📍नई दिल्ली | 14 Jul, 2026, 8:00 AM
India S-400 China Drill: भारत के एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम को लेकर चीन कितना घबराया हुआ है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने हाल ही में एक सैन्य अभ्यास किया। , इस एक्सरसाइज में एस-400 जैसे एयर डिफेंस सिस्टम पर हमला करने का अभ्यास किया गया। हाल ही में पश्चिमी थिएटर कमांड की ओर से जारी वीडियो में 370 मिमी गाइडेड रॉकेट से एयर डिफेंस रडार पर हमला करते हुए दिखाया गया है।
चीन का पश्चिमी थिएटर कमांड भारत के साथ लगने वाली वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) की जिम्मेदारी संभालती है। अभ्यास के दौरान चीन ने लंबी दूरी तक मार करने वाले गाइडेड रॉकेट का इस्तेमाल करते हुए यह दिखाने की कोशिश की कि जरूरत पड़ने पर वह दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम पर शुरुआती हमला कर सकता है।
India S-400 China Drill: किस हथियार का किया गया इस्तेमाल
अभ्यास में चीन ने 370 मिमी गाइडेड रॉकेट का इस्तेमाल किया। माना जाता है कि यह रॉकेट पीसीएल-191 मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम से दागा जाता है। यह चीन की नई पीढ़ी की लंबी दूरी की रॉकेट प्रणाली है।
यह रॉकेट सैटेलाइट नेविगेशन और इनर्शियल गाइडेंस सिस्टम की मदद से अपने तय स्थान तक पहुंचता है। अलग-अलग संस्करणों की मारक क्षमता लगभग 300 से 350 किलोमीटर तक बताई जाती है।
चीन ने रॉकेट आर्टिलरी पर क्यों बढ़ाया जोर
पश्चिमी थिएटर कमांड ने पिछले कुछ सालों में अपनी लंबी दूरी की रॉकेट क्षमता में काफी बढ़ोतरी की है। इसमें पीसीएल-191 जैसे आधुनिक मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम शामिल हैं। यह सिस्टम कुछ ही मिनटों में कई गाइडेड रॉकेट दाग सकता है।
रिपोर्टों के मुताबिक 370 मिमी गाइडेड रॉकेट सैटेलाइट और इनर्शियल गाइडेंस की मदद से लंबी दूरी तक पहुंच सकते हैं। ऐसे हथियारों का इस्तेमाल स्थिर सैन्य ठिकानों, रडार स्टेशन, मिसाइल बैटरियों और कमांड सेंटर पर हमला करने के लिए किया जाता है।
साल 2020 में पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन के बीच तनाव बढ़ने के बाद पीएलए ने तिब्बत और शिनजियांग क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी लगातार मजबूत की है।
पश्चिमी थिएटर कमांड ने इन इलाकों में लंबी दूरी की रॉकेट प्रणाली, ड्रोन, निगरानी उपकरण और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम की संख्या बढ़ाई है। (India S-400 China Drill)
क्या है इस रणनीति का मतलब
चीन की यह एक्सरसाइज ‘सप्रेशन ऑफ एनिमी एयर डिफेंसिस (SEAD)’ और ‘डिस्ट्रक्शन ऑफ एनिमी एयर डिफेंसिस (DEAD)’ रणनीति पर आधारित थी। आधुनिक युद्ध में इन दोनों रणनीतियों का उद्देश्य किसी भी बड़े सैन्य अभियान की शुरुआत में दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को कमजोर या पूरी तरह निष्क्रिय करना होता है। इसके लिए पहले एयर डिफेंस रडार, मिसाइल लॉन्चर, कमांड सेंटर और अन्य महत्वपूर्ण ठिकानों की पहचान की जाती है। इसके बाद लंबी दूरी के गाइडेड रॉकेट, मिसाइल, ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और अन्य हथियारों की मदद से उन पर एक साथ हमला किया जाता है, ताकि विरोधी की हवाई सुरक्षा कमजोर पड़ जाए। जब एयर डिफेंस सिस्टम प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पाते, तब लड़ाकू विमान और अन्य हमलावर प्लेटफॉर्म अपेक्षाकृत कम जोखिम के साथ अपने मिशन पूरे कर सकते हैं।
