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जहां कैमरा होगा फेल, वहां यह रडार देख लेगा दुश्मन…जानें क्या है भारतीय सेना का नया ‘सीक्रेट’ प्रोजेक्ट?

सेना ने ड्रोन बेस्ड फोलिएज पेनेट्रेशन (एफओपेन) रडार डेवलप करने की तैयारी शुरू कर दी है। यह प्रोजेक्ट मेक-II श्रेणी के तहत होगा, जिसमें भारतीय कंपनियां इस सिस्टम को डिजाइन, डेवलप और तैयार करेंगी...

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📍नई दिल्ली | 21 Jul, 2026, 12:31 PM

FOPEN Radar Drone: भारतीय सेना अब ऐसे ड्रोन सिस्टम को शामिल करने की तैयारी कर रही है, जो घने जंगलों और पेड़ों की मोटी छतरी के नीचे छिपे आतंकियों, घुसपैठियों और दुश्मन की गतिविधियों का पता लगा सके। इसके लिए सेना ने ड्रोन बेस्ड फोलिएज पेनेट्रेशन (एफओपेन) रडार डेवलप करने की तैयारी शुरू कर दी है। यह प्रोजेक्ट मेक-II श्रेणी के तहत होग, जिसमें भारतीय कंपनियां इस सिस्टम को डिजाइन, डेवलप और तैयार करेंगी।

यह सिस्टम खास तौर पर उन इलाकों के लिए तैयार किया जा रहा है, जहां सामान्य ड्रोन कैमरे, थर्मल कैमरे या ऑप्टिकल सेंसर काम नहीं कर पाते। जम्मू-कश्मीर के घने जंगल, पूर्वोत्तर के पहाड़ी राज्य और सीमावर्ती वन क्षेत्र ऐसे इलाके हैं, जहां आतंकवादी और घुसपैठिए पेड़ों की घनी पत्तियों के नीचे छिपकर अपनी गतिविधियां चलाते हैं। ऐसे हालात में सेना को ऐसी तकनीक की जरूरत महसूस हुई, जो पेड़ों के आर-पार देखकर जमीन पर मौजूद गतिविधियों की जानकारी दे सके।

FOPEN Radar Drone: क्या है फोलिएज पेनेट्रेशन रडार

फोलिएज पेनेट्रेशन रडार (एफओपेन) का मतलब है ऐसा रडार जो घने पेड़ों, पत्तियों और जंगल की छतरी के बीच से भी जमीन की जानकारी जुटा सके।

आमतौर पर जब कोई ड्रोन कैमरे से निगरानी करता है तो उसे केवल पेड़ों का ऊपरी हिस्सा दिखाई देता है। अगर कोई व्यक्ति, वाहन या हथियार पेड़ों के नीचे छिपा हो तो कैमरा उसे नहीं देख पाता। यही समस्या थर्मल कैमरों और कई सामान्य सेंसरों के साथ भी होती है।

एफओपेन रडार विशेष रेडियो तरंगों का इस्तेमाल करता है, जो पेड़ों और पत्तियों के बीच से गुजर सकती हैं। इसके बाद रडार जमीन से लौटने वाले सिग्नल का विश्लेषण करता है और यह पता लगाने की कोशिश करता है कि नीचे कोई व्यक्ति, वाहन या दूसरी गतिविधि मौजूद है या नहीं। यही वजह है कि दुनिया की कई सेनाएं जंगलों में निगरानी के लिए इस तरह की तकनीक का इस्तेमाल कर रही हैं।

आतंकवाद और घुसपैठ जैसी चुनौतियां

भारतीय सेना को केवल पारंपरिक युद्ध की तैयारी नहीं करनी होती, बल्कि आतंकवाद और घुसपैठ जैसी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है। जम्मू-कश्मीर के जंगलों में कई बार आतंकवादी पेड़ों और झाड़ियों की आड़ लेकर छिप जाते हैं। इसी तरह पूर्वोत्तर के राज्यों में भी घने जंगल सुरक्षा बलों के लिए बड़ी चुनौती बने रहते हैं।

इन इलाकों में सामान्य ड्रोन कई बार केवल ऊपर की तस्वीर भेजते हैं, जबकि असली खतरा नीचे छिपा होता है। ऐसी स्थिति में सैनिकों को आगे बढ़ने से पहले पूरी जानकारी नहीं मिल पाती। एफओपेन रडार इस कमी को दूर करने के लिए तैयार किया जा रहा है। अगर ड्रोन उड़ते समय नीचे छिपी गतिविधियों की जानकारी पहले ही मिल जाए तो ऑपरेशन की योजना अधिक सटीक तरीके से बनाई जा सकती है। (FOPEN Radar Drone)

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छोटा ड्रोन लेकिन बड़ी जिम्मेदारी

