HomeIndian Armyकारगिल का वो सच जिसे आज भी भूलना चाहता है पाकिस्तान, भारतीय...

कारगिल का वो सच जिसे आज भी भूलना चाहता है पाकिस्तान, भारतीय सेना ने निभाई मानवता की मिसाल

टाइगर हिल की लड़ाई इसलिए भी खास मानी जाती है क्योंकि इसमें दोनों देशों के सैनिकों को उनकी बहादुरी के लिए सर्वोच्च वीरता पुरस्कार मिले...

रक्षा समाचार WhatsApp Channel Follow US

📍नई दिल्ली/कारगिल | 21 Jul, 2026, 7:43 PM

Kargil War Pakistani Soldiers Buried: कारगिल युद्ध की चर्चा जब भी होती है तो सबसे पहले भारतीय सेना के युवा अधिकारी कैप्टन सौरभ कालिया और उनके पांच साथियों के साथ हुई अमानवीय यातना का जिक्र भी जरूर आता है। मई 1999 में पाकिस्तानी सेना की कैद में जाने के बाद कैप्टन सौरभ कालिया और उनके साथियों के शव जिस हालत में भारत को लौटाए गए, उसने पूरे देश को झकझोर दिया था। उनके शरीर पर यातना के कई निशान थे। भारत ने उस समय इसे जिनेवा समझौते के तहत युद्ध के नियमों का गंभीर उल्लंघन बताया।

वहीं, दूसरी तरफ भारतीय सेना थी, जिस समय पाकिस्तान अपने कई सैनिकों के शव लेने से इनकार कर रहा था, तो उन्होंने पाकिस्तानी सैनिकों को पूरे सैन्य सम्मान और इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार दफनाया। भारतीय सेना ने जिम्मेदारी निभाते हुए बाद में उन्हीं शवों को दुर्गम पहाड़ियों से निकालकर पाकिस्तान को सौंपने के लिए भी भारतीय सैनिकों ने अपनी जान जोखिम में डाली। लगभग 249 पाकिस्तानी सैनिकों के शव भारतीय सेना ने बरामद किए थे।

Kargil War Pakistani Soldiers Buried: पाकिस्तान ने पहले सैनिकों की मौजूदगी से ही किया इनकार

कारगिल युद्ध मई 1999 में शुरू हुआ था। पाकिस्तान ने नियंत्रण रेखा पार कर कारगिल, द्रास, बटालिक, टोलोलिंग, चोरबाट ला और आसपास की कई ऊंची चोटियों पर कब्जा कर लिया था। शुरुआत में पाकिस्तान ने का दावा किया था कि इन इलाकों में उसकी सेना नहीं, बल्कि “कश्मीरी मुजाहिदीन” लड़ रहे हैं। इसके लिए पकिस्तानी सेना ने जानबूझ कर उनकी बातचीत भारत को इंटरसेप्ट करवाई, ताकि भारतीय सेना को यह भरोसा दिया जा सके कि वे घुसपैठिये मुजाहिद हैं।

लेकिन भारतीय सेना को युद्ध के दौरान जिन लोगों के शव मिले, उनके पास से पाकिस्तानी सेना के पहचान पत्र, यूनिट के दस्तावेज, हथियार और सैन्य सामग्री मिली। इससे साफ हो गया कि लड़ाई में पाकिस्तान की नियमित सेना, खासकर नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री (एनएलआई) की कई बटालियन सीधे शामिल थीं।

इसके बावजूद पाकिस्तान ने लंबे समय तक अपने कई सैनिकों के शव लेने से इनकार किया। क्योंकि ऐसा करने से पाकिस्तान की आधिकारिक कहानी कमजोर पड़ जाती कि कारगिल में केवल घुसपैठिए लड़ रहे थे।

भारतीय सेना ने निभाई सैन्य परंपरा

भारतीय सेना ने युद्ध के दौरान मिले पाकिस्तानी सैनिकों के शवों के साथ वही व्यवहार किया, जो अंतरराष्ट्रीय सैन्य परंपराओं और जिनेवा कन्वेंशन की भावना के अनुरूप माना जाता है।