चीन के हालिया अभ्यास से यह संकेत मिलता है कि उसकी सेना भविष्य में किसी भी बड़े संघर्ष की शुरुआत में सबसे पहले विरोधी के एयर डिफेंस नेटवर्क को निशाना बनाने की तैयारी पर विशेष ध्यान दे रही है। इसी सोच के तहत पीएलए ने अपने युद्धाभ्यास में गाइडेड रॉकेट, लंबी दूरी की मारक क्षमता और आधुनिक हमले की तकनीकों का प्रदर्शन किया। यह अभ्यास चीन की बदलती सैन्य रणनीति और संयुक्त युद्ध क्षमता को भी दर्शाता है।

अब केवल लड़ाकू विमानों पर निर्भर नहीं चीन
कुछ साल पहले तक लड़ाकू विमानों किसी भी देश की सुरक्षा की रीढ़ होते थे। लेकिन अब चीन अपनी रणनीति बदल रहा है। रिपोर्टों के अनुसार पीएलए अब रॉकेट आर्टिलरी, ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और साइबर हमलों का एक साथ इस्तेमाल करने की तैयारी कर रही है। इसका उद्देश्य युद्ध की शुरुआत में ही कम्युनिकेशन नेटवर्क, रडार, एयर डिफेंस सिस्टम और कमांड सेंटर को प्रभावित करना होता है। इसे मल्टी-डोमेन ऑपरेशन की रणनीति कहा जाता है, जिसमें एक साथ कई तरह के सैन्य साधनों का इस्तेमाल किया जाता है। (India S-400 China Drill)
भारत के लिए एस-400 क्यों अहम
भारत ने रूस से पांच एस-400 ट्रायम्फ एयर डिफेंस सिस्टम खरीदे हैं। यह दुनिया के सबसे आधुनिक लंबी दूरी के एयर डिफेंस सिस्टम में गिना जाता है। इसके अलावा रक्षा मंत्रालय पहले ही अतिरिक्त पांच एस-400 स्क्वाड्रन खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी दे चुका है। जिसके बाद भारत के पास कुल 10 एस-400 स्क्वाड्रन हो जाएंगे।
एस-400 एक साथ कई तरह के हवाई खतरों पर नजर रख सकता है। यह लड़ाकू विमान, ड्रोन, क्रूज मिसाइल और बैलिस्टिक मिसाइल को अलग-अलग दूरी पर रोकने की क्षमता रखता है। इसकी अधिकतम मारक क्षमता लगभग 400 किलोमीटर तक बताई जाती है।
भारतीय वायुसेना ने इसे उत्तर और पश्चिमी सीमाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए तैनात किया है। यह प्रणाली भारतीय वायुसेना के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम के साथ मिलकर काम करती है, जिससे अलग-अलग रडार और एयर डिफेंस नेटवर्क से जानकारी एक साथ मिलती रहती है। (India S-400 China Drill)
भारत भी लगातार मजबूत कर रहा है अपनी हवाई सुरक्षा
भारत भी बदलते युद्ध के स्वरूप को देखते हुए अपनी हवाई सुरक्षा व्यवस्था को लगातार मजबूत कर रहा है। एस-400 के अलावा आकाश मिसाइल सिस्टम, बराक-8, क्यूआरएसएएम और बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस जैसी कई प्रणालियां अलग-अलग स्तर पर सुरक्षा देती हैं। इन सभी को जोड़कर मल्टी-लेयर एयर डिफेंस नेटवर्क तैयार किया गया है।
इसके अलावा डीआरडीओ लंबे समय से प्रोजेक्ट कुशा पर भी काम कर रहा है। यह भारत का स्वदेशी लंबी दूरी का एयर डिफेंस सिस्टम है। इसका उद्देश्य भविष्य में विदेशी प्रणालियों पर निर्भरता कम करना और स्वदेशी क्षमता को मजबूत करना है।
भारतीय सेना और वायुसेना लगातार कर रही हैं अभ्यास
भारतीय सेना और वायुसेना भी समय-समय पर संयुक्त सैन्य अभ्यास करती रहती हैं। इन अभ्यासों में एयर डिफेंस सिस्टम, लड़ाकू विमान, मिसाइल इकाइयों और रडार नेटवर्क के बीच तालमेल की जांच की जाती है। साथ ही तेजी से तैनाती, स्थान बदलने और इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा से जुड़े अभ्यास भी किए जाते हैं। आधुनिक युद्ध में केवल अत्याधुनिक हथियार होना ही पर्याप्त नहीं है। उन्हें तेजी से तैनात करना, सुरक्षित रखना और पूरे नेटवर्क के साथ जोड़कर इस्तेमाल करना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। (India S-400 China Drill)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।