सेना ने इस प्रोजेक्ट के लिए हल्के ड्रोन की मांग रखी है। पूरे सिस्टम का वजन 20 किलोग्राम से अधिक नहीं होना चाहिए, ताकि इसे आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाया जा सके।

ड्रोन में इतना पेलोड होगा कि वह एफओपेन रडार को लेकर उड़ सके। इसके साथ ही उसका फ्लाइंग टाइम 60 से 120 मिनट के बीच होना चाहिए। सेना चाहती है कि यह ड्रोन एक बार उड़ान भरने के बाद लंबे समय तक निगरानी कर सके।

सिस्टम की ऑपरेशनल रेंज 5 से 10 किलोमीटर रखी गई है। इससे सैनिक सुरक्षित दूरी पर रहते हुए जंगलों की निगरानी कर सकेंगे। (FOPEN Radar Drone)

ऊंचे पहाड़ों में भी करेगा काम

भारतीय सेना की बड़ी तैनाती हिमालयी क्षेत्रों में है। इसलिए सेना ने इस सिस्टम के लिए ऊंचाई पर काम करने की क्षमता भी अनिवार्य रखी है।

ड्रोन और रडार दोनों को 4500 मीटर तक की ऊंचाई पर काम करने में सक्षम होना होगा। इसके अलावा यह सिस्टम माइनस 20 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 50 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में भी काम कर सके।

यह सिस्टम लद्दाख जैसे ठंडे इलाकों से लेकर राजस्थान और मध्य भारत जैसे गर्म क्षेत्रों तक इस्तेमाल किया जा सकेगा। (FOPEN Radar Drone)

केवल कैमरा नहीं, रडार करेगा असली काम

इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी खासियत इसका रडार है। यह सामान्य कैमरे की तरह केवल तस्वीर नहीं लेता, बल्कि रेडियो तरंगों की मदद से आसपास के इलाके का विश्लेषण करता है।

रडार से मिलने वाली जानकारी सीधे जमीन पर मौजूद सैनिकों तक पहुंचेगी। इससे सैनिकों को तुरंत पता चल सकेगा कि आगे का इलाका सुरक्षित है या वहां किसी प्रकार की गतिविधि दिखाई दे रही है।

सेना चाहती है कि डेटा रियल टाइम में मिले, ताकि निर्णय लेने में देरी न हो। (FOPEN Radar Drone)

एसएआर तकनीक से बढ़ेगी सटीकता

भारतीय सेना ने आरएफपी में यह भी पूछा है कि क्या एफओपेन रडार सिंथेटिक एपर्चर रडार (एसएआर) तकनीक पर आधारित होगा।

एसएआर आधुनिक रडार तकनीक है, जिसमें ड्रोन उड़ते समय लगातार सिग्नल भेजता और प्राप्त करता रहता है। बाद में इन सभी सिग्नलों को जोड़कर कंप्यूटर बहुत अधिक स्पष्ट तस्वीर तैयार करता है।

इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि छोटे ड्रोन पर भी बिना बड़े एंटीना के हाई क्वॉलिटी वाली रडार इमेज तैयार की जा सकती है।

एसएआर तकनीक कम फ्रीक्वेंसी वाली रेडियो तरंगों के साथ मिलकर घने जंगलों के नीचे छिपी गतिविधियों की पहचान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए दुनिया के कई आधुनिक फोलिएज पेनेट्रेशन सिस्टम इसी तकनीक का उपयोग करते हैं।

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सैनिकों तक तुरंत पहुंचेगी रियल टाइम जानकारी

सेना की सबसे बड़ी जरूरत यह है कि ड्रोन से मिलने वाला डेटा बिना किसी देरी के सीधे जमीन पर मौजूद सैनिकों तक पहुंचे। इसके लिए एफओपेन रडार में रियल टाइम डेटा ट्रांसमिशन की सुविधा होनी चाहिए।

अगर ड्रोन जंगल के ऊपर उड़ते समय किसी संदिग्ध गतिविधि का पता लगाता है तो उसकी जानकारी तुरंत ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन और ऑपरेशन चला रही टीम तक पहुंच जाएगी। इससे सैनिकों को आगे बढ़ने से पहले इलाके की स्थिति समझने में मदद मिलेगी।

सेना ने यह भी पूछा है कि डेटा ट्रांसमिशन में कितनी देरी होगी। जितनी कम देरी होगी, सिस्टम उतना ही प्रभावी माना जाएगा।

सुरक्षित रहेगा पूरा कम्युनिकेशन नेटवर्क

आज के समय में इलेक्ट्रॉनिक युद्ध भी मिलिट्री ऑपरेशनों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। इसी कारण सेना ने ड्रोन और ग्राउंड स्टेशन के बीच सुरक्षित संचार पर विशेष जोर दिया है।