पहले सैनिकों की पहचान से जुड़े दस्तावेज, पहचान पत्र और व्यक्तिगत सामान सुरक्षित किए गए। इसके बाद मुस्लिम धार्मिक परंपरा का सम्मान करते हुए जनाजा पढ़वाया गया और शवों को दफनाया गया। जहां संभव हुआ, वहां कब्रों पर पहचान से जुड़ी जानकारी भी दर्ज की गई ताकि भविष्य में जरूरत पड़ने पर शवों की पहचान की जा सके।

युद्ध के दौरान भारतीय सेना की इस कार्रवाई का कई विदेशी मीडिया संस्थानों और सैन्य लेखकों ने भी उल्लेख किया।

बटालिक सेक्टर में भी दफन किए गए पाकिस्तानी सैनिक

कारगिल युद्ध की सबसे कठिन लड़ाइयों में से कई बटालिक सेक्टर में हुई थीं। यहां खालूबार रिज, जुबार, कुकरथांग, गनासोक, यालडोर घाटी और पॉइंट 5203 जैसी ऊंचाइयों पर भारतीय सेना ने भीषण संघर्ष के बाद कब्जा वापस लिया।

यह बेहद कम लोगों को पता है कि बटालिक में भी पाकिस्तानी सैनिकों को दफनाया गया था। दरअसल द्रास औऱ कारगिल में मीडिया की भारी मौजूदगी थी, लेकिन बटालिक में उस दौरान कोई मीडिया से वहां शायद ही पहुंचा, जिसके चलते वहां की वीरता की कहानियां लोगों को कम पता चलीं।

यह भी पढ़ें:  Indian Army Flood Relief 2025: बाढ़ से जंग में सबसे आगे भारतीय सेना, 75 जगहों पर बचाई 21,500 जानें, हेलिकॉप्टरों ने भरी 500 घंटे उड़ान

बटालिक में भारतीय सैनिकों को कई पाकिस्तानी सैनिकों के शव मिले। कई शव ऐसी जगहों पर थे जहां हेलीकॉप्टर भी नहीं पहुंच सकते थे। ऊंची चट्टानों और बर्फ से ढके इलाकों के कारण शवों को नीचे लाना बेहद कठिन था।

कारगिल युद्ध के बाद भी बटालिक, गनासोक, यालडोर, खालूबर और आसपास के क्षेत्रों में दफन किए गए कई पाकिस्तानी सैनिकों का उल्लेख विभिन्न सैन्य पुस्तकों और पूर्व अधिकारियों के संस्मरणों में मिलता है। इनमें कैप्टन फरहत हसीब हैदर, मेजर अब्दुल वहाब और कैप्टन मुहम्मद अम्मार हुसैन जैसे अधिकारियों के नाम भी शामिल हैं। हालांकि सुरक्षा कारणों से इन कब्रों की सटीक लोकेशन कभी सार्वजनिक नहीं की गई।

द्रास और टाइगर हिल में भी दफनाए थे पाकिस्तानी सैनिक

केवल बटालिक ही नहीं, बल्कि द्रास, टोलोलिंग और टाइगर हिल की लड़ाइयों के बाद भी भारतीय सेना को बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिकों के शव मिले थे।

युद्ध समाप्त होने के बाद कुछ शव दोनों देशों के बीच सैन्य और राजनयिक माध्यमों से लौटाए गए, लेकिन कई सैनिक ऐसे भी रहे जिनके शव लेने पाकिस्तान की ओर से कोई आधिकारिक प्रयास नहीं किया गया। ऐसे सैनिकों को भारतीय सेना ने युद्ध क्षेत्र में ही दफनाया।

कारगिल युद्ध पर लिखी कई पुस्तकों और सैन्य संस्मरणों में इन घटनाओं का उल्लेख मिलता है। तत्कालीन थल सेना प्रमुख जनरल वीपी मलिक ने अपनी पुस्तक “कारगिल: फ्रॉम सरप्राइज टू विक्ट्री” में युद्ध के दौरान अपनाई गई सैन्य प्रक्रियाओं का विस्तार से वर्णन किया है।

