशाली परंपरा भी सौंपी गई है।
उन्होंने कहा कि किसी भी युद्धपोत की असली ताकत केवल उसकी तकनीक नहीं होती, बल्कि उसे चलाने वाले अधिकारियों और नाविकों का नेतृत्व, प्रशिक्षण, टीमवर्क और पेशेवर क्षमता होती है।
भारतीय नौसेना के लिए ऐतिहासिक दिन
समारोह को संबोधित करते हुए फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ, वेस्टर्न नेवल कमांड वाइस एडमिरल संजय वात्सायन ने कहा कि आईएनएस मालवन का कमीशन होना भारतीय नौसेना के लिए कई मायनों में ऐतिहासिक है।
उन्होंने बताया कि यह आठ एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट की सीरीज का दूसरा युद्धपोत है, जिसका निर्माण कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड कर रहा है।
वाइस एडमिरल वात्सायन ने बताया कि आईएनएस मालवन कारवार नौसैनिक अड्डे पर कमीशन होने वाला पहला भारतीय नौसैनिक युद्धपोत भी बन गया है।
उन्होंने कहा कि यह जहाज महाराष्ट्र के ऐतिहासिक तटीय शहर मालवन के नाम पर रखा गया है, जिसका संबंध छत्रपति शिवाजी महाराज की समुद्री विरासत से जुड़ा है। यह नाम 1983 से 2003 तक सेवा देने वाले पुराने आईएनएस मालवन की विरासत को भी आगे बढ़ाता है।
उन्होंने कहा कि हिंद महासागर क्षेत्र का रणनीतिक महत्व लगातार बढ़ रहा है और भारतीय नौसेना समुद्री सुरक्षा, सुरक्षित नौवहन, मानवीय सहायता एवं आपदा राहत अभियानों और क्षेत्रीय सहयोग के माध्यम से अपनी जिम्मेदारी निभा रही है। (INS Malvan Commissioned)
आईएनएस मैंगरोल भी कमीशनिंग के लिए तैयार
आईएनएस मालवन के कमीशनिंग समारोह में कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL) के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक जोस विजयन ने कहा कि एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट प्रोजेक्ट तेजी से आगे बढ़ रहा है। आईएनएस मालवन के बाद इसी सीरीज का तीसरा युद्धपोत ‘मैंगरोल’ भी तैयार है और जल्द भारतीय नौसेना को सौंप दिया जाएगा। उन्होंने बताया कि इस श्रृंखला के बाकी सभी युद्धपोत भी निर्माण के अंतिम चरण में हैं और उन्हें एक के बाद एक नौसेना को सौंपा जाएगा।
पांच दशक की यात्रा का बड़ा पड़ाव
जोस विजयन ने कहा कि पिछले 50 सालों में कोचीन शिपयार्ड ने भारत के जहाज निर्माण और जहाज मरम्मत क्षेत्र की मजबूत नींव तैयार की है। देश के पहले स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत से लेकर आधुनिक युद्धपोतों तक के निर्माण में शिपयार्ड ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
उन्होंने कहा कि आज कोचीन शिपयार्ड एशिया के सबसे आधुनिक समुद्री औद्योगिक ढांचों में से एक के साथ काम कर रहा है और भारत में समुद्री क्षेत्र के तेजी से बढ़ते विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
उन्होंने बताया कि इन जहाजों के डिजाइन से लेकर स्टील और अधिकांश उपकरण भारत में ही तैयार किए गए हैं। युद्धपोत में लगभग 80 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है, जो देश के रक्षा विनिर्माण क्षेत्र की बढ़ती क्षमता को दर्शाता है।
निर्माण के दौरान आईं कई तकनीकी चुनौतियां
जोस विजयन ने बताया कि लगभग 78 मीटर लंबे इन युद्धपोतों का निर्माण आसान नहीं था। हालांकि आकार के हिसाब से यह कोचीन शिपयार्ड का सबसे बड़ा या सबसे जटिल जहाज नहीं है, लेकिन निर्माण के दौरान कई तकनीकी और उत्पादन संबंधी चुनौतियां सामने आईं।
उन्होंने कहा कि पहले दो जहाजों के निर्माण से जो अनुभव मिला है, उसके बाद अब इन चुनौतियों का समाधान कर लिया गया है। इसका फायदा बाकी जहाजों के निर्माण में मिलेगा और उनकी डिलीवरी पहले की तुलना में अधिक तेजी से हो सकेगी। (INS Malvan Commissioned)
पूरी सर्विस लाइफ में मिलेगा तकनीकी सहयोग
