📍नई दिल्ली | 20 Jul, 2026, 7:55 PM
Kargil War Artillery OP Officer: कारगिल युद्ध की बात होती है तो सबसे पहले टाइगर हिल, तोलोलिंग और पॉइंट 5140 का नाम जहन में आता है। लेकिन इस युद्ध में कुछ ऐसे सैनिक भी थे, जिनका नाम बहुत कम लोगों ने सुना, जबकि उनकी भूमिका जीत की सबसे मजबूत नींव बनी। ये थे भारतीय सेना के आर्टिलरी ऑब्जर्वेशन पोस्ट (ओपी) अधिकारी। कारगिल युद्ध के दौरान ये पाकिस्तानी फौज का सबसे पहले निशाना बनते थे, क्योंकि ओपी अधिकारी उनकी गतिविधियों पर नजर रखते थे, उनका इशारा मिलते ही उन पर भारतीय तोपों का कहर बरपने लगता था।
Kargil War Artillery OP Officer: कारगिल युद्ध में क्यों सबसे ज्यादा खतरे में थे ओपी अधिकारी
ऐसे ही एक अधिकारी थे 15 फील्ड रेजिमेंट के कैप्टन सतीश कुमार। उन्होंने पूरे कारगिल युद्ध के दौरान अग्रिम मोर्चे पर रहकर न केवल तोपखाने का मार्गदर्शन किया, बल्कि तीन अलग-अलग मौकों पर मौत को बेहद करीब से देखकर भी बच निकले। उनकी कहानी कारगिल युद्ध के उन अनसुने अध्यायों में शामिल है, जिनके बिना भारतीय सेना की सफलता की तस्वीर पूरी नहीं होती।
कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय तोपें पहाड़ों के पीछे कई किलोमीटर दूर तैनात थीं। वहां से दुश्मन के बंकर सीधे दिखाई नहीं देते थे। ऐसे में तोपों को सही दिशा और सही दूरी बताने की जिम्मेदारी आर्टिलरी ऑब्जर्वेशन पोस्ट (ओपी) अधिकारियों की होती थी।
एक ओपी टीम में आम तौर पर तीन लोग होते थे। पहला होता था ओपी अधिकारी, जो दूरबीन और नक्शे की मदद से दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखता था। दूसरा तकनीकी सहायक होता था, जो गोले गिरने की जगह का विश्लेषण करता था। तीसरा रेडियो ऑपरेटर होता था, जो वायरलेस के जरिए पीछे मौजूद बैटरी कमांडर तक हर सूचना पहुंचाता था।
युद्ध के दौरान यह छोटी टीम दुश्मन के बेहद करीब ऊंची पहाड़ियों पर तैनात रहती थी। उनके पास दूरबीन, रेडियो सेट, बैटरियां और नक्शे होते थे, जिससे उनकी पहचान आसानी से हो जाती थी। पाकिस्तानी सेना जानती थी कि अगर ओपी टीम सक्रिय रही, तो कुछ ही मिनटों में भारतीय तोपों की गोलाबारी इतनी सटीक हो जाएगी कि उनके बंकर सुरक्षित नहीं रहेंगे। यही कारण था कि पाकिस्तानी स्नाइपर, मोर्टार और आर्टिलरी सबसे पहले ओपी टीम को निशाना बनाने की कोशिश करते थे। (Kargil War Artillery OP Officer)
तोपखाने की आंखें कहलाते थे ओपी अधिकारी
सेना के अधिकारियों के अनुसार, ओपी अधिकारी किसी भी आर्टिलरी रेजिमेंट की “आंखें” होते हैं। जिस तरह आधुनिक हथियारों में लेजर डिजाइनेटर टारगेट की पहचान करता है, उसी तरह कारगिल युद्ध में यह काम ओपी अधिकारी करते थे।
वे पहाड़ी की ऊंचाई से दुश्मन के बंकरों पर गिर रहे गोले देखते थे और तुरंत रेडियो पर सुधार बताते थे। जैसे यदि गोला टारगेट से कुछ मीटर बाईं ओर गिरा, तो वह नई दिशा बताते थे। इसके बाद अगला गोला पहले से अधिक सटीक स्थान पर गिरता था। कुछ ही राउंड के बाद गोलाबारी सीधे दुश्मन के बंकरों पर होने लगती थी।