इसी तरह ब्रिगेडियर एमपीएस बाजवा ने अपनी पुस्तक “कारगिल: द इनसाइड स्टोरी” में कई ऐसे मामलों का जिक्र किया है, जब भारतीय सेना ने दुश्मन सैनिकों के शवों के साथ सम्मानजनक व्यवहार किया।

युद्ध में शामिल कई वरिष्ठ अधिकारियों ने बाद में दिए गए साक्षात्कारों में भी स्वीकार किया कि भारतीय सेना ने हर स्तर पर सैन्य परंपराओं का पालन किया।

पाकिस्तान ने अपने कई अधिकारियों के शव भी नहीं लिए

पूर्व पाकिस्तानी सेना अधिकारी मेजर इमरान, जो बाद में समय से पहले सेना छोड़कर कनाडा में रहने लगे, उन्होंने अपनी रिसर्च शोध में ऐसे कई पाकिस्तानी अधिकारियों का उल्लेख किया है जिनके शव कभी पाकिस्तान वापस नहीं ले जा सका।

इनमें कैप्टन फरहत हसीब हैदर, मेजर अब्दुल वहाब और कैप्टन मुहम्मद अम्मार हुसैन जैसे अधिकारी शामिल हैं। इनके बारे में उपलब्ध जानकारी के अनुसार ये सभी कारगिल युद्ध के दौरान अलग-अलग मोर्चों पर मारे गए थे, लेकिन उनके शव लंबे समय तक भारतीय क्षेत्र में ही रहे।

इन अधिकारियों को पाकिस्तान ने बाद में वीरता पुरस्कार जरूर दिए, लेकिन उनके शवों को वापस लाने का कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड लंबे समय तक सामने नहीं आया।

रेडियो पर हुई दो कमांडरों की बातचीत

192 माउंटेन ब्रिगेड के तत्कालीन कमांडर ब्रिगेडियर एमपीएस बाजवा ने बाद में एक घटना का विस्तार से जिक्र किया। उनके अनुसार, 27 जुलाई 1999 के आसपास पाकिस्तान की फ्रंटियर फोर्स रेजिमेंट की 19वीं बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल मुस्तफा ने भारतीय सेना से सीधे रेडियो संपर्क किया।

मुस्तफा ने सबसे पहले कहा कि विभाजन से पहले फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ भी फ्रंटियर फोर्स रेजिमेंट का हिस्सा रह चुके थे। इसके बाद उन्होंने भारतीय अधिकारियों से कहा कि उनके सैनिक बहादुरी से लड़े हैं, लेकिन अब उनकी पलटन के कई जवान मारे गए हैं।

यह भी पढ़ें:  भारतीय सेना खरीदेगी 450 नए कार्ल गुस्ताफ मार्क-IV लॉन्चर, जानिए कितना घातक है यह एंटी-टैंक वेपन सिस्टम

उन्होंने भारतीय सेना से अनुरोध किया कि शव उन्हें लौटा दिए जाएं ताकि वह अपने सैनिकों को सम्मान के साथ दफना सकें। उन्होंने इसे अपनी पलटन की ‘इज्जत’ का सवाल बताया।

भारतीय कमांडर ने भी रखी शर्त

ब्रिगेडियर बाजवा ने तुरंत सहमति नहीं दी। उन्होंने पाकिस्तानी अधिकारी से कहा कि यदि शव लौटाए जाएंगे तो बदले में क्या होगा।

जवाब में लेफ्टिनेंट कर्नल मुस्तफा ने कहा कि यदि शव लौटा दिए गए तो उनकी बची हुई टुकड़ी नियंत्रण रेखा के उस पार वापस चली जाएगी और उस इलाके में आगे लड़ाई नहीं होगी।

ब्रिगेडियर बाजवा ने बाद में बताया कि उन्होंने मुस्तफा से पूछा कि क्या वह अपने शब्द पर कायम रहेंगे। इस पर पाकिस्तानी अधिकारी ने जवाब दिया, “मैं पठान हूं।”