जोस विजयन ने कहा कि कोचीन शिपयार्ड केवल युद्धपोत बनाकर नौसेना को सौंपने तक ही अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं मानता। जहाज के पूरे सेवा काल में रखरखाव, तकनीकी सहायता और भविष्य में होने वाले रिफिट कार्यों के दौरान भी शिपयार्ड भारतीय नौसेना को पूरा सहयोग देता रहेगा।
उन्होंने भरोसा जताया कि आईएनएस मालवन भारतीय नौसेना की समुद्री सुरक्षा क्षमता को और मजबूत करेगा तथा उसका चालक दल देश की समुद्री सीमाओं की रक्षा में नई उपलब्धियां हासिल करेगा। (INS Malvan Commissioned)
आईएनएस मालवन: समुद्र के भीतर दुश्मन पनडुब्बियों का शिकारी
आईएनएस मालवन भारतीय नौसेना की नई पीढ़ी का एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट (एएसडब्ल्यू-एसडब्ल्यूसी) है, जिसे उथले समुद्री क्षेत्रों में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने और उन्हें निष्क्रिय करने के लिए विशेष रूप से विकसित किया गया है।
करीब 78 मीटर लंबे इस युद्धपोत में अत्याधुनिक सोनार, निगरानी प्रणाली और पनडुब्बी रोधी हथियार लगाए गए हैं, जिससे यह तटीय क्षेत्रों में प्रभावी समुद्री सुरक्षा प्रदान कर सकता है। इसके अलावा यह माइंस बिछाने, सर्च एंड रेस्क्यू, लो-इंटेंसिटी मैरिटाइम ऑपरेशन और समुद्री निगरानी जैसे कई अभियानों को भी अंजाम देने में सक्षम है। जहाज का नाम महाराष्ट्र के ऐतिहासिक तटीय शहर मालवन के नाम पर रखा गया है, जो छत्रपति शिवाजी महाराज की समृद्ध समुद्री विरासत से जुड़ा है। यह नाम 1983 से 2003 तक भारतीय नौसेना में सेवा देने वाले पुराने आईएनएस मालवन की विरासत को भी आगे बढ़ाता है। आईएनएस मालवन के शामिल होने से भारतीय नौसेना की तटीय रक्षा और पनडुब्बी रोधी क्षमता को नई मजबूती मिलेगी। (INS Malvan Commissioned)
क्या है आईएनएस मैंगरोल
आईएनएस मैंगरोल भारतीय नौसेना की माहे क्लास एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट (एएसडब्ल्यू-एसडब्ल्यूसी) सीरीज का तीसरा युद्धपोत है। इसका निर्माण कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (सीएसएल) ने किया है। इस जहाज को 30 नवंबर 2023 को आईएनएस माहे और आईएनएस मालवन के साथ लॉन्च किया गया था। फिलहाल यह डिलीवरी की प्रक्रिया में है और जल्द ही भारतीय नौसेना को सौंपे जाने की उम्मीद है। जहाज का नाम गुजरात के तटीय शहर मैंगरोल के नाम पर रखा गया है, जो भारत की समुद्री विरासत और तटीय पहचान को दर्शाता है।
करीब 78 मीटर लंबे और लगभग 900 से 1,100 टन वजनी इस युद्धपोत को विशेष रूप से उथले समुद्री क्षेत्रों में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने, उनका पीछा करने और जरूरत पड़ने पर उन्हें नष्ट करने के लिए डिजाइन किया गया है। इसकी टॉप स्पीड 25 नॉट्स है।
आईएनएस मैंगरोल में डीआरडीओ द्वारा विकसित ‘अभय’ हल-माउंटेड सोनार के साथ लो फ्रीक्वेंसी वैरिएबल डेप्थ सोनार लगाया गया है, जो उथले पानी में भी पनडुब्बियों का प्रभावी ढंग से पता लगाने में सक्षम है। हथियारों के रूप में इसमें हल्के टॉरपीडो, आरबीयू-6000 एंटी-सबमरीन रॉकेट लॉन्चर, 30 मिमी मुख्य गन और 12.7 मिमी रिमोट कंट्रोल्ड गन लगाई गई हैं। इसके अलावा यह माइन लेइंग यानी समुद्र में बारूदी सुरंगें बिछाने की क्षमता भी रखता है।
माहे क्लास के ये युद्धपोत भारतीय नौसेना के पुराने अभय क्लास कोरवेट की जगह ले रहे हैं। इनके शामिल होने से तटीय क्षेत्रों में पनडुब्बी रोधी निगरानी और समुद्री सुरक्षा पहले से कहीं अधिक मजबूत होगी। साथ ही बड़े फ्रिगेट और डेस्ट्रॉयर जैसे प्रमुख युद्धपोतों को गहरे समुद्र में रणनीतिक अभियानों के लिए ज्यादा इस्तेमाल किया जा सकेगा। (INS Malvan Commissioned)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।



