📍नई दिल्ली | 13 Jul, 2026, 7:57 PM
AS-HAPS Project India: भारतीय वायुसेना को जल्द ही ऐसी टेक्नोलॉजी मिलने वाली है जिसमें उसे बिना अंतरिक्ष में गए ही दुश्मन की निगरानी कर सकेगी। रक्षा मंत्रालय ने एयरशिप आधारित हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट (AS-HAPS) के डिजाइन और विकास के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी कर दिया है। यह प्रोजेक्ट डीएपी-2020 की मेक-1 कैटेगरी के तहत शुरू किया गया है।
खास बात यह है कि इस महीने की शुरुआत में हुई डीएसी की बैठक में भारतीय वायुसेना के लिए फिक्स्ड-विंग हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट (FW-HAPS) की खरीद को भी मंजूरी दी थी। वहीं अब एयरशिप बेस्ड सिस्टम के लिए डेवलपमेंट प्रोसेस शुरू होने से भारत एक साथ दो अलग-अलग तरह के हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट प्लेटफॉर्म पर काम कर रहा है।
AS-HAPS Project India: क्या है हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट
सूत्रों के मुताबिक, हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट ऐसा मानव रहित प्लेटफॉर्म होता है, जो धरती की सतह से करीब 18 से 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर लंबे समय तक उड़ान भर सकता है। यह ऊंचाई सामान्य यात्री विमानों से काफी अधिक होती है और मौसम का असर भी बहुत कम रहता है।
इसे स्यूडो सैटेलाइट इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट की तरह लगातार एक निश्चित क्षेत्र पर नजर बनाए रख सकता है। फर्क सिर्फ इतना है कि इसे जरूरत पड़ने पर वापस जमीन पर उतारा जा सकता है और दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है।
एयरशिप बेस्ड सिस्टम क्यों है खास
सूत्रों के मुताबिक इस प्रोजेक्ट में वायुसेना एयरशिप बेस्ड प्लेटफॉर्म डेवलप कराना चाहती है। यह गैस से भरा एक बड़ा एयरशिप होगा, जो सौर ऊर्जा और अन्य ऊर्जा प्रणालियों की मदद से लंबे समय तक हवा में रह सकेगा।
इसकी सबसे बड़ी खूबी यह होगी कि यह एक ही इलाके के ऊपर कई दिनों या कई सप्ताह तक लगातार उड़ान भर सकता है। इसी वजह से यह सीमा क्षेत्रों, समुद्री इलाकों और दूर-दराज के क्षेत्रों में लगातार निगरानी रखने के लिए काफी उपयोगी माना जा रहा है। (AS-HAPS Project India)
20 किलोमीटर ऊंचाई पर करेगा काम
सूत्रों के अनुसार, एएस-एचएपीएस को करीब 18 से 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर काम करने के लिए तैयार किया जाएगा। इस ऊंचाई पर वायुमंडल अपेक्षाकृत स्थिर होता है, जिससे प्लेटफॉर्म लंबे समय तक कम से कम एक महीने तक एक ही इलाके में रह सकता है।
वहीं, यह प्लेटफॉर्म केवल निगरानी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें ऐसे उपकरण लगाए जा सकेंगे, जिनकी मदद से खुफिया जानकारी जुटाई जा सके, दूर-दराज के इलाकों में कम्युनिकेशन फैसिलिटी उपलब्ध कराई जा सके और विभिन्न प्रकार के सेंसर्स के जरिए जमीन पर हो रही गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा सके।
इसमें इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल कैमरे, इन्फ्रारेड सेंसर, रडार, कम्युनिकेशन रिले सिस्टम और अन्य विशेष 500-2000 किग्रा तक के पेलोड लगाए जा सकते हैं। जरूरत के अनुसार अलग-अलग मिशन के लिए इसका पेलोड बदला भी जा सकेगा।
सैटेलाइट से सस्ता और ज्यादा लचीला विकल्प
सूत्रों का कहना है कि हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट का सबसे बड़ा फायदा इसकी लागत और संचालन है। किसी सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजने के लिए रॉकेट की जरूरत होती है, जबकि एएस-एचएपीएस को जमीन से उड़ाया जा सकता है।
जरूरत पूरी होने के बाद इसे वापस उतारकर रखरखाव किया जा सकता है और फिर दोबारा उड़ान पर भेजा जा सकता है। इसी कारण यह कई मिशनों में पारंपरिक सैटेलाइट का कम लागत वाला विकल्प माना जाता है।
मेक-1 कैटेगरी में होगा डेवलपमेंट
सूत्रों के मुताबिक, यह प्रोजेक्ट रक्षा खरीद प्रक्रिया-2020 की मेक-1 कैटेगरी के तहत शुरू किया गया है। इस मॉडल में सरकार और कंपनियां मिलकर नई डिफेंस टेक्नोलॉजी डेवलप करते हैं। विकास कार्य के दौरान सरकारी सहायता भी उपलब्ध कराई जाती है, ताकि देश में नई तकनीकों का विकास तेज हो सके।
भारतीय वायुसेना ने योग्य भारतीय कंपनियों और उद्योग समूहों से इस प्रोजेक्ट के लिए प्रस्ताव मांगे हैं। आवेदन की अंतिम तारीख 10 अगस्त तय की गई है। (AS-HAPS Project India)
डीएसी पहले ही दे चुकी है एक और एचएपीएस को मंजूरी
3 जुलाई को रक्षा अधिग्रहण परिषद ने भारतीय वायुसेना के लिए फिक्स्ड-विंग हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट की खरीद को स्वीकृति दी थी। यह विमान की तरह पंखों वाला मानव रहित प्लेटफॉर्म होगा, जो सौर ऊर्जा और बैटरी की मदद से कई सप्ताह तक स्ट्रेटोस्फियर में उड़ान भर सकेगा।
फिक्स्ड-विंग और एयरशिप बेस्ड दोनों सिस्टम्स अलग-अलग जरूरतों को पूरा करेंगे। फिक्स्ड-विंग प्लेटफॉर्म अपेक्षाकृत तेज रफ्तार से बड़े क्षेत्र में काम कर सकता है, जबकि एयरशिप आधारित प्लेटफॉर्म अधिक समय तक एक स्थान पर रहकर निगरानी करने के लिए उपयुक्त माना जाता है। (AS-HAPS Project India)
इसे बनाने में जुटीं कई कंपनियां
सूत्रों के मुताबिक, देश की कई कंपनियां पहले से ही इस तरह की तकनीक पर काम कर रही हैं। सरकारी क्षेत्र की नेशनल एयरोस्पेस लेबोरेटरीज और न्यूस्पेस रिसर्च एंड लैबोरेट्रीज समेत निजी क्षेत्र की कुछ डिफेंस कंपनियां लंबे समय तक उड़ान भरने वाले हाई एल्टीट्यूड प्लेटफॉर्म तैयार करने में जुटी हुई हैं। वहीं, रक्षा मंत्रालय के इस नए प्रोजेक्ट से इन कंपनियों को स्वदेशी सिस्टम डेवलप करने का मौका मिलेगा।
सूत्रों का कहना है कि भारतीय वायुसेना ऐसे प्लेटफॉर्म चाहती है, जो लंबे समय तक बिना रुके सीमावर्ती और समुद्री क्षेत्रों पर नजर रख सकें। लगातार उड़ान भरने की क्षमता के कारण यह प्रणाली खुफिया जानकारी जुटाने, संचार सहायता देने और निगरानी मिशनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। (AS-HAPS Project India)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।



