📍नई दिल्ली | 21 Jul, 2026, 2:47 PM
INS Malwan Commissioning: भारतीय नौसेना 22 जुलाई को अपनी समुद्री ताकत में एक और स्वदेशी युद्धपोत जोड़ने जा रही है। कर्नाटक के कारवार नौसैनिक अड्डे पर आईएनएस मालवन को औपचारिक रूप से नौसेना में शामिल किया जाएगा। यह माहे-क्लास का एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट (एएसडब्ल्यू-एसडब्ल्यूसी) का दूसरा जहाज है। इसका निर्माण कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (सीएसएल) ने किया है।
आईएनएस मालवन ऐसे समय नौसेना का हिस्सा बन रहा है, जब हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की पनडुब्बियों की मौजूदगी बढ़ रही है और पाकिस्तान भी अपनी पानी के भीतर लड़ने की क्षमता को लगातार मजबूत कर रहा है। यह युद्धपोत भारतीय नौसेना की कोस्टल एंटी-सबमरीन क्षमता को और मजबूत करेगा।
INS Malwan Commissioning: महाराष्ट्र के तटीय शहर पर रखा गया नाम
इस युद्धपोत का नाम महाराष्ट्र के प्रसिद्ध तटीय शहर मालवन के नाम पर रखा गया है। यह भारतीय नौसेना के उस कार्यक्रम का हिस्सा है, जिसके तहत कुल 16 एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट तैयार किए जा रहे हैं। इनमें आठ जहाज गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) और आठ जहाज कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड बना रहे हैं।
आईएनएस मालवन, सीएसएल द्वारा बनाए जा रहे आठ माहे-क्लास जहाजों में दूसरा है। इससे पहले आईएनएस माहे को नौसेना में शामिल किया जा चुका है।
उथले समुद्र में पनडुब्बियों की तलाश के लिए तैयार
आईएनएस मालवन को खास तौर पर उन समुद्री इलाकों के लिए तैयार किया गया है, जहां पानी की गहराई कम होती है। आमतौर पर तटीय क्षेत्रों में पानी की गहराई 50 से 60 मीटर के आसपास रहती है। ऐसे इलाकों में पनडुब्बियों का पता लगाना बड़े युद्धपोतों के लिए आसान नहीं होता।
यही वजह है कि भारतीय नौसेना ने इस तरह के विशेष जहाज तैयार किए हैं। आईएनएस मालवन कम गहराई वाले समुद्र में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने, उनका पीछा करने और जरूरत पड़ने पर उन्हें निशाना बनाने में सक्षम होगा। (INS Malwan Commissioning)
आकार छोटा, लेकिन क्षमता बड़ी
आईएनएस मालवन की लंबाई लगभग 78 मीटर है, जबकि इसका वजन लगभग 900 से 1100 टन के बीच है। यह अधिकतम 25 नॉट्स की गति से चल सकता है।
यह जहाज 14 नॉट्स की गति पर लगभग 1800 नॉटिकल माइल तक लगातार सफर कर सकता है। जहाज पर 57 नौसैनिक तैनात रहेंगे, जिनमें 7 अधिकारी और 50 नाविक शामिल हैं।
इसमें तीन डीजल इंजन और वॉटरजेट आधारित प्रोपल्शन सिस्टम लगाया गया है। भारतीय नौसेना के युद्धपोतों में यह सबसे बड़े वॉटरजेट सिस्टम में से एक माना जाता है। (INS Malwan Commissioning)
⚓🇮🇳 The Indian Navy is set to welcome a new guardian of the coast!