आरएफपी के अनुसार सिस्टम में एस या सी बैंड डेटा लिंक का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके साथ 256-बिट एईएस एन्क्रिप्शन अनिवार्य होगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ड्रोन से भेजी जा रही जानकारी को कोई दुश्मन बीच में पढ़ या बदल न सके।

सिक्योर डेटा लिंक के कारण निगरानी के दौरान मिलने वाली जानकारी केवल अधिकृत सैनिकों तक ही पहुंचेगी।

एक साथ कई नेविगेशन सिस्टम का होगा उपयोग

भारतीय सेना चाहती है कि यह ड्रोन केवल एक सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम पर निर्भर न रहे। इसी वजह से प्रस्ताव में नैवस्टार (जीपीएस), ग्लोनास और आईआरएनएसएस (नैविक) के साथ काम करने की क्षमता मांगी गई है। जरूरत पड़ने पर ऑपरेटर इनमें से किसी एक या कई सिस्टम को सिलेक्ट कर सकेगा। इस सिस्टम से किसी एक सैटेलाइट नेटवर्क में समस्या आने पर भी ड्रोन अपना मिशन जारी रख सकेगा। (FOPEN Radar Drone)

खराब मौसम में भी जारी रहेगी निगरानी

यह सिस्टम हर मौसम में करेगा। ड्रोन और रडार दोनों के लिए आईपी-65 या उससे बेहतर सुरक्षा मानक तय किया गया है। इसका मतलब है कि सिस्टम धूल और पानी से सुरक्षित रहेगा और कठिन मौसम में भी काम कर सकेगा।

साथ ही ड्रोन को तेज हवा में भी स्थिर उड़ान बनाए रखने में सक्षम होना होगा। कंपनियों को अपनी तकनीकी जानकारी में यह भी बताना होगा कि उनका सिस्टम कितनी तेज हवा सह सकता है।

जरूरत पड़ने पर कंधे पर लेकर भी इस्तेमाल किया जा सकेगा

इस प्रोजेक्ट की एक खास बात यह भी है कि एफओपेन रडार केवल ड्रोन तक सीमित नहीं रहेगा। सेना चाहती है कि जरूरत पड़ने पर यही रडार मैन-पैक मोड में भी इस्तेमाल किया जा सके। यानी सैनिक इसे अपने कंधे पर लेकर भी ऑपरेशन क्षेत्र में ले जा सकें। इससे उन इलाकों में भी इसका इस्तेमाल संभव होगा, जहां ड्रोन उड़ाना कठिन हो या जहां जमीन से निगरानी की जरूरत हो। (FOPEN Radar Drone)

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लंबे समय तक मिलेगा रखरखाव

सेना ने कंपनियों से पूछा है कि वे कितने सालों तक स्पेयर पार्ट्स उपलब्ध करा सकेंगी, सिस्टम की मरम्मत कैसे होगी और सॉफ्टवेयर अपडेट कितने समय तक दिए जाएंगे।

प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि सिस्टम का डिजाइन ऐसा हो कि यदि कोई हिस्सा खराब हो जाए तो उसे मैदान में ही आसानी से बदला जा सके। इसके अलावा विशेष परीक्षण उपकरण, रखरखाव उपकरण और विस्तृत तकनीकी पुस्तिकाएं भी उपलब्ध करानी होंगी। (FOPEN Radar Drone)

60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री जरूरी

इस प्रोजेक्ट की सबसे महत्वपूर्ण शर्तों में से एक कम से कम 60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री है। कंपनियों को यह बताना होगा कि सिस्टम के कौन-कौन से हिस्से भारत में तैयार होंगे और यदि कोई तकनीक विदेश से लेनी पड़ेगी तो उसका प्रतिशत कितना होगा।

सेना ने यह भी पूछा है कि भविष्य में विदेशी हिस्सों को भारतीय तकनीक से बदलने की क्या योजना होगी। इसके साथ बौद्धिक संपदा अधिकार और महत्वपूर्ण तकनीकों की जानकारी भी मांगी गई है।

पहले बनेगा प्रोटोटाइप, फिर होंगे यूजर ट्रायल

यह प्रोजेक्ट अभी शुरुआती चरण में है। इसलिए सेना ने तय संख्या में सिस्टम खरीदने की घोषणा नहीं की है।

सबसे पहले चयनित कंपनियां प्रोटोटाइप तैयार करेंगी। इसके बाद इन्फैंट्री डायरेक्टोरेट की ओर से यूजर ट्रायल किए जाएंगे। ट्रायल में यह देखा जाएगा कि सिस्टम घने जंगल, पहाड़ी क्षेत्र और अलग-अलग मौसम में कितना प्रभावी काम करता है। सेना ने कंपनियों से यह भी पूछा है कि ट्रायल के लिए कितने प्रोटोटाइप उपलब्ध कराए जा सकते हैं और बड़े पैमाने पर उत्पादन की उनकी क्षमता कितनी होगी। (FOPEN Radar Drone)

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  • herry passport

    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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