यही वजह थी कि कारगिल युद्ध में ओपी अधिकारी केवल ऑब्जर्वर नहीं थे, बल्कि पूरी आर्टिलरी कार्रवाई के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से माने जाते थे। (Kargil War Artillery OP Officer)
बटालिक सेक्टर में सबसे मुश्किल थी जिम्मेदारी
कैप्टन सतीश कुमार की तैनाती बटालिक सेक्टर में थी। यह इलाका कारगिल के सबसे कठिन युद्ध क्षेत्रों में गिना जाता है। कारगिल युद्ध के दौरान मीडिया का अधिक ध्यान द्रास, तोलोलिंग और टाइगर हिल पर रहा, लेकिन बटालिक में भी बेहद कठिन लड़ाई लड़ी गई थी। यहां की पहाड़ियां अधिक ऊंची, ढलान ज्यादा खड़ी और रास्ते बेहद कठिन थे।
यही वजह थी कि यहां तोपों को तैनात करने के लिए प्लेन जमीन बहुत कम मिलती थी। कई जगह तोपों को ऐसी स्थिति में रखना पड़ता था, जहां से उन्हें ऊंचे एंगल पर गोले दागने पड़ते थे। इसे हाई एंगल फायर कहा जाता है।
हाई एंगल फायर क्यों था चुनौती
बटालिक सेक्टर में भारतीय सेना की 105 मिमी इंडियन फील्ड गन (आईएफजी) मुख्य हथियारों में शामिल थी। ये तोपें दाह क्षेत्र में सिंधु नदी के पास कई किलोमीटर पीछे तैनात थीं। सामान्य परिस्थितियों में तोपें अपेक्षाकृत सीधे एंगल से फायर करती हैं, लेकिन बटालिक की ऊंची पहाड़ियों के कारण यहां गोले अधिक ऊंचे एंगल से दागने पड़ते थे।
हाई एंगल फायर में गोला अधिक ऊंचाई लेकर टारगेट तक पहुंचता है। इससे दुश्मन के चट्टानों और गुफाओं में बने बंकरों तक पहुंचना संभव होता है, लेकिन इसकी सटीकता बनाए रखना बेहद कठिन होता है। ऐसे में ओपी अधिकारी की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती थी।
कैप्टन सतीश कुमार अपनी टीम के साथ पहाड़ियों पर चढ़कर दुश्मन की हर गतिविधि पर नजर रखते थे और लगातार आर्टिलरी को सही निर्देश भेजते थे। (Kargil War Artillery OP Officer)
15 फील्ड रेजिमेंट ने बरसाए 45 हजार गोले
कारगिल युद्ध के दौरान 15 फील्ड रेजिमेंट ने बटालिक सेक्टर में जबरदस्त गोलाबारी की।
रिटायर्ड मेजर जनरल संजय सारण, जो उस समय 15 फील्ड रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर थे और बटालिक-तुर्तुक सेक्टर में आर्टिलरी ऑपरेशन को कॉर्डिनेट कर रहे थे। उन्होंने बताया कि केवल 45 दिनों में 105 मिमी आईएफजी से करीब 45,000 गोले दागे गए।
इतनी अधिक फायरिंग हुई कि कई तोपों की बैरल युद्ध क्षेत्र में ही बदलनी पड़ी। उन्होंने बताया कि युद्ध के दौरान रेजिमेंट में नए शामिल हुए गनरों ने भी अपने पूरे मिलिट्री करियर में जितने गोले नहीं दागे, उससे कहीं अधिक गोले केवल कारगिल युद्ध के दौरान चला दिए।
इसी उत्कृष्ट योगदान के लिए युद्ध के बाद कैप्टन सतीश कुमार को चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ कमेंडेशन कार्ड से सम्मानित किया गया। (Kargil War Artillery OP Officer)
1/11 गोरखा राइफल्स के साथ निभाई अहम भूमिका