ब्रिगेडियर बाजवा ने कहा कि वह भी अपने वादे पर कायम रहेंगे और शव सौंप दिए जाएंगे।

सफेद झंडे के साथ पहुंचे पाकिस्तानी सैनिक

भारतीय सेना ने शव सौंपने के लिए स्पष्ट नियम बनाए। ब्रिगेडियर बाजवा ने कहा कि पाकिस्तानी सैनिकों को सफेद झंडा, स्ट्रेचर और पूरी सैन्य मर्यादा के साथ आना होगा।

उन्होंने यह भी साफ किया कि शवों को किसी बोरे या असम्मानजनक तरीके से नहीं ले जाया जाएगा। हर शव को सम्मान के साथ स्ट्रेचर पर रखा जाएगा।

निर्धारित समय पर पाकिस्तानी सैनिक सफेद झंडे के साथ पहुंचे और भारतीय सेना ने पूरे सैन्य सम्मान के साथ शव उनके हवाले कर दिए। इस पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग भी की गई।

बाद में यही वीडियो इस बात का महत्वपूर्ण प्रमाण बना कि कारगिल युद्ध में पाकिस्तान की नियमित सेना लड़ रही थी, जबकि उस समय पाकिस्तान लगातार कह रहा था कि केवल घुसपैठिए या तथाकथित मुजाहिदीन शामिल हैं।

टाइगर हिल: बहादुरी के दो सर्वोच्च सम्मानों की बनी गवाह

कारगिल युद्ध 1999 में टाइगर हिल सबसे अहम और सबसे कठिन लड़ाइयों में से एक थी। इस ऊंची चोटी पर पाकिस्तान का कब्जा था। इसे वापस लेने के लिए भारतीय सेना की 18 ग्रेनेडियर्स ने 3 और 4 जुलाई 1999 की रात बड़ा हमला किया। भारी गोलाबारी, खड़ी चट्टानों और बेहद कठिन मौसम के बीच भारतीय सैनिकों ने चोटी पर कब्जा कर लिया।

यह लड़ाई इसलिए भी खास मानी जाती है क्योंकि इसमें दोनों देशों के सैनिकों को उनकी बहादुरी के लिए सर्वोच्च वीरता पुरस्कार मिले।

भारतीय सेना के ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव ने खड़ी चट्टान पर चढ़ते हुए दुश्मन के बंकरों तक पहुंचने का रास्ता बनाया। इस दौरान उन्हें तीन गोलियां लगीं, लेकिन उन्होंने लड़ाई नहीं छोड़ी। उनकी बहादुरी के लिए उन्हें भारत का सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परम वीर चक्र दिया गया।

दूसरी ओर, पाकिस्तान की 12 नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री के कैप्टन कर्नल शेर खान भी टाइगर हिल पर अंत तक लड़ते रहे और युद्ध में मारे गए। भारतीय सेना ने उनका शव बरामद कर पूरे सम्मान के साथ पाकिस्तान को सौंपा। बाद में पाकिस्तान ने उनकी बहादुरी के लिए उन्हें मरणोपरांत अपना सर्वोच्च वीरता पुरस्कार निशान-ए-हैदर प्रदान किया।

टाइगर हिल की जीत कारगिल युद्ध का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुई। इस लड़ाई ने दोनों देशों के सैनिकों के साहस, कर्तव्य और बलिदान की मिसाल पेश की, जिसे आज भी कारगिल युद्ध के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जाता है।

टाइगर हिल पर भी भारतीय सेना ने निभाई जिम्मेदारी

टाइगर हिल की लड़ाई में पाकिस्तान के कैप्टन कर्नल शेर खान और कैप्टन मुहम्मद अम्मार हुसैन भी मारे गए थे। दोनों ने भारतीय सेना की 8 सिख बटालियन के खिलाफ जवाबी हमला किया था।

यह भी पढ़ें:  TAIWS: LoC पर भारत पहली बार लगाने जा रहा है यह घातक हथियार, खोज-खोज कर आतंकियों को करेगा ढेर, इजरायल भी होगा फेल!

