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भारतीय सेना के T-72 और T-90 टैंकों के लिए आएंगे नए AI गनरी सिमुलेटर, बिना गोला दागे मिलेगी युद्ध की ट्रेनिंग

भारतीय सेना के पास बड़ी संख्या में टी-72 और टी-90 मुख्य युद्धक टैंक हैं। ये दोनों टैंक पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर सेना की बख्तरबंद ताकत की रीढ़ माने जाते हैं...

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📍नई दिल्ली | 14 Jul, 2026, 1:19 PM

T-72 T-90 Tanks Gunnery Simulator: भारतीय सेना अपने टैंक चालक दल की ट्रेनिंग को और आधुनिक बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठा रही है। सेना ने टी-72 और टी-90 मेन बेटल टैंकों के लिए कुल 150 अत्याधुनिक गनरी सिमुलेटर खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके लिए मई 2026 में तीन अलग-अलग रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन (आरएफआई) जारी किए गए हैं। इनमें टी-72 टैंक के लिए 50 क्रू गनरी सिमुलेटर (सीजीएस), 50 बेसिक गनरी सिमुलेटर (बीजीएस) और टी-90 टैंक के लिए 50 क्रू गनरी सिमुलेटर (सीजीएस) शामिल हैं।

T-72 T-90 Tanks Gunnery Simulator: रक्षा मंत्रालय ने शुरू की खरीद प्रक्रिया

ये तीनों आरएफआई रक्षा मंत्रालय के तहत इंटीग्रेटेड हेडक्वार्टर ऑफ मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस (आर्मी) के डायरेक्टरेट जनरल ऑफ आर्मर्ड कॉर्प्स एंड मैकेनाइज्ड फोर्सेज की ओर से जारी किए गए हैं।

भारतीय सेना के पास बड़ी संख्या में टी-72 और टी-90 मुख्य युद्धक टैंक हैं। ये दोनों टैंक पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर सेना की बख्तरबंद ताकत की रीढ़ माने जाते हैं। इन टैंकों के चालक दल को लगातार अभ्यास कराना जरूरी होता है, ताकि किसी भी समय ऑपरेशन के लिए तैयार रखा जा सके।

अब तक अधिकांश गनरी एक्सरसाइज फायरिंग रेंज में असली गोला-बारूद के साथ की जाती हैं। ऐसी ट्रेनिंग में भारी खर्च आता है। इसके अलावा गोला-बारूद, ईंधन, टैंक की आवाजाही, रखरखाव और फायरिंग रेंज की उपलब्धता जैसी कई चुनौतियां भी होती हैं। मौसम खराब होने या रेंज उपलब्ध नहीं होने पर ट्रेनिंग भी प्रभावित हो सकती है।

इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए सेना अब सिमुलेशन आधारित ट्रेनिंग पर अधिक जोर दे रही है। इससे सैनिकों को बार-बार अभ्यास कराने में आसानी होगी और वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियां भी तैयार की जा सकेंगी। (T-72 T-90 Tanks Gunnery Simulator)

क्या होता है गनरी सिमुलेटर

गनरी सिमुलेटर एक ऐसा डिजिटल ट्रेनिंग सिस्टम होता है, जिसमें असली टैंक के अंदर का पूरा माहौल तैयार किया जाता है। इसमें गनर और कमांडर उसी तरह बैठते हैं जैसे असली टैंक में बैठते हैं। उनके सामने वही कंट्रोल, वही साइट, वही डिस्प्ले और वही वेपन ऑपरेशन सिस्टम होता है।

जब अभ्यास शुरू होता है तो सामने बड़ी स्क्रीन पर कंप्यूटर से तैयार किया गया पूरा बेटल फील्ड दिखाई देता है। इसमें पहाड़, रेगिस्तान, जंगल, मैदान, गांव, दुश्मन के टैंक, बख्तरबंद वाहन और दूसरे मिलिट्री टारगेट दिखाए जाते हैं। चालक दल को इन्हें पहचानकर उन पर हमला करना होता है।

सिस्टम हर कार्रवाई को रिकॉर्ड करता है और यह भी बताता है कि निशाना कितना सटीक था, टारगेट पर हमला करने में कितना समय लगा और किस जगह गलती हुई।

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खरीदे जाएंगे दो तरह के सिमुलेटर

सेना इस बार टी-72 टैंकों के लिए दो अलग-अलग तरह के गनरी सिमुलेटर खरीदने की तैयारी कर रही है।

पहला है क्रू गनरी सिमुलेटर (सीजीएस)। इसमें गनर और कमांडर दोनों एक साथ अभ्यास करेंगे। इसका उद्देश्य पूरे टैंक चालक दल के बीच तालमेल बढ़ाना है।

दूसरा है बेसिक गनरी सिमुलेटर (बीजीएस)। यह मुख्य रूप से गनर की व्यक्तिगत ट्रेनिंग के लिए बनाया गया है। इसमें टारगेट पहचानना, दूरी मापना, निशाना लगाना और अलग-अलग हथियारों का इस्तेमाल करना सिखाया जाता है। (T-72 T-90 Tanks Gunnery Simulator)