INS Malvan, the Navy’s newest Shallow Water Craft, will soon be commissioned, further strengthening India’s coastal defence, anti-submarine warfare, and maritime security capabilities.#INSMalvan #IndianNavy… pic.twitter.com/se1qYA8PlJ— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) July 21, 2026
आधुनिक सोनार और हथियारों से लैस
आईएनएस मालवन को आधुनिक सेंसर और हथियारों से लैस किया गया है, ताकि यह पनडुब्बी रोधी अभियानों में प्रभावी भूमिका निभा सके।
इसमें डीआरडीओ का बनाया अभय हल-माउंटेड सोनार लगाया गया है। इसके अलावा लो फ्रीक्वेंसी वैरिएबल डेप्थ सोनार भी मौजूद है, जो अलग-अलग गहराई पर जाकर पानी के भीतर मौजूद पनडुब्बियों का पता लगाने में मदद करता है।
युद्धपोत में हल्के वजन वाले टॉरपीडो, आरबीयू-6000 एंटी-सबमरीन रॉकेट लॉन्चर, टॉरपीडो डिकॉय सिस्टम, 30 मिमी मुख्य तोप और 12.7 मिमी रिमोट कंट्रोल गन भी लगाई गई हैं।
इन हथियारों और सेंसरों की मदद से जहाज पानी के भीतर मौजूद खतरे का पता लगाकर उस पर कार्रवाई कर सकता है।
केवल पनडुब्बी रोधी अभियान तक सीमित नहीं मालवन
आईएनएस मालवन केवल पनडुब्बियों की तलाश के लिए ही नहीं बनाया गया है। इसे कई अन्य समुद्री अभियानों के लिए भी तैयार किया गया है।
यह जहाज समुद्र के भीतर निगरानी, माइन बिछाने, खोज एवं बचाव अभियान और कम तीव्रता वाले समुद्री ऑपरेशन भी कर सकता है। इसके अलावा यह नौसेना के हेलीकॉप्टर और समुद्री गश्ती विमानों के साथ मिलकर संयुक्त अभियान चलाने में भी सक्षम है। (INS Malwan Commissioning)
भारतीय नौसेना में छह शैलो वॉटर युद्धपोत होंगे शामिल
आईएनएस मालवन के नौसेना में शामिल होने के बाद भारतीय नौसेना के पास एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट (एएसडब्ल्यू-एसडब्ल्यूसी) की संख्या बढ़कर छह हो जाएगी। अभी तक चार अर्नाला-क्लास और एक माहे-क्लास युद्धपोत सक्रिय सेवा में हैं। मालवन के शामिल होने के बाद दूसरा माहे-क्लास जहाज भी बेड़े का हिस्सा बन जाएगा।
भारतीय नौसेना ने इस श्रेणी के कुल 16 युद्धपोत शामिल करने की योजना बनाई है। इनमें आठ अर्नाला-क्लास जहाज गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) बना रही है, जबकि आठ माहे-क्लास जहाज कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड तैयार कर रही है।
22 जुलाई तक छह जहाज सक्रिय सेवा में होंगे, जबकि बाकी दस जहाज निर्माण या परीक्षण के अलग-अलग चरणों में हैं। (INS Malwan Commissioning)
पुराने अभय-क्लास युद्धपोतों की जगह लेंगे नए जहाज
इस परियोजना को रक्षा मंत्रालय ने दिसंबर 2013 में मंजूरी दी थी। पूरे कार्यक्रम की लागत लगभग 12,622 करोड़ से 13,440 करोड़ रुपये के बीच है।
इन नए युद्धपोतों का उद्देश्य भारतीय नौसेना के उन रूसी मूल के अभय-क्लास कोरवेट की जगह लेना है, जिन्हें 1990 के दशक की शुरुआत में सेवा में शामिल किया गया था। कई दशक तक सेवा देने के बाद अब उनकी जगह आधुनिक तकनीक वाले नए प्लेटफॉर्म तैयार किए जा रहे हैं।
नए जहाजों में बेहतर सेंसर, अधिक आधुनिक हथियार और स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है।
चीन और पाकिस्तान बढ़ रहीं पनडुब्बी गतिविधियां
हिंद महासागर क्षेत्र में पिछले कुछ सालों के दौरान चीन ने अपनी पनडुब्बियों की तैनाती बढ़ाई है। दूसरी ओर पाकिस्तान भी चीन की मदद से हैंगोर-क्लास एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (एआईपी) पनडुब्बियां अपने बेड़े में शामिल कर रहा है।
सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी संघर्ष की स्थिति में पाकिस्तान अपनी पनडुब्बी क्षमता पर अधिक भरोसा कर सकता है। ऐसे हालात में तटीय क्षेत्रों में पनडुब्बियों का समय रहते पता लगाना भारतीय नौसेना के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।
इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए एएसडब्ल्यू-एसडब्ल्यूसी कार्यक्रम शुरू किया गया था, ताकि तटीय समुद्री क्षेत्रों की निगरानी और पनडुब्बी रोधी अभियान अधिक प्रभावी बनाए जा सकें।
बड़े युद्धपोतों का बोझ होगा कम
भारतीय नौसेना के बड़े युद्धपोत, जैसे फ्रिगेट और डेस्ट्रॉयर, सामान्य तौर पर गहरे समुद्र में लंबे अभियानों के लिए तैयार किए जाते हैं। यदि उन्हें तटीय इलाकों में पनडुब्बियों की खोज में लगाना पड़े तो उनकी अन्य जिम्मेदारियां प्रभावित हो सकती हैं।
आईएनएस मालवन जैसे युद्धपोत इसी जरूरत को पूरा करेंगे। ये कम गहराई वाले समुद्री क्षेत्रों में निगरानी और पनडुब्बी रोधी अभियान संभालेंगे, जबकि बड़े युद्धपोत गहरे समुद्र में अपने रणनीतिक अभियानों पर ध्यान दे सकेंगे। (INS Malwan Commissioning)
इस तरह नौसेना अपने उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग कर सकेगी।
हेलीकॉप्टर और समुद्री विमानों के साथ भी करेगा काम
आईएनएस मालवन को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वह अकेले काम करने के बजाय नौसेना के अन्य प्लेटफॉर्म के साथ मिलकर भी अभियान चला सके।
यह जहाज नौसेना के हेलीकॉप्टरों और समुद्री गश्ती विमानों से मिलने वाली जानकारी का उपयोग कर सकता है। इसी तरह जहाज से जुटाई गई जानकारी भी दूसरे प्लेटफॉर्म तक भेजी जा सकती है। इससे समुद्र में निगरानी का दायरा और अधिक मजबूत होता है। (INS Malwan Commissioning)
मेंटेनेंस पर भी विशेष ध्यान
नौसेना ने इस परियोजना में केवल युद्ध क्षमता पर ही नहीं, बल्कि लंबे समय तक संचालन और रखरखाव पर भी जोर दिया है। जहाज में ऐसे सिस्टम लगाए गए हैं जिन्हें जरूरत पड़ने पर आसानी से बदला जा सके। स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता, तकनीकी सहायता और रखरखाव की व्यवस्था भी इस परियोजना का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इससे जहाज लंबे समय तक परिचालन के लिए तैयार रहेंगे। (INS Malwan Commissioning)
80 फीसदी से अधिक स्वदेशी तकनीक
आईएनएस मालवन की सबसे बड़ी खासियत इसका स्वदेशी निर्माण है। इस जहाज में 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है। कई महत्वपूर्ण सिस्टम भारत में ही तैयार किए गए हैं। इससे रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के प्रयासों को भी मजबूती मिली है।
इस परियोजना के तहत भारतीय रक्षा उद्योग, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और निजी उद्योगों ने मिलकर कई महत्वपूर्ण उपकरण तैयार किए हैं। (INS Malwan Commissioning)
2026 में 18 नए जहाज शामिल करने की तैयारी
आईएनएस मालवन वर्ष 2026 में नौसेना के महत्वाकांक्षी विस्तार कार्यक्रम का हिस्सा है। नौसेना इस साल कुल 18 नए पोत और सहायक जहाज सेवा में शामिल करने की योजना पर काम कर रही है। इनमें अतिरिक्त एएसडब्ल्यू-एसडब्ल्यूसी युद्धपोत, प्रोजेक्ट 17ए का अंतिम स्टील्थ फ्रिगेट, डाइविंग सपोर्ट वेसल निपुण और कई सहायक जहाज शामिल हैं। अगले दो महीनों में भी कई नए युद्धपोत नौसेना को मिलने की उम्मीद है। (INS Malwan Commissioning)
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