लड़ाई खत्म होने के बाद भारतीय सेना ने कैप्टन शेर खान की बहादुरी को भी स्वीकार किया। ब्रिगेडियर बाजवा ने उनके शव को सम्मानपूर्वक नीचे लाने का आदेश दिया और पाकिस्तान को भेजते समय उनके साहस का उल्लेख करते हुए उनकी शर्ट की जेब में एक पर्ची भी रखी थी।

बाद में पाकिस्तान ने कैप्टन कर्नल शेर खान को अपना सर्वोच्च वीरता पुरस्कार निशान-ए-हैदर प्रदान किया।

इसके विपरीत, उपलब्ध सैन्य विवरणों के अनुसार कैप्टन मुहम्मद अम्मार हुसैन का शव लंबे समय तक वहीं युद्ध क्षेत्र में रहा और उसे पाकिस्तान तत्काल वापस नहीं ले सका।

कैप्टन तैमूर मलिक की कहानी बनी मानवता की मिसाल

कारगिल युद्ध की दिल झकझोर देने वाली घटनाओं में कैप्टन मीर तैमूर मलिक की कहानी भी शामिल है। वह पाकिस्तान सेना की 38 ए.के./पैरा ब्रिगेड से जुड़े थे और पॉइंट 5770 पर तैनात थे।

27 जून 1999 को भारतीय सेना की 27 राजपूत बटालियन ने लगभग 18,930 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस पोस्ट पर हमला किया। मेजर नवदीप एस. चीमा, कैप्टन श्यामल सिन्हा, हवलदार जोगिंदर सिंह और लद्दाख स्काउट्स के जवानों ने लगभग सीधी बर्फीली चट्टान पर चढ़ाई कर यह ऑपरेशन पूरा किया।

भीषण लड़ाई में कैप्टन तैमूर मलिक और उनके छह सैनिक मारे गए। पाकिस्तान ने उस समय उनके शव लेने से इनकार कर दिया। भारतीय सैनिकों ने ऊंची चट्टान पर ही अस्थायी कब्र बनाकर उन्हें पूरे सम्मान के साथ दफनाया।

दादी की अपील पर फिर निकाले गए शव

युद्ध समाप्त होने के बाद कैप्टन तैमूर मलिक की दादी जोहरा अपने पोते का शव वापस लाने के लिए लगातार प्रयास करती रहीं। उनका परिवार ब्रिटेन में भारतीय उच्चायोग के रक्षा सलाहकार ब्रिगेडियर सुधीर शर्मा के संपर्क में आया।

ब्रिगेडियर शर्मा ने यह मामला सेना मुख्यालय तक पहुंचाया। इसके बाद तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल वीपी मलिक की स्वीकृति मिलने पर भारतीय सेना ने एक बेहद कठिन अभियान शुरू किया।

लगभग 19 हजार फीट की ऊंचाई पर बने अस्थायी कब्रों तक सैनिक फिर पहुंचे। शवों को सावधानी से बाहर निकाला गया। उन्हें स्लीपिंग बैग में रखकर रस्सियों के सहारे खड़ी बर्फीली ढलानों से नीचे उतारा गया। एक-एक शव को नीचे लाने में 7 से 8 सैनिकों की जरूरत पड़ी।

इसके बाद हेलीकॉप्टर की मदद से शवों को बेस कैंप लाया गया और 25 अगस्त 1999 को नियंत्रण रेखा पर पोस्ट-43 के जरिए पूरे सैन्य सम्मान के साथ पाकिस्तान को सौंप दिया गया।

अगले दिन 26 अगस्त 1999 को कैप्टन तैमूर मलिक को मुजफ्फराबाद के बुट्टदारा गांव में दफनाया गया। उनके साथ छह अन्य पाकिस्तानी सैनिकों के शव भी उनके परिवारों तक पहुंचे। (Kargil War Pakistani Soldiers Buried)

Author

  • herry passport

    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

रक्षा समाचार WhatsApp Channel Follow US
हरेंद्र चौधरी
हरेंद्र चौधरी
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

Most Popular