टी-72 और टी-90 के लिए अलग-अलग सिस्टम

हालांकि दोनों टैंकों में 125 मिमी की मुख्य तोप होती है, लेकिन उनके अंदर का लेआउट, कंट्रोल सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अलग-अलग हैं। इसी वजह से दोनों टैंकों के लिए अलग सिमुलेटर बनाए जाएंगे।

टी-72 सिमुलेटर में उसी टैंक के कंट्रोल, गनर स्टेशन, कमांडर स्टेशन और फायर कंट्रोल सिस्टम को दोबारा तैयार किया जाएगा। इसी तरह टी-90 सिमुलेटर में टी-90 के आधुनिक उपकरण, थर्मल साइट और दूसरे सिस्टम उसी तरह काम करेंगे जैसे असली टैंक में करते हैं।

इससे चालक दल को वही अनुभव मिलेगा, जो उन्हें असली टैंक चलाते समय मिलता है।

नए सिमुलेटरों में छह दिशाओं में मूवमेंट करने वाला 6-डीओएफ मोशन प्लेटफॉर्म लगाया जाएगा। इसका मतलब है कि जब टैंक ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर चलेगा, अचानक मुड़ेगा या फायर करेगा, तो चालक दल को वही झटका महसूस होगा जो असली टैंक में होता है।

गोला दागने के समय रिकॉयल यानी पीछे की ओर लगने वाला झटका भी महसूस होगा। टैंक के इंजन की आवाज, ऑटो लोडर की आवाज, गोला भरने की प्रक्रिया, गोली चलने की आवाज और युद्ध क्षेत्र की अन्य ध्वनियां भी वास्तविक माहौल जैसा अनुभव देंगी।

इसके साथ ही कंप्यूटर से तैयार किए गए त्रि-आयामी युद्ध क्षेत्र में बारिश, बर्फबारी, धूल, धुआं, कोहरा, दिन और रात जैसे अलग-अलग हालात भी बनाए जा सकेंगे। इससे चालक दल हर तरह की परिस्थितियों में अभ्यास कर सकेगा।

एआई से होगी गलतियों की पहचान

नए गनरी सिमुलेटरों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) बेस्ड ट्रेनिंग सिस्टम भी शामिल होगा। इसका काम केवल अभ्यास कराना नहीं होगा, बल्कि हर सैनिक के प्रदर्शन का विश्लेषण करना भी होगा।

यदि गनर टारगेट पहचानने में देर करता है, गलत गोला चुनता है या निशाना लगाने में गलती करता है तो सिस्टम तुरंत उसे रिकॉर्ड करेगा। ट्रेनिंग पूरी होने के बाद इंस्ट्रक्टर यह देख सकेंगे कि चालक दल ने कहां गलती की और उसे कैसे सुधारा जा सकता है। अलग-अलग स्तर के युद्ध अभ्यास भी तैयार किए जा सकेंगे, जिनमें आसान से लेकर बेहद मुश्किल टारगेट शामिल होंगे।

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अलग-अलग हथियारों का अभ्यास भी होगा

सिमुलेटर में टैंक के अलग-अलग हथियारों का इस्तेमाल भी सिखाया जाएगा। चालक दल मुख्य तोप के अलावा को-एक्सियल मशीन गन, एंटी एयरक्राफ्ट मशीन गन और स्मोक ग्रेनेड सिस्टम का भी अभ्यास कर सकेगा।

सिस्टम में अलग-अलग तरह के गोला-बारूद का भी डिजिटल मॉडल होगा। इसमें आर्मर पियर्सिंग फिन स्टेबलाइज्ड डिस्कार्डिंग सबोट (एपीएफएसडीएस), हाई एक्सप्लोसिव एंटी टैंक (एचईएटी), हाई एक्सप्लोसिव (एचई) और इनवार गाइडेड मिसाइल जैसी क्षमताओं का अभ्यास कराया जा सकेगा। इससे चालक दल अलग-अलग परिस्थितियों में सही हथियार चुनने का अनुभव हासिल करेगा। (T-72 T-90 Tanks Gunnery Simulator)

थर्मल साइट और फायर कंट्रोल सिस्टम का भी अभ्यास

नए सिमुलेटरों में टैंक के फायर कंट्रोल सिस्टम और थर्मल साइट भी दिया जाएगा। इससे चालक दल दिन और रात दोनों समय टारगेट खोजने और उस पर हमला करने का अभ्यास कर सकेगा।

सिस्टम में लेजर रेंज फाइंडर, दूरी मापने की प्रक्रिया, लक्ष्य को ट्रैक करना और चलते हुए टारगेट पर निशाना लगाने जैसी सभी प्रक्रियाएं शामिल होंगी। इससे जवानों को वही अनुभव मिलेगा जो वास्तविक ऑपरेशन के दौरान मिलता है।

पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं जैसे इलाके दिखेंगे

इन सिमुलेटरों में केवल सामान्य मैदान नहीं दिखेंगे, बल्कि भारत की पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं जैसे इलाके भी तैयार किए जाएंगे। कंप्यूटर से तैयार थ्रीडी नक्शों में रेगिस्तान, पहाड़ी क्षेत्र, जंगल और बर्फीले इलाके शामिल होंगे।

इसके अलावा धूल भरी आंधी, बारिश, बर्फबारी, कोहरा, धुआं और दिन-रात जैसी परिस्थितियां भी बनाई जा सकेंगी। इससे चालक दल अलग-अलग मौसम और टेरेन में टैंक चलाने का अभ्यास कर सकेगा। (T-72 T-90 Tanks Gunnery Simulator)

इंस्ट्रक्टर एक क्लिक में बदल सकेंगे पूरा बैटल फील्ड

इन सिमुलेटरों के साथ इंस्ट्रक्टर के लिए अलग कंट्रोल स्टेशन भी होगा। यहीं से पूरा अभ्यास संचालित किया जाएगा। इंस्ट्रक्टर किसी भी समय युद्ध क्षेत्र बदल सकेंगे, नए टारगेट जोड़ सकेंगे, टैंक में तकनीकी खराबी दिखा सकेंगे या किसी भी स्थिति को दोबारा चला सकेंगे। पूरी ट्रेनिंग रिकॉर्ड होगी, जिसे बाद में दोबारा देखकर चालक दल की समीक्षा की जा सकेगी।

15 साल तक लगातार इस्तेमाल के लिए तैयार होंगे सिस्टम

सेना ने सिमुलेटरों के लिए लंबे समय तक इस्तेमाल की शर्त भी रखी है। सूत्रों के मुताबिक, इनकी न्यूनतम सेवा अवधि 15 वर्ष होगी। इन्हें प्रतिदिन 12 से 16 घंटे तक लगातार चलाने की क्षमता भी होनी चाहिए।

साथ ही इन्हें माइनस 10 डिग्री सेल्सियस से लेकर 48 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान और अधिक नमी वाले वातावरण में भी काम करने योग्य बनाया जाएगा। बिजली जाने की स्थिति में बैकअप पावर की व्यवस्था भी रहेगी।

एक जगह से दूसरी जगह आसानी से ले जाए जा सकेंगे

सेना चाहती है कि इन सिमुलेटरों को जरूरत पड़ने पर आसानी से एक ट्रेनिंग सेंटर से दूसरे सेंटर तक ले जाया जा सके। इसलिए इन्हें कंटेनर आधारित डिजाइन में तैयार करने की मांग की गई है। सूत्रों के अनुसार, पूरा सिस्टम ऐसा होगा जिसे सेना के अशोक लेलैंड स्टैलियन ट्रक से आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाया जा सके।

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स्वदेशी तकनीक पर रहेगा जोर

इन आरएफआई में सेना ने कंपनियों से यह जानकारी भी मांगी है कि सिस्टम में इस्तेमाल होने वाले प्रमुख हिस्से कितने स्वदेशी हैं। सॉफ्टवेयर, इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी और अन्य महत्वपूर्ण उपकरणों के बारे में भी जानकारी देनी होगी।

इसका उद्देश्य केवल सिमुलेटर खरीदना नहीं, बल्कि देश में रक्षा सिमुलेशन तकनीक का मजबूत आधार तैयार करना भी है। रक्षा क्षेत्र में पहले से काम कर रही कई भारतीय कंपनियां इस क्षेत्र में अपनी तकनीक विकसित कर चुकी हैं और उनके इस प्रक्रिया में भाग लेने की संभावना है। (T-72 T-90 Tanks Gunnery Simulator)

लाइव फायरिंग पर निर्भरता होगी कम

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक सेनाएं अब सिमुलेशन आधारित प्रशिक्षण पर अधिक जोर दे रही हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इजरायल और दक्षिण कोरिया जैसी सेनाएं सालों से एडवांस टैंक सिमुलेटरों का इस्तेमाल कर रही हैं।

भारतीय सेना भी अब उसी दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। सिमुलेटरों की मदद से गोला-बारूद की बचत होगी, टैंकों पर होने वाला घिसाव कम होगा और चालक दल को एक ही दिन में कई बार अभ्यास कराने की सुविधा मिलेगी। इससे वास्तविक फायरिंग रेंज का उपयोग केवल अंतिम चरण की ट्रेनिंग के लिए किया जा सकेगा।

अभी आरएफआई चरण में है पूरी प्रक्रिया

फिलहाल यह पूरी परियोजना रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन (आरएफआई) स्टेज में है। इसके बाद कंपनियों से मिली जानकारी का मूल्यांकन किया जाएगा। तकनीकी जरूरतों के आधार पर आगे रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) जारी होगी। इसके बाद परीक्षण, मूल्यांकन और रक्षा खरीद प्रक्रिया के अनुसार अंतिम चयन किया जाएगा। (T-72 T-90 Tanks Gunnery Simulator)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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