बटालिक सेक्टर में कैप्टन सतीश कुमार ने 1/11 गोरखा राइफल्स, 12 जम्मू-कश्मीर लाइट इन्फैंट्री और 22 ग्रेनेडियर्स जैसी अग्रिम लड़ाकू इकाइयों के साथ काम किया। जब भी इन्फैंट्री को किसी पाकिस्तानी चौकी या बंकर पर हमला करना होता था, उससे पहले कैप्टन सतीश कुमार अपनी ओपी टीम के साथ पहाड़ी की ऊंचाई पर पहुंचकर दुश्मन की स्थिति का पता लगाते थे।
उनकी ओर से भेजे गए निर्देशों के आधार पर भारतीय तोपें कई किलोमीटर दूर से सटीक गोलाबारी करती थीं। भारी तबाही के बाद जब दुश्मन कमजोर हो जाता था, तब भारतीय इन्फैंट्री आगे बढ़कर उन पर कब्जा करती थी।
कारगिल युद्ध में आर्टिलरी और इन्फैंट्री के बीच यही तालमेल भारतीय सेना की सबसे बड़ी ताकत बना। कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेना ने लगभग 2.5 लाख से अधिक गोले और रॉकेट दागे। दुश्मन की ऊंची चोटियों पर बने मजबूत बंकरों को नष्ट करने में आर्टिलरी की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही। (Kargil War Artillery OP Officer)
तीन बार मौत को मात देकर लौटे कैप्टन सतीश कुमार
कारगिल युद्ध के दौरान कैप्टन सतीश कुमार तीन बार मौत के बेहद करीब पहुंचे, लेकिन हर बार बाल-बाल बच निकले। मई 1999 में गनासोक हाइट्स पर वह अपनी ओपी टीम के साथ 1/11 गोरखा राइफल्स को आर्टिलरी सहायता दे रहे थे। दुश्मन के बंकरों पर नजर रखते हुए उन्हें अचानक लगा कि उनकी मौजूदा पोजीशन सुरक्षित नहीं है। उन्होंने अपनी टीम को तुरंत वहां से हटने का आदेश दिया। कुछ ही सेकंड बाद उसी स्थान पर पाकिस्तानी सेना का मोर्टार गोला गिरा और लगातार गोलाबारी शुरू हो गई।
जून 1999 में एरिया स्प्रिंग में लेफ्टिनेंट जी.एस. घुमन के साथ तैनाती के दौरान एक पाकिस्तानी स्नाइपर की गोली उनके बालों को छूते हुए निकल गई, लेकिन वे सुरक्षित बच गए।
वहीं जुलाई 1999 में खालूबर रिज पर 22 ग्रेनेडियर्स के साथ अभियान के दौरान उनके कान के पास से लगातार तीन गोलियां निकलीं। कैप्टन सतीश कुमार ने तुरंत साथियों को सतर्क किया। तलाशी में एक पाकिस्तानी सैनिक जी-3 राइफल के साथ छिपा मिला, जो पीछे छूट जाने के बाद किसी भारतीय अधिकारी को निशाना बनाना चाहता था।
इन्हीं अभियानों के दौरान उन्होंने एक ऐसी घटना भी देखी, जिसमें चट्टान की गुफा में शरण लेने वाले एक भारतीय जवान के ऊपर सीधे पाकिस्तानी गोला गिरा और उसकी मौके पर ही मौत हो गई, जबकि उसके आसपास मौजूद अन्य सैनिक सुरक्षित बच गए। (Kargil War Artillery OP Officer)
प्वाइंट 5203 पर एक साथ लगाए गए तीन ओपी
बटालिक सेक्टर में स्थित प्वाइंट 5203 भारतीय सेना के लिए सबसे कठिन लक्ष्यों में से एक था। इस ऊंचाई पर बने पाकिस्तानी बंकरों पर प्रभावी गोलाबारी सुनिश्चित करने के लिए कैप्टन सतीश कुमार को एक नहीं, बल्कि तीन अलग-अलग ऑब्जर्वेशन पोस्ट तैनात करनी पड़ीं।
अलग-अलग एंगल से दुश्मन की स्थिति देखने के बाद ही तोपों को सही निर्देश दिए जा सके। इससे भारतीय गोलाबारी की सटीकता बढ़ी और इन्फैंट्री को आगे बढ़ने में मदद मिली। (Kargil War Artillery OP Officer